Tag: Supreme Court

  • “पत्नी नौकरानी नहीं, बराबर की साथी है” — सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

    “पत्नी नौकरानी नहीं, बराबर की साथी है” — सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी


    नई दिल्ली। वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पति को कड़ी फटकार लगाते हुए साफ कहा कि शादी किसी नौकरानी से नहीं, बल्कि जीवनसाथी से की जाती है। अदालत ने दो टूक कहा कि घर के कामों में पति को भी बराबरी से हाथ बंटाना होगा।

    कोर्ट ने टिप्पणी की कि खाना बनाना, कपड़े धोना या घर संभालना सिर्फ पत्नी की जिम्मेदारी नहीं है। समय बदल चुका है और पति-पत्नी दोनों को मिलकर जिम्मेदारियां निभानी चाहिए।

    तलाक की मांग पर कोर्ट सख्त

    मामले में पति ने ‘क्रूरता’ के आधार पर तलाक की मांग की थी। उसका आरोप था कि पत्नी घर का काम नहीं करती और उसके साथ दुर्व्यवहार करती है। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी घरेलू काम ठीक से नहीं करती, तो इसे क्रूरता नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने कहा कि इस आधार पर तलाक देना उचित नहीं है और पति को अपने नजरिए में बदलाव लाना चाहिए।

    2017 में हुई थी शादी

    दोनों की शादी वर्ष 2017 में हुई थी और उनका एक आठ साल का बेटा भी है। पति का कहना था कि शादी के कुछ ही समय बाद पत्नी का व्यवहार बदल गया और वह उसके माता-पिता के प्रति भी अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करती है।

    हालांकि, कोर्ट ने इस विवाद को सुलझाने के लिए पहले मध्यस्थता (मेडिएशन) का रास्ता सुझाया था, लेकिन दोनों के बीच सहमति नहीं बन पाई। अब मामले की अगली सुनवाई तय की गई है।

    दूसरे मामले में भी दिलचस्प टिप्पणी

    इसी दिन एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक फरार जोड़े की सुरक्षा याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें सीधे राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि वे इसके लिए संबंधित दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख करें।

    बताया गया कि यह जोड़ा सोशल मीडिया से प्रभावित होकर इस गलतफहमी में सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था कि वह परिसर में शादी कर सकता है और तुरंत सुरक्षा मिल जाएगी। अदालत ने इस पर अप्रत्यक्ष रूप से नाराजगी जताते हुए उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी।

  • क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून

    क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून


    नई दिल्ली। भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को मंजूरी देते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह फैसला Harish Rana vs Union of India मामले में आया, जिसमें 32 वर्षीय हरीश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अपील स्वीकार कर ली गई।

    Supreme Court of India की जस्टिस J. B. Pardiwala और जस्टिस K. V. Viswanathan की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा एक इमारत से गिरने के बाद पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में हैं। बेटे की लगातार बिगड़ती हालत को देखते हुए उनके माता-पिता ने अदालत से जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति मांगी थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

    इस फैसले के बाद इच्छामृत्यु को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

    आइए जानते हैं कि इच्छामृत्यु क्या है और दुनिया में इसका इतिहास क्या रहा है।

    क्या होती है इच्छामृत्यु

    इच्छामृत्यु (Euthanasia) का अर्थ है किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन को जानबूझकर समाप्त करना, जो असाध्य या लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो और असहनीय दर्द झेल रहा हो। इसका उद्देश्य उस व्यक्ति को कष्ट से मुक्ति दिलाना होता है।

    इच्छामृत्यु मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है।

    1. सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)

    इसमें मरीज की मृत्यु लाने के लिए डॉक्टर या कोई व्यक्ति सक्रिय कदम उठाता है, जैसे घातक दवा या इंजेक्शन देना। उदाहरण के तौर पर मरीज को ऐसा इंजेक्शन देना जिससे वह गहरी नींद में चला जाए और उसकी दर्दरहित मृत्यु हो जाए।

    2. निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)

    इसमें मरीज को जिंदा रखने वाले इलाज या जीवन रक्षक उपकरण हटा लिए जाते हैं। डॉक्टर सीधे मौत नहीं देते, बल्कि उपचार बंद कर देते हैं, जिससे मरीज प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त होता है।

    प्राचीन काल में इच्छामृत्यु

    इच्छामृत्यु का विचार बहुत पुराना है। लगभग 8वीं सदी ईसा पूर्व के महाकाव्य Iliad में घायल योद्धाओं के दर्द से मुक्ति के लिए दया मृत्यु का उल्लेख मिलता है।

    भारतीय परंपरा में भी तपस्वियों द्वारा प्रायोपवेश (आमरण अनशन के माध्यम से प्राण त्यागना) की परंपरा रही है, जिसका उल्लेख Mahabharata में मिलता है।

    प्राचीन यूनान में दार्शनिक Plato ने अपनी पुस्तक Republic में असाध्य रोगियों के लिए इच्छामृत्यु का समर्थन किया था।

    हालांकि करीब 400 ईसा पूर्व में ली जाने वाली Hippocratic Oath ने सक्रिय इच्छामृत्यु का विरोध किया और कहा कि डॉक्टर किसी मरीज को घातक दवा नहीं देंगे।

    मध्यकाल में धार्मिक प्रतिबंध

    ईसाई धर्म के प्रसार के बाद इच्छामृत्यु को पाप और हत्या के समान माना गया। धार्मिक विचारक Augustine of Hippo और Thomas Aquinas ने इसे ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध बताया।

    इस्लाम और यहूदी धर्म में भी सक्रिय इच्छामृत्यु को प्रतिबंधित किया गया, हालांकि कुछ परिस्थितियों में जीवन रक्षक उपचार रोकने की अनुमति दी गई।

    19वीं और 20वीं सदी में बहस

    19वीं सदी में आधुनिक चिकित्सा के विकास के साथ इच्छामृत्यु पर फिर से बहस शुरू हुई। 1870 में डॉक्टर Samuel D. Williams ने अंतिम अवस्था के मरीजों को क्लोरोफॉर्म देने का सुझाव दिया था।

    20वीं सदी में नाजी जर्मनी के कुख्यात Aktion T4 program के कारण इच्छामृत्यु की अवधारणा विवादित हो गई। 1939-1945 के बीच नाजी शासन ने इस कार्यक्रम के नाम पर हजारों लोगों की हत्या कर दी थी।

    आज किन देशों में मान्य है इच्छामृत्यु

    समय के साथ कई देशों ने सख्त नियमों के तहत इच्छामृत्यु या सहायता प्राप्त मृत्यु को कानूनी मान्यता दी है।

    Netherlands (2001) और Belgium (2002) ने सक्रिय इच्छामृत्यु को वैध बनाया।

    Canada ने 2016 में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग (MAiD) कार्यक्रम शुरू किया।

    Switzerland में 1942 से सहायता प्राप्त आत्महत्या कानूनी है।

    United States के कुछ राज्यों में “Death with Dignity” कानून लागू है, जिसकी शुरुआत Oregon में 1997 में हुई।

    Spain, Austria, Australia, New Zealand, Colombia और Ecuador में भी विभिन्न रूपों में इसे अनुमति मिली है।

    किन देशों में सख्त प्रतिबंध

    कई इस्लामिक देशों में शरिया कानून के तहत इच्छामृत्यु के किसी भी रूप पर प्रतिबंध है। वहीं France और United Kingdom जैसे देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं है, बल्कि मरीजों को दर्द से राहत देने के लिए पालीएटिव केयर और सिडेशन पर जोर दिया जाता है।

    भारत में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इच्छामृत्यु के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक बहस को नई दिशा देता है। हालांकि यह केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु तक सीमित है, लेकिन इससे भविष्य में चिकित्सा नैतिकता और मरीज के अधिकारों पर व्यापक चर्चा की संभावना बढ़ गई है।

  • हरीश राणा को SC ने इच्छा मृत्यु की इजाजत दी, देश में पहली बार हुआ ऐसा फैसला

    हरीश राणा को SC ने इच्छा मृत्यु की इजाजत दी, देश में पहली बार हुआ ऐसा फैसला


    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ऐसा फैसला सुनाया जो आज तक कभी भी किसी मामले में नहीं सुनाया गया। दरअसल, जस्टिस पारदीवाला की बेंच एक मामलें में इच्छा मृत्यु की मांग पर सुनावाई कर रही थी। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है। हरीश बीते 13 साल से 100 प्रतिशत दिव्यांगता से जूझ रहे हैं और अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े हुए हैं। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि इस पूरी प्रक्रिया को पूरी डिग्निटी के साथ पूरा किया जाना चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए दुख जताया
    सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की इजाजात दे दी है। कोर्ट ने पिछली सुनवाई के दौरान हरीश के घरवालों से भी बात की थी जिसके बाद जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि ये बेहद दुखद मामला है। लेकिन लड़के की तकलीफ को देखते हुए हमें किसी भी अंतिम फैसले पर पहुंचना होगा जिसके बाद उन्हें इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी गई। कोर्ट ने कहा है कि हरीश राणा को AIIMS के पैलिएटिव केयर में भर्ती किया जाएगा ताकि मेडिकल ट्रीटमेंट वापस लिया जा सके। बता दें कि भारत में ये पैसिव यूथेनेसिया का पहला मामला है।

    100 प्रतिशत दिव्यांग हैं हरीश राणा
    साल 2013 में हरीश चंडीगढ़ में रहकर अपनी पढाई कर रहे थे जिस दौरान वह अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इसके बाद जब उन्हें अस्पताल ले जाया गया तो उनके सिर में गंभीर चोट आई थी। उसके बाद से वह कभी अपने पैर पर नहीं खड़े हो सके। AIIMS के मुताबिक वह 100 प्रतिशत दिव्य़ांग हो गए हैं जिसका इलाज लगभग असंभव है। लगातार बिस्तर पर लेटे रहने के कारण उनके शरीर पर घाव बन गए है। माता-पिता से जब यह तकलीफ नहीं देखी गई तो उन्होंने इच्छा मृत्यु की मांग की जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकृति दे दी।

  • सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 13 साल से कोमा में युवक को इच्छामृत्यु की अनुमति

    सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 13 साल से कोमा में युवक को इच्छामृत्यु की अनुमति

    नई दिल्ली। भारत में इच्छामृत्यु से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में Supreme Court of India ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 13 साल से कोमा में पड़े युवक को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी है। अदालत ने गाजियाबाद के 31 वर्षीय Harish Rana के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाने का निर्देश दिया है।

    यह फैसला जस्टिस J. B. Pardiwala और जस्टिस K. V. Viswanathan की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि दिल्ली के All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) में मेडिकल प्रक्रिया इस तरह पूरी की जाए कि मरीज की गरिमा और मानवीय सम्मान बना रहे।

    दरअसल हरीश राणा 2013 में चंडीगढ़ स्थित Panjab University में बीटेक की पढ़ाई के दौरान हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। गंभीर चोटों के कारण वे कोमा में चले गए और डॉक्टरों ने उन्हें Quadriplegia से पीड़ित बताया। इस स्थिति में मरीज शरीर के लगभग सभी अंगों को नियंत्रित नहीं कर पाता और पूरी तरह वेंटिलेटर व फीडिंग ट्यूब पर निर्भर रहता है।

    करीब 13 साल से बिस्तर पर पड़े रहने के कारण उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई और शरीर पर गहरे बेडसोर्स भी बन गए। परिवार लंबे समय से मानसिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा था। इसी वजह से हरीश के माता-पिता निर्मला राणा और अशोक राणा ने अदालत से पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति देने की गुहार लगाई थी।

    फैसला सुनाते समय अदालत ने कहा कि जब किसी मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं रह जाती और इलाज केवल जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखता है, तो ऐसे मामलों में मानवीय गरिमा को ध्यान में रखते हुए लाइफ सपोर्ट हटाने पर विचार किया जा सकता है। जस्टिस पारदीवाला ने अपने फैसले में साहित्यकार William Shakespeare के प्रसिद्ध कथन “To be or not to be” का भी उल्लेख किया।

    सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पैसिव यूथेनेशिया से जुड़े स्पष्ट कानून बनाने पर भी विचार करने को कहा है। फिलहाल भारत में यह प्रक्रिया अदालत द्वारा तय दिशानिर्देशों और मेडिकल बोर्ड की मंजूरी के आधार पर ही संभव है।

    गौरतलब है कि 2018 में Supreme Court of India ने ‘सम्मान के साथ मृत्यु के अधिकार’ को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मान्यता दी थी। हालांकि एक्टिव यूथेनेशिया यानी किसी दवा या इंजेक्शन से मौत देना भारत में अब भी गैरकानूनी है।

    इस फैसले को देश में इच्छामृत्यु से जुड़े कानून और मानवीय अधिकारों की बहस में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने कोविड वैक्सीन साइड इफेक्ट्स के लिए मुआवजा देने का दिया आदेश: नो-फॉल्ट पॉलिसी लागू, एक्सपर्ट पैनल की जरूरत नहीं

    सुप्रीम कोर्ट ने कोविड वैक्सीन साइड इफेक्ट्स के लिए मुआवजा देने का दिया आदेश: नो-फॉल्ट पॉलिसी लागू, एक्सपर्ट पैनल की जरूरत नहीं

    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कोविड वैक्सीनेशन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सरकार को निर्देश दिया कि वैक्सीनेशन से किसी भी व्यक्ति को हुए नुकसान के लिए मुआवजा दिया जाए। इसके लिए सरकार नो-फॉल्ट कम्पनसेशन पॉलिसी बनाए।

    नो-फॉल्ट कम्पनसेशन पॉलिसी का मतलब
    इस नीति के तहत अगर किसी व्यक्ति को वैक्सीन या दवा से नुकसान होता है, तो उसे मुआवजा मिल सकता है, चाहे इसमें किसी की गलती साबित हो या न हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि साइड इफेक्ट्स की मॉनिटरिंग के लिए मौजूदा सिस्टम ही जारी रहेगा, अलग से एक्सपर्ट पैनल बनाने की जरूरत नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मुख्य बातें
    साइड इफेक्ट्स के आंकड़े सार्वजनिक होंगे – वैक्सीन से जुड़े मामलों का डेटा समय-समय पर पब्लिक डोमेन में उपलब्ध कराया जाएगा।

    सरकार की गलती साबित नहीं होती – मुआवजा नीति लागू होने का मतलब यह नहीं कि सरकार या कोई अन्य अथॉरिटी अपनी गलती मान रही है।

    याचिकाएं और पृष्ठभूमि
    यह आदेश रचना गंगू और वेणुगोपालन गोविंदन द्वारा 2021 में दायर याचिकाओं पर आया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उनकी बेटियों की मौत कोविड वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स के कारण हुई थी।

    करुण्या गोविंदन मामला: जुलाई 2021 में कोवीशील्ड वैक्सीन लगने के महीने भर बाद करुण्या की मौत हुई। राष्ट्रीय समिति ने मामले की जांच की, लेकिन पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण वैक्सीन को सीधे मौत का कारण नहीं माना गया।

    8 साल की रितिका मामला: मई 2021 में पहली डोज के 7 दिन बाद तेज बुखार और ब्रेन ब्लड क्लोटिंग के कारण मौत। परिवार ने RTI के जरिए पता लगाया कि मौत का कारण थ्रोम्बोसिस विथ थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम था।

    ICMR और NCDC की स्टडी
    जुलाई 2025 में ICMR और NCDC ने स्टडी जारी की, जिसमें बताया गया कि 18-45 साल के लोगों में अचानक मौतों का कोविड वैक्सीन से कोई सीधा संबंध नहीं है। स्टडी में यह भी कहा गया कि गंभीर साइड इफेक्ट के मामले बहुत दुर्लभ (rare) हैं।

    अन्य संभावित कारणों में जेनेटिक्स, लाइफस्टाइल, पहले से मौजूद बीमारियां और कोविड के बाद के कॉम्प्लिकेशन शामिल हैं।

    भारत में विकसित कोविड वैक्सीन
    कोवैक्सिन – भारत बायोटेक ने ICMR के सहयोग से विकसित की।

    कोवीशील्ड – सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने ब्रिटिश कंपनी एस्ट्राजेनेका के फॉर्मूले से बनाई।

    सुप्रीम कोर्ट का संदेश
    सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वैक्सीनेशन सुरक्षित और जरूरी है, और सरकार की जिम्मेदारी है कि साइड इफेक्ट्स के लिए उचित मुआवजा नीति लागू करे। जनता को इससे घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन नो-फॉल्ट नीति से प्रभावित लोगों को राहत मिलेगी।

  • इंदिरा प्रियदर्शनी कॉलेज मामले में कांग्रेस MLA मसूद को सुप्रीम कोर्ट से राहत

    इंदिरा प्रियदर्शनी कॉलेज मामले में कांग्रेस MLA मसूद को सुप्रीम कोर्ट से राहत

    भोपाल । भोपाल के कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। मामला इंदिरा प्रियदर्शनी कॉलेज के संचालन से जुड़ा है जहां कथित फर्जी सेल डीड के आधार पर मसूद और अमन एजुकेशन सोसाइटी के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी की जा रही थी। हाईकोर्ट ने पहले पुलिस कमिश्नर को मसूद के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और पुलिस महानिदेशक को एसआईटी गठित करने के निर्देश दिए थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को निरस्त कर दिया।

    सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच जिसमें जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल चंदूरकर शामिल थे ने सुनवाई के दौरान कहा कि सरकार का जवाब आए बिना ऐसा अंतरिम आदेश देना उचित नहीं था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट द्वारा लगाए गए सख्त निर्देश पहली नजर में उचित नहीं लगते।

    आरिफ मसूद की पैरवी सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तंखा ने की। तंखा ने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट ने बिना सरकार का पक्ष सुने ही एफआईआर दर्ज करने और एसआईटी गठित करने का आदेश दिया जो सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामला हाईकोर्ट में लंबित है इसलिए सभी पक्ष जल्द अपनी दलीलें प्रस्तुत करें। इसके बाद ही हाईकोर्ट मामले में मेरिट के आधार पर निर्णय लेगा।

    मामला इस प्रकार शुरू हुआ कि मध्य प्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग ने 9 जून 2025 को इंदिरा प्रियदर्शनी कॉलेज की मान्यता रद्द कर दी। कॉलेज का संचालन अमन एजुकेशन सोसाइटी करती है और कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद इस सोसाइटी के सचिव हैं। मसूद ने मान्यता रद्द होने के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

    पूर्व विधायक ध्रुवनारायण सिंह ने इस मामले की शिकायत की थी। जांच के दौरान आयुक्त उच्च शिक्षा ने पाया कि अमन एजुकेशन सोसाइटी ने कॉलेज के संचालन के लिए फर्जी दस्तावेजों पर एनओसी और मान्यता ली थी। जांच में यह भी सामने आया कि फर्जी दस्तावेजों के जरिए सेल डीड तैयार करवाई गई और इसे पंजीयन कार्यालय में फर्जी तरीके से दर्ज किया गया।

    इस मामले से कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक चर्चा भी शुरू हो गई थी क्योंकि मसूद कांग्रेस विधायक हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मसूद को फिलहाल कानूनी राहत मिल गई है लेकिन हाईकोर्ट में मामला अब भी लंबित है और वहीं अंतिम निर्णय होगा।

    राजनीतिक और शिक्षा जगत दोनों में इस मामले को गंभीरता से देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि बिना पक्षकार की सुनवाई के सख्त आदेश देना न्यायसंगत नहीं होता जिससे राज्य के प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठ सकते हैं। अब हाईकोर्ट मामले में दस्तावेजों और सबूतों के आधार पर निर्णय करेगा।

  • मध्य प्रदेश राजनीति ताजा: विजयपुर फैसला, सूचना आयोग और गैस संकट पर विपक्ष-सत्तापक्ष आमने-सामने

    मध्य प्रदेश राजनीति ताजा: विजयपुर फैसला, सूचना आयोग और गैस संकट पर विपक्ष-सत्तापक्ष आमने-सामने


    नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा के निर्वाचन शून्य घोषित होने के फैसले को लेकर राजनीति गरमाई हुई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भाजपा सरकार पर तीखे हमले किए। पटवारी ने कहा कि कांग्रेस इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी और न्यायपालिका का सम्मान करते हुए विश्वास जताया कि वहां न्याय मिलेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा इस मामले में दबाव बनाकर निर्णय करवाना चाहती है, क्योंकि उन्हें यह स्वीकार नहीं है कि एक आदिवासी नेता चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गया।

    पटवारी ने भाजपा को चुनौती देते हुए विधायक निर्मला सप्रे के मामले का भी जिक्र किया और कहा कि अगर सरकार में हिम्मत है तो इस मामले में भी निर्णय कराए। वहीं, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्य में सूचना आयोग के खाली पदों पर सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति लंबे समय से लंबित है और सरकार इस मामले में बेहद धीमी गति से काम कर रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री से बातचीत कर दो सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की मांग भी की।

    सिंघार ने पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा से जुड़े मामले और गैस सिलेंडर की कमी एवं महंगाई को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उनका कहना था कि भाजपा हर मामले में देर से निर्णय लेती है और जनता को राहत देने के बजाय केवल खजाना भरने में लगी है।

    वहीं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कांग्रेस नेताओं के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें उच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत करना चाहिए और अनावश्यक टिप्पणियों से उनकी अज्ञानता उजागर होती है।

    यह राजनीतिक वार्ता मध्य प्रदेश में आगामी चुनाव और राज्यसभा सीटों को लेकर बढ़ते तनाव की झलक देती है। विपक्ष और सरकार के बीच जारी इस बहस पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिक गई हैं।

    Keywords: विजयपुर फैसला, मध्य प्रदेश राजनीति, जीतू पटवारी, उमंग सिंघार, भाजपा, सुप्रीम कोर्ट, निर्मला सप्रे, सूचना आयोग, नरोत्तम मिश्रा, गैस सिलेंडर, महंगाई, आदिवासी विधायक

  • बिना बताए दूसरे राज्य से आरोपी लाना: क्या पुलिस भी हो सकती है गिरफ्तार?

    बिना बताए दूसरे राज्य से आरोपी लाना: क्या पुलिस भी हो सकती है गिरफ्तार?


    नई दिल्ली । हाल ही में शिमला में यूथ कांग्रेस के तीन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के दौरान यह सवाल फिर से उभरा कि क्या एक राज्य की पुलिस दूसरे राज्य से आरोपी को बिना सूचना दिए ले जा सकती है। मंगलवार रात दिल्ली और हरियाणा पुलिस की टीम ने रोहड़ू इलाके से तीन लोगों को हिरासत में लिया और उन्हें दिल्ली ले जाने लगी। बुधवार सुबह हिमाचल प्रदेश पुलिस ने रास्ते में गाड़ियों को रोककर पूछताछ की। अंततः ट्रांजिट रिमांड मिलने के बाद आरोपी दिल्ली ले जाए गए।

    दूसरे राज्य से गिरफ्तारी के नियम

    भारत में एक राज्य की पुलिस दूसरे राज्य में जाकर गिरफ्तारी कर सकती है लेकिन इसके लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। इसे नियंत्रित करते हैं दंड प्रक्रिया संहिता और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश जैसे कि डी.के. बसु बनाम राज्य मामला।

    इंटर-स्टेट गिरफ्तारी के नियम इस प्रकार हैं

    स्थानीय पुलिस को पूर्व सूचना देना जिस राज्य में गिरफ्तारी करनी है वहां के थाने को पहले जानकारी देना आवश्यक है।ट्रांजिट रिमांड लेना आरोपी को नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है और ट्रांजिट रिमांड मिलना चाहिए। यह कानूनी अनुमति है जिससे आरोपी को दूसरे राज्य ले जाया जा सकता है।स्थानीय पुलिस स्टेशन में रिकॉर्ड दर्ज करना गिरफ्तारी की पूरी जानकारी डायरी में दर्ज करनी होती है।पुलिस अधिकारियों की पहचान स्पष्ट होना गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी वर्दी में हों पहचान पत्र दिखाएं और अपनी पहचान स्पष्ट करें।

    नियम तोड़ने पर परिणाम

    अगर पुलिस बिना स्थानीय पुलिस को बताए और ट्रांजिट रिमांड लिए आरोपी को ले जाती है तो ऐसी गिरफ्तारी अवैध मानी जाएगी। परिणामस्वरूप संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अपहरण गैरकानूनी हिरासत या बंधक बनाने के आरोप लग सकते हैं।सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का उल्लंघन अदालत की अवमानना माना जा सकता है। विभागीय जांच निलंबन या अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई भी संभव है।

  • वोटिंग अनिवार्य बनाने पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, NOTA की उपयोगिता पर जताई शंका

    वोटिंग अनिवार्य बनाने पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, NOTA की उपयोगिता पर जताई शंका


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट ने मतदान को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए अधिक से अधिक नागरिकों का मतदान केंद्र तक पहुंचना जरूरी है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि वोटिंग को अनिवार्य बनाने जैसे उपायों पर विचार किया जा सकता है, ताकि लोग अपने मताधिकार का सक्रिय रूप से इस्तेमाल करें।

    यह टिप्पणी उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें मांग की गई है कि यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में केवल एक उम्मीदवार ही मैदान में हो, तब भी उसे निर्विरोध विजयी घोषित करने के बजाय चुनाव कराया जाए, ताकि मतदाता “इनमें से कोई नहीं” (NOTA) का विकल्प चुन सकें।


    अदालत ने पूछा—क्या NOTA से बदली है स्थिति?

    सुनवाई के दौरान पीठ ने यह सवाल उठाया कि NOTA लागू होने के बाद क्या वास्तव में:

    • मतदान प्रतिशत में वृद्धि हुई है?

    • उम्मीदवारों की गुणवत्ता में सुधार देखने को मिला है?

    अदालत ने कहा कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि कोई प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए—बहुत कठोर नहीं, लेकिन ऐसी कि नागरिक मतदान के लिए प्रेरित हों।


    ग्रामीण बनाम शहरी मतदान पर भी चर्चा

    सुनवाई के दौरान यह भी उल्लेख किया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान को अक्सर एक उत्सव की तरह देखा जाता है। लोग समूह में मतदान करने जाते हैं, जबकि अनुभव बताता है कि शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग कई बार मतदान में अपेक्षाकृत कम भागीदारी करता है।


    किस प्रावधान को दी गई है चुनौती?

    याचिका में जनप्रतिनिधित्व कानून की उस धारा को चुनौती दी गई है, जिसके तहत यदि चुनाव मैदान में केवल एक उम्मीदवार रह जाता है, तो उसे बिना मतदान के निर्वाचित घोषित किया जा सकता है।

    याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस स्थिति में मतदाताओं को NOTA का विकल्प प्रयोग करने का अवसर ही नहीं मिलता, जिससे लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति सीमित हो जाती है।


    याचिकाकर्ताओं का पक्ष

    याचिका में कहा गया कि यदि NOTA के परिणामों को वास्तविक प्रभाव दिया जाए, तो अधिक मतदाता मतदान के लिए प्रेरित होंगे। वर्तमान व्यवस्था में NOTA चुनने का कोई प्रत्यक्ष परिणाम नहीं निकलता, जिससे मतदाताओं का उत्साह कम होता है।


    व्यापक बहस की शुरुआत

    अदालत की इन टिप्पणियों ने अनिवार्य मतदान, मतदाता सहभागिता और NOTA की प्रभावशीलता जैसे मुद्दों पर नई बहस छेड़ दी है। मामला अभी विचाराधीन है और आगे की सुनवाई में इस पर विस्तृत कानूनी विमर्श होने की संभावना है।

  • सहारा समूह पर बड़ा निवेशक घोटाला: मध्य प्रदेश में लगभग 6,689 करोड़ रुपए की राशि के गबन के 9 लाख से अधिक शिकायत आवेदन मिले

    सहारा समूह पर बड़ा निवेशक घोटाला: मध्य प्रदेश में लगभग 6,689 करोड़ रुपए की राशि के गबन के 9 लाख से अधिक शिकायत आवेदन मिले

    भोपाल । मध्य प्रदेश सहारा समूह से जुड़े निवेशकों की रकम के गबन का बड़ा मामला सामने आया है। राज्य सरकार को कुल लगभग 9 लाख से अधिक शिकायती आवेदन प्राप्त हुए हैं जिनमेंकुल 6 689 करोड़ रुपए की राशि के निवेशकों के साथ गबन होने का दावा किया गया है। यह जानकारी आज विधानसभा में राज्य मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल ने गृह विभाग की ओर से दी।

    मध्य प्रदेश विधानसभा के प्रश्नकाल के दौरान कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह ने सहारा समूह को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने सरकार से पूछा कि प्रदेश में सहारा के निवेशकों की राशि के संबंध में कुल कितनी शिकायतें मिली हैं और कितना पैसा निवेशकों को वापस मिला है। इसके उत्तर में राज्य मंत्री पटेल ने बताया कि सरकार को 9 06 661 शिकायत आवेदन मिले हैं और इनमें कुल राशि करीब 6 689 करोड़ रुपये के निवेशकों की है।

    सरकार ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सहारा रिफंड पोर्टल बनाया गया है जिसके माध्यम से निवेशकों को उनकी राशि वापस करने की प्रक्रिया चल रही है। इस पोर्टल के तहत अब तक लगभग 355 करोड़ रुपये निवेशकों को वापस किये जा चुके हैं लेकिन कुल राशि की तुलना में यह राशि केवल एक छोटा हिस्सा है।

    इस घोटाले को लेकर सदन में स्पष्ट किया गया कि सहारा समूह की कई संपत्तियाँ न्यायालय के आदेश के अनुरूप अटैच की गई हैं और सुप्रीम कोर्ट के तहत निवेशकों की राशि वापस करने का काम जारी है। हालांकि शिवपुरी में दर्ज एफआईआर की संख्या के बारे में सरकार ने कहा कि 1 जनवरी 2024 के बाद समूह के खिलाफ लगभग 4 एफआईआर दर्ज की गई हैं और अन्य मामलों को मुरैना कोतवाली में मर्ज किया जा रहा है।

    विपक्ष ने सरकार से यह भी पूछा कि क्या राज्य सरकार के पास निवेशकों की राशि की वसूली या संपत्तियों के नीलामी के कोई ठोस कार्यक्रम हैं ताकि निवेशकों को उनका धन लौटाया जा सके। मंत्री ने जवाब दिया कि यह मामला न्यायिक प्रकृति का है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ही आगे की कार्रवाई की जा रही है। यह विषय राज्य पुलिस की सीमा से बाहर है और उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय के मार्गदर्शन में ही निवेशकों की राशि वापस की जाएगी।

    विशेषज्ञों और निवेशकों की मांग है कि सहारा मामले में पारदर्शिता और तेजी लाने की जरूरत है ताकि लंबे समय से अपना पैसा वापस पाने के लिए प्रतीक्षा कर रहे लाखों निवेशकों को न्याय मिल सके। निवेशकों की शिकायतें कई वर्षों से लंबित हैं और न्यायपालिका के आदेशों के बावजूद वापस प्राप्त राशि बहुत कम है। इस घोटाले की व्यापक प्रकृति के कारण देश भर में सहारा समूह के खिलाफ मामले दर्ज हैं और जांच एजेंसियाँ सक्रिय हैं।