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  • उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण की तबीयत बिगड़ने से राजनीतिक हलचल तेज अस्पताल में सफल सर्जरी के बाद राहत

    उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण की तबीयत बिगड़ने से राजनीतिक हलचल तेज अस्पताल में सफल सर्जरी के बाद राहत


    नई दिल्ली।आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और जनसेना पार्टी के अध्यक्ष पवन कल्याण की तबीयत एक प्रशासनिक बैठक के दौरान अचानक बिगड़ गई जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया। बैठक के दौरान उन्हें अस्वस्थता महसूस हुई और स्थिति गंभीर होने पर उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई गई।
    डॉक्टरों की टीम ने उनकी जांच के बाद आवश्यक सर्जरी की प्रक्रिया अपनाई जो सफलतापूर्वक पूरी की गई। सर्जरी के बाद उनकी स्थिति को स्थिर बताया गया है और उन्हें लगातार चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया है। चिकित्सकों ने उन्हें कुछ दिनों तक पूर्ण आराम करने की सलाह दी है ताकि वे पूरी तरह स्वस्थ हो सकें और किसी भी प्रकार की जटिलता से बचा जा सके। उनकी तबीयत में सुधार के संकेत मिल रहे हैं हालांकि पूर्ण रिकवरी में समय लग सकता है।

    स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद उन्हें पहले नजदीकी चिकित्सा केंद्र में प्राथमिक उपचार दिया गया और बाद में बेहतर सुविधा के लिए बड़े अस्पताल में स्थानांतरित किया गया जहां विशेषज्ञों की टीम ने विस्तृत जांच की। जांच के दौरान यह निर्णय लिया गया कि उनकी स्थिति को देखते हुए सर्जरी आवश्यक है। ऑपरेशन के बाद उनकी हालत स्थिर बनी हुई है और डॉक्टर लगातार उनकी सेहत पर नजर बनाए हुए हैं। अस्पताल में उन्हें विशेष देखभाल में रखा गया है और मेडिकल टीम उनकी रिकवरी को लेकर सतर्क है।

    इस घटना के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चिंता का माहौल देखा जा रहा है। उनके समर्थक और प्रशंसक लगातार उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं। पवन कल्याण की पत्नी ने भी उनकी सेहत में सुधार की जानकारी देते हुए लोगों को आश्वस्त किया है कि वह चिकित्सकीय देखरेख में धीरे धीरे बेहतर हो रहे हैं। परिवार और करीबी लोग अस्पताल में मौजूद रहकर उनकी स्थिति पर नजर रखे हुए हैं।

    पवन कल्याण लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहे थे और इसी कारण उन्होंने अपने कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी सीमित भागीदारी की थी। अचानक तबीयत बिगड़ने की इस घटना ने सभी को चिंतित कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि सर्जरी सफल रही है और आने वाले दिनों में उनकी स्थिति में और सुधार की उम्मीद है।

    पवन कल्याण न केवल एक सक्रिय राजनेता हैं बल्कि तेलुगु फिल्म उद्योग के एक प्रसिद्ध अभिनेता भी हैं। अपने अभिनय करियर में उन्होंने कई सफल फिल्मों के जरिए एक अलग पहचान बनाई है। राजनीति में उन्होंने जनसेना पार्टी की स्थापना कर राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हाल के वर्षों में वे राज्य की नीतियों और प्रशासनिक निर्णयों में सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं।

    उनकी तबीयत को लेकर जारी यह स्थिति फिलहाल स्थिर बनी हुई है और चिकित्सकीय टीम लगातार उनकी रिकवरी प्रक्रिया पर नजर बनाए हुए है। परिवार और समर्थक उनके जल्द स्वस्थ होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं और पूरे प्रदेश में उनके स्वास्थ्य को लेकर सकारात्मक माहौल बना हुआ है।

  • बंगाल में बदलाव की हुंकार सीएम मोहन यादव बोले जंगलराज से मुक्ति दिलाएगी भाजपा

    बंगाल में बदलाव की हुंकार सीएम मोहन यादव बोले जंगलराज से मुक्ति दिलाएगी भाजपा

    कोलकाता/भोपाल। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पश्चिम बंगाल दौरे के दौरान कोलकाता में भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जोरदार चुनाव प्रचार किया। उन्होंने कमरहाटी क्षेत्र के वार्ड 24 और 112 में घर घर पहुंचकर लोगों से मुलाकात की और दुकानों पर जाकर आम नागरिकों से सीधे संवाद स्थापित किया। इस दौरान उन्होंने प्रदेश में बदलाव और विकास के नाम पर भाजपा को समर्थन देने की अपील की।

    कोलकाता में जनसंपर्क अभियान के दौरान डॉ. मोहन यादव ने कहा कि अब पश्चिम बंगाल की जनता ठहराव नहीं बल्कि विकास चाहती है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य विकास की दौड़ में पीछे छूटता जा रहा है जबकि देश के अन्य राज्य तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उनके अनुसार बंगाल को फिर से प्रगति के रास्ते पर लाने के लिए भाजपा की सरकार बनना जरूरी है।

    उन्होंने कहा कि बंगाल अब जंगलराज से मुक्ति चाहता है और यहां की जनता बदलाव के लिए तैयार है। मुख्यमंत्री ने दावा किया कि आगामी चुनाव में जनता प्रचंड बहुमत से भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में लाने का मन बना चुकी है। उन्होंने भाजपा के चुनाव चिन्ह कमल को विकास और समृद्धि का प्रतीक बताते हुए लोगों से इसे चुनने का आग्रह किया।

    इस दौरान उन्होंने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का भी जिक्र किया और कहा कि देश के कई राज्यों में तेजी से विकास कार्य हो रहे हैं। मध्यप्रदेश का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां भी विकास की गति लगातार बढ़ी है और इसी मॉडल को बंगाल में भी लागू किया जा सकता है।

    जनसंपर्क के दौरान मुख्यमंत्री ने स्थानीय नागरिकों की समस्याएं भी सुनीं और भरोसा दिलाया कि भाजपा की सरकार बनने पर जनकल्याण योजनाओं को तेजी से लागू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जनता की अपेक्षाओं को पूरा करना ही उनकी प्राथमिकता है और इसके लिए मजबूत और स्थिर सरकार जरूरी है।

    डॉ. मोहन यादव का यह दौरा दो दिनों का बताया जा रहा है जिसमें वे विभिन्न क्षेत्रों में जनसभाएं और संपर्क अभियान चला रहे हैं। राजनीतिक रूप से यह दौरा महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसके जरिए भाजपा बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

  • आज रात 8:30 बजे देश को संबोधित करेंगे प्रधानमंत्री मोदी, महिला आरक्षण पर कर सकते हैं बात

    आज रात 8:30 बजे देश को संबोधित करेंगे प्रधानमंत्री मोदी, महिला आरक्षण पर कर सकते हैं बात


    नई दिल्ली ।  हालांकि उनके संबोधन का विषय अभी आधिकारिक तौर पर स्पष्ट नहीं किया गया है लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि वे महिला आरक्षण और संसद में हालिया घटनाक्रम पर अपनी बात रख सकते हैं। दरअसल सरकार लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा विधेयक लेकर आई थी जो पारित नहीं हो सका। इसी पृष्ठभूमि में माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री अपने संबोधन में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठा सकते हैं।

    कैबिनेट बैठक में विपक्ष पर निशाना

    आज हुई कैबिनेट बैठक में भी इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई। बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर ‘दोषी’ होने और महिलाओं के लिए आरक्षण बिल का समर्थन न करके महिलाओं के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया। पीएम मोदी ने विपक्ष के इस रवैये को एक गलती बताया और चेतावनी दी है कि भविष्य में उन्हें इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह मैसेज देश के हर गांव तक पहुंचाया जाना चाहिए कि विपक्ष महिलाओं के प्रति नकारात्मक सोच रखता है.

    पिछले दशकों में क्यों नहीं मिला आरक्षण?

    विपक्षी दलों पर सवाल उठाते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि वे वास्तव में महिलाओं के पक्ष में थे तो पिछले कई दशकों में उन्होंने आरक्षण लागू क्यों नहीं किया। उन्होंने इसे विपक्ष की नीयत पर सवाल खड़ा करने वाला मुद्दा बताया। प्रधानमंत्री मोदी ने संकेत दिए कि महिला आरक्षण का विरोध करने का राजनीतिक परिणाम विपक्ष को भुगतना पड़ सकता है। उनके अनुसार जनता इस मुद्दे को गंभीरता से देख रही है और इसका असर चुनावी माहौल पर पड़ना तय है।

    गांव-गांव तक पहुंचाने का निर्देश

    उन्होंने पार्टी नेताओं को निर्देश दिया कि इस मुद्दे को देश के हर गांव तक पहुंचाया जाए। साथ ही कहा कि जनता के बीच जाकर यह बताया जाए कि महिलाओं के अधिकारों को लेकर सरकार और विपक्ष की सोच में क्या अंतर है।

  • कांग्रेस ने हिमाचल में 71 ब्लॉक अध्यक्ष किए नियुक्त, एक भी महिला को नहीं मिली जगह

    कांग्रेस ने हिमाचल में 71 ब्लॉक अध्यक्ष किए नियुक्त, एक भी महिला को नहीं मिली जगह


    नई दिल्ली । हिमाचल प्रदेश में संगठन विस्तार के तहत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बड़ी स्तर पर ब्लॉक कांग्रेस कमेटियों के अध्यक्षों की नियुक्ति की है। कुल 71 ब्लॉक अध्यक्षों की सूची जारी की गई है, लेकिन इस सूची में किसी भी महिला को जगह नहीं दी गई है।

    संगठन विस्तार में नई नियुक्तियां

    कांग्रेस द्वारा जारी सूची के अनुसार, राज्य के सभी जिलों में ब्लॉक स्तर पर नए अध्यक्षों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। इनमें चंबा, कांगड़ा, मंडी, कुल्लू, ऊना, हमीरपुर, सोलन, सिरमौर, शिमला, लाहौल-स्पीति और किन्नौर जैसे सभी जिलों को शामिल किया गया है।

    नालागढ़ ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष बने बाबूराम ठाकुर ने अपनी नियुक्ति पर हाईकमान का आभार जताया और इसे बड़ी जिम्मेदारी बताया। उन्होंने कहा कि वे संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करेंगे और सभी कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलेंगे।

    नेताओं ने जताया नेतृत्व पर भरोसा

    बाबूराम ठाकुर ने अपनी नियुक्ति को मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और वरिष्ठ नेताओं के मार्गदर्शन का परिणाम बताया। उन्होंने मुकेश अग्निहोत्री, प्रतिभा सिंह, विक्रमादित्य सिंह और अन्य नेताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

    जमीनी संगठन को मजबूत करने का दावा

    नवनियुक्त अध्यक्षों ने कहा कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करेंगे और कार्यकर्ताओं के सम्मान को प्राथमिकता देंगे। साथ ही, किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय लेने की बात भी कही गई।

    जिलावार नियुक्तियां पूरी

    सूची के अनुसार सभी जिलों में ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति कर दी गई है, जिनमें चंबा, कांगड़ा, मंडी, हमीरपुर, ऊना, सोलन, सिरमौर, शिमला और अन्य जिले शामिल हैं।

    महिला प्रतिनिधित्व पर उठे सवाल

    हालांकि संगठन विस्तार के इस कदम के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि इतने बड़े स्तर पर नियुक्तियों के बावजूद किसी भी महिला को ब्लॉक अध्यक्ष नहीं बनाया गया। यह मुद्दा राजनीतिक बहस का नया विषय बन सकता है, खासकर उस समय जब महिला प्रतिनिधित्व और आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है।

  • लोकसभा में नहीं पास हो सका महिला आरक्षण बिल, बहुमत से 54 वोट कम पड़े

    लोकसभा में नहीं पास हो सका महिला आरक्षण बिल, बहुमत से 54 वोट कम पड़े


    नई दिल्ली । सरकार द्वारा पेश किए गए महिला आरक्षण से जुड़े तीनों विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सके। 131वें संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया और यह 54 वोटों से पीछे रह गया। कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया, जिसमें सरकार को जरूरी 352 वोटों के मुकाबले सिर्फ 298 वोट ही मिल सके।

    संख्या बल में कमी से गिरा प्रस्ताव
    विधेयक के खिलाफ 230 वोट पड़े, जिसके चलते यह आवश्यक बहुमत तक नहीं पहुंच सका और गिर गया। बिल के असफल होने के बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की महिला सांसदों ने मकर द्वार पर विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी ने 18 अप्रैल से देशभर में विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान भी किया है।

    सरकार ने विपक्ष को ठहराया जिम्मेदार

    गृह मंत्री अमित शाह ने बिल के गिरने के लिए कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर इस पर प्रतिक्रिया दी और बिल के असफल होने पर जश्न मनाए जाने की आलोचना की। यह विधेयक एक दिन पहले कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था।

    लंबी बहस के बावजूद नहीं बनी सहमति

    इस बिल पर संसद में करीब 20 घंटे से अधिक समय तक चर्चा हुई। गुरुवार को सुबह 11 बजे से लेकर देर रात 1 बजे तक बहस चली, जबकि शुक्रवार को भी सुबह से शाम तक चर्चा जारी रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतदान से पहले विपक्ष से सहयोग की अपील की थी और सांसदों से अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने का आग्रह किया था, लेकिन इसका असर नजर नहीं आया।

    परिसीमन बना मुख्य विवाद का कारण

    चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने साफ कहा कि वे महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन परिसीमन के मुद्दे पर सहमत नहीं हैं। इसी कारण उन्होंने विधेयक का विरोध किया।

    संसदीय प्रक्रिया और राजनीतिक टकराव

    गृह मंत्री अमित शाह के जवाब के बाद कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विधेयक को विचार के लिए पेश किया, लेकिन मतदान में यह आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर सका। बता दें कि बजट सत्र को लेकर भी सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आए। सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक सत्र बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, जबकि विपक्ष ने चुनावों के बाद सर्वदलीय बैठक की मांग की थी, जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया।

  • हरिवंश नारायण सिंह का तीसरी बार उपसभापति चुना जाना अनुभव और विश्वास की निरंतरता का प्रतीक

    हरिवंश नारायण सिंह का तीसरी बार उपसभापति चुना जाना अनुभव और विश्वास की निरंतरता का प्रतीक

    नई दिल्ली: राज्यसभा के वरिष्ठ सदस्य हरिवंश नारायण सिंह को एक बार फिर उच्च सदन का उपसभापति चुना गया है और यह उनका लगातार तीसरा कार्यकाल होगा। शुक्रवार को उनके निर्विरोध चयन की औपचारिक घोषणा की गई। विपक्ष की ओर से कोई उम्मीदवार न उतारे जाने के कारण यह चयन पहले से ही लगभग तय माना जा रहा था। इस घटनाक्रम को संसदीय परंपरा में निरंतरता और अनुभव पर भरोसे के रूप में देखा जा रहा है।

    यह पद उनके पिछले कार्यकाल की समाप्ति के बाद रिक्त हुआ था, जिसके बाद निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत नामांकन और चुनाव की प्रक्रिया शुरू की गई। तय समय सीमा के भीतर उनके समर्थन में कई प्रस्ताव दाखिल किए गए। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा रही कि विपक्ष ने इस प्रक्रिया से दूरी बनाकर अपनी असहमति दर्ज कराई, हालांकि सदन की औपचारिक प्रक्रिया बिना किसी बाधा के पूरी हुई।

    उपसभापति के रूप में उनके चयन के बाद प्रधानमंत्री ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि यह लगातार तीसरी बार की जिम्मेदारी सदन के उनके प्रति गहरे विश्वास को दर्शाती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि हरिवंश नारायण सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान सदन की कार्यवाही को संतुलित, व्यवस्थित और प्रभावी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के बीच संतुलन बनाए रखना उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक रहा है।

    प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि हरिवंश नारायण सिंह ने सदन में सभी दलों को साथ लेकर चलने का प्रयास किया है और उनकी कार्यशैली ने संसदीय गरिमा को मजबूत किया है। अनुभव और संयम के साथ उनके द्वारा निभाई गई भूमिका ने सदन की कार्यवाही को अधिक सुचारु और प्रभावी बनाने में योगदान दिया है।

    संसदीय हलकों में भी उनके लगातार तीसरी बार चुने जाने को स्थिरता और निरंतरता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। उनके कार्यकाल में संवाद की गुणवत्ता और संसदीय अनुशासन को बढ़ावा मिलने की बात कही जा रही है, जिससे विधायी कार्यों के संचालन में अधिक सहजता आई है।

    इस पूरे घटनाक्रम को भारतीय संसदीय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण विकास माना जा रहा है, जहां अनुभव, संतुलन और परंपरा को महत्व देते हुए नेतृत्व की निरंतरता को आगे बढ़ाया गया है।

  • लोकसभा में बोले PM मोदी, 'परिसीमन में किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं, ये मेरी गारंटी', विपक्ष ने उठाए कई सवाल

    लोकसभा में बोले PM मोदी, 'परिसीमन में किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं, ये मेरी गारंटी', विपक्ष ने उठाए कई सवाल


    नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र की शुरुआत गुरुवार को जोरदार हंगामे और तीखी बहस के साथ हुई। जैसे ही सरकार की ओर से संबंधित विधेयक सदन में पेश किए गए विपक्ष ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार संवैधानिक व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश कर रही है। वहीं सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे देश के भविष्य और महिलाओं की भागीदारी से जुड़ा ऐतिहासिक कदम बताया।

    महिला शक्ति को लेकर नीयत पर जोर

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान कहा कि इस मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय राष्ट्रीय दृष्टिकोण से समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की महिलाएं केवल फैसलों को ही नहीं बल्कि सरकार की नीयत को भी परखेंगी। अगर नीयत में खोट होगी तो देश की नारी शक्ति उसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। प्रधानमंत्री ने सभी दलों से अपील की कि वे इस पहल का समर्थन करें और विकसित भारत के निर्माण में योगदान दें।

    विपक्ष को पीएम की चेतावनी
    प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि जो लोग इस मुद्दे में राजनीति तलाश रहे हैं उन्हें इतिहास से सबक लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब जब महिलाओं को अधिकार देने के प्रयासों का विरोध हुआ है उसका खामियाजा विरोध करने वालों को उठाना पड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सभी दल मिलकर आगे बढ़ते हैं तो इसका लाभ पूरे लोकतंत्र को मिलेगा न कि किसी एक पार्टी को। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि परिसीमन प्रक्रिया में किसी भी राज्य के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा “यह मेरी गारंटी है मेरा वादा है कि हर राज्य को न्याय मिलेगा।” साथ ही उन्होंने विपक्ष से अपील की कि इस मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से न देखें और देशहित में सहयोग करें।

    निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी जरूरी

    अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश की आधी आबादी अब निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए तैयार है। उन्होंने याद दिलाया कि पंचायत स्तर पर महिलाओं को आरक्षण पहले ही दिया जा चुका है और अब समय आ गया है कि उन्हें संसद और विधानसभाओं में भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले। उन्होंने कहा कि लाखों महिलाएं जमीनी स्तर पर काम कर चुकी हैं और अब वे नीति निर्धारण में अपनी भूमिका चाहती हैं।

    विकसित भारत की परिभाषा में महिला भागीदारी अहम

    प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि विकसित भारत केवल बुनियादी ढांचे या आर्थिक आंकड़ों से नहीं बनेगा बल्कि इसमें महिलाओं की बराबर भागीदारी भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि देश इस दिशा में पहले ही काफी देर कर चुका है और अब और देरी करना उचित नहीं होगा। उन्होंने सांसदों से आग्रह किया कि वे इस अवसर को गंवाएं नहीं।

    देश की दिशा तय करने वाला कदम

    पीएम मोदी ने इस विधेयक को देश के भविष्य के लिए निर्णायक बताते हुए कहा कि यह केवल एक कानून नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की दिशा तय करने वाला कदम है। उन्होंने कहा कि यह प्रयास शासन व्यवस्था को अधिक संवेदनशील बनाएगा और इससे निकला परिणाम देश की राजनीति को नई दिशा देगा।

    विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल

    समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के पक्ष में है लेकिन इसे लागू करने के तरीके पर आपत्ति है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर जनगणना और परिसीमन को इससे जोड़कर इसे लागू करने में देरी कर रही है। उनका कहना था कि अगर जातीय जनगणना के आंकड़े सामने आएंगे तो आरक्षण की मांग और बढ़ेगी जिससे सरकार बचना चाहती है।

    महिला प्रतिनिधित्व पर भाजपा से जवाब मांग

    अखिलेश यादव ने भाजपा पर हमला करते हुए पूछा कि जिन राज्यों में उनकी सरकारें हैं वहां कितनी महिला मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी अभी भी सीमित है और भाजपा को पहले अपने संगठन में महिलाओं को पर्याप्त स्थान देना चाहिए।

    मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण पर विवाद

    सदन में मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण को लेकर भी तीखी बहस हुई। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने कहा कि अगर मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण नहीं दिया जाएगा तो यह अधूरा कदम होगा। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान के खिलाफ है। उन्होंने विपक्ष को चुनौती देते हुए कहा कि वे अपनी पार्टी में मुस्लिम महिलाओं को टिकट दे सकते हैं सरकार को इससे कोई आपत्ति नहीं है।

    परिसीमन को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप

    भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह परिसीमन को लेकर खासकर दक्षिण भारत में भ्रम फैला रहा है। उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया संविधान के तहत हो रही है और इससे किसी राज्य का नुकसान नहीं होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि परिसीमन के बाद कुछ राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ सकती है जिससे उनका प्रतिनिधित्व और मजबूत होगा।

    सरकार का दावा किसी राज्य को नुकसान नहीं

    केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन को बताया कि प्रस्तावित बदलावों से लोकसभा की कुल सीटों में वृद्धि होगी और महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण मिलेगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि किसी भी राज्य की वर्तमान स्थिति को नुकसान नहीं होगा और सभी को समान रूप से लाभ मिलेगा।

    महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करने की मांग

    कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण का समर्थन करती है लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ना सही नहीं है। उनका सुझाव था कि इस कानून को तुरंत लागू किया जाना चाहिए ताकि महिलाओं को जल्द से जल्द इसका लाभ मिल सके।

    तीनों विधेयकों पर आगे की प्रक्रिया

    लोकसभा में इन विधेयकों पर चर्चा शुरू हो चुकी है और मतदान 17 अप्रैल को शाम 4 बजे कराया जाएगा। सरकार ने इस पर विस्तृत चर्चा के लिए पर्याप्त समय निर्धारित किया है। शुरुआती वोटिंग में विधेयकों को पेश करने के पक्ष में बहुमत मिला जिससे आगे की प्रक्रिया का रास्ता साफ हो गया।

    हंगामे के बीच जारी रही कार्यवाही


    सदन में पूरे दिन हंगामे का माहौल बना रहा। विपक्ष ने जहां सरकार पर गंभीर आरोप लगाए वहीं सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे ऐतिहासिक सुधार बताया। अब सभी की नजरें आगामी मतदान पर टिकी हैं जो इस पूरे मुद्दे की दिशा तय करेगा।

  • कर्नाटक कांग्रेस में 30 विधायकों का दिल्ली दौरा, कैबिनेट फेरबदल की मांग तेज…

    कर्नाटक कांग्रेस में 30 विधायकों का दिल्ली दौरा, कैबिनेट फेरबदल की मांग तेज…


    नई दिल्ली। कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर सियासी तापमान बढ़ गया है, जहां सत्तारूढ़ कांग्रेस के भीतर असंतोष के स्वर खुलकर सामने आने लगे हैं। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की सरकार में संभावित कैबिनेट फेरबदल को लेकर पार्टी के भीतर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, कर्नाटक कांग्रेस के लगभग 30 वरिष्ठ विधायकों का एक समूह दिल्ली पहुंच चुका है, जहां वे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात की तैयारी में हैं। इन विधायकों का उद्देश्य राज्य मंत्रिमंडल में बड़े बदलाव की मांग को मजबूती से रखना है। उनका कहना है कि सरकार को बने ढाई से तीन वर्ष हो चुके हैं और अब प्रशासन में नए चेहरों को अवसर देना आवश्यक है, ताकि सरकार में नई ऊर्जा और गति लाई जा सके।

    जानकारी के मुताबिक, यह असंतोष अचानक नहीं उभरा है, बल्कि लंबे समय से पार्टी के भीतर चल रही बैठकों और असंतोषपूर्ण चर्चाओं का परिणाम है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रम और उपचुनावों के बाद विधायकों के एक वर्ग में यह धारणा मजबूत हुई है कि संगठन और सरकार में अपेक्षित बदलाव नहीं किए गए हैं।

    विधायकों का कहना है कि कुछ मंत्री लंबे समय से अपने पदों पर बने हुए हैं, जिससे प्रशासनिक संतुलन और कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है। उनका तर्क है कि अनुभवी और नए चेहरों को शामिल करने से सरकार की कार्यप्रणाली और जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता और मजबूत होगी।

    इस पूरे घटनाक्रम पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने संतुलित प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि कैबिनेट फेरबदल की प्रक्रिया पहले से चल रही है और इसमें देरी का कारण विभिन्न राज्यों में चुनावी व्यस्तता और बजट सत्र है। उन्होंने यह भी कहा कि मंत्री पद की इच्छा रखने वाले विधायकों का दिल्ली जाना स्वाभाविक है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

    मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि पार्टी के भीतर सभी विषयों पर चर्चा जारी है और समय आने पर उचित निर्णय लिया जाएगा। साथ ही उन्होंने भरोसा जताया कि कांग्रेस आगामी चुनावों में मजबूत प्रदर्शन करेगी।

    इस घटनाक्रम के बीच अब सभी की नजरें पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि क्या शीर्ष नेतृत्व विधायकों की मांग के अनुरूप कैबिनेट में बड़ा फेरबदल करता है या मौजूदा व्यवस्था को ही जारी रखने का निर्णय लिया जाता है।

    कर्नाटक कांग्रेस में यह स्थिति एक बार फिर आंतरिक असंतुलन और नेतृत्व की चुनौती को उजागर कर रही है, जिससे राज्य की राजनीति में आने वाले दिनों में और अधिक हलचल की संभावना बनी हुई है।

  • कांग्रेस को बड़ा झटका ऐतिहासिक अकबर रोड दफ्तर खाली करने के निर्देश

    कांग्रेस को बड़ा झटका ऐतिहासिक अकबर रोड दफ्तर खाली करने के निर्देश


    नई दिल्ली: देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के ऐतिहासिक मुख्यालय 24 अकबर रोड को खाली करने का निर्देश मिलने के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। यह वही दफ्तर है जो लगभग 48 वर्षों तक कांग्रेस की पहचान बना रहा और पार्टी के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का गवाह रहा। सरकार की ओर से कांग्रेस को शनिवार तक इस भवन को खाली करने के लिए कहा गया है, जिससे यह मामला अब सियासी और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है।

    सूत्रों के अनुसार कांग्रेस को केवल 24 अकबर रोड ही नहीं बल्कि 5 रायसीना रोड स्थित इंडियन यूथ कांग्रेस के दफ्तर को भी खाली करने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि कांग्रेस ने पिछले वर्ष कोटला मार्ग पर अपने नए मुख्यालय इंदिरा भवन’ का उद्घाटन कर दिया था, लेकिन अब तक वह पूरी तरह से पुराने दफ्तर से शिफ्ट नहीं हो पाई है। पार्टी की गतिविधियां अभी भी अकबर रोड स्थित भवन में जारी हैं, जिससे यह विवाद और गहरा गया है।

    कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे को लेकर मंथन चल रहा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि वे इस आदेश के खिलाफ कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं ताकि उन्हें कुछ राहत मिल सके। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि 24 अकबर रोड से उनका भावनात्मक जुड़ाव रहा है, क्योंकि यह दफ्तर केवल एक कार्यालय नहीं बल्कि पार्टी के इतिहास और संघर्ष का प्रतीक रहा है।

    इस दफ्तर का इतिहास भी काफी समृद्ध रहा है। ब्रिटिश शासन के समय यह भवन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो की कार्यकारी परिषद के सदस्य सर रेजिनाल्ड मैक्सवेल का निवास स्थान था। बाद में यह म्यांमार की भारत में राजदूत डॉ खिन क्यी का निवास भी रहा, जिनकी बेटी आंग सान सू की ने आगे चलकर नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त किया। इस तरह यह भवन अंतरराष्ट्रीय और ऐतिहासिक महत्व भी रखता है।

    कांग्रेस के लिए यह दफ्तर 1970 के दशक के अंत से विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन गया। 1977 के चुनाव में हार के बाद जब पार्टी में विभाजन हुआ और इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट को एक नए केंद्र की जरूरत थी, तब जी वेंकटस्वामी ने अपना बंगला पार्टी को उपलब्ध कराया। यहीं से कांग्रेस की राजनीतिक वापसी की कहानी शुरू हुई। इसके बाद यह दफ्तर इंदिरा गांधी के नेतृत्व से लेकर राजीव गांधी, पी वी नरसिम्हा राव और डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल तक पार्टी का प्रमुख केंद्र बना रहा।

    समय के साथ इस भवन को पार्टी ने अपनी जरूरतों के अनुसार विस्तार भी दिया, लेकिन हाल के वर्षों में संगठन के पुनर्गठन के चलते पार्टी ने नया मुख्यालय बनाने का निर्णय लिया। इसी क्रम में कोटला मार्ग स्थित इंदिरा भवन’ का उद्घाटन किया गया, जो अब कांग्रेस का नया ठिकाना बन चुका है।

    अब जब सरकार ने पुराने दफ्तर को खाली करने का आदेश दिया है, तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक बदलाव भी माना जा रहा है। कांग्रेस इस आदेश को लेकर अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करने पर विचार कर रही है, जबकि राजनीतिक गलियारों में इस कदम को लेकर अलग अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

    आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस इस आदेश पर क्या रुख अपनाती है और क्या वह अपने ऐतिहासिक दफ्तर को लेकर कोई कानूनी लड़ाई लड़ती है या फिर पूरी तरह से नए मुख्यालय इंदिरा भवन’ से अपने कामकाज को आगे बढ़ाती है।

  • गिरधारी यादव मामले में नया मोड़ जेडीयू के कदम पर आरजेडी ने दिया बया

    गिरधारी यादव मामले में नया मोड़ जेडीयू के कदम पर आरजेडी ने दिया बया


    नई दिल्ली:जेडीयू सांसद गिरधारी यादव के खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों को लेकर उठाए गए कदम के बाद राजनीतिक माहौल गर्मा गया है। जेडीयू की ओर से लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग की गई है। पार्टी का आरोप है कि गिरधारी यादव के बेटे ने 2025 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी के टिकट पर चुनाव लड़ा था और इस दौरान खुद गिरधारी यादव ने भी प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाई थी। इसी आधार पर जेडीयू ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई का रुख अपनाया है।

    इस पूरे मामले पर आरजेडी की पहली प्रतिक्रिया सामने आई है। आरजेडी सांसद मीसा भारती ने जेडीयू के इस कदम पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी का बेटा चुनाव लड़ता है तो वह एक वयस्क व्यक्ति है और उसे अपने फैसले लेने का अधिकार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में हर नागरिक को चुनाव लड़ने और अपनी राजनीतिक राह चुनने की आजादी है। मीसा भारती ने यह भी कहा कि किसी परिवार के भीतर अलग अलग लोग अलग दलों से जुड़ सकते हैं और यह पूरी तरह से व्यक्तिगत अधिकार का मामला है।

    उन्होंने आगे कहा कि चुनाव लड़ना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इसे किसी भी प्रकार से गलत नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति को वोट डालने और अपनी राजनीतिक पसंद रखने की स्वतंत्रता है। ऐसे में यदि किसी के परिवार का सदस्य किसी अन्य पार्टी से चुनाव लड़ता है तो इसे आधार बनाकर कार्रवाई करना उचित नहीं है।

    मीसा भारती ने यह भी कहा कि कई अन्य नेता भी आरजेडी के लिए चुनाव प्रचार में शामिल रहे हैं और यदि आवश्यकता पड़ी तो पार्टी इसकी सूची भी सार्वजनिक कर सकती है। उनके इस बयान से यह साफ संकेत मिलता है कि आरजेडी इस मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से देख रही है और इसे पूरी तरह खारिज नहीं कर रही है।

    उधर जेडीयू की ओर से यह मामला लोकसभा अध्यक्ष के पास भेजा गया है और अब इस पर आगे क्या निर्णय लिया जाएगा, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। पार्टी का कहना है कि एक सांसद के तौर पर गिरधारी यादव का कर्तव्य है कि वे पार्टी के सिद्धांतों और अनुशासन का पालन करें। यदि उन पर लगे आरोप सही पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।

    वहीं गिरधारी यादव ने भी इस पूरे मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि वे अपना पक्ष रखने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि वे इस आरोप का जवाब विधिवत तरीके से देंगे।

    इस तरह गिरधारी यादव के खिलाफ जेडीयू के कदम और आरजेडी की प्रतिक्रिया के बाद बिहार की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। आने वाले दिनों में लोकसभा अध्यक्ष का फैसला और दोनों दलों की अगली रणनीति इस मामले को और अधिक महत्वपूर्ण बना सकती है।