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  • पश्चिम बंगाल TMC विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, 20 सांसदों की सदस्यता पर दल-बदल कानून के तहत बढ़ी कानूनी कार्रवाई

    पश्चिम बंगाल TMC विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, 20 सांसदों की सदस्यता पर दल-बदल कानून के तहत बढ़ी कानूनी कार्रवाई

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों से जवाब मांगा है। यह नोटिस पार्टी के महासचिव और लोकसभा में दल के नेता अभिषेक बनर्जी की ओर से दायर याचिका पर जारी किया गया है। याचिका में इन सांसदों के खिलाफ दल-बदल कानून के तहत शुरू की गई अयोग्यता प्रक्रिया पर जल्द फैसला कराने की मांग की गई है।

    मामला उन 20 लोकसभा सांसदों से जुड़ा है, जिन्होंने तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई के साथ जुड़ने का कदम उठाया है। बागी सांसदों की ओर से अलग समूह के रूप में पहचान बनाने की कोशिश की गई है और संसद में उनके राजनीतिक रुख को लेकर भी विवाद सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि ये सांसद पार्टी के चुनाव चिह्न पर निर्वाचित हुए थे और बाद में पार्टी से अलग होने के कारण उनके खिलाफ संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।

    अभिषेक बनर्जी ने अपनी याचिका में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के समक्ष लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर समयबद्ध तरीके से फैसला लेने की मांग की है। उनका कहना है कि सांसदों के खिलाफ दल-बदल संबंधी शिकायतों पर प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रखा जा सकता। पार्टी की ओर से इस मामले में पहले भी लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष शिकायतें दाखिल की जा चुकी हैं।

    सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान लोकसभा अध्यक्ष की ओर से सॉलिसिटर जनरल पेश हुए। अदालत को बताया गया कि अध्यक्ष की ओर से संबंधित 20 सांसदों को पहले ही नोटिस जारी किए जा चुके हैं और उनसे जवाब मांगा गया है। इस जानकारी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अध्यक्ष को अलग से नोटिस जारी करने की आवश्यकता नहीं मानी। हालांकि अदालत ने मामले में शामिल बागी सांसदों से जवाब मांगा है।

    इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि विवाद का अगला महत्वपूर्ण चरण अब सांसदों के जवाब और लोकसभा स्तर पर चल रही अयोग्यता प्रक्रिया से जुड़ा होगा। अंतिम निर्णय आने तक इन सांसदों की संसदीय सदस्यता की स्थिति को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस जारी रहने की संभावना है।

    तृणमूल कांग्रेस के भीतर यह संकट पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तेज हुआ। पार्टी में नेतृत्व और राजनीतिक रणनीति को लेकर मतभेदों के बीच 20 सांसदों के अलग रुख अपनाने से लोकसभा में भी संगठनात्मक विभाजन की स्थिति बनी। बागी गुट और तृणमूल नेतृत्व इस घटनाक्रम की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं।

    दल-बदल कानून के तहत किसी सांसद की सदस्यता समाप्त करने का निर्णय केवल राजनीतिक विवाद के आधार पर नहीं होता, बल्कि संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया और तथ्यों के आधार पर लिया जाता है। इसलिए इस मामले में सांसदों के जवाब, उनके अलग समूह के दावे और पार्टी से उनके संबंधों की स्थिति महत्वपूर्ण होगी।

    सुप्रीम कोर्ट का नोटिस फिलहाल सदस्यता समाप्त होने का फैसला नहीं है, बल्कि संबंधित सांसदों से मामले पर उनका पक्ष जानने की न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। अब इस मामले में अदालत के समक्ष जवाब आने और लोकसभा अध्यक्ष के स्तर पर चल रही प्रक्रिया पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

  • बंगाल में TMC की अंदरूनी कलह के बीच मुस्लिम विधायक की घर वापसी, ममता के नेतृत्व में फिर जताया भरोसा

    बंगाल में TMC की अंदरूनी कलह के बीच मुस्लिम विधायक की घर वापसी, ममता के नेतृत्व में फिर जताया भरोसा

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान के बीच पार्टी को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बढ़त मिली है। उत्तर 24 परगना जिले की आमडांगा विधानसभा सीट से विधायक कासेम सिद्दीकी ने बागी गुट छोड़कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले खेमे में वापस लौटने की घोषणा की है। वापसी के बाद सिद्दीकी ने ममता बनर्जी के प्रति अपनी राजनीतिक निष्ठा दोहराते हुए कहा कि उनके लिए दीदी ही सब कुछ हैं।

    कासेम सिद्दीकी की वापसी ऐसे समय हुई है जब विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक मतभेद सामने आए हैं। पार्टी के कई विधायकों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए अलग गुट का रुख किया था। इस गुट के साथ बड़ी संख्या में विधायक जुड़े थे और पार्टी नेतृत्व के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा खोलने की कोशिश हुई थी।

    सिद्दीकी भी कुछ समय के लिए इसी बागी गुट के साथ थे। हालांकि अब उन्होंने वहां से अलग होकर ममता बनर्जी के साथ बने रहने का फैसला किया है। उन्होंने अपने निर्णय के पीछे की वजह बताते हुए कहा कि उन्हें बागी गुट के उद्देश्य को लेकर अलग जानकारी दी गई थी।

    सिद्दीकी के अनुसार, उन्हें बताया गया था कि कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर लिए जा रहे हैं और ये दस्तावेज ममता बनर्जी तक पहुंचाए जाएंगे। उन्हें यह भी बताया गया था कि बागी गुट ममता बनर्जी के नेतृत्व में ही काम करेगा। लेकिन बाद में जब उन्होंने गुट की गतिविधियों को देखा तो उन्हें वहां तृणमूल कांग्रेस प्रमुख के नेतृत्व या भूमिका का स्पष्ट उल्लेख दिखाई नहीं दिया।

    इसके बाद उन्होंने बागी गुट से अलग होने का फैसला किया। सिद्दीकी ने कहा कि उन्हें ममता बनर्जी ने टिकट दिया और उनके नेतृत्व में ही वह विधानसभा तक पहुंचे। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के दौरान उन्होंने ममता बनर्जी की तस्वीर के साथ लोगों के बीच जाकर समर्थन मांगा था और मतदाताओं ने भी उनके नेतृत्व को ध्यान में रखते हुए उन्हें समर्थन दिया।

    कासेम सिद्दीकी का राजनीतिक प्रभाव केवल उनके विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं माना जाता। उनका संबंध हुगली जिले के फुरफुरा शरीफ से जुड़े धार्मिक और सामाजिक प्रभाव वाले समुदाय से है। मुस्लिम समुदाय के बीच उनकी पकड़ को देखते हुए उनकी राजनीतिक स्थिति तृणमूल कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। पिछले साल पार्टी में शामिल होने के बाद उन्हें संगठन में राज्य महासचिव की जिम्मेदारी भी दी गई थी।

    इसके बाद विधानसभा चुनाव में उन्हें आमडांगा सीट से उम्मीदवार बनाया गया और उन्होंने जीत दर्ज की। अब उनका ममता बनर्जी के खेमे में लौटना पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी के बीच महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

    हालांकि कासेम सिद्दीकी की वापसी के बावजूद तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। पार्टी के दोनों पक्षों के बीच संगठनात्मक गतिविधियों को लेकर मतभेद बने हुए हैं। तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस को लेकर भी दोनों गुटों की ओर से अलग-अलग तैयारियां की जा रही हैं।

    28 अगस्त को मेयो रोड पर गांधी प्रतिमा के पास छात्र परिषद का स्थापना दिवस मनाने को लेकर विवाद सामने आया है। दोनों पक्षों ने कार्यक्रम की अनुमति के लिए अदालत का रुख किया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला खेमे पारंपरिक स्थान पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति चाहता है।

    ऐसे समय में कासेम सिद्दीकी की वापसी को पार्टी नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनकी वापसी यह संकेत देती है कि बागी खेमे के भीतर भी सभी विधायक एकजुट नहीं हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी किस दिशा में जाती है और कितने अन्य नेता या विधायक ममता बनर्जी के नेतृत्व में वापस आते हैं।

  • सर्किट हाउस विवाद में महुआ मोइत्रा की बढ़ीं मुश्किलें, कृष्णानगर अदालत ने समन के बाद गिरफ्तारी वारंट जारी किया

    सर्किट हाउस विवाद में महुआ मोइत्रा की बढ़ीं मुश्किलें, कृष्णानगर अदालत ने समन के बाद गिरफ्तारी वारंट जारी किया


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर से तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। कृष्णानगर की तृतीय न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने सर्किट हाउस विवाद से जुड़े एक मामले में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। यह कार्रवाई अदालत की ओर से जारी किए गए समन के बावजूद सुनवाई के दौरान उनकी उपस्थिति नहीं होने के बाद की गई है। मामले की जानकारी सामने आने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी इसकी चर्चा तेज हो गई है।

    पुलिस के अनुसार, मामला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 227 के तहत दायर शिकायत से जुड़ा हुआ है। शिकायत में महुआ मोइत्रा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की कई धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं। इनमें महिला की मर्यादा के अपमान, विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ाने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले जानबूझकर किए गए कृत्य, आपराधिक धमकी और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित करने वाले बयान से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।

    अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान महुआ मोइत्रा को कई बार समन जारी किए थे। निर्धारित प्रक्रिया के तहत अदालत में उपस्थित होने का अवसर दिए जाने के बावजूद उनकी पेशी नहीं हुई। इसके बाद न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए अदालत ने गिरफ्तारी वारंट जारी करने का आदेश दिया। पुलिस ने भी अदालत के इस आदेश की पुष्टि की है।

    यह पूरा विवाद 14 अगस्त की रात कृष्णानगर सर्किट हाउस में हुई घटना से जुड़ा है। महुआ मोइत्रा के अनुसार, वह शाम करीब 6 बजकर 15 मिनट पर सर्किट हाउस पहुंची थीं और उन्हें नियमित रूप से एक कमरा आवंटित किया गया था। बाद में रात करीब 10 बजे उन्हें परिसर खाली करने के लिए कहा गया।

    महुआ मोइत्रा ने दावा किया था कि रात करीब 9 बजकर 47 मिनट पर अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट की ओर से उन्हें फोन किया गया और सर्किट हाउस खाली करने को कहा गया। इसके बाद डिप्टी कलेक्टर की ओर से उन्हें व्हाट्सऐप संदेश के जरिए 12 अगस्त का एक आदेश भेजा गया था। इस आदेश में रखरखाव और सफाई कार्य का हवाला देते हुए परिसर खाली कराने की बात कही गई थी।

    घटना के बाद महुआ मोइत्रा ने नादिया जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के आचरण पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया और संसदीय प्रोटोकॉल का भी पालन नहीं किया गया। इस मामले को लेकर उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष विशेषाधिकार नोटिस भी दिया था।

    अब अदालत की ओर से गिरफ्तारी वारंट जारी किए जाने से विवाद ने नया कानूनी मोड़ ले लिया है। हालांकि वारंट जारी होना अपने आप में आरोपों की पुष्टि या दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। मामले में लगाए गए आरोपों पर अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।

    फिलहाल अदालत की कार्रवाई के बाद महुआ मोइत्रा की कानूनी स्थिति पर ध्यान केंद्रित हो गया है। आगे की कार्यवाही में उनकी अदालत के समक्ष पेशी और मामले से जुड़े आरोपों पर होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। सर्किट हाउस में हुए विवाद से शुरू हुआ यह मामला अब न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण में पहुंच चुका है।

  • तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस पर आमने-सामने आए दोनों गुट, कार्यक्रम की अनुमति को लेकर हाईकोर्ट पहुंचा मामला

    तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस पर आमने-सामने आए दोनों गुट, कार्यक्रम की अनुमति को लेकर हाईकोर्ट पहुंचा मामला

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठन के भीतर चल रहा विवाद अब 28 अगस्त को होने वाले स्थापना दिवस कार्यक्रम को लेकर खुलकर सामने आ गया है। तृणमूल छात्र परिषद के दो गुटों ने मध्य कोलकाता के मेयो रोड स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगी है। एक ही स्थान और एक ही दिन कार्यक्रम की मांग किए जाने से दोनों पक्षों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है।

    तृणमूल छात्र परिषद का स्थापना दिवस हर वर्ष 28 अगस्त को मनाया जाता है। इस अवसर पर मेयो रोड पर रैली और सभा का आयोजन किया जाता रहा है। इस बार पार्टी से जुड़े दो छात्र गुटों की अलग-अलग गतिविधियों के कारण स्थापना दिवस का कार्यक्रम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।

    ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की ओर से कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति के लिए अदालत का रुख किया जा चुका है। संबंधित याचिका पर सुनवाई के लिए मामला सूचीबद्ध भी किया गया। इसके बाद दूसरे गुट ने भी इसी स्थान पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं मिलने का हवाला देते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है।

    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट भी 28 अगस्त को मेयो रोड पर कार्यक्रम आयोजित करना चाहता है। इस गुट की ओर से कोलकाता पुलिस से रैली की अनुमति मांगी गई थी, लेकिन अनुमति नहीं मिलने के बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया।

    अदालत ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं किया और इसे अगले शुक्रवार के लिए सूचीबद्ध किया है। दूसरी ओर, ममता बनर्जी समर्थक गुट की याचिका पर पहले ही सुनवाई की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस वजह से अब दोनों पक्षों की नजर अदालत के अगले रुख पर टिकी हुई है।

    मामले का मुख्य प्रश्न यह है कि क्या दोनों गुटों को एक ही स्थान पर अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी जा सकती है या फिर प्रशासन और अदालत की ओर से कोई वैकल्पिक व्यवस्था तय की जाएगी। एक ही दिन और एक ही स्थान पर दो कार्यक्रम होने की स्थिति में कानून-व्यवस्था से जुड़े पहलुओं पर भी विचार करना होगा।

    मेयो रोड का स्थान तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस कार्यक्रम के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में स्थान को लेकर दोनों पक्षों की दावेदारी ने संगठन के भीतर चल रहे मतभेद को और स्पष्ट कर दिया है। पहले से मौजूद राजनीतिक खींचतान के बीच छात्र संगठन का यह विवाद अब न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बन गया है।

    फिलहाल अदालत के फैसले और प्रशासन की अनुमति पर आगे की तस्वीर निर्भर करेगी। दोनों गुट अपने-अपने कार्यक्रम को लेकर सक्रिय हैं, जबकि 28 अगस्त की तारीख नजदीक आने के साथ विवाद के समाधान को लेकर भी दबाव बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि स्थापना दिवस का आयोजन किस व्यवस्था के तहत होगा और क्या दोनों पक्षों को अलग-अलग कार्यक्रम के लिए स्थान उपलब्ध कराया जाएगा।

  • टीएमसी कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुंचीं ममता, विरोध के बीच बीजेपी पर लगाए गंभीर आरोप

    टीएमसी कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुंचीं ममता, विरोध के बीच बीजेपी पर लगाए गंभीर आरोप

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल के हलीसहर में रविवार को पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विरोध का सामना करना पड़ा। वह कथित पुलिस हिरासत में जान गंवाने वाले तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुंची थीं। इसी दौरान स्थानीय लोगों के एक समूह ने उनके काफिले को रोक दिया। विरोध के दौरान उनकी कार पर कीचड़ लगाने, जूते-चप्पल फेंकने और पत्थरबाजी किए जाने के आरोप सामने आए हैं।

    घटना के दौरान प्रदर्शनकारियों ने ममता बनर्जी के खिलाफ नारेबाजी भी की। उनके खिलाफ ‘चोर-चोर’ जैसे नारे लगाए जाने की बात सामने आई है। जब तक उनका वाहन मौके पर रुका रहा, विरोध प्रदर्शन जारी रहा। इस घटनाक्रम के बाद इलाके में राजनीतिक तनाव की स्थिति बन गई।

    ममता बनर्जी ने घटना के लिए भारतीय जनता पार्टी को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन स्थानीय ग्रामीणों की ओर से नहीं किया गया, बल्कि बाहर से लोगों को लाकर विरोध कराया गया। उनके अनुसार प्रदर्शनकारियों ने उनकी कार पर बड़े पत्थर और ईंटें फेंकीं तथा अपशब्दों का इस्तेमाल किया।

    ममता ने कहा कि वह उस परिवार से मिलने गई थीं, जिसके सदस्य की पुलिस हिरासत में मौत हुई है। उनका आरोप है कि परिवार के सदस्यों को भी डराने और धमकाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि परिवार से मिलने का उन्होंने वादा किया था और उसी के तहत वह वहां पहुंची थीं।

    पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस की मौजूदगी में उनकी गाड़ी पर पत्थर फेंके गए। उन्होंने कहा कि सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक रही और पुलिस के सामने ही प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया। ममता ने दावा किया कि इस घटना में बाहरी लोगों की भूमिका थी।

    उन्होंने पुलिस प्रशासन पर भी गंभीर आरोप लगाए। ममता के मुताबिक पुलिस अपनी कथित विफलताओं को छिपाने के लिए ऐसे लोगों का सहारा ले रही है। उन्होंने राज्य में हिरासत में होने वाली मौतों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हो रही है।

    ममता ने दावा किया कि उन्होंने मृतक कार्यकर्ता के परिवार से मिलने का आश्वासन पहले ही दिया था। उनके अनुसार उन्होंने परिवार की महिला सदस्य से एक दिन पहले दो बार फोन पर बातचीत भी की थी। उन्होंने यह भी कहा कि एक विधायक के माध्यम से परिवार को घर से बाहर नहीं निकलने की चेतावनी दिए जाने की बात सामने आई थी।

    उन्होंने कहा कि घटना के संबंध में मामला दर्ज कराया जाएगा। ममता ने पुलिस के प्रति व्यक्तिगत नाराजगी से इनकार करते हुए आरोप लगाया कि राजनीतिक स्तर पर तनाव को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने राज्य के गृह विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष से जुड़े लोग हालात को बिगाड़ने में भूमिका निभा रहे हैं।

    दूसरी ओर, स्थानीय लोगों की ओर से ममता बनर्जी के दौरे को लेकर अलग प्रतिक्रिया सामने आई। कुछ लोगों का आरोप है कि वह शांत इलाके में राजनीतिक गतिविधि के लिए पहुंची थीं, जिससे वहां तनाव बढ़ गया। स्थानीय स्तर पर ममता के दौरे और विरोध को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।

    घटना के बाद हलीसहर में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। एक ओर ममता बनर्जी ने इसे बीजेपी समर्थित विरोध और बाहरी लोगों की कार्रवाई बताया है, जबकि दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर उनके दौरे को लेकर सवाल उठाए गए हैं। फिलहाल पत्थरबाजी और विरोध की घटना के बाद इलाके की स्थिति पर प्रशासन की नजर बनी हुई है।

  • महुआ मोइत्रा को सुप्रीम कोर्ट से झटका, वर्चुअल पेशी की मांग खारिज, सांसद होने पर अलग सुविधा देने से कोर्ट का इनकार

    महुआ मोइत्रा को सुप्रीम कोर्ट से झटका, वर्चुअल पेशी की मांग खारिज, सांसद होने पर अलग सुविधा देने से कोर्ट का इनकार

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा को सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े आपराधिक मामले में राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने पुलिस के सामने वर्चुअल तरीके से पेश होने की उनकी मांग वाली याचिका खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल सांसद होने के आधार पर किसी आरोपी को जांच एजेंसी के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट नहीं दी जा सकती।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ के सामने महुआ मोइत्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि एक फेसबुक पोस्ट के संबंध में महुआ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है और पुलिस ने उन्हें उनके संसदीय क्षेत्र के संबंधित थाने में जांच अधिकारी के सामने उपस्थित होने को कहा है। उनकी ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति मांगी गई थी।

    महुआ की ओर से अदालत में सुरक्षा संबंधी चिंता भी रखी गई। उनके वकील ने कहा कि पिछली बार जब वह पुलिस के सामने पेश हुई थीं, तब उनके खिलाफ प्रदर्शन और विरोध की स्थिति बनी थी। उनका दावा था कि अंडे फेंके जाने की आशंका के कारण उन्हें व्यक्तिगत रूप से थाने पहुंचने में खतरा महसूस हो रहा है। इसी आधार पर पुलिस के सामने वर्चुअल उपस्थिति की मांग की गई थी।

    इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। अदालत ने सवाल किया कि वर्चुअल पेशी की मांग क्या इसलिए की जा रही है क्योंकि महुआ मोइत्रा संसद सदस्य हैं। पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि राजनीति में आने के बाद सार्वजनिक विरोध जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। सुनवाई के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि इस तरह की याचिकाएं केवल राजनीतिक पद के आधार पर स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि कलकत्ता हाई कोर्ट पहले ही महुआ मोइत्रा को जांच एजेंसी के साथ सहयोग करने का निर्देश दे चुका है। अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश के संबंधित हिस्से का पालन करने की बात कही और स्पष्ट किया कि यदि वह जांच अधिकारी के सामने पेश नहीं होती हैं, तो इसके परिणाम उन्हें हाई कोर्ट में भुगतने पड़ सकते हैं।

    आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा की याचिका खारिज कर दी। इसका मतलब है कि उन्हें जांच प्रक्रिया में व्यक्तिगत रूप से शामिल होकर पुलिस के निर्देशों का पालन करना होगा। अदालत ने फिलहाल उनके लिए वर्चुअल पेशी की विशेष व्यवस्था को मंजूरी नहीं दी है।

    महुआ मोइत्रा के खिलाफ यह मामला पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद सोशल मीडिया पर किए गए दो वीडियो पोस्ट से जुड़ा है। एक बीजेपी नेता की शिकायत के बाद पुलिस ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था। यह विवाद उस समय और बढ़ा जब उनके संसदीय क्षेत्र कृष्णानगर में एक अदालत के बाहर उनके खिलाफ प्रदर्शन की स्थिति बनी और प्रदर्शनकारियों के पास अंडे और टमाटर होने की बात सामने आई।

    इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने पिछले महीने महुआ मोइत्रा की एफआईआर रद्द करने की मांग पर उन्हें अंतरिम सुरक्षा दी थी, लेकिन साथ ही जांच में सहयोग करने का निर्देश भी दिया था। हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक उन्हें 14 अगस्त को जांच अधिकारी के सामने पेश होना है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब जांच में उनकी व्यक्तिगत पेशी का रास्ता साफ हो गया है।

  • सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस ने टीएमसी छोड़ी, भाजपा और तृणमूल दोनों पर साधा निशाना

    सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस ने टीएमसी छोड़ी, भाजपा और तृणमूल दोनों पर साधा निशाना

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिला है। स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस ने तृणमूल कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुख्यधारा के राजनीतिक दलों से उनका मोहभंग हो चुका है। अब वे नेताजी के आदर्शों और सिद्धांतों पर आधारित एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच स्थापित करने की योजना बना रहे हैं। उनके इस निर्णय ने राज्य के राजनीतिक हलकों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

    तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के महज चार माह के भीतर ही उन्होंने पार्टी से अलग होने का मन बना लिया। उन्होंने अप्रैल 2026 में तृणमूल का दामन थामा था। अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा कि सत्तारूढ़ दल और मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा की कार्यशैली में कोई मौलिक अंतर नजर नहीं आता। दोनों ही दल जनहित के बुनियादी मुद्दों को किनारे कर केवल सत्ता केंद्रित राजनीति में लगे हुए हैं, जिससे आम जनता के हित प्रभावित हो रहे हैं।

    अपने सार्वजनिक जीवन के अनुभवों का जिक्र करते हुए चंद्र कुमार बोस ने कहा कि वे ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक, भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के साथ काम कर चुके हैं। इन सभी राजनीतिक यात्राओं के बाद उन्हें अहसास हुआ कि वर्तमान राजनीतिक ढांचा उनके जनसेवा के उद्देश्यों और सोच से मेल नहीं खाता। देश को इस समय समावेशी राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और वास्तविक सामाजिक न्याय को प्राथमिकता देने वाली राजनीति की सख्त जरूरत है।

    उन्होंने आगे कहा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचार ही उनकी राजनीति का मुख्य आधार रहे हैं। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए वे एक नई राजनीतिक पहल की नींव रखेंगे। इस नए मंच का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों से जोड़ना और राजनीति में नैतिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करना होगा। मध्य प्रदेश समेत देशभर के राजनीतिक हलकों में भी इस नए विचार को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं, जहां समान विचारधारा वाले लोगों को एकजुट करने की तैयारी है।

    उल्लेखनीय है कि चंद्र कुमार बोस ने वर्ष 2016 में भाजपा की सदस्यता ली थी। वे पार्टी के राज्य उपाध्यक्ष रहने के साथ-साथ विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी भी रहे। हालांकि, नीतियों से असहमति के चलते उन्होंने 2023 में भाजपा से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद अप्रैल 2026 में वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे, लेकिन यह साथ भी महज चार महीने ही चल सका। तृणमूल कांग्रेस की ओर से फिलहाल इस इस्तीफे और बयानों पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है।

  • TMC को हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, ईडी द्वारा फ्रीज किए गए तीन बैंक खाते फिलहाल रहेंगे बंद

    TMC को हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, ईडी द्वारा फ्रीज किए गए तीन बैंक खाते फिलहाल रहेंगे बंद


    नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) को सोमवार को कलकत्ता हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा फ्रीज किए गए पार्टी के तीन बैंक खातों के संचालन की अंतरिम अनुमति देने से इनकार कर दिया। इन खातों में कुल 440.42 करोड़ रुपये जमा बताए गए हैं।

    ईडी ने यह कार्रवाई राज्य पुलिस की एफआईआर के आधार पर शुरू की गई जांच के तहत की है। जांच एजेंसी कथित वित्तीय अनियमितताओं, अवैध धन जुटाने और पार्टी के कुछ बैंक खातों के माध्यम से हुए संदिग्ध लेनदेन की पड़ताल कर रही है।

    हाईकोर्ट ने खारिज की अंतरिम राहत की मांग
    मामले की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने 13 जुलाई को अंतरिम आदेश सुरक्षित रख लिया था। सोमवार को अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए टीएमसी की अंतरिम राहत की मांग खारिज कर दी। इसके साथ ही पार्टी के तीनों बैंक खाते फिलहाल फ्रीज ही रहेंगे।

    जांच में क्या सामने आया?
    रिपोर्ट के मुताबिक, ईडी की प्रारंभिक जांच में दावा किया गया है कि अप्रैल 2023 से जून 2026 के बीच टीएमसी के बैंक खातों से करीब 160 करोड़ रुपये केयरवेल एविएशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और उससे जुड़ी एक अन्य इकाई को ट्रांसफर किए गए। जांच एजेंसी का यह भी आरोप है कि संबंधित कंपनी ने 2023 से 2026 के बीच 82.96 करोड़ रुपये एक अन्य नई कंपनी को भेजे। अधिकारियों के अनुसार, इस धनराशि का आगे भी लेनदेन किया गया।

    जेट और हेलीकॉप्टर खरीद की जांच
    ईडी के अनुसार, जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कथित लेनदेन में से 112 करोड़ रुपये का उपयोग एम्ब्रेयर लेगेसी 600 बिजनेस जेट और अगस्तावेस्टलैंड 109SP हेलीकॉप्टर की खरीद में किया गया। एजेंसी इस पूरे वित्तीय लेनदेन और धन के स्रोत की जांच कर रही है। फिलहाल मामले की जांच जारी है और अदालत में इस संबंध में आगे की सुनवाई होना बाकी है।

  • संसद सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक में बागी सांसदों की मौजूदगी पर बढ़ा विवाद, विपक्ष ने जताया विरोध, सहमति की कोशिशों के बीच फिर लौटी बैठक

    संसद सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक में बागी सांसदों की मौजूदगी पर बढ़ा विवाद, विपक्ष ने जताया विरोध, सहमति की कोशिशों के बीच फिर लौटी बैठक

    नई दिल्ली । संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक में रविवार को उस समय राजनीतिक हलचल तेज हो गई, जब विपक्षी दलों ने तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों को बैठक में आमंत्रित किए जाने का विरोध करते हुए सांकेतिक वॉकआउट कर दिया। हालांकि यह विरोध अधिक देर तक नहीं चला और बातचीत के बाद विपक्षी नेता दोबारा बैठक में लौट आए। इस घटनाक्रम ने मानसून सत्र शुरू होने से पहले ही सदन के भीतर संभावित राजनीतिक टकराव के संकेत दे दिए हैं।

    संसद भवन परिसर में आयोजित इस बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। बैठक में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, आम आदमी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, वाम दलों सहित कई विपक्षी दलों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। बैठक का उद्देश्य आगामी मानसून सत्र के दौरान संसद के सुचारु संचालन के लिए सभी दलों के बीच संवाद स्थापित करना और विधायी कार्यों को लेकर सहमति बनाना था। लेकिन बैठक शुरू होने के कुछ ही समय बाद विपक्ष ने बागी सांसदों की मौजूदगी को लेकर आपत्ति दर्ज कराई और विरोध स्वरूप बाहर निकल गया।

    विपक्ष का कहना था कि जिन सांसदों ने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर अलग राजनीतिक समूह का दावा किया है, उन्हें अभी तक लोकसभा अध्यक्ष की ओर से औपचारिक मान्यता नहीं मिली है। साथ ही उनके खिलाफ दायर अयोग्यता संबंधी याचिकाएं भी लंबित हैं। ऐसे में उन्हें सर्वदलीय बैठक में अलग इकाई के रूप में आमंत्रित करना संसदीय परंपराओं और स्थापित प्रक्रियाओं के अनुरूप नहीं माना जा सकता। विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़ा विषय बताते हुए सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा।

    विरोध दर्ज कराने के बाद विपक्षी दलों ने कुछ समय के लिए बैठक का बहिष्कार किया, लेकिन बाद में संवाद की आवश्यकता को देखते हुए सभी दल फिर से बैठक में शामिल हो गए। बैठक के दौरान सरकार ने सभी राजनीतिक दलों से संसद के सुचारु संचालन में सहयोग की अपील की। साथ ही आगामी सत्र के दौरान प्रस्तावित विधेयकों, विधायी कार्यक्रम और विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के लिए सभी पक्षों से सकारात्मक भूमिका निभाने का आग्रह किया गया।

    इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि हाल में हुए राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़ी हुई है। तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए 20 सांसदों को लोकसभा में अलग बैठने की अनुमति मिलने के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई थी। विपक्ष का तर्क है कि अलग बैठने की अनुमति और किसी नए समूह को औपचारिक मान्यता दिए जाने की प्रक्रिया अलग-अलग विषय हैं। इसी कारण सर्वदलीय बैठक में उनकी भागीदारी को लेकर सवाल उठाए गए। इसी तरह अन्य दलों से जुड़े कुछ बागी सांसदों की संसदीय स्थिति भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

    संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलेगा, जिसमें कुल 19 बैठकें प्रस्तावित हैं। इस दौरान सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयक और नीतिगत प्रस्ताव सदन के समक्ष रख सकती है, जबकि विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और अन्य राजनीतिक मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है। ऐसे में सत्र शुरू होने से पहले सर्वदलीय बैठक में सामने आया यह विवाद संकेत देता है कि आने वाले दिनों में संसद के भीतर तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिल सकती है। इसके बावजूद बैठक में सभी दलों की वापसी इस बात का संकेत भी मानी जा रही है कि संवाद की प्रक्रिया को जारी रखने और संसदीय कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक दलों ने बातचीत का रास्ता खुला रखा है।

  • पश्चिम बंगाल में अभिषेक बनर्जी के पांच मंजिला कार्यालय पर प्रशासन की कार्रवाई, सुरक्षा के बीच चला बुलडोजर

    पश्चिम बंगाल में अभिषेक बनर्जी के पांच मंजिला कार्यालय पर प्रशासन की कार्रवाई, सुरक्षा के बीच चला बुलडोजर

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार को उस समय हलचल मच गई जब दक्षिण 24 परगना जिले के अमताला-बारुईपुर रोड स्थित तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी के कथित अवैध रूप से निर्मित सांसद कार्यालय पर प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू कर दी। पांच मंजिला इमारत को गिराने के लिए प्रशासन ने भारी मशीनरी और तीन बुलडोजर तैनात किए। कार्रवाई के दौरान पूरे क्षेत्र में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए और बड़ी संख्या में पुलिस बल की मौजूदगी रही ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।

    जिला प्रशासन के अधिकारियों के अनुसार संबंधित भवन को अवैध निर्माण की श्रेणी में पाया गया था। प्रशासन का कहना है कि भवन स्वामी और संबंधित पक्ष को पहले नोटिस जारी कर निर्माण से जुड़े वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया था। अधिकारियों के मुताबिक निर्धारित समय सीमा के भीतर आवश्यक दस्तावेज या संतोषजनक जवाब उपलब्ध नहीं कराया गया, जिसके बाद नियमानुसार ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का निर्णय लिया गया। प्रशासन का दावा है कि पूरी प्रक्रिया कानूनी प्रावधानों के तहत की जा रही है।

    शनिवार सुबह जैसे ही बुलडोजर कार्यालय परिसर पहुंचे, बड़ी संख्या में स्थानीय लोग मौके पर एकत्र होने लगे। कुछ ही देर में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता भी घटनास्थल पर पहुंच गए, जिससे इलाके में तनाव का माहौल बन गया। स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया और आसपास के क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी बढ़ा दी गई। अधिकारियों ने लोगों से शांति बनाए रखने और प्रशासनिक कार्रवाई में सहयोग करने की अपील की।

    जानकारी के अनुसार यह कार्यालय पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद से बंद पड़ा था। इससे पहले डायमंड हार्बर संसदीय क्षेत्र से जुड़े कई संगठनात्मक कार्यक्रम, बैठकों और राजनीतिक गतिविधियों का संचालन इसी कार्यालय से किया जाता था। स्थानीय स्तर पर यह भवन तृणमूल कांग्रेस की महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है।

    इस कार्रवाई के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। प्रशासन जहां इसे अवैध निर्माण के विरुद्ध सामान्य कानूनी कार्रवाई बता रहा है, वहीं राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर आरोप-प्रत्यारोप तेज होने की संभावना जताई जा रही है। मामले को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं पर भी नजर बनी हुई है। फिलहाल प्रशासन की निगरानी में भवन को ध्वस्त करने का कार्य जारी है और पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था सख्त रखी गई है। संबंधित पक्ष की ओर से इस कार्रवाई पर आधिकारिक विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार है।