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  • फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का आंदोलन तेज, स्कूलों में भीड़ और शिक्षकों की कमी से सड़कों पर उतरे छात्र

    फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का आंदोलन तेज, स्कूलों में भीड़ और शिक्षकों की कमी से सड़कों पर उतरे छात्र

    नई दिल्ली ।फ्रांस की राजधानी पेरिस से शुरू हुआ शिक्षा व्यवस्था में सुधार का छात्र आंदोलन अब देश के कई हिस्सों तक फैल गया है। स्कूलों में बढ़ती छात्र संख्या, कक्षाओं की कमी, शिक्षकों की कमी और अन्य सुविधाओं के अभाव को लेकर छात्र सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलन के दौरान अलग-अलग स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच झड़प की घटनाएं भी सामने आई हैं। लेंस शहर में एक स्कूल के पास हुए धमाके में 15 साल का एक छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया। एक अन्य छात्र के सिर में आंसू गैस का गोला लगने और जबड़े में दो जगह फ्रैक्चर होने की जानकारी सामने आई है।

    आंदोलन से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, अब तक करीब 190 छात्र घायल हुए हैं, जबकि पुलिस ने लगभग 5 हजार लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार लोगों में करीब 85 प्रतिशत छात्र नाबालिग बताए गए हैं। छात्र संगठनों ने मंगलवार को होने वाले आंदोलन में अधिक से अधिक लोगों से शामिल होने की अपील की थी। कई शिक्षक संगठनों ने भी प्रदर्शन को समर्थन देने का ऐलान किया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि स्कूलों में छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन उसके अनुपात में कक्षाएं, शिक्षक और दूसरी जरूरी सुविधाएं नहीं बढ़ाई गई हैं।

    आंदोलन के बीच फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्तियन लेकोर्नू ने छात्रों और शिक्षकों की समस्याओं को दूर करने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने का ऐलान किया है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि हिंसक प्रदर्शन के मामले में सरकार की ओर से नरमी नहीं बरती जाएगी। शिक्षा मंत्री एडुआर जॉफ्रे ने बताया कि आंदोलन शुरू होने के बाद से 24 स्कूलों में बड़े स्तर पर तोड़फोड़ की गई और कुछ स्कूलों को आग के हवाले भी किया गया।

    इस आंदोलन की शुरुआत 21 सितंबर को पेरिस के एक स्कूल से हुई थी। छात्रों ने स्कूल में स्टाफ और संसाधनों की कमी को दूर करने की मांग उठाई थी। जब उनकी मांगें पूरी हुईं तो संबंधित छात्रों ने हड़ताल खत्म कर दी, लेकिन तब तक आंदोलन दूसरे इलाकों तक पहुंच चुका था। धीरे-धीरे इसका विस्तार कॉलेज और विश्वविद्यालयों तक भी हो गया। पिछले दो दशकों में फ्रांस के माध्यमिक स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़ी है, जबकि उसके अनुपात में शिक्षकों की संख्या नहीं बढ़ सकी है। इस अवधि में छात्रों की संख्या करीब ढाई लाख बढ़ने की बात सामने आई है।

    फ्रांस में 2010 में करीब साढ़े 8 लाख बच्चों का जन्म हुआ था, जो 1980 के दशक के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा बताया गया है। बच्चों के जन्म में इस बढ़ोतरी के पीछे 30 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में बढ़ी प्रजनन दर को प्रमुख कारण बताया गया है। 2010 में जन्मे बच्चे अब करीब 15 से 16 साल के हो चुके हैं और हाई स्कूलों में पढ़ रहे हैं। छात्रों की संख्या बढ़ने के बावजूद स्कूलों में कक्षाओं, सुविधाओं और शिक्षकों की संख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ी।

    फ्रांस में जारी विरोध केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं है। सरकारी कर्मचारी, फायर फाइटर, शिक्षक और स्वास्थ्यकर्मी भी वेतन बढ़ोतरी समेत अपनी अलग-अलग मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। देश इस समय ईरान और यूक्रेन युद्ध की वजह से आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। फ्रांस पर करीब 4 ट्रिलियन डॉलर का सरकारी कर्ज बताया गया है, जो उसकी सालाना अर्थव्यवस्था के करीब 119 प्रतिशत के बराबर है। आबादी के बूढ़े होने के कारण पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी खर्च भी लगातार बढ़ रहा है।

  • बिहार दरोगा मेंस परीक्षा रद्द होने पर पटना में छात्रों का प्रदर्शन, बैरिकेड तोड़े तो पुलिस ने किया लाठीचार्ज

    बिहार दरोगा मेंस परीक्षा रद्द होने पर पटना में छात्रों का प्रदर्शन, बैरिकेड तोड़े तो पुलिस ने किया लाठीचार्ज

    नई दिल्ली ।बिहार में 1799 पदों के लिए होने वाली दरोगा भर्ती की मुख्य परीक्षा रद्द किए जाने के खिलाफ सोमवार को पटना में अभ्यर्थियों ने जोरदार प्रदर्शन किया। अलग-अलग जिलों से पहुंचे अभ्यर्थी गांधी मैदान में एकत्र हुए और वहां से मुख्यमंत्री आवास की ओर मार्च निकाला। प्रदर्शनकारी जब जेपी गोलंबर के पास पहुंचे तो पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बैरिकेडिंग की। छात्रों ने बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस ने स्थिति नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज किया।

    प्रदर्शन सोमवार सुबह करीब 11:30 बजे गांधी मैदान से शुरू हुआ। बड़ी संख्या में दरोगा भर्ती के अभ्यर्थी वहां जुटे और जेपी गोलंबर की तरफ मार्च करने लगे। जेपी गोलंबर के पास भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। पुलिस ने बैरिकेड लगाकर छात्रों को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया। इसी दौरान प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ दिए और डाकबंगला चौराहे की ओर बढ़ने लगे। इसके बाद पुलिस ने लाठियां भांजकर भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की, जिससे मौके पर भगदड़ की स्थिति बन गई। प्रशासन की ओर से कहा गया कि इस तरह के प्रदर्शन से आम लोगों और यातायात व्यवस्था पर असर पड़ रहा था।

    अभ्यर्थियों का मुख्य विरोध 1799 पदों के लिए आयोजित मुख्य परीक्षा को रद्द किए जाने को लेकर है। करीब 10 हजार अभ्यर्थियों ने यह मेंस परीक्षा पास की थी। प्रदर्शन कर रहे छात्रों का आरोप है कि कुछ लोगों की शिकायतों के आधार पर बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग ने पूरी परीक्षा रद्द कर दी। उनका कहना है कि यदि परीक्षा में किसी स्तर पर गड़बड़ी या भ्रष्टाचार हुआ था तो उसकी जांच कर दोषी अभ्यर्थियों या संबंधित परीक्षा केंद्रों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए थी। छात्रों का तर्क है कि पूरी परीक्षा रद्द करने से उन अभ्यर्थियों को भी नुकसान हो रहा है, जिन्होंने मेहनत से परीक्षा पास की थी।

    अभ्यर्थियों ने अपनी चार महीने की तैयारी और भविष्य को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि मुख्य परीक्षा पास करने के बाद वे पिछले करीब चार महीने से शारीरिक दक्षता परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। कई अभ्यर्थियों के अनुसार उनकी उम्र सीमा समाप्त हो चुकी है या समाप्त होने के करीब है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले छात्रों के लिए पटना में रहकर लगातार तैयारी करना और परिवार से बार-बार आर्थिक मदद लेना भी मुश्किल हो रहा है। ऐसे में भर्ती प्रक्रिया के अंतिम चरण में पहुंचने के बाद मुख्य परीक्षा रद्द होने से उनके सामने भविष्य को लेकर परेशानी खड़ी हो गई है।

    प्रदर्शनकारी छात्रों ने अपनी मांग के समर्थन में चुनाव प्रक्रिया का उदाहरण भी दिया। उनका कहना है कि यदि किसी एक या दो मतदान केंद्रों पर गड़बड़ी मिलती है तो पूरे राज्य का चुनाव रद्द नहीं किया जाता, बल्कि संबंधित बूथ पर दोबारा मतदान कराया जाता है। इसी आधार पर छात्रों ने सवाल उठाया कि परीक्षा में गड़बड़ी की स्थिति में पूरी परीक्षा रद्द करने के बजाय संबंधित स्तर पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई। अभ्यर्थियों ने उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। छात्रों का कहना है कि जब तक मुख्य परीक्षा रद्द करने का आदेश वापस लेकर शारीरिक परीक्षा की नई तारीख घोषित नहीं की जाती, तब तक उनका विरोध जारी रहेगा।

  • 5 साल में 23 IIT में 45 छात्रों ने की आत्महत्या, 28 SC-ST-OBC वर्ग से, IIT हैदराबाद में सबसे ज्यादा 7 मौतें

    5 साल में 23 IIT में 45 छात्रों ने की आत्महत्या, 28 SC-ST-OBC वर्ग से, IIT हैदराबाद में सबसे ज्यादा 7 मौतें


    नई दिल्ली। देश के 23 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) में 2020-21 से 2024-25 के बीच 45 छात्रों की आत्महत्या से मौत हुई। लोकसभा में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इनमें 28 छात्र SC, ST और OBC वर्ग से थे। यानी कुल आत्महत्याओं में इन तीन सामाजिक वर्गों के छात्रों की हिस्सेदारी करीब 62% रही। ये आंकड़े देश के सभी 23 IIT से जुटाई गई जानकारी के आधार पर तैयार किए गए हैं।

    सालवार आंकड़ों में 2023-24 सबसे ज्यादा मौतों वाला वर्ष रहा। इस दौरान 16 छात्रों ने आत्महत्या की, जबकि 2022-23 में यह संख्या छह थी। 2024-25 में भी 13 छात्रों की आत्महत्या दर्ज की गई।

    IIT हैदराबाद में सबसे ज्यादा मौतें

    संस्थानवार आंकड़ों में IIT हैदराबाद में पांच साल के दौरान सबसे ज्यादा सात छात्रों की आत्महत्या दर्ज की गई। इसके बाद IIT खड़गपुर, IIT दिल्ली और IIT कानपुर में छह-छह छात्रों ने जान गंवाई।

    वहीं IIT मद्रास में पांच और IIT (BHU) वाराणसी में चार छात्रों की आत्महत्या दर्ज की गई। बाकी IIT में दर्ज मामलों की संख्या इससे कम रही।

    OBC के 12, SC के 9 और ST के 7 छात्र

    सरकारी आंकड़ों में सामाजिक वर्ग के आधार पर भी मौतों का विवरण दिया गया है। पांच साल में आत्महत्या करने वाले 45 छात्रों में 12 OBC, 9 SC और 7 ST वर्ग से थे। इसके अलावा 16 छात्र सामान्य वर्ग से थे, जबकि एक छात्र EWS वर्ग से था।

    केवल 2024-25 के आंकड़ों को देखें तो उस वर्ष आत्महत्या करने वाले 13 छात्रों में चार OBC, तीन ST और दो SC वर्ग से थे। वहीं चार छात्र सामान्य वर्ग के थे।

    इस तरह 2024-25 में भी SC, ST और OBC वर्ग के छात्रों की संख्या कुल आत्महत्या के मामलों में उल्लेखनीय रही।

    45 आत्महत्याओं के अलावा 8 अस्वाभाविक मौतें

    सरकारी आंकड़ों में पांच साल की अवधि में आत्महत्या के 45 मामलों के अलावा आठ अन्य मौतों का भी उल्लेख है। इन्हें अस्वाभाविक मौत की श्रेणी में रखा गया है और आत्महत्या के 45 मामलों में शामिल नहीं किया गया है।

    हालांकि, उपलब्ध सरकारी आंकड़ों में इन छात्रों के कोर्स, अध्ययन के वर्ष या मौत के पीछे संभावित कारणों की जानकारी नहीं दी गई है। इसलिए केवल संख्या और सामाजिक वर्ग के आंकड़ों के आधार पर आत्महत्या के कारणों के संबंध में कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

    यह जानकारी 8 दिसंबर 2025 को लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में उपलब्ध कराए गए सरकारी आंकड़ों पर आधारित है। आंकड़े 2020-21 से 2024-25 तक देश के सभी 23 IIT से संबंधित हैं।

  • कुणाल चौधरी ने छात्रों, किसानों और आम जनता के मुद्दों पर सरकार से मांगी जवाबदेही

    कुणाल चौधरी ने छात्रों, किसानों और आम जनता के मुद्दों पर सरकार से मांगी जवाबदेही

    मध्यप्रदेश: कांग्रेस के सचिव कुणाल चौधरी ने इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शामिल हुए छात्र-छात्राओं का आभार जताते हुए युवाओं और किसानों से जुड़े कई मुद्दे उठाए। उन्होंने कार्यक्रम की सफलता के लिए राहुल गांधी का भी आभार व्यक्त किया। चौधरी ने कहा कि युवाओं ने अपने भविष्य और अधिकारों से जुड़े सवाल मजबूती से सामने रखे हैं।

    उन्होंने कहा कि इंदौर की अर्थव्यवस्था में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन प्रदेश में पढ़े-लिखे युवा रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक और वेतन से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। उनका कहना था कि परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी का सीधा असर मेहनत करने वाले विद्यार्थियों और अभ्यर्थियों के भविष्य पर पड़ता है।

    चौधरी ने पेपर लीक के मामलों में जवाबदेही तय करने के लिए बोर्ड बनाने और प्रभावित अभ्यर्थियों को मुआवजा देने की मांग की। उन्होंने कहा कि युवाओं को बार-बार परीक्षा शुल्क भरकर परीक्षाओं की तैयारी करनी पड़ती है, लेकिन व्यवस्था की गलती सामने आने पर उनकी परेशानी और बढ़ जाती है।

    उन्होंने कहा कि युवाओं को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने पर कार्रवाई का सामना करने के बजाय उनकी समस्याओं का नीतिगत समाधान मिलना चाहिए। रोजगार और वेतन से जुड़े मामलों में सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

    चौधरी ने भागीरथपुरा मामले और छिंदवाड़ा में जहरीले कफ सिरप से बच्चों की मौत के मुद्दे पर भी सवाल उठाए। उन्होंने जिम्मेदारी तय करने और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की। साथ ही ड्रग से जुड़े मामलों में पूरे नेटवर्क की जांच करने तथा किसी अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका सामने आने पर जवाबदेही तय करने की बात कही।

    सागर में जहरीली शराब से हुई मौतों का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने कहा कि केवल छोटे आरोपियों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। प्रशासनिक लापरवाही या सरकारी तंत्र की विफलता सामने आने पर संबंधित अधिकारियों और राजनीतिक स्तर पर भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उन्होंने सरकारी धन के नुकसान की स्थिति में जिम्मेदार लोगों से उसकी वसूली की मांग की।

    भोपाल के 90 डिग्री ब्रिज से जुड़े मुद्दे पर भी चौधरी ने सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा। उन्होंने कहा कि राजधानी से जुड़े महत्वपूर्ण अधोसंरचना संबंधी सवालों पर जनता को समयबद्ध जानकारी मिलनी चाहिए।

    किसानों के मुद्दे पर उन्होंने सोयाबीन की फसल में मौसम और बीमारी से हुए नुकसान का उल्लेख किया। चौधरी ने पीले मोजेक सहित फसल खराब होने की शिकायतों के बीच तत्काल सर्वे और प्रभावित किसानों को राहत देने की मांग की।

    उन्होंने एक बीघा में 12 क्विंटल सोयाबीन उत्पादन के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि वास्तविक स्थिति खेतों में जाकर देखी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कई किसान कम उत्पादन और फसल खराब होने की शिकायत कर रहे हैं।

    सोयाबीन के न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर चौधरी ने कहा कि सरकार ने 5,700 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी की बात कही है, लेकिन किसानों को इससे कम कीमत पर उपज बेचने की स्थिति क्यों बन रही है। उन्होंने भावांतर योजना के पंजीयन, भुगतान और वास्तविक लाभ को लेकर भी स्पष्टता की मांग की।

    उन्होंने कहा कि सोयाबीन की कटाई शुरू होने से पहले प्रभावित क्षेत्रों का सर्वे होना जरूरी है। फसल कट जाने के बाद सर्वे होने पर वास्तविक नुकसान का आकलन मुश्किल हो सकता है। चौधरी ने उचित एमएसपी, समय पर सर्वे, फसल नुकसान का मुआवजा और सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ सुनिश्चित करने की मांग की।

    चौधरी ने भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा पर भी आरोप लगाए और कहा कि नेताओं को विवाद और विभाजन के बजाय युवाओं, किसानों, रोजगार, शिक्षा और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनता अब केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि जवाबदेही और कार्रवाई चाहती है।

  • इंदौर में छात्राओं की समस्याओं पर राहुल गांधी ने सरकार से मांगा जवाब, बोले- रहने की जगह नहीं मिलने से पढ़ाई छूटती है

    इंदौर में छात्राओं की समस्याओं पर राहुल गांधी ने सरकार से मांगा जवाब, बोले- रहने की जगह नहीं मिलने से पढ़ाई छूटती है

    इंदौर : लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने छात्रों के लिए बुनियादी सुविधाओं और छात्रावासों की कमी का मुद्दा उठाते हुए सरकार से सवाल किया है। उन्होंने इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान एक छात्रा की ओर से पूछे गए सवाल का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार के पास दीये जलाने के लिए पैसा है, लेकिन छात्रों के लिए हॉस्टल बनाने के लिए क्यों नहीं है।

    राहुल गांधी ने कहा कि यह सवाल उनसे इंदौर में एक छात्रा ने पूछा था। उनके मुताबिक छात्रा गांव से उच्च शिक्षा के लिए शहर आई है, लेकिन उसे रहने के लिए हॉस्टल नहीं मिला। ऐसे में उसे पीजी में रहना पड़ रहा है। छात्रा ने रहने और सुरक्षित रहने की लागत को लेकर अपनी परेशानी सामने रखी।

    राहुल गांधी ने इसी सवाल के आधार पर छात्राओं के सामने आने वाली आवास संबंधी समस्याओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि गांवों से शहरों में पढ़ाई के लिए आने वाली कई छात्राओं के सामने रहने की व्यवस्था एक बड़ी चुनौती बन जाती है। हॉस्टल की सुविधा उपलब्ध नहीं होने पर उन्हें निजी आवास या पीजी पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।

    उन्होंने कहा कि युवा देश का भविष्य हैं और किसी भी देश की मजबूती में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। राहुल गांधी ने छात्रों की जिज्ञासा और सवाल पूछने की क्षमता को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके मुताबिक छात्रों में सबसे बड़ा गुण सवाल पूछने का होना चाहिए, क्योंकि सवालों के जरिए व्यवस्था से जवाब मांगा जा सकता है।

    राहुल गांधी ने छात्राओं की शिक्षा से जुड़े आवास और सुरक्षा के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने कहा कि कई लड़कियां केवल इसलिए पढ़ाई छोड़ देती हैं क्योंकि उनके लिए रहने की उचित जगह उपलब्ध नहीं होती। उनके अनुसार उच्च शिक्षा के लिए घर से दूर जाने वाली छात्राओं के सामने पढ़ाई के साथ सुरक्षित आवास की चिंता भी बनी रहती है।

    उन्होंने सरकार से छात्रावासों और छात्रों के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे को लेकर जवाब मांगा। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए छात्रा के सवाल का जवाब देने की मांग की और कहा कि सरकार को युवाओं की शिक्षा तथा उनके रहने की जरूरतों पर ध्यान देना चाहिए।

    राहुल गांधी ने आवास सहायता से जुड़े मुद्दे का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि छात्रों के लिए मिलने वाली आवास संबंधी सहायता बढ़ती महंगाई के अनुरूप पर्याप्त नहीं है और इसके साथ अनियमितताओं की समस्या भी जुड़ी हुई है। उन्होंने इस विषय पर भी सरकार से जवाब मांगा।

    इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शिक्षा, रोजगार और छात्रों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। इसी दौरान छात्रावासों की कमी और छात्राओं की सुरक्षा का विषय भी सामने आया। राहुल गांधी ने कहा कि विद्यार्थियों की समस्याओं को सुनना और उनके सवालों पर जवाब मांगना जरूरी है।

    उन्होंने छात्राओं के लिए सुरक्षित और किफायती आवास की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा हासिल करने के लिए शहरों में आने वाले विद्यार्थियों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कठिनाइयों का सामना नहीं करना चाहिए। उनके बयान में छात्रावासों की उपलब्धता को उच्च शिक्षा और छात्र सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण विषय के रूप में सामने रखा गया।

  • इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम पर सियासी घमासान, मंच पर बुलाए गए छात्रों की पृष्ठभूमि पर भाजपा ने उठाए सवाल

    इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम पर सियासी घमासान, मंच पर बुलाए गए छात्रों की पृष्ठभूमि पर भाजपा ने उठाए सवाल

    मध्य प्रदेश: के इंदौर में शनिवार को आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान कुछ छात्रों को मंच पर बुलाकर उनकी समस्याएं और रोजगार से जुड़े मुद्दे सामने रखने का अवसर दिया गया। अब मंच पर पहुंचे कुछ युवाओं की कथित राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर सवाल उठाए हैं।

    भाजपा का आरोप है कि कार्यक्रम में सामान्य छात्रों के रूप में जिन युवाओं को मंच पर संवाद के लिए बुलाया गया, उनमें कुछ कांग्रेस से जुड़े पदाधिकारी या कार्यकर्ता रहे हैं। भाजपा नेताओं ने सोशल मीडिया पर कुछ पुराने दस्तावेजों और तस्वीरों का हवाला देते हुए दावा किया कि मंच पर मौजूद युवाओं की राजनीतिक संबद्धता पहले से सामने रही है। पार्टी ने इसे कार्यक्रम की विश्वसनीयता से जोड़ते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा है।

    कार्यक्रम में तीन नाम विशेष रूप से चर्चा में आए हैं। इनमें तनय शर्मा, राधा मालवीय और रणजीत किसानवंशी शामिल हैं। भाजपा की ओर से दावा किया गया है कि तनय शर्मा कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई के प्रवक्ता हैं। पार्टी नेताओं ने उनके राजनीतिक पद से संबंधित जानकारी को सार्वजनिक करते हुए सवाल उठाया कि यदि वे कांग्रेस की छात्र राजनीति से जुड़े हैं तो उन्हें सामान्य परीक्षार्थी के तौर पर मंच पर क्यों बुलाया गया।

    इसी तरह भाजपा ने राधा मालवीय को लेकर भी दावा किया है कि वह निर्वाचित जिला पंचायत सदस्य होने के साथ युवा कांग्रेस की प्रदेश महासचिव की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। भाजपा नेताओं ने उनकी राजनीतिक भूमिका का उल्लेख करते हुए कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी और मंच पर संवाद को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

    तीसरे नाम के तौर पर रणजीत किसानवंशी का उल्लेख किया गया है। भाजपा ने उन्हें कांग्रेस का सक्रिय कार्यकर्ता बताया है। इसके समर्थन में पार्टी नेताओं ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी के साथ उनकी पुरानी तस्वीरों का हवाला दिया है। भाजपा का कहना है कि इन तस्वीरों और राजनीतिक गतिविधियों से उनकी कांग्रेस से संबद्धता का संकेत मिलता है।

    भाजपा नेताओं ने पूरे मामले को लेकर राहुल गांधी और कांग्रेस पर तीखा राजनीतिक हमला किया। उनका आरोप है कि युवाओं की समस्याओं पर सीधे संवाद के लिए आयोजित कार्यक्रम में पार्टी से जुड़े लोगों को छात्रों के रूप में मंच पर प्रस्तुत किया गया और उनसे पहले से तय तरीके से बातचीत कराई गई।

    भाजपा प्रवक्ताओं ने आरोपों के आधार पर कार्यक्रम की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि यदि मंच पर मौजूद लोगों की राजनीतिक पहचान पहले से कांग्रेस से जुड़ी थी, तो कार्यक्रम में उन्हें सामान्य छात्रों के रूप में प्रस्तुत करने का उद्देश्य स्पष्ट किया जाना चाहिए।

    हालांकि, इन आरोपों पर खबर लिखे जाने तक कांग्रेस की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया था। ऐसे में मंच पर आए तीनों युवाओं की भूमिका और कार्यक्रम में उनके चयन को लेकर लगाए गए राजनीतिक दावों पर कांग्रेस का पक्ष सामने आना बाकी है। विवाद के बाद इंदौर के इस आयोजन को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।

  • जीतू पटवारी का मुख्यमंत्री मोहन यादव पर तंज, बोले- 800 दिन बचे हैं, अब सस्ती शिक्षा और छात्रों के मुद्दों पर काम करें

    जीतू पटवारी का मुख्यमंत्री मोहन यादव पर तंज, बोले- 800 दिन बचे हैं, अब सस्ती शिक्षा और छात्रों के मुद्दों पर काम करें

    मध्य प्रदेश: कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इंदौर में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पर निशाना साधा। पटवारी ने मुख्यमंत्री से सस्ती और सुलभ शिक्षा सुनिश्चित करने की अपील करते हुए कहा कि उनके कार्यकाल के अब करीब 800 दिन बचे हैं। उन्होंने कहा कि इस समय का इस्तेमाल जनता और छात्रों से जुड़े मुद्दों पर काम करने के लिए किया जाना चाहिए।

    पटवारी ने मुख्यमंत्री को संबोधित करते हुए कहा कि प्रदेश के विद्यार्थियों के लिए सस्ती शिक्षा उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को बिना समय गंवाए शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में काम करना चाहिए। उनके मुताबिक सत्ता और पद पर रहने का समय तेजी से गुजरता है, इसलिए सरकार को शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्राथमिकता से ध्यान देना चाहिए।

    कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने अपने बयान में मुख्यमंत्री के राजनीतिक हालात का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के पास अब सीमित समय बचा है और उन्हें इस अवधि में जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। पटवारी ने शिक्षा को छात्रों के भविष्य से सीधे जुड़ा विषय बताते हुए सरकार से इस दिशा में ठोस काम करने की अपील की।

    इसी दौरान जीतू पटवारी ने प्रदेशभर में ‘छात्रों की गूंज’ अभियान चलाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में मध्य प्रदेश के हर जिले में इस नाम से कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। अभियान के जरिए छात्रों और उनके अभिभावकों को सीधे तौर पर जोड़े जाने की बात कही गई है।

    पटवारी ने कार्यक्रम की रूपरेखा बताते हुए कहा कि ‘छात्रों की गूंज’ किसी राजनीतिक दल या कांग्रेस के बैनर तले आयोजित नहीं किया जाएगा। इसमें छात्रों और उनके अभिभावकों की भागीदारी होगी। अभियान का उद्देश्य शिक्षा और छात्रों से जुड़े मुद्दों को सामने लाना तथा उनके भविष्य से संबंधित विषयों पर चर्चा करना बताया गया है।

    उन्होंने सरकार से अपील करते हुए कहा कि छात्रों से जुड़े गंभीर मुद्दों पर अब काम शुरू किया जाना चाहिए। पटवारी ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि विद्यार्थियों के हित और उनके भविष्य से जुड़े विषयों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

    ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को प्रदेश के सभी जिलों तक ले जाने की घोषणा के साथ पटवारी ने छात्रों और अभिभावकों की सीधी भागीदारी पर जोर दिया। उनके अनुसार यह कार्यक्रम शिक्षा से जुड़े मुद्दों को सामने लाने का माध्यम बनेगा और विद्यार्थियों की समस्याओं पर चर्चा की जाएगी।

    इंदौर में हुई पत्रकार वार्ता के दौरान पटवारी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने सस्ती शिक्षा का मुद्दा प्रमुखता से रखा। उन्होंने कहा कि सरकार को अपने बचे हुए कार्यकाल में शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए और छात्रों के भविष्य से जुड़े विषयों पर प्रभावी कदम उठाने चाहिए।

    इस पूरे अभियान के जरिए छात्रों और अभिभावकों को शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर जोड़ने की योजना बताई गई है। पटवारी ने कहा कि सरकार को जनहित के मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए और छात्रों के भविष्य से संबंधित समस्याओं के समाधान की दिशा में काम करना चाहिए।

  • अमेरिका में विदेशी छात्रों के OPT पर 1 लाख डॉलर फीस का प्रस्ताव, भारतीय छात्रों के लिए बढ़ सकती है नौकरी की लागत

    अमेरिका में विदेशी छात्रों के OPT पर 1 लाख डॉलर फीस का प्रस्ताव, भारतीय छात्रों के लिए बढ़ सकती है नौकरी की लागत

    नई दिल्ली ।अमेरिका में पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्रों के लिए पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी का रास्ता महंगा होने की संभावना है। ट्रंप प्रशासन ने Optional Practical Training यानी OPT से संबंधित करीब 1 लाख डॉलर की फीस लगाने का प्रस्ताव रखा है। भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग 96 लाख रुपये बताई गई है। प्रस्ताव को व्हाइट हाउस की मंजूरी मिल चुकी है और अब इसे आगे नियम के रूप में लाया जा सकता है।

    OPT अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों को अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सीमित अवधि तक काम करने की अनुमति देता है। इसका उद्देश्य छात्रों को उनके अध्ययन से जुड़े क्षेत्र में व्यावहारिक अनुभव हासिल करने का अवसर देना है। आम तौर पर OPT के तहत छात्र 12 महीने तक काम कर सकते हैं। STEM यानी साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स से जुड़े पाठ्यक्रमों के छात्रों को इसके अलावा 24 महीने का अतिरिक्त समय मिल सकता है। इस तरह पात्र छात्रों को पढ़ाई के बाद कुल तीन साल तक काम करने का अवसर मिल सकता है।

    प्रस्तावित बदलाव के तहत OPT से जुड़ी फीस 1 लाख डॉलर निर्धारित करने की बात सामने आई है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इतनी बड़ी रकम का भुगतान कौन करेगा। डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी के प्रस्ताव में इस जिम्मेदारी को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं होने की बात कही गई है।

    फीस का भुगतान छात्र को करना होगा या उसे नौकरी देने वाली कंपनी को, यह फिलहाल तय नहीं है। कुछ कानूनी जानकारों के मुताबिक, OPT वाले विदेशी छात्र को नौकरी देने वाली कंपनी पर यह खर्च डाला जा सकता है। वहीं, इस बात को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं कि यदि भुगतान की जिम्मेदारी विश्वविद्यालयों पर आती है तो किसी दूसरी कंपनी में काम करने वाले छात्र के लिए कॉलेज इतनी बड़ी राशि क्यों वहन करेगा।

    प्रस्तावित फीस भारतीय छात्रों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद OPT के जरिए नौकरी करना वहां काम का अनुभव हासिल करने का एक प्रमुख रास्ता है। इसी अवधि में कुछ छात्रों को आगे चलकर नियोक्ता की मदद से H-1B वीजा के लिए अवसर मिल सकता है।

    यदि प्रस्तावित 1 लाख डॉलर की राशि छात्रों को स्वयं देनी पड़ती है, तो पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में नौकरी शुरू करना उनके लिए काफी महंगा हो सकता है। यदि इसका भुगतान कंपनियों या विश्वविद्यालयों को करना पड़ता है, तो इसका असर विदेशी छात्रों की भर्ती और रोजगार के अवसरों पर भी पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

    प्रस्ताव का असर केवल छात्रों तक सीमित रहने की बात भी सामने आई है। यदि विश्वविद्यालयों पर बड़ी वित्तीय जिम्मेदारी आती है, तो कुछ संस्थान विदेशी छात्रों की संख्या कम करने पर विचार कर सकते हैं। इससे अमेरिका में विदेशी छात्रों के लिए उपलब्ध अध्ययन विकल्पों पर असर पड़ सकता है। इसी तरह कंपनियों को भी विदेशी छात्रों से मिलने वाले प्रशिक्षित प्रतिभाशाली कर्मचारियों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पिछले साल करीब 3 लाख विदेशी छात्रों के पास OPT के जरिए अमेरिका में नौकरी करने की अनुमति थी। ऐसे में प्रस्तावित फीस का दायरा बड़ी संख्या में छात्रों तक पहुंच सकता है। फिलहाल प्रस्ताव से जुड़े प्रमुख सवालों में यह शामिल है कि 1 लाख डॉलर की फीस का भुगतान कौन करेगा और अंतिम नियम लागू होने पर उसकी वास्तविक शर्तें क्या होंगी।

  • उन्नाव के स्कूल में हेड मास्टर पर बच्चों की पिटाई और निजी काम कराने के गंभीर आरोप, वायरल वीडियो से मचा हड़कंप

    उन्नाव के स्कूल में हेड मास्टर पर बच्चों की पिटाई और निजी काम कराने के गंभीर आरोप, वायरल वीडियो से मचा हड़कंप

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है. पुरवा तहसील के मदारपुर जूनियर स्कूल के हेड मास्टर पर स्कूली बच्चों को बेरहमी से पीटने का आरोप लगा है. साथ ही, उनका मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न करने का भी गंभीर आरोप लगा है. इस घटना से जुड़ा एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने शिक्षा विभाग की कार्यशैली और बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

    छोटी-छोटी बातों पर बर्बरता के आरोप

    पीड़ित बच्चों के परिजनों के अनुसार, स्कूल के हेड मास्टर मासूम बच्चों से अपने व्यक्तिगत और गैर-शैक्षणिक काम करवाते थे. आरोप है कि अगर कोई स्टूडेंट उन्हें ‘गुड मॉर्निंग’ बोलना भूल जाता था, तो उसकी बेरहमी से पिटाई की जाती थी. इसके अलावा, हेड मास्टर बच्चों से अपनी निजी गाड़ी धुलवाता और टॉयलेट में पानी डालने जैसे काम भी जबरन करवाते थे. इन कामों को करने में जरा सी भी चूक होने पर बच्चों को बेरहमी से प्रताड़ित किया जाता था.

    परिजनों ने एसडीएम से की शिकायत

    जब बच्चों ने अपने साथ हो रही इस बर्बरता की जानकारी घर पर दी, तो परिजनों का गुस्सा फूट पड़ा. घटना से आक्रोशित परिजनों ने एसडीएम पुरवा से मुलाकात कर आरोपी हेड मास्टर के खिलाफ शिकायत की. परिजनों ने वायरल वीडियो का हवाला देते हुए आरोपी हेड मास्टर के खिलाफ कड़े कानूनी कदम उठाने की मांग की है. एसडीएम ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के बाद सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया है.

    शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

    सरकारी स्कूलों में बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुरक्षित माहौल देने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन मदारपुर जूनियर स्कूल की इस घटना ने सरकारी दावों की पोल खोलकर रख दी है. स्कूल में शिक्षा लेने जाने वाले मासूमों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार न केवल उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है, बल्कि उनके मन में शिक्षा के प्रति खौफ भी पैदा करता है. फिलहाल, इस वायरल वीडियो और परिजनों की शिकायत के बाद बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) स्तर पर क्या कार्रवाई होती है ये देखने वाली बात होगी.

  • जंतर-मंतर पर छात्रों पर लाठीचार्ज को जस्टिस उज्जल भुइयां ने बताया चिंताजनक, पुलिस से निष्पक्षता और संयम बरतने की अपील

    जंतर-मंतर पर छात्रों पर लाठीचार्ज को जस्टिस उज्जल भुइयां ने बताया चिंताजनक, पुलिस से निष्पक्षता और संयम बरतने की अपील

    नई दिल्ली ।जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों और युवाओं पर पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने चिंता जताई है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज को परेशान करने वाली घटना बताया और कहा कि अलग विचार रखने वाले छात्रों के खिलाफ दंडात्मक रवैया नहीं अपनाया जाना चाहिए। उन्होंने पुलिस की भूमिका को लेकर निष्पक्षता, संयम और जनता के भरोसे को बेहद महत्वपूर्ण बताया।

    जस्टिस भुइयां ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों और युवाओं को अपने विचार रखने तथा विरोध दर्ज कराने का अधिकार है। यदि कोई छात्र किसी मुद्दे पर अलग राय रखता है तो उसके साथ ऐसी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, जिससे उसके अधिकार प्रभावित हों। उन्होंने प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ कथित कठोर व्यवहार को निराशाजनक बताया।

    उन्होंने पुलिस अधिकारियों की निष्पक्षता को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उनके मुताबिक पुलिस से यह अपेक्षा की जाती है कि वह कानून को समान रूप से लागू करे और किसी भी परिस्थिति में निष्पक्षता बनाए रखे। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पुलिस की इस भूमिका पर सवाल उठना गंभीर चिंता का विषय है।

    जस्टिस भुइयां ने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके लिए जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। पुलिस को परिस्थितियों को समझते हुए संयमित तरीके से कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस और आम नागरिकों के बीच विश्वास बना रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी है।

    उन्होंने कहा कि आम लोगों के लिए वर्दी पहने पुलिसकर्मी सरकार की शक्ति और अधिकार का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि होता है। जब किसी नागरिक को परेशानी होती है तो वह सहायता के लिए पुलिस के पास जाता है। ऐसे में पुलिस की विश्वसनीयता कमजोर होना समाज और कानून व्यवस्था दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

    जस्टिस भुइयां ने यह भी कहा कि यदि सरकार के अधिकारी ही कानून का उल्लंघन करने लगें तो इसका व्यापक असर पड़ता है। ऐसी स्थिति में लोगों के बीच कानून के प्रति सम्मान कम हो सकता है और अराजकता को बढ़ावा मिलने का खतरा रहता है। उन्होंने कहा कि किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक देश में सरकारी अधिकारियों से कानून का पालन करने की अपेक्षा की जाती है।

    उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मामलों में पीड़ितों को मुआवजा दिए जाने की आवश्यकता को स्वीकार किया है। उनके मुताबिक, राज्य की संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके।

    जस्टिस भुइयां ने ये बातें पूर्व सुरक्षा सचिव यशोवर्धन आजाद की पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में कहीं। राजधानी में आयोजित कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा के युवा अधिकारियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब ऐसे अधिकारी प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट करते दिखाई देते हैं तो यह निराशाजनक स्थिति होती है।

    छात्रों के विरोध के अधिकार को लेकर इससे पहले मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत भी टिप्पणी कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि छात्रों को किसी भी मुद्दे पर विरोध करने का अधिकार है। लॉ संस्थान के छात्रों के पंजीकरण पर रोक लगाने से जुड़े एक मामले में भी उन्होंने छात्रों के अधिकारों के संरक्षण पर जोर दिया था।

    जस्टिस भुइयां की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की भूमिका, बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों को लेकर बहस जारी है। उनकी टिप्पणियों में कानून व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने तथा पुलिस की निष्पक्षता पर विशेष जोर दिया गया।