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  • केंद्रीय मंत्री पद छोड़ने के बाद भी ओडिशा भाजपा में मजबूत पकड़, धर्मेंद्र प्रधान के स्वागत से मिले राजनीतिक संकेत

    केंद्रीय मंत्री पद छोड़ने के बाद भी ओडिशा भाजपा में मजबूत पकड़, धर्मेंद्र प्रधान के स्वागत से मिले राजनीतिक संकेत

    नई दिल्ली । केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद पहली बार ओडिशा पहुंचे वरिष्ठ भाजपा नेता धर्मेंद्र प्रधान का पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं ने जोरदार स्वागत किया। नीट पेपर लीक विवाद के बीच मंत्री पद से उनके इस्तीफे के बाद राज्य की राजनीति में उनकी भूमिका और भविष्य को लेकर लगातार चर्चाएं चल रही हैं। हालांकि ओडिशा में उनके स्वागत और पार्टी कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने संकेत दिया कि संगठन के भीतर उनकी राजनीतिक पकड़ अब भी मजबूत बनी हुई है।

    धर्मेंद्र प्रधान लंबे समय तक केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं और ओडिशा भाजपा के प्रमुख रणनीतिकारों में उनकी पहचान रही है। उनके इस्तीफे के बाद भाजपा के कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से उनका समर्थन व्यक्त किया था। संसद में भी एनडीए के कई सांसदों ने उनका स्वागत कर उनके प्रति सम्मान और समर्थन का संदेश दिया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम संगठन में उनके प्रभाव को दर्शाता है।

    राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि मंत्री पद से हटने के बाद उनकी प्रशासनिक भूमिका भले बदल गई हो, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर उनका अनुभव और नेटवर्क भाजपा के लिए अब भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। पार्टी के भीतर लंबे समय से सक्रिय रहने के कारण उनकी पकड़ संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत मानी जाती है।

    धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ था। उनकी सक्रियता अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और संघ परिवार से जुड़ी रही है। उनके पिता देवेंद्र प्रधान भी राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे और केंद्रीय मंत्री का दायित्व निभा चुके थे। वर्ष 2014 के बाद केंद्र में भाजपा सरकार बनने के साथ धर्मेंद्र प्रधान राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख नेताओं में शामिल हुए और विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली।

    ओडिशा में भाजपा के विस्तार में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। पिछले एक दशक में उन्होंने संगठन को मजबूत करने और राज्य में पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए लगातार काम किया। वर्ष 2017 के स्थानीय निकाय चुनावों तथा 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन को मजबूत करने में उनकी रणनीतिक भूमिका की चर्चा होती रही है। राज्य में लंबे समय तक सत्तारूढ़ रहे राजनीतिक दल के मुकाबले भाजपा को मजबूत विकल्प बनाने के प्रयासों में भी उनका योगदान माना जाता है।

    हालांकि हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के बाद यह सवाल भी उठ रहे हैं कि ओडिशा भाजपा में नेतृत्व की भूमिका किस दिशा में आगे बढ़ेगी। राज्य में मौजूदा सरकार और संगठन के बीच समन्वय को लेकर भी राजनीतिक विश्लेषक नजर बनाए हुए हैं। माना जा रहा है कि आने वाले समय में ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकाय चुनाव पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होंगे और इन चुनावों में संगठनात्मक रणनीति के लिहाज से धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका पर भी ध्यान रहेगा।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि किसी नेता का प्रभाव केवल सरकारी पद से नहीं, बल्कि संगठन में उसकी स्वीकार्यता, कार्यकर्ताओं से जुड़ाव और नेतृत्व क्षमता से भी तय होता है। ओडिशा दौरे के दौरान मिले स्वागत ने यह संकेत दिया है कि धर्मेंद्र प्रधान अभी भी राज्य की भाजपा राजनीति के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम यह तय करेंगे कि भविष्य में उनकी संगठनात्मक और राजनीतिक भूमिका किस रूप में आगे बढ़ती है।

  • पूर्व IAS नियाज़ खान की राजनीति में एंट्री की इच्छा: बोले- कांग्रेस और भाजपा शायद स्वीकार न करें, नई पार्टी बनी तो करूंगा जॉइन

    पूर्व IAS नियाज़ खान की राजनीति में एंट्री की इच्छा: बोले- कांग्रेस और भाजपा शायद स्वीकार न करें, नई पार्टी बनी तो करूंगा जॉइन


    भोपाल । मध्य प्रदेश के पूर्व आईएएस अधिकारी और चर्चित लेखक नियाज़ खान ने सक्रिय राजनीति में आने की इच्छा जाहिर कर एक नई राजनीतिक चर्चा छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर साझा की गई अपनी पोस्ट में उन्होंने कहा कि देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और राजनीतिक व्यवस्था में सुधार लाने के लिए अब राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना जरूरी हो गया है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है।

    नियाज़ खान ने अपनी पोस्ट में लिखा कि वह कांग्रेस पार्टी में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि उनके हिंदू उदारवादी विचारों के कारण कांग्रेस उन्हें स्वीकार नहीं करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने भी उनके साथ हमेशा अलग व्यवहार किया और प्रशासनिक सेवा के दौरान उन्हें कभी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां नहीं दीं। उनके अनुसार, इससे यह स्पष्ट होता है कि भाजपा भी उन्हें अपने साथ जोड़ने की इच्छुक नहीं रही।

    पूर्व आईएएस अधिकारी ने अपनी पोस्ट में आगे लिखा कि यदि भविष्य में कॉकरोच जनता पार्टी राजनीति में सक्रिय रूप से उतरती है तो वह उस पार्टी से जुड़ने पर विचार करेंगे। उनका कहना है कि वर्तमान समय में राजनीति ही समाज और देश की सबसे बड़ी सेवा का माध्यम बन चुकी है। इसलिए यदि व्यवस्था में बदलाव लाना है तो राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बनना आवश्यक है।

    नियाज़ खान प्रशासनिक सेवा के साथ-साथ साहित्य जगत में भी अपनी अलग पहचान रखते हैं। उन्होंने ‘ब्राह्मण द ग्रेट’, ‘ब्राउन डेजर्ट IV-786’ और ‘बी रेडी टू डाई’ जैसे कई चर्चित उपन्यास लिखे हैं। उनकी किताबें अक्सर सामाजिक और वैचारिक मुद्दों पर केंद्रित रही हैं, जिसके कारण वे समय-समय पर सार्वजनिक बहस का हिस्सा भी बने हैं।

    सोशल मीडिया पर उनकी पोस्ट सामने आने के बाद लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोगों ने उनके राजनीति में आने के फैसले का स्वागत किया, जबकि कुछ ने उनके बयान को लेकर सवाल भी उठाए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह का इस तरह खुलकर अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं सार्वजनिक करना चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है।

    हालांकि, नियाज़ खान ने फिलहाल किसी राजनीतिक दल में औपचारिक रूप से शामिल होने की घोषणा नहीं की है। उनका बयान केवल अपनी इच्छा और संभावित विकल्पों को लेकर है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में वह वास्तव में सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनते हैं या नहीं और यदि बनते हैं तो किस राजनीतिक मंच से अपनी नई पारी की शुरुआत करते हैं।

  • जंतर मंतर से संसद तक गूंजा आंदोलन, राहुल गांधी के प्रदर्शन के बाद सरकार ने वांगचुक से की मुलाकात

    जंतर मंतर से संसद तक गूंजा आंदोलन, राहुल गांधी के प्रदर्शन के बाद सरकार ने वांगचुक से की मुलाकात


    नई दिल्ली । जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन ने देश की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। लंबे समय तक आंदोलन को सीमित मानकर चल रही केंद्र सरकार ने अब अपना रुख बदलते हुए सक्रिय पहल शुरू कर दी है। राहुल गांधी के प्रधानमंत्री आवास के निकट धरने के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला और सरकार ने न केवल अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक से संपर्क किया बल्कि आंदोलन में घायल छात्रों से मिलने के लिए केंद्रीय मंत्रियों को अस्पताल भी भेजा। इसके साथ ही संसद में इस मुद्दे पर चर्चा कराने की विपक्ष की मांग को भी सरकार ने स्वीकार कर लिया।

    नीट पेपर लीक और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर शुरू हुआ आंदोलन शुरुआती दिनों में सीमित दायरे में दिखाई दे रहा था। जंतर मंतर पर कम संख्या में प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी को देखते हुए माना जा रहा था कि यह आंदोलन ज्यादा प्रभाव नहीं डाल पाएगा। लेकिन जैसे जैसे छात्रों का समर्थन बढ़ा और संसद मार्च के बाद आंदोलन ने नया स्वरूप लिया वैसे वैसे राजनीतिक माहौल भी बदलने लगा।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी के धरने ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दी। इसके बाद सरकार ने तेजी से अपनी रणनीति में बदलाव किया। कई दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक से मिलने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह पहुंचे और उनसे अनशन समाप्त करने की अपील की। इससे पहले आंदोलन के प्रतिनिधियों को सरकार से मिलने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा था लेकिन बाद में परिस्थितियां तेजी से बदल गईं।

    सरकार ने संसद में इस पूरे मुद्दे पर चर्चा के लिए भी सहमति जताई। हालांकि विपक्ष ने इस पर नई शर्त रखते हुए कहा कि चर्चा तभी सार्थक होगी जब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा देंगे। इसके बाद इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।

    इस बीच सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया पर एक पत्र साझा करते हुए बताया कि विभिन्न राजनीतिक दलों के लगभग 65 सांसदों ने उन्हें पत्र लिखकर या व्यक्तिगत रूप से मिलकर अनशन समाप्त करने का आग्रह किया है। उन्होंने लिखा कि सभी ने उन्हें याद दिलाया है कि देश और शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान अभी बाकी है। वांगचुक ने कहा कि वह भी जीना चाहते हैं और अपने छात्रों तथा शिक्षा से जुड़े कार्यों में जल्द लौटना चाहते हैं लेकिन आंदोलन के उद्देश्यों को लेकर उनकी प्रतिबद्धता बनी हुई है।

    विश्लेषकों का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को लेकर युवाओं में पहले से ही असंतोष था। यही कारण है कि आंदोलन धीरे धीरे व्यापक समर्थन हासिल करता गया और सरकार को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा।

    फिलहाल सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है लेकिन आंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि संसद में होने वाली चर्चा और सरकार के अगले कदम इस पूरे विवाद का क्या समाधान निकालते हैं।

  • अन्ना आंदोलन से निकले नेताओं की बदली सियासी तस्वीर, सत्ता, संघर्ष और सामाजिक सक्रियता ने तय किए नए रास्ते

    अन्ना आंदोलन से निकले नेताओं की बदली सियासी तस्वीर, सत्ता, संघर्ष और सामाजिक सक्रियता ने तय किए नए रास्ते


    नई दिल्ली ।
    वर्ष 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ अन्ना हजारे का जन आंदोलन देश के सबसे बड़े जनआंदोलनों में गिना जाता है। दिल्ली के रामलीला मैदान से उठी इस मुहिम ने तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती दी और जनलोकपाल की मांग को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना दिया। इस आंदोलन से कई ऐसे चेहरे उभरे जिन्होंने आगे चलकर भारतीय राजनीति, सामाजिक आंदोलनों और सार्वजनिक जीवन में अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। करीब 15 वर्ष बाद इन प्रमुख चेहरों की राजनीतिक और सामाजिक यात्रा पूरी तरह अलग दिशाओं में दिखाई देती है।

    अन्ना हजारे आंदोलन के प्रमुख नेतृत्वकर्ता रहे और उन्होंने आंदोलन समाप्त होने के बाद सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी। उन्होंने महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धि लौटकर ग्रामीण विकास, पारदर्शिता और लोकायुक्त जैसे मुद्दों पर अपनी सक्रियता जारी रखी। समय-समय पर उन्होंने राज्य सरकारों से लोकायुक्त कानून लागू करने सहित विभिन्न जनहित विषयों पर आवाज भी उठाई, लेकिन चुनावी राजनीति में प्रवेश नहीं किया।

    अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन के बाद राजनीतिक विकल्प तैयार करने का निर्णय लिया और आम आदमी पार्टी की स्थापना की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया और कई वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे। हाल के विधानसभा चुनावों में सत्ता परिवर्तन के बाद वे विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं और पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं।

    मनीष सिसोदिया भी आंदोलन से निकलकर आम आदमी पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। उन्होंने दिल्ली सरकार में शिक्षा और प्रशासनिक सुधारों को लेकर काम किया, लेकिन बाद के वर्षों में विभिन्न कानूनी मामलों के कारण चर्चा में रहे। न्यायिक प्रक्रिया के बीच उनकी राजनीतिक सक्रियता भी लगातार बनी हुई है।

    किरण बेदी ने आंदोलन के बाद भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा और बाद में पुडुचेरी की उपराज्यपाल के रूप में जिम्मेदारी निभाई। प्रशासनिक अनुभव के आधार पर उन्होंने सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका जारी रखी। वर्तमान समय में वे सामाजिक और जनहित से जुड़े विषयों पर अपनी राय रखती रहती हैं।

    कुमार विश्वास आंदोलन के दौरान अपने प्रभावशाली भाषणों और कविताओं के कारण चर्चित हुए। उन्होंने आम आदमी पार्टी की स्थापना में भी भूमिका निभाई, लेकिन बाद में मतभेदों के चलते अलग हो गए। वर्तमान में वे साहित्य, कवि सम्मेलनों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में सक्रिय हैं तथा समय-समय पर समसामयिक मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया भी देते हैं।

    योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने भी आंदोलन के बाद अलग राह चुनी। दोनों ने आम आदमी पार्टी से अलग होने के बाद सामाजिक आंदोलनों, लोकतांत्रिक सुधारों, किसानों के मुद्दों और न्यायिक पारदर्शिता जैसे विषयों पर काम जारी रखा। दोनों सार्वजनिक अभियानों और जनहित से जुड़े मामलों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं।

    योग गुरु बाबा रामदेव ने आंदोलन के दौरान भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का समर्थन किया था। बाद के वर्षों में उन्होंने योग, आयुर्वेद, स्वदेशी उत्पादों और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी गतिविधियों का विस्तार किया। वे समय-समय पर राष्ट्रीय और आर्थिक मुद्दों पर भी अपनी राय व्यक्त करते रहे हैं।

    वरिष्ठ विधिवेत्ता शांति भूषण आंदोलन के कानूनी सलाहकारों में शामिल थे और जनलोकपाल विधेयक के प्रारूप तैयार करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनका निधन हो चुका है, लेकिन आंदोलन में उनके योगदान को आज भी महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं मेधा पाटकर ने आंदोलन के बाद भी सामाजिक संघर्षों, विस्थापितों, किसानों और आदिवासी समुदायों से जुड़े मुद्दों पर अपनी सक्रियता जारी रखी।

    अन्ना आंदोलन से जुड़े इन प्रमुख चेहरों की यात्रा यह दर्शाती है कि एक साझा उद्देश्य से शुरू हुआ जन आंदोलन समय के साथ कई अलग-अलग दिशाओं में विकसित हो सकता है। किसी ने सत्ता की राजनीति का रास्ता चुना, किसी ने सामाजिक आंदोलनों को प्राथमिकता दी, जबकि कुछ सार्वजनिक जीवन में अलग भूमिकाओं के साथ सक्रिय बने रहे। यह बदलाव भारतीय लोकतंत्र में जन आंदोलनों के दीर्घकालिक प्रभाव और उनके विविध परिणामों की भी झलक प्रस्तुत करता है।

  • मानसून सत्र में गरमाई सियासत कांग्रेस का वॉकआउट जैसा विरोध सदन 15 मिनट के लिए स्थगित

    मानसून सत्र में गरमाई सियासत कांग्रेस का वॉकआउट जैसा विरोध सदन 15 मिनट के लिए स्थगित


    मध्य प्रदेश मध्य प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र का तीसरा दिन राजनीतिक टकराव और तीखी बहसों के नाम रहा। दिल्ली में छात्रों के साथ हुई कथित मारपीट और कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी के मुद्दे को लेकर कांग्रेस विधायकों ने सदन में काली पट्टी बांधकर विरोध दर्ज कराया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के नेतृत्व में विपक्ष ने इस मुद्दे पर चर्चा कराने की मांग की, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने स्थगन प्रस्ताव के तहत इसकी अनुमति नहीं दी। इसके बाद सदन में जोरदार हंगामा हुआ और लगातार शोरगुल के चलते कार्यवाही 15 मिनट के लिए स्थगित करनी पड़ी।

    कांग्रेस विधायकों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठाई और आरोप लगाया कि छात्रों की आवाज को दबाया जा रहा है। विपक्ष ने यह भी कहा कि छात्रों के सम्मान और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों पर सरकार जवाब देने से बच रही है। वहीं सत्ता पक्ष ने कांग्रेस के विरोध को केवल राजनीतिक प्रदर्शन और मीडिया में सुर्खियां बटोरने का प्रयास बताया।

    शून्यकाल के दौरान नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने दिल्ली में छात्रों के साथ हुई घटना का मुद्दा उठाते हुए कहा कि छात्रों का अपमान किया गया और उनके खिलाफ बल प्रयोग हुआ। उन्होंने इस विषय पर सदन में चर्चा कराने की मांग की। जवाब में लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने कहा कि यह मामला मध्य प्रदेश के अधिकार क्षेत्र से बाहर का है और विधानसभा के नियमों के अनुसार इस पर चर्चा नहीं कराई जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष की ओर से सूचना निर्धारित समय के बाद दी गई थी।

    सदन में प्रश्नकाल के दौरान भी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगा गया। विधायकों ने ई-अटेंडेंस व्यवस्था, आदिवासियों की जमीन, किसानों के लंबित मुआवजे, केन-बेतवा परियोजना, भोपाल सिटी लिंक परियोजना पर लगाए गए जुर्माने, वसीयत के आधार पर नामांतरण और चंबल सूक्ष्म सिंचाई परियोजना जैसे विषयों पर सरकार को घेरा।

    शिवपुरी की चंबल सूक्ष्म सिंचाई परियोजना पर कांग्रेस विधायक बाबू जंडेल ने 167 करोड़ रुपये की परियोजना में भ्रष्टाचार और किसानों तक पानी नहीं पहुंचने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि वर्षों बाद भी किसानों को परियोजना का लाभ नहीं मिला और उच्चस्तरीय जांच की मांग की। इसके जवाब में मंत्री कृष्णा गौर ने कहा कि परियोजना पूरी हो चुकी है और हजारों हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जहां भी तकनीकी खामियां होंगी, वहां जांच कराकर सुधार कराया जाएगा। विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने भी परियोजना का निरीक्षण कर कमियों को दूर करने के निर्देश दिए।

    पेसा एक्ट और सोलर प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण का मुद्दा भी सदन में गूंजा। विधायक बाला बच्चन ने आरोप लगाया कि आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा की अनुमति के बिना किसानों को नोटिस दिए जा रहे हैं। हालांकि राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि किसी भी भूमि का अधिग्रहण नहीं किया गया है। विधानसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में भूमि से जुड़े मामलों में स्थानीय समुदाय के अधिकारों और सामूहिक हितों का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।

    सत्र के दौरान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (मध्य प्रदेश संशोधन) विधेयक को सदन ने पारित कर दिया। इसके बाद मध्य प्रदेश निजी विश्वविद्यालय स्थापना एवं संचालन (संशोधन) विधेयक पर चर्चा शुरू हुई। कांग्रेस विधायक महेश परमार ने निजी विश्वविद्यालयों के लिए 25 एकड़ भूमि की अनिवार्यता समाप्त किए जाने का विरोध करते हुए कहा कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों के हित प्रभावित हो सकते हैं।

    मानसून सत्र के तीसरे दिन विधानसभा के भीतर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, जनहित के मुद्दों पर बहस और विधायी कार्यवाही एक साथ देखने को मिली। आने वाले दिनों में भी किसानों, शिक्षा, आदिवासी अधिकारों और विकास परियोजनाओं से जुड़े मुद्दों पर सदन में तीखी बहस जारी रहने की संभावना है।

  • मल्लिकार्जुन खरगे के जन्मदिन पर राजनीतिक दलों ने जताया सम्मान, प्रधानमंत्री और वरिष्ठ नेताओं ने की दीर्घायु व उत्तम स्वास्थ्य की कामना

    मल्लिकार्जुन खरगे के जन्मदिन पर राजनीतिक दलों ने जताया सम्मान, प्रधानमंत्री और वरिष्ठ नेताओं ने की दीर्घायु व उत्तम स्वास्थ्य की कामना


    नई दिल्ली । 
    कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे के 84वें जन्मदिन पर देशभर से उन्हें शुभकामनाएं मिलीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हुए स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु जीवन की कामना की। राजनीतिक मतभेदों से इतर कई नेताओं ने सार्वजनिक जीवन में उनके लंबे अनुभव और योगदान का उल्लेख करते हुए उन्हें शुभकामनाएं प्रेषित कीं।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मल्लिकार्जुन खरगे को जन्मदिन की बधाई देते हुए उनके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की। उन्होंने अपने शुभकामना संदेश में कहा कि ईश्वर उन्हें स्वस्थ और लंबा जीवन प्रदान करें। प्रधानमंत्री का यह संदेश सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बना और अनेक लोगों ने इसे लोकतांत्रिक परंपराओं का सकारात्मक उदाहरण बताया।

    लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी मल्लिकार्जुन खरगे को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने उनके सुखद, स्वस्थ और मंगलमय जीवन की कामना करते हुए सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान की सराहना की। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी उन्हें बधाई देते हुए स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की शुभकामनाएं व्यक्त कीं।

    कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के जन्मदिन पर विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से उन्हें शुभकामनाएं दीं। पार्टी नेताओं ने उनके लंबे राजनीतिक जीवन, संगठनात्मक अनुभव और सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्यों तथा जनसेवा के प्रति उनके समर्पण को याद किया। कई नेताओं ने कहा कि उनके नेतृत्व में पार्टी लगातार जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाने का प्रयास कर रही है।

    उत्तर प्रदेश कांग्रेस सहित विभिन्न प्रदेश इकाइयों ने भी मल्लिकार्जुन खरगे को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। पार्टी की ओर से जारी संदेशों में उन्हें अनुभवी नेता, कुशल संगठनकर्ता और करोड़ों कार्यकर्ताओं के प्रेरणास्रोत के रूप में बताया गया। साथ ही उनके स्वस्थ और सक्रिय जीवन की कामना भी की गई।

    सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बल्कि अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी उन्हें जन्मदिन की बधाई दी। समाजवादी पार्टी ने भी अपने शुभकामना संदेश में मल्लिकार्जुन खरगे के स्वस्थ, प्रसन्न और दीर्घायु जीवन की कामना की। विभिन्न दलों के नेताओं की ओर से आए इन संदेशों ने राजनीतिक शिष्टाचार और लोकतांत्रिक परंपराओं को भी रेखांकित किया।

    मल्लिकार्जुन खरगे भारतीय राजनीति के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। उन्होंने लंबे समय तक राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न जिम्मेदारियां निभाई हैं। संगठन और संसदीय राजनीति दोनों में उनका अनुभव व्यापक माना जाता है। वर्तमान में वह कांग्रेस अध्यक्ष होने के साथ-साथ राज्यसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका भी निभा रहे हैं।

    उनके जन्मदिन के अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी कार्यक्रम आयोजित किए। कई स्थानों पर सामाजिक सेवा गतिविधियां, पौधारोपण, रक्तदान शिविर और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस अवसर पर पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके नेतृत्व में संगठन को और मजबूत बनाने का संकल्प भी दोहराया।

  • भोपाल में कांग्रेस विचार विभाग की बैठक, केप्टन डाबर बोले- नेहरू ने आधुनिक भारत बनाया, भाजपा ने अफवाह तंत्र खड़ा किया

    भोपाल में कांग्रेस विचार विभाग की बैठक, केप्टन डाबर बोले- नेहरू ने आधुनिक भारत बनाया, भाजपा ने अफवाह तंत्र खड़ा किया

    मध्यप्रदेश: की राजधानी भोपाल में आयोजित कांग्रेस विचार विभाग की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और केंद्र सरकार पर कई राजनीतिक एवं वैचारिक मुद्दों को लेकर तीखे आरोप लगाए। कांग्रेस विचार विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष केप्टन प्रवीण डाबर ने कहा कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जबकि भाजपा ने देश में अफवाहों का तंत्र खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि नेहरू की सोच वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लोकतांत्रिक संस्थाओं और आधुनिक विकास पर आधारित थी, जिसे आज भी देश की प्रगति का आधार माना जाता है।

    बैठक के दौरान केप्टन डाबर ने अयोध्या स्थित राम मंदिर के चढ़ावे और उसके प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम करोड़ों भारतीयों की आस्था, सांस्कृतिक चेतना और नैतिक मूल्यों के प्रतीक हैं। मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं और प्रबंधन को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित पक्ष की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।

    डाबर ने राम मंदिर के लिए नए मुख्य कार्यपालन अधिकारी की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि यदि नियुक्ति के लिए केवल “राम भक्त” होने की शर्त रखी जाती है तो यह अन्य देवी-देवताओं के श्रद्धालुओं के साथ भेदभाव जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने सवाल किया कि भगवान को अलग-अलग वर्गों में बांटने की आवश्यकता क्यों महसूस की जा रही है और धार्मिक संस्थानों में समान भाव की भावना बनाए रखना अधिक आवश्यक है।

    प्रदेश कांग्रेस विचार विभाग के अध्यक्ष भूपेन्द्र गुप्ता ने अपने संबोधन में राष्ट्रीय हितों और देश की संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर सतर्क रहने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार के ऐसे समझौतों से बचना चाहिए जो देश के हितों को प्रभावित कर सकते हों। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से वैचारिक रूप से सक्रिय रहने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए जनता के बीच संवाद बढ़ाने का आह्वान किया।

    बैठक में शामिल पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि मंदिरों के संचालन और धार्मिक संस्थाओं में संघ के प्रचारकों की भूमिका बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मंदिरों का संचालन संतों और धार्मिक परंपराओं से जुड़े लोगों के हाथों में रहना चाहिए। दिग्विजय सिंह ने यह भी कहा कि धर्म का मूल आधार इंसानियत और मानवता है तथा कांग्रेस सभी धर्मों के सम्मान और समानता में विश्वास करती है। उन्होंने मंदिरों के संचालन में शंकराचार्यों की भूमिका सुनिश्चित किए जाने की भी मांग रखी।

    बैठक के दौरान कांग्रेस नेताओं ने सामाजिक सौहार्द, धार्मिक सद्भाव और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा को पार्टी की प्राथमिकता बताया। वहीं भाजपा और सरकार पर लगाए गए आरोपों को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। इन बयानों के बाद संबंधित पक्ष की प्रतिक्रिया का भी इंतजार किया जा रहा है, क्योंकि इस तरह के मुद्दे प्रदेश की राजनीति में आगे भी बहस का विषय बने रह सकते हैं।

  • मेरठ छात्रा हत्याकांड: पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल को रोका, पार्टी ने पुलिस पर लगाए आरोप

    मेरठ छात्रा हत्याकांड: पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल को रोका, पार्टी ने पुलिस पर लगाए आरोप

    मेरठ। मेरठ छात्रा हत्याकांड को लेकर पीड़ित परिवार की शिकायत वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) तक पहुंचाने जा रहे कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल को सोमवार को मेरठ-दिल्ली हाईवे स्थित काशी टोल प्लाजा पर पुलिस ने रोक दिया। इसके बाद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मौके पर विरोध प्रदर्शन करते हुए पुलिस प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की।

    काशी टोल प्लाजा पर रोका गया काफिला
    कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल एसएसपी कार्यालय जाने के लिए मेरठ पहुंच रहा था। इसी दौरान पुलिस ने काशी टोल प्लाजा पर उनके काफिले को आगे बढ़ने से रोक दिया। पुलिस की इस कार्रवाई के विरोध में कांग्रेस कार्यकर्ता सड़क पर उतर आए और प्रदर्शन शुरू कर दिया।

    कांग्रेस ने पुलिस पर लगाए आरोप
    कांग्रेस नेताओं का कहना था कि वे केवल पीड़ित परिवार की शिकायत लेकर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से मिलने जा रहे थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें जबरन रोक दिया। उनका आरोप है कि इस तरह की कार्रवाई लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना के अनुरूप नहीं है और इससे प्रदेश का माहौल प्रभावित होता है।

    प्रदेश सरकार पर भी साधा निशाना
    प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस नेताओं ने उत्तर प्रदेश सरकार की भी आलोचना की। उनका आरोप था कि पुलिस को सरकार का संरक्षण प्राप्त है, जिसके कारण आम लोगों के साथ मनमानी की जा रही है। नेताओं ने पुलिस की कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए इस पर नाराजगी जताई।

    प्रतिनिधिमंडल में ये नेता रहे शामिल
    कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल में महानगर अध्यक्ष रंजन शर्मा, उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र गौतम, सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और बाराबंकी से सांसद तनुज पूनिया सहित अन्य नेता शामिल थे।

  • नाना पटवारी ने मानी पुरानी ड्रग्स की लत, बोले- रिहैब के बाद छोड़ा नशा; कांग्रेस ने पुलिस कार्रवाई को बताया राजनीतिक प्रतिशोध

    नाना पटवारी ने मानी पुरानी ड्रग्स की लत, बोले- रिहैब के बाद छोड़ा नशा; कांग्रेस ने पुलिस कार्रवाई को बताया राजनीतिक प्रतिशोध


    मध्यप्रदेश । मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के भाई नाना पटवारी को पुलिस हिरासत में लिए जाने के बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। शुक्रवार को इंदौर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में नाना पटवारी ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि वे करीब तीन साल पहले तक ड्रग्स का सेवन करते थे, लेकिन रिहैब सेंटर में इलाज के बाद उन्होंने नशा पूरी तरह छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि आज उनका ड्रग तस्करी से कोई संबंध नहीं है और उनकी सबसे बड़ी गलती सिर्फ इतनी है कि वे कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के भाई हैं।

    प्रेस कॉन्फ्रेंस में नाना पटवारी ने दावा किया कि ड्रग्स मामले में गिरफ्तार आरोपियों से उनका कोई लेन-देन या संबंध नहीं है। उन्होंने बताया कि वे अपनी कार की सर्विसिंग कराने गए थे, तभी पुलिस उन्हें अपने साथ ले गई। उनके अनुसार थाने में उनसे केवल सामान्य पूछताछ की गई, लेकिन हिरासत में लेने का स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पूरे दिन उन्हें अलग-अलग स्थानों पर घुमाया गया और देर रात बिना किसी कार्रवाई के छोड़ दिया गया।

    नाना पटवारी ने कहा कि उनकी कार संजय कौशल उर्फ रॉनी के सर्विस सेंटर पर सर्विस होती है और वहीं काम करने वाले कुछ लोगों के बारे में पुलिस ने उनसे पूछताछ की। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस स्कॉर्पियो वाहन की चर्चा हो रही है, वह उनकी नहीं बल्कि संजय कौशल की है और उसमें मिले किसी भी सामान से उनका कोई संबंध नहीं है।

    इस पूरे मामले को कांग्रेस ने राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार सत्ता का दुरुपयोग कर विपक्षी नेताओं और उनके परिवारों को निशाना बना रही है। उनका कहना है कि नाना पटवारी का ड्रग तस्करी प्रकरण से कोई लेना-देना नहीं है और उन्हें केवल राजनीतिक दबाव बनाने के उद्देश्य से हिरासत में लिया गया।

    दूसरी ओर इंदौर पुलिस का कहना है कि कार्रवाई पूरी तरह जांच के आधार पर की गई। डीसीपी नरेंद्र सिंह रावत के मुताबिक राजेंद्र नगर क्षेत्र से ब्राउन शुगर के साथ गिरफ्तार दो आरोपियों इरफान खान उर्फ गोलू चंदेरी और संजय कौशल उर्फ रॉनी ने पूछताछ के दौरान नाना पटवारी और मानव गंगवानी का नाम लिया था। इसी आधार पर दोनों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया। पुलिस ने बताया कि फिलहाल कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच की जा रही है और जांच में जिसकी भूमिका सामने आएगी, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

    नाना पटवारी पहले भी कई मामलों को लेकर चर्चा में रहे हैं। उनके खिलाफ हत्या के प्रयास सहित लगभग दस आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आ चुकी है। वर्ष 2023 में विधानसभा चुनाव के दौरान भी उन्हें एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया था। वहीं वर्ष 2025 में जमीन विवाद और 2018 में महिला से कथित अभद्रता के मामले में भी उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। उनका नाम खुशी कूलवाल आत्महत्या मामले की जांच के दौरान भी सामने आया था, हालांकि उस मामले में उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई थी।

    फिलहाल यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है। कांग्रेस इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता रही है, जबकि पुलिस का कहना है कि जांच तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है।

  • मास्टर प्लान को लेकर दिशा बैठक में गरमाई राजनीति विधायक और जनपद अध्यक्ष में तीखी बहस सांसद बोले जल्द हो लागू

    मास्टर प्लान को लेकर दिशा बैठक में गरमाई राजनीति विधायक और जनपद अध्यक्ष में तीखी बहस सांसद बोले जल्द हो लागू


    भोपाल । भोपाल के बहुप्रतीक्षित मास्टर प्लान को लेकर जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति दिशा की बैठक शुक्रवार को राजनीतिक टकराव का अखाड़ा बन गई। मास्टर प्लान के लंबे समय से लागू नहीं होने के मुद्दे पर कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद और आतिफ अकील ने बैठक में तीखा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब राजधानी के विकास का सबसे अहम दस्तावेज ही लागू नहीं हो पा रहा है तो विकास समीक्षा बैठकों का क्या औचित्य रह जाता है। इसी मुद्दे पर चर्चा के दौरान फंदा जनपद पंचायत अध्यक्ष प्रमोद सिंह राजपूत के हस्तक्षेप से माहौल और अधिक गरमा गया और बैठक में तीखी नोकझोंक शुरू हो गई।

    विवाद के दौरान कांग्रेस विधायकों ने आपत्ति जताते हुए कहा कि उनकी बात सांसद से हो रही थी ऐसे में बीच में हस्तक्षेप करने का अधिकार किसे है। दोनों पक्षों के बीच बहस इतनी बढ़ गई कि कुछ समय तक बैठक का माहौल पूरी तरह तनावपूर्ण बना रहा। कांग्रेस विधायकों ने आरोप लगाया कि उनकी बातों को गंभीरता से नहीं सुना जा रहा है और नाराज होकर बैठक से बाहर निकल गए। बैठक की अध्यक्षता कर रहे सांसद आलोक शर्मा ने दोनों नेताओं को रोकने और समझाने का प्रयास किया लेकिन वे वापस नहीं लौटे।

    बैठक के बाद सांसद आलोक शर्मा ने भी स्वीकार किया कि भोपाल के सुनियोजित विकास के लिए मास्टर प्लान का जल्द लागू होना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में मुख्यमंत्री से जल्द मुलाकात कर मास्टर प्लान को शीघ्र लागू कराने का आग्रह किया जाएगा। उनका मानना है कि राजधानी के भविष्य के विकास और बुनियादी ढांचे को व्यवस्थित बनाने के लिए मास्टर प्लान सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

    बैठक के दौरान केवल मास्टर प्लान ही नहीं बल्कि स्मार्ट सिटी परियोजना भी जनप्रतिनिधियों के निशाने पर रही। भाजपा विधायक भगवानदास सबनानी ने परियोजना की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि स्मार्ट सिटी के नाम पर बड़े निर्माण तो हुए लेकिन नागरिक सुविधाओं की अनदेखी की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि कई इमारतों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है और दशहरा मैदान जैसी महत्वपूर्ण जगहों का भी नुकसान हुआ है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि स्मार्ट सिटी के बड़े व्यावसायिक प्लॉट छोटे किए जाएं ताकि उनकी बिक्री आसान हो और परियोजना की आय बढ़ सके।

    महापौर मालती राय ने भी स्मार्ट सिटी की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि स्ट्रीट लाइट जैसी सामान्य समस्याओं का समाधान भी समय पर नहीं हो पाता जिससे आम नागरिकों को परेशानी झेलनी पड़ती है। इस पर कलेक्टर एवं स्मार्ट सिटी बोर्ड के अध्यक्ष प्रियंक मिश्रा ने भरोसा दिलाया कि अलग बैठक कर सभी समस्याओं की समीक्षा की जाएगी और समाधान सुनिश्चित किया जाएगा।

    सांसद आलोक शर्मा ने कहा कि स्मार्ट सिटी परियोजना में विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी दिखाई देती है। उन्होंने पूरे प्रोजेक्ट के लिए एक नोडल एजेंसी बनाने का सुझाव दिया ताकि सभी विभाग मिलकर बेहतर तरीके से काम कर सकें। इस दौरान कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने भी भाजपा विधायक भगवानदास सबनानी द्वारा उठाए गए मुद्दों का समर्थन करते हुए कहा कि यदि वरिष्ठ जनप्रतिनिधि समस्याओं की ओर ध्यान दिला रहे हैं तो अधिकारियों को उन्हें गंभीरता से लेकर जल्द समाधान करना चाहिए।

    बैठक में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव भोजपाल वेटलैंड प्राधिकरण के गठन को लेकर भी पारित किया गया। प्रस्ताव के अनुसार संभागायुक्त को प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया जाए जबकि भोपाल और सीहोर के कलेक्टर जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी तथा जनप्रतिनिधियों को इसमें शामिल किया जाए। इस प्रस्ताव को मुख्यमंत्री के पास भेजने का निर्णय लिया गया। साथ ही भोपाल को आधिकारिक रूप से वेटलैंड सिटी घोषित करने की मांग भी बैठक में प्रमुखता से उठाई गई।