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  • शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन करें मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें पौराणिक कथा, प्रिय भोग, मंत्र और पूजन विधि

    शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन करें मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें पौराणिक कथा, प्रिय भोग, मंत्र और पूजन विधि

    नई दिल्ली ।शारदीय नवरात्रि का तीसरा दिन 13 अक्टूबर 2026 को मनाया जा रहा है। इस दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी की आराधना से मन को शांति मिलती है और व्यक्ति में साहस, धैर्य तथा एकाग्रता का भाव विकसित होता है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप कठिन परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखने की प्रेरणा देता है। आज की व्यस्त दिनचर्या में कामकाज का दबाव और एक साथ कई जिम्मेदारियां निभाने की चुनौती लोगों के मानसिक तनाव को बढ़ा सकती है। ऐसे में भक्त मां चंद्रघंटा की पूजा करके मानसिक शांति और सकारात्मकता की कामना करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है। इसी कारण देवी को चंद्रघंटा कहा जाता है। देवीभागवत पुराण में उनके स्वरूप का वर्णन मिलता है। उनका शरीर स्वर्ण के समान चमकदार बताया गया है। मां की दस भुजाएं हैं और वे सिंह पर सवार रहती हैं। उनकी भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं। देवी का यह रूप सौम्यता और वीरता का प्रतीक माना जाता है। उनकी आराधना में भक्त शक्ति, साहस और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।

    पौराणिक कथा के अनुसार, जब महिषासुर नामक दैत्य का अत्याचार बढ़ने लगा और देवताओं को परेशान किया जाने लगा, तब मां दुर्गा ने दुष्ट शक्तियों का मुकाबला करने के लिए चंद्रघंटा का स्वरूप धारण किया। मान्यता है कि देवी के घंटे की भयानक ध्वनि से दैत्यों में भय फैल गया और बुरी शक्तियों का नाश हुआ। इसी कारण उनके घंटे को नकारात्मक शक्तियों को दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा के संचार का प्रतीक माना जाता है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप यह संदेश भी देता है कि विपरीत परिस्थितियों में घबराने के बजाय धैर्य और साहस के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

    नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाने की परंपरा है। भक्त माता को मखाने या केसर की खीर, पेड़े, रबड़ी और मेवों से बनी मिठाइयां अर्पित कर सकते हैं। फूलों में कमल और सफेद या पीली चमेली को प्रिय माना जाता है। इसके अलावा लाल गुलाब, गेंदा और पीले रंग के फूल भी पूजा में चढ़ाए जा सकते हैं। पूजन के लिए सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल को साफ रखें। इसके बाद मां की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक और धूप जलाएं, फूल अर्पित करें तथा दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं। श्रद्धापूर्वक आरती करें और पूजा के दौरान मन को शांत रखने का प्रयास करें।

    मां चंद्रघंटा की आराधना में मंत्र जाप का भी विशेष महत्व माना जाता है। भक्त देवी का ध्यान करते हुए ‘ॐ देवी चंद्रघण्टायै नमः॥’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। उनका ध्यान मंत्र है, ‘पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥’ इसका भावार्थ है कि श्रेष्ठ सिंह पर सवार, दुष्टों के संहार के लिए अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली और चंद्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध देवी भक्त पर अपनी कृपा बनाए रखें।

    पूजा के दौरान क्रोध, कटुता और अनावश्यक विवाद से बचने की सलाह दी जाती है। घर और पूजा स्थल में स्वच्छता बनाए रखें तथा बासी फूलों को जमा न होने दें। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, नवरात्रि में सात्विक भोजन करने और शराब तथा मांसाहार से दूर रहने की सलाह दी जाती है। मां चंद्रघंटा की आराधना का संदेश है कि कामकाज के दबाव और जीवन की कठिनाइयों के बीच भी शांत मन से निर्णय लेना चाहिए। घर और कार्यस्थल पर अनावश्यक शोर से बचना, दूसरों का सम्मान करना और धैर्य बनाए रखना जीवन में संतुलन स्थापित करने में मदद कर सकता है।

  • देवास की माता टेकरी की अनोखी कथा, रूठकर पाताल में समाने लगीं बड़ी माता तो छोटी माता ने छोड़ी टेकरी

    देवास की माता टेकरी की अनोखी कथा, रूठकर पाताल में समाने लगीं बड़ी माता तो छोटी माता ने छोड़ी टेकरी

    मध्य प्रदेश: के देवास शहर की ऐतिहासिक माता टेकरी धार्मिक आस्था और प्राचीन मान्यताओं के लिए विशेष पहचान रखती है। यहां स्थित मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा के मंदिरों में सालभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। नवरात्रि के दौरान दोनों मंदिरों में विशेष उत्साह दिखाई देता है। इस अवसर पर मंदिरों को आकर्षक रोशनी से सजाया गया है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर रहे हैं। मान्यता है कि दोनों देवियों के यहां विराजमान होने के कारण ही इस स्थान का नाम देवास पड़ा। माता टेकरी से जुड़ी कई लोककथाएं प्रचलित हैं, जिनमें दो रूठी हुई बहनों की कहानी विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

    लोकमान्यता के अनुसार, माता टेकरी पर विराजित मां तुलजा भवानी को बड़ी माता और मां चामुंडा को छोटी माता कहा जाता है। प्रचलित कथा के मुताबिक, एक बार किसी बात को लेकर दोनों बहनों के बीच विवाद हो गया। इससे नाराज होकर दोनों ने टेकरी छोड़ने का फैसला कर लिया। बड़ी माता क्रोधित होकर पाताल में समाने लगीं, जबकि छोटी माता टेकरी से नीचे उतरने लगीं। जब इस घटना की जानकारी भैरवजी और हनुमानजी को मिली तो वे दोनों देवियों को मनाने पहुंचे। उस समय तक बड़ी माता का आधा शरीर पाताल में समा चुका था और छोटी माता टेकरी से काफी नीचे उतर आई थीं। देवताओं ने दोनों से रुकने और वापस लौटने की विनती की। उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए दोनों देवियां उसी अवस्था में रुक गईं। लोकविश्वास के अनुसार, इसी वजह से बड़ी माता के आधे स्वरूप को पाताल में माना जाता है। यह कथा आज भी माता टेकरी की धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    माता टेकरी को लेकर एक अन्य धार्मिक मान्यता भी प्रचलित है। इसे रक्तपीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, यहां माता सती के हृदय से रक्त की बूंदें गिरी थीं। इसी पवित्र स्थान पर पहाड़ों के बीच से मां चामुंडा के प्रकट होने की मान्यता है, जबकि मां तुलजा भवानी को स्वयंभू माना जाता है। इन मान्यताओं के कारण माता टेकरी का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। नवरात्रि के दौरान यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु दोनों देवियों के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

    देवास के इतिहास में भी दोनों मंदिरों का विशेष स्थान रहा है। यहां कभी पवार राजवंश की दो रियासतें थीं, जिन्हें सीनियर और जूनियर रियासत के नाम से जाना जाता था। मान्यता के अनुसार, मां तुलजा भवानी जूनियर रियासत की कुलदेवी थीं, जबकि मां चामुंडा सीनियर रियासत की कुलदेवी मानी जाती थीं। इसी परंपरा के चलते दोनों देवियों के मंदिरों का राजपरिवार और स्थानीय धार्मिक संस्कृति से गहरा संबंध रहा है। आज भी श्रद्धालु इन मंदिरों को आस्था के प्रमुख केंद्र के रूप में देखते हैं।

    माता टेकरी को नाथ संप्रदाय की साधना स्थली के रूप में भी जाना जाता है। इस स्थान की परंपराएं गुरु गोरक्षनाथ, राजा भर्तृहरि और शीलनाथ महाराज जैसे योगियों से जुड़ी हुई हैं। लोककथाओं में टेकरी से उज्जैन तक लगभग 45 किलोमीटर लंबी गुप्त सुरंग होने का उल्लेख भी मिलता है। मान्यता है कि राजा भर्तृहरि इस सुरंग के रास्ते यहां आते थे, हालांकि इस दावे की ऐतिहासिक पुष्टि आवश्यक है।

    नवरात्रि के अवसर पर माता टेकरी के दोनों मंदिरों को आकर्षक विद्युत रोशनी से सजाया गया है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पेयजल की व्यवस्था की गई है और गर्मी से राहत देने के लिए कारपेट बिछाए गए हैं। नौ दिनों तक मंदिरों में चौबीस घंटे दर्शन की व्यवस्था रहती है। कई श्रद्धालु घुटनों के बल तो कुछ व्हीलचेयर के सहारे माता के दरबार तक पहुंच रहे हैं। शहर के विभिन्न स्थानों पर भंडारे आयोजित किए जा रहे हैं, जहां इंदौर, उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु प्रसादी ग्रहण कर रहे हैं। रसूलपुर चौराहे से इंदिरा गांधी चौराहे तक विद्युत सजावट और विभिन्न स्थानों पर भगवा ध्वजों के साथ देवास में नवरात्रि का धार्मिक उत्साह दिखाई दे रहा है।

  • मध्य प्रदेश के कायमोर प्लांट में अदाणी सीमेंट ने 15,000 सीमेंट बैग से बनाई मां दुर्गा की 70 फीट ऊंची आकृति

    मध्य प्रदेश के कायमोर प्लांट में अदाणी सीमेंट ने 15,000 सीमेंट बैग से बनाई मां दुर्गा की 70 फीट ऊंची आकृति


    नई दिल्ली ।
    नवरात्रि और दुर्गा पूजा 2026 के अवसर पर अदाणी सीमेंट ने मध्य प्रदेश के कायमोर प्लांट में मां दुर्गा को समर्पित एक अनूठी कलाकृति तैयार की है। 15,000 सीमेंट बैग की मदद से बनाई गई इस विशाल आकृति के माध्यम से आस्था, शक्ति और विश्वास का संदेश देने का प्रयास किया गया है। कंपनी की इस पहल को ‘जहां विश्वास, वहां शक्ति’ नाम दिया गया है। इस रचना की खासियत इसका आकार और इसे तैयार करने का तरीका है, जिसमें हजारों सीमेंट बैग मिलकर देवी दुर्गा की एक विशाल छवि बनाते हैं।

    यह कलाकृति 70 फीट लंबी और 70 फीट चौड़े क्षेत्र में तैयार की गई है। इसमें अंबुजा सीमेंट और एसीसी के बैगों का इस्तेमाल करते हुए कुल 750 टन सीमेंट का प्रतीकात्मक उपयोग किया गया। इस पूरी रचना को आकार देने में लगभग 12,600 मानव-घंटों का सामूहिक श्रम लगा। कर्मचारियों ने सीमेंट बैगों को निर्धारित स्थानों पर व्यवस्थित करके देवी की आकृति तैयार की। इस प्रक्रिया में अलग-अलग बैगों को इस तरह रखा गया कि वे मिलकर एक संपूर्ण और स्पष्ट छवि का रूप ले सकें।

    इस स्थापना की सबसे खास बात यह है कि जमीन से देखने पर सीमेंट के बैग अलग-अलग इकाइयों की तरह नजर आते हैं, लेकिन ऊंचाई से देखने पर उनका संयोजन मां दुर्गा की विशाल आकृति में बदल जाता है। इस कलाकृति में देवी का मुकुट, आंखें, दस भुजाएं और उनका व्यापक स्वरूप बारीकी से उकेरा गया है। अलग-अलग हिस्सों में व्यवस्थित किए गए बैगों के माध्यम से देवी की पूरी छवि तैयार की गई है। इस तरह यह रचना छोटे-छोटे तत्वों के सामूहिक संयोजन से एक बड़ी कलात्मक प्रस्तुति बनाने का उदाहरण पेश करती है।

    कंपनी ने कलाकृति को तैयार करने की पूरी प्रक्रिया और उसके अंतिम स्वरूप को एक डिजिटल फिल्म में दर्ज किया है। इसमें शुरुआत में कर्मचारियों को जमीन पर सीमेंट बैग व्यवस्थित करते हुए दिखाया गया है। इसके बाद कैमरा धीरे-धीरे ऊपर उठता है और अलग-अलग बैगों से बनी मां दुर्गा की पूरी आकृति सामने आती है। इस फिल्म में निर्माण प्रक्रिया के साथ कलाकृति का हवाई दृश्य भी शामिल किया गया है। इसे डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया पर साझा करने की योजना है।

    अदाणी सीमेंट के अनुसार, इस अभियान में उसके दो प्रमुख ब्रांड अंबुजा सीमेंट और एसीसी को एक साझा रचनात्मक मंच पर प्रस्तुत किया गया है। अभियान में ‘शक्ति’ को अंबुजा सीमेंट की मजबूती के वादे से जोड़ा गया है, जबकि ‘विश्वास’ एसीसी की नौ दशकों पुरानी विश्वसनीयता और विरासत का प्रतीक है। मां दुर्गा की छवि को इस प्रस्तुति का केंद्र बनाया गया है, जिन्हें शक्ति, संरक्षण और आस्था का प्रतीक माना जाता है।

    कंपनी का कहना है कि इस पहल के जरिए सीमेंट को केवल भवन और बुनियादी ढांचे के निर्माण से जुड़ी सामग्री के रूप में नहीं, बल्कि विश्वास, शक्ति और समर्पण जैसी भावनाओं से जोड़कर भी प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। नवरात्रि और दुर्गा पूजा के अवसर पर तैयार की गई यह कलाकृति परंपरा और सामूहिक प्रयास के महत्व को रेखांकित करती है। साथ ही, यह अंबुजा सीमेंट और एसीसी की पहचान को एक साथ सामने लाने का माध्यम भी बनी है।

  • नवरात्रि में माता रानी के स्वागत के लिए प्लेलिस्ट में शामिल करें ये 12 भजन, पूजा से लेकर माता की चौकी तक छाएगा भक्तिमय माहौल

    नवरात्रि में माता रानी के स्वागत के लिए प्लेलिस्ट में शामिल करें ये 12 भजन, पूजा से लेकर माता की चौकी तक छाएगा भक्तिमय माहौल


    नई दिल्ली । नवरात्रि का पर्व आते ही घरों और मंदिरों में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। भक्त माता की चौकी सजाते हैं, कलश स्थापना की तैयारी करते हैं और अखंड ज्योत जलाकर मां का स्वागत करते हैं। इस दौरान भक्ति संगीत का भी विशेष महत्व होता है। माता रानी के भजन पूजा के माहौल को भक्तिमय बनाने के साथ श्रद्धालुओं को अपनी आस्था व्यक्त करने का अवसर देते हैं। सुबह की पूजा से लेकर शाम की आरती और भजन संध्या तक, मां के गीत उत्सव की रौनक बढ़ा सकते हैं।

    नवरात्रि के लिए भजनों की प्लेलिस्ट तैयार करते समय ऐसे गीत चुने जा सकते हैं, जिनमें मां की ममता, भक्तों के प्रति विश्वास, देवी की महिमा और उनके दरबार की सुंदरता का वर्णन हो। कुछ भजन भक्त और माता के रिश्ते को भावनात्मक रूप से व्यक्त करते हैं, जबकि कुछ गीत नवरात्रि के आगमन और उत्सव की उमंग से जुड़े हैं। इस अवसर पर पुराने और नए भक्ति गीतों को एक साथ सुनने का विकल्प भी रखा जा सकता है।

    इस सूची में पहला भजन ‘माई है ना’ है। मां को अपना सहारा मानने वाले भक्तों के लिए यह गीत खास भाव रखता है। इसे सुबह की पूजा या दिन की शुरुआत के समय सुना जा सकता है। दूसरा भजन ‘मेरी मां के बराबर कोई नहीं’ है, जिसे पायल देव ने गाया है। यह गीत मां की ममता और उनके प्रति श्रद्धा की भावना को व्यक्त करता है। तीसरा भजन ‘मैं बालक तू माता’ है। इसके बोल भक्त और माता के बीच अटूट संबंध को दर्शाते हैं। इस गीत का आधुनिक संस्करण भी श्रोताओं के बीच लोकप्रिय है।

    चौथा गीत ‘मेरी माई जगदम्बा भवानी’ मां जगदम्बा की स्तुति से जुड़ा है। इसे प्लेलिस्ट में शामिल करके देवी के प्रति आस्था और श्रद्धा के भाव को स्थान दिया जा सकता है। पांचवां भजन ‘शेरावाली मां’ माता की स्तुति और उनके दरबार से जुड़ी भक्ति भावना को सामने लाता है। मां की सजावट, चुनरी और जयकारों के बीच इस तरह के गीत नवरात्रि के उत्सव के अनुकूल रहते हैं। छठा गीत ‘आई है नवरात्रि’ पर्व के आगमन की खुशी और उत्साह से जुड़ा है। इसे सुनकर पूजा की तैयारियों के दौरान उत्सवी माहौल बनाया जा सकता है।

    सातवां भजन ‘माई’ मां के दरबार में हाजिरी लगाने और उनके प्रति समर्पण व्यक्त करने की भावना से जुड़ा है। आठवां गीत ‘तेरे मंदिरों की शान निराली, री शेरावाली मां’ देवी के मंदिरों की सुंदरता, दरबार की रौनक और भक्तों की आस्था को केंद्र में रखता है। नौवां भजन ‘माता मेरी माता’ देवी के विभिन्न रूपों की महिमा का स्मरण कराने वाला गीत है। इन तीनों भजनों को माता की पूजा, भजन संध्या या घर में धार्मिक आयोजन के दौरान सुना जा सकता है।

    दसवां गीत ‘मैया का चोला है रंगला’ मां के श्रृंगार और रंग-बिरंगी चुनरी से जुड़े भावों को प्रस्तुत करता है। माता की चौकी सजाते समय या भजन संध्या में इसे शामिल किया जा सकता है। ग्यारहवां भजन ‘बिगड़ी मेरी बना दे’ मां के सामने अपनी परेशानियां रखने और उनसे सुख, शांति तथा साहस की कामना करने की भावना से जुड़ा है। बारहवां गीत ‘प्यारा सजा है तेरा द्वार’ माता के दरबार को सजाने और उनके स्वागत में भजन गाने की परंपरा से मेल खाता है। इसे कलश स्थापना, शाम की आरती या माता की चौकी से पहले सुना जा सकता है।

    नवरात्रि के नौ दिनों में इन 12 भजनों को अपनी पसंद के अनुसार प्लेलिस्ट में शामिल किया जा सकता है। सुबह की आरती, पूजा की तैयारी, माता की चौकी और शाम के धार्मिक आयोजन के लिए अलग-अलग गीत चुने जा सकते हैं। मां दुर्गा की स्तुति से जुड़े इन भजनों के माध्यम से परिवार के लोग एक साथ भक्ति के पल बिता सकते हैं और पर्व के दौरान श्रद्धा तथा उत्साह से भरा माहौल बना सकते हैं।

  • शारदीय नवरात्रि में नारंगी से पीकॉक ग्रीन तक नौ रंगों की परंपरा, जानें किस दिन किस देवी की पूजा होती है और क्या है रंगों का महत्व

    शारदीय नवरात्रि में नारंगी से पीकॉक ग्रीन तक नौ रंगों की परंपरा, जानें किस दिन किस देवी की पूजा होती है और क्या है रंगों का महत्व


    नई दिल्ली ।
    शारदीय नवरात्रि का पर्व देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ इस दौरान पारंपरिक कपड़े पहनने और हर दिन अलग रंग चुनने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। भक्त पूजा, गरबा और डांडिया जैसे आयोजनों के लिए अपने परिधानों की तैयारी पहले से करते हैं। नवरात्रि के प्रत्येक दिन को एक देवी स्वरूप से जोड़ा जाता है और प्रचलित रंगों की सूची में नारंगी, सफेद, लाल, रॉयल ब्लू, पीला, हरा, ग्रे, पर्पल और पीकॉक ग्रीन शामिल हैं। इन रंगों को उत्साह, शांति, शक्ति, प्रसन्नता और नई शुरुआत जैसे भावों से जोड़ा जाता है। हालांकि, रंगों का क्रम और उनसे जुड़ी मान्यताएं अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार बदल सकती हैं। पूजा के लिए किसी विशेष रंग के कपड़े पहनना अनिवार्य नहीं है।

    नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस दिन नारंगी रंग पहनने की परंपरा बताई जाती है। नारंगी रंग को उत्साह, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। भक्त इस अवसर पर नारंगी रंग की साड़ी, सूट या कुर्ता पहनकर पारंपरिक अंदाज अपना सकते हैं। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना होती है और सफेद रंग को इस दिन से जोड़ा जाता है। सफेद रंग शांति, सादगी और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सफेद सूट या साड़ी के साथ हल्की जूलरी पहनकर सादगी भरा उत्सवी लुक तैयार किया जा सकता है। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इस दिन लाल रंग पहनने की परंपरा है। लाल रंग को शक्ति और साहस से जोड़कर देखा जाता है। लाल साड़ी, अनारकली सूट या अन्य पारंपरिक परिधान इस दिन के लिए चुने जा सकते हैं।

    नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होती है और प्रचलित सूची में रॉयल ब्लू रंग शामिल है। इस रंग को गहराई, स्थिरता और शांति से जोड़ा जाता है। भक्त नीले रंग का कुर्ता, साड़ी या लहंगा पहनकर उत्सव के अनुरूप अपना पहनावा चुन सकते हैं। पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है। इस दिन पीला रंग पहनने की परंपरा बताई गई है। पीले रंग को खुशहाली, प्रसन्नता और उमंग का प्रतीक माना जाता है। पीले रंग की कुर्ती, साड़ी या सूट पारंपरिक परिधान के विकल्प हो सकते हैं। छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा होती है और हरे रंग को इस दिन से जोड़ा जाता है। हरा रंग प्रकृति, विकास और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर हरे रंग के परिधान पहनकर नवरात्रि के उत्सव में शामिल हुआ जा सकता है।

    सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। इस दिन ग्रे रंग को प्रचलित रंगों की सूची में रखा गया है। ग्रे रंग को संतुलन और स्थिरता से जोड़ा जाता है। इस दिन ग्रे रंग की साड़ी या एथनिक सूट के साथ सिल्वर जूलरी पहनने का विकल्प चुना जा सकता है। आठवें दिन मां महागौरी की आराधना होती है और पर्पल यानी बैंगनी रंग इस दिन से संबंधित माना गया है। बैंगनी रंग को गरिमा, समृद्धि और भव्यता से जोड़ा जाता है। इस दिन बैंगनी साड़ी, सूट या लहंगा पहनकर उत्सवी लुक तैयार किया जा सकता है। नवरात्रि के नौवें और अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। इस दिन पीकॉक ग्रीन यानी मोरपंखी हरे रंग को प्रचलित रंगों की सूची में शामिल किया गया है। इस रंग की साड़ी, सूट या लहंगा पहनकर भक्त अंतिम दिन के उत्सव के लिए पारंपरिक पहनावा चुन सकते हैं।

    नवरात्रि में नौ रंगों के कपड़े पहनने की परंपरा का उद्देश्य त्योहार के उत्साह और देवी उपासना से जुड़े भावों को पहनावे के माध्यम से व्यक्त करना भी है। अलग-अलग रंगों को विशेष गुणों और प्रतीकों से जोड़ा जाता है। लाल रंग शक्ति, सफेद शांति और हरा रंग प्रकृति तथा विकास का प्रतीक माना जाता है। इसी तरह नारंगी को ऊर्जा, पीले को प्रसन्नता और बैंगनी को भव्यता से जोड़ा जाता है। हालांकि, इन रंगों की सूची हर जगह एक जैसी नहीं होती और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार इसमें बदलाव देखने को मिल सकता है। इसलिए नवरात्रि के दौरान रंगों का चयन व्यक्तिगत पसंद, स्थानीय परंपरा और सुविधा के अनुसार किया जा सकता है। मां दुर्गा की आराधना में श्रद्धा और पूजा का महत्व प्रमुख है; किसी खास रंग के कपड़े पहनना धार्मिक रूप से अनिवार्य नहीं माना जाता।

  • शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू, पहले दिन घटस्थापना के लिए जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और जरूरी सामग्री

    शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू, पहले दिन घटस्थापना के लिए जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और जरूरी सामग्री

    नई दिल्ली ।शारदीय नवरात्रि का पर्व 11 अक्टूबर, रविवार से शुरू होगा। नौ दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक उत्सव में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान घर में सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना या कलश स्थापना के साथ पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत होती है। इस दिन विधि-विधान से कलश स्थापित करने की परंपरा है।

    घटस्थापना के लिए सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालु इन समयावधियों को ध्यान में रखकर पूजा की तैयारी कर सकते हैं। कलश स्थापना नवरात्रि की शुरुआत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। इसके बाद भक्त मां दुर्गा की आराधना करते हुए नौ दिनों तक पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

    कलश स्थापना से पहले पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री एकत्र कर लेनी चाहिए। इसके लिए चौड़े मुंह वाला मिट्टी का पात्र, साफ मिट्टी, जौ, कलश, गंगाजल, शुद्ध पानी, सिक्का, सुपारी, साबुत चावल यानी अक्षत, दूर्वा, रोली और कलावा की जरूरत होती है। इसके साथ ही आम या अशोक के पांच अथवा सात पत्ते और पानी वाला नारियल भी रखना चाहिए। पूजा के लिए लाल कपड़ा या चुनरी, फूल, फल, पान, इलायची, लौंग, घी का दीपक, मिठाई और बताशे भी उपयोगी सामग्री हैं।

    नवरात्रि के पहले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई कर लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। इस चौकी पर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। फिर पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण करें। इसके बाद माता रानी को फूल, चुनरी और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। पूजा शुरू करने से पहले सभी आवश्यक सामग्री व्यवस्थित रखना सुविधाजनक होता है।

    घटस्थापना की प्रक्रिया में सबसे पहले मिट्टी के पात्र में साफ मिट्टी डालकर जौ बोए जाते हैं। इसके ऊपर मिट्टी की हल्की परत डालें और थोड़ा पानी छिड़कें। इसके बाद इस पात्र को पूजा स्थल पर रख दें। नवरात्रि के नौ दिनों तक जौ में थोड़ा-थोड़ा पानी डालते रहना चाहिए, ताकि उनमें अंकुर निकल सकें। धार्मिक परंपरा में जौ बोने को समृद्धि और अच्छी फसल के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसे नई शुरुआत और खुशहाली से भी जोड़ा जाता है।

    इसके बाद कलश पर कलावा बांधें और उसमें गंगाजल तथा साफ पानी भरें। कलश में साबुत सुपारी, सिक्का, अक्षत और हल्दी की गांठ जैसी शुभ वस्तुएं रखी जा सकती हैं। फिर कलश के मुख पर आम या अशोक के पांच अथवा सात पत्ते सजाएं और उसके ऊपर नारियल स्थापित करें। तैयार कलश को जौ वाले पात्र के पास रखें। इसके बाद मां दुर्गा के सामने घी का दीपक जलाएं और धूप, फूल, फल तथा मिठाई अर्पित करें। अंत में मां दुर्गा के मंत्रों का जाप कर आरती करें।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में बोए गए जौ का अच्छी तरह अंकुरित होना शुभ संकेत माना जाता है। जौ को समृद्धि और अच्छी फसल से जोड़ने की परंपरा के चलते घटस्थापना के दौरान इन्हें विशेष महत्व दिया जाता है। इस प्रकार कलश स्थापना, जौ बोने और मां दुर्गा की पूजा के साथ नवरात्रि के नौ दिवसीय पर्व का आरंभ होता है।

  • 51 शक्तिपीठों में शामिल उत्तर प्रदेश के पांच प्रमुख धाम, कहीं मां विशालाक्षी तो कहीं कात्यायनी रूप में होती हैं पूजा

    51 शक्तिपीठों में शामिल उत्तर प्रदेश के पांच प्रमुख धाम, कहीं मां विशालाक्षी तो कहीं कात्यायनी रूप में होती हैं पूजा

    नई दिल्ली । नवरात्रि का पर्व शुरू होते ही देशभर के देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना और दर्शन का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। उत्तर प्रदेश में भी माता रानी के कई प्रसिद्ध मंदिर और शक्तिधाम स्थित हैं, जिनसे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं भक्तों की आस्था का प्रमुख आधार हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता सती के शरीर के अंग या आभूषण जहां-जहां गिरे, उन स्थानों को शक्तिपीठ कहा जाता है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी, प्रयागराज, चित्रकूट, वृंदावन और बलरामपुर में स्थित देवी मंदिरों को इसी परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। नवरात्रि के दौरान इन मंदिरों में विशेष पूजा होती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

    वाराणसी को भगवान शिव की नगरी के रूप में जाना जाता है। यहां मणिकर्णिका घाट के पास मां विशालाक्षी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है, जिसे शक्तिपीठों में विशेष स्थान प्राप्त है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्थान पर माता सती के कुंडल या मणिकर्णिका से संबंधित अंग गिरने की कथा प्रचलित है। मां विशालाक्षी को देवी शक्ति के स्वरूप में पूजा जाता है। श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और माता का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं। नवरात्रि के दिनों में मंदिर में भक्तों की संख्या बढ़ जाती है। काशी की धार्मिक पहचान और मां विशालाक्षी से जुड़ी मान्यताओं के कारण यह मंदिर देवी उपासना के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है।

    प्रयागराज में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम का विशेष धार्मिक महत्व है। इसी शहर में मां ललिता देवी का मंदिर स्थित है, जिसे प्रसिद्ध शक्तिधामों में शामिल माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस स्थान पर माता सती की अंगुली गिरी थी। प्रयागराज में मां कल्याणी देवी और अलोपी देवी के मंदिर भी श्रद्धालुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। इन मंदिरों में नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भक्त देवी के दर्शन करने और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के लिए यहां पहुंचते हैं। प्रयागराज के ये तीनों देवी मंदिर शहर की धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और पर्व के अवसर पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है।

    चित्रकूट भगवान श्रीराम से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां रामगिरि क्षेत्र में स्थित शक्तिपीठ को लेकर मान्यता है कि माता सती का वक्ष इस स्थान पर गिरा था। यहां देवी को मां शिवानी के रूप में भी पूजा जाता है। नवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालु मां शिवानी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं। चित्रकूट की धार्मिक पहचान भगवान राम से जुड़ी परंपराओं के साथ-साथ देवी उपासना से भी संबंधित है। यहां स्थित देवी धाम भक्तों के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है। नवरात्रि के दौरान पूजा-अर्चना और दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में बढ़ोतरी होती है।

    वृंदावन भगवान श्रीकृष्ण की नगरी के रूप में प्रसिद्ध है, लेकिन यहां देवी उपासना की भी महत्वपूर्ण परंपरा है। यहां मां कात्यायनी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है, जिसे शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्थान पर माता सती के केश या चूड़ामणि गिरे थे। नवरात्रि में श्रद्धालु मां कात्यायनी के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के तुलसीपुर में स्थित देवीपाटन मंदिर मां पाटेश्वरी को समर्पित है। भारत-नेपाल सीमा के पास स्थित यह मंदिर प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। मान्यता है कि यहां माता सती का स्कंध यानी कंधा गिरा था। नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष पूजा होती है और दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इन धामों से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं उत्तर प्रदेश में देवी उपासना की विविध परंपराओं को दर्शाती हैं।

  • शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से, हाथी पर मां दुर्गा का आगमन और 10 दिनों तक पूजा का कारण जानें

    शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से, हाथी पर मां दुर्गा का आगमन और 10 दिनों तक पूजा का कारण जानें

    नई दिल्ली । शारदीय नवरात्रि का पर्व इस साल 11 अक्टूबर 2026, रविवार से शुरू होगा। देशभर में इस दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाएगी। भक्त व्रत और साधना के साथ माता रानी से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करेंगे। इस बार नवरात्रि को लेकर खास बात यह है कि पर्व सामान्य नौ दिनों के बजाय 10 दिनों तक चलेगा। तिथियों में वृद्धि होने के कारण नवरात्रि की अवधि एक दिन बढ़ गई है और इसका समापन 20 अक्टूबर को विजयादशमी तथा दशहरा के साथ होगा।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि की शुरुआत जिस वार से होती है, उसके आधार पर मां दुर्गा के वाहन के आगमन की मान्यता जुड़ी होती है। इस बार नवरात्रि रविवार से शुरू हो रही है, इसलिए मां दुर्गा के हाथी पर आगमन की मान्यता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में हाथी को स्थिरता, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। माता के हाथी पर आने को अच्छी वर्षा और धन-धान्य में वृद्धि का संकेत भी माना जाता है।

    नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना की जाएगी। इस दिन मां शैलपुत्री की पूजा होगी। घटस्थापना का मुहूर्त सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक बताया गया है। भक्त इस दौरान विधि-विधान से कलश स्थापना कर नवरात्रि की पूजा की शुरुआत कर सकते हैं।

    इस बार 10 दिनों तक नवरात्रि चलने का कारण तिथियों में वृद्धि है। पंचांग के अनुसार सप्तमी तिथि दो दिन रहने के कारण पर्व की अवधि एक दिन बढ़ गई है। हालांकि नवरात्रि के धार्मिक आधार में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की ही पूजा की जाएगी। यानी पूजा के क्रम में नौ देवियों की आराधना ही रहेगी, लेकिन तिथियों की गणना के कारण नवरात्रि का पूरा पर्व 10 कैलेंडर दिनों में संपन्न होगा।

    11 अक्टूबर को प्रतिपदा के दिन मां शैलपुत्री की पूजा और घटस्थापना होगी। 12 अक्टूबर को द्वितीया पर मां ब्रह्मचारिणी, 13 अक्टूबर को तृतीया पर मां चंद्रघंटा और 14 अक्टूबर को चतुर्थी पर मां कूष्मांडा की आराधना होगी। 15 अक्टूबर को पंचमी के दिन मां स्कंदमाता और 16 अक्टूबर को षष्ठी पर मां कात्यायनी की पूजा की जाएगी।

    17 अक्टूबर को सप्तमी तिथि पर मां कालरात्रि की पूजा होगी। 18 अक्टूबर को महानिशा पूजा और दुर्गा अष्टमी होगी, जबकि सप्तमी तिथि भी जारी रहेगी। 19 अक्टूबर को अष्टमी और नवमी तिथि का संयोग रहेगा तथा इस दिन कन्या पूजन किया जाएगा। इसके बाद 20 अक्टूबर को नवमी तिथि के बाद विजयादशमी और दशहरा मनाया जाएगा।

    शारदीय नवरात्रि को शक्ति की उपासना का प्रमुख पर्व माना जाता है। इन दिनों भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा के साथ व्रत और साधना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी की आराधना से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में सुख, शांति, समृद्धि तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। नवरात्रि का समय आत्मसंयम, श्रद्धा और आध्यात्मिक साधना के लिए भी विशेष माना जाता है। इस बार 10 दिनों तक चलने वाला यह पर्व 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ संपन्न होगा।

  • नवरात्रि के पहले दिन बदल सकता है इन 4 राशियों का समय, नौकरी, घर और शादी से जुड़े मिलेंगे खास संकेत

    नवरात्रि के पहले दिन बदल सकता है इन 4 राशियों का समय, नौकरी, घर और शादी से जुड़े मिलेंगे खास संकेत

    नई दिल्ली ।शारदीय नवरात्रि का पहला दिन 11 अक्टूबर रविवार को होगा। इस दिन कलश स्थापना के साथ मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा का यह दिन चार राशियों के लिए विशेष रूप से शुभ माना जा रहा है। मेष, वृश्चिक, मकर और कुंभ राशि के जातकों के लिए इस दिन करियर, नौकरी, विवाह, आर्थिक स्थिति और पारिवारिक जीवन से जुड़े सकारात्मक संकेत बताए गए हैं। इन राशियों के जातकों के कुछ लंबे समय से अधूरे सपने पूरे होने की संभावना भी जताई गई है।

    मेष राशि वालों के लिए नवरात्रि का पहला दिन करियर के लिहाज से महत्वपूर्ण रह सकता है। पद और प्रतिष्ठा में वृद्धि के संकेत हैं। प्रमोशन मिलने पर वर्तमान शहर से किसी दूसरे शहर में जाने की स्थिति बन सकती है। नई नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को भी नए शहर में अवसर मिल सकता है। परिवार में खुशहाली का माहौल रहेगा और परिजनों के साथ घूमने-फिरने का अवसर मिल सकता है। अविवाहित लोगों के विवाह की बात आगे बढ़ सकती है और शादी का सपना पूरा होने की संभावना है। सामाजिक संपर्क बढ़ाने से करियर में नए अवसर मिल सकते हैं।

    वृश्चिक राशि के जातकों के लिए यह दिन जीवन में सकारात्मक बदलाव लेकर आने वाला बताया गया है। लंबे समय से चली आ रही समस्याओं का अंत हो सकता है और अपने लक्ष्य की दिशा में सफलता मिलने के संकेत हैं। इस दिन कोई ऐसी खुशखबरी या महत्वपूर्ण सूचना मिल सकती है, जिसका लंबे समय से इंतजार किया जा रहा था। कार्यस्थल पर प्रभाव बढ़ेगा और लोग आपके काम से प्रभावित हो सकते हैं। प्रेम संबंध को विवाह में बदलने की इच्छा रखने वालों के लिए समय अनुकूल बताया गया है। परिवार की सहमति से लव मैरिज का रास्ता खुल सकता है। कुछ महीने पहले विवाह करने वाले लोगों के लिए संतान सुख के संकेत भी बताए गए हैं।

    मकर राशि वालों के लिए नवरात्रि का पहला दिन रुकावटों से राहत मिलने का संकेत दे रहा है। कामकाज में आने वाली बाधाएं दूर हो सकती हैं और बनाई गई योजनाओं के सफल होने की संभावना है। नौकरीपेशा लोगों को अपने क्षेत्र में लगातार मेहनत करनी होगी। जिस पद और आर्थिक लाभ की इच्छा है, उसे पाने की दिशा में सफलता मिल सकती है। नई नौकरी की तलाश कर रहे लोगों के लिए भी अवसर बनने के संकेत हैं। इसके अलावा विदेश में नौकरी या शिक्षा से संबंधित कोई प्रस्ताव मिलने की संभावना बताई गई है।

    कुंभ राशि के जातकों के लिए नवरात्रि का पहला दिन घर और आर्थिक मामलों से जुड़ी उम्मीदें पूरी होने का संकेत दे रहा है। लंबे समय से घर खरीदने का सपना देख रहे लोगों के लिए यह समय अनुकूल बताया गया है। आर्थिक स्थिति मजबूत होने से मकान खरीदने की योजना को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। करियर में भी आगे बढ़ने के अवसर मिलेंगे। अपने लक्ष्य के प्रति लगातार प्रयास और दृढ़ता बनाए रखना महत्वपूर्ण रहेगा। पारिवारिक जीवन में सुख और शांति बनी रह सकती है।

    कुंभ राशि वालों के लिए वाणी और व्यवहार पर नियंत्रण रखना भी जरूरी बताया गया है। संयमित बातचीत और सकारात्मक व्यवहार से काम आसान हो सकते हैं। वहीं अन्य तीन राशियों के लिए भी नवरात्रि का पहला दिन अपने-अपने क्षेत्रों में आगे बढ़ने और लंबित इच्छाओं को पूरा करने की दिशा में अवसरों वाला बताया गया है। इन ज्योतिषीय संकेतों में नौकरी, करियर, विवाह, विदेश से जुड़े अवसर और घर खरीदने जैसे विषय प्रमुख हैं।

  • नवरात्रि से पहले गरबा पर मुस्लिम त्योहार समिति की अपील, युवाओं से कार्यक्रमों से दूर रहने और विवाद से बचने को कहा

    नवरात्रि से पहले गरबा पर मुस्लिम त्योहार समिति की अपील, युवाओं से कार्यक्रमों से दूर रहने और विवाद से बचने को कहा

    मध्य प्रदेश: मुस्लिम त्योहार समिति ने आगामी नवरात्रि से पहले मुस्लिम युवाओं और छात्रों से गरबा कार्यक्रमों में शामिल नहीं होने की अपील की है। समिति ने कहा है कि युवा केवल रील्स, लाइक्स और व्यूज हासिल करने के लिए गरबा आयोजनों में शामिल होने से बचें। समिति के प्रदेशाध्यक्ष जीशान रहमान ने कहा कि गरबा मुस्लिम समुदाय का धार्मिक त्योहार या कार्यक्रम नहीं है। उनके मुताबिक, किसी एक व्यक्ति के गलत कदम का असर पूरे समुदाय की छवि पर पड़ सकता है। समिति ने स्पष्ट किया कि उसकी अपील किसी धर्म या गरबा समारोह के खिलाफ नहीं है, बल्कि जिम्मेदार व्यवहार, धार्मिक मर्यादा, कानून के पालन और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई है।

    जीशान रहमान ने कहा कि मुस्लिम युवाओं को गरबा कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं लेने की अपील इसलिए की गई है क्योंकि ये उनके धार्मिक त्योहार या कार्यक्रम नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक हितों को साधने के लिए कई बार मुसलमानों को बदनाम करने वाले बयान दिए जाते हैं। उनके अनुसार, मुसलमानों पर गरबा कार्यक्रमों में धार्मिक रूप से भड़काऊ हरकतें करने या ‘लव जिहाद’ जैसी गतिविधियों को अंजाम देने के आरोप लगाए जाते हैं। रहमान ने कहा कि ऐसी स्थिति से बचने के लिए मुस्लिम युवाओं और छात्रों को गरबा कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी गई है।

    रहमान ने कहा कि समिति की अपील का मुख्य उद्देश्य समुदाय की बदनामी की स्थिति को रोकना है। उन्होंने कहा कि कोई एक व्यक्ति गलत काम करता है, लेकिन उसका नतीजा पूरे समुदाय को भुगतना पड़ सकता है। इसी वजह से युवाओं से रील्स और व्यूज के लिए गरबा कार्यक्रमों में नहीं जाने को कहा गया है। समिति ने युवाओं से सभी धर्मों की आस्था और परंपराओं का सम्मान करने की अपील भी की है। इसके साथ ही स्थानीय नियमों और कानूनों का पालन करने तथा विवाद, टकराव, उकसावे और गलत प्रतिक्रियाओं से दूर रहने की सलाह दी गई है।

    समिति ने प्रशासनिक अधिकारियों और मध्य प्रदेश सरकार के संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर अपनी अपील विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, तकनीकी और मेडिकल संस्थानों तथा हॉस्टलों तक पहुंचाने का अनुरोध किया है। समिति चाहती है कि यह अपील 11 अक्टूबर से पहले संबंधित संस्थानों तक पहुंच जाए। इसके जरिए मुस्लिम युवाओं और छात्रों को धार्मिक कार्यक्रमों में बिना जरूरत शामिल होने से बचने तथा किसी भी तरह के विवाद की स्थिति पैदा न करने की सलाह दी गई है।

    रहमान ने यह भी कहा कि गरबा कार्यक्रमों में मुसलमानों की मौजूदगी को लेकर उन्हें बार-बार राजनीतिक रूप से निशाना बनाए जाने की बात सामने आती रही है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम युवाओं से रील्स और व्यूज के लिए गरबा कार्यक्रमों में नहीं जाने की अपील के पीछे यही वजह है। इससे पहले भोपाल की हुजूर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने गरबा कार्यक्रमों में मुस्लिम युवकों के आने को लेकर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम युवक गरबा में आना चाहते हैं तो अपनी बहन-बेटियों को भी साथ लाएं। इसके अलावा कई हिंदू संगठनों की ओर से भी गरबा कार्यक्रमों में मुस्लिम युवाओं को प्रवेश नहीं देने की बात कही जाती रही है। मुस्लिम त्योहार समिति की मौजूदा अपील इसी विवाद के बीच सामने आई है।