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  • लोकसभा में नहीं पास हो सका महिला आरक्षण बिल, बहुमत से 54 वोट कम पड़े

    लोकसभा में नहीं पास हो सका महिला आरक्षण बिल, बहुमत से 54 वोट कम पड़े


    नई दिल्ली । सरकार द्वारा पेश किए गए महिला आरक्षण से जुड़े तीनों विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सके। 131वें संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया और यह 54 वोटों से पीछे रह गया। कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया, जिसमें सरकार को जरूरी 352 वोटों के मुकाबले सिर्फ 298 वोट ही मिल सके।

    संख्या बल में कमी से गिरा प्रस्ताव
    विधेयक के खिलाफ 230 वोट पड़े, जिसके चलते यह आवश्यक बहुमत तक नहीं पहुंच सका और गिर गया। बिल के असफल होने के बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की महिला सांसदों ने मकर द्वार पर विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी ने 18 अप्रैल से देशभर में विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान भी किया है।

    सरकार ने विपक्ष को ठहराया जिम्मेदार

    गृह मंत्री अमित शाह ने बिल के गिरने के लिए कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर इस पर प्रतिक्रिया दी और बिल के असफल होने पर जश्न मनाए जाने की आलोचना की। यह विधेयक एक दिन पहले कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था।

    लंबी बहस के बावजूद नहीं बनी सहमति

    इस बिल पर संसद में करीब 20 घंटे से अधिक समय तक चर्चा हुई। गुरुवार को सुबह 11 बजे से लेकर देर रात 1 बजे तक बहस चली, जबकि शुक्रवार को भी सुबह से शाम तक चर्चा जारी रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतदान से पहले विपक्ष से सहयोग की अपील की थी और सांसदों से अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने का आग्रह किया था, लेकिन इसका असर नजर नहीं आया।

    परिसीमन बना मुख्य विवाद का कारण

    चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने साफ कहा कि वे महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन परिसीमन के मुद्दे पर सहमत नहीं हैं। इसी कारण उन्होंने विधेयक का विरोध किया।

    संसदीय प्रक्रिया और राजनीतिक टकराव

    गृह मंत्री अमित शाह के जवाब के बाद कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विधेयक को विचार के लिए पेश किया, लेकिन मतदान में यह आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर सका। बता दें कि बजट सत्र को लेकर भी सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आए। सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक सत्र बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, जबकि विपक्ष ने चुनावों के बाद सर्वदलीय बैठक की मांग की थी, जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया।

  • हरिवंश नारायण सिंह का तीसरी बार उपसभापति चुना जाना अनुभव और विश्वास की निरंतरता का प्रतीक

    हरिवंश नारायण सिंह का तीसरी बार उपसभापति चुना जाना अनुभव और विश्वास की निरंतरता का प्रतीक

    नई दिल्ली: राज्यसभा के वरिष्ठ सदस्य हरिवंश नारायण सिंह को एक बार फिर उच्च सदन का उपसभापति चुना गया है और यह उनका लगातार तीसरा कार्यकाल होगा। शुक्रवार को उनके निर्विरोध चयन की औपचारिक घोषणा की गई। विपक्ष की ओर से कोई उम्मीदवार न उतारे जाने के कारण यह चयन पहले से ही लगभग तय माना जा रहा था। इस घटनाक्रम को संसदीय परंपरा में निरंतरता और अनुभव पर भरोसे के रूप में देखा जा रहा है।

    यह पद उनके पिछले कार्यकाल की समाप्ति के बाद रिक्त हुआ था, जिसके बाद निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत नामांकन और चुनाव की प्रक्रिया शुरू की गई। तय समय सीमा के भीतर उनके समर्थन में कई प्रस्ताव दाखिल किए गए। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा रही कि विपक्ष ने इस प्रक्रिया से दूरी बनाकर अपनी असहमति दर्ज कराई, हालांकि सदन की औपचारिक प्रक्रिया बिना किसी बाधा के पूरी हुई।

    उपसभापति के रूप में उनके चयन के बाद प्रधानमंत्री ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि यह लगातार तीसरी बार की जिम्मेदारी सदन के उनके प्रति गहरे विश्वास को दर्शाती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि हरिवंश नारायण सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान सदन की कार्यवाही को संतुलित, व्यवस्थित और प्रभावी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के बीच संतुलन बनाए रखना उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक रहा है।

    प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि हरिवंश नारायण सिंह ने सदन में सभी दलों को साथ लेकर चलने का प्रयास किया है और उनकी कार्यशैली ने संसदीय गरिमा को मजबूत किया है। अनुभव और संयम के साथ उनके द्वारा निभाई गई भूमिका ने सदन की कार्यवाही को अधिक सुचारु और प्रभावी बनाने में योगदान दिया है।

    संसदीय हलकों में भी उनके लगातार तीसरी बार चुने जाने को स्थिरता और निरंतरता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। उनके कार्यकाल में संवाद की गुणवत्ता और संसदीय अनुशासन को बढ़ावा मिलने की बात कही जा रही है, जिससे विधायी कार्यों के संचालन में अधिक सहजता आई है।

    इस पूरे घटनाक्रम को भारतीय संसदीय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण विकास माना जा रहा है, जहां अनुभव, संतुलन और परंपरा को महत्व देते हुए नेतृत्व की निरंतरता को आगे बढ़ाया गया है।

  • लोकसभा में बोले PM मोदी, 'परिसीमन में किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं, ये मेरी गारंटी', विपक्ष ने उठाए कई सवाल

    लोकसभा में बोले PM मोदी, 'परिसीमन में किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं, ये मेरी गारंटी', विपक्ष ने उठाए कई सवाल


    नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र की शुरुआत गुरुवार को जोरदार हंगामे और तीखी बहस के साथ हुई। जैसे ही सरकार की ओर से संबंधित विधेयक सदन में पेश किए गए विपक्ष ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार संवैधानिक व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश कर रही है। वहीं सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे देश के भविष्य और महिलाओं की भागीदारी से जुड़ा ऐतिहासिक कदम बताया।

    महिला शक्ति को लेकर नीयत पर जोर

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान कहा कि इस मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय राष्ट्रीय दृष्टिकोण से समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की महिलाएं केवल फैसलों को ही नहीं बल्कि सरकार की नीयत को भी परखेंगी। अगर नीयत में खोट होगी तो देश की नारी शक्ति उसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। प्रधानमंत्री ने सभी दलों से अपील की कि वे इस पहल का समर्थन करें और विकसित भारत के निर्माण में योगदान दें।

    विपक्ष को पीएम की चेतावनी
    प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि जो लोग इस मुद्दे में राजनीति तलाश रहे हैं उन्हें इतिहास से सबक लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब जब महिलाओं को अधिकार देने के प्रयासों का विरोध हुआ है उसका खामियाजा विरोध करने वालों को उठाना पड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सभी दल मिलकर आगे बढ़ते हैं तो इसका लाभ पूरे लोकतंत्र को मिलेगा न कि किसी एक पार्टी को। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि परिसीमन प्रक्रिया में किसी भी राज्य के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा “यह मेरी गारंटी है मेरा वादा है कि हर राज्य को न्याय मिलेगा।” साथ ही उन्होंने विपक्ष से अपील की कि इस मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से न देखें और देशहित में सहयोग करें।

    निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी जरूरी

    अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश की आधी आबादी अब निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए तैयार है। उन्होंने याद दिलाया कि पंचायत स्तर पर महिलाओं को आरक्षण पहले ही दिया जा चुका है और अब समय आ गया है कि उन्हें संसद और विधानसभाओं में भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले। उन्होंने कहा कि लाखों महिलाएं जमीनी स्तर पर काम कर चुकी हैं और अब वे नीति निर्धारण में अपनी भूमिका चाहती हैं।

    विकसित भारत की परिभाषा में महिला भागीदारी अहम

    प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि विकसित भारत केवल बुनियादी ढांचे या आर्थिक आंकड़ों से नहीं बनेगा बल्कि इसमें महिलाओं की बराबर भागीदारी भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि देश इस दिशा में पहले ही काफी देर कर चुका है और अब और देरी करना उचित नहीं होगा। उन्होंने सांसदों से आग्रह किया कि वे इस अवसर को गंवाएं नहीं।

    देश की दिशा तय करने वाला कदम

    पीएम मोदी ने इस विधेयक को देश के भविष्य के लिए निर्णायक बताते हुए कहा कि यह केवल एक कानून नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की दिशा तय करने वाला कदम है। उन्होंने कहा कि यह प्रयास शासन व्यवस्था को अधिक संवेदनशील बनाएगा और इससे निकला परिणाम देश की राजनीति को नई दिशा देगा।

    विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल

    समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के पक्ष में है लेकिन इसे लागू करने के तरीके पर आपत्ति है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर जनगणना और परिसीमन को इससे जोड़कर इसे लागू करने में देरी कर रही है। उनका कहना था कि अगर जातीय जनगणना के आंकड़े सामने आएंगे तो आरक्षण की मांग और बढ़ेगी जिससे सरकार बचना चाहती है।

    महिला प्रतिनिधित्व पर भाजपा से जवाब मांग

    अखिलेश यादव ने भाजपा पर हमला करते हुए पूछा कि जिन राज्यों में उनकी सरकारें हैं वहां कितनी महिला मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी अभी भी सीमित है और भाजपा को पहले अपने संगठन में महिलाओं को पर्याप्त स्थान देना चाहिए।

    मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण पर विवाद

    सदन में मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण को लेकर भी तीखी बहस हुई। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने कहा कि अगर मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण नहीं दिया जाएगा तो यह अधूरा कदम होगा। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान के खिलाफ है। उन्होंने विपक्ष को चुनौती देते हुए कहा कि वे अपनी पार्टी में मुस्लिम महिलाओं को टिकट दे सकते हैं सरकार को इससे कोई आपत्ति नहीं है।

    परिसीमन को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप

    भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह परिसीमन को लेकर खासकर दक्षिण भारत में भ्रम फैला रहा है। उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया संविधान के तहत हो रही है और इससे किसी राज्य का नुकसान नहीं होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि परिसीमन के बाद कुछ राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ सकती है जिससे उनका प्रतिनिधित्व और मजबूत होगा।

    सरकार का दावा किसी राज्य को नुकसान नहीं

    केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन को बताया कि प्रस्तावित बदलावों से लोकसभा की कुल सीटों में वृद्धि होगी और महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण मिलेगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि किसी भी राज्य की वर्तमान स्थिति को नुकसान नहीं होगा और सभी को समान रूप से लाभ मिलेगा।

    महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करने की मांग

    कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण का समर्थन करती है लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ना सही नहीं है। उनका सुझाव था कि इस कानून को तुरंत लागू किया जाना चाहिए ताकि महिलाओं को जल्द से जल्द इसका लाभ मिल सके।

    तीनों विधेयकों पर आगे की प्रक्रिया

    लोकसभा में इन विधेयकों पर चर्चा शुरू हो चुकी है और मतदान 17 अप्रैल को शाम 4 बजे कराया जाएगा। सरकार ने इस पर विस्तृत चर्चा के लिए पर्याप्त समय निर्धारित किया है। शुरुआती वोटिंग में विधेयकों को पेश करने के पक्ष में बहुमत मिला जिससे आगे की प्रक्रिया का रास्ता साफ हो गया।

    हंगामे के बीच जारी रही कार्यवाही


    सदन में पूरे दिन हंगामे का माहौल बना रहा। विपक्ष ने जहां सरकार पर गंभीर आरोप लगाए वहीं सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे ऐतिहासिक सुधार बताया। अब सभी की नजरें आगामी मतदान पर टिकी हैं जो इस पूरे मुद्दे की दिशा तय करेगा।

  • कर्नाटक कांग्रेस में 30 विधायकों का दिल्ली दौरा, कैबिनेट फेरबदल की मांग तेज…

    कर्नाटक कांग्रेस में 30 विधायकों का दिल्ली दौरा, कैबिनेट फेरबदल की मांग तेज…


    नई दिल्ली। कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर सियासी तापमान बढ़ गया है, जहां सत्तारूढ़ कांग्रेस के भीतर असंतोष के स्वर खुलकर सामने आने लगे हैं। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की सरकार में संभावित कैबिनेट फेरबदल को लेकर पार्टी के भीतर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, कर्नाटक कांग्रेस के लगभग 30 वरिष्ठ विधायकों का एक समूह दिल्ली पहुंच चुका है, जहां वे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात की तैयारी में हैं। इन विधायकों का उद्देश्य राज्य मंत्रिमंडल में बड़े बदलाव की मांग को मजबूती से रखना है। उनका कहना है कि सरकार को बने ढाई से तीन वर्ष हो चुके हैं और अब प्रशासन में नए चेहरों को अवसर देना आवश्यक है, ताकि सरकार में नई ऊर्जा और गति लाई जा सके।

    जानकारी के मुताबिक, यह असंतोष अचानक नहीं उभरा है, बल्कि लंबे समय से पार्टी के भीतर चल रही बैठकों और असंतोषपूर्ण चर्चाओं का परिणाम है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रम और उपचुनावों के बाद विधायकों के एक वर्ग में यह धारणा मजबूत हुई है कि संगठन और सरकार में अपेक्षित बदलाव नहीं किए गए हैं।

    विधायकों का कहना है कि कुछ मंत्री लंबे समय से अपने पदों पर बने हुए हैं, जिससे प्रशासनिक संतुलन और कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है। उनका तर्क है कि अनुभवी और नए चेहरों को शामिल करने से सरकार की कार्यप्रणाली और जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता और मजबूत होगी।

    इस पूरे घटनाक्रम पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने संतुलित प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि कैबिनेट फेरबदल की प्रक्रिया पहले से चल रही है और इसमें देरी का कारण विभिन्न राज्यों में चुनावी व्यस्तता और बजट सत्र है। उन्होंने यह भी कहा कि मंत्री पद की इच्छा रखने वाले विधायकों का दिल्ली जाना स्वाभाविक है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

    मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि पार्टी के भीतर सभी विषयों पर चर्चा जारी है और समय आने पर उचित निर्णय लिया जाएगा। साथ ही उन्होंने भरोसा जताया कि कांग्रेस आगामी चुनावों में मजबूत प्रदर्शन करेगी।

    इस घटनाक्रम के बीच अब सभी की नजरें पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि क्या शीर्ष नेतृत्व विधायकों की मांग के अनुरूप कैबिनेट में बड़ा फेरबदल करता है या मौजूदा व्यवस्था को ही जारी रखने का निर्णय लिया जाता है।

    कर्नाटक कांग्रेस में यह स्थिति एक बार फिर आंतरिक असंतुलन और नेतृत्व की चुनौती को उजागर कर रही है, जिससे राज्य की राजनीति में आने वाले दिनों में और अधिक हलचल की संभावना बनी हुई है।

  • कांग्रेस को बड़ा झटका ऐतिहासिक अकबर रोड दफ्तर खाली करने के निर्देश

    कांग्रेस को बड़ा झटका ऐतिहासिक अकबर रोड दफ्तर खाली करने के निर्देश


    नई दिल्ली: देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के ऐतिहासिक मुख्यालय 24 अकबर रोड को खाली करने का निर्देश मिलने के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। यह वही दफ्तर है जो लगभग 48 वर्षों तक कांग्रेस की पहचान बना रहा और पार्टी के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का गवाह रहा। सरकार की ओर से कांग्रेस को शनिवार तक इस भवन को खाली करने के लिए कहा गया है, जिससे यह मामला अब सियासी और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है।

    सूत्रों के अनुसार कांग्रेस को केवल 24 अकबर रोड ही नहीं बल्कि 5 रायसीना रोड स्थित इंडियन यूथ कांग्रेस के दफ्तर को भी खाली करने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि कांग्रेस ने पिछले वर्ष कोटला मार्ग पर अपने नए मुख्यालय इंदिरा भवन’ का उद्घाटन कर दिया था, लेकिन अब तक वह पूरी तरह से पुराने दफ्तर से शिफ्ट नहीं हो पाई है। पार्टी की गतिविधियां अभी भी अकबर रोड स्थित भवन में जारी हैं, जिससे यह विवाद और गहरा गया है।

    कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे को लेकर मंथन चल रहा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि वे इस आदेश के खिलाफ कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं ताकि उन्हें कुछ राहत मिल सके। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि 24 अकबर रोड से उनका भावनात्मक जुड़ाव रहा है, क्योंकि यह दफ्तर केवल एक कार्यालय नहीं बल्कि पार्टी के इतिहास और संघर्ष का प्रतीक रहा है।

    इस दफ्तर का इतिहास भी काफी समृद्ध रहा है। ब्रिटिश शासन के समय यह भवन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो की कार्यकारी परिषद के सदस्य सर रेजिनाल्ड मैक्सवेल का निवास स्थान था। बाद में यह म्यांमार की भारत में राजदूत डॉ खिन क्यी का निवास भी रहा, जिनकी बेटी आंग सान सू की ने आगे चलकर नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त किया। इस तरह यह भवन अंतरराष्ट्रीय और ऐतिहासिक महत्व भी रखता है।

    कांग्रेस के लिए यह दफ्तर 1970 के दशक के अंत से विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन गया। 1977 के चुनाव में हार के बाद जब पार्टी में विभाजन हुआ और इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट को एक नए केंद्र की जरूरत थी, तब जी वेंकटस्वामी ने अपना बंगला पार्टी को उपलब्ध कराया। यहीं से कांग्रेस की राजनीतिक वापसी की कहानी शुरू हुई। इसके बाद यह दफ्तर इंदिरा गांधी के नेतृत्व से लेकर राजीव गांधी, पी वी नरसिम्हा राव और डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल तक पार्टी का प्रमुख केंद्र बना रहा।

    समय के साथ इस भवन को पार्टी ने अपनी जरूरतों के अनुसार विस्तार भी दिया, लेकिन हाल के वर्षों में संगठन के पुनर्गठन के चलते पार्टी ने नया मुख्यालय बनाने का निर्णय लिया। इसी क्रम में कोटला मार्ग स्थित इंदिरा भवन’ का उद्घाटन किया गया, जो अब कांग्रेस का नया ठिकाना बन चुका है।

    अब जब सरकार ने पुराने दफ्तर को खाली करने का आदेश दिया है, तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक बदलाव भी माना जा रहा है। कांग्रेस इस आदेश को लेकर अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करने पर विचार कर रही है, जबकि राजनीतिक गलियारों में इस कदम को लेकर अलग अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

    आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस इस आदेश पर क्या रुख अपनाती है और क्या वह अपने ऐतिहासिक दफ्तर को लेकर कोई कानूनी लड़ाई लड़ती है या फिर पूरी तरह से नए मुख्यालय इंदिरा भवन’ से अपने कामकाज को आगे बढ़ाती है।

  • गिरधारी यादव मामले में नया मोड़ जेडीयू के कदम पर आरजेडी ने दिया बया

    गिरधारी यादव मामले में नया मोड़ जेडीयू के कदम पर आरजेडी ने दिया बया


    नई दिल्ली:जेडीयू सांसद गिरधारी यादव के खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों को लेकर उठाए गए कदम के बाद राजनीतिक माहौल गर्मा गया है। जेडीयू की ओर से लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग की गई है। पार्टी का आरोप है कि गिरधारी यादव के बेटे ने 2025 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी के टिकट पर चुनाव लड़ा था और इस दौरान खुद गिरधारी यादव ने भी प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसी आधार पर जेडीयू ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई का रुख अपनाया है।

    इस पूरे मामले पर आरजेडी की पहली प्रतिक्रिया सामने आई है। आरजेडी सांसद मीसा भारती ने जेडीयू के इस कदम पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी का बेटा चुनाव लड़ता है तो वह एक वयस्क व्यक्ति है और उसे अपने फैसले लेने का अधिकार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में हर नागरिक को चुनाव लड़ने और अपनी राजनीतिक राह चुनने की आजादी है। मीसा भारती ने यह भी कहा कि किसी परिवार के भीतर अलग अलग लोग अलग दलों से जुड़ सकते हैं और यह पूरी तरह से व्यक्तिगत अधिकार का मामला है।

    उन्होंने आगे कहा कि चुनाव लड़ना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इसे किसी भी प्रकार से गलत नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति को वोट डालने और अपनी राजनीतिक पसंद रखने की स्वतंत्रता है। ऐसे में यदि किसी के परिवार का सदस्य किसी अन्य पार्टी से चुनाव लड़ता है तो इसे आधार बनाकर कार्रवाई करना उचित नहीं है।

    मीसा भारती ने यह भी कहा कि कई अन्य नेता भी आरजेडी के लिए चुनाव प्रचार में शामिल रहे हैं और यदि आवश्यकता पड़ी तो पार्टी इसकी सूची भी सार्वजनिक कर सकती है। उनके इस बयान से यह साफ संकेत मिलता है कि आरजेडी इस मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से देख रही है और इसे पूरी तरह खारिज नहीं कर रही है।

    उधर जेडीयू की ओर से यह मामला लोकसभा अध्यक्ष के पास भेजा गया है और अब इस पर आगे क्या निर्णय लिया जाएगा, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। पार्टी का कहना है कि एक सांसद के तौर पर गिरधारी यादव का कर्तव्य है कि वे पार्टी के सिद्धांतों और अनुशासन का पालन करें। यदि उन पर लगे आरोप सही पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।

    वहीं गिरधारी यादव ने भी इस पूरे मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि वे अपना पक्ष रखने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि वे इस आरोप का जवाब विधिवत तरीके से देंगे।

    इस तरह गिरधारी यादव के खिलाफ जेडीयू के कदम और आरजेडी की प्रतिक्रिया के बाद बिहार की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। आने वाले दिनों में लोकसभा अध्यक्ष का फैसला और दोनों दलों की अगली रणनीति इस मामले को और अधिक महत्वपूर्ण बना सकती है।
  • पुडुचेरी चुनाव 2026 भाजपा की दूसरी सूची जारी कराईकल साउथ से एम अरुल मुरुगन उम्मीदवार

    पुडुचेरी चुनाव 2026 भाजपा की दूसरी सूची जारी कराईकल साउथ से एम अरुल मुरुगन उम्मीदवार

    नई दिल्ली:   पुडुचेरी विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं इसी बीच भारतीय जनता पार्टी ने अपनी दूसरी उम्मीदवार सूची जारी कर चुनावी मैदान में अपनी रणनीति को और स्पष्ट कर दिया है पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति ने कराईकल साउथ विधानसभा सीट से एम अरुल मुरुगन को उम्मीदवार घोषित किया है

    यह घोषणा ऐसे समय में की गई है जब चुनाव की तारीखें नजदीक हैं और सभी राजनीतिक दल अपने प्रचार अभियान और संगठनात्मक तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं भाजपा अपनी पूरी ताकत के साथ चुनाव में उतरने की रणनीति बना रही है ताकि सभी सीटों पर मजबूत प्रदर्शन किया जा सके

    इससे पहले शनिवार को भाजपा ने अपनी पहली सूची जारी की थी जिसमें कई महत्वपूर्ण सीटों पर उम्मीदवारों के नाम घोषित किए गए थे मन्नादीपेट सीट से ए नमस्सिवायम ओस्सुडु एससी सीट से ई थीप्पैंथन कालापेट सीट से पीएमएल कल्याणसुंदरम और राज भवन सीट से वीपी रामलिंगम को टिकट दिया गया है इसके अलावा मुदलियारपेट से ए जॉनकुमार मनावेली से एम्बलम आर सेल्वम तिरुनल्लार से जीएनएस राजसेकरन नेरावी टीआर पट्टिनम से टीकेएसएम मीनाक्षीसुंदरम और माहे सीट से ए दिनेशन को उम्मीदवार बनाया गया है

    पार्टी ने न केवल पुडुचेरी बल्कि अन्य राज्यों में भी अपने उम्मीदवारों की घोषणा तेज कर दी है इसी क्रम में केरल के लिए भी तीसरी सूची जारी की गई है जिसमें 11 उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं यह दर्शाता है कि भाजपा अपने संगठन और चुनावी रणनीति को व्यापक स्तर पर मजबूत करने में लगी है

    पुडुचेरी विधानसभा में कुल 33 सीटें हैं जिनमें से 30 सीटों पर जनता द्वारा सीधे मतदान किया जाता है जबकि 3 सीटें केंद्र सरकार द्वारा नामित की जाती हैं इस चुनावी प्रक्रिया में जनता के वोट का महत्व बेहद महत्वपूर्ण होता है

    पुडुचेरी विधानसभा चुनाव 9 अप्रैल को एक ही चरण में संपन्न होंगे जबकि 4 मई को मतगणना की जाएगी और उसी दिन परिणाम घोषित कर दिए जाएंगे चुनावी तारीखों के ऐलान के बाद क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियां और तेज हो गई हैं सभी प्रमुख दल मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए जनसभाएं रैलियां और प्रचार अभियान चला रहे हैं

    इस पूरी चुनावी प्रक्रिया में भाजपा अपनी मजबूत उम्मीदवार सूची और संगठनात्मक ताकत के सहारे बेहतर प्रदर्शन करने की कोशिश कर रही है वहीं अन्य दल भी अपनी रणनीति के साथ मैदान में सक्रिय हो गए हैं जिससे चुनावी मुकाबला और भी रोचक होने की उम्मीद है

  • 2026-27 के बजट प्रस्तावों में हर वर्ग के विकास पर फोकस: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, 18 फरवरी को विधानसभा में पेश होगा बजट

    2026-27 के बजट प्रस्तावों में हर वर्ग के विकास पर फोकस: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, 18 फरवरी को विधानसभा में पेश होगा बजट


    भोपाल । मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट प्रस्तावों में राज्य के सभी क्षेत्रों और समाज के हर वर्ग के विकास तथा कल्याण का विशेष ध्यान रखा गया है। मुख्यमंत्री ने बजट प्रस्तावों को वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप और संतुलित बताते हुए उप मुख्यमंत्री एवं वित्त मंत्री श्री जगदीश देवड़ा के दृष्टिकोण की सराहना की।

    मंगलवार को मंत्रालय में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के समक्ष वर्ष 2026-27 के बजट प्रस्तावों का विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया गया। इस दौरान मुख्यमंत्री ने बजट निर्माण में लगे विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों के परिश्रम की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि बजट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं बल्कि यह प्रदेश के विकास की दिशा और सरकार की प्राथमिकताओं को दर्शाता है।

    बैठक में उप मुख्यमंत्री श्री जगदीश देवड़ा मुख्य सचिव श्री अनुराग जैन अपर मुख्य सचिव मुख्यमंत्री कार्यालय श्री नीरज मंडलोई अपर मुख्य सचिव (वित्त) श्री मनीष रस्तोगी सहित वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। प्रेजेंटेशन के दौरान विभिन्न विभागों की योजनाओं विकास कार्यों सामाजिक कल्याण अधोसंरचना शिक्षा स्वास्थ्य कृषि और रोजगार से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा की गई।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि सरकार का लक्ष्य प्रदेश के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ समाज के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाना है। बजट में गरीब किसान महिला युवा और श्रमिक वर्ग के हितों को प्राथमिकता दी गई है। साथ ही औद्योगिक विकास निवेश और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने वाले प्रस्तावों को भी इसमें शामिल किया गया है।

    मुख्यमंत्री के समक्ष प्रेजेंटेशन के बाद मंत्रि-परिषद के समक्ष भी बजट प्रस्तावों का प्रस्तुतीकरण किया गया जिसे कैबिनेट ने अनुमोदित कर दिया है। मंत्रि-परिषद से मंजूरी मिलने के बाद अब यह बजट 18 फरवरी को उप मुख्यमंत्री एवं वित्त मंत्री श्री जगदीश देवड़ा द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत किया जाएगा।

    सरकार का दावा है कि यह बजट विकासोन्मुख होने के साथ-साथ वित्तीय अनुशासन को भी ध्यान में रखेगा। इसमें राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने आधारभूत ढांचे के विस्तार और जनकल्याणकारी योजनाओं को गति देने पर जोर रहेगा।

    प्रदेश सरकार के इस बजट को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में काफी उम्मीदें हैं। माना जा रहा है कि 2026-27 का बजट मध्य प्रदेश के विकास को नई दिशा देगा और राज्य को आर्थिक रूप से और मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।

  • सदन में बोलने से रोका गया, यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात, राहुल गांधी का स्पीकर को पत्र

    सदन में बोलने से रोका गया, यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात, राहुल गांधी का स्पीकर को पत्र


    नई दिल्ली। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मंगलवार 3 फरवरी को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक पत्र लिखकर गंभीर आरोप लगाए। राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें सरकार के इशारे पर सदन में बोलने से रोका गया, जो लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक है। उन्होंने लिखा कि नेता प्रतिपक्ष सहित हर सांसद को अपनी बात रखने का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है, लेकिन इन अधिकारों की अनदेखी से संसद में एक असाधारण स्थिति पैदा हो गई है।

    संसद में जारी गतिरोध के बीच राहुल गांधी ने सोमवार की तरह मंगलवार को भी पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण पर आधारित एक लेख का हवाला देते हुए चीन से जुड़े मुद्दे को उठाने की कोशिश की। हालांकि, उन्हें आसन की ओर से इसकी अनुमति नहीं दी गई। राहुल गांधी ने बताया कि उन्होंने उस लेख को सत्यापित कर सदन के पटल पर रखा था।

    पत्र में क्या लिखा राहुल गांधी ने

    राहुल गांधी ने पत्र में लिखा कि सोमवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान उनसे जिस लेख का उल्लेख करना था, उसे सत्यापित करने को कहा गया था। मंगलवार को जब उन्होंने अपना भाषण आगे बढ़ाया, तो उन्होंने निर्देश के अनुसार संबंधित दस्तावेज को सत्यापित कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि संसदीय परंपरा और पूर्व अध्यक्षों के फैसलों के अनुसार, किसी भी सदस्य को दस्तावेज का उल्लेख करने से पहले उसे सत्यापित करना होता है और उसकी जिम्मेदारी लेनी होती है।

    संसदीय परंपरा का उल्लंघन
    राहुल गांधी ने कहा कि एक बार दस्तावेज सत्यापित हो जाने के बाद अध्यक्ष की भूमिका समाप्त हो जाती है और सरकार को उसका जवाब देना होता है। इसके बावजूद उन्हें बोलने से रोकना न केवल संसदीय परंपराओं का उल्लंघन है, बल्कि इससे यह आशंका भी पैदा होती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम विषयों पर नेता प्रतिपक्ष को जानबूझकर चुप कराया जा रहा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा राष्ट्रपति के अभिभाषण का अहम हिस्सा है और उस पर संसद में चर्चा जरूरी है।

    लोकतंत्र पर काला धब्बा
    राहुल गांधी ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी है कि वे सदन के निष्पक्ष संरक्षक के रूप में हर सदस्य, खासकर विपक्ष के अधिकारों की रक्षा करें। उन्होंने लिखा कि नेता प्रतिपक्ष और प्रत्येक सांसद का बोलने का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि संसदीय इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब सरकार के दबाव में अध्यक्ष को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर नेता प्रतिपक्ष को बोलने से रोकना पड़ा। उन्होंने इसे लोकतंत्र पर काला धब्बा बताते हुए अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया।

  • NCP महाराष्ट्र में BJP-नेतृत्व वाले NDA के साथ बनी रहेगी, विलय की अटकलों को सुनील तटकरे ने किया खारिज

    NCP महाराष्ट्र में BJP-नेतृत्व वाले NDA के साथ बनी रहेगी, विलय की अटकलों को सुनील तटकरे ने किया खारिज


    नई दिल्ली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी NCP की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष और लोकसभा सांसद सुनील तटकरे ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी भाजपा नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन NDA का हिस्सा बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि संगठन दिवंगत अजित पवार की विचारधारा और मार्ग पर आगे बढ़ेगा।

    विलय की अफवाहों पर प्रतिक्रिया

    हाल ही में यह दावा किया गया था कि NCP और शरद पवार की राकांपा का विलय 12 फरवरी को घोषित किया जाएगा। इस पर तटकरे ने कहा, “हमारा रुख स्पष्ट है। पार्टी और अजित दादा की विचारधारा को हम आगे बढ़ाएंगे। राजग के साथ हमारा सहयोग कायम रहेगा।” उन्होंने जोर देकर कहा कि अजित पवार की सहमति के बिना कोई राजनीतिक निर्णय नहीं लिया गया।

    शपथ और पार्टी संबंध
    तटकरे ने सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने की जल्दबाजी पर कहा कि यह निर्णय महाराष्ट्र के हित में और राकांपा को मजबूत करने के लिए लिया गया। उन्होंने भाजपा की प्रशंसा करते हुए कहा कि गठबंधन में हमेशा सम्मानजनक व्यवहार रहा है।

    अस्थियों का अंतिम संस्कार और आगे की प्रक्रिया
    सुनील तटकरे ने बताया कि अजित पवार की अस्थियों को राज्य के सभी जिलों में ले जाकर श्रद्धांजलि दी जाएगी। वहीं, राकांपा के वरिष्ठ नेता माणिकराव कोकाटे ने कहा कि विलय या आगे की राजनीतिक दिशा का फैसला सुनेत्रा पवार करेंगी और उनका निर्णय पार्टी में सभी के लिए बाध्यकारी होगा।