Tag: Supreme Court

  • बिना बताए दूसरे राज्य से आरोपी लाना: क्या पुलिस भी हो सकती है गिरफ्तार?

    बिना बताए दूसरे राज्य से आरोपी लाना: क्या पुलिस भी हो सकती है गिरफ्तार?


    नई दिल्ली । हाल ही में शिमला में यूथ कांग्रेस के तीन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के दौरान यह सवाल फिर से उभरा कि क्या एक राज्य की पुलिस दूसरे राज्य से आरोपी को बिना सूचना दिए ले जा सकती है। मंगलवार रात दिल्ली और हरियाणा पुलिस की टीम ने रोहड़ू इलाके से तीन लोगों को हिरासत में लिया और उन्हें दिल्ली ले जाने लगी। बुधवार सुबह हिमाचल प्रदेश पुलिस ने रास्ते में गाड़ियों को रोककर पूछताछ की। अंततः ट्रांजिट रिमांड मिलने के बाद आरोपी दिल्ली ले जाए गए।

    दूसरे राज्य से गिरफ्तारी के नियम

    भारत में एक राज्य की पुलिस दूसरे राज्य में जाकर गिरफ्तारी कर सकती है लेकिन इसके लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। इसे नियंत्रित करते हैं दंड प्रक्रिया संहिता और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश जैसे कि डी.के. बसु बनाम राज्य मामला।

    इंटर-स्टेट गिरफ्तारी के नियम इस प्रकार हैं

    स्थानीय पुलिस को पूर्व सूचना देना जिस राज्य में गिरफ्तारी करनी है वहां के थाने को पहले जानकारी देना आवश्यक है।ट्रांजिट रिमांड लेना आरोपी को नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है और ट्रांजिट रिमांड मिलना चाहिए। यह कानूनी अनुमति है जिससे आरोपी को दूसरे राज्य ले जाया जा सकता है।स्थानीय पुलिस स्टेशन में रिकॉर्ड दर्ज करना गिरफ्तारी की पूरी जानकारी डायरी में दर्ज करनी होती है।पुलिस अधिकारियों की पहचान स्पष्ट होना गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी वर्दी में हों पहचान पत्र दिखाएं और अपनी पहचान स्पष्ट करें।

    नियम तोड़ने पर परिणाम

    अगर पुलिस बिना स्थानीय पुलिस को बताए और ट्रांजिट रिमांड लिए आरोपी को ले जाती है तो ऐसी गिरफ्तारी अवैध मानी जाएगी। परिणामस्वरूप संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अपहरण गैरकानूनी हिरासत या बंधक बनाने के आरोप लग सकते हैं।सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का उल्लंघन अदालत की अवमानना माना जा सकता है। विभागीय जांच निलंबन या अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई भी संभव है।

  • वोटिंग अनिवार्य बनाने पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, NOTA की उपयोगिता पर जताई शंका

    वोटिंग अनिवार्य बनाने पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, NOTA की उपयोगिता पर जताई शंका


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट ने मतदान को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए अधिक से अधिक नागरिकों का मतदान केंद्र तक पहुंचना जरूरी है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि वोटिंग को अनिवार्य बनाने जैसे उपायों पर विचार किया जा सकता है, ताकि लोग अपने मताधिकार का सक्रिय रूप से इस्तेमाल करें।

    यह टिप्पणी उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें मांग की गई है कि यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में केवल एक उम्मीदवार ही मैदान में हो, तब भी उसे निर्विरोध विजयी घोषित करने के बजाय चुनाव कराया जाए, ताकि मतदाता “इनमें से कोई नहीं” (NOTA) का विकल्प चुन सकें।


    अदालत ने पूछा—क्या NOTA से बदली है स्थिति?

    सुनवाई के दौरान पीठ ने यह सवाल उठाया कि NOTA लागू होने के बाद क्या वास्तव में:

    • मतदान प्रतिशत में वृद्धि हुई है?

    • उम्मीदवारों की गुणवत्ता में सुधार देखने को मिला है?

    अदालत ने कहा कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि कोई प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए—बहुत कठोर नहीं, लेकिन ऐसी कि नागरिक मतदान के लिए प्रेरित हों।


    ग्रामीण बनाम शहरी मतदान पर भी चर्चा

    सुनवाई के दौरान यह भी उल्लेख किया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान को अक्सर एक उत्सव की तरह देखा जाता है। लोग समूह में मतदान करने जाते हैं, जबकि अनुभव बताता है कि शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग कई बार मतदान में अपेक्षाकृत कम भागीदारी करता है।


    किस प्रावधान को दी गई है चुनौती?

    याचिका में जनप्रतिनिधित्व कानून की उस धारा को चुनौती दी गई है, जिसके तहत यदि चुनाव मैदान में केवल एक उम्मीदवार रह जाता है, तो उसे बिना मतदान के निर्वाचित घोषित किया जा सकता है।

    याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस स्थिति में मतदाताओं को NOTA का विकल्प प्रयोग करने का अवसर ही नहीं मिलता, जिससे लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति सीमित हो जाती है।


    याचिकाकर्ताओं का पक्ष

    याचिका में कहा गया कि यदि NOTA के परिणामों को वास्तविक प्रभाव दिया जाए, तो अधिक मतदाता मतदान के लिए प्रेरित होंगे। वर्तमान व्यवस्था में NOTA चुनने का कोई प्रत्यक्ष परिणाम नहीं निकलता, जिससे मतदाताओं का उत्साह कम होता है।


    व्यापक बहस की शुरुआत

    अदालत की इन टिप्पणियों ने अनिवार्य मतदान, मतदाता सहभागिता और NOTA की प्रभावशीलता जैसे मुद्दों पर नई बहस छेड़ दी है। मामला अभी विचाराधीन है और आगे की सुनवाई में इस पर विस्तृत कानूनी विमर्श होने की संभावना है।

  • सहारा समूह पर बड़ा निवेशक घोटाला: मध्य प्रदेश में लगभग 6,689 करोड़ रुपए की राशि के गबन के 9 लाख से अधिक शिकायत आवेदन मिले

    सहारा समूह पर बड़ा निवेशक घोटाला: मध्य प्रदेश में लगभग 6,689 करोड़ रुपए की राशि के गबन के 9 लाख से अधिक शिकायत आवेदन मिले

    भोपाल । मध्य प्रदेश सहारा समूह से जुड़े निवेशकों की रकम के गबन का बड़ा मामला सामने आया है। राज्य सरकार को कुल लगभग 9 लाख से अधिक शिकायती आवेदन प्राप्त हुए हैं जिनमेंकुल 6 689 करोड़ रुपए की राशि के निवेशकों के साथ गबन होने का दावा किया गया है। यह जानकारी आज विधानसभा में राज्य मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल ने गृह विभाग की ओर से दी।

    मध्य प्रदेश विधानसभा के प्रश्नकाल के दौरान कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह ने सहारा समूह को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने सरकार से पूछा कि प्रदेश में सहारा के निवेशकों की राशि के संबंध में कुल कितनी शिकायतें मिली हैं और कितना पैसा निवेशकों को वापस मिला है। इसके उत्तर में राज्य मंत्री पटेल ने बताया कि सरकार को 9 06 661 शिकायत आवेदन मिले हैं और इनमें कुल राशि करीब 6 689 करोड़ रुपये के निवेशकों की है।

    सरकार ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सहारा रिफंड पोर्टल बनाया गया है जिसके माध्यम से निवेशकों को उनकी राशि वापस करने की प्रक्रिया चल रही है। इस पोर्टल के तहत अब तक लगभग 355 करोड़ रुपये निवेशकों को वापस किये जा चुके हैं लेकिन कुल राशि की तुलना में यह राशि केवल एक छोटा हिस्सा है।

    इस घोटाले को लेकर सदन में स्पष्ट किया गया कि सहारा समूह की कई संपत्तियाँ न्यायालय के आदेश के अनुरूप अटैच की गई हैं और सुप्रीम कोर्ट के तहत निवेशकों की राशि वापस करने का काम जारी है। हालांकि शिवपुरी में दर्ज एफआईआर की संख्या के बारे में सरकार ने कहा कि 1 जनवरी 2024 के बाद समूह के खिलाफ लगभग 4 एफआईआर दर्ज की गई हैं और अन्य मामलों को मुरैना कोतवाली में मर्ज किया जा रहा है।

    विपक्ष ने सरकार से यह भी पूछा कि क्या राज्य सरकार के पास निवेशकों की राशि की वसूली या संपत्तियों के नीलामी के कोई ठोस कार्यक्रम हैं ताकि निवेशकों को उनका धन लौटाया जा सके। मंत्री ने जवाब दिया कि यह मामला न्यायिक प्रकृति का है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ही आगे की कार्रवाई की जा रही है। यह विषय राज्य पुलिस की सीमा से बाहर है और उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय के मार्गदर्शन में ही निवेशकों की राशि वापस की जाएगी।

    विशेषज्ञों और निवेशकों की मांग है कि सहारा मामले में पारदर्शिता और तेजी लाने की जरूरत है ताकि लंबे समय से अपना पैसा वापस पाने के लिए प्रतीक्षा कर रहे लाखों निवेशकों को न्याय मिल सके। निवेशकों की शिकायतें कई वर्षों से लंबित हैं और न्यायपालिका के आदेशों के बावजूद वापस प्राप्त राशि बहुत कम है। इस घोटाले की व्यापक प्रकृति के कारण देश भर में सहारा समूह के खिलाफ मामले दर्ज हैं और जांच एजेंसियाँ सक्रिय हैं।

  • SC का ऐहितासिक फैसला, कहा- सलवार का नाड़ा खोलना महज 'छेड़छाड़' नहीं, बल्कि सीधे 'रेप का प्रयास'

    SC का ऐहितासिक फैसला, कहा- सलवार का नाड़ा खोलना महज 'छेड़छाड़' नहीं, बल्कि सीधे 'रेप का प्रयास'


    नई दिल्ली।
    यौन अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता (Sensitivity) और कानूनी व्याख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक ऐतिहासिक और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के एक बेहद विवादित फैसले को पलटते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी महिला को गलत नीयत से पकड़ना और उसकी सलवार का नाड़ा खोलना महज ‘छेड़छाड़’ या ‘रेप की तैयारी’ नहीं, बल्कि सीधे तौर पर ‘रेप का प्रयास’ (Attempt) है।

    अदालत ने कहा कि ऐसे कृत्य को कम गंभीर अपराध मानकर आरोपी को हल्की सजा देना न्याय की भावना के खिलाफ है। इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मार्च 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें कोर्ट ने इसे केवल महिला की लज्जा भंग करने का मामला माना था।


    क्या है पूरा मामला?

    मामला काफी गंभीर था, जिसमें आरोपियों ने महिला के साथ न केवल अश्लील हरकतें कीं बल्कि उसके कपड़े उतारने का प्रयास भी किया। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक अजीबोगरीब तर्क देते हुए इसे ‘रेप का प्रयास’ मानने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट का मानना था कि यह कृत्य ‘रेप की तैयारी’ के अंतर्गत आता है, जिसके लिए सजा कम होती है। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद आक्रोश फैल गया था। महिला अधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की थी।


    सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान

    हाईकोर्ट के इस विवादास्पद फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। यह कदम एनजीओ ‘वी द वुमन’ की संस्थापक और वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता द्वारा लिखे गए एक पत्र के बाद उठाया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक विशेष बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के साथ-साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया शामिल थे, ने इस मामले की सुनवाई की।


    SC की तीखी टिप्पणी और फैसला

    सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सिरे से खारिज करते हुए आरोपियों के खिलाफ पोक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत ‘रेप के प्रयास’ के मूल और सख्त आरोपों को बहाल कर दिया है। फैसला सुनाते हुए CJI सूर्यकांत ने न्यायिक संवेदनशीलता पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि जब कोई न्यायाधीश यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहा हो, तो उसे मामले की तथ्यात्मक हकीकत और पीड़िता की कमजोरियों के प्रति विचारशील होना चाहिए।

    बेंच ने अपनी टिप्पणी में कहा, “कोई भी जज या किसी भी अदालत का फैसला तब तक पूर्ण न्याय नहीं कर सकता, जब तक कि वह मुकदमे के तथ्यों की वास्तविकताओं और अदालत का रुख करने वाली पीड़िता की कमजोरियों के प्रति विचारशील न हो।” अदालत ने यह भी साफ किया कि न्यायाधीशों का प्रयास न केवल संवैधानिक और कानूनी सिद्धांतों के ठोस अनुप्रयोग पर आधारित होना चाहिए, बल्कि उसमें करुणा और सहानुभूति का भाव भी होना चाहिए। इन स्तंभों के अभाव में न्यायिक संस्थान अपने महत्वपूर्ण कर्तव्यों का निर्वहन ठीक से नहीं कर पाएंगे।

    सुप्रीम कोर्ट ने केवल इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटने तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि भविष्य के लिए एक व्यापक सुधार का खाका भी खींचा है। कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में जजों को अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है। इसके लिए, सर्वोच्च न्यायालय ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक और पूर्व जस्टिस अनिरुद्ध बोस से विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का अनुरोध किया है। यह समिति यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों में न्यायाधीशों के लिए ‘संवेदनशीलता और करुणा’ विकसित करने हेतु दिशा-निर्देश तैयार करेगी। अदालत ने यह विशेष निर्देश दिया कि ये दिशा-निर्देश सरल भाषा में होने चाहिए, न कि विदेशी अदालतों के जटिल कानूनी शब्दों से भरे हुए।

  • धार भोजशाला विवाद: वकीलों की हड़ताल के चलते टली सुनवाई, अब 18 फरवरी को पेश होगी ASI की सर्वे रिपोर्ट

    धार भोजशाला विवाद: वकीलों की हड़ताल के चलते टली सुनवाई, अब 18 फरवरी को पेश होगी ASI की सर्वे रिपोर्ट


    इंदौर/धार। मध्य प्रदेश की सुप्रसिद्ध और ऐतिहासिक धार भोजशाला मामले में चल रही कानूनी प्रक्रिया एक बार फिर ठंडे बस्ते में जाती नजर आ रही है। जिला अदालत में आज होने वाली बहुचर्चित सुनवाई को वकीलों की काम से विमुक्ति हड़ताल के चलते स्थगित कर दिया गया है। अब इस संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई 18 फरवरी को निर्धारित की गई है। उल्लेखनीय है कि शिवपुरी में हुए एक वकील के हत्याकांड के विरोध में प्रदेश भर के वकील न्यायिक कार्यों से दूर हैं जिसका सीधा असर भोजशाला केस पर पड़ा है।

    सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के पालन में आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ASI को अपनी विस्तृत सर्वे रिपोर्ट अदालत के पटल पर रखनी थी। इस रिपोर्ट में भोजशाला परिसर के भीतर किए गए वैज्ञानिक सर्वे खुदाई के दौरान मिले साक्ष्य डिजिटल फोटोग्राफी और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों को शामिल किया गया है। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों को उम्मीद थी कि आज रिपोर्ट पेश होने के बाद स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगी लेकिन अब यह सस्पेंस 18 फरवरी तक बना रहेगा।

    मुस्लिम पक्ष के गंभीर आरोप और हिंदू पक्ष की मांग

    जैसे-जैसे सुनवाई की तारीखें बदल रही हैं दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज होता जा रहा है। मुस्लिम पक्ष मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने एएसआई के सर्वे की निष्पक्षता पर ही सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। उनका आरोप है कि सर्वे के दौरान कुछ पत्थर की मूर्तियां पिछले रास्ते से गुपचुप तरीके से परिसर के अंदर लाकर रखी गईं और बाद में उन्हें सर्वे रिपोर्ट का हिस्सा बना लिया गया। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की कोशिश है।

    दूसरी ओर हिंदू पक्ष महाराजा भोज उत्सव समिति अपने दावों पर अडिग है। हिंदू पक्ष की ओर से कोर्ट में यह मांग प्रमुखता से उठाई गई है कि भोजशाला वाग्देवी मां सरस्वती का मंदिर है इसलिए वहां हिंदुओं को 24 घंटे पूजा-अर्चना करने की अनुमति दी जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने परिसर में होने वाली नमाज को पूरी तरह से बंद करने की भी मांग की है। हिंदू पक्ष का तर्क है कि सर्वे में मिले अवशेषों से यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि यह एक प्राचीन मंदिर है।

    क्या है भोजशाला का महत्व?

    धार की भोजशाला सदियों से सांप्रदायिक सद्भाव और विवाद दोनों का केंद्र रही है। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार यहां मंगलवार को हिंदू पूजा करते हैं और शुक्रवार को मुस्लिम नमाज अदा करते हैं। एएसआई का वैज्ञानिक सर्वे इसी गुत्थी को सुलझाने के लिए किया गया है कि क्या इस इमारत का मूल स्वरूप मंदिर था। अब सबकी निगाहें 18 फरवरी पर टिकी हैं जब कोर्ट के रिकॉर्ड पर एएसआई के साक्ष्य आएंगे और इस ऐतिहासिक विवाद की दिशा तय होगी।

  • Bihar Assembly Election: बिहार चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची PK की जन सुराज पार्टी

    Bihar Assembly Election: बिहार चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची PK की जन सुराज पार्टी


    नई दिल्ली । बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी और कानूनी घमासान तेज हो गया है। चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज पार्टी ने राज्य में हुए विधानसभा चुनाव को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की है। पार्टी ने चुनाव के दौरान महिलाओं को सीधे ₹10,000 ट्रांसफर किए जाने को आचार संहिता का उल्लंघन बताते हुए इसे अवैध करार दिया है और नए सिरे से विधानसभा चुनाव कराने की मांग की है।

    सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार
    जन सुराज पार्टी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ इस मामले की शुक्रवार को सुनवाई करेगी। याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई है।

    10 हजार रुपये ट्रांसफर पर उठे सवाल

    याचिका में कहा गया है कि चुनाव से ठीक पहले और मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू रहने के दौरान राज्य सरकार की ओर से महिला मतदाताओं को ₹10,000 का प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण किया गया, जो चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला कदम है। पार्टी का दावा है कि इससे 25 से 35 लाख महिला वोटर्स प्रभावित हुईं, जो सीधे तौर पर भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आता है।

    संविधान के कई अनुच्छेदों के उल्लंघन का आरोप

    जन सुराज पार्टी ने कोर्ट से यह घोषित करने की मांग की है कि मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत चुनावी अवधि में नए लाभार्थियों को जोड़ना और उन्हें भुगतान करना संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 112, 202 और 324 का गंभीर उल्लंघन है। साथ ही, चुनाव आयोग को इस मामले में सख्त कार्रवाई के निर्देश देने की भी अपील की गई है।

    जीविका दीदियों की तैनाती पर भी आपत्ति

    याचिका में यह मुद्दा भी उठाया गया है कि दो चरणों में कराई गई वोटिंग के दौरान जीविका स्वयं सहायता समूह की करीब 1.8 लाख महिला लाभार्थियों को पोलिंग बूथों पर तैनात किया गया, जो निष्पक्ष चुनाव की भावना के खिलाफ है। पार्टी ने इसे अवैध और अनुचित बताया है।

    दोबारा चुनाव की मांग

    जन सुराज पार्टी ने चुनाव में कथित भ्रष्ट आचरणों का हवाला देते हुए बिहार में फिर से विधानसभा चुनाव कराने की मांग की है। साथ ही, पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि वह एस. सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार 2013 मामले में दिए गए निर्देशों को लागू कराए और मुफ्त योजनाओं व डीबीटी स्कीम्स पर स्पष्ट और सख्त दिशा-निर्देश तय करे।

    बढ़ेगा सियासी तापमान

    इस याचिका के बाद बिहार की राजनीति में हलचल और तेज हो गई है। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और उसके फैसले पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में बिहार की सियासत की दिशा तय कर सकता है।

  • अनिल अंबानी ने SC को दिया वचन, बोले- 'ED-CBI जांच के बीच देश नहीं छोड़ूंगा

    अनिल अंबानी ने SC को दिया वचन, बोले- 'ED-CBI जांच के बीच देश नहीं छोड़ूंगा


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बुधवार को रिलायंस कम्युनिकेशंस (Reliance Communications- RCom) और अनिल धीरभाई अंबानी ग्रुप (Anil Dhirubhai Ambani Group-ADAG) से जुड़े ₹40,000 करोड़ के कथित बैंक ऋण धोखाधड़ी मामले में एक कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को इस मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का आदेश दिया और साथ ही उद्योगपति अनिल अंबानी ( (Anil Ambani) को एक अहम वचन देने को कहा कि वे बिना अनुमति के भारत नहीं छोड़ेंगे।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ई.ए.एस. सरमा के वकील, प्रशांत भूषण ने चिंता व्यक्त की कि धोखाधड़ी के बड़े पैमाने को देखते हुए मुख्य आरोपी, अनिल अंबानी, देश छोड़कर भाग सकते हैं। इस पर अंबानी के वकील मुकुल रोहतगी ने अदालत को आश्वस्त किया कि “मेरे मुवक्किल का देश छोड़ने का कोई इरादा नहीं है। वे प्रतिदिन अपने कार्यालय जाते हैं और मैं वचन देता हूं कि वे बिना अदालत की अनुमति के विदेश नहीं जाएंगे।”

    सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अदालत को याद दिलाया कि पहले भी एक वचन दिया गया था, लेकिन वह व्यक्ति अंततः देश से भाग गया था। सरकार ने बताया कि अंबानी के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर पहले से जारी है, ताकि उनके विदेश जाने के प्रयास को रोका जा सके।

    मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों द्वारा की गई देरी पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट 2020 में आई थी, लेकिन CBI ने प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने में 2025 तक का समय लिया।

    अदालत ने जांच एजेंसी से निर्देश दिया कि बैंक अधिकारियों के साथ मिलीभगत के हर मामले के लिए अलग-अलग FIR दर्ज की जाए। इसके अलावा, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि बैंक अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए कानूनी अनुमति की आवश्यकता नहीं है और यदि कोई अधिकारी धोखाधड़ी या साजिश में शामिल है, तो उसे तुरंत कार्रवाई का सामना करना चाहिए।


    IBC का दुरुपयोग:

    सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) का इस्तेमाल परिसंपत्तियों को कम मूल्य पर खरीदने के लिए किया जा रहा है। प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि RCom पर ₹47,000 करोड़ का बकाया था, लेकिन उसकी संपत्तियां केवल ₹430 करोड़ में (मुकेश अंबानी की कंपनी द्वारा) खरीदी गईं। अदालत ने इसे IBC का दुरुपयोग करार दिया और कहा कि नीलामी प्रक्रिया पूर्व-नियोजित लगती है।


    ईडी का बयान:

    ईडी ने अदालत को सूचित किया कि अब तक 204 संपत्तियों को कुर्क किया जा चुका है, जिनकी कीमत लगभग ₹12,012 करोड़ है। हाल ही में, रिलायंस ग्रुप के पूर्व निदेशक पुनीत गर्ग को गिरफ्तार किया गया है, जो 7 फरवरी तक हिरासत में रहेंगे। अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले की खुद निगरानी करेगा और जांच एजेंसियों को चार सप्ताह के भीतर ताजा स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर मामले में कड़ी कार्रवाई का संकेत दिया और जांच एजेंसियों को शीघ्रता से कार्रवाई करने की हिदायत दी है।

  • 2027 जनगणना में जाति जानकारी का सत्यापन सुनिश्चित किया जाए- SC ने केंद्र को दिया निर्देश

    2027 जनगणना में जाति जानकारी का सत्यापन सुनिश्चित किया जाए- SC ने केंद्र को दिया निर्देश


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को केंद्र सरकार (Central Government) और भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त को 2027 में होने वाली जनगणना (Census 2027) में जाति संबंधी आंकड़ों को दर्ज करने की प्रक्रिया पर पुनः विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह सुझाव दिया कि जाति की गणना केवल स्व-घोषणा के बजाय सत्यापन प्रणाली के आधार पर की जाए, ताकि अधिक सटीक और पारदर्शी आंकड़े मिल सकें।

    सुप्रीम कोर्ट ने जनगणना में नागरिकों की जाति संबंधी जानकारी को दर्ज करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने के तरीकों पर सवाल उठाने वाली जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह निर्देश दिया कि इस विषय पर जनगणना अधिनियम 1958 के तहत संबंधित प्राधिकारियों को विचार करना चाहिए। अदालत ने याचिकाकर्ता आकाश गोयल से कहा कि इस मामले में उठाए गए मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन न्यायालय की तरफ से इसमें हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

    मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि जनगणना की प्रक्रिया जनगणना अधिनियम, 1958 और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार संचालित होती है। इसके तहत महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय को जनगणना के विवरण और तरीके तय करने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए प्रतिवेदन में उठाए गए मुद्दों को विचार के लिए प्रासंगिक माना और सुझाव दिए कि इन पर महापंजीयक द्वारा गंभीरता से विचार किया जाए।

    CJI सूर्यकांत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता और उनके जैसे अन्य व्यक्तियों द्वारा जताई गई चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय ने क्षेत्रीय विशेषज्ञों की सहायता से एक मजबूत और सुरक्षित प्रणाली विकसित की होगी, ताकि कोई गलती न हो सके। अदालत ने इस मामले में महापंजीयक को दिए गए सुझावों पर विचार करने का आदेश दिया और याचिका का निपटारा कर दिया।

    इससे पहले, याचिकाकर्ता आकाश गोयल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने अदालत से आग्रह किया था कि नागरिकों के जाति संबंधी विवरण को दर्ज करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने के लिए एक पारदर्शी और सार्वजनिक प्रश्नपत्र तैयार किया जाए।

    वर्ष 2027 की जनगणना, 1931 के बाद पहली बार जातिगत गणना को शामिल करने वाली जनगणना होगी और यह भारत की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना भी होगी, जो अपने आंकड़ों और प्रक्रिया में पूरी तरह से डिजिटल रूप से संचालित होगी। इस संस्करण में मैंने मूल खबर का सार और जानकारी समान रखते हुए शब्दों की संख्या में समानता बनाए रखी है। साथ ही, हेडिंग को आकर्षक और संक्षिप्त रखा है।

  • सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एम्स जोधपुर में हुई विशेषज्ञ जांच, मेडिकल रिपोर्ट तलब

    सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एम्स जोधपुर में हुई विशेषज्ञ जांच, मेडिकल रिपोर्ट तलब


    नई दिल्ली । जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद सोनम वांगचुक की तबीयत को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट के निर्देश पर शनिवार सुबह कड़ी पुलिस सुरक्षा में सोनम वांगचुक को एम्स जोधपुर ले जाया गया, जहां गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग में उनकी करीब डेढ़ घंटे तक विस्तृत चिकित्सकीय जांच की गई। बताया जा रहा है कि वह लंबे समय से पेट दर्द, गैस और गैस्ट्रो से जुड़ी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं और सामान्य इलाज से उनकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो रहा है।

    सोनम वांगचुक 27 सितंबर 2025 से जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद हैं। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि जेल में उपलब्ध खराब गुणवत्ता वाले पानी के कारण उनके मुवक्किल की तबीयत लगातार बिगड़ रही है। कोर्ट को यह भी बताया गया कि वांगचुक को लगातार पेट से जुड़ी परेशानियां हो रही हैं और जेल में दिया जा रहा सामान्य इलाज उनकी बीमारी के लिए पर्याप्त नहीं है।

    इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जेल प्रशासन को निर्देश दिए थे कि सोनम वांगचुक को किसी विशेषज्ञ डॉक्टर, विशेष रूप से गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट को दिखाया जाए। इसी आदेश के तहत शनिवार को उन्हें एम्स जोधपुर ले जाया गया। एम्स सूत्रों के अनुसार, डॉक्टरों की विशेषज्ञ टीम ने उनकी स्वास्थ्य स्थिति का आकलन किया और जरूरी मेडिकल टेस्ट किए। जांच के बाद उन्हें वापस जोधपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया।

    गौरतलब है कि सोनम वांगचुक को शुक्रवार को भी मेडिकल जांच के लिए एम्स जोधपुर लाया गया था। डॉक्टरों ने उनकी स्थिति पर नजर रखते हुए आवश्यक जांचें की थीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सोनम वांगचुक की मेडिकल रिपोर्ट 2 फरवरी तक अदालत में पेश की जाए, ताकि आगे की कार्रवाई उसी रिपोर्ट के आधार पर तय की जा सके।

    यह मामला सुप्रीम कोर्ट में सोनम वांगचुक की पत्नी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि वांगचुक की सेहत लगातार गिरती जा रही है और जेल की मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाएं उनकी बीमारी के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि कैदियों के स्वास्थ्य से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता और जरूरत पड़ने पर उन्हें विशेषज्ञ इलाज उपलब्ध कराना जेल प्रशासन की जिम्मेदारी है।

    इससे पहले हुई सुनवाई में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने जेल अधिकारियों को स्पष्ट आदेश दिया था कि सोनम वांगचुक की जांच गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट से कराई जाए। राजस्थान सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कोर्ट को बताया था कि पिछले चार महीनों में जेल के डॉक्टरों द्वारा सोनम वांगचुक की 21 बार जांच की जा चुकी है और 26 जनवरी को भी उनकी मेडिकल जांच हुई थी। हालांकि कपिल सिब्बल ने इस दलील पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि सामान्य जांच पर्याप्त नहीं है क्योंकि समस्या की जड़ जेल का खराब पानी है। अब सभी की निगाहें सोनम वांगचुक की मेडिकल रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट में पेश किया जाएगा और जिसके आधार पर आगे का फैसला लिया जाएगा।

  • सुप्रीम कोर्ट ने NHAI को दिया अल्टीमेटम: हर 50 किलोमीटर पर गौशाला बनाएं, आवारा जानवरों के लिए CSR से समाधान जरूरी

    सुप्रीम कोर्ट ने NHAI को दिया अल्टीमेटम: हर 50 किलोमीटर पर गौशाला बनाएं, आवारा जानवरों के लिए CSR से समाधान जरूरी


    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को गुरुवार को निर्देश दिया कि वह सड़क निर्माण में लगे ठेकेदारों से राजमार्गों पर आवारा जानवरों की देखभाल के लिए CSR के तहत गौशाला/पशु आश्रय बनाने पर विचार करने को कहे। अदालत ने कहा कि लगभग हर 50 किलोमीटर के बाद ऐसे आश्रय बनाकर आवारा पशुओं को संरक्षित किया जा सकता है।

    न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने आवारा कुत्तों के स्थानांतरण और बधियाकरण संबंधी 7 नवंबर, 2025 के आदेश में संशोधन की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

    पंजाब, राजस्थान, यूपी और तमिलनाडु पर कोर्ट ने जताया असंतोष
    सुप्रीम कोर्ट ने कई राज्यों के निर्देशों के अनुपालन पर असंतोष जताया। कोर्ट ने पंजाब सरकार के दैनिक 100 कुत्तों के बधियाकरण प्रयास को अपर्याप्त बताते हुए इसे “ऊंट के मुंह में जीरे” जैसा बताया।

    NHAI से ऐप बनाने का निर्देश
    कोर्ट ने NHAI से कहा कि वह एक ऐप विकसित करे, जिसमें लोग राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा जानवरों को देखने पर तुरंत सूचना दे सकें। इससे सड़क दुर्घटनाओं को रोकने में मदद मिलेगी।

    राज्यों की रिपोर्टों पर कोर्ट ने उठाए सवाल
    NHAI ने बताया कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर 1300 से अधिक संवेदनशील स्थान हैं। कुछ राज्यों ने कदम उठाए हैं, लेकिन महाराष्ट्र, झारखंड और राजस्थान जैसे राज्यों ने अभी तक समस्या के समाधान के लिए ठोस कार्रवाई नहीं की।

    राजस्थान ने कहा कि राज्य में बधियाकरण केंद्र बनाए गए हैं और संस्थानों के आसपास बाड़बंदी की गई है, लेकिन कोर्ट ने कहा कि केवल 45 वैन से यह काम संभव नहीं है।

    कोर्ट ने दी चेतावनी: समस्या बढ़ती जाएगी
    पीठ ने कहा कि यदि अभी कार्रवाई नहीं हुई तो आवारा कुत्तों की संख्या हर साल 10-15% तक बढ़ेगी। कोर्ट ने कहा कि 100 कुत्तों का रोज़ाना बधियाकरण कोई समाधान नहीं है।

    AWBI के पास 250+ आवेदन लंबित, कोर्ट ने फटकार लगाई
    भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (AWBI) ने बताया कि 7 नवंबर के आदेश के बाद 250 से अधिक बधियाकरण केंद्र और आश्रय खोलने के आवेदन आए हैं, लेकिन कई आवेदन पर अभी भी निर्णय नहीं लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने AWBI से कहा कि वे जल्दी से जल्दी निर्णय लें।

    कोर्ट ने राज्यों को दिया चेतावनी संकेत
    सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी को कहा था कि यदि कुत्ते के काटने की घटनाएं बढ़ती हैं तो राज्यों को भारी हर्जाना देना होगा और कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जवाबदेह ठहराया जाएगा।
    सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशुओं की समस्या पर सख्त रुख अपनाया है और NHAI को CSR के जरिए गौशाला बनाने, ऐप बनाने और ठेकेदारों को जिम्मेदार बनाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही राज्यों को चेतावनी दी है कि यदि वे निर्देशों का पालन नहीं करेंगे तो कानूनी कार्रवाई और भारी जुर्माना हो सकता है।