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  • तमिलनाडु नए सीएम के शपथ समारोह में राष्ट्रगीत-राष्ट्रगान के बजा राज्य गीत, मचा सियासी संग्राम

    तमिलनाडु नए सीएम के शपथ समारोह में राष्ट्रगीत-राष्ट्रगान के बजा राज्य गीत, मचा सियासी संग्राम


    चेन्नई।
    तमिलनाडु (Tamil Nadu) के नए मुख्यमंत्री (New Chief Minister) और टीवीके चीफ जोसेफ विजय (TVK Chief Joseph Vijay) के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान तमिलनाडु के राज्य गीत ‘तमिल थाई वजथु’ (Tamil Thai Vazhthu) को देश के राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के बाद तीसरे स्थान पर गाए जाने को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है. तमिलनाडु की राजनीति में भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता हमेशा से बेहद संवेदनशील मुद्दे रहे हैं, ऐसे में इस घटनाक्रम ने राज्य के सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है।

    चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू इंडोर स्टेडियम में रविवार को आयोजित भव्य समारोह में टीवीके प्रमुख जोसेफ विजय ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई. शपथ ग्रहण समारोह के शुरुआत में ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ प्रस्तुत किया गया, जबकि परंपरागत रूप से राज्य के सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत में गाए जाने वाले ‘तमिल थाई वजथु’ को वरीयता क्रम में तीसरे स्थान पर रखा गया।

    इसी बात को लेकर विपक्षी दलों और टीवीके को समर्थन देने वाले सहयोगी दलों ने कड़ी नाराजगी जताई है. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के तमिलनाडु राज्य सचिव एम वीरपांडियन ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि ‘तमिल थाई वजथु’ को हमेशा सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत में सम्मानपूर्वक गाया जाता रहा है और उसे उसका उचित स्थान मिलना चाहिए. उन्होंने टीवीके प्रमुख विजय के नेतृत्व वाली नई सरकार से इस मामले में स्पष्टीकरण की मांग करते हुए कहा कि भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं होनी चाहिए।


    TVK के सहयोगी दलों ने जताई नाराजगी

    सीपीआई के साथ-साथ सीपीएम, वीसीके और आईयूएमएल जैसी पार्टियों ने भी टीवीके सरकार को समर्थन दिया है, इसलिए सहयोगी दलों की ओर से उठी यह नाराजगी राजनीतिक रूप से अहम मानी जा रही है. पीएमके संस्थापक एस रामदास ने भी बयान जारी कर कहा कि राज्य सरकार को सभी सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में ‘तमिल थाई वजथु’ को उचित सम्मान और प्राथमिकता सुनिश्चित करनी चाहिए. वहीं वीसीके प्रमुख थोल थिरुमावलवन ने भी इस घटना की निंदा करते हुए कहा कि तमिल पहचान और संस्कृति से जुड़े प्रतीकों के साथ इस तरह का व्यवहार उचित नहीं है।

    विवाद यहीं तक सीमित नहीं रहा. टीवीके विधायक एम वी करुप्पैया के प्रोटेम स्पीकर के रूप में शपथ ग्रहण समारोह में भी ‘तमिल थाई वजथु’ को वरीयता क्रम में तीसरे स्थान पर रखा गया था. इसके बाद यह मुद्दा और ज्यादा तूल पकड़ने लगा है. तमिलनाडु की राजनीति में भाषा और सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा लंबे समय से बेहद संवेदनशील रहा है. द्रविड़ राजनीति की पूरी विचारधारा ही तमिल भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता के इर्द-गिर्द विकसित हुई है. ऐसे में मुख्यमंत्री विजय के शपथ ग्रहण समारोह में राज्य गीत ‘तमिल थाई वजथु’ को प्राथमिकता नहीं दिए जाने को विपक्ष और सहयोगी दल तमिल पहचान की उपेक्षा के तौर पर पेश कर रहे हैं।


    विवाद पर टीवीके सरकार ने दी सफाई

    हालांकि, विवाद बढ़ने पर टीवीके सरकार में मंत्री आधव अर्जुन स्पष्टीकरण जारी किया. उन्होंने कहा, ‘नीरारुम कदलुथुदा… से शुरू होने वाला तमिल वंदना गीत तमिल समाज की 100 साल से अधिक पुरानी सांस्कृतिक विरासत और गौरव का प्रतीक है. तमिलनाडु सरकार ने इसे राज्य गीत का दर्जा दिया है और परंपरा के अनुसार राज्य के सभी सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत इसी गीत से होती है, जबकि अंत में राष्ट्रगान बजाया जाता है. हालांकि मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के शपथ ग्रहण समारोह में पहले राष्ट्रगीत वंदे मातरम्, फिर राष्ट्रगान जन मन गण और उसके बाद तमिल थाई वजथु प्रस्तुत किया गया।

    आधव अर्जुन ने आगे कहा, ‘टीवीके सरकार इस नई व्यवस्था से सहमत नहीं है. राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर की ओर से बताया गया कि केंद्र सरकार के नए सर्कुलर के कारण ऐसा करना पड़ा. टीवीके सरकार ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में पुरानी परंपरा ही लागू रहेगी, यानी सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत ‘तमिल थाई वजथु’ से होगी और अंत राष्ट्रगान से किया जाएगा. पार्टी ने यह भी कहा कि देश के सभी राज्यों में राज्य भाषा के वंदना गीत को कार्यक्रम की शुरुआत में सम्मानपूर्वक स्थान मिलना चाहिए।

  • तमिलनाडु में विजय सरकार की सबसे बड़ी चुनौती, चुनावी वादों पर खर्च कैसे उठाएगा कर्ज में डूबा राज्य?

    तमिलनाडु में विजय सरकार की सबसे बड़ी चुनौती, चुनावी वादों पर खर्च कैसे उठाएगा कर्ज में डूबा राज्य?


    नई दिल्ली।
    तमिलनाडु की राजनीति में अभिनेता से नेता बने विजय ने शानदार चुनावी सफलता हासिल कर सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बना लिया है। लेकिन अब उनकी असली परीक्षा सरकार चलाने और जनता से किए गए बड़े चुनावी वादों को पूरा करने की होगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव जीतने से ज्यादा कठिन काम आर्थिक दबावों के बीच वादों को जमीन पर उतारना होगा।

    चुनाव प्रचार के दौरान विजय और उनकी पार्टी टीवीके ने कई महत्वाकांक्षी घोषणाएं की थीं। इनमें महिलाओं को हर महीने ₹2500 सहायता राशि, गरीब महिलाओं के विवाह के लिए 8 ग्राम सोना और सिल्क साड़ी, स्वयं सहायता समूहों को ₹5 लाख तक की मदद और हर साल 6 मुफ्त एलपीजी सिलेंडर जैसी योजनाएं शामिल हैं। इन वादों ने महिला मतदाताओं पर बड़ा असर डाला।

    युवाओं के लिए भी पार्टी ने बड़े ऐलान किए थे। बेरोजगार ग्रेजुएट्स को ₹4000 मासिक भत्ता देने और छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए ₹20 लाख तक का बिना गारंटी वाला शिक्षा ऋण देने का वादा किया गया। इसके अलावा किसानों के लिए कृषि ऋण माफी और धान-गन्ने पर कानूनी एमएसपी लागू करने की बात भी कही गई।

    सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन वृद्धि और अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी करने जैसे वादों ने भी चुनाव में अहम भूमिका निभाई। हालांकि, अब सबसे बड़ा सवाल इन सभी योजनाओं के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने का है।

    तमिलनाडु देश के औद्योगिक रूप से मजबूत राज्यों में गिना जाता है, लेकिन राज्य पर पहले से भारी कर्ज़ का बोझ है। वित्तीय आंकड़ों के अनुसार राज्य का कर्ज लगातार बढ़ रहा है, जिसकी बड़ी वजह कल्याणकारी योजनाओं, सब्सिडी, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और ब्याज भुगतान को माना जा रहा है।

    ऐसे में नई सरकार के सामने दोहरी चुनौती होगी। एक ओर जनता से किए गए वादों को पूरा करने का दबाव रहेगा, वहीं दूसरी ओर वित्तीय अनुशासन बनाए रखना भी जरूरी होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खर्च और राजस्व के बीच संतुलन नहीं बना, तो राज्य की आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

    विजय की सबसे बड़ी ताकत उनकी लोकप्रियता और मजबूत जनाधार है। फिल्मी दुनिया से राजनीति में आने के कारण उनके पास बड़ी संख्या में समर्थक हैं, लेकिन प्रशासन चलाने के लिए केवल लोकप्रियता काफी नहीं मानी जाती। शासन में आर्थिक प्रबंधन, नीतिगत फैसले और प्रशासनिक अनुभव की भी अहम भूमिका होती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि विजय सरकार विकास और कल्याणकारी योजनाओं के बीच संतुलन कैसे बनाती है। तमिलनाडु की जनता ने नई उम्मीदों के साथ उन्हें मौका दिया है, लेकिन अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उन उम्मीदों को हकीकत में बदलने की होगी।

  • फर्जी समर्थन पत्र विवाद के बाद थलपति विजय की सरकार गठन कोशिशों पर उठे बड़े सवाल

    फर्जी समर्थन पत्र विवाद के बाद थलपति विजय की सरकार गठन कोशिशों पर उठे बड़े सवाल

    नई दिल्ली ।
    तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राज्य की राजनीति में जबरदस्त हलचल देखने को मिल रही है। सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थलपति विजय की पार्टी सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन जुटाने में लगातार सक्रिय है, लेकिन इसी बीच एक नए विवाद ने पूरे घटनाक्रम को और ज्यादा उलझा दिया है। एएमएमके प्रमुख टीटीवी दिनाकरन ने विजय की पार्टी पर फर्जी समर्थन पत्र तैयार कर राज्यपाल को सौंपने का गंभीर आरोप लगाया है। इस दावे के बाद राजनीतिक माहौल अचानक गरमा गया और मामला अब कानूनी दायरे तक पहुंच चुका है।

    दिनाकरन ने चेन्नई के गुइंडी थाने में शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि उनकी पार्टी के विधायक एस कामराज के नाम का गलत इस्तेमाल किया गया। उनका आरोप है कि विजय की पार्टी ने ऐसा दस्तावेज पेश किया जिसमें यह दिखाने की कोशिश की गई कि एएमएमके विधायक सरकार गठन के लिए टीवीके का समर्थन कर रहे हैं। दिनाकरन के अनुसार, जब मूल पत्र प्रस्तुत करने की बात आई तब उन्होंने खुद राज्यपाल से मुलाकात कर असली दस्तावेज सौंपा, जिसमें उनकी पार्टी का समर्थन किसी और गठबंधन के पक्ष में बताया गया था। उन्होंने इस पूरे मामले को लोकतंत्र के खिलाफ साजिश बताते हुए दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

    इस विवाद के केंद्र में मौजूद विधायक एस कामराज को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। कुछ समय पहले दिनाकरन ने दावा किया था कि उनके विधायक संपर्क से बाहर हैं और उन पर दबाव बनाया जा रहा है। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें शुरू हो गई थीं। हालांकि बाद में विजय की पार्टी की तरफ से एक वीडियो सामने आया जिसमें विधायक कामराज यह कहते दिखाई दिए कि उन्होंने अपनी मर्जी और सहमति से समर्थन देने का फैसला लिया है। इस वीडियो के सामने आने के बाद मामला और ज्यादा उलझ गया क्योंकि दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर कायम हैं।

    थलपति विजय की पार्टी लगातार यह कह रही है कि उन्हें सरकार बनाने के लिए किसी प्रकार की खरीद-फरोख्त या दबाव की राजनीति की जरूरत नहीं है। पार्टी का दावा है कि उन्हें विधायकों का समर्थन स्वाभाविक रूप से मिल रहा है और विरोधी दल केवल भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर दिनाकरन इस पूरे मामले को गंभीर आपराधिक साजिश बता रहे हैं और उनका कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गलत असर पड़ेगा।

    तमिलनाडु में इस समय सरकार गठन का गणित बेहद दिलचस्प स्थिति में पहुंच चुका है। हर राजनीतिक दल अपने समर्थन के आंकड़े मजबूत दिखाने में जुटा हुआ है। राजभवन में लगातार बैठकों और राजनीतिक गतिविधियों का दौर जारी है। ऐसे माहौल में यह विवाद सत्ता की तस्वीर बदल सकता है। अगर जांच में किसी प्रकार की गड़बड़ी सामने आती है तो इसका सीधा असर सरकार गठन की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।

    राज्य की जनता अब पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रखे हुए है। राजनीतिक आरोपों, समर्थन पत्रों और कानूनी शिकायतों के बीच तमिलनाडु की राजनीति में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि बहुमत का दावा किसके पक्ष में जाता है और क्या यह विवाद राज्य की नई सरकार बनने की राह में बड़ी बाधा साबित होगा।

  • तमिलनाडु में फंसा पेंच… विजय के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए AIADMK-DMK मिला सकते हैं हाथ!

    तमिलनाडु में फंसा पेंच… विजय के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए AIADMK-DMK मिला सकते हैं हाथ!


    चेन्नई।
    तमिलनाडु (Tamil Nadu) में सरकार बनाने को लेकर पेंच फंसता ही जा रहा है। किसी भी दल या गठबंधन के पास बहुमत नहीं होने के कारण अभी तक सरकार बनाने का रास्ता साफ नहीं हुआ है। इस बीच दक्षिण भारत (South India) के इस राज्य की राजनीति में एक ऐसा घटनाक्रम देखने को मिल रहा है, जिसकी कल्पना पिछले 50 वर्षों में किसी ने नहीं की थी। अभिनेता से नेता बने विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए राज्य के दो सबसे बड़े कट्टर प्रतिद्वंद्वी डीएमके (DMK) और एआईएडीएमके (AIADMK) हाथ मिला सकते हैं। दोनों को साथ लाने में भाजपा (BJP) बड़ी भूमिका निभा सकती है।

    एक रिपोर्ट के अनुसार, डीएमके के उदयनिधि स्टालिन गुट को डर है कि विजय का उदय पूर्व मुख्यमंत्री एम.जी. रामचंद्रन (MGR) के दौर की याद दिला सकता है। एमजीआर ने अपने जीवनकाल में डीएमके को कभी सत्ता में नहीं आने दिया था। वहीं, जयललिता के निधन के बाद लगातार चार चुनाव हार चुकी AIADMK अपनी राजनीतिक वजूद बचाने के लिए इस गठबंधन पर विचार कर रही है।

    सूत्रों का कहना है कि भाजपा इस गठबंधन को पर्दे के पीछे से समर्थन दे रही है ताकि कांग्रेस को सत्ता से दूर रखा जा सके। आपको बता दें कि अभी तक सिर्फ कांग्रेस ने ही अपने पांच विधायकों के साथ ऐक्टर विजय को समर्थन देने का ऐलान किया है।


    क्या है प्रस्तावित फॉर्मूला?

    योजना के मुताबिक, ई. पलानीस्वामी (EPS) मुख्यमंत्री बनेंगे और DMK बाहर से समर्थन देगी। हालांकि पार्टी प्रमुख एम.के. स्टालिन और पुराने नेता इस अजीब प्रयोग से डरे हुए हैं। उन्हें डर है कि इस बेमेल गठबंधन से समर्थकों के बीच भारी आक्रोश पैदा हो सकता है।


    विजय ने दी इस्तीफे की चेतावनी

    जैसे ही इस संभावित गठबंधन की खबरें फैलीं, विजय की पार्टी टीवीके ने बड़ा दांव चल दिया है। टीवीके ने घोषणा की है कि यदि DMK-AIADMK गठबंधन सरकार बनाने का दावा पेश करता है, तो उनके सभी 108 विधायक सामूहिक इस्तीफा दे देंगे। यह कदम जनता और प्रशंसकों को सड़कों पर उतारने की एक सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है।


    किसके पास कितनी सीटें

    आपको बता दें कि इस विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन चाहिए। फिलहाल विजय की पार्टी टीवीके के पास सबसे अधिक 108 सीटें हैं। वहीं डीएमकी गठबंधन के पास 74 विधायक हैं। इनमें डीएमके 59, कांग्रेस पांच और अन्य की 10 सीटें हैं। एआईएडीएमके गठबंधन के पास यहां 53 सीटें हैं। वहीं, अन्य की संख्या 6 है।


    गवर्नर ने नहीं दिया सरकार बनाने का न्योता

    108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद राज्यपाल आर.वी. अर्लेकर ने विजय को सरकार बनाने का न्यौता देने से इनकार कर दिया है। राज्यपाल का कहना है कि विजय पहले 118 विधायकों का समर्थन पत्र दिखाएं। कई दलों ने राज्यपाल की इस मांग की आलोचना की है। उनका तर्क है कि बहुमत सदन के पटल पर साबित किया जाना चाहिए, न कि राजभवन में। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 10 मई को समाप्त हो रहा है, जिससे राज्य में संवैधानिक संकट गहरा गया है।

    इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए वामपंथी दलों और वीसीके की सहमति जरूरी है। विजय ने पहले ही इन पार्टियों से संपर्क साधा है, लेकिन वे फिलहाल वेट एंड वॉच की स्थिति में हैं।

  • तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा… किसी भी दल के पास बहुमत नहीं, अब क्या करेंगे गवर्नर?

    तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा… किसी भी दल के पास बहुमत नहीं, अब क्या करेंगे गवर्नर?


    चेन्नई।
    तमिलनाडु (Tamil Nadu) की जनता ने इस विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) में ऐसा फैसला सुनाया है कि वहां की राजनीति फंस सी गई है। किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। अभिनेता से राजनेता बने विजय (Vijay) की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (Tamilaga Vetri Kazhagam- TVK) ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में 108 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर इतिहास तो रच दिया है, लेकिन सत्ता से अभी भी दूर ही नजर आ रही है। उनके पास सरकार बनाने के लिए जरूरी 117 विधायकों का समर्थन प्राप्त नहीं है। राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर (Governor Rajendra Arlekar) ने विधानसभा तो भंग कर दी है, लेकिन विजय को सरकार बनाने का न्यौता देने से पहले बहुमत का ठोस सबूत पेश करने को कहा है।

    आपको यह भी बता दें कि विजय ने दो सीटों से चुनाव जीता है। नियमों के मुताबिक उन्हें एक सीट छोड़नी होगी। इसके साथ पार्टी के विधायकों की संख्या 107 ही रह जाएगी। उन्हें बहुमत के लिए 10 और विधायकों के समर्थन की जरूरत है। इस चुनाव में सत्तारूढ़ डीएमके गठबंधन को 59, एआईएडीएमके गठबंधन को 47, कांग्रेस को 5 और पीएमके को 4 सीटें मिली हैं। अन्य छोटे दलों के पास 2 सीटें हैं। कांग्रेस ने टीवीके को समर्थन देने का एलान किया है, जिससे आंकड़ा 112 तक पहुंचता है। हालांकि, अभी भी 5 और सीटों की दरकार है। चर्चा यह भी है कि भाजपा के समर्थन से टीवीके और एआईएडीएमके के बीच भी बातचीत चल रही है।


    त्रिशंकु विधानसभा के हालात में क्या करेंगे राज्यपाल?

    नियमों के मुताबिक, जब किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो राज्यपाल के पास शक्तियां होती हैं। न्यायमूर्ति आरएस सरकारिया के अनुसार, राज्यपाल का मुख्य कार्य सरकार का गठन करवाना है न कि अपनी पसंद की विचारधारा वाली सरकार चुनना। राज्यपाल को सबसे पहले चुनाव पूर्व गठबंधन, उसके बाद सबसे बड़ी पार्टी और सबसे अंत में चुनाव बाद का गठबंधन को मौका देना होता है। यह उस स्थिति में होता है जब उनके पास सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्याबल हो। मुख्यमंत्री को पद संभालने के 30 दिनों के भीतर सदन में विश्वास मत हासिल करना होगा। बहुमत का फैसला राजभवन में नहीं बल्कि विधानसभा के फ्लोर पर होना चाहिए।


    राज्यपालों के विवादित फैसले

    हालांकि, राज्यपालों ने अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग रुख अपनाए हैं, जिससे अक्सर विवाद पैदा हुए हैं। 2017 में गोवा और मिजोरम में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन वहां के राज्यपालों ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए बुलाया क्योंकि भाजपा ने अन्य दलों के समर्थन के पत्र पहले पेश कर दिए थे। इसके एक साल बाद कर्नाटक में भी ऐसी ही स्थिति थी। यहां भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी। राज्यपाल ने बी.एस. येदियुरप्पा को शपथ दिला दी, लेकिन कांग्रेस और जेडीएस के चुनाव बाद गठबंधन ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 24 घंटे के भीतर बहुमत साबित करने की चुनौती मिलने पर येदियुरप्पा को इस्तीफा देना पड़ा।

  • तमिलनाडु में TVK का कमाल…. लेकिन अभी राजनीति में नहीं आना चाहते थे विजय….जानें इसकी वजह?

    तमिलनाडु में TVK का कमाल…. लेकिन अभी राजनीति में नहीं आना चाहते थे विजय….जानें इसकी वजह?


    चेन्नई।
    सोमवार को आए तमिलनाडु विधानसभा (Tamil Nadu Assembly elections) के चुनावी नतीजों में हाल ही में बनी पार्टी टीवीके (TVK) ने कमाल कर दिया। अपने पहले ही चुनाव में टीवीके चीफ थालापति विजय (TVK Chief Thalapathy Vijay) की पार्टी ने तमिलनाडु के 108 सीटों पर जीद दर्ज की है। आज पूरे देश में नई बनी पार्टी टीवीके और थालापति विजय की चर्चा है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब थालापति विजय राजनीति में नहीं आना चाहते थे। राजनीति में आने से पहले अपने भविष्य को लेकर विजय थालापति असमंजस में रहते थे। आइए जानते हैं उन्हें किस बात का डर था और वो राजनीति में अभी क्यों नहीं आना चाहते थे।


    किस बात का था डर

    साउथ की फिल्मों में सुपरस्टार थालापति विजय बॉक्स ऑफिस पर एकदम हिट थे और प्रदेश की जनता भी उन्हें भगवान की तरह पूजती थी, लेकिन वो राजनीति में नहीं आना चाहते थे। विजय के पिता भी चाहते थे कि वो राजनीति में आएं, लेकिन उनको अपने ऊपर पूरी तरह भरोसा नहीं था। अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर थालापति विजय निश्चित नहीं थे, इसलिए वो पार्टी नहीं बनाना चाहते थे।

    थालापति विजय ने अचानक क्यों बनाई पार्टी
    थालापति के माता-पिता उन्हें साल 2009 से ही राजनीति में लाना चाहते थे, क्योंकि पूरे तमिलनाडु में उनकी लोकप्रियता और फैन फॉलोइंग बहुत ज्यादा थी। लेकिन वो राजनीति में नहीं आए। इस दौरान वो चाहते थे कि प्रदेश में ऐसा वैक्यूम बने जब एक नई राजनीतिक पार्टी की जरूरत हो। साल 2016 में जयललिता के निधन के बाद एआईएडीएमके (AIADMK) अपनी साख खोती दिख रही थी। तमिलनाडु में मजबूत संगठन के बावजूद अपने शीर्ष नेताओं के बीच चल रही लगातार लड़ाई के कारण एआईएडीएमके ने अपनी राजनीतिक हैसियत को खत्म कर लिया। इस दौरान विजय थालापति ने एआईएडीएमके के खिलाफ बुगल फूंक दिया और बीजेपी को भी निशाने पर लिया।

    एआईएडीएमके के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और बीजेपी के खिलाफ सांप्रदायिकता का आरोप लगाकर विजय ने जमीन पर अपना काम शुरू कर दिया। इस दौरान विजय को युवाओं और महिलाओं के बीच काफी समर्थन मिला। इसी समय विजय ने पार्टी बनाने का मन बना लिया और साल 2026 के चुनावों में कमाल करते हुए पहली बार में ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर आई।

  • दिल्ली और बंगाल के बाद BJP के सामने बचे ये 3 बड़े राजनीतिक किले, अब असली परीक्षा शुरू

    दिल्ली और बंगाल के बाद BJP के सामने बचे ये 3 बड़े राजनीतिक किले, अब असली परीक्षा शुरू

    नई दिल्ली। हाल के चुनावी नतीजों और रुझानों ने भारतीय राजनीति की तस्वीर को काफी हद तक बदल दिया है। दिल्ली में जीत और पश्चिम बंगाल में बढ़त के बाद भाजपा का राजनीतिक प्रभाव लगातार विस्तार करता दिख रहा है। हालांकि इस सफलता के बीच भी देश में कुछ ऐसे राज्य हैं, जहां पार्टी के लिए स्थिति अभी भी बेहद चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। इन राज्यों को राजनीतिक रूप से सबसे कठिन क्षेत्र माना जाता है, जहां जीत हासिल करना किसी बड़ी परीक्षा से कम नहीं है।

    पंजाब इस सूची में सबसे ऊपर आता है। यहां राजनीति लंबे समय से क्षेत्रीय भावनाओं, किसान मुद्दों और स्थानीय नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमती रही है। राज्य में मतदाता काफी जागरूक और मुद्दा-आधारित वोटिंग के लिए जाने जाते हैं। यहां शहरी और ग्रामीण दोनों ही इलाकों की राजनीतिक सोच अलग-अलग है, जिससे किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए स्थायी पकड़ बनाना आसान नहीं होता। हालांकि भाजपा लगातार अपनी रणनीति को मजबूत करने में लगी है, लेकिन जमीन पर व्यापक समर्थन हासिल करना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।

    दूसरा राज्य केरल है, जहां राजनीति पूरी तरह वैचारिक और संगठित ढांचे पर आधारित मानी जाती है। यहां दशकों से दो प्रमुख राजनीतिक ध्रुवों के बीच मुकाबला चलता आ रहा है। मतदाता वर्ग में शिक्षा और राजनीतिक जागरूकता का स्तर काफी ऊंचा है, जिससे चुनावी निर्णय अधिक सोच-समझकर लिए जाते हैं। भाजपा यहां धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है, खासकर कुछ शहरी क्षेत्रों और स्थानीय निकायों में, लेकिन राज्य स्तर पर बड़ी सफलता अभी दूर नजर आती है।

    तीसरा और सबसे जटिल राजनीतिक मैदान तमिलनाडु है। यहां राजनीति की नींव मजबूत क्षेत्रीय पहचान, भाषा और सांस्कृतिक विचारधारा पर टिकी हुई है। द्रविड़ आंदोलन का प्रभाव आज भी यहां की राजनीति में गहराई से देखा जा सकता है। स्थानीय दलों की मजबूत पकड़ और सामाजिक समीकरणों के कारण यहां बाहरी राजनीतिक दलों के लिए विस्तार करना बेहद कठिन माना जाता है। हालांकि हाल के वर्षों में राजनीतिक परिदृश्य में कुछ नए बदलाव देखने को मिले हैं, जिससे भविष्य में समीकरण बदलने की संभावना को भी पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

    इन तीनों राज्यों की एक खास बात यह है कि यहां राष्ट्रीय राजनीति की तुलना में स्थानीय मुद्दे कहीं अधिक प्रभावी भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि यहां किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए स्थायी आधार बनाना आसान नहीं होता। इसके बावजूद भाजपा लगातार संगठन विस्तार, जमीनी संपर्क और स्थानीय नेताओं के साथ तालमेल के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

    राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इन राज्यों में सफलता हासिल करना केवल चुनावी जीत नहीं होगी, बल्कि यह संगठनात्मक क्षमता और रणनीतिक धैर्य की भी बड़ी परीक्षा होगी। यह भी माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में इन राज्यों की राजनीति और अधिक प्रतिस्पर्धी और दिलचस्प हो सकती है।

    कुल मिलाकर, दिल्ली और बंगाल की बढ़त के बाद भाजपा का सफर आसान नहीं है, क्योंकि असली चुनौती अभी बाकी है और वह इन तीन मजबूत राजनीतिक किलों में अपनी पकड़ बनाना है।

  • पश्चिम बंगाल में 1 बजे तक 60% से ज्यादा मतदान, तमिलनाडु थोड़ा पीछे, देंखे अब तक के आंकड़े

    पश्चिम बंगाल में 1 बजे तक 60% से ज्यादा मतदान, तमिलनाडु थोड़ा पीछे, देंखे अब तक के आंकड़े


    नई दिल्ली। चिलचिलाती गर्मी और छिटपुट हिंसा की घटनाओं के बावजूद पश्चिम बंगाल में मतदान को लेकर लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ। दोपहर एक बजे तक राज्य में 62.18% वोटिंग दर्ज की गई, जो तेज रफ्तार को दर्शाती है। वहीं तमिलनाडु में इसी समय तक 56.81% मतदान हुआ, जो बंगाल के मुकाबले थोड़ा कम है।

    जिलों में वोटिंग का अलग-अलग रुझान
    चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल के कई जिलों में मतदान 60% के आसपास या उससे अधिक रहा। मालदा में 58.45%, मुर्शिदाबाद में 62.71%, पश्चिम वर्धमान में 60.37%, पश्चिम मेदिनीपुर में 65.77% और पूर्वी मेदिनीपुर में 62.90% मतदान दर्ज किया गया। इसके अलावा पुरुलिया में 59.83%, उत्तरी दिनाजपुर में 60%, झारग्राम में 65.31%, कैलिम्पोंग में 59.52%, अलीपुरद्वार में 60.03%, बांकुरा में 64.58%, बीरभूम में 63.93%, कूचबिहार में 60.75%, दक्षिण दिनाजपुर में 63.05%, दार्जिलिंग में 59.81% और जलपाईगुड़ी में 60.84% वोटिंग हुई।

    तमिलनाडु में मतदान की रफ्तार थोड़ी धीमी
    तमिलनाडु के जिलों में भी मतदान जारी है, लेकिन कई जगहों पर आंकड़ा 60% से नीचे बना हुआ है। इरोड में 61.79%, करूर में 60.77% जैसे कुछ जिलों को छोड़ दें तो बाकी जगहों पर वोटिंग अपेक्षाकृत कम रही। कल्लाकुरिची में 57.15%, कांचीपुरम में 58.98%, कन्याकुमारी में 50.35%, मदुरै में 54.75%, चेन्नई में 54.58% और कोयंबटूर में 58.24% मतदान दर्ज किया गया।

    चुनावी चरण और नतीजों की तारीख
    पश्चिम बंगाल में पहले चरण के तहत 152 सीटों पर मतदान हो रहा है, जबकि तमिलनाडु में सभी सीटों के लिए एक ही चरण में वोटिंग कराई जा रही है। दोनों राज्यों के चुनाव परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे।

    बंगाल में कड़ा मुकाबला, 1478 उम्मीदवार मैदान में
    चुनाव आयोग के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की 152 सीटों पर कुल 1,478 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इन सीटों पर करीब 3.60 करोड़ मतदाता वोट डाल रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी सभी 152 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस 148 सीटों पर मैदान में है। पहले चरण का मतदान खासतौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह क्षेत्र उत्तर बंगाल, जंगलमहल और मतुआ बहुल इलाकों तक फैला है, जहां चुनावी मुकाबला काफी दिलचस्प बना हुआ है।

  • तमिलनाडु चुनाव में ब्राह्मण उम्मीदवारों की कमी, बड़ी पार्टियों की रणनीति ने खड़े किए सवाल

    तमिलनाडु चुनाव में ब्राह्मण उम्मीदवारों की कमी, बड़ी पार्टियों की रणनीति ने खड़े किए सवाल


    चेन्नई। तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों की उम्मीदवार सूची में एक खास रुझान देखने को मिल रहा है—ब्राह्मण समुदाय के उम्मीदवार लगभग गायब हैं। राज्य की आबादी में करीब 3 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले इस समुदाय को टिकट देने से प्रमुख पार्टियां इस बार बचती नजर आईं, जिसे विश्लेषक नई चुनावी रणनीति से जोड़ रहे हैं।
    प्रमुख दलों ने नहीं दिए टिकट

    करीब 35 वर्षों में पहली बार अन्नाद्रमुक ने विधानसभा चुनाव में एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतारा। दिवंगत नेता जे. जयललिता के निधन के बाद पार्टी ने पिछले एक दशक में केवल एक ब्राह्मण उम्मीदवार को मौका दिया था। 2021 में पूर्व डीजीपी आर. नटराज को टिकट दिया गया था।

    इसी तरह भारतीय जनता पार्टी ने भी 27 सीटों में से किसी पर ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतारा।

    द्रमुक और कांग्रेस ने भी इस समुदाय को प्रतिनिधित्व नहीं दिया।

    छोटे दलों ने दिए सीमित टिकट

    हालांकि तमिलगा वेत्रि कझगम (अभिनेता विजय की पार्टी) ने दो ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि नाम तमिलर कच्ची ने छह उम्मीदवार मैदान में उतारे। इन दलों ने मायिलापुर और श्रीरंगम जैसे क्षेत्रों को चुना, जहां ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक मानी जाती है।

    रणनीति के पीछे क्या वजह?
    विश्लेषकों का मानना है कि लंबे समय तक ब्राह्मण मतदाता अन्नाद्रमुक के साथ रहे, लेकिन हाल के वर्षों में उनका झुकाव भाजपा की ओर बढ़ा है। इसी कारण अन्नाद्रमुक को ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने में चुनावी लाभ नहीं दिख रहा। राजनीतिक टिप्पणीकार रवींद्रन दुरईसामी के अनुसार, पहले एम.जी. रामचंद्रन और जयललिता ब्राह्मण उम्मीदवारों को नियमित तौर पर मौका देते थे।

    वहीं विश्लेषक अरुण कुमार का कहना है कि जयललिता के निधन के बाद ब्राह्मण मतदाता भाजपा की ओर गए, जिससे अन्य दलों ने इस वर्ग पर कम ध्यान देना शुरू कर दिया।

    अलग-अलग दलों की अलग रणनीति
    TVK ब्राह्मण उम्मीदवार देकर खुद को गैर-ब्राह्मण राजनीति तक सीमित नहीं दिखाना चाहती
    DMK की राजनीति पारंपरिक रूप से गैर-ब्राह्मण सशक्तिकरण पर केंद्रित रही है
    NTK प्रमुख सीमन पहचान आधारित राजनीति पर जोर देते रहे हैं
    कुल मिलाकर, चुनावी समीकरणों और सामाजिक समीकरणों के बदलते रुझान के कारण तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व घटता नजर आ रहा है, जिसे विश्लेषक राज्य की बदलती राजनीतिक दिशा का संकेत मान रहे हैं।
  • मदुरै की जनसभा में प्रधानमंत्री मोदी का विपक्ष पर हमला, विकसित तमिलनाडु का रखा लक्ष्य

    मदुरै की जनसभा में प्रधानमंत्री मोदी का विपक्ष पर हमला, विकसित तमिलनाडु का रखा लक्ष्य


    मदुरै।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तमिलनाडु के मदुरै में राज्य के विकास, कानून-व्यवस्था, महिलाओं की सुरक्षा और केंद्र की योजनाओं के क्रियान्वयन जैसे मुद्दों पर जनसभा को संबोधित किया। उन्होंने तिरुप्परनकुंद्रम स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर में दर्शन के अनुभव से की।

    प्रधानमंत्री ने विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जनसभा से पहले वे तिरुप्परनकुंद्रम जाकर भगवान मुरुगन के दर्शन कर चुके हैं और यह उनके लिए अत्यंत आध्यात्मिक क्षण था। उन्होंने कहा कि उन्होंने तमिलनाडु और देश की समृद्धि के लिए प्रार्थना की। इस दौरान उन्हें एक युवा भक्त थिरु पूर्णा चंद्रन की याद आई, जिनका हाल ही में निधन हो गया था। वे उनकी पत्नी थिरुमति इंदुमति पूर्णा चंद्रन और उनके दो छोटे बच्चों से मिले तथा परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में कोई किसी से भयभीत नहीं होता और मतभेद होना स्वाभाविक है। वर्तमान राज्य सरकार के कार्यकाल में महिलाओं की सुरक्षा चिंता का विषय बनी हुई है। उनके अनुसार, अपराध की घटनाएं बढ़ी हैं और नशे तथा अवैध गतिविधियों के कारण अनेक परिवार प्रभावित हो रहे हैं।

    प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य ‘विकसित तमिलनाडु’ के बिना अधूरा है। उन्होंने राज्य को देश की प्रगति में निर्णायक भूमिका निभाने वाला प्रदेश बताया। प्रधानमंत्री ने कहा कि बंदरगाह, कॉरिडोर और लॉजिस्टिक्स से जुड़े कई प्रोजेक्ट पूर्व में लंबित रहे, लेकिन केंद्र सरकार ने उन्हें गति देने का प्रयास किया है। उन्होंने चेन्नई और कामराजा बंदरगाह के एकीकरण तथा मदुरवॉयल एलिवेटेड कॉरिडोर जैसे कार्यों का जिक्र करते हुए कहा कि इससे राज्य की आर्थिक गतिविधियों को बल मिला है।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि केंद्र की ग्रामीण आवास योजना के तहत लाखों परिवारों को पक्का घर मिला है। हालांकि कुछ परियोजनाएं राज्य स्तर पर समन्वय के अभाव में अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकीं। प्रधानमंत्री ने कहा कि शहर को बेहतर शहरी सुविधाओं, स्वच्छता और जल निकासी व्यवस्था की आवश्यकता है। केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से शहरी ढांचे को सुदृढ़ करने का प्रयास किया जा रहा है।

    उन्होंने कहा कि दुनिया भर में तमिल संस्कृति के प्रति सम्मान है। मलाया विश्वविद्यालय में तिरुवल्लुवर चेयर की स्थापना को उन्होंने तमिल भाषा और संस्कृति के वैश्विक प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प पूरे देश का है और इसमें तमिलनाडु की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी।