Tag: Supreme Court

  • 33 साल बाद मिला न्याय: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पूर्व वायुसेना अधिकारी को मिलेगी सम्मानजनक विदाई

    33 साल बाद मिला न्याय: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पूर्व वायुसेना अधिकारी को मिलेगी सम्मानजनक विदाई


    नई दिल्ली। तीन दशक पहले नौकरी से बर्खास्त किए गए भारतीय वायुसेना (IAF) के एक पूर्व अधिकारी को आखिरकार न्याय मिल गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 1993 की बर्खास्तगी को अवैध और अनुचित ठहराते हुए न सिर्फ उसे रद्द किया, बल्कि अधिकारी को सम्मानजनक विदाई देने का ऐतिहासिक आदेश भी दिया है।

    अदालत ने कहा कि किसी भी सैनिक के लिए उसका सम्मान सबसे बड़ी पूंजी होता है, और उसे बहाल करना न्याय का अहम हिस्सा है।

    कोर्ट का बड़ा फैसला
    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने पूर्व स्क्वाड्रन लीडर आर. सूद की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए कहा कि वायुसेना की कार्रवाई कानूनी रूप से कमजोर और त्रुटिपूर्ण थी।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि:

    वायुसेना प्रमुख द्वारा तय तारीख पर उन्हें औपचारिक विदाई दी जाए
    विदाई उसी सम्मान के साथ हो, जिसके वे नियमित सेवानिवृत्ति पर हकदार होते

    क्या था मामला?
    यह पूरा विवाद 1987 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप था कि एक नागरिक ड्राइवर को रेगिस्तान में छोड़ दिया गया था, जहां बाद में उसके अवशेष मिले। इसी मामले में कार्रवाई करते हुए 22 सितंबर 1993 को वायुसेना अधिनियम की धारा 19 के तहत आर. सूद को सेवा से हटा दिया गया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?

    पहले ही मिल चुकी थी क्लीन चिट
    एक आपराधिक अदालत ने सबूतों के अभाव में आर. सूद को पहले ही बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मुकदमा चलाने लायक सबूत ही नहीं थे, तो विभागीय कार्रवाई का आधार भी कमजोर हो जाता है।
    सजा में भेदभाव पर सख्त टिप्पणी
    कोर्ट ने पाया कि इस मामले में वरिष्ठ अधिकारी को मामूली सजा दी गई, जबकि आदेश का पालन करने वाले आर. सूद को बर्खास्त कर दिया गया—जो स्पष्ट रूप से असमानता है।

    वरिष्ठ के आदेश का पालन बना सजा का कारण
    अदालत ने कहा कि किसी अधीनस्थ अधिकारी को सिर्फ इसलिए कठोर सजा नहीं दी जा सकती कि उसने अपने वरिष्ठ के आदेशों का पालन किया।

    सम्मान की वापसी को प्राथमिकता
    चूंकि आर. सूद अब सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुके हैं, उन्हें सेवा में बहाल करना संभव नहीं है। लेकिन कोर्ट ने आदेश दिया कि उन्हें सभी लाभ ऐसे दिए जाएं मानो वे कभी बर्खास्त ही नहीं हुए थे।

    सबसे अहम बात—अदालत ने आर्थिक मुआवजे से ज्यादा “सम्मान की बहाली” को प्राथमिकता दी। यह फैसला बताता है कि एक सैनिक के लिए उसकी प्रतिष्ठा ही सबसे बड़ी पहचान होती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 33 साल बाद फिर से स्थापित कर दिया।

  • सुप्रीम कोर्ट सख्त: पवन खेड़ा की ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक, तीन हफ्ते में जवाब तलब

    सुप्रीम कोर्ट सख्त: पवन खेड़ा की ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक, तीन हफ्ते में जवाब तलब


    नई दिल्ली।
    पवन खेड़ा को तेलंगाना हाई कोर्ट से मिली ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने कांग्रेस नेता को नोटिस जारी करते हुए तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

    न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने यह आदेश असम सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। याचिका में तेलंगाना हाई कोर्ट द्वारा दी गई एक सप्ताह की ट्रांजिट बेल को चुनौती दी गई थी।

    कोर्ट का स्पष्ट निर्देश

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि फिलहाल ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक रहेगी। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पवन खेड़ा असम की सक्षम अदालत में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करते हैं, तो इस आदेश से उस प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की गई है।

    असम सरकार की दलील

    सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि इस मामले में तेलंगाना हाई कोर्ट को सुनवाई का अधिकार क्षेत्र नहीं था, क्योंकि एफआईआर और कथित अपराध दोनों असम में दर्ज हुए हैं। उन्होंने इसे ‘फोरम शॉपिंग’ बताते हुए कानून के दुरुपयोग का आरोप लगाया।

    क्या है पूरा मामला

    यह विवाद हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भूयान सरमा को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़ा है। असम पुलिस ने पवन खेड़ा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है, जिनमें मानहानि, जालसाजी और आपराधिक साजिश के आरोप शामिल हैं।

    खेड़ा का पक्ष

    खेड़ा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि मामला राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है और अधिकतम मानहानि का मामला बनता है, जिसमें गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है।

    पहले क्या हुआ था

    तेलंगाना हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 10 अप्रैल को खेड़ा को एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी, ताकि वे संबंधित अदालत में नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकें। इसी आदेश को चुनौती देते हुए असम सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।

    राजनीतिक माहौल गर्म

    इस मामले ने राज्य की सियासत को भी गरमा दिया है। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया है, जबकि बीजेपी ने खेड़ा के बयान को गैरजिम्मेदार और मानहानिकारक करार दिया है।

  • TET परीक्षा पर नए आदेश जल्द, कौन शिक्षक देंगे एग्जाम तय करेगा विभाग

    TET परीक्षा पर नए आदेश जल्द, कौन शिक्षक देंगे एग्जाम तय करेगा विभाग


    नई दिल्ली। मध्यप्रदेश में टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) को लेकर बड़ा फैसला जल्द सामने आ सकता है। स्कूल शिक्षा विभाग नए सिरे से आदेश जारी करने की तैयारी में है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाएगा कि किन शिक्षकों के लिए TET अनिवार्य होगा और किन्हें छूट या सरलीकरण मिलेगा। इस संबंध में लोक शिक्षण आयुक्त अभिषेक सिंह ने अधिकारियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं।

    नए आदेश में तय होगी अनिवार्यता और छूट
    आयुक्त ने कहा कि प्रस्तावित आदेश में यह बिंदु स्पष्ट रूप से शामिल किया जाएगा कि किन श्रेणी के शिक्षकों को परीक्षा देना जरूरी होगा। साथ ही नियमों के तहत कुछ शिक्षकों को राहत देने के प्रावधानों को भी परिभाषित किया जाएगा, जिससे भ्रम की स्थिति खत्म हो सके।

    सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका की तैयारी
    मामले को लेकर विभाग शासकीय अधिवक्ता से कानूनी राय ले रहा है। राय मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने पर निर्णय लिया जाएगा। इससे पहले कोर्ट ने सख्त निर्देश देते हुए सेवा में बने रहने और प्रमोशन के लिए TET पास करना अनिवार्य कर दिया था।

    बैठक में कई अहम प्रशासनिक निर्णय
    सोमवार को आयोजित बैठक में शिक्षक संगठनों और अधिकारियों के साथ चर्चा के दौरान कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। इनमें लंबित वेतनवृद्धि और समयमान वेतनमान से जुड़े मामलों को जल्द निपटाने पर सहमति बनी।

    प्रशिक्षण और मार्गदर्शन कार्यक्रम की तैयारी
    यदि न्यायालय के निर्देश यथावत रहते हैं, तो TET में शामिल होने वाले शिक्षकों के लिए तहसील और विकासखंड स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसमें सिलेबस आधारित मार्गदर्शन दिया जाएगा ताकि शिक्षक परीक्षा की बेहतर तैयारी कर सकें।

    DPI स्तर पर परामर्श बैठक का निर्णय
    लंबित समस्याओं के समाधान के लिए डीपीआई स्तर पर एक परामर्शदात्री बैठक आयोजित की जाएगी, जिसमें विभिन्न शिक्षक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इसका उद्देश्य सभी पक्षों को साथ लेकर समाधान निकालना है।

    शिक्षक संगठनों में असंतोष
    हालांकि इस बैठक को लेकर कुछ शिक्षक संगठनों ने असंतोष जताया है। उनका कहना है कि सभी प्रभावित संगठनों को शामिल नहीं किया गया, जिससे लिए गए निर्णयों की वैधता पर सवाल उठते हैं। कुछ संगठनों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे अधिकृत प्रतिनिधिमंडल के साथ ही चर्चा को मान्यता देंगे।

    क्या है TET परीक्षा?
    TET यानी Teacher Eligibility Test एक राष्ट्रीय स्तर की पात्रता परीक्षा है, जिसे राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा 2010 में अनिवार्य किया गया था। यह परीक्षा कक्षा 1 से 8 तक के शिक्षकों की योग्यता निर्धारित करती है और शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत इसकी वैधानिकता तय की गई है।

    सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
    1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जिन शिक्षकों की सेवा अवधि 5 वर्ष से अधिक शेष है, उन्हें TET पास करना अनिवार्य होगा। अन्यथा उन्हें सेवा छोड़नी पड़ सकती है या अनिवार्य सेवानिवृत्ति का सामना करना पड़ सकता है।

  • मुरैना हत्याकांड पर सुप्रीम कोर्ट सख्त 13 अप्रैल से होगी अहम सुनवाई

    मुरैना हत्याकांड पर सुप्रीम कोर्ट सख्त 13 अप्रैल से होगी अहम सुनवाई


    मुरैना । मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में वन आरक्षक की निर्मम हत्या का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर घटना पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुनवाई का फैसला किया है जिससे अवैध खनन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

    जानकारी के अनुसार 13 अप्रैल से इस मामले की सुनवाई शुरू होगी और यह सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच द्वारा की जाएगी। इस दौरान अदालत अवैध रेत खनन और उससे जुड़े अपराधों पर व्यापक और कड़े दिशा निर्देश जारी कर सकती है जो भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

    यह मामला चंबल क्षेत्र में चल रहे अवैध खनन से जुड़ा है जहां लंबे समय से रेत माफिया सक्रिय हैं। इस पूरे मुद्दे को कोर्ट के सामने न्याय मित्र रूपाली सैमुअल ने उठाया और वन आरक्षक की हत्या का जिक्र करते हुए अदालत का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सुनवाई का निर्णय लिया।

    घटना के अनुसार मुरैना जिले में चंबल नदी के ऐसाह घाट पर अवैध रेत खनन और परिवहन की सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम कार्रवाई के लिए निकली थी। अंबाह रेंज के गश्ती दल ने रथोल का पुरा और रानपुर के बीच रेत से भरे एक ट्रैक्टर ट्रॉली को रोकने की कोशिश की। इसी दौरान चालक ने वन आरक्षक हरिकेश गुर्जर को बेरहमी से ट्रैक्टर से कुचल दिया जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

    मृतक हरिकेश गुर्जर मुरैना जिले के जनकपुर गांव के निवासी थे और हाल ही में उनका स्थानांतरण अंबाह रेंज में हुआ था। इस दुखद घटना के बाद वन विभाग की टीम ने शव को जिला अस्पताल पहुंचाया जबकि सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और पूरे मामले की जांच शुरू कर दी गई।

    यह घटना केवल एक हत्या नहीं बल्कि अवैध खनन माफिया के बढ़ते हौसलों का संकेत भी मानी जा रही है। चंबल क्षेत्र में लंबे समय से अवैध रेत खनन एक गंभीर समस्या बना हुआ है और कई बार प्रशासनिक कार्रवाई के बावजूद इस पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई है।

    अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से इस मुद्दे पर बड़ा फैसला आने की उम्मीद है। यदि अदालत सख्त दिशा निर्देश जारी करती है तो इससे न केवल मुरैना बल्कि पूरे देश में अवैध खनन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का रास्ता साफ हो सकता है। फिलहाल पूरे मामले पर देशभर की नजरें टिकी हुई हैं और 13 अप्रैल से शुरू होने वाली सुनवाई को बेहद अहम माना जा रहा है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में कहा कि धार्मिक प्रथाओं में अंधविश्वास की समीक्षा करना न्यायपालिका का अधिकार है।

    सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में कहा कि धार्मिक प्रथाओं में अंधविश्वास की समीक्षा करना न्यायपालिका का अधिकार है।

    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के विषय पर चल रही समीक्षा याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि धार्मिक प्रथाओं में अंधविश्वास और असंवैधानिक प्रथाओं की समीक्षा करना न्यायपालिका का अधिकार है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने कहा कि अदालत धर्म विशेषज्ञ नहीं है, लेकिन यदि कोई प्रथा मानवता, संविधान और न्याय की मूल भावना के खिलाफ जाती है, तो उस पर समीक्षा करना न्यायपालिका का संवैधानिक कर्तव्य है। सुप्रीम कोर्ट ने उदाहरण के तौर पर सती प्रथा, मानव बलि और नरभक्षण जैसी प्रथाओं का जिक्र किया और स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर अंधविश्वास को हमेशा अपरिवर्तनीय नहीं माना जा सकता।

    सुनवाई इस 2018 के निर्णय के पुनरीक्षण से जुड़ी है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 10 से 50 वर्ष आयु की महिलाओं का प्रवेश रोकना असंवैधानिक है। अब यह समीक्षा याचिका नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष है, जो व्यापक संवैधानिक सवालों पर विचार कर रही है कि धार्मिक अभ्यासों पर न्यायिक हस्तक्षेप किस हद तक संभव और उचित है। अदालत ने यह भी कहा कि केवल यह मान लेना कि सरकार का निर्णय अंतिम होगा, सही नहीं है और कोर्ट के पास यह देखने का अधिकार है कि कोई प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है या नहीं।

    सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से सुरक्षित है और अदालत को केवल धार्मिक विश्वास के आधार पर समीक्षा नहीं करनी चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 25 आदि के तहत संतुलित रूप से देखा जाएगा और यदि कोई प्रथा मूलभूत अधिकारों के खिलाफ है तो न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

    विशेष सुनवाई में कुछ न्यायाधीशों ने कहा कि यदि कोई प्रथा केवल धार्मिक मान्यता पर आधारित है और संवैधानिक मूल्यों को चुनौती देती है, तो उसकी समीक्षा अवश्य होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान जरूरी है, लेकिन यह असीमित नहीं है, और अदालत के पास यह शक्ति सुरक्षित है कि वह सामाजिक और नैतिक मूल्यों के अनुरूप न्याय सुनिश्चित करे।

    सबरीमाला मामला लंबे समय से महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संवेदनशील संतुलन से जुड़ा हुआ है। समीक्षा सुनवाई के निर्णायक चरण में सुप्रीम कोर्ट का यह रुख न्यायिक परंपरा, मूल्यों और संविधान की व्याख्या की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

  • विधायक बनाम न्यायपालिका: एमपी में 5 मामले जहां सजा और सदस्यता बनी मुद्दा

    विधायक बनाम न्यायपालिका: एमपी में 5 मामले जहां सजा और सदस्यता बनी मुद्दा


    भोपाल । मध्य प्रदेश में विधायकों को आपराधिक मामलों में सजा मिलने और सदस्यता समाप्त होने के पांच प्रमुख मामले हाल ही में सुर्खियों में रहे। इनमें न्यायालय ने कुछ मामलों में सजा सुनाई, विधानसभा सचिवालय ने सीट रिक्त घोषित की, लेकिन उच्च अदालतों ने कुछ विधायकों को राहत दी जिससे उनकी विधायकी बच गई।

    सबसे पहला मामला बिजावर सीट की भाजपा विधायक आशा रानी सिंह का है। वर्ष 2011 में छतरपुर जिले की बिजावर सीट से विधायक आशा रानी सिंह को अपनी नौकरानी तिजिया बाई को आत्महत्या के लिए उकसाने के जुर्म में दस साल की सजा सुनाई गई। उनके पति पर भी इसी मामले में आरोप था। सजा के बाद विधानसभा सचिवालय ने उनकी सदस्यता समाप्त कर दी और सीट को रिक्त घोषित कर चुनाव आयोग को सूचना भेजी। हाई कोर्ट में अपील करने के बावजूद उन्हें राहत नहीं मिली और 31 अक्टूबर 2013 को उनकी विधायकी समाप्त हो गई।

    दूसरा मामला पवई सीट के भाजपा विधायक प्रहलाद लोधी का है। 2014 में अवैध रेत उत्खनन के दौरान तहसीलदार के साथ मारपीट के मामले में 31 अक्टूबर 2019 को भोपाल की विशेष अदालत ने उन्हें दो साल की सजा सुनाई। विधानसभा सचिवालय ने सदस्यता रद्द की अधिसूचना जारी की, लेकिन प्रहलाद लोधी ने हाई कोर्ट में अपील की और सात नवंबर 2019 को कोर्ट ने उनकी सजा पर स्टे दे दी। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आदेशों के बाद उनकी सदस्यता बहाल हुई और वे विधायक बने रहे।

    तीसरा मामला खरगापुर विधानसभा सीट के राहुल सिंह लोधी का है। 2018 में उनके खिलाफ कांग्रेस प्रत्याशी ने चुनाव याचिका दायर की। हाई कोर्ट ने नामांकन पत्र में महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने के आधार पर उनके निर्वाचन को शून्य घोषित कर दिया। विधानसभा सचिवालय ने सदस्यता समाप्त कर दी और सीट रिक्त घोषित की। राहुल सिंह लोधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम स्टे दे कर सदस्यता बहाल की। लेकिन उन्हें वोटिंग और कुछ भत्तों का अधिकार नहीं मिला।

    चौथा मामला विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा का है। उन्हें नामांकन पत्र में आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाने का आरोप लगा और मार्च 2026 में हाई कोर्ट ने उनके चुनाव को शून्य घोषित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें विधायक के तौर पर काम करने की अनुमति दी लेकिन वे वेतन, भत्तों और वोटिंग में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। उनकी सुनवाई 23 जुलाई को होगी।

    पांचवां और वर्तमान में चर्चित मामला दतिया सीट के कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती का है। 2 अप्रैल 2026 को दिल्ली की विशेष अदालत ने उन्हें साल 1998 के बैंक धोखाधड़ी मामले में दोषी पाया और तीन साल की जेल की सजा सुनाई। सदस्यता समाप्त करने और सीट रिक्त घोषित करने की अधिसूचना विधानसभा सचिवालय ने चुनाव आयोग को भेज दी। राजेंद्र भारती ने जमानत तो पा ली है लेकिन सजा पर कनविक्शन स्टे नहीं मिला है। वे सुप्रीम कोर्ट में अपील करने जा रहे हैं।

    राजेन्द्र कुमार सिंह ने इस घटनाक्रम पर कहा कि न्यायालय का काम अलग है, लेकिन रात में विधानसभा खोलकर गजट नोटिफिकेशन जारी करना संसदीय प्रक्रिया में पहले कभी नहीं हुआ। कई मामलों में हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद सदस्यता बहाल की जाती है। इन घटनाओं ने मध्य प्रदेश विधानसभा की राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया के बीच संवेदनशील संतुलन को उजागर किया है।

  • सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री विवाद पर SC की 9 जजों की पीठ करेगी सुनवाई… अन्य धर्मों पर भी होगा असर….

    सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री विवाद पर SC की 9 जजों की पीठ करेगी सुनवाई… अन्य धर्मों पर भी होगा असर….


    नई दिल्ली।
    सबरीमाला मंदिर (Sabarimala Temple) में महिलाओं के प्रवेश (Women’s entry) से शुरू हुआ विवाद अब एक ऐतिहासिक संवैधानिक मोड़ पर खड़ा है। 7 अप्रैल 2026 से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ उन व्यापक कानूनी सवालों पर सुनवाई शुरू करने जा रही है। यह न केवल हिंदू धर्म, बल्कि मुस्लिम, पारसी और दाऊदी बोहरा समुदायों की धार्मिक प्रथाओं को भी प्रभावित करेंगे।

    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की यह पीठ केवल सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर विचार नहीं कर रही है। अदालत के सामने असल चुनौती यह तय करना है कि क्या व्यक्तिगत मौलिक अधिकार किसी समुदाय के धार्मिक अधिकारों से ऊपर हैं। इस फैसले का असर मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, पारसी महिलाओं के अधिकारों और दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित प्रथाओं पर भी पड़ेगा।

    2018 में तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा की बेंच ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। कोर्ट ने कहा था कि भक्ति को लैंगिक भेदभाव का शिकार नहीं बनाया जा सकता। एकमात्र महिला जज, जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने तब असहमति जताते हुए कहा था कि धार्मिक प्रथाओं की तर्कसंगतता की जांच करना अदालतों का काम नहीं है। नवंबर 2019 में पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पाया कि यह मुद्दा बहुत व्यापक है और इसे बड़ी बेंच (9 जजों) को भेज दिया गया।


    सुप्रीम कोर्ट के सामने कई सवाल

    संविधान पीठ कुछ मुद्दों पर स्पष्टता लाने की कोशिश कर सकती है। धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा और सीमा क्या है? अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत अधिकार) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदाय के अधिकार) के बीच तालमेल कैसे बैठेगा? क्या धार्मिक संप्रदाय के अधिकार संविधान के ‘भाग-III’ (मौलिक अधिकार) के अधीन हैं? अनुच्छेद 25 और 26 में प्रयुक्त ‘नैतिकता’ शब्द का अर्थ क्या है? क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता शामिल है? क्या अदालतें यह तय कर सकती हैं कि कोई धार्मिक प्रथा उस धर्म का अनिवार्य हिस्सा है या नहीं? अनुच्छेद 25(2)(b) में हिंदुओं के वर्गों का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या कोई व्यक्ति जो उस विशेष धार्मिक संप्रदाय का हिस्सा नहीं है, उसकी प्रथाओं को कोर्ट में चुनौती दे सकता है?


    अन्य धर्मों पर भी होगा असर

    यह सुनवाई इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि इसमें कई अन्य विवादों को जोड़ दिया गया है। मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों में प्रवेश का अधिकार। दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित ‘बहिष्कार’ और अन्य प्रथाओं की वैधता। गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिलाओं के ‘अग्नि मंदिर’ में प्रवेश का अधिकार। आपको बता दें कि अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कई जैन संगठनों ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया है, क्योंकि कोर्ट का फैसला उनके व्यक्तिगत कानूनों को प्रभावित कर सकता है।


    नई बेंच का गठन

    CJI सूर्य कांत के नेतृत्व वाली इस बेंच में विविधता का ध्यान रखा गया है। इसमें जस्टिस बीवी नागरत्ना सहित देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों से आए अनुभवी जज शामिल हैं। 7 अप्रैल से होने वाली यह दैनिक सुनवाई भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक व्याख्याओं में से एक साबित होगी। अदालत के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है कि संविधान का अनुच्छेद 25 धर्म मानने की आजादी देता है, लेकिन साथ ही यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।

    याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कोई भी प्रथा जो महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है, वह धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं हो सकती। धार्मिक संस्थाओं का तर्क है कि धर्म की अपनी आंतरिक स्वायत्तता होती है और अदालतों को सदियों पुरानी परंपराओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

  • वोटर लिस्ट विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की दोटूक, TMC की आपत्तियों पर कहा—‘ऐसा हर बार होता है’

    वोटर लिस्ट विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की दोटूक, TMC की आपत्तियों पर कहा—‘ऐसा हर बार होता है’

    कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर उठे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि बड़ी संख्या में फॉर्म-6 जमा होना कोई नई बात नहीं है, यह प्रक्रिया पहले भी होती रही है। अदालत ने साथ ही कहा कि अगर किसी नाम को लेकर आपत्ति है तो चुनाव आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

    फॉर्म-6 को लेकर TMC ने जताई थी आपत्ति

    तृणमूल कांग्रेस की ओर से पेश वकील कल्याण बनर्जी ने दलील दी कि एक ही व्यक्ति ने 30 हजार फॉर्म-6 जमा किए हैं। फॉर्म-6 का उपयोग मतदाता सूची में नाम जोड़ने या संसदीय क्षेत्र बदलने के लिए किया जाता है। उनका कहना था कि पूरक सूची आने के बाद भी नए फॉर्म स्वीकार किए जा रहे हैं, जिससे प्रक्रिया पर सवाल उठता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा—पहली बार नहीं

    सुनवाई के दौरान बेंच ने टिप्पणी की कि “ऐसा हर बार होता है, इसमें कुछ असामान्य नहीं है।” अदालत ने कहा कि किसी भी नए नाम पर आपत्ति दर्ज करने का विकल्प उपलब्ध है और संबंधित पक्ष चुनाव आयोग से संपर्क कर सकता है।

    चुनाव आयोग ने रखा अपना पक्ष

    भारत निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वकील ने कहा कि नियमों के अनुसार उम्मीदवारों के नामांकन की अंतिम तिथि तक मतदाताओं के नाम जोड़े जा सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति हाल ही में 18 वर्ष का हुआ है तो उसे मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने का अधिकार है।

    अदालत ने प्रक्रिया समझने की दी नसीहत

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा और पूरी प्रक्रिया को समझना जरूरी है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव उसी सूची के आधार पर होते हैं, जो तय तिथि तक अपडेट होती है।

    अदालत ने संकेत दिया कि सभी आपत्तियों पर निर्णय 7 अप्रैल तक लिया जाएगा।

  • OBC आरक्षण मामला: सुप्रीम कोर्ट ने बदला अपना आदेश, दो केस खुद सुनेगा, अप्रैल में होगी अहम सुनवाई

    OBC आरक्षण मामला: सुप्रीम कोर्ट ने बदला अपना आदेश, दो केस खुद सुनेगा, अप्रैल में होगी अहम सुनवाई


    भोपाल। मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर चल रही कानूनी प्रक्रिया में नया मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले दिए गए आदेश में संशोधन करते हुए आरक्षण से जुड़े दो मामलों को फिर से अपने पास ले लिया है। अब 13 प्रतिशत आरक्षण को होल्ड रखने के मुद्दे पर शीर्ष अदालत स्वयं सुनवाई करेगी।

    बताया जा रहा है कि 87-13 फार्मूले को चुनौती देने वाले मामले को भी रिकॉल किया गया है, जिसकी सुनवाई अप्रैल के दूसरे सप्ताह में तय की गई है।

    कई याचिकाएं हाईकोर्ट को ट्रांसफर

    इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 54 अन्य याचिकाओं को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट भेज दिया है। ओबीसी आरक्षण से जुड़ी कुल 103 याचिकाओं पर हाईकोर्ट में 2 से 15 अप्रैल के बीच नियमित सुनवाई होगी।

    52 मामलों की वापसी, दो पर SC करेगा सुनवाई

    ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने जानकारी दी कि सुप्रीम कोर्ट ने 19 फरवरी 2026 के अपने आदेश में बदलाव करते हुए 52 मामलों को वापस हाईकोर्ट भेज दिया है। हालांकि, इनमें से दो विशेष मामलों की सुनवाई अब सुप्रीम कोर्ट में ही होगी।

    पहले ट्रांसफर हुए थे सभी केस

    जानकारी के अनुसार, ओबीसी आरक्षण से जुड़े सभी लंबित मामलों को पहले मध्यप्रदेश सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कराया गया था। ये मामले अलग-अलग बेंचों में लंबित थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 19 फरवरी को आदेश जारी कर सभी मामलों को वापस हाईकोर्ट भेजते हुए निर्देश दिया था कि तीन महीने के भीतर विशेष बेंच बनाकर इनका निपटारा किया जाए।

    रिव्यू याचिका पर बदला फैसला

    ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने दीपक कुमार पटेल के नाम से रिव्यू याचिका दाखिल की थी। इस पर 20 मार्च को खुली अदालत में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में संशोधन कर दिया। संशोधित आदेश के तहत 52 मामलों को दोबारा हाईकोर्ट भेजा गया, जबकि दो विशेष अनुमति याचिकाएं दीपक कुमार पटेल बनाम मध्यप्रदेश शासन और हरिशंकर बरोदिया बनाम मध्यप्रदेश शासन को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास सुनवाई के लिए रख लिया है।

    अप्रैल में फिर होगी अहम सुनवाई

    अब इन सभी मामलों में अगली सुनवाई 2 अप्रैल 2026 से मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में शुरू होगी, जबकि सुप्रीम कोर्ट में रिकॉल किए गए मामलों पर अप्रैल के दूसरे सप्ताह में सुनवाई प्रस्तावित है।

  • वंदे मातरम मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कोई दंड नहीं केवल सलाह…

    वंदे मातरम मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कोई दंड नहीं केवल सलाह…

    नई दिल्ली: देश के सर्वोच्च न्यायालय ने वंदे मातरम के गायन को अनिवार्य किए जाने से जुड़े एक सर्कुलर के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने साफ किया कि इस मामले में अभी हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता क्योंकि याचिका समय से पहले यानी प्री मेच्योर है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार के सर्कुलर में वंदे मातरम के गायन को लेकर केवल एक सुझाव या एडवाइजरी दी गई है न कि कोई बाध्यकारी आदेश या दंड का प्रावधान।

    सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि क्या 28 जनवरी को जारी सरकारी अधिसूचना में कहीं यह उल्लेख है कि यदि कोई व्यक्ति वंदे मातरम नहीं गाता है तो उसे किसी तरह की सजा दी जाएगी या उसके खिलाफ कोई कार्रवाई होगी। इस पर अदालत ने यह समझने की कोशिश की कि याचिकाकर्ता की आशंका किस आधार पर है।

    याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने दलील दी कि भले ही सरकार ने सीधे तौर पर दंड का प्रावधान न किया हो, लेकिन इस तरह की एडवाइजरी के कारण सामाजिक दबाव उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को गाने या सम्मान करने के लिए मजबूर किया जाना उसके अधिकारों के खिलाफ हो सकता है और इस तरह की स्थिति में अप्रत्यक्ष रूप से दबाव बन सकता है।

    इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या राष्ट्रगीत के सम्मान के लिए किसी एडवाइजरी की आवश्यकता होती है। वहीं अदालत ने इस मामले में स्पष्ट किया कि सर्कुलर में “may” यानी “सकते हैं” जैसे शब्द का उपयोग किया गया है, जो किसी भी प्रकार के अनिवार्य आदेश या दंड को इंगित नहीं करता।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी में यह भी सामने आया कि इस सर्कुलर में न तो किसी प्रकार की सजा का प्रावधान है और न ही किसी व्यक्ति को इसे गाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। अदालत ने कहा कि अगर भविष्य में इस एडवाइजरी के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव किया जाता है या उसके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई होती है, तो उस स्थिति में वह व्यक्ति न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह भी सलाह दी कि अभी उनके द्वारा उठाई गई आशंकाएं अस्पष्ट हैं और किसी ठोस आधार पर नहीं हैं। अदालत ने कहा कि यदि वास्तव में किसी के साथ अन्याय या भेदभाव होता है तभी वह कोर्ट में आए। यह कोई धमकी नहीं बल्कि एक स्पष्ट सलाह है।

    इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फिलहाल हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि वंदे मातरम को लेकर जारी सर्कुलर में किसी प्रकार का दंडात्मक प्रावधान नहीं है और यह केवल एक सलाह के रूप में देखा जाना चाहिए।