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  • पंजाब में नशे और गैंगस्टरवाद पर अमित शाह के आरोपों से भड़के केजरीवाल, तीन कृषि कानूनों का मुद्दा उठाया

    पंजाब में नशे और गैंगस्टरवाद पर अमित शाह के आरोपों से भड़के केजरीवाल, तीन कृषि कानूनों का मुद्दा उठाया


    नई दिल्ली ।पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच राजनीतिक टकराव तेज होता दिखाई दे रहा है। राज्य में नशे के कारोबार, गैंगस्टर नेटवर्क और कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भगवंत मान सरकार पर सवाल उठाए। इसके जवाब में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने पलटवार करते हुए भाजपा पर ही पंजाब में नशा फैलाने और राज्य के हितों को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए।

    केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया में अडानी पोर्ट के रास्ते पंजाब में नशा फैलने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि देश में नशे की समस्या उन राज्यों में भी गंभीर है, जहां लंबे समय से भाजपा की सरकारें हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि दूसरे राज्यों में नशे के कारोबार पर प्रभावी रोक लगाने के बजाय पंजाब को लेकर सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं।

    केजरीवाल ने अपने बयान में पंजाब में नशे के प्रसार और गैंगस्टर नेटवर्क को लेकर भाजपा को निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2007 से 2017 के बीच भी राज्य में नशे की समस्या को बढ़ावा मिला था। उन्होंने उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए भाजपा पर पुराने राजनीतिक सहयोगियों के साथ मिलकर पंजाब में नशे का कारोबार बढ़ाने का आरोप लगाया। ये आरोप केजरीवाल की ओर से लगाए गए हैं।

    अपने पलटवार में केजरीवाल ने पंजाब के पानी, पंजाब विश्वविद्यालय और चंडीगढ़ का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की नजर राज्य के इन महत्वपूर्ण विषयों पर है। इसी क्रम में उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2020 में लाए गए तीन कृषि कानूनों का जिक्र करते हुए आशंका जताई कि भाजपा दोबारा सत्ता में आने पर ऐसे कानूनों को फिर से ला सकती है। केजरीवाल ने कहा कि पंजाब ऐसा नहीं होने देगा। उनका यह बयान आगामी विधानसभा चुनाव से पहले कृषि कानूनों और राज्य के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाता है।

    दरअसल, अमित शाह ने पंजाब की कानून-व्यवस्था को लेकर भगवंत मान के नेतृत्व वाली सरकार पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा कि राज्य नशे, गैंगस्टरवाद और संगठित अपराध के बढ़ते खतरे का सामना कर रहा है। शाह ने सवाल किया कि मौजूदा परिस्थितियों में पंजाब की जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन निभा रहा है। उन्होंने राज्य सरकार से नशे के कारोबार और अपराध पर नियंत्रण के लिए उठाए जा रहे कदमों को लेकर भी सवाल किए।

    शाह ने अपने बयान में मानसा में नशा-विरोधी कार्यकर्ता परविंदर सिंह झोटा की हत्या का मामला उठाया। इसके साथ ही उन्होंने दिरबा में एक पिता की मौत से जुड़े मामले का भी उल्लेख किया। शाह के अनुसार, परविंदर सिंह झोटा के पिता ने आम आदमी पार्टी की सरकार और उसके एक विधायक पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय इन दोनों घटनाओं को लेकर पंजाब सरकार से जवाब मांगेगा।

    शाह ने यह भी कहा कि केजरीवाल और भगवंत मान ने विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब को नशामुक्त बनाने का वादा किया था, लेकिन मौजूदा हालात को लेकर सवाल बने हुए हैं। उन्होंने राज्य में भाजपा की सरकार बनने पर पंजाब को नशामुक्त, गैंगस्टरमुक्त और सुरक्षित बनाने का संकल्प दोहराया। शाह ने नशे के कारोबार पर कार्रवाई, युवाओं के भविष्य की रक्षा और अपराधियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात कही।

    दोनों नेताओं के बयानों से स्पष्ट है कि पंजाब में नशे का कारोबार, संगठित अपराध और कानून-व्यवस्था आगामी विधानसभा चुनाव से पहले प्रमुख राजनीतिक मुद्दे बने हुए हैं। जहां भाजपा राज्य सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठा रही है, वहीं केजरीवाल ने पलटवार करते हुए भाजपा के शासन और उसके पुराने राजनीतिक फैसलों को बहस के केंद्र में ला दिया है।

  • जम्मू-कश्मीर में हजारों किताबों पर कार्रवाई से सियासी बहस तेज, उमर और मीरवाइज ने उठाए सवाल

    जम्मू-कश्मीर में हजारों किताबों पर कार्रवाई से सियासी बहस तेज, उमर और मीरवाइज ने उठाए सवाल

    नई दिल्ली ।जम्मू-कश्मीर के कॉलेजों और पुस्तकालयों में मौजूद किताबों की व्यापक स्क्रीनिंग और हजारों पुस्तकों को हटाए जाने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। सरकार के अनुसार 21,81,582 किताबों और प्रकाशनों की जांच की गई, जिनमें से 4,767 किताबों को प्रचलन से हटाया गया है। इनमें 518 ऐसी किताबें शामिल हैं, जिन पर पहले से प्रतिबंध लागू था। इसके अलावा 1,752 किताबों को विशेषज्ञ जांच के लिए भेजा गया है।

    इस कार्रवाई को लेकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि किताबों पर प्रतिबंध लगाने का मुद्दा लोकतंत्र में व्यापक बहस का विषय है। उनके अनुसार मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में निर्वाचित सरकार के पास ऐसे फैसले खुद लेने का अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि परिस्थितियां बदलने पर इस पूरे मामले की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।

    मामले पर मीरवाइज उमर फारूक ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने हजारों किताबों को हटाए जाने की कार्रवाई को चिंताजनक बताते हुए संबंधित किताबों के नाम और उन्हें हटाने के कारण सार्वजनिक करने की मांग की। उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अकादमिक स्वतंत्रता तथा अलग-अलग विचारों और दृष्टिकोणों तक छात्रों की पहुंच शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी बड़ी संख्या में किताबों को हटाने के पीछे आखिर किस तरह की नीति और उद्देश्य काम कर रहा है।

    सरकार की ओर से कार्रवाई को नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बताया गया है। मुख्य सचिव अटल डुल्लू ने कहा कि किताबों की जांच करना और उनकी सामग्री का तथ्यात्मक परीक्षण करना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। उनका कहना है कि यदि कोई किताब आधिकारिक रूप से प्रतिबंधित है या उसमें आपत्तिजनक सामग्री पाई गई है, तो उसे सरकारी संस्थानों और पुस्तकालयों में नहीं रखा जाना चाहिए।

    भाजपा विधायक आरएस पठानिया ने भी कार्रवाई का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि स्कूलों और कॉलेजों में इतिहास तथ्यों के आधार पर पढ़ाया जाना चाहिए। उनके अनुसार काल्पनिक किस्सों, अफवाहों या किंवदंतियों को इतिहास के रूप में शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।

    भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता जोरवार सिंह जमवाल ने भी हटाई गई किताबों की सामग्री पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐतिहासिक विषयों पर आधारित पुस्तकों में तथ्यात्मकता और विश्वसनीयता जरूरी है। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों में ऐसी सामग्री नहीं होनी चाहिए जो युवाओं को भ्रमित करने वाली हो।

    किताबों की स्क्रीनिंग से जुड़े आंकड़े विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सामने आए। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार जम्मू क्षेत्र में 9,32,941 और कश्मीर क्षेत्र में 12,48,641 किताबों तथा प्रकाशनों की जांच की गई। कार्रवाई के तहत कश्मीर क्षेत्र से 4,474 और जम्मू क्षेत्र से 293 किताबें हटाई गईं। वहीं 1,752 किताबों को विशेषज्ञ परीक्षण के लिए भेजा गया है, जिनमें जम्मू क्षेत्र की 538 और कश्मीर क्षेत्र की 1,214 किताबें शामिल हैं।

    सरकार के मुताबिक यह स्क्रीनिंग जुलाई में दो किताबों की खरीद को लेकर उठे विवाद के बाद शुरू हुई। इसके बाद उच्च शिक्षा विभाग ने कॉलेजों और संबंधित पुस्तकालयों में उपलब्ध पुरानी और नई किताबों की सामग्री की जांच के निर्देश दिए। सरकार ने कहा है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में संवैधानिक मूल्यों, अकादमिक स्वतंत्रता, आलोचनात्मक सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जिम्मेदार नागरिकता को बढ़ावा देने वाला वातावरण बनाए रखना जरूरी है। मामले में राजनीतिक दलों और विभिन्न पक्षों के अलग-अलग रुख के बीच अब किताबों की जांच और उन्हें हटाने के कारणों को लेकर बहस जारी है।

  • इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम पर सियासी घमासान, मंच पर बुलाए गए छात्रों की पृष्ठभूमि पर भाजपा ने उठाए सवाल

    इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम पर सियासी घमासान, मंच पर बुलाए गए छात्रों की पृष्ठभूमि पर भाजपा ने उठाए सवाल

    मध्य प्रदेश: के इंदौर में शनिवार को आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान कुछ छात्रों को मंच पर बुलाकर उनकी समस्याएं और रोजगार से जुड़े मुद्दे सामने रखने का अवसर दिया गया। अब मंच पर पहुंचे कुछ युवाओं की कथित राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर सवाल उठाए हैं।

    भाजपा का आरोप है कि कार्यक्रम में सामान्य छात्रों के रूप में जिन युवाओं को मंच पर संवाद के लिए बुलाया गया, उनमें कुछ कांग्रेस से जुड़े पदाधिकारी या कार्यकर्ता रहे हैं। भाजपा नेताओं ने सोशल मीडिया पर कुछ पुराने दस्तावेजों और तस्वीरों का हवाला देते हुए दावा किया कि मंच पर मौजूद युवाओं की राजनीतिक संबद्धता पहले से सामने रही है। पार्टी ने इसे कार्यक्रम की विश्वसनीयता से जोड़ते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा है।

    कार्यक्रम में तीन नाम विशेष रूप से चर्चा में आए हैं। इनमें तनय शर्मा, राधा मालवीय और रणजीत किसानवंशी शामिल हैं। भाजपा की ओर से दावा किया गया है कि तनय शर्मा कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई के प्रवक्ता हैं। पार्टी नेताओं ने उनके राजनीतिक पद से संबंधित जानकारी को सार्वजनिक करते हुए सवाल उठाया कि यदि वे कांग्रेस की छात्र राजनीति से जुड़े हैं तो उन्हें सामान्य परीक्षार्थी के तौर पर मंच पर क्यों बुलाया गया।

    इसी तरह भाजपा ने राधा मालवीय को लेकर भी दावा किया है कि वह निर्वाचित जिला पंचायत सदस्य होने के साथ युवा कांग्रेस की प्रदेश महासचिव की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। भाजपा नेताओं ने उनकी राजनीतिक भूमिका का उल्लेख करते हुए कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी और मंच पर संवाद को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

    तीसरे नाम के तौर पर रणजीत किसानवंशी का उल्लेख किया गया है। भाजपा ने उन्हें कांग्रेस का सक्रिय कार्यकर्ता बताया है। इसके समर्थन में पार्टी नेताओं ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी के साथ उनकी पुरानी तस्वीरों का हवाला दिया है। भाजपा का कहना है कि इन तस्वीरों और राजनीतिक गतिविधियों से उनकी कांग्रेस से संबद्धता का संकेत मिलता है।

    भाजपा नेताओं ने पूरे मामले को लेकर राहुल गांधी और कांग्रेस पर तीखा राजनीतिक हमला किया। उनका आरोप है कि युवाओं की समस्याओं पर सीधे संवाद के लिए आयोजित कार्यक्रम में पार्टी से जुड़े लोगों को छात्रों के रूप में मंच पर प्रस्तुत किया गया और उनसे पहले से तय तरीके से बातचीत कराई गई।

    भाजपा प्रवक्ताओं ने आरोपों के आधार पर कार्यक्रम की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि यदि मंच पर मौजूद लोगों की राजनीतिक पहचान पहले से कांग्रेस से जुड़ी थी, तो कार्यक्रम में उन्हें सामान्य छात्रों के रूप में प्रस्तुत करने का उद्देश्य स्पष्ट किया जाना चाहिए।

    हालांकि, इन आरोपों पर खबर लिखे जाने तक कांग्रेस की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया था। ऐसे में मंच पर आए तीनों युवाओं की भूमिका और कार्यक्रम में उनके चयन को लेकर लगाए गए राजनीतिक दावों पर कांग्रेस का पक्ष सामने आना बाकी है। विवाद के बाद इंदौर के इस आयोजन को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।

  • राजनीतिक मतभेदों के बीच महिलाओं के सम्मान पर समझौता नहीं, तृषा विवाद के बाद विजय ने आपत्तिजनक भाषा के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया

    राजनीतिक मतभेदों के बीच महिलाओं के सम्मान पर समझौता नहीं, तृषा विवाद के बाद विजय ने आपत्तिजनक भाषा के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया

    नई दिल्ली । तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने महिलाओं के खिलाफ की जाने वाली अभद्र और आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। विधानसभा में सोमवार को उन्होंने स्पष्ट कहा कि राजनीति में विचारों और नीतियों को लेकर तीखी बहस हो सकती है, लेकिन किसी महिला के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली भाषा को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    मुख्यमंत्री विजय ने कहा कि उनकी राजनीतिक यात्रा और सफलता में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में महिलाओं के खिलाफ गलत, गंदी या अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल उन्हें स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने राजनीतिक विरोध और व्यक्तिगत अपमान के बीच अंतर बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया।

    विजय का यह बयान अभिनेत्री तृषा कृष्णन से जुड़े हालिया विवाद के बीच सामने आया है। इस विवाद ने तमिलनाडु की राजनीति में भी काफी चर्चा पैदा की है। मामले को लेकर विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम यानी टीवीके की ओर से विरोध दर्ज कराया गया था।

    विवाद की शुरुआत कावेरी नदी के पानी के बंटवारे से जुड़े राजनीतिक मुद्दे को लेकर हुई बहस के दौरान हुई। डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन ने तमिलनाडु सरकार को इस मुद्दे पर घेरा था। इसी दौरान अभिनेत्री तृषा कृष्णन को लेकर की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी ने राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया।

    इसके बाद टीवीके कार्यकर्ताओं ने मामले के विरोध में प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने कुछ लोगों को हिरासत में लिया था। बाद में इस कार्रवाई को लेकर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी और संबंधित लोगों की रिहाई हुई। पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक बयानबाजी में भाषा और मर्यादा को लेकर नई बहस छेड़ दी।

    मुख्यमंत्री विजय ने अपने बयान के जरिए यह संकेत देने की कोशिश की कि राजनीतिक असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन महिलाओं को निशाना बनाकर आपत्तिजनक टिप्पणी करना अलग विषय है। उनका कहना है कि राजनीतिक नेताओं के बीच आलोचना और बहस हो सकती है, मगर व्यक्तिगत गरिमा और महिलाओं के सम्मान की सीमा नहीं टूटनी चाहिए।

    इसी विवाद से जुड़े एक अन्य घटनाक्रम में चेन्नई साइबर क्राइम पुलिस ने उद्यमी प्रवीन गणेशन को गिरफ्तार किया है। 35 वर्षीय गणेशन हांगकांग से भारत लौट रहे थे। दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर इमिग्रेशन अधिकारियों ने उन्हें रोक लिया, जिसके बाद उन्हें पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

    गणेशन ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि उनके खिलाफ जून में किए गए एक पोस्ट को लेकर लुक आउट सर्कुलर जारी किया गया था। उनका कहना है कि संबंधित पोस्ट बाद में हटा दिया गया था। इसके बावजूद मामले में उनके खिलाफ कार्रवाई की गई।

    तृषा कृष्णन से जुड़ा विवाद अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि साइबर अपराध और कानूनी कार्रवाई का विषय भी बन चुका है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच विजय का विधानसभा में दिया गया बयान महिलाओं के सम्मान को लेकर उनकी पार्टी और सरकार के रुख को सामने रखता है।

    तमिलनाडु की राजनीति में टीवीके के सत्ता में आने के बाद राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माहौल भी तेज हुआ है। ऐसे में महिला सम्मान, सार्वजनिक बयानबाजी और सोशल मीडिया पर की जाने वाली टिप्पणियों को लेकर नेताओं तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भूमिका पर भी नजर बनी हुई है। मुख्यमंत्री विजय ने साफ किया है कि राजनीतिक संघर्ष अपनी जगह है, लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक भाषा को किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

  • राज्यसभा नहीं मिलने पर स्मृति ईरानी का जवाब, अमेठी चुनाव हार और भाजपा में संगठनात्मक भूमिका पर खुलकर बोलीं

    राज्यसभा नहीं मिलने पर स्मृति ईरानी का जवाब, अमेठी चुनाव हार और भाजपा में संगठनात्मक भूमिका पर खुलकर बोलीं

    नई दिल्ली । पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भाजपा की केंद्रीय टीम में वापसी के बाद कई मुद्दों पर बात की है। एक पॉडकास्ट के दौरान उन्होंने 2024 लोकसभा चुनाव में अमेठी से मिली हार के बाद राज्यसभा न भेजे जाने को लेकर कहा कि भारतीय जनता पार्टी के संगठन में पद कोई पहचान नहीं होती है, वह एक मौका होता है। उन्होंने कहा, “अगर राजनीतिक ताकत महत्वपूर्ण होती, तो मैं कभी भी अमेठी नहीं जाती। क्योंकि अमेठी ऐतिहासिक रूप से भाजपा के लिए एक ‘लूजिंग सीट’ रही है।” बता दें स्मृति ईरानी 2011 से 2019 तक राज्यसभा सांसद रही थीं। इस दौरान ही उन्होंने 2019 के चुनाव में अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। बाद में 2024 लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

    टाइम्स नाऊ से बात करते हुए स्मृति ईरानी ने 2024 लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी द्वारा वापस राज्यसभा न भेजे जाने के सवाल पर भी विस्तार से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि वह जहां से आई हैं, वहां पर कभी नहीं सोचा था कि वह इस मुकाम पर पहुंचेंगी।

    मैं और देवेंद्र फडणवीस मिलकर, पुराने दिनों को याद करके हंसते हैं- स्मृति ईरानी

    इंटरव्यू के दौरान स्मृति ईरानी ने भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा में काम करने वाले दिनों को याद किया। उन्होंने कहा, “मैं पहली बार 2003 में युवा मोर्चा महाराष्ट्र में पदाधिकारी बनी थी। मेरे साथ जो उपाध्यक्ष थे, व देवेंद्र फडणवीस थे। उस समय हम लोगों ने कभी नहीं सोचा था कि यहां तक पहुंचेंगे। मैं और देवेंद्र फडणवीस जब की मिलते हैं, तो इस बात पर हंसते हैं। उस समय हम लोग प्रमोद महाजन, गोपीनाथ मुंडे को देखा करते थे। मैंने जीवन में कभी नहीं सोचा था कि हम यहां तक पहुंचेंगे।” उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से सार्वजनिक रूप से की गई तारीफ उनके लिए एक उपलब्धि है।

    ‘घर से पेट्रोल, पानी के पैसे मांगते थे’

    भाजपा नेता स्मृति ईरानी युवा मोर्चा के दिनों को याद करते हुए कहा कि वह एक पक्की भाजपा कार्यकर्ता हैं। युवा मोर्चा के दिनों में वह अपने साथी लोगों की मदद करने के लिए घर से पेट्रोल पानी के पैसे तक लेती थी। इस पर उनके घर वाले भी कई बार टोका करते थे। उन्होंने कहा, “उस समय हम लोग ऐसे ही घूमा करते थे। घर से पेट्रोल पानी के पैसे भी लिया करते थे। घरवाले कहते थे कि अरे तुम युवा मोर्चा में हो और अभी पैसे लेते हो। तब हम कहते थे कि ‘हां, ताकि हम अपने साथियों की मदद कर सकें।’ उस वक्त हमारे जो संगठन मंत्री थे वह वी. सतीश जी थे। वह आज संसद में हैं। वह बैठकर हमें बताते थे कि जो गरीब कार्यकर्ता है उसकी मदद कैसे करनी है। उसको भी अपने साथ लेकर चलना है।” उन्होंने कहा कि जब संगठन में इस तरीके की मजबूती के साथ तैयारी की जाती है और ऐसे बैकग्राउंड से आप आते हैं, तो आपके लिए पद कोई ज्यादा मायने नहीं रखता।

    पीएम के इग्नोर करने वाले वीडियो पर भी दिया स्मृति ईरानी का जवाब

    इंटरव्यू के दौरान जब स्मृति ईरानी से बंगाल में एक कार्यक्रम के दौरान वायरल हुए वीडियो पर भी सवाल पूछा गया। विपक्ष की तरफ से आरोप लगाया जाता है कि पीएम मोदी ने इस कार्यक्रम में स्मृति ईरानी को इग्नोर किया था। इसका जवाव देते हुए ईरानी ने कहा, “हां, उस समय मैं और दादा (मिथुन) एक साथ ही बैठे हुए थे। वीडियो में पीएम मोदी की पीठ दिखाई दे रही है। किसको पता है कौन किसको हाथ जोड़ रहा है। वह पल बेहद भावुक करने वाला था। वहां जितने भी लोग मंच पर थे, सबकी अपनी कहानी थी। बंगाल में कार्यकर्ताओं ने काफी कुछ झेला है।”

    उन्होंने जोर देकर कहा कि उस समय मंच पर पुराने से पुराना कार्यकर्ता मौजूद था। प्रधानमंत्री मोदी उन लोगों का अभिवादन कर रहे थे। हमने पीएम के लिए बंगाल में गालियां सुनी हैं। ऐसे में यह सारी चीजें मायने नहीं रखतीं। मायने रखती है, तो केवल जीत और वह सुखद थी। मायने रखता है, तो बंगाल का कार्यकर्ता और उसे मिलने वाला न्याय।

  • अखिलेश के बयान से गरमाई यूपी की सियासत, मायावती ने सपा की जातीय राजनीति और पुराने गठबंधन पर उठाए सवाल

    अखिलेश के बयान से गरमाई यूपी की सियासत, मायावती ने सपा की जातीय राजनीति और पुराने गठबंधन पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की राष्ट्रीय लोकदल और जयंत चौधरी को लेकर की गई टिप्पणी के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोलते हुए उनके बयान को अमर्यादित और अशोभनीय बताया है। मायावती ने जयंत चौधरी और उनके राजनीतिक परिवार का सम्मान करने की बात कहते हुए अखिलेश यादव से माफी मांगने की मांग की है।

    मायावती ने कहा कि अखिलेश यादव की ओर से यह कहना कि उन्होंने अपने पुराने सहयोगी दल राष्ट्रीय लोकदल और उसके नेता को चवन्नी से रुपया बनाया, राजनीतिक शिष्टाचार के लिहाज से उचित नहीं है। उन्होंने इस टिप्पणी को लेकर अखिलेश यादव से राष्ट्रीय लोकदल, जयंत चौधरी और चौधरी चरण सिंह के परिवार के प्रति कथित अपमान के लिए माफी मांगने को कहा।

    बसपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी का अपने सहयोगी दलों के साथ व्यवहार लंबे समय से राजनीतिक स्वार्थ और संकीर्णता से प्रभावित रहा है। उन्होंने कहा कि सपा की इसी कार्यशैली के कारण कई मौकों पर उसके राजनीतिक सहयोगियों के साथ संबंध खराब हुए हैं। मायावती ने दावा किया कि ऐसे राजनीतिक मतभेदों का लाभ अक्सर भारतीय जनता पार्टी को मिला और विपक्षी या धर्मनिरपेक्ष ताकतें कमजोर हुईं।

    मायावती ने अपने बयान में सपा और बसपा के पुराने गठबंधन का भी उल्लेख किया। उन्होंने 1993 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सपा के साथ बसपा के गठबंधन और बाद में उसके टूटने की घटना को याद किया। उन्होंने 2 जून 1995 के लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड का भी जिक्र करते हुए उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों को अपने आरोपों के संदर्भ में सामने रखा।

    बसपा प्रमुख ने इसके बाद अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुए सपा और बसपा के चुनावी गठबंधन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के लिए दोनों दलों के बीच गठबंधन हुआ था, लेकिन अपेक्षित चुनावी परिणाम नहीं आने के बाद यह गठबंधन ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सका। मायावती ने इसके लिए सपा के रवैये को जिम्मेदार ठहराया।

    मायावती ने अखिलेश यादव की पीडीए राजनीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अखिलेश यादव पीडीए में शामिल पी शब्द को कभी पिछड़ा वर्ग और कभी पंडितों के हित से जोड़ते हैं। मायावती ने दावा किया कि सपा पिछड़े वर्गों में अपनी जाति के अलावा अन्य समुदायों, अल्पसंख्यकों और विशेष रूप से ब्राह्मण समाज के हितों के प्रति पर्याप्त रूप से संवेदनशील नहीं रही है।

    उन्होंने सपा की पिछली सरकारों पर दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और ऊंची जातियों के लोगों के साथ भेदभाव तथा उत्पीड़न के आरोप भी लगाए। मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि सपा शासन के दौरान अपराधी और अराजक तत्वों को बढ़ावा मिला। इन दावों के आधार पर उन्होंने उत्तर प्रदेश के मतदाताओं से आगामी विधानसभा चुनाव में सपा को सत्ता से दूर रखने की अपील की।

    जयंत चौधरी को लेकर शुरू हुई टिप्पणी अब सपा, बसपा और अन्य राजनीतिक दलों के बीच व्यापक बहस का विषय बनती दिखाई दे रही है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन, सामाजिक समीकरण और पीडीए की रणनीति आगामी चुनावी माहौल में महत्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं। मायावती के ताजा हमले ने इन मुद्दों पर राजनीतिक टकराव को और तेज कर दिया है।

  • धर्मेंद्र के निधन के बाद फिल्मों में वापसी पर हेमा मालिनी ने दिया जवाब, बताया अब किन जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं अभिनेत्री

    धर्मेंद्र के निधन के बाद फिल्मों में वापसी पर हेमा मालिनी ने दिया जवाब, बताया अब किन जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं अभिनेत्री

    नई दिल्ली ।बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री हेमा मालिनी लंबे समय से बड़े पर्दे से दूर हैं, लेकिन उनके प्रशंसकों के बीच आज भी फिल्मों में वापसी को लेकर उत्सुकता बनी हुई है। हाल ही में उनसे पूछा गया कि क्या वह दोबारा फिल्मों में नजर आने की तैयारी कर रही हैं। अभिनेत्री ने इस सवाल पर स्पष्ट संकेत दिया कि फिलहाल उनका ध्यान अभिनय में वापसी से ज्यादा अपनी वर्तमान जिम्मेदारियों और परिवार पर है।

    हेमा मालिनी ने बताया कि इस समय वह अपने राजनीतिक दायित्वों में व्यस्त हैं और अपने क्षेत्र के लोगों के लिए काम करना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। इसके साथ ही वह अपने बच्चों और नाती-पोतों के साथ भी समय बिताती हैं। उनके अनुसार, परिवार को इस समय उनकी जरूरत है और यही उनकी वर्तमान जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    अभिनेत्री ने धर्मेंद्र की यादों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह उनकी यादों के साथ जीवन आगे बढ़ा रही हैं। धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की जोड़ी हिंदी सिनेमा की चर्चित जोड़ियों में रही है। दोनों ने लंबे समय तक साथ जीवन बिताया और उनकी निजी जिंदगी हमेशा प्रशंसकों की दिलचस्पी का विषय रही है।

    हेमा मालिनी का फिल्मी करियर कई दशकों तक फैला रहा है। उन्होंने शादी और परिवार की जिम्मेदारियों के बाद भी पूरी तरह काम करना बंद नहीं किया। हालांकि समय के साथ फिल्मों में उनकी सक्रियता कम होती गई। उनकी आखिरी फिल्मों में 2020 में आई शिमला मिर्ची शामिल है। इसके बाद उनका ज्यादा ध्यान सार्वजनिक जीवन और राजनीति से जुड़े कामों पर रहा।

    अभिनेत्री ने यह भी बताया कि शादी और बच्चों की योजना बनाने के बाद उन्होंने फिल्मों की संख्या कम कर दी थी, लेकिन उनका रचनात्मक काम जारी रहा। उन्होंने निर्देशन के क्षेत्र में भी काम किया और टेलीविजन से जुड़े प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बनीं। उन्होंने दिल आशना है का निर्देशन किया था, जबकि टेलीविजन के लिए भी काम किया।

    हेमा मालिनी का कला से जुड़ाव सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। वह लंबे समय से शास्त्रीय नृत्य से जुड़ी हुई हैं और उन्होंने कई नृत्य प्रस्तुतियां तथा बैले तैयार किए। इनमें दुर्गा, महालक्ष्मी, राधा कृष्ण और द्रौपदी जैसे पौराणिक विषयों पर आधारित कार्यक्रम शामिल रहे हैं। अभिनेत्री ने बताया कि उन्होंने मंच पर फिल्मी गीतों के बजाय शास्त्रीय नृत्य को प्राथमिकता दी।

    उनके मुताबिक शास्त्रीय नृत्य से आर्थिक लाभ फिल्मी प्रस्तुतियों की तुलना में कम हो सकता है, लेकिन उन्होंने इसे अपनी पसंद और कला के प्रति प्रतिबद्धता के कारण जारी रखा। इससे उनके अभिनय के अलावा नृत्य के क्षेत्र में उनकी अलग पहचान भी बनी।

    हेमा मालिनी ने अपने फिल्मी करियर से जुड़े कुछ पुराने फैसलों को भी याद किया। उन्होंने बताया कि राज कपूर की सत्यम शिवम सुंदरम में काम करने का प्रस्ताव उन्हें मिला था, लेकिन उन्होंने भूमिका स्वीकार नहीं की। अभिनेत्री के अनुसार, वह राज कपूर के साथ फिर काम करना चाहती थीं, लेकिन इस विशेष फिल्म को करने के लिए तैयार नहीं थीं।

    फिलहाल हेमा मालिनी ने फिल्मों में वापसी की कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की है। उनके बयान से यही संकेत मिलता है कि राजनीति, परिवार, नृत्य और धर्मेंद्र की यादों से जुड़ी उनकी वर्तमान जिंदगी में अभिनय की वापसी अभी प्राथमिकता नहीं है। हालांकि भविष्य में कोई उपयुक्त भूमिका मिलने पर उनका फैसला क्या होगा, इस पर उन्होंने कोई निश्चित घोषणा नहीं की है।

  • शहजाद पूनावाला ने बीजेपी छोड़ने की बताई वजह, आर्थिक तंगी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच लिया बड़ा फैसला

    शहजाद पूनावाला ने बीजेपी छोड़ने की बताई वजह, आर्थिक तंगी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच लिया बड़ा फैसला

    नई दिल्ली । बीजेपी के चर्चित प्रवक्ताओं में शामिल रहे शहजाद पूनावाला ने पार्टी की जिम्मेदारी से अलग होने के बाद अपने फैसले की वजह स्पष्ट की है। उन्होंने बताया कि इस्तीफे के पीछे केवल राजनीतिक कारण नहीं थे, बल्कि आर्थिक परिस्थितियों और परिवार से जुड़ी जिम्मेदारियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लंबे समय तक पार्टी के लिए पूर्णकालिक भूमिका निभाने के कारण उनके लिए आय का कोई दूसरा नियमित माध्यम बनाए रखना मुश्किल हो गया था। अब उन्होंने प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करने की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया है।

    शहजाद पूनावाला ने बताया कि राजनीति में सक्रिय रहते हुए घर चलाने से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही थीं। किराया, रोजमर्रा के खर्च और परिवार की अन्य आवश्यकताओं को पूरा करना उनके लिए कठिन होता जा रहा था। पार्टी के काम को पूरा समय देने के कारण वह किसी अन्य नौकरी या पेशेवर गतिविधि में नियमित रूप से शामिल नहीं हो पा रहे थे। उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में बचत के सहारे खर्च चलाया गया, लेकिन समय के साथ बचत भी समाप्त होने लगी।

    परिवार से जुड़ी परिस्थितियों ने भी उनके फैसले को प्रभावित किया। शहजाद पूनावाला के अनुसार, उनकी मां कुछ समय पहले एक दुर्घटना का शिकार हुई थीं। ऐसे समय में उनके साथ रहना और उनकी देखभाल करना उनके लिए प्राथमिकता बन गया। राजनीतिक गतिविधियों में लगातार व्यस्त रहने के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों को संतुलित करना मुश्किल हो रहा था। इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने 30 जुलाई को अपना इस्तीफा दिया, जिसे बातचीत के बाद पार्टी ने स्वीकार कर लिया।

    पार्टी से अलग होने के बावजूद शहजाद पूनावाला ने स्पष्ट किया कि उनके वैचारिक रुख में बदलाव नहीं आया है। उन्होंने कहा कि वह बीजेपी की विचारधारा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक बने हुए हैं। उनके मुताबिक, पार्टी की जिम्मेदारी छोड़ना उनके राजनीतिक विचारों से दूरी बनाने का संकेत नहीं है। उन्होंने अपने फैसले को मुख्य रूप से व्यक्तिगत, आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियों से जुड़ा बताया है।

    अब शहजाद पूनावाला निजी क्षेत्र में नौकरी तलाशने की तैयारी कर रहे हैं। वह पहले भी कॉरपोरेट क्षेत्र में काम कर चुके हैं, इसलिए उनका मानना है कि पेशेवर जीवन में वापस लौटना उनके लिए नया अनुभव नहीं होगा। हालांकि उन्होंने अभी किसी विशेष कंपनी या पद को लेकर अंतिम निर्णय नहीं किया है। उनका अगला कदम प्राइवेट सेक्टर में रोजगार हासिल करने की दिशा में होगा।

    बीजेपी की जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद शहजाद ने मीडिया और सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता बढ़ाने की भी बात कही है। उनका कहना है कि पार्टी पद से जुड़े दायित्वों के कारण जिन सीमाओं और जिम्मेदारियों का पालन करना पड़ता था, अब उनमें बदलाव आएगा। वह सार्वजनिक मुद्दों और राजनीतिक विषयों पर अपनी राय पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्रता के साथ रखने की कोशिश करेंगे।

    शहजाद पूनावाला ने बीजेपी को युवाओं से जुड़ने को लेकर भी सुझाव दिया है। उनके अनुसार, बदलते दौर में राजनीतिक दलों को युवाओं की भाषा, उनकी प्राथमिकताओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका को अधिक गंभीरता से समझना चाहिए। उनका मानना है कि सोशल मीडिया और नए डिजिटल माध्यमों के जरिए युवा वर्ग से संवाद मजबूत किया जा सकता है। बीजेपी से उनकी औपचारिक जिम्मेदारी समाप्त होने के बावजूद पार्टी के प्रति उनका समर्थन कायम रहने की बात उन्होंने दोहराई है। इस्तीफे के बाद उनका फोकस अब आर्थिक स्थिरता, परिवार की जिम्मेदारियों और पेशेवर जीवन में वापसी पर रहेगा।

  • सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए कॉजपा संस्थापक का सुझाव, जनप्रतिनिधि सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं अपने बच्चे

    सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए कॉजपा संस्थापक का सुझाव, जनप्रतिनिधि सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं अपने बच्चे

    नई दिल्ली । देश में सरकारी शिक्षा प्रणाली की स्थिति और उसमें आवश्यक सुधारों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने एक बयान जारी कर मांग की है कि शिक्षा विभाग से जुड़े सभी मंत्रियों, प्रशासनिक अधिकारियों, प्राचार्यों और शिक्षकों को अपने बच्चों का दाखिला अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूलों में ही कराना चाहिए। उनका मानना है कि यदि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अपने बच्चों को इन संस्थानों में भेजेंगे, तो सरकारी स्कूलों की व्यवस्था में बहुत जल्द सकारात्मक और व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा।

    अभिजीत दीपके ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक सरकारी नीतियों को लागू करने वाले अधिकारी और जनप्रतिनिधि स्वयं इन सेवाओं का उपयोग नहीं करेंगे, तब तक वास्तविक सुधार संभव नहीं है। उन्होंने पूछा कि आखिर क्यों अधिकारी और मंत्री अपने बच्चों को निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाना पसंद करते हैं। क्या उन्हें अपने ही विभाग और सरकारी नीतियों की कार्यप्रणाली पर भरोसा नहीं है। उनका यह बयान देश भर में सरकारी स्कूलों के कायाकल्प के लिए चलाए जा रहे विभिन्न अभियानों के संदर्भ में आया है।

    इस विचार को धरातल पर उतारने और व्यवस्था की कमियों को उजागर करने के उद्देश्य से उन्होंने महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में स्थित अपने पैतृक गांव संतुक पिंपरी का दौरा किया था। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जिला परिषद द्वारा संचालित स्थानीय स्कूल में पहुंचे दीपके ने वहां की बुनियादी सुविधाओं का जायजा लिया था। निरीक्षण के दौरान उन्होंने पाया कि कक्षाओं में खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे, सीसीटीवी कैमरे निष्क्रिय थे और स्वच्छता से जुड़ी कई मूलभूत सुविधाएं बदहाल स्थिति में थीं।

    उनके द्वारा उजागर की गई कमियों के बाद स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायत तुरंत हरकत में आई। संतुक पिंपरी के स्थानीय सरपंच विजय पुरी ने जानकारी दी है कि अभिजीत दीपके द्वारा चिन्हित की गई सभी समस्याओं को दूर करने का कार्य प्राथमिकता के आधार पर शुरू कर दिया गया है। स्कूल में क्षतिग्रस्त खिड़कियों और उनके फ्रेम को बदला जा रहा है, नए सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं, तथा शौचालयों में पानी की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए हैं।

    शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस पूरे मामले का संज्ञान लेते हुए स्कूल प्रबंधन को मरम्मत कार्य जल्द से जल्द पूरा करने के निर्देश जारी किए हैं। इस घटनाक्रम के बाद स्थानीय स्तर पर स्कूल की ढांचागत स्थिति में तेजी से सुधार देखने को मिल रहा है।

    मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में भी सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और सुविधाओं को लेकर समय-समय पर इस तरह की मांगें उठती रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सार्वजनिक सेवाओं के उपयोग को अनिवार्य या प्रोत्साहित किया जाए, तो इससे प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ती है। अभिजीत दीपके की इस पहल और उनके सुझाव ने एक बार फिर शिक्षा के अधिकार और सरकारी शैक्षणिक संस्थानों के स्तर को ऊंचा उठाने की दिशा में गंभीर मंथन शुरू कर दिया है।

  • 'अंधभक्त' कहे जाने पर ईशा कोपिकर और कंगना रनौत का पलटवार, राष्ट्रप्रेम और देशहित को बताया सर्वोपरि

    'अंधभक्त' कहे जाने पर ईशा कोपिकर और कंगना रनौत का पलटवार, राष्ट्रप्रेम और देशहित को बताया सर्वोपरि

    नई दिल्ली । सोशल मीडिया पर अक्सर अभिनेत्रियों और सार्वजनिक हस्तियों को अपनी बेबाक राय के कारण आलोचनाओं और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। हाल ही में अभिनेत्री ईशा कोपिकर को इंटरनेट पर ‘अंधभक्त’ कहकर निशाना बनाया गया, जिसके बाद उन्होंने बेहद कड़े शब्दों में अपनी बात रखी। इस पूरे विवाद के सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी की सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत भी ईशा कोपिकर के समर्थन में आगे आई हैं और उन्होंने इस विषय पर अपनी सहमति व्यक्त की है।

    यह विवाद तब शुरू हुआ था जब ईशा कोपिकर ने देश में चल रहे छात्र आंदोलनों के दौरान प्रधानमंत्री के प्रति आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करने वाले लोगों का विरोध किया था। उन्होंने ऐसे कृत्य को देशहित के खिलाफ बताते हुए अपनी असहमति दर्ज कराई थी। इसके बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उन्हें ट्रोल किया जाने लगा। इसके जवाब में ईशा ने एक वीडियो संदेश जारी कर स्पष्ट किया कि यदि देश की भलाई सोचना और उसके प्रति निष्ठा रखना भक्ति है, तो वे इस शब्द को स्वीकार करने में संकोच नहीं करेंगी।

    ईशा कोपिकर के इस रुख की सराहना करते हुए कंगना रनौत ने उनके वीडियो को अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा किया। कंगना ने लिखा कि ईशा ने इस मुद्दे को बहुत ही स्पष्ट और तार्किक तरीके से जनता के सामने रखा है। उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों का संदर्भ देते हुए कहा कि अपने अधिकारों, न्याय और राष्ट्र के प्रति आवाज उठाना हमेशा से उनके स्वभाव का हिस्सा रहा है। उन्होंने छात्र जीवन से लेकर अपने पेशेवर करियर तक में अनुचित बातों के खिलाफ हमेशा स्टैंड लिया है।

    कंगना रनौत ने आगे कहा कि अपने परिवार, समाज और देश के प्रति सम्मान और प्रेम रखना किसी भी नागरिक का स्वाभाविक गुण होना चाहिए। वे जिन भी लोगों और विचारों से प्रभावित होती हैं, उनके प्रति आदर भाव रखती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश और देशवासियों के प्रति निष्ठा को किसी नकारात्मक टैग से जोड़कर देखना अनुचित है। जब भी समाज में कुछ गलत होगा, तो उसके खिलाफ बोलना और जब कुछ अच्छा होगा, तो उसकी सराहना करना एक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है।

    ईशा कोपिकर ने भी अपने संदेश में यह साफ कर दिया था कि वे किसी राजनीतिक एजेंडे से प्रभावित होकर नहीं, बल्कि एक नागरिक के रूप में अपनी राय रखती हैं। वे गलत नीतियों का विरोध और सही कार्यों की प्रशंसा बिना किसी हिचकिचाहट के करती रहेंगी। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे देशहित में सोचने वालों के प्रति अपनी मानसिकता में बदलाव लाएं और रचनात्मक चर्चा को बढ़ावा दें।

    इस घटनाक्रम के बाद मनोरंजन जगत और राजनीतिक क्षेत्रों में अभिव्यक्ति की आजादी और ऑनलाइन ट्रोलिंग को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में भी सोशल मीडिया यूजर्स इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि राष्ट्रप्रेम और व्यक्तिगत विचारों की अभिव्यक्ति को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय एक स्वतंत्र सोच के रूप में देखा जाना चाहिए।