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  • नेपाल में फीकी पड़ी बालेन शाह का चमक…. महज दो माह में टूटने लगा Gen Z का भरोसा!

    नेपाल में फीकी पड़ी बालेन शाह का चमक…. महज दो माह में टूटने लगा Gen Z का भरोसा!


    काठमांडु।
    नेपाल (Nepal) में पारंपरिक राजनेताओं (Traditional Politicians) के खिलाफ जेनरेशन जेड (Gen-Z) के आंदोलन के रूप में देखे गए ऐतिहासिक चुनावों के जरिए सत्ता में आए बालेन शाह (Balen Shah) की सरकार के लिए शुरुआती उम्मीदें और चमक अब फीकी पड़ती नजर आ रही हैं। महज दो महीने के भीतर ही सरकार चौतरफा विवादों, अदालती झटकों और कूटनीतिक मोर्चों पर आलोचनाओं से घिर गई है। संसद सत्र को टालकर अध्यादेशों की बाढ़ लाने और आलोचनाओं पर प्रधानमंत्री शाह की चुप्पी ने उनके समर्थकों को भी निराश किया है।

    बालेन शाह की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के पास 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 181 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत है, लेकिन नेशनल असेंबली (ऊपरी सदन) में उनका एक भी सदस्य नहीं है। विधायी संशोधन और कानून पारित करने के लिए उच्च सदन की भूमिका अनिवार्य होती है।

    इस विधायी गतिरोध से बचने के लिए शाह सरकार ने एक विवादास्पद रास्ता चुना। 30 अप्रैल को शुरू होने वाले निचले सदन के सत्र को 11 मई तक टाल दिया गया और इस 12 दिनों के अंतराल में सरकार ने आठ अध्यादेश पारित कर दिए। समर्थकों का मानना है कि यह उस सुधार के एजेंडे के साथ विश्वासघात है जिसके दम पर वे सत्ता में आए थे।


    न्यायपालिका से जुड़ा विवाद

    सबसे बड़ा विवाद संवैधानिक परिषद से जुड़े अध्यादेश को लेकर हुआ। यह परिषद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीशों और अन्य संवैधानिक निकायों के प्रमुखों की नियुक्ति की सिफारिश करती है। नए अध्यादेश के जरिए प्रधानमंत्री को वीटो पावर दे दी गई। इसके तहत यदि किसी नाम पर टाई होता है, तो पीएम का फैसला अंतिम होगा और वे बहुमत के फैसले को भी पलट सकते हैं। परिषद के दो सदस्यों उच्च सदन के अध्यक्ष नारायण दहाल और भीष्मराज आंगदाम्बे ने इस पर असहमति जताई।

    राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने भी इसे पुनर्विचार के लिए वापस भेजा था, लेकिन सरकार द्वारा बिना बदलाव के दोबारा भेजे जाने पर उन्हें इसे मंजूरी देनी पड़ी। अध्यादेश के तुरंत बाद परिषद ने डॉ. मनोज शर्मा को मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की, जिससे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सपना मल्ला प्रधान सहित तीन वरिष्ठ न्यायाधीश पीछे छूट गए। नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने इसप कहा, “बालेन को इस कृत्य की कीमत चुकानी होगी, जो देश की 15 मिलियन महिलाओं का अपमान है।”


    सुप्रीम कोर्ट का झटका

    प्रशासन को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने के नाम पर सरकार ने एक अन्य अध्यादेश के जरिए संवैधानिक निकायों, राज्य बोर्डों, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों में तैनात करीब 1,600 लोगों की नियुक्तियां रद्द कर दीं। इसके साथ ही, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्र संगठनों और कर्मचारी यूनियनों पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया गया। हालांकि, नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने इस अध्यादेश पर रोक लगा दी है, जो शाह सरकार के लिए एक बड़ा कानूनी झटका है। इससे पहले कोर्ट ने बिना पुनर्वास के सुकुम्बासी (भूमिहीन निवासियों) को हटाने पर भी रोक लगाई थी।


    संसद में बर्ताव और स्थानीय स्तर पर विरोध

    11 मई को शुरू हुए संसद सत्र के पहले ही दिन पीएम बालेन शाह सफेद कैनवास जूते पहनकर पहुंचे, जिसे संसदीय मर्यादा के लिहाज से बहुत अनौपचारिक माना गया। इसके बाद वे राष्ट्रपति के अभिभाषण के बीच में ही अचानक सदन से बाहर निकल गए और बुधवार को बिना किसी सूचना के संसद से गायब रहे, जिसके कारण विपक्ष के हंगामे के बाद सदन को स्थगित करना पड़ा।

    काठमांडू घाटी में बागमती नदी के किनारे चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान दो भूमिहीन लोगों की आत्महत्या के बाद मानवीय संकट गहरा गया। तीखी आलोचना के बाद शाह ने सोशल मीडिया पर सफाई दी कि सरकार सच्चे भूमिहीनों के पुनर्वास के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन फर्जी भूमिहीनों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी थी।

    इसके अतिरिक्त, देश के शीर्ष उद्योगपतियों को भ्रष्टाचार के आरोप में हिरासत में लेने के फैसले से घरेलू और विदेशी निवेशकों में डर का माहौल बन गया है, जिसे संभालने के लिए अब वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले को डैमेज कंट्रोल करना पड़ रहा है।

    अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मोर्चे पर भी नई सरकार अनुभवहीन साबित हो रही है। बालेन शाह ने अप्रैल में 17 देशों के राजदूतों से मुलाकात कर बहुपक्षीय संबंधों का भरोसा दिया था। लेकिन इसके तुरंत बाद भारत और चीन ने नेपाल के क्षेत्रीय दावे की अनदेखी करते हुए लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर सड़क खोलने की घोषणा कर दी, जिस पर काठमांडू को विरोध पत्र भेजना पड़ा।

    बालेन शाह ने संकल्प लिया है कि वे एक साल तक कोई विदेशी दौरा नहीं करेंगे और केवल मंत्रियों या उससे ऊपर के स्तर के गणमान्य व्यक्तियों से ही मिलेंगे। इसी कूटनीतिक कड़े रुख के कारण भारत के विदेश सचिव विवेक मिस्री ने अपना नेपाल दौरा स्थगित कर दिया।

  • नेपाल में ‘सिस्टम क्लीनअप’: PM बालेंद्र शाह ने एक झटके में 1594 राजनीतिक नियुक्तियां रद्द

    नेपाल में ‘सिस्टम क्लीनअप’: PM बालेंद्र शाह ने एक झटके में 1594 राजनीतिक नियुक्तियां रद्द


    नई दिल्ली। नेपाल की राजनीति में एक बड़े फैसले ने हलचल मचा दी है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने एक झटके में देशभर में की गई 1594 राजनीतिक नियुक्तियों को रद्द कर दिया है। कैबिनेट की मंजूरी और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल की स्वीकृति के बाद यह फैसला लागू होते ही करीब 150 सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों में बैठे पदाधिकारी तत्काल प्रभाव से पदमुक्त हो गए।

    सरकार ने इस कदम को “सिस्टम सुधार” और पारदर्शिता की दिशा में बड़ा बदलाव बताया है। अध्यादेश के जरिए करीब 110 कानूनों में संशोधन कर यह सुनिश्चित किया गया कि पहले की सभी राजनीतिक नियुक्तियां, चाहे उनकी अवधि या शर्त कुछ भी रही हो, स्वतः समाप्त मानी जाएं। इसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, एविएशन, मीडिया और सांस्कृतिक संस्थानों समेत कई अहम क्षेत्रों पर पड़ा है।

    सबसे बड़ा झटका देश के विश्वविद्यालयों को लगा है, जहां उपकुलपति, रजिस्ट्रार और अन्य शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी हटाए गए हैं। इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में मेडिकल कॉलेजों, काउंसिल्स और रिसर्च संस्थानों के प्रमुख पदाधिकारी भी पदमुक्त कर दिए गए हैं। नेपाल मेडिकल काउंसिल, नेपाल पर्यटन बोर्ड और नेपाल नागरिक उड्डयन प्राधिकरण जैसे बड़े संस्थान भी इस फैसले की जद में आए हैं।

    यह कार्रवाई केवल प्रशासनिक ढांचे तक सीमित नहीं रही, बल्कि शांति प्रक्रिया से जुड़े आयोगों तक पहुंच गई। माओवादी संघर्ष के बाद गठित सत्य निरूपण और बेपत्ता व्यक्तियों की जांच से जुड़े निकायों के पदाधिकारी भी हटा दिए गए हैं, जिससे इस फैसले की व्यापकता और भी साफ हो जाती है।

    सरकार का दावा है कि इससे राजनीतिक दखल कम होगा और संस्थानों की कार्यप्रणाली अधिक पेशेवर बनेगी। हालांकि विपक्ष इसे सत्ता का केंद्रीकरण और संस्थानों पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश बता रहा है। ऐसे में यह फैसला नेपाल की राजनीति में आने वाले दिनों में बड़ा मुद्दा बनने की पूरी संभावना है।

  • Nepal के सबसे युवा प्रधानमंत्री होगे बालेंद्र शाह, आज ग्रहण करेंगे पदभार

    Nepal के सबसे युवा प्रधानमंत्री होगे बालेंद्र शाह, आज ग्रहण करेंगे पदभार


    काठमांडू।
    राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) (Rashtriya Swatantra Party – RSP)) नेता बालेंद्र शाह (Balendra Shah) शुक्रवार को नेपाल (Nepal) के प्रधानमंत्री (Prime Minister) पद की शपथ लेंगे। वह देश के सबसे युवा पीएम होंगे। इससे पहले संसद के अस्थायी भवन में आयोजित कार्यक्रम में नेपाल की प्रतिनिधि सभा के नए सांसदों ने बृहस्पतिवार को शपथ ली।

    प्रतिनिधि सभा के वरिष्ठ सदस्य अर्जुन नरसिंह केसी ने सांसदों को शपथ दिलाई। 63 सांसदों ने नेपाली के अलावा अपनी मातृभाषा में शपथ ली। उधर, संघीय संसद सचिवालय ने दलों की सीट संख्या के आधार पर बैठने की व्यवस्था तय की। इसके तहत नेपाली कांग्रेस, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी(एमाले) और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) के सांसदों को एक ही पंक्ति में बैठाया गया, जहां उन्होंने शपथ ग्रहण किया। सांसद विभिन्न पारंपरिक वेशभूषा में शपथ लेने के लिए सिंहदरबार पहुंचे।


    शाह को संसदीय दल के नेता का प्रस्ताव पारित

    राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) की केंद्रीय समिति ने संसदीय दल गठन का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया है। पार्टी के प्रवक्ता और सांसद मनिष झा ने जानकारी दी कि जारी केंद्रीय समिति बैठक ने बालेन्द्र शाह को संसदीय दल का नेता चुनने का प्रस्ताव भी पारित कर दिया है।


    बालेंद्र शाह ने जारी किया अपना नया गाना

    अपने शपथ ग्रहण समारोह की पूर्व संध्या पर बालेंद्र शाह बालेन ने बृहस्पतिवार को अपना नया गाना जय महाकाली जारी किया। इस नए वीडियो गीत में बालेन के चुनावी अभियान के दृश्य दिखाए गए हैं। इस गीत का उद्देश्य देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता का संदेश फैलाना है। यूट्यूब पर जारी होने के महज दो घंटे में ही इस गाने को 1.50 लाख दर्शकों ने देखा।

    गौरतलब है कि 5 मार्च को हुए प्रतिनिधि सभा चुनाव में आरएसपी ने 182 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। पार्टी ने चुनाव से पहले ही बालेंद्र शाह को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था।

  • RSP नेता बालेंद्र शाह होंगे नेपाल के नए PM, 27 मार्च को लेंगे पद की शपथ….

    RSP नेता बालेंद्र शाह होंगे नेपाल के नए PM, 27 मार्च को लेंगे पद की शपथ….


    काठमांडो।
    नेपाल (Nepal) में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) (Rashtriya Swatantra Party (RSP)) के वरिष्ठ नेता बालेंद्र शाह (Balendra Shah) 27 मार्च को प्रधानमंत्री (Prime Minister) पद की शपथ लेंगे। एक दिन पहले सांसदों को शपथ दिलाई जाएगी। 5 मार्च को हुए प्रतिनिधि सभा चुनाव में आरएसपी ने 182 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। पार्टी ने चुनाव से पहले ही बालेंद्र शाह को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था।

    आरएसपी अध्यक्ष रवि लामिछाने, वरिष्ठ नेता शाह तथा उपाध्यक्ष द्वय डीपी अर्याल और स्वर्णिम वाग्ले के बीच हुई बैठक में शपथ की तारीख तय की गई। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि पीएम पद की शपथ से पहले 26 मार्च को संघीय संसद सचिवालय ने 26 मार्च को दोपहर 2 बजे सांसदों के शपथ ग्रहण का कार्यक्रम तय है। इसके तुरंत बाद आरएसपी सरकार गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी।


    अस्थायी हॉल में होगा शपथ ग्रहण

    संघीय संसद सचिवालय के प्रवक्ता एकराम गिरी के अनुसार सिंहदरबार परिसर के भीतर निर्माणाधीन नए संसद भवन के पूरी तरह तैयार न होने के कारण शपथ ग्रहण समारोह अस्थायी हॉल में होगा। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम स्थल पर माइक्रोफोन, प्रकाश व्यवस्था और अन्य आवश्यक आधारभूत संरचनाओं की स्थापना का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।


    नेपाल निर्वाचन आयोग राष्ट्रपति पौडेल को आज सौंपेगा अंतिम चुनाव नतीजे

    नेपाल के निर्वाचन आयोग ने कहा है कि वह शुक्रवार दोपहर को राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को चुनाव के अंतिम नतीजे पेश करेगा। प्रतिनिधि सभा के चुनाव पांच मार्च, 2026 को हुए, जिसमें 275 सदस्यीय निचले सदन (प्रतिनिधि सभा) के लिए मतदान हुआ। निचले सदन में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को 182 सीटें, नेपाली कांग्रेस को 38 सीटें, सीपीएन-यूएमएल को 25, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी को 17, श्रम संस्कृति पार्टी को सात और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को पांच सीटें मिली हैं।

    निचले सदन के 275 सदस्यों में से 165 सदस्य प्रत्यक्ष मतदान द्वारा और 110 सदस्य आनुपातिक मतदान द्वारा चुने जाते हैं। आरएसपी ने साधारण बहुमत यानी 138 सीटों से अधिक सीटें हासिल कर ली हैं। पार्टी को दो-तिहाई बहुमत से के लिए केवल दो सीटों की जरूरत है। राष्ट्रपति नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू करेंगे।


    हार के बाद गगन थापा का कांग्रेस सभापति पद से इस्तीफा

    नेपाली कांग्रेस के सभापति गगन कुमार थापा ने प्रतिनिधि सभा चुनाव में पार्टी की करारी हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। बुधवार को उन्होंने अपना त्यागपत्र पार्टी के उपसभापति विश्वप्रकाश शर्मा को सौंपा। थापा इसी वर्ष 15 जनवरी को विशेष महाधिवेशन के जरिये सभापति निर्वाचित हुए थे। 5 मार्च को हुए चुनावों में कांग्रेस ने बदला कांग्रेस, बदलेगा देश के नारे के साथ थापा को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था।

    हालांकि, पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। खुद गगन थापा भी सर्लाही-4 सीट से राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार अमरेश कुमार सिंह से चुनाव हार गए। इस हार के बाद पार्टी के भीतर शेरबहादुर देउवा गुट लगातार उनके इस्तीफे की मांग कर रहा था। पार्टी विधान के अनुसार, थापा का इस्तीफा शुक्रवार को होने वाली केंद्रीय कार्यसमिति की बैठक में पेश किया जाएगा।

  • नेपाल में पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दामों में भारी वृद्धि, जानें कितनी बढ़ी कीमतें

    नेपाल में पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दामों में भारी वृद्धि, जानें कितनी बढ़ी कीमतें


    काठमांडू।
    ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध (Iran and US-Israeli War) के साथ खाड़ी देशों की वर्तमान स्थिति का हवाला देते हुए नेपाल (Nepal) में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में भारी वृद्धि (Increase Petroleum Products Prices) की घोषणा की गई है.

    नेपाल ऑयल निगम की रविवार देर रात तक चली बैठक में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी करने का फैसला लिया गया. निगम द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों और आपूर्ति प्रबंधन में आ रही चुनौतियों के कारण यह निर्णय लिया गया है. नई दरें आज रात 12 बजे से लागू कर दी गई हैं।

    नए मूल्य समायोजन के अनुसार पेट्रोल की कीमत में 31 रुपये प्रति लीटर, डीजल में 54 रुपये प्रति लीटर तथा एलपीजी गैस में 296 रुपये प्रति सिलेंडर की बढ़ोतरी की गई है।

    मूल्य वृद्धि के बाद अब पेट्रोल की कीमत 188 रुपये प्रति लीटर, डीजल की कीमत 196 रुपये प्रति लीटर और एलपीजी गैस का मूल्य 2,126 रुपये प्रति सिलेंडर तय किया गया है। निगम ने कहा है कि हाल के समय में मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में तेज वृद्धि हुई है, जिससे आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है।

    प्रेस विज्ञप्ति में यह भी बताया गया है कि नेपाल जैसे पेट्रोलियम उत्पादन न करने वाले देश के लिए अंतरराष्ट्रीय मूल्य वृद्धि का सीधा असर पड़ता है. इससे पहले भी वैश्विक परिस्थितियों के कारण आपूर्ति प्रणाली प्रभावित हुई थी और निगम को इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन को भुगतान करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था.

    निगम ने मौजूदा समय में भी नेपाल को निरंतर पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति जारी रखने के लिए इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन का आभार व्यक्त किया है। नेपाल ऑयल निगम ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति को देखते हुए पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में यह समायोजन किया गया है, ताकि आपूर्ति व्यवस्था को सुचारु रखा जा सके।

  • नेपाल में तीर्थयात्रियों की बस खाई में गिरी, 7 की मौत, 7 घायल

    नेपाल में तीर्थयात्रियों की बस खाई में गिरी, 7 की मौत, 7 घायल


    नई दिल्ली । नेपाल के गंडकी प्रांत के गोरखा जिले में शनिवार रात एक दुखद सड़क हादसा हुआ जिसमें भारतीय तीर्थयात्रियों से भरी बस खाई में गिर गई। मनाकामना मंदिर से दर्शन कर लौट रही इस बस में 7 लोगों की मौत हो गई और 7 घायल हो गए। हादसे के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन देर रात तक जारी रहा।

    पुलिस के अनुसार श्रद्धालुओं को लेकर जा रही माइक्रोबस मनाकामना मंदिर से तनहुन जिले के अंबुखैरेनी इलाके की ओर जा रही थी तभी सड़क फिसलने के कारण लगभग 200 फीट गहरी खाई में गिर गई। बस में एक दर्जन से ज्यादा यात्री सवार थे। घायल यात्रियों को भरतपुर स्थित चितवन मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए भेजा गया।

    गोरखा जिला ट्रैफिक पुलिस कार्यालय के प्रमुख सूरज अर्याल ने बताया कि मृतकों में दो महिलाएं और पांच पुरुष शामिल हैं सभी भारतीय नागरिक हैं। जिला पुलिस प्रमुख भरत बहादुर बीके ने मृतकों की पहचान मुथु कुमार (58) अनामालिक (58) मीनाक्षी (59) शिवगामी (53) विजयल (57) मीना (58) और तमिलरसी (60) के रूप में की। हादसे में बस का ड्राइवर सुरक्षित बच गया जबकि उसका सहायक घायल हुआ।

    नेपाल में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या और गंभीरता पिछले वर्षों में लगातार बढ़ी है। विश्व बैंक की स्टडी के अनुसार 2007 के बाद नेपाल में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाला आर्थिक नुकसान तीन गुना बढ़ चुका है और अब यह देश के सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) का लगभग 1.5% है। सड़क हादसों में मरने वालों में 70% से अधिक पैदल यात्री साइकिल सवार और मोटरसाइकिल चालक जैसे संवेदनशील रोड यूजर शामिल होते हैं।

    नेपाल में पहाड़ी इलाकों में संकरी और खराब सड़कें भारी बारिश और प्राकृतिक आपदाएं भूकंप और भूगर्भीय अस्थिरता परिवहन व्यवस्था की सीमाएं और वाहन ओवरलोडिंग जैसी वजहों से सड़क हादसे आम हैं। उदाहरण के तौर पर फरवरी में धादिंग जिले में एक पर्यटक बस 200 मीटर गहरी खाई में गिर गई थी जिसमें 19 लोगों की मौत हुई थी और 25 घायल हुए थे।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि नेपाल का ज्यादातर क्षेत्र पहाड़ी और दुर्गम है। सड़क किनारों पर गहरी खाइयां और ढलान होने के कारण थोड़ी सी गलती या खराब मौसम में वाहन आसानी से फिसल सकते हैं। संकरी घुमावदार सड़कें सुरक्षा दीवारों की कमी भूस्खलन और मिट्टी खिसकने जैसी घटनाएं हादसों की संभावना बढ़ाती हैं। पुराने वाहन ओवरलोडिंग और ड्राइवरों का अपर्याप्त प्रशिक्षण भी जोखिम बढ़ाता है।

    सरल शब्दों में कहें तो नेपाल में पहाड़ खराब सड़कें भारी बारिश और कमजोर बुनियादी ढांचा मिलकर सड़क हादसों की संख्या और गंभीरता को बढ़ाते हैं। मनाकामना मंदिर से लौटते समय हुए इस दुखद हादसे ने एक बार फिर नेपाल की सड़क सुरक्षा की चिंताओं को उजागर किया है।

  • Nepal: बालेन शाह ने किया बड़ा उलटफेर….., चार बार PM रह चुके केपी ओली को हराया

    Nepal: बालेन शाह ने किया बड़ा उलटफेर….., चार बार PM रह चुके केपी ओली को हराया


    काठमांडू।
    नेपाल (Nepal) के झापा-5 निर्वाचन क्षेत्र (Jhapa-5 Constituency) में आरएसपी नेता और रैपर से नेता बने बालेन शाह (Balen Shah) ने चार बार प्रधानमंत्री (Prime Minister) रह चुके के.पी. शर्मा ओली (K.P. Sharma Oli) को लगभग 50,000 मतों के भारी अंतर से हराया। निर्वाचन आयोग ने यहां यह जानकारी दी। राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी (आरएसपी) के नेता और काठमांडू के पूर्व महापौर, जिन्हें लोकप्रिय रूप से केवल बालेन के नाम से जाना जाता है, अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं।

    निर्वाचन आयोग (ईसी) ने बताया कि 35 वर्षीय बालेन को 68,348 मत मिले, जबकि 74 वर्षीय ओली को 18,734 मत मिले। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) – (सीपीएन-यूएमएल) ने ओली को पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया था। नेपाल में पिछले साल हुए हिंसक ‘जेन जेड’ विरोध प्रदर्शनों के बाद बृहस्पतिवार को पहला आम चुनाव हुआ, जिसमें हिमालयी देश में राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव और भ्रष्टाचार मुक्त शासन की मांग की गई थी।

    बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी (आरएसपी) बड़ा बहुमत हासिल कर नेपाल की सत्ता पर काबिज़ होने जा रही है। शाह ने झापा-5 सीट पर ओली को चुनौती दी और अपने फैसले को सही साबित कर दिखाया। इस सीट पर कुल 1,06,372 वोट डाले गए। पूरे देश में आरएसपी के पक्ष में चल रही तेज लहर के बावजूद पूर्व प्रधानमंत्री दहल 10,240 मतों के साथ रुकुम पूर्व-1 सीट जीतने में सफल रहे हैं।

    नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, आरएसपी ने 60 से अधिक सीटों पर जीत हासिल कर ली है। दूसरी ओर, नेपाली कांग्रेस ने जहां सिर्फ नौ पर जीत हासिल की है। ओली की पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) 3, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी 2 सीटें जीत चुकी हैं। इन आंकड़ों के आने के बाद शाह का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है।

    जेनरेशन-जेड के आंदोलन से पहले नेपाल की सत्ता पर काबिज़ रही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को मौजूदा आम चुनाव में करारी शिकस्त मिली है। पार्टी के उपाध्यक्ष बिष्णु पौडेल, गोकर्ण बिस्टा, महासचिव शंकर पोखरेल, सचिव महेश बसनेत, भानुभक्त ढकाल और राजन भट्टराई को हार का सामना करना पड़ा है। नेपाल की संसद (प्रतिनिधि सभा) की कुल 275 सीटों के लिए पांच मार्च को मतदान संपन्न हुआ था। इनमें से 165 सीटों पर प्रत्यक्ष मतदान के जरिए और शेष 110 सीटों पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से चुनाव कराए गए। निर्वाचन आयोग के अनुसार, इस बार लगभग 60 प्रतिशत मतदान हुआ है।

    उल्लेखनीय है कि सितंबर 2025 में हुए व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी छात्र आंदोलनों के बाद ओली सरकार गिर गई थी और संसद भंग कर दी गई थी। इसके बाद गठित अंतरिम सरकार की देखरेख में ये चुनाव संपन्न हुए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल के युवा मतदाताओं ने पारंपरिक नेतृत्व को नकारते हुए एक नए और आधुनिक राजनीतिक दृष्टिकोण को चुना है। शाह अगर सत्ता संभालते हैं तो न केवल नेपाल की आंतरिक राजनीति बल्कि भारत के साथ उसके द्विपक्षीय संबंधों के लिए भी एक नए युग की शुरुआत हो सकती है।

  • नेपाल चुनाव में बालेन शाह की RSP ने मारी बाजी: केपी ओली अपने ही गढ़ में 43,000 वोटों से हार गए

    नेपाल चुनाव में बालेन शाह की RSP ने मारी बाजी: केपी ओली अपने ही गढ़ में 43,000 वोटों से हार गए


    नई दिल्ली। नेपाल में आम चुनाव का परिणाम राजनीतिक इतिहास में एक नया मोड़ लेकर आया है। रैपर और काठमांडू के मेयर रह चुके बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) इस बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। शुरुआती रुझानों के अनुसार RSP ने अब तक 58 सीटें जीत ली हैं और 63 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। यह पार्टी सिर्फ चार साल पहले पत्रकार रहे रबि लामिछाने के प्रयासों से बनाई गई थी और अब यह युवा नेतृत्व नेपाल की राजनीति में अपनी मजबूती दिखा रहा है।

    पूर्व प्रधानमंत्री और भारत विरोधी रवैये के लिए जाने जाने वाले केपी शर्मा ओली को झापा-5 सीट पर बालेन शाह के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा। यहां ओली को केवल 16,350 वोट मिले, जबकि बालेन शाह को 59,568 वोट मिले, यानी 43,000 से अधिक मतों की भारी अंतर से वे पिछड़ गए। इससे यह स्पष्ट हो गया कि ओली का अपना गढ़ भी अब उन्हें समर्थन नहीं दे रहा। ओली ने 2017 और 2022 में इसी सीट से जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार युवा नेतृत्व और जनता की बदलती पसंद ने उनकी चुनौती को बढ़ा दिया।

    नेपाल की चुनाव प्रणाली मिश्रित मॉडल पर आधारित है। संसद की कुल 275 सीटों में से 165 सीटों पर सीधे चुनाव होते हैं, जहां निर्वाचन क्षेत्र के वोटरों का पसंदीदा उम्मीदवार जीतता है। बाकी 110 सीटें पार्टियों को कुल वोट प्रतिशत के आधार पर दी जाती हैं। इस प्रणाली का उद्देश्य छोटे दलों और विभिन्न सामाजिक समूहों को भी संसद में प्रतिनिधित्व देना है। इस बार भी Balen Shah की RSP ने 54.8 प्रतिशत वोट हासिल किए हैं, जो उसे संसद में मजबूत स्थिति प्रदान करता है।

    पिछले साल सितंबर में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद नेपाल में 5 मार्च को हुए चुनाव में लगभग 58% मतदाताओं ने हिस्सा लिया। चुनाव आयोग के अनुसार वोटों की गिनती पूरी करने में 3-4 दिन लग सकते हैं और 9 मार्च तक परिणाम आने की संभावना है।

    इस चुनाव के नतीजे नेपाल की राजनीति में युवा नेतृत्व के उदय और पुराने नेताओं के प्रभाव में गिरावट को दर्शाते हैं। बालेन शाह की RSP ने युवा और अलग सोच रखने वाले मतदाताओं का समर्थन हासिल किया, वहीं केपी ओली जैसी स्थापित पार्टी और नेता अब नए राजनीतिक परिदृश्य में चुनौती का सामना कर रहे हैं। इससे नेपाल की संसद में बदलाव की उम्मीद और नए गठबंधनों की संभावनाएं भी सामने आ रही हैं।

    कुल मिलाकर, नेपाल के इस चुनाव ने स्पष्ट कर दिया कि जनता अब युवा और नए दृष्टिकोण वाले नेताओं को प्राथमिकता दे रही है, और पारंपरिक, पुराने नेताओं को अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए नई रणनीतियों की आवश्यकता है।

  • नेपाल में बड़े राजनीतिक उलटफेर की आहट, चुनाव नतीजों से पहले सबकी धड़कनें तेज, PM की रेस में बालेन शाह….

    नेपाल में बड़े राजनीतिक उलटफेर की आहट, चुनाव नतीजों से पहले सबकी धड़कनें तेज, PM की रेस में बालेन शाह….


    काठमांडू।
    नेपाल (Nepal) चुनाव के नतीजे (Election Results) आने से पहले सबकी धड़कनें तेज हैं. जारी मतगणना से साफ है कि वहां राजनीति में बड़ा उलटफेर (Big Political Ppheaval) दहलीज पर है. 5 मार्च को हुए चुनाव में काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन्द्र (बालेन) शाह (Balendra (Balen) Shah) की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) भारी बढ़त के साथ आगे चल रही है. वहीं पारंपरिक दलों को करारी हार का सामना करना पड़ रहा है।

    ताजा रुझानों के मुताबिक, 275 सदस्यीय संसद के लिए हुए चुनाव में प्रत्यक्ष चुनाव की 165 सीटों में से शुक्रवार देर रात तक RSP 117 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. इससे बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनना लगभग तय है. जहां RSP प्रचंड बहुमत की ओर आगे बढ़ रही है, वहीं नेपाल के पारंपरिक दल जैसे- नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल को जनता ने पूरी तरह से हाशिए पर डाल दिया है.

    117 सीटों पर RSP आगे है तो दूसरे नंबर पर नेपाली कांग्रेस सिर्फ 15 सीटों पर और के पी ओली के नेतृत्व में रहे यूएमएल सिर्फ 13 सीटों पर जीत के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वहीं, पुष्प कमल दहाल प्रचंड के नेतृत्व वाली पार्टी की हालत इनसे भी बदतर हैं।


    बालेन शाह को Gen-Z का सपोर्ट, ओली बुरी तरह हार रहे

    विश्लेषकों का कहना है कि युवाओं और “Gen-Z” मतदाताओं का भारी समर्थन बालेन शाह की जीत का सबसे बड़ा कारण बना है, जिसने दशकों से सत्ता में रहे पारंपरिक दलों की पकड़ को कमजोर कर दिया है।

    पूर्व प्रधानमंत्री के पी ओली अपने निर्वाचन क्षेत्र से बुरी तरह से पिछड़ गए हैं. झापा जिले के जिस संसदीय क्षेत्र से एक बार छोड़कर वो लगातार सात बार चुनाव जीतते आए थे आज उसी निर्वाचन क्षेत्र से बालेन शाह उनको पटखनी देने वाले हैं। देर रात तक चल रहे मतगणना में जहां बालेन को करीब 17 हजार वोट मिल चुके थे, वहीं ओली को सिर्फ 4 हजार वोट ही मिल पाए. यानी ओली अभी बालेन से 13 हजार वोट से पीछे चल रहे हैं।

    सिर्फ ओली ही नहीं उनकी पार्टी के एक भी पदाधिकारी या उनकी सरकार के एक भी मंत्री मतगणना में आगे नहीं है. पार्टी के सभी दिग्गज चुनाव में हार की कगार पर हैं. उधर नेपाली कांग्रेस का भी कुछ यही हाल है. इस पार्टी के अध्यक्ष गगन थापा भी अपने निकटतम प्रतिद्वंदी से पीछे चल रहे हैं जबकि पार्टी के कई दिग्गज चुनाव हार चुके हैं।


    उलटफेर के तीन बड़े कारण

    – भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता से जनता की नाराजगी
    – युवा मतदाताओं का ओली सहित पुराने नेताओं से नफरत
    – बालेन शाह का नई राजनीति का वादा करना

    नेपाल में कुल 1 करोड़ 89 लाख मतदाता हैं. कुल 275 सीटों के लिए मतदान हुआ. First Past The Post (FPTP) या प्रत्यक्ष मतदान की 165 सीटों में ही RSP को दो तिहाई का बहुमत मिलता दिख रहा है. वहीं, Proportional Representation (PR) या समानुपातिक सिस्टम की 110 सीटों के लिए गिनती जारी है जिसका परिणाम आखिर में बताया जाएगा. प्रत्यक्ष में RSP के पक्ष में सुनामी को देखते हुए इस पार्टी को समानुपातिक में भी 50 से ज्यादा सीट मिलने की उम्मीद है. यानि नेपाल के इतिहास में 36 सालों के बाद किसी एक पार्टी को न सिर्फ पूर्ण बहुमत बल्कि प्रचंड बहुमत मिलेगा. लोगों को राजनीतिक स्थायित्व की उम्मीद है और इस सरकार से अपेक्षा भी बहुत है।

  • नेपाल में बड़ा बदलाव…. आज हो रहा मतदान, ओली के गढ़ में चुनौती बने Gen Z नेता बालेन

    नेपाल में बड़ा बदलाव…. आज हो रहा मतदान, ओली के गढ़ में चुनौती बने Gen Z नेता बालेन


    काठमांडु।
    नेपाल (Nepal) में आज (गुरुवार) मतदान (Voting) हो रहा है और इस बार हिमालयी देश के राजनीतिक माहौल में एक बड़ा पीढ़ीगत बदलाव (Big Generational Change) देखने को मिल रहा है। यह चुनाव मुख्य रूप से नेपाल के पारंपरिक नेतृत्व और बदलाव की मांग कर रहे युवा मतदाताओं (Young Voters) के बीच का संघर्ष बन गया है।


    युवा आक्रोश और झापा-5 का महामुकाबला

    काठमांडू और नेपाल के अन्य शहरों में, ‘जेन जी’ यानी युवा मतदाताओं का वर्ग नेपाल के पुराने और पारंपरिक नेतृत्व से निराश व बेचैन हो चुका है। यह वही युवा वर्ग है जिसने केपी शर्मा ओली की सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था और 35 वर्षीय बालेन शाह जैसे युवा नेताओं को राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया था।

    तमाम उथल-पुथल के बावजूद, केपी शर्मा ओली नेपाल की राजनीति के सबसे कद्दावर और स्थायी चेहरों में से एक बने हुए हैं। पूर्वी नेपाल में भारत की सीमा से लगा उनका चुनाव क्षेत्र ‘झापा-5’ दशकों से उनके राजनीतिक करियर का मजबूत गढ़ रहा है। इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प है क्योंकि युवा नेता बालेन ने सीधे तौर पर झापा-5 से ओली को चुनौती देने का फैसला किया है, मानो वे कोई बड़ा संदेश देना चाहते हों।


    विद्रोही से सत्ता के शिखर तक का सफर

    1952 में जन्मे ओली का राजनीतिक सफर नेपाल के ‘पंचायत युग’ के दौरान शुरू हुआ, जब देश में राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध था। 1970 में एक किशोर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने राजशाही की दल-विहीन व्यवस्था का कड़ा विरोध किया। अक्टूबर 1973 में ‘झापा विद्रोह’ और राजशाही विरोधी गतिविधियों के लिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने अपनी जिंदगी के 14 साल जेल में बिताए, जिनमें से चार साल उन्हें कालकोठरी में रखा गया था। 2018 में एक विश्लेषक ने बताया था कि पंचायत युग की जेलों से निकले नेताओं का मानना था कि सत्ता का प्रयोग निर्णायक रूप से होना चाहिए, क्योंकि उन्होंने देखा था कि इसे कितनी आसानी से कुचला जा सकता है।


    लोकतंत्र की बहाली और ओली का उदय

    1990 के जन आंदोलन के बाद जब नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र बहाल हुआ, तो ओली ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी UML के जरिए खुली राजनीति में प्रवेश किया। संसद में उन्होंने जल्द ही अपनी स्पष्ट बयानबाजी और तीखे व्यंग्य के लिए पहचान बना ली। वे राजनीतिक बहसों को शांतिपूर्ण समझौते के बजाय “सहनशक्ति और हाजिरजवाबी की प्रतियोगिता” के रूप में देखते थे।


    2015 का संकट और ‘राष्ट्रवादी’ छवि

    राष्ट्रीय स्तर पर उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक छलांग 2015 में आई। जब नेपाल ने अपना नया संविधान अपनाया, तो भारत के साथ उसके रिश्ते काफी खराब हो गए। दक्षिणी सीमा पर हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण नेपाल में ईंधन, दवाओं और जरूरी चीजों की भारी कमी हो गई, जिसे नेपाल में भारत की ‘अघोषित नाकेबंदी’ के रूप में देखा गया। ओली ने इस संकट को नेपाल की संप्रभुता और राष्ट्रीय गौरव का मुद्दा बना दिया। इसी राष्ट्रवादी लहर के दम पर वामपंथी गठबंधन ने 2017 के चुनावों में भारी जीत हासिल की और ओली एक दुर्लभ संसदीय बहुमत के साथ सत्ता में लौटे।


    संवैधानिक संकट और सत्ता से बाहर

    उनके द्वारा किया गया राजनीतिक स्थिरता का वादा ज्यादा दिन नहीं टिक सका। अपनी ही पार्टी में विरोध का सामना करते हुए, ओली ने दिसंबर 2020 में संसद भंग कर दी (जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बाद में बहाल किया)। मई 2021 में उन्होंने फिर से संसद भंग कर दी, जिससे एक नया संवैधानिक संकट पैदा हुआ और आखिरकार उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ा। आलोचकों का कहना था कि जिस नेता ने राज्य की सत्ता का विरोध करते हुए वर्षों जेल में बिताए, वही अब सत्ता में बने रहने के लिए संवैधानिक सीमाओं को लांघ रहा था।


    बालेन का राजनीतिक सफर

    बालेन्द्र शाह (जिन्हें नेपाल में लोकप्रिय रूप से ‘बालेन’ कहा जाता है) का राजनीतिक सफर नेपाल के आधुनिक इतिहास की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक है। एक अंडरग्राउंड रैपर और स्ट्रक्चरल इंजीनियर से लेकर नेपाल के प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार बनने तक का उनका सफर, पारंपरिक राजनीति को सीधी चुनौती देने वाला रहा है। बालेन का जन्म 27 अप्रैल 1990 को काठमांडू में हुआ था। राजनीति में आने से पहले वे एक पेशेवर इंजीनियर रहे हैं। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया और फिर भारत (कर्नाटक) से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री (MTech) हासिल की। वर्तमान में वे काठमांडू विश्वविद्यालय से अपनी पीएचडी (PhD) भी कर रहे हैं।


    रैपर के रूप में लोकप्रियता और सामाजिक चेतना

    म्यूजिक और ‘रैप बैटल’: 2013 के आसपास नेपाल के अंडरग्राउंड हिप-हॉप और ‘रैप बैटल’ (जैसे ‘Raw Barz’) के जरिए बालेन को खासी पहचान मिली। उनके गानों के बोल कोई सामान्य गीत नहीं थे; वे अक्सर भ्रष्टाचार, असमानता और राजनीतिक कुव्यवस्था पर तीखा प्रहार करते थे। इसी संगीत ने उन्हें पहली बार युवाओं के बीच एक विद्रोही आइकन के रूप में स्थापित किया। राजनीति में उनका असली उदय 2022 के स्थानीय चुनावों में हुआ, जब उन्होंने एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में काठमांडू के मेयर पद का चुनाव लड़ा।

    बिना किसी राजनीतिक पार्टी के समर्थन के, उन्होंने नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल (CPN-UML) जैसी मजबूत पार्टियों के दिग्गज उम्मीदवारों को भारी अंतर से हराकर पूरे देश की राजनीति में भूचाल ला दिया। मेयर के रूप में बालेन ने कई कड़े और मुखर फैसले लिए। उन्होंने अवैध कब्जों को हटाने के लिए अभियान चलाया, दशकों पुरानी कचरा प्रबंधन की समस्या को सुलझाने की कोशिश की और नेपाल में पहली बार नगर निगम की बैठकों का सीधा प्रसारण शुरू किया। हालांकि, उनके कुछ आक्रामक फैसलों की आलोचना भी हुई, लेकिन युवाओं में उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई।

    ‘Gen Z’ विरोध प्रदर्शन और राष्ट्रीय राजनीति की ओर कदम
    जब नेपाल में भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ युवाओं (Gen Z) का भारी विरोध प्रदर्शन हुआ- जिसके कारण अंततः केपी शर्मा ओली की सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा- तो बालेन ने मुखर होकर इस युवा क्रांति का समर्थन किया। प्रदर्शनों के दौरान वे एक अघोषित नेता के रूप में उभरे। हालांकि कई युवाओं ने उन्हें अंतरिम नेतृत्व संभालने को कहा, लेकिन बालेन ने स्पष्ट किया कि वे सत्ता हथियाने के बजाय लोकतांत्रिक तरीके (बैलेट बॉक्स) से व्यवस्था में बदलाव लाना चाहते हैं।

    2026 का राष्ट्रीय चुनाव: पुराने दिग्गजों को सीधी चुनौती
    राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति करने के इरादे से, बालेन ने जनवरी 2026 में काठमांडू के मेयर पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने पूर्व टीवी होस्ट रबि लामिछाने के नेतृत्व वाली युवाओं की लोकप्रिय ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ (RSP) के साथ गठबंधन किया और इस चुनाव में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन गए। किसी आसान या सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के बजाय, बालेन ने नेपाल के कद्दावर नेता और चार बार के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को उनके ही गढ़ ‘झापा-5’ में चुनौती देने का साहसिक फैसला किया।

    क्या विद्रोही का भविष्य अब भी बाकी है?
    ओली 2024 में गठबंधन सरकार के हिस्से के रूप में एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर लौटे। लेकिन पिछले साल सितंबर में हुए हिंसक ‘जेन जी’ विरोध प्रदर्शनों के दौरान उन्हें भारी जनआक्रोश का सामना करना पड़ा और अंततः उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। कई लोगों का मानना था कि उनका राजनीतिक करियर अब खत्म हो गया है। इसके बावजूद, ओली झापा-5 से एक बार फिर चुनावी मैदान में डटे हैं। जेल, राजनीतिक उथल-पुथल और सत्ता विरोधी लहरों को मात देने वाले इस नेता का सामना अब उन युवा मतदाताओं से है, जो यह तय करेंगे कि नेपाल की राजनीति में इस कद्दावर नेता का अब कोई भविष्य बचा है या नहीं।