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  • नेपाल में बाढ़ से 105 भारतीय समेत 300 विदेशी पर्यटक लापता, बिहार के आठ जिलों में गंडक को लेकर हाई अलर्ट जारी

    नेपाल में बाढ़ से 105 भारतीय समेत 300 विदेशी पर्यटक लापता, बिहार के आठ जिलों में गंडक को लेकर हाई अलर्ट जारी

    नई दिल्ली ।नेपाल के रसुवा जिले में अचानक आई बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी है। भोटेकोशी नदी के तेज बहाव से घरों, पुलों, वाहनों और अन्य संरचनाओं को भारी नुकसान पहुंचा है। हादसे में अब तक 16 लोगों की मौत की पुष्टि की गई है, जबकि बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की सूचना सामने आई है।

    नेपाल पर्यटन बोर्ड से मिली जानकारी के अनुसार, 105 भारतीय पर्यटकों समेत 300 से अधिक विदेशी नागरिकों के लापता होने की सूचना है। प्रभावित क्षेत्र में विदेशी पर्यटकों के अलावा नेपाली नागरिक भी लापता बताए जा रहे हैं। अलग-अलग रिकॉर्ड की जांच के चलते लापता लोगों की संख्या में बदलाव संभव है।

    पर्यटन और यात्रा क्षेत्र से मिले शुरुआती आंकड़ों में प्रभावित इलाकों से कुल 384 यात्रियों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। इनमें 291 विदेशी नागरिक और 93 नेपाली नागरिक बताए गए हैं। प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों, स्थानीय गाइड और यात्रा कंपनियों के रिकॉर्ड का मिलान कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है।

    लापता विदेशी नागरिकों में भारतीयों के अलावा ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड्स, अमेरिका, मलेशिया, ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका के नागरिक भी शामिल बताए गए हैं। राहत और तलाश अभियान को तेज करने के लिए 15 हेलीकॉप्टर लगाए गए हैं। दुर्गम और प्रभावित इलाकों तक पहुंच बनाने के लिए बचाव दल लगातार काम कर रहे हैं।

    बाढ़ के कारण नेपाल में बुनियादी ढांचे को भी बड़ा नुकसान पहुंचा है। तेज बहाव की चपेट में आने से 13 जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं। कई परियोजनाओं के बांध, विद्युतगृह और वहां तक पहुंचने वाले मार्गों को नुकसान पहुंचने की जानकारी है। बाजारों और सीमा क्षेत्र में खड़े कई वाहन भी पानी के बहाव में बह गए।

    स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रभावित इलाकों में आवाजाही पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। रसुवा, नुवाकोट, चितवन और धादिंग की ओर जाने वाले वाहनों की आवाजाही रोकी गई है। नदी के निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सतर्क रहने और संभावित बाढ़ के खतरे को देखते हुए आवश्यक सावधानी बरतने को कहा गया है।

    नेपाल में बाढ़ की स्थिति का असर बिहार पर भी पड़ने की आशंका के चलते राज्य में सतर्कता बढ़ा दी गई है। नेपाल सीमा से जुड़े पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी और शिवहर जिलों को हाई अलर्ट पर रखा गया है।

    बिहार आपदा प्रबंधन विभाग ने गंडक नदी में करीब तीन मीटर ऊंची फ्लैश फ्लड वेव आने की आशंका जताई है। इसके मद्देनजर गंडक और अन्य प्रमुख नदियों के आसपास के इलाकों में निगरानी बढ़ाई गई है। संवेदनशील क्षेत्रों में राहत और बचाव व्यवस्था को तैयार रखने के निर्देश दिए गए हैं।

    मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक कर संभावित बाढ़ की स्थिति और तैयारियों का जायजा लिया गया। बेतिया, मोतिहारी, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली समेत संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं। सीतामढ़ी और शिवहर में भी हालात पर लगातार नजर रखने को कहा गया है।

    गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से फोन पर बातचीत कर नेपाल में आई बाढ़ और बिहार में संभावित प्रभाव को लेकर तैयारियों की जानकारी ली। एनडीआरएफ की कई टीमों को छह जिलों में तैनात किया गया है। कोसी, गंडक और गंगा के आसपास के इलाकों में भी निगरानी बढ़ाई गई है। फिलहाल प्रशासन का जोर संभावित बाढ़ के प्रभाव को कम करने और जरूरत पड़ने पर तत्काल राहत पहुंचाने पर है।

  • नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग फिर तेज, पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान बनाने का दिया प्रस्ताव

    नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग फिर तेज, पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान बनाने का दिया प्रस्ताव

    नई दिल्ली । नेपाल में एक बार फिर देश को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के गुट के राष्ट्रीय सम्मेलन में देश की पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर महत्वपूर्ण प्रस्ताव सामने आया। सम्मेलन में सनातन धर्म को नेपाल की राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने की बात कही गई, जिसके बाद वहां के राजनीतिक माहौल में नई बहस शुरू हो गई है।

    नेपाल लंबे समय तक हिंदू राष्ट्र के रूप में पहचाना जाता था, लेकिन वर्ष 2008 में राजशाही के अंत और राजनीतिक परिवर्तन के बाद देश को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित किया गया। इसके बाद से हिंदू राष्ट्र की मांग अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक समूहों की ओर से समय-समय पर उठती रही है। हाल के दिनों में मधेश और तराई क्षेत्रों में सामने आए सांप्रदायिक तनाव तथा सामाजिक असंतोष के बीच इस मांग ने फिर जोर पकड़ा है।

    देउबा गुट के सम्मेलन में पारित प्रस्ताव में नेपाल की पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाओं को राष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया। प्रस्ताव में सनातन धर्म की पहचान को आगे बढ़ाने के साथ हिंदू, बौद्ध, किरात और प्रकृति आधारित धार्मिक परंपराओं के संरक्षण की बात भी कही गई। इसके साथ ही सभी धार्मिक समुदायों की स्वतंत्रता, सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने पर जोर दिया गया।

    सम्मेलन के समापन समारोह में पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने अपने धार्मिक विश्वास को लेकर खुलकर बयान दिया। उन्होंने कहा कि वह हिंदू हैं और उन्हें यह कहने का अधिकार होना चाहिए कि वह हिंदू हैं। देउबा ने यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की कि उनका रुख किसी समुदाय के विरोध में नहीं है। उनके इस बयान को नेपाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सम्मेलन में नेपाल के मौजूदा संविधान को लेकर भी चर्चा हुई। प्रस्ताव में कहा गया कि संविधान में जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप आवश्यक बदलाव किए जाने चाहिए। हालांकि, ऐसे किसी भी बदलाव के लिए सभी संबंधित समूहों के साथ बातचीत और सहमति की प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया गया। इससे संकेत मिलता है कि संविधान में धार्मिक पहचान से जुड़े किसी बदलाव को लेकर व्यापक राजनीतिक संवाद की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

    नेपाल में हिंदू राष्ट्र की बहाली का मुद्दा केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध देश की राजनीति, संविधान और सामाजिक संरचना से भी है। नेपाल में हिंदू और बौद्ध परंपराओं का ऐतिहासिक प्रभाव रहा है, जबकि देश में अन्य धार्मिक समुदाय भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं। ऐसे में हिंदू राष्ट्र की मांग के साथ धार्मिक स्वतंत्रता और समान अधिकारों को लेकर भी बहस तेज होने की संभावना है।

    देउबा गुट की ओर से सामने आया प्रस्ताव नेपाली कांग्रेस के भीतर भी राजनीतिक चर्चा को प्रभावित कर सकता है। नेपाल की मुख्यधारा की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता, संवैधानिक व्यवस्था और पारंपरिक धार्मिक पहचान के बीच संतुलन को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं। अब सम्मेलन में हिंदू राष्ट्र की पहचान को लेकर उठी आवाज ने इस बहस को फिर राष्ट्रीय स्तर पर ला दिया है। हालांकि, नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए संवैधानिक और राजनीतिक स्तर पर व्यापक प्रक्रिया से गुजरना होगा।

  • नेपाल PM बालेन शाह ने पहली बार भारतीय राजदूत से की वन-टू-वन मुलाकात, चीन के राजदूत से भी आज करेंगे सीधी बातचीत

    नेपाल PM बालेन शाह ने पहली बार भारतीय राजदूत से की वन-टू-वन मुलाकात, चीन के राजदूत से भी आज करेंगे सीधी बातचीत


    नई दिल्ली । 
    नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने विदेशी राजदूतों से वन-टू-वन मुलाकात नहीं करने की अपनी पुरानी नीति में बड़ा बदलाव किया है। प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार उन्होंने किसी विदेशी राजदूत से अकेले मुलाकात की। सोमवार को उन्होंने भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव से अलग बैठक की। इस दौरान दोनों के बीच भारत और नेपाल के संबंधों, विकास सहयोग और आपसी हित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

    मुलाकात के दौरान नवीन श्रीवास्तव ने बालेन शाह को प्रधानमंत्री बनने पर बधाई दी। उन्होंने भारत की ओर से नेपाल के साथ बेहतर संबंधों और सहयोग को आगे बढ़ाने की बात कही। बालेन शाह ने भी दोनों देशों के बीच पुराने और भरोसेमंद रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दिया।

    नेपाल और भारत के बीच व्यापार, ऊर्जा, सड़क और विकास परियोजनाओं को लेकर लंबे समय से सहयोग रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद भारतीय राजदूत के साथ बालेन शाह की पहली व्यक्तिगत बैठक को दोनों देशों के बीच सीधे संवाद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    बालेन शाह इससे पहले विदेशी अधिकारियों और राजदूतों से अकेले मुलाकात करने से परहेज करते रहे थे। प्रधानमंत्री बनने के शुरुआती दौर में उन्होंने विदेश मंत्री के स्तर से नीचे के विदेशी अधिकारियों के साथ वन-टू-वन बैठक नहीं करने की नीति अपनाई थी। विदेशी राजदूतों के साथ भी वह सामूहिक बैठकों को प्राथमिकता देते थे।

    इसी नीति के तहत भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की मई में नेपाल यात्रा के दौरान भी बालेन शाह ने उनसे अलग मुलाकात नहीं की थी। इसके अलावा अमेरिकी अधिकारियों के साथ प्रस्तावित कुछ व्यक्तिगत बैठकों को भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया था। इसके बजाय उन्होंने काठमांडू में तैनात कई देशों के राजदूतों के साथ सामूहिक बैठकें की थीं।

    बालेन शाह की इस नीति के पीछे उनका यह तर्क बताया जाता रहा है कि बड़े और प्रभावशाली देशों के प्रतिनिधि नेपाल की सरकारी व्यवस्था को दरकिनार कर सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकते हैं। सामूहिक बैठकों के जरिए वह सभी देशों के साथ समान व्यवहार और नेपाल की संप्रभुता का संदेश देना चाहते थे।

    हालांकि, सरकार गठन के करीब 100 दिन पूरे होने के बाद उनकी कार्यशैली में बदलाव दिखाई देने लगा। सलाहकारों की ओर से घरेलू और विदेशी स्तर पर अलग-अलग लोगों के साथ सीधे संवाद बढ़ाने की सलाह के बाद शाह ने नेताओं, कारोबारियों और उद्योगपतियों के साथ व्यक्तिगत बैठकें शुरू कीं। अब विदेशी राजदूतों के साथ सीधी मुलाकात भी इसी बदली हुई रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

    भारतीय राजदूत से मुलाकात के बाद बालेन शाह चीनी राजदूत झांग माओमिंग से भी अलग बैठक करने वाले हैं। भारत और चीन दोनों नेपाल के प्रमुख पड़ोसी और महत्वपूर्ण साझेदार हैं। एक ही दिन दोनों देशों के राजदूतों के साथ व्यक्तिगत संवाद का कार्यक्रम नेपाल की संतुलित विदेश नीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    नेपाल में लंबे समय से प्रधानमंत्री और बड़े देशों के राजदूतों के बीच सीधे संवाद की परंपरा रही है। कई बार ऐसी बैठकें प्रधानमंत्री के निजी आवास पर भी होती रही हैं। इन बैठकों में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की मौजूदगी जरूरी नहीं होती थी और कुछ मुलाकातों का औपचारिक रिकॉर्ड भी नहीं रखा जाता था।

    बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस व्यवस्था में बदलाव आया था, लेकिन अब उनकी नीति फिर बदलती नजर आ रही है। भारत और चीन के राजदूतों के साथ सीधे संवाद से यह संकेत मिलता है कि नेपाल सरकार महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मामलों पर सामूहिक बैठकों के साथ व्यक्तिगत कूटनीतिक संपर्क को भी जगह दे रही है।

  • भारत-नेपाल सीमा पर फिर बढ़ा तनाव, सुस्ता में अस्थायी बांध तोड़े जाने के आरोप से विवाद गहराया

    भारत-नेपाल सीमा पर फिर बढ़ा तनाव, सुस्ता में अस्थायी बांध तोड़े जाने के आरोप से विवाद गहराया

    नई दिल्ली । भारत और नेपाल के बीच सीमा से जुड़े संवेदनशील सुस्ता क्षेत्र में एक बार फिर तनाव की स्थिति बन गई है। नेपाल की ओर से आरोप लगाया गया है कि भारतीय सशस्त्र सीमा बल के जवानों ने नेपाली क्षेत्र में प्रवेश कर वहां बनाया जा रहा एक अस्थायी मिट्टी का बांध हटा दिया। नेपाली पक्ष का कहना है कि यह बांध नारायणी नदी के बढ़ते जलस्तर और संभावित बाढ़ से स्थानीय बस्तियों की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया जा रहा था। इस घटना के बाद सीमा क्षेत्र में कुछ समय के लिए तनावपूर्ण माहौल बन गया, हालांकि प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद स्थिति सामान्य बताई जा रही है।

    बताया जा रहा है कि विवाद उस समय सामने आया जब स्थानीय स्तर पर अस्थायी तटबंध निर्माण का कार्य चल रहा था। नेपाल का दावा है कि भारतीय सुरक्षा कर्मियों ने इस निर्माण पर आपत्ति जताई और बाद में बांध को हटाने की कार्रवाई की। इस दौरान स्थानीय लोगों और भारतीय सुरक्षाकर्मियों के बीच बहस भी हुई। घटना का एक वीडियो भी सामने आने की चर्चा है, जिसके बाद मामला दोनों देशों के अधिकारियों तक पहुंच गया।

    नेपाल सरकार ने इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए राजनयिक स्तर पर भारत के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराया है। नेपाल का कहना है कि सीमा से जुड़े मामलों में पहले से तय व्यवस्थाओं का सम्मान किया जाना चाहिए और किसी भी कार्रवाई से पहले आपसी समन्वय आवश्यक है। वहीं भारतीय पक्ष की ओर से यह बताया गया कि जिस क्षेत्र में निर्माण किया जा रहा था, वह लंबे समय से विवादित माना जाता है और ऐसे इलाकों में यथास्थिति बनाए रखने पर दोनों देशों के बीच पहले भी सहमति बन चुकी है।

    सुस्ता क्षेत्र भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। दोनों देश इस क्षेत्र पर अपना-अपना दावा करते रहे हैं। समय-समय पर सीमा निर्धारण, नदी की धारा में बदलाव और स्थानीय गतिविधियों को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नदी के मार्ग में परिवर्तन के कारण इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति भी समय के साथ बदलती रही है, जिससे सीमा संबंधी विवाद और जटिल हो गया है।

    स्थानीय प्रशासन ने बताया कि हालात पूरी तरह नियंत्रण में हैं और किसी प्रकार की अप्रिय घटना नहीं हुई है। एहतियात के तौर पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई है ताकि दोनों ओर के नागरिकों के बीच किसी प्रकार का तनाव न बढ़े। प्रशासन लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है।

    भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध बेहद मजबूत रहे हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा व्यवस्था के कारण लाखों लोग रोजमर्रा के आवागमन और व्यापार से जुड़े हैं। ऐसे में सीमा से जुड़े किसी भी विवाद का शांतिपूर्ण और आपसी सहमति से समाधान निकालना दोनों देशों के हित में माना जाता है। जानकारों का मानना है कि संवाद और कूटनीतिक स्तर पर निरंतर संपर्क बनाए रखने से इस प्रकार के विवादों का स्थायी समाधान संभव हो सकता है और द्विपक्षीय संबंधों में विश्वास कायम रहेगा।

  • सीमा पर बांध हटाने के आरोप से बढ़ा तनाव, भारत-नेपाल अधिकारियों की बातचीत पर टिकी निगाहें

    सीमा पर बांध हटाने के आरोप से बढ़ा तनाव, भारत-नेपाल अधिकारियों की बातचीत पर टिकी निगाहें


    नई दिल्ली । 
    भारत-नेपाल सीमा पर एक बार फिर तनाव की स्थिति बन गई है। नेपाल के नवलपरासी वेस्ट जिले में स्थानीय लोगों ने भारतीय सुरक्षाकर्मियों पर नेपाल की सीमा में प्रवेश कर अस्थायी मिट्टी के बांध को हटाने का आरोप लगाया है। इस घटना के बाद सीमा क्षेत्र में कुछ समय के लिए तनावपूर्ण माहौल बन गया। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं तथा मामले के समाधान के लिए दोनों देशों के अधिकारियों के बीच बातचीत की प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही है।

    बताया जा रहा है कि संबंधित अस्थायी बांध स्थानीय ग्रामीणों ने नारायणी नदी के बढ़ते जलस्तर और संभावित बाढ़ से अपने गांवों की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया था। ग्रामीणों का कहना है कि यह संरचना बारिश के मौसम में नदी का पानी आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश करने से रोकने के लिए तैयार की गई थी। इसी बांध को हटाए जाने के आरोप के बाद स्थानीय लोगों में नाराजगी देखने को मिली।

    घटना के दौरान स्थानीय नागरिकों और भारतीय सुरक्षाकर्मियों के बीच कहासुनी होने की भी जानकारी सामने आई है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जैसे ही लोगों ने बांध के पास गतिविधियां देखीं, बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर पहुंच गए और विरोध दर्ज कराया। स्थिति को देखते हुए नेपाल के सुरक्षा बल भी घटनास्थल पर पहुंचे और दोनों पक्षों के बीच तनाव कम कराने का प्रयास किया।

    नेपाल के स्थानीय सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि पहले भी इस क्षेत्र में बाढ़ सुरक्षा से जुड़े निर्माण कार्यों को लेकर कई बार चर्चा हो चुकी है। उनका दावा है कि स्थायी संरचना के निर्माण में बाधाएं आने के बाद ग्रामीणों ने अस्थायी रूप से मिट्टी का बांध तैयार किया था, ताकि मानसून के दौरान बस्तियों को नुकसान से बचाया जा सके। इसी कारण ग्रामीण इस संरचना को अपने लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।

    जिला प्रशासन ने घटना की पुष्टि करते हुए कहा है कि सीमा क्षेत्र में बांध को लेकर विवाद की जानकारी मिली है। प्रशासन का कहना है कि मामले की वास्तविक परिस्थितियों का आकलन किया जा रहा है और दोनों देशों के संबंधित अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित किया जा रहा है। उद्देश्य यह है कि सीमा पर शांति और सामान्य स्थिति बनी रहे तथा किसी भी प्रकार का तनाव आगे न बढ़े।

    भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा होने के कारण दोनों देशों के नागरिकों का लंबे समय से सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर गहरा जुड़ाव रहा है। हालांकि समय-समय पर सीमा निर्धारण, नदी प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर स्थानीय स्तर पर विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों का समाधान आमतौर पर प्रशासनिक और कूटनीतिक संवाद के माध्यम से किया जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा क्षेत्रों में नदी के बहाव, बाढ़ नियंत्रण और सुरक्षात्मक निर्माण जैसे विषय दोनों देशों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में किसी भी निर्माण या कार्रवाई को लेकर स्थानीय प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक होता है, ताकि सीमा क्षेत्र में रहने वाले लोगों के हित सुरक्षित रह सकें।

    फिलहाल दोनों देशों के अधिकारियों के बीच प्रस्तावित वार्ता पर सभी की निगाहें टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि बातचीत के माध्यम से स्थिति स्पष्ट होगी और सीमा क्षेत्र में उत्पन्न विवाद का शांतिपूर्ण एवं पारस्परिक सहमति से समाधान निकाला जाएगा।

  • नेपाल की भारत से नई अपील, सीमा पार यात्रा के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र को मान्यता देने का अनुरोध

    नेपाल की भारत से नई अपील, सीमा पार यात्रा के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र को मान्यता देने का अनुरोध

    नई दिल्ली । नेपाल ने भारत सरकार से औपचारिक रूप से अनुरोध किया है कि वह नेपाली नागरिकों के राष्ट्रीय पहचान पत्र (नेशनल आइडेंटिटी कार्ड) को सीमा पार यात्रा और हवाई सफर के लिए वैध यात्रा दस्तावेज के रूप में मान्यता दे। नेपाल का कहना है कि इस कदम से दोनों देशों के बीच लोगों की आवाजाही अधिक सुरक्षित, आसान और आधुनिक पहचान प्रणाली के अनुरूप हो सकेगी।

    नेपाल और भारत के बीच लंबे समय से खुली सीमा व्यवस्था लागू है, जिसके तहत दोनों देशों के नागरिकों को सामान्य परिस्थितियों में बिना पासपोर्ट और वीजा के एक-दूसरे के देश में आने-जाने की अनुमति है। हालांकि, वर्तमान व्यवस्था में भारत मुख्य रूप से नेपाली नागरिकों के पासपोर्ट और नागरिकता प्रमाण पत्र को आधिकारिक पहचान दस्तावेज के रूप में स्वीकार करता है। अब नेपाल चाहता है कि उसके राष्ट्रीय पहचान पत्र को भी इसी श्रेणी में शामिल किया जाए।

    नेपाल के आव्रजन विभाग के अनुसार, इस संबंध में जून के अंतिम सप्ताह में भारत सरकार को औपचारिक प्रस्ताव भेजा गया था। प्रस्ताव में अनुरोध किया गया है कि नेपाली नागरिकों के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र को सीमा पार आवागमन और हवाई यात्रा के दौरान वैध पहचान दस्तावेज के रूप में मान्यता दी जाए।

    नेपाल सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय पहचान पत्र आधुनिक बायोमेट्रिक तकनीक पर आधारित है। इसमें फिंगरप्रिंट, चेहरे की पहचान और आईरिस स्कैन जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां सुरक्षित रहती हैं। इसके कारण यह पारंपरिक नागरिकता प्रमाण पत्र की तुलना में अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय माना जाता है।

    नेपाल में सरकार विभिन्न सरकारी सेवाओं के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र के उपयोग को लगातार बढ़ावा दे रही है। पासपोर्ट आवेदन, बैंक खाता खोलने, भूमि पंजीकरण और अन्य कई सरकारी कार्यों में इस पहचान पत्र को अनिवार्य बनाया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य धीरे-धीरे पुराने नागरिकता प्रमाण पत्रों की जगह डिजिटल रूप से सत्यापित किए जा सकने वाले पहचान पत्रों को लागू करना है।

    नेपाल की ओर से प्रस्ताव भेजे जाने के बाद काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने राष्ट्रीय पहचान पत्र से जुड़े तकनीकी और सुरक्षा पहलुओं के बारे में जानकारी भी प्राप्त की है। बताया गया कि यह औपचारिक वार्ता नहीं थी, बल्कि कार्ड की विशेषताओं और सुरक्षा व्यवस्था को समझने के उद्देश्य से जानकारी का आदान-प्रदान किया गया।

    नेपाल के अधिकारियों का मानना है कि यदि राष्ट्रीय पहचान पत्र को भारत में भी वैध यात्रा दस्तावेज का दर्जा मिल जाता है तो दोनों देशों की सुरक्षा व्यवस्था और पहचान सत्यापन प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो जाएगी। इससे सीमा पार आवाजाही के दौरान पहचान संबंधी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।

    वर्तमान व्यवस्था के तहत भारत आने वाले नेपाली नागरिकों के लिए पासपोर्ट और नागरिकता प्रमाण पत्र स्वीकार किए जाते हैं। वहीं नेपाल जाने वाले भारतीय नागरिक पासपोर्ट, मतदाता पहचान पत्र अथवा केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जारी कुछ अन्य मान्य पहचान पत्रों का उपयोग कर सकते हैं।

    नेपाल के राष्ट्रीय पहचान एवं नागरिक पंजीकरण विभाग के अनुसार अब तक 45 लाख से अधिक नागरिकों को राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी किए जा चुके हैं, जबकि लगभग दो करोड़ लोगों ने इसके लिए पंजीकरण कराया है। नेपाल को उम्मीद है कि भविष्य में इस डिजिटल पहचान प्रणाली को भारत की मान्यता मिलने से दोनों देशों के बीच आवागमन और अधिक सुरक्षित तथा सुविधाजनक हो सकेगा।

  • नेपाल में हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग हुई तेज…. सड़कों पर उतरे लोग

    नेपाल में हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग हुई तेज…. सड़कों पर उतरे लोग


    काठमांडू।
    नेपाल (Nepal) को हिन्दू राष्ट्र (Hindu Nation) घोषित करने की मांग तेज हो रही है। यह मुद्दा केवल संगठनों और प्रदर्शनों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आम लोग अपने जनप्रतिनिधियों से भी सीधे जवाब मांग रहे हैं। प्रभावित क्षेत्रों में सांसदों का घेराव कर उनसे हिन्दू समुदाय की सुरक्षा और अधिकारों के पक्ष में खुलकर बोलने की मांग की जा रही है।


    सांसद के सामने विरोध

    सिरहा जिले (Siraha District) में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सांसद बबलू गुप्ता (MP Bablu Gupta) को लोगों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। विरोध कर रहे लोगों का कहना था कि उन्होंने परिवर्तन और नेपाल को पुन: हिन्दू राष्ट्र बनाने की उम्मीद के साथ अपने जनप्रतिनिधियों का समर्थन किया था, लेकिन अब उनकी अपेक्षाओं की अनदेखी की जा रही है।


    ठंडी हुई सांप्रदायिक हिंसा की आंच

    नेपाल में 26 जुलाई की रात से शुरू हुई हिंसा की आंच अब मंद पड़ चुकी है। कई जिलों में बने तनाव के हालात अब काबू में हैं। हालांकि, इस घटना के बाद अब हिंदूवादी संगठनों ने सरकार को 15 सूत्री मांगपत्र सौंपते हुए नेपाल को पुन: हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने समेत कई बड़े फैसले लेने की मांग की है।

    मांगपत्र में सुनसरी जिले के देवानगंज में हुई हिंसा की निष्पक्ष जांच, घटना के दोषियों एवं साजिशकर्ताओं की शीघ्र गिरफ्तारी तथा जांच समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की गई है। साथ ही गोली चलाने का आदेश देने वाले अधिकारियों की पहचान उजागर कर उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने की भी मांग रखी गई है। प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।

    मांगपत्र में घटना में जान गंवाने वाले लोगों को शहीद का दर्जा देने, उनके परिजनों को उचित मुआवजा उपलब्ध कराने तथा घायलों का निशुल्क और प्रभावी इलाज सुनिश्चित करने की भी मांगें शामिल हैं। साथ ही नेपाल को बौद्ध एवं किरात परंपराओं के सम्मान के साथ ‘वैदिक सनातन हिंदू राष्ट्र’ के रूप में पुन:स्थापित करने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की मांग की गई है। संगठनों ने रोहिंग्या, बांग्लादेशी और पाकिस्तानी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें निष्कासित करने, सीमा सुरक्षा को और मजबूत बनाने तथा वर्ष 1990 के बाद जारी नेपाली नागरिकताओं की जांच कराने की मांग भी उठाई है।


    क्या बोले पीएम बालेन शाह

    पीएम बालेन शाह का कहना है कि हिंदू राष्ट्र की बहाली के साथ राजशाही का मुद्दाभी जुड़ता है। ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसा कोई भी फैसला लेना उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि सरकार फेडरल व्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध है और मजबूती से इसका पालन करेगी। उनका कहना है कि हिंदू राष्ट्र घोषित कर देने से संघीय व्यवस्था कमजोर हो जाएगी।

  • त्रिभुवन यूनिवर्सिटी पेपर लीक विवाद ने बढ़ाया सरकार पर दबाव, विरोध प्रदर्शन तेज; पुलिस ने शुरू की व्यापक जांच

    त्रिभुवन यूनिवर्सिटी पेपर लीक विवाद ने बढ़ाया सरकार पर दबाव, विरोध प्रदर्शन तेज; पुलिस ने शुरू की व्यापक जांच


    नई दिल्ली । 
    नेपाल में मास्टर ऑफ बिजनेस स्टडीज (एमबीएस) प्रथम सेमेस्टर की परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होने के बाद छात्रों का विरोध प्रदर्शन तेज हो गया है। राजधानी काठमांडू सहित कई स्थानों पर युवाओं ने परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। इस घटनाक्रम ने देश की शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा सुरक्षा तंत्र पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए प्रभावी व्यवस्था जरूरी है।

    पेपर लीक का मामला सामने आने के बाद नेपाल पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपी पर परीक्षा शुरू होने के कुछ ही मिनट बाद प्रश्नपत्र ऑनलाइन साझा करने का आरोप है। पुलिस का कहना है कि पूरे मामले की तकनीकी और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर जांच की जा रही है तथा यह पता लगाया जा रहा है कि प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले किस तरह बाहर पहुंचा और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका रही।

    प्रारंभिक जांच के अनुसार, त्रिभुवन यूनिवर्सिटी के एमबीएस प्रथम सेमेस्टर की परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने के लगभग पांच मिनट बाद एक व्हाट्सएप समूह में साझा किया गया। इसके बाद उसी समूह में प्रश्नों के उत्तर भी उपलब्ध कराए जाने की बात सामने आई। सोशल मीडिया पर बातचीत के स्क्रीनशॉट सामने आने के बाद मामला तेजी से सार्वजनिक हुआ और शिक्षा विभाग के साथ पुलिस ने भी जांच शुरू कर दी।

    जांच में गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की पहचान संदीप सिंह के रूप में हुई है, जो विभिन्न शिक्षण संस्थानों से जुड़े बताए जा रहे हैं। पूछताछ के दौरान उन्होंने दावा किया कि उन्हें प्रश्नपत्र किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त हुआ था और उन्होंने केवल उसे आगे साझा किया। हालांकि जांच एजेंसियां इस दावे की पुष्टि करने के लिए डिजिटल रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा और अन्य तकनीकी साक्ष्यों की पड़ताल कर रही हैं। अब तक जांच में आर्थिक लाभ मिलने का कोई स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया है, लेकिन पुलिस पूरे नेटवर्क की जांच कर रही है।

    नेपाल के शिक्षा मंत्रालय ने मामले को गंभीर बताते हुए गृह मंत्रालय और पुलिस अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित किया है। मंत्रालय का कहना है कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। शुरुआती जांच में यह संकेत भी मिले हैं कि प्रश्नपत्र लीक की घटना में किसी शिक्षक की भूमिका हो सकती है, हालांकि अंतिम निष्कर्ष विस्तृत जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

    पेपर लीक विवाद के बाद विश्वविद्यालय की परीक्षा सुरक्षा प्रणाली और गोपनीयता व्यवस्था पर व्यापक बहस शुरू हो गई है। छात्र संगठनों ने परीक्षा प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाने, डिजिटल निगरानी बढ़ाने और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं मेहनत करने वाले विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित करती हैं और शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर करती हैं।

    यह विरोध ऐसे समय सामने आया है जब नेपाल में युवाओं के बीच भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को लेकर पहले से असंतोष बना हुआ है। अब पेपर लीक की इस घटना ने शिक्षा व्यवस्था को भी सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। सरकार ने निष्पक्ष जांच और आवश्यक सुधारों का भरोसा दिया है, जबकि छात्र संगठनों ने स्पष्ट किया है कि दोषियों पर प्रभावी कार्रवाई और परीक्षा व्यवस्था में सुधार होने तक वे इस मुद्दे को उठाते रहेंगे।

  • नेपाल के पीएम बालेन शाह ने बदला रुख, भारत और चीन के राजदूतों से अलग-अलग मुलाकात कर कूटनीतिक संतुलन का दिया संकेत

    नेपाल के पीएम बालेन शाह ने बदला रुख, भारत और चीन के राजदूतों से अलग-अलग मुलाकात कर कूटनीतिक संतुलन का दिया संकेत

    नई दिल्ली । नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह, जिन्हें बालेन शाह के नाम से जाना जाता है, अपने कार्यकाल के शुरुआती महीनों में अपनाई गई एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक नीति में बदलाव करने जा रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि वह किसी भी विदेशी राजदूत से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात नहीं करेंगे और सभी आधिकारिक संपर्क विदेश मंत्रालय की निर्धारित प्रक्रिया या समूह बैठकों के माध्यम से ही होंगे। अब पहली बार वह इस नीति से हटते हुए भारत और चीन के राजदूतों से अलग-अलग मुलाकात करने की तैयारी में हैं। इसे नेपाल की संतुलित विदेश नीति और बदलती कूटनीतिक आवश्यकताओं का संकेत माना जा रहा है।

    जानकारी के अनुसार, भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीन के राजदूत झांग माओमिंग से प्रधानमंत्री की अलग-अलग बैठकें एक ही दिन आयोजित की जाएंगी। दोनों बैठकों का उद्देश्य यह संदेश देना है कि नेपाल अपने दोनों प्रमुख पड़ोसी देशों के साथ समान महत्व और संतुलित संबंध बनाए रखना चाहता है। सरकार की ओर से इन बैठकों की पुष्टि की गई है, हालांकि उनकी अंतिम तिथि सार्वजनिक नहीं की गई है। विदेश मंत्रालय इन मुलाकातों की तैयारियों में जुटा हुआ है।

    प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने पारंपरिक व्यवस्था में बदलाव करते हुए एक नया कूटनीतिक प्रोटोकॉल लागू किया था। इसके तहत उन्होंने तय किया कि वह केवल किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री स्तर के प्रतिनिधियों से ही व्यक्तिगत बैठक करेंगे। राजदूतों, उप-मंत्रियों या अन्य अधिकारियों से मुलाकात विदेश मंत्रालय की मौजूदगी में या समूह स्तर पर ही होगी। उनका मानना था कि विदेश नीति व्यक्तिगत संपर्कों के बजाय संस्थागत व्यवस्था के तहत संचालित होनी चाहिए और इससे पारदर्शिता भी बढ़ेगी।

    नेपाल में लंबे समय से यह परंपरा रही थी कि प्रभावशाली देशों के राजदूत सीधे प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत मुलाकात करते थे। कई बार इन बैठकों का कोई औपचारिक रिकॉर्ड भी नहीं रखा जाता था। विशेषज्ञों का मानना था कि ऐसी व्यवस्था से विदेश नीति पर अनौपचारिक प्रभाव बढ़ सकता है और राष्ट्रीय हित प्रभावित हो सकते हैं। इसी सोच के आधार पर बालेन शाह ने नई व्यवस्था लागू की थी, जिसके चलते कई विदेशी प्रतिनिधियों के साथ प्रस्तावित व्यक्तिगत मुलाकातें नहीं हो सकीं।

    बताया जाता है कि उन्होंने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री, अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों तथा चीन के कुछ उच्च प्रतिनिधियों से भी व्यक्तिगत मुलाकात नहीं की थी। हालांकि एशियाई विकास बैंक के अध्यक्ष मसातो कांडा के साथ उनकी एकल बैठक को विशेष परिस्थिति में अपवाद माना गया था। इन घटनाओं ने उनकी नई कार्यशैली को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा पैदा की थी।

    अब प्रधानमंत्री के रूप में कुछ महीनों के अनुभव के बाद बालेन शाह का रुख अधिक व्यावहारिक दिखाई दे रहा है। नेपाल की भौगोलिक, आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को देखते हुए भारत और चीन दोनों के साथ नियमित एवं प्रत्यक्ष संवाद बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता बन गया है। ऐसे में व्यक्तिगत स्तर पर संवाद को पूरी तरह सीमित रखने की नीति व्यवहारिक चुनौतियां पैदा कर रही थी। यही कारण माना जा रहा है कि उन्होंने पहली बार अपने पुराने निर्णय में बदलाव करने का फैसला लिया है।

    नेपाल की विदेश नीति लंबे समय से भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखने पर आधारित रही है। भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और दोनों देशों के बीच खुली सीमा, सांस्कृतिक संबंध तथा लोगों के बीच गहरे सामाजिक जुड़ाव हैं। दूसरी ओर चीन ने हाल के वर्षों में नेपाल के बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और परिवहन परियोजनाओं में बड़े निवेश किए हैं। ऐसे में दोनों देशों के साथ समान दूरी और समान निकटता बनाए रखना काठमांडू की कूटनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। बालेन शाह का यह नया कदम भी इसी संतुलन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।

  • नेपाल से भटककर गोरखपुर पहुंची 147 किलो की प्रेग्नेंट डॉल्फिन…52 KM का ग्रीन कॉरिडोर बनाकर नदी में छोड़ी

    नेपाल से भटककर गोरखपुर पहुंची 147 किलो की प्रेग्नेंट डॉल्फिन…52 KM का ग्रीन कॉरिडोर बनाकर नदी में छोड़ी


    गोरखपुर/महराजगंज।
    नेपाल (Nepal) की त्रिवेणी नदी (Triveni River) से महराजगंज जिले (Maharajganj district) के एक कैनाल में बहकर आई 147 किलो की डॉल्फिन मछली (Dolphin) का रेस्क्यू चर्चा में है. प्रेग्नेंट मछली (Pregnant fish) को राप्ती नदी में छोड़ा गया. डॉल्फिन को सुरक्षित गोरखपुर लाने के लिए भटहट से 52 किलो के रास्ते में ग्रीन कॉरिडोर (Green Corridor) बनाया गया. तकरीबन 1 घंटे के सफर के बाद डॉल्फिन को गोरखपुर के राप्ती तट पर लाकर इलाज के बाद राप्ती नदी में छोड़ दिया गया.

    गोरखपुर के शहीद अशफाक उल्लाह खान प्राणी उद्यान के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. योगेश कुमार सिंह ने बताया, नेपाल की त्रिवेणी नदी से एक डॉल्फिन भटककर एक कैनाल में आ गई और वह धीरे-धीरे परतावाल के पास धरमौली बाजार के कैनाल में आकर फंस गई थी. वह वहां 3 दिन से फंसी थी और उसकी जान को बचाना बहुत ही जरूरी था।

    प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव उत्तर प्रदेश अनुराधा बेमुरी और मुख्य वन संरक्षक गोरखपुर बीसी ब्रम्हा के निर्देशन में डॉल्फिन को रविवार यानी 19 जुलाई को भी पकड़ने का प्रयास किया गया, लेकिन बारिश के कारण कैनाल में पानी ज्यादा था और बहाव भी बहुत तेज होने के कारण बहुत ही कठिनाई हो रही थी.

    ऐसे में सिंचाई विभाग के आलाधिकारियों से बात करके कैनाल में पानी को कम कराया गया और सोमवार (20 जुलाई) को कुशीनगर वन प्रभाग के हाटा रेंज के तहत सिसवां शुक्ल ग्रामसभा के पास देवरिया कैनाल से सफल रेस्क्यू किया गया।

    रेस्क्यू के बाद डॉलफिन को डॉलफिन एंबुलेंस में रखा गया. जहां इलाज और जांच किया गया. 7 फीट 2 इंच लंबी डॉल्फिन 147 किलो की प्रेग्नेंट मादा है. एंबुलेंस के जरिए ही मछली को राजघाट के पास राप्ती नदी में छोड़ा जाना था, क्योंकि राप्ती नदी डॉल्फिन के लिए एक सुरक्षित घर है।

    गोरखपुर SSP डॉक्टर कौस्तुभ के आदेश पर डॉल्फिन को सुरक्षित राप्ती नदी में छोड़ने के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया। इसके चलते राप्ती घाट तक कुल दूरी करीब 52 किमी को तय करने में मात्र एक घंटा 5 मिनट लगे और मछली को सुरक्षित राप्ती नदी में छोड़ दिया गया।