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  • ब्रह्मोस की बराबरी का दावा, लेकिन ‘फेल’ निकली फतह-3! खाड़ी देशों को चीनी मिसाइल बेचने में जुटा पाकिस्तान

    ब्रह्मोस की बराबरी का दावा, लेकिन ‘फेल’ निकली फतह-3! खाड़ी देशों को चीनी मिसाइल बेचने में जुटा पाकिस्तान




    नई दिल्ली। पाकिस्तान अब चीन में बनी फतह-3 मिसाइल को खाड़ी देशों में बेचने की तैयारी में जुट गया है। पाकिस्तान इसे भारत की सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइल का जवाब बताकर सऊदी अरब, कतर और दूसरे अरब देशों को लुभाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का दावा है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान फतह मिसाइल भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम के सामने पूरी तरह विफल साबित हुई थी। इसके बावजूद पाकिस्तान इसे अपनी बड़ी सैन्य ताकत के तौर पर पेश कर रहा है।

    ईरान-अमेरिका तनाव के बाद पाकिस्तान खुद को खाड़ी देशों का सुरक्षा साझेदार दिखाने में लगा है। इसी रणनीति के तहत वह चीनी हथियारों को अरब बाजार में उतारना चाहता है। इससे पहले पाकिस्तान JF-17 फाइटर जेट को लेकर भी बड़े दावे कर चुका है और अब फतह-3 मिसाइल को ब्रह्मोस की टक्कर की मिसाइल बताकर प्रचार किया जा रहा है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक फतह-3 असल में चीन की HD-1 सुपरसोनिक मिसाइल का मॉडिफाइड वर्जन मानी जा रही है, जिसे चीन की कंपनी Guangdong Hongda ने विकसित किया है। पाकिस्तान का दावा है कि यह मिसाइल 2.5 से 4 मैक की स्पीड से उड़ सकती है और 450 किलो तक वारहेड ले जाने में सक्षम है। इसकी रेंज करीब 290 से 450 किलोमीटर बताई जा रही है।

    पाकिस्तानी मीडिया इसे जमीन और समुद्री लक्ष्यों पर हमला करने वाली आधुनिक मिसाइल बता रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी क्षमता ब्रह्मोस के मुकाबले काफी सीमित है। ब्रह्मोस जहां लंबी दूरी, सटीक निशाने और भारी विनाशक क्षमता के लिए जानी जाती है, वहीं फतह-3 अभी तक खुद को युद्धक्षेत्र में साबित नहीं कर पाई है।

    ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत की ब्रह्मोस मिसाइलों ने पाकिस्तान के कई अहम सैन्य ठिकानों और एयरबेस को निशाना बनाया था। रिपोर्ट्स के अनुसार नूर खान एयरबेस के आसपास हुए हमलों ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। इसके बाद पाकिस्तान ने अपनी मिसाइल ताकत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना शुरू किया।

    विशेषज्ञों का कहना है कि चीन पाकिस्तान के जरिए खाड़ी देशों के हथियार बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है, जहां अब तक अमेरिका और पश्चिमी देशों का दबदबा रहा है। माना जा रहा है कि सऊदी अरब भविष्य में फतह-3 मिसाइल या JF-17 लड़ाकू विमान खरीदने पर विचार कर सकता है, क्योंकि वह ईरान के खतरे को देखते हुए अपनी सैन्य क्षमता लगातार बढ़ा रहा है

  • ब्रह्मोस की बराबरी का दावा, लेकिन ‘फेल’ रही फतह-3! चीन की मिसाइल बेचने में जुटा पाकिस्तान, खाड़ी देशों को साधने की कोशिश

    ब्रह्मोस की बराबरी का दावा, लेकिन ‘फेल’ रही फतह-3! चीन की मिसाइल बेचने में जुटा पाकिस्तान, खाड़ी देशों को साधने की कोशिश




    नई दिल्ली। भारत के खिलाफ सैन्य संतुलन बनाने की कोशिश में पाकिस्तान अब चीन निर्मित हथियारों को खाड़ी देशों तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहा है। पाकिस्तानी सेना अपनी ‘फतह-3’ मिसाइल को भारत की ब्रह्मोस मिसाइल का जवाब बताकर सऊदी अरब और कतर जैसे देशों को आकर्षित करने में जुटी है। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह मिसाइल भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम के सामने प्रभावी साबित नहीं हो सकी थी।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान खुद को खाड़ी देशों का सुरक्षा साझेदार दिखाने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका-ईरान तनाव के बाद इस्लामाबाद ने रक्षा सहयोग को बढ़ाने के लिए चीन के हथियारों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। पहले जेएफ-17 फाइटर जेट और अब फतह-3 मिसाइल को लेकर पाकिस्तान बड़े दावे कर रहा है।

    पाकिस्तानी मीडिया फतह-3 को सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बताते हुए इसे ब्रह्मोस की टक्कर का हथियार बता रहा है। दावा किया जा रहा है कि यह जमीन और समुद्री दोनों लक्ष्यों पर हमला करने में सक्षम है और कम ऊंचाई पर तेज रफ्तार से उड़ान भरने के कारण इसे रोकना मुश्किल है। लेकिन रक्षा जानकारों का कहना है कि इसकी तकनीक काफी हद तक चीन की HD-1 मिसाइल पर आधारित है, जिसे Guangdong Hongda कंपनी ने विकसित किया था।

    बताया जा रहा है कि फतह-3 की रेंज करीब 290 से 450 किलोमीटर तक है और यह 240 से 450 किलोग्राम तक का वारहेड ले जा सकती है। इसकी गति 2.5 से 4 मैक तक बताई जाती है। वहीं दूसरी ओर भारत की ब्रह्मोस मिसाइल लंबी रेंज, अधिक सटीकता और भारी मारक क्षमता के लिए जानी जाती है।

    ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने ब्रह्मोस मिसाइलों के जरिए पाकिस्तान के कई अहम सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। रिपोर्ट्स के अनुसार नूर खान एयरबेस के पास हुए हमलों ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को झटका दिया था। इसके बाद पाकिस्तान ने अपनी मिसाइल क्षमता को बढ़ाने और नए खरीदार तलाशने की कोशिशें तेज कर दी हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन पाकिस्तान के जरिए खाड़ी देशों के हथियार बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है, जहां अब तक अमेरिका और पश्चिमी देशों का दबदबा रहा है। इसी रणनीति के तहत पाकिस्तान खुद को रक्षा साझेदार के रूप में पेश कर रहा है और चीनी तकनीक वाले हथियारों को “कम लागत वाला विकल्प” बताकर प्रचारित कर रहा है।

    रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि सऊदी अरब भविष्य में फतह-3 मिसाइल या जेएफ-17 फाइटर जेट में रुचि दिखा सकता है, क्योंकि वह क्षेत्रीय खतरों को देखते हुए अपनी सैन्य ताकत को तेजी से बढ़ा रहा है। हालांकि रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि ब्रह्मोस जैसी उन्नत मिसाइल प्रणाली की बराबरी करना पाकिस्तान और चीन दोनों के लिए अभी बड़ी चुनौती बना हुआ है।

  • इजरायल, ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव पर बड़ा दावा: ‘युद्ध भड़काने की थी साजिश, लेकिन MBS ने रोका बड़ा संकट’

    इजरायल, ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव पर बड़ा दावा: ‘युद्ध भड़काने की थी साजिश, लेकिन MBS ने रोका बड़ा संकट’



    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर बड़े दावों और आरोपों को लेकर सुर्खियों में है। सऊदी अरब के पूर्व खुफिया प्रमुख और पूर्व राजदूत प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने दावा किया है कि यदि इजरायल की कथित रणनीति सफल हो जाती, तो ईरान और सऊदी अरब के बीच सीधा सैन्य संघर्ष भड़क सकता था, जिससे पूरा क्षेत्र विनाशकारी युद्ध की चपेट में आ जाता। हालांकि उन्होंने कहा कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) की सूझबूझ और संयम की नीति के चलते सऊदी अरब इस बड़े संकट से बच गया।

    पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ते आरोप
    तुर्की अल-फैसल ने अपने लेख में दावा किया कि हाल के वर्षों में क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच कुछ बाहरी ताकतें चाहती थीं कि सऊदी अरब और ईरान सीधे टकराव में आ जाएं। उनके अनुसार, यदि यह स्थिति बनती तो खाड़ी देशों की तेल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और नागरिक ढांचे को भारी नुकसान पहुंच सकता था।

    हालांकि यह सभी दावे उनके व्यक्तिगत विश्लेषण और राय पर आधारित हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद यह बयान क्षेत्रीय भू-राजनीति की जटिलता को उजागर करता है।

    सऊदी अरब की ‘संयम नीति’ का दावा
    तुर्की अल-फैसल का कहना है कि सऊदी नेतृत्व ने इस पूरे तनाव के दौरान आक्रामक प्रतिक्रिया देने के बजाय कूटनीति और संयम का रास्ता अपनाया। उनके मुताबिक, अगर सऊदी अरब ईरान के हमलों का सैन्य जवाब देता, तो हालात तेजी से युद्ध में बदल सकते थे और खाड़ी क्षेत्र की तेल सुविधाएं गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती थीं।

    उन्होंने दावा किया कि सऊदी अरब ने पर्दे के पीछे रहकर तनाव को कम करने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की।

    ‘युद्ध में धकेलने की कोशिश’ का आरोप
    पूर्व खुफिया प्रमुख ने यह भी आरोप लगाया कि सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक समूहों के जरिए सऊदी अरब पर दबाव बनाने और उसे संघर्ष में खींचने की कोशिश की गई। लेकिन नेतृत्व ने सार्वजनिक बयानबाजी से दूरी बनाकर स्थिति को बिगड़ने से रोका। उनके अनुसार, यदि उस समय स्थिति नियंत्रण से बाहर जाती तो क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और सुरक्षा ढांचे को भारी नुकसान पहुंच सकता था।

    MBS की रणनीति पर फोकस
    तुर्की अल-फैसल ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की नीति को “दूरदर्शी और व्यावहारिक” बताया। उनके अनुसार, सऊदी अरब ने सीधे टकराव से बचकर क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता दी, जिससे एक बड़े युद्ध की आशंका टल गई।

    क्षेत्रीय राजनीति पर असर
    यह बयान ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों के बीच तनाव पहले से ही उच्च स्तर पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के दावे भले ही राजनीतिक दृष्टिकोण हों, लेकिन ये क्षेत्र में जारी शक्ति संतुलन और कूटनीतिक संघर्ष को दर्शाते हैं।

    तुर्की अल-फैसल का यह दावा एक बार फिर दिखाता है कि पश्चिम एशिया की राजनीति कितनी जटिल और संवेदनशील है। जहां एक ओर सैन्य तनाव की आशंकाएं बनी रहती हैं, वहीं दूसरी ओर कूटनीति और संयम कई बार बड़े युद्धों को टालने में अहम भूमिका निभाते हैं।

  • ईरान ने खाड़ी में बढ़ाया तनाव, UAE को लेकर सऊदी अरब को दी कथित चेतावनी; अबू धाबी पर हमले की रणनीति का दावा

    ईरान ने खाड़ी में बढ़ाया तनाव, UAE को लेकर सऊदी अरब को दी कथित चेतावनी; अबू धाबी पर हमले की रणनीति का दावा


    नई दिल्ली। तेहरान और खाड़ी देशों के बीच तनाव एक बार फिर तेज होता दिख रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान ने सऊदी अरब और ओमान के साथ बातचीत के दौरान संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को लेकर सख्त और आक्रामक रुख अपनाया है, जिससे पूरे क्षेत्र में कूटनीतिक हलचल बढ़ गई है।

    रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिमी मीडिया में दावा किया गया है कि ईरानी अधिकारियों ने बातचीत के दौरान संकेत दिया कि यदि क्षेत्रीय संघर्ष और बढ़ता है तो UAE को “कड़े जवाब” का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, इस बातचीत का आधिकारिक समय और पूरा विवरण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसे खाड़ी देशों के बीच बढ़ते अविश्वास के रूप में देखा जा रहा है।

    सूत्रों के मुताबिक, ईरान ने सऊदी अरब के सामने यह भी इशारा किया कि वह खाड़ी क्षेत्र में मौजूदा शक्ति संतुलन को अच्छी तरह समझता है और जरूरत पड़ने पर रणनीतिक जवाब देने की क्षमता रखता है। इस बयानबाजी को रियाद और अबू धाबी के बीच पहले से मौजूद मतभेदों को और गहरा करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।

    खाड़ी क्षेत्र में पहले से ही कई मोर्चों पर तनाव बना हुआ है। यमन संघर्ष में सऊदी अरब और UAE अलग-अलग पक्षों का समर्थन करते रहे हैं, जबकि सूडान और लीबिया जैसे देशों में भी दोनों देशों की नीतियां अक्सर एक-दूसरे के विपरीत रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में ईरान की हालिया बयानबाजी ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का यह कड़ा संदेश सिर्फ सैन्य चेतावनी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति में दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकता है। वहीं सऊदी अरब और UAE दोनों ही अपनी सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारियों को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। फिलहाल, इस पूरे मामले पर आधिकारिक स्तर पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन खाड़ी की राजनीति में हलचल साफ महसूस की जा रही है।

  • UAE ने मांगा अरबों का कर्ज, पाकिस्तान पर बढ़ा दबाव; सऊदी अरब से बढ़ी उम्मीदें

    UAE ने मांगा अरबों का कर्ज, पाकिस्तान पर बढ़ा दबाव; सऊदी अरब से बढ़ी उम्मीदें

    इस्लामाबाद। आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए नया संकट खड़ा हो गया है। संयुक्त अरब अमीरात द्वारा अरबों डॉलर का कर्ज वापस मांगे जाने के बीच अब सऊदी अरब एक बार फिर उसके लिए ‘संकटमोचक’ के रूप में उभरता नजर आ रहा है।

    इसी कड़ी में सऊदी वित्त मंत्री मोहम्मद अल-जदान का इस्लामाबाद दौरा काफी अहम माना जा रहा है। इसे पाकिस्तान को संभावित आर्थिक राहत के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

    पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सऊदी नेतृत्व के प्रति आभार जताते हुए कहा कि सऊदी सहयोग ने देश की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    UAE का कर्ज लौटाने से बढ़ेगी मुश्किलें
    जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान 2018 में लिए गए 3 अरब डॉलर से अधिक के कर्ज को UAE को लौटाने की प्रक्रिया में है। यह राशि उसके विदेशी मुद्रा भंडार का करीब 18 प्रतिशत है। ऐसे में भुगतान से देश की आर्थिक स्थिति पर सीधा दबाव पड़ना तय माना जा रहा है।

    स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के अनुसार, मार्च के अंत तक देश के पास करीब 16.4 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था, जो लगभग तीन महीने के आयात के लिए पर्याप्त माना जाता है।

    खाड़ी देशों के बदलते समीकरण
    विशेषज्ञों का मानना है कि UAE द्वारा कर्ज रोलओवर से इनकार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों का भी संकेत हो सकता है। खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े हालात के बीच यह कदम अहम माना जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान ने इसे सामान्य वित्तीय प्रक्रिया बताया है।

    सऊदी-पाकिस्तान रक्षा सहयोग भी मजबूत
    इस बीच सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक साझेदारी भी गहरी होती दिख रही है। सऊदी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, पाकिस्तानी वायुसेना का एक दल पूर्वी क्षेत्र स्थित किंग अब्दुलअजीज एयर बेस पर तैनात किया गया है। इसमें लड़ाकू और सहायक विमान शामिल हैं, जिनका उद्देश्य सैन्य समन्वय और ऑपरेशनल तैयारियों को मजबूत करना है।

    IMF और कर्ज भुगतान की दोहरी चुनौती
    पाकिस्तान पर इस महीने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को 1.3 अरब डॉलर के बॉन्ड का भुगतान भी करना है। साथ ही वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 1.2 अरब डॉलर की अगली किस्त का इंतजार कर रहा है।

    आर्थिक जानकारों का कहना है कि UAE के अचानक रुख ने पाकिस्तान की वित्तीय योजना को झटका दिया है। अब देश को विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट से बचने और आर्थिक संतुलन बनाए रखने के लिए सऊदी अरब सहित अन्य सहयोगी देशों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है।

    कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में पाकिस्तान के लिए आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ती दिख रही हैं, और उसकी नजरें एक बार फिर सऊदी समर्थन पर टिकी हैं।

  • सऊदी भागा आकिब, एटीएस जांच में बड़ा खुलासा; 2025 से लापता, लुकआउट नोटिस जारी

    सऊदी भागा आकिब, एटीएस जांच में बड़ा खुलासा; 2025 से लापता, लुकआउट नोटिस जारी


    लखनऊ। संदिग्ध आतंकी कनेक्शन की जांच में घिरे आकिब के खिलाफ अब एजेंसियों ने शिकंजा कसना तेज कर दिया है। एटीएस की पड़ताल में सामने आया है कि वह चार बार सऊदी अरब जा चुका है और अगस्त 2025 में चौथी बार विदेश जाने के बाद से अब तक भारत नहीं लौटा है। उसके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी कर दिया गया है, वहीं पासपोर्ट निरस्त करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।

    जांच में सामने आई ट्रैवल हिस्ट्री के मुताबिक, आकिब का पासपोर्ट 9 अप्रैल 2018 को बना था। वह पहली बार 4 अगस्त 2019 को सऊदी अरब गया और 8 फरवरी 2022 को भारत लौटा। इसके बाद 8 अप्रैल 2022 को दोबारा सऊदी गया और 11 अप्रैल 2023 को वापस आया। तीसरी बार वह 20 जून 2023 को गया और 22 जुलाई 2025 को भारत लौटा। हालांकि, महज 10 दिन बाद ही 1 अगस्त 2025 को वह फिर सऊदी चला गया और तब से वहीं पर है।

    एटीएस ने उसकी पूरी यात्रा का ब्योरा खंगाल लिया है और अब उसे भारत वापस लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि आकिब के हिरासत में आने के बाद आतंकी मॉड्यूल और संभावित साजिश से जुड़े कई अहम खुलासे हो सकते हैं।

    वीडियो जारी कर दी सफाई, कहा—अगर गलत हूं तो गोली मार देना

    इधर, मामले में तीन दिन पहले मॉड्यूल से जुड़े उवैद और जलाल हैदर की गिरफ्तारी के बाद यह प्रकरण और चर्चा में आया। इसी बीच आकिब ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर एक वीडियो जारी कर अपनी सफाई दी है।

    वीडियो में उसने पुलिस अधिकारियों के प्रति सम्मान जताते हुए कहा कि वह देश की सुरक्षा करने वालों की इज्जत करता है। उसने यह भी दावा किया कि उसने अपने साथी को पुलिस के सामने सरेंडर कर सच्चाई बताने की सलाह दी थी। आकिब ने अपने ऊपर लगे आतंकी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने कोई आपराधिक गतिविधि नहीं की, केवल गुस्से में अपशब्द कहे थे।

    वीडियो के अंत में उसने भावुक अपील करते हुए कहा, “मैं अपने ऊपर आतंकवादी का ठप्पा नहीं लगने दूंगा। अगर मैं गलत हूं, तो मेरे माथे पर गोली मार देना।”

    फिलहाल, एजेंसियां उसके ठिकाने और नेटवर्क की गहन जांच में जुटी हैं।

  • ईरान संघर्ष के बीच सऊदी अरब को दोहरा झटका, तेल सप्लाई के वैकल्पिक मार्ग पर हमला

    ईरान संघर्ष के बीच सऊदी अरब को दोहरा झटका, तेल सप्लाई के वैकल्पिक मार्ग पर हमला

    तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी जंग ट्रंप के सीजफायर के ऐलान के बाद थम गई है। लेकिन इसकी वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई करने में कई वर्ष लग जाएंगे। इस युद्ध के दौरान ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया था, जिसकी वजह से पूरी दुनिया में कच्चे तेल के दामों में उछाल आ गया था। सऊदी अरब ने तेल सप्लाई के अपने दूसरे रास्ते (ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन) का उपयोग करना शुरू कर दिया था। हालांकि, अब सामने आईं रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरानी हमले में इस पाइपलाइन को भी नुकसान पहुंचा है।

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही ट्रंप के सीजफायर ऐलान के बाद होर्मुज का रास्ता खुल गया हो, लेकिन इसके बाद भी लाखों बैरल तेल कच्चे बाजार से बाहर होने की आशंका है।

    सऊदी अरब में मौजूद एक स्त्रोत के मुताबिक ईरान ने अपने हमलों के दौरान सऊदी अरब के कई तेल प्रतिष्ठानों और तेल सप्लाई प्वाइंट्स को निशाना बनाया था। इसमें ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और उसके एक केंद्र (यानबू बंदरगाह) को भी निशाना बनाया गया है। इस पाइपलाइन के जरिए सऊदी अरब होर्मुज को बायपास करके तेल की सप्लाई को चालू रखता है।

    बता दें, ईरान के साथ बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए ही सऊदी अरब ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का निर्माण किया था। इसके जरिए तेल सप्लाई को यानबू पर ले जाकर लाल सागर के जरिए आगे बढ़ाया जाता है।

    इस पाइपलाइन के जरिए प्रतिदिन लगभग 70 लाख बैरल तेल सप्लाई होता था। 28 फरवरी के बाद सामने आए शिपिंग डेटा के मुताबिक यानबू की क्षमता करीब 4.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन है। पिछले कुछ दिनों से यह लगातार अपनी पूरी क्षमता के साथ काम कर रही थी। लेकिन अब इस पर भी हमला करके ईरान ने सऊदी के इस कदम पर भी पानी फेर दिया है।

    तेल प्रतष्ठानों पर हुए इन हमलों की जिम्मेदारी आईआरजीसी ने ली है।

    बुधवार को जारी एक बयान में आईआरजीसी की तरफ से कहा गया कि फारस की खाड़ी में कई लक्ष्यों के ऊपर मिसाइलों और ड्रोन्स के जरिए हमला किया गया है। इसमें यानबू में मौजूद अमेरिकी कंपनियों के ठिकानों को भी निशाना बनाया। यह पहली बार नहीं है कि जब इस संघर्ष के दौरान ईरान ने यानबू बंदरगाह को निशाना बनाने की कोशिश की है। इससे पहले भी ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के तमाम ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाया था। होर्मुज के ऊपर तेहरान ने पहले से ही पाबंदी लगा रखी थी। इसकी वजह से पूरी दुनिया में तेल के दाम आसमान छू रहे थे। हालांकि, अब सीजफायर के ऐलान के साथ ही होर्मुज को खोलने पर भी सहमति बनी है। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर कल से होर्मुज अपनी पूरी क्षमता के साथ शुरू भी हो जाता है, तब भी स्थिति को सामान्य होने में कई महीनों का वक्त लग जाएगा।
  • 2 मुस्लिम देशों की ईरान को चेतावनी, क्या सऊदी-पाकिस्तान जंग में उतरेंगे

    2 मुस्लिम देशों की ईरान को चेतावनी, क्या सऊदी-पाकिस्तान जंग में उतरेंगे


    रियाद।
     मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच ईरान  के खिलाफ 12 मुस्लिम देशों ने एकजुट होकर कड़ा रुख अपनाया है। साउदी अरब  की राजधानी में हुई अहम बैठक में पाकिस्‍तान समेत कई देशों के विदेश मंत्रियों ने ईरान से तुरंत हमले रोकने और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की मांग की।

    बैठक में । अज़रबैजान, बहरीन, मिस्र, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, सीरिया, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात  जैसे देश शामिल रहे। सभी ने नागरिक ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की कड़ी निंदा की।

    ईरान को सख्त संदेश

    बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में तेल संयंत्रों, हवाई अड्डों, रिहायशी इलाकों और राजनयिक मिशनों पर हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया गया। देशों ने United Nations चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा के अधिकार का भी जिक्र किया और United Nations Security Council के प्रस्तावों के पालन की मांग की।

    साथ ही ईरान से हॉर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में हस्तक्षेप न करने और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करने की अपील की गई।

    सऊदी विदेश मंत्री की कड़ी चेतावनी
    सऊदी विदेश मंत्री Faisal bin Farhan Al Saud ने साफ कहा कि ईरान पर भरोसा “पूरी तरह खत्म” हो चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि तेहरान दबाव और आक्रामक रणनीति के जरिए क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है।

    उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जरूरत पड़ी तो सऊदी अरब “उचित कदम” उठाने से पीछे नहीं हटेगा। उनका यह बयान सीधे तौर पर सैन्य कार्रवाई की संभावना की ओर इशारा माना जा रहा है।

    क्या पाकिस्तान भी जंग में खिंच सकता है?
    विश्लेषकों का मानना है कि यदि Saudi Arabia सीधे संघर्ष में उतरता है, तो उसका रक्षा सहयोग समझौता Pakistan के साथ सक्रिय हो सकता है। ऐसे में इस्लामाबाद भी इस टकराव का हिस्सा बन सकता है, जिससे संघर्ष और व्यापक हो सकता है।

    खाड़ी देशों पर हमलों से बढ़ा तनाव
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद ईरान ने खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सभी छह देशों को निशाना बनाया है। Abu Dhabi और Dubai में हुए हमलों में कई नागरिकों की मौत हुई, जबकि Kuwait, Oman और Bahrain में भी नुकसान की खबरें हैं।

    Qatar के अल-उदीद एयरबेस और Saudi Arabia के तेल ठिकानों पर भी हमले किए गए, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

    स्थिति बेहद संवेदनशील
    मौजूदा हालात संकेत दे रहे हैं कि यह संघर्ष अब सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहा। अगर सऊदी अरब और उसके सहयोगी सीधे मैदान में उतरते हैं, तो यह टकराव पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले सकता है—जिसके वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक असर भी गंभीर हो सकते हैं।

  • भारत की ऊर्जा सुरक्षा: होर्मुज स्ट्रेट और तेल-एलएनजी आयात की चुनौतियां

    भारत की ऊर्जा सुरक्षा: होर्मुज स्ट्रेट और तेल-एलएनजी आयात की चुनौतियां


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। भारत अपनी सीक्रेट डिप्लोमेसी और रणनीतिक कदमों के माध्यम से ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने की कोशिशों में लगा है। हालात ऐसे हैं कि अमेरिका को नाटो देशों से अपील करनी पड़ रही है कि होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने के लिए युद्धपोत भेजें।

    भारत ने इस चुनौती के बीच भी अपने दो तेल टैंकर शिप्स को होर्मुज स्ट्रेट से निकालकर भारतीय समुद्री तट पर पहुंचा दिया है जबकि कई अन्य शिप्स की वापसी की संभावना बनी हुई है। भारत लगभग 85-89 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है और इसमें से पहले लगभग 55 फीसदी तेल होर्मुज स्ट्रेट से होकर आता था। अब यह आंकड़ा लगभग 70 फीसदी तक बढ़ गया है। भारत की दैनिक तेल खपत लगभग 55 लाख बैरल है और यह तेल लगभग 40 देशों से आयात किया जाता है।

    भारत का कच्चा तेल मुख्य रूप से रूस इराक सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से आता है। इसके अलावा अमेरिका से तेल आयात बढ़ा है। खाड़ी और मिडिल ईस्ट में कुवैत कतर ओमान और मिस्र; अफ्रीका में नाइजीरिया अंगोला लीबिया और अल्जीरिया; अमेरिका महाद्वीप में कनाडा मेक्सिको और ब्राजील; मिडिल एशिया में कजाकिस्तान और अजरबैजान भारत के तेल आपूर्तिकर्ता हैं।

    प्राकृतिक गैस की बात करें तो भारत की कुल खपत लगभग 189 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन है जिसमें से घरेलू उत्पादन 97.5 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन है। अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण लगभग 47.4 मिलियन घन मीटर की आपूर्ति प्रभावित हुई है।

    रसोई गैस में भारत लगभग 60 फीसदी आयात पर निर्भर है। इस आयात का करीब 90 फीसदी हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर आता है। हालात प्रभावित होने के बावजूद घरेलू एलपीजी उत्पादन में 25 फीसदी की वृद्धि कर इसे संतुलित किया गया है। भारत मुख्य रूप से कतर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से एलपीजी आयात करता है जबकि अमेरिका भी इस सूची में शामिल हो गया है।

    एलएनजी में भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता कतर है जिससे कुल एलएनजी का 47-50 फीसदी आता है। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात ओमान नाइजीरिया अंगोला ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से भी एलएनजी आती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार होर्मुज स्ट्रेट इसलिए इतना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दुनिया के तेल और गैस व्यापार का मुख्य मार्ग है। यदि यहां किसी तरह की बाधा आती है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और तेल व गैस की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।

    भारत ने रणनीतिक भंडार और वैकल्पिक मार्गों के माध्यम से ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय और द्विपक्षीय सहयोग के जरिए भारतीय समुद्री शिप्स को सुरक्षित मार्ग मुहैया कराया जा रहा है।

  • मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच CBSE ने GCC देशों में 12वीं बोर्ड परीक्षाओं को रद्द किया

    मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच CBSE ने GCC देशों में 12वीं बोर्ड परीक्षाओं को रद्द किया


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल अमेरिका के हालिया संघर्ष के चलते तनावपूर्ण स्थिति बढ़ने के बीच भारतीय दूतावासों ने छात्रों और अभिभावकों के लिए नई एडवाइजरी जारी की है। इस अपडेट में सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) ने 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं को बहरीन ईरान कुवैत ओमान कतर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में रद्द करने की घोषणा की है। यह निर्णय छात्रों की सुरक्षा और शिक्षण गतिविधियों पर पड़ रहे प्रभावों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

    ओमान में भारतीय दूतावास ने बताया कि यह एडवाइजरी पहले जारी 01.03.2026 03.03.2026 05.03.2026 07.03.2026 और 09.03.2026 के सर्कुलरों का अपडेशन है। इन सर्कुलरों के माध्यम से प्रभावित देशों में स्कूलों और संबंधित अधिकारियों से मिले इनपुट और अपील के आधार पर बोर्ड ने 12वीं क्लास की परीक्षाओं की समीक्षा की। बोर्ड ने स्पष्ट किया कि 16 मार्च से लेकर 10 मार्च तक निर्धारित सभी परीक्षाएं रद्द कर दी गई हैं। इसके साथ ही पहले स्थगित की गई परीक्षाओं की तारीखें भी पूरी तरह रद्द होंगी।

    इस निर्णय का उद्देश्य न केवल छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि उनके परिणाम सही समय पर घोषित किए जाएं। एडवाइजरी में यह भी कहा गया कि परीक्षा स्थगित होने के बाद रिजल्ट जारी करने की प्रक्रिया और तरीका बाद में अलग से बताया जाएगा। इससे पहले दूतावास ने कहा था कि सीबीएसई 10 मार्च को स्थिति की पुनः समीक्षा करेगा और 12 मार्च से होने वाली परीक्षाओं के लिए सही निर्णय लेगा।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण ओमान में भारतीय दूतावास ने पहले भी 9 10 और 11 मार्च को होने वाली 12वीं बोर्ड परीक्षाओं को फिलहाल टालने की जानकारी साझा की थी। यह कदम ईरान इजरायल युद्ध और वहां की सुरक्षा स्थिति के मद्देनजर छात्रों और उनके परिवारों के हित में उठाया गया। दूतावास ने यह भी बताया कि सभी संबंधित स्कूलों और अधिकारियों को बोर्ड ने सीधे निर्देश दिए हैं कि परीक्षा स्थगित होने की जानकारी तुरंत छात्रों तक पहुँचाई जाए।

    इस स्थिति से प्रभावित छात्रों और अभिभावकों के लिए राहत की बात यह है कि बोर्ड ने पहले से ही स्पष्ट कर दिया है कि परीक्षाओं के परिणामों को घोषित करने की प्रक्रिया सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से की जाएगी। इस बीच छात्रों को आवश्यकतानुसार ऑनलाइन अध्ययन सामग्री और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा सकता है ताकि उनका अकादमिक नुकसान कम से कम हो।

    इस निर्णय से यह भी साफ हो जाता है कि वैश्विक तनाव और सुरक्षा स्थिति सीधे तौर पर शिक्षा पर प्रभाव डाल सकती है। सीबीएसई का यह कदम छात्रों की सुरक्षा मानसिक शांति और शिक्षण गतिविधियों की निरंतरता को सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।