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  • TMC में दो फाड़ के संकेत ममता ने दिखाई ताकत चुनाव आयोग को सौंपा नया संगठनात्मक ढांचा

    TMC में दो फाड़ के संकेत ममता ने दिखाई ताकत चुनाव आयोग को सौंपा नया संगठनात्मक ढांचा


    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी घमासान देखने को मिल रहा है। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और बगावत खुलकर सामने आने लगी है। इसी बीच पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने अपने विरोधियों को जवाब देते हुए एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाया है। उन्होंने पार्टी के पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति की नई सूची चुनाव आयोग को भेजकर स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि संगठन पर उनकी पकड़ अभी भी मजबूत है।

    दरअसल सोमवार को पार्टी के बागी नेताओं ने कोलकाता में एक बैठक आयोजित कर तृणमूल कांग्रेस की समानांतर वर्किंग कमेटी बनाने का दावा किया था। इस बैठक में ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने की घोषणा की गई और उनकी जगह अरूप रॉय को नया अध्यक्ष चुने जाने का दावा किया गया। इतना ही नहीं बागी गुट की ओर से ममता बनर्जी को मुख्य सलाहकार का पद देने का प्रस्ताव भी सामने आया।

    बागी नेताओं की इस कार्रवाई के बाद ममता बनर्जी ने तुरंत राजनीतिक जवाबी रणनीति अपनाई। उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्यों की नई सूची चुनाव आयोग को भेज दी। इस सूची में ममता बनर्जी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया गया है जबकि अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव और सुब्रत बख्शी को उपाध्यक्ष के रूप में दर्शाया गया है।

    नई सूची के चुनाव आयोग तक पहुंचने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी का आधिकारिक नेतृत्व अपने संगठनात्मक ढांचे को वैध और प्रभावी बनाए रखने के लिए सक्रिय हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि बागी गुट को सीधा संदेश देने की रणनीति भी है।

    दूसरी ओर बागी गुट का नेतृत्व कर रहे ऋतब्रत बनर्जी का कहना है कि पार्टी में संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा हो गई थी। उनका दावा है कि फरवरी 2022 में गठित राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और नए संगठनात्मक चुनाव नहीं कराए गए। इसी वजह से उन्होंने समानांतर कार्यसमिति के गठन को उचित ठहराया है।

    अब पार्टी पर नियंत्रण को लेकर दोनों गुट आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ ममता बनर्जी का नेतृत्व वाला आधिकारिक संगठन है तो दूसरी तरफ बागी नेताओं का गुट अपने दावों के साथ मैदान में उतर चुका है। ऐसे में आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    राजनीतिक जानकारों के अनुसार यदि विवाद और बढ़ता है तो मामला चुनाव आयोग के साथ-साथ अदालत तक भी पहुंच सकता है। फिलहाल ममता बनर्जी ने नई सूची भेजकर यह संकेत जरूर दे दिया है कि वह पार्टी नेतृत्व को लेकर किसी भी चुनौती का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले समय में नए समीकरण पैदा कर सकता है और TMC के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

  • चुनावी हार और संगठनात्मक संकट के बीच TMC पर फंड का बड़ा झटका, 440 करोड़ रुपये वाले तीन बैंक खाते फ्रीज

    चुनावी हार और संगठनात्मक संकट के बीच TMC पर फंड का बड़ा झटका, 440 करोड़ रुपये वाले तीन बैंक खाते फ्रीज

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है, जहां तृणमूल कांग्रेस को संगठनात्मक चुनौतियों के बीच अब वित्तीय संकट का भी सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के तीन बैंक खातों पर रोक लगाए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। इस घटनाक्रम ने न केवल पार्टी के आंतरिक हालात को लेकर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि संगठन के वित्तीय संचालन को लेकर भी नई बहस शुरू कर दी है।

    जानकारी के अनुसार, पार्टी के जिन बैंक खातों पर रोक लगाई गई है, उनमें बड़ी राशि जमा बताई जा रही है। यह कदम ऐसे समय सामने आया है जब संगठन के भीतर नेतृत्व और नियंत्रण को लेकर मतभेदों की खबरें पहले से ही राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बनी हुई हैं। पार्टी के भीतर चल रहे विवाद के बीच यह मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है।

    विवाद की शुरुआत तब हुई जब पार्टी से जुड़े एक पूर्व वरिष्ठ पदाधिकारी ने बैंक प्रबंधन को पत्र लिखकर खातों के संचालन पर रोक लगाने की मांग की। पत्र में संगठन के नेतृत्व और वित्तीय नियंत्रण को लेकर गंभीर मतभेदों का हवाला दिया गया। साथ ही यह आशंका भी जताई गई कि मौजूदा परिस्थितियों में पार्टी के वित्तीय संसाधनों के उपयोग को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकता है। इसी आधार पर खातों में किसी भी प्रकार के लेनदेन को अस्थायी रूप से रोकने का अनुरोध किया गया।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी बड़े राजनीतिक दल के बैंक खातों पर रोक लगना एक असाधारण स्थिति मानी जाती है। विशेष रूप से तब, जब मामला पार्टी के भीतर नेतृत्व और अधिकारों के विवाद से जुड़ा हो। इस तरह की परिस्थितियां संगठन की प्रशासनिक और चुनावी गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकती हैं, क्योंकि अधिकांश राजनीतिक दल अपने दैनिक संचालन और कार्यक्रमों के लिए संस्थागत वित्तीय संसाधनों पर निर्भर रहते हैं।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पार्टी के पास बड़ी वित्तीय संपत्ति और निवेश मौजूद हैं। हाल के वर्षों में संगठन ने अपने कोष और संपत्तियों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की थी। ऐसे में खातों पर रोक लगने का असर केवल बैंकिंग लेनदेन तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह संगठन की रणनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकता है।

    इस घटनाक्रम ने राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को भी हवा दे दी है। विपक्षी दलों ने मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं दी हैं और पार्टी के अंदरूनी हालात पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का दावा है कि यह घटनाक्रम संगठन के भीतर लंबे समय से चल रहे मतभेदों और प्रबंधन संबंधी समस्याओं को उजागर करता है। वहीं पार्टी से जुड़े नेताओं का कहना है कि आंतरिक मामलों का समाधान संगठनात्मक प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाएगा।

    विशेषज्ञों के अनुसार, राजनीतिक दलों में नेतृत्व परिवर्तन, संगठनात्मक पुनर्गठन या आंतरिक विवाद नई बात नहीं है, लेकिन जब ऐसे विवाद वित्तीय संस्थानों और संपत्तियों के नियंत्रण तक पहुंच जाते हैं, तब उनका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक हो जाता है। ऐसे मामलों में कानूनी, प्रशासनिक और संगठनात्मक स्तर पर कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।

    फिलहाल सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि खातों पर लगी रोक कितने समय तक जारी रहेगी और नेतृत्व विवाद का समाधान किस रूप में सामने आएगा। यदि मामला कानूनी या संगठनात्मक स्तर पर लंबा खिंचता है, तो इसका असर पार्टी की भविष्य की गतिविधियों और राजनीतिक रणनीतियों पर भी पड़ सकता है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल वित्तीय विवाद नहीं है, बल्कि संगठन के भीतर शक्ति संतुलन और नेतृत्व नियंत्रण की लड़ाई का भी संकेत देता है। आने वाले दिनों में इस मामले में होने वाले फैसले और प्रतिक्रियाएं पश्चिम बंगाल की राजनीति में महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती हैं। फिलहाल पार्टी के सामने संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने और वित्तीय संचालन को सामान्य करने की दोहरी चुनौती खड़ी दिखाई दे रही है।

  • राष्ट्रीय कार्यसमिति में शामिल होने के महज 7 दिन बाद ज्योतिप्रिय मलिक का इस्तीफा, TMC के भीतर बढ़ीं राजनीतिक अटकलें

    राष्ट्रीय कार्यसमिति में शामिल होने के महज 7 दिन बाद ज्योतिप्रिय मलिक का इस्तीफा, TMC के भीतर बढ़ीं राजनीतिक अटकलें


    नई दिल्ली ।
    पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय नई हलचल पैदा हो गई जब तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री ज्योतिप्रिय मलिक ने पार्टी के सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उन्हें हाल ही में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति में शामिल किया गया था। राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी मिलने के कुछ ही दिनों बाद संगठनात्मक पदों से दूरी बनाने के उनके फैसले ने राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

    ज्योतिप्रिय मलिक ने अपने इस्तीफे के पीछे स्वास्थ्य संबंधी कारणों को मुख्य वजह बताया है। उन्होंने कहा कि लंबे समय से स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं और चिकित्सकों ने उन्हें सक्रिय राजनीतिक और संगठनात्मक गतिविधियों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी है। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में पार्टी संगठन की जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से निर्वहन करना उनके लिए संभव नहीं रह गया है।

    मलिक ने बताया कि वे लंबे समय से मधुमेह की बीमारी से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं के कारण उनकी किडनी भी प्रभावित हुई है, जिसके चलते नियमित चिकित्सा निगरानी और उपचार की आवश्यकता बनी हुई है। इसी कारण उन्होंने संगठनात्मक जिम्मेदारियों से मुक्त होने का निर्णय लिया ताकि स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान दिया जा सके। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका पार्टी से वैचारिक संबंध और निष्ठा पहले की तरह बनी रहेगी।

    पश्चिम बंगाल की राजनीति में ज्योतिप्रिय मलिक का लंबा राजनीतिक अनुभव रहा है। उन्होंने विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हुए राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर सक्रिय रहने वाले नेताओं में उनकी पहचान रही है। लंबे समय तक विधायक रहने के साथ-साथ उन्होंने राज्य सरकार में महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारियां भी संभाली थीं।

    पिछले कुछ वर्षों में उनका नाम उस समय व्यापक चर्चा में आया था जब राशन वितरण से जुड़े कथित घोटाले की जांच के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने लंबा समय हिरासत और न्यायिक प्रक्रिया के बीच बिताया। बाद में उन्हें जमानत मिली और वे सक्रिय राजनीति में लौटे। हालांकि जमानत मिलने के बाद उन्हें सरकार में कोई नई प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई थी।

    हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें राजनीतिक झटका भी लगा, जब उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र में हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताते हुए राष्ट्रीय कार्यसमिति में स्थान दिया था। यही कारण है कि कार्यसमिति में शामिल होने के कुछ दिनों के भीतर उनका इस्तीफा राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चर्चा का विषय बन गया है।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मलिक का इस्तीफा फिलहाल स्वास्थ्य कारणों से जुड़ा निर्णय बताया जा रहा है, लेकिन इसका संगठनात्मक और राजनीतिक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है। तृणमूल कांग्रेस के लिए यह एक ऐसे नेता का संगठनात्मक स्तर पर पीछे हटना है, जिसने लंबे समय तक पार्टी के विस्तार और चुनावी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई है।

    फिलहाल पार्टी की ओर से इस इस्तीफे को व्यक्तिगत और स्वास्थ्य संबंधी निर्णय के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि ज्योतिप्रिय मलिक संगठनात्मक राजनीति से कितनी दूरी बनाए रखते हैं और भविष्य में उनकी राजनीतिक भूमिका किस दिशा में आगे बढ़ती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनके इस कदम पर सभी की नजर बनी हुई है।

  • कांग्रेस मुक्त’ से आगे बढ़ी भाजपा की राजनीति? क्षेत्रीय दलों में बढ़ती बगावत के बीच ‘विपक्ष मुक्त भारत’ की चर्चा तेज

    कांग्रेस मुक्त’ से आगे बढ़ी भाजपा की राजनीति? क्षेत्रीय दलों में बढ़ती बगावत के बीच ‘विपक्ष मुक्त भारत’ की चर्चा तेज

    नई दिल्ली । देश की राजनीति में एक बार फिर बड़े बदलावों की आहट सुनाई दे रही है। लंबे समय तक ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के नारे के साथ आगे बढ़ने वाली भारतीय जनता पार्टी को लेकर अब राजनीतिक गलियारों में एक नई चर्चा शुरू हो गई है। विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों के भीतर बढ़ती बगावत, नेताओं और सांसदों के अलग गुट बनाने की कोशिशें तथा सत्ता समीकरणों में लगातार हो रहे बदलावों ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या देश की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है।

    हाल के महीनों में पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब जैसे राज्यों में कई ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने विपक्षी दलों की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कई क्षेत्रीय दल अपने ही नेताओं और जनप्रतिनिधियों के असंतोष से जूझते दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाओं का प्रभाव केवल राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीति और भविष्य के गठबंधन समीकरणों पर भी पड़ सकता है।

    सबसे अधिक चर्चा पश्चिम बंगाल के राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर हो रही है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद विपक्षी खेमे के भीतर असंतोष की खबरों ने राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। कई सांसदों और नेताओं द्वारा अलग राजनीतिक रास्ता अपनाने की चर्चाओं ने राज्य की राजनीति को नई दिशा देने का संकेत दिया है। हालांकि इन घटनाओं पर अलग-अलग राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी व्याख्या है, लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट हुआ है कि क्षेत्रीय दलों के सामने संगठनात्मक एकता बनाए रखना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

    महाराष्ट्र में भी राजनीतिक अस्थिरता का दौर थमता नजर नहीं आ रहा। शिवसेना के विभिन्न गुटों के बीच जारी खींचतान के बीच कई सांसदों और नेताओं के रुख ने राजनीतिक समीकरणों को और जटिल बना दिया है। पार्टी अनुशासन, व्हिप के पालन और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर उठे सवालों ने राज्य की राजनीति में नई बहस को जन्म दिया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले समय में इन घटनाओं का प्रभाव राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर दिखाई दे सकता है।

    इसी बीच कुछ राजनीतिक वर्ग यह तर्क दे रहे हैं कि विपक्षी दलों के भीतर बढ़ती टूट-फूट और पुनर्संरेखण की प्रक्रिया भाजपा को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचा सकती है। हालांकि भाजपा नेतृत्व लगातार इस बात से इनकार करता रहा है कि उसका कोई ‘विपक्ष मुक्त भारत’ अभियान चल रहा है। पार्टी का कहना है कि लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष की अपनी भूमिका होती है और चुनावी सफलता जनता के समर्थन के आधार पर तय होती है।

    राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान परिदृश्य केवल दल-बदल या बगावत तक सीमित नहीं है। इसके पीछे क्षेत्रीय नेतृत्व, राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं, संगठनात्मक असंतोष और बदलते जनादेश जैसे कई कारण काम कर रहे हैं। यही वजह है कि कई राज्यों में पुराने राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं।

    फिलहाल देश की राजनीति ऐसे दौर से गुजर रही है जहां क्षेत्रीय दलों की आंतरिक चुनौतियां राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन चुकी हैं। आने वाले महीनों में यदि यह सिलसिला जारी रहता है तो विपक्षी राजनीति के स्वरूप, गठबंधन की रणनीतियों और सत्ता संतुलन पर इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। राजनीतिक दलों की अगली चाल और नेताओं के फैसले इस बहस की दिशा तय करेंगे।

  • ममता बनर्जी के लिए राहत या नई चुनौती? बागी सांसदों के विवाद पर 19 जून को ओम बिरला से मिलेंगे अभिषेक बनर्जी

    ममता बनर्जी के लिए राहत या नई चुनौती? बागी सांसदों के विवाद पर 19 जून को ओम बिरला से मिलेंगे अभिषेक बनर्जी

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही उथल-पुथल के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। पार्टी में बढ़ती असहमति और बागी सांसदों के अलग रुख के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को 19 जून को बैठक के लिए आमंत्रित किया है। इस मुलाकात को पार्टी के भीतर जारी संकट और उसके संभावित राजनीतिक प्रभावों के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है।

    हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस के कई सांसदों द्वारा पार्टी नेतृत्व के खिलाफ असंतोष जताए जाने के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। कुछ सांसदों ने अलग राजनीतिक रास्ता अपनाने का संकेत देते हुए एक अन्य क्षेत्रीय दल के साथ जुड़ने की घोषणा की थी। इस घटनाक्रम ने न केवल पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ाई है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी नई चर्चाओं को जन्म दिया है।

    लोकसभा अध्यक्ष द्वारा अभिषेक बनर्जी को बुलाए जाने के पीछे मुख्य उद्देश्य पूरे मामले पर उनका पक्ष जानना और संसदीय स्थिति को स्पष्ट करना माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बैठक के बाद बागी सांसदों की स्थिति, संसदीय मान्यता और दलगत अधिकारों से जुड़े कई प्रश्नों पर तस्वीर साफ हो सकती है। यही कारण है कि राजनीतिक दलों और पर्यवेक्षकों की नजरें अब इस मुलाकात पर टिकी हुई हैं।

    तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से पश्चिम बंगाल की प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में पार्टी को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। संगठन के भीतर नेतृत्व शैली, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और राजनीतिक रणनीति को लेकर समय-समय पर मतभेद सामने आते रहे हैं। हालिया घटनाक्रम ने इन चर्चाओं को और तेज कर दिया है।

    राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसी भी बड़े दल में असहमति होना असामान्य नहीं है, लेकिन जब निर्वाचित जनप्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से अलग रुख अपनाने लगें तो उसका असर संगठनात्मक एकता पर पड़ता है। तृणमूल कांग्रेस के मामले में भी यही स्थिति दिखाई दे रही है। ऐसे समय में पार्टी नेतृत्व के लिए संगठन को एकजुट बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

    इस पूरे घटनाक्रम का असर आगामी राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव भले अभी कुछ समय दूर हों, लेकिन राजनीतिक दल पहले से ही अपनी रणनीतियों को मजबूत करने में जुटे हुए हैं। ऐसे में किसी भी बड़े दल के भीतर अस्थिरता विपक्षी दलों को राजनीतिक अवसर प्रदान कर सकती है।

    दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के समर्थक और नेता यह दावा कर रहे हैं कि पार्टी संगठन मजबूत है और किसी भी तरह की चुनौती का सामना करने में सक्षम है। उनका कहना है कि नेतृत्व लगातार संवाद के जरिए स्थिति को संभालने का प्रयास कर रहा है और जल्द ही सभी विवादों का समाधान निकल सकता है।

    अब राजनीतिक हलकों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 19 जून की बैठक के बाद स्थिति सामान्य होगी या फिर पार्टी के भीतर जारी मतभेद और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आएंगे। फिलहाल सभी की निगाहें इस अहम मुलाकात और उसके बाद होने वाले राजनीतिक घटनाक्रमों पर टिकी हुई हैं।

  • TMC सांसदों का NCPI में विलय: राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक या कानूनी जोखिम?

    TMC सांसदों का NCPI में विलय: राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक या कानूनी जोखिम?


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली All India Trinamool Congress को बड़ा झटका देते हुए उसके 20 बागी सांसदों ने खुद को Nationalist Citizens Party of India में विलय करने का दावा किया है। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपने और संसद में अलग बैठने की मांग के साथ इस घटनाक्रम ने राष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। हालांकि राजनीतिक तौर पर यह कदम बागी सांसदों के लिए सुरक्षित दिखाई देता है, लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञ इसे इतना आसान नहीं मान रहे हैं।

    दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी सांसद या विधायक को अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होने पर सदस्यता गंवानी पड़ सकती है। इसी खतरे से बचने के लिए बागी सांसदों ने ‘विलय’ का रास्ता चुना है। उनके पास कुल 28 में से 20 सांसदों का समर्थन है, जो दो-तिहाई की कानूनी शर्त पूरी करता है। लेकिन असली विवाद यहीं से शुरू होता है।

    क्या केवल सांसदों का समूह किसी दूसरी पार्टी में विलय कर सकता है?
    संविधान विशेषज्ञों और संसद के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य का कहना है कि दल-बदल कानून के तहत केवल सांसदों या विधायकों का समूह किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाए, तो उसे विलय नहीं माना जा सकता। कानून के अनुसार मूल राजनीतिक दल का भी दूसरी पार्टी में विलय होना जरूरी है। उनका तर्क है कि दसवीं अनुसूची के पैरा-4 में स्पष्ट रूप से राजनीतिक दल के विलय की बात कही गई है, न कि केवल संसदीय दल के। ऐसे में सांसदों का यह कदम कानूनी चुनौती का सामना कर सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले क्यों बन सकते हैं परेशानी?
    इस पूरे मामले में कई महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों का उल्लेख किया जा रहा है। वर्ष 2023 में हुए Shiv Sena Political Crisis से जुड़े फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि ‘मूल राजनीतिक दल’ और ‘विधायक या सांसद दल’ अलग-अलग इकाइयाँ हैं। अदालत ने कहा था कि किसी पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधि खुद को संगठन का मालिक नहीं मान सकते। पार्टी के आधिकारिक फैसलों का अधिकार मूल संगठन और उसके नेतृत्व के पास ही रहता है। यही सिद्धांत अब TMC के पक्ष को मजबूत करता दिखाई दे रहा है।

    ममता खेमे की कानूनी तैयारी शुरू
    TMC नेतृत्व ने बागी सांसदों के कदम को चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी की ओर से लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर किसी अलग गुट को मान्यता नहीं देने की मांग की गई है। साथ ही, पश्चिम बंगाल में बागी विधायकों को मिली मान्यता के खिलाफ अदालत का दरवाजा भी खटखटाया गया है। पार्टी का कहना है कि संगठन स्तर पर किसी प्रकार का विलय नहीं हुआ है, इसलिए सांसदों का दावा संवैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं है।

    NCPI को अचानक मिला राष्ट्रीय महत्व
    त्रिपुरा में पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त Nationalist Citizens Party of India अब अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गई है। 2023 में गठित यह छोटी पार्टी अब बागी सांसदों के कारण संसद में उल्लेखनीय उपस्थिति का दावा कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम कानूनी सुरक्षा हासिल करने की रणनीति हो सकती है, लेकिन अंतिम फैसला अदालतों और लोकसभा अध्यक्ष की व्याख्या पर निर्भर करेगा।

    आगे क्या होगा?
    अब सबकी निगाहें लोकसभा अध्यक्ष और न्यायपालिका पर टिकी हैं। यदि बागी सांसदों का ‘विलय’ कानूनी रूप से मान्य माना जाता है तो यह दल-बदल कानून की नई व्याख्या का रास्ता खोल सकता है। लेकिन यदि अदालतों ने इसे केवल ‘दल-बदल’ माना, तो सांसदों की सदस्यता पर संकट गहरा सकता है। फिलहाल यह मामला भारतीय राजनीति में दल-बदल कानून की प्रभावशीलता, उसकी खामियों और भविष्य में संभावित संशोधनों को लेकर नई बहस छेड़ चुका है।

  • टीएमसी संकट से विपक्षी राजनीति में हलचल, क्षेत्रीय दलों के भविष्य पर उठे सवाल, कांग्रेस फिर बनी संभावित केंद्रबिंदु

    टीएमसी संकट से विपक्षी राजनीति में हलचल, क्षेत्रीय दलों के भविष्य पर उठे सवाल, कांग्रेस फिर बनी संभावित केंद्रबिंदु

    नई दिल्ली । देश की विपक्षी राजनीति इन दिनों एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल से गुजरती दिखाई दे रही है। कई क्षेत्रीय दलों के भीतर उभर रहे असंतोष, नेतृत्व संबंधी चुनौतियों और संभावित राजनीतिक पुनर्संरचना की चर्चाओं ने राष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा देने की संभावना पैदा कर दी है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की राजनीति में सामने आए हालिया घटनाक्रमों के बाद विपक्षी खेमे में नए समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय दलों ने पिछले तीन दशकों में भारतीय राजनीति की दिशा और दशा को गहराई से प्रभावित किया है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और अन्य राज्यों में इन दलों ने न केवल कांग्रेस के पारंपरिक आधार को चुनौती दी, बल्कि कई स्थानों पर उसकी जगह भी ले ली। यही कारण रहा कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस का प्रभाव धीरे-धीरे सीमित होता गया और क्षेत्रीय नेतृत्व मजबूत होकर उभरा।

    हालांकि हाल के वर्षों में कई क्षेत्रीय दलों के सामने संगठनात्मक चुनौतियां बढ़ती दिखाई दी हैं। कुछ दलों में नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आए, तो कुछ जगहों पर वरिष्ठ नेताओं और जनप्रतिनिधियों के अलग रास्ता अपनाने की खबरें सुर्खियों में रहीं। इन परिस्थितियों ने क्षेत्रीय राजनीति की स्थिरता और भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

    पश्चिम बंगाल में उभरे राजनीतिक संकट ने इस बहस को और तेज कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चाएं हैं कि यदि क्षेत्रीय दलों के सामने अस्तित्व का संकट गहराता है तो वे व्यापक विपक्षी एकजुटता की दिशा में अधिक गंभीरता से कदम बढ़ा सकते हैं। इसी संदर्भ में कांग्रेस की भूमिका पर भी चर्चा बढ़ी है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर वह अभी भी सबसे बड़ा विपक्षी राजनीतिक संगठन मानी जाती है।

    विपक्षी गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के रिश्ते हमेशा सरल नहीं रहे हैं। कई राज्यों में सीट बंटवारे, नेतृत्व और रणनीति को लेकर मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आते रहे हैं। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ गठबंधन के मुकाबले एक मजबूत राजनीतिक विकल्प खड़ा करने के लिए इन दलों को साथ काम करना पड़ा है। यही व्यावहारिक राजनीति आज भी विपक्षी दलों को सहयोग की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियां कांग्रेस के लिए राजनीतिक अवसर भी लेकर आई हैं। जिन राज्यों में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव लंबे समय तक कांग्रेस के विस्तार में बाधा बना रहा, वहां अब नए समीकरण बनने की संभावना पर चर्चा हो रही है। कांग्रेस नेतृत्व भी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि व्यापक विपक्षी एकता राष्ट्रीय राजनीति की आवश्यकता है और इसके लिए सभी दलों को व्यक्तिगत तथा क्षेत्रीय हितों से ऊपर उठकर सोचना होगा।

    दूसरी ओर क्षेत्रीय दलों के सामने भी चुनौती कम नहीं है। उन्हें अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी भूमिका निभाने के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। यही कारण है कि विपक्षी राजनीति के भीतर सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों समानांतर रूप से दिखाई दे रहे हैं।

    आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्षी दल किस प्रकार अपनी रणनीति तय करते हैं। यदि क्षेत्रीय दल और कांग्रेस साझा राजनीतिक मंच को मजबूत करने में सफल रहते हैं तो राष्ट्रीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो सकता है। वहीं यदि संगठनात्मक चुनौतियां और आंतरिक मतभेद बढ़ते हैं तो विपक्षी खेमे के सामने नई कठिनाइयां भी खड़ी हो सकती हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों ने विपक्षी राजनीति को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

  • ‘वंदे मातरम’ और सरकारी योजनाओं पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का बड़ा बयान, लाभार्थियों की पात्रता पर उठाए सवाल

    ‘वंदे मातरम’ और सरकारी योजनाओं पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का बड़ा बयान, लाभार्थियों की पात्रता पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम में आयोजित एक जनकल्याण कार्यक्रम के दौरान कई महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दों पर अपनी सरकार का पक्ष रखते हुए विपक्ष पर तीखे आरोप लगाए। अपने संबोधन में उन्होंने राष्ट्रभक्ति, सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता, सीमा सुरक्षा, सामाजिक कल्याण योजनाओं में कथित अनियमितताओं तथा सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया। उनके बयान के बाद राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है।

    कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान के मुद्दे का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान देश के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कुछ लोगों को ‘वंदे मातरम’ बोलने या राष्ट्रगान के प्रति सम्मान व्यक्त करने में आपत्ति है, तो सरकारी योजनाओं के लाभ को लेकर भी चर्चा होना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि सरकार लाभार्थियों की पात्रता और प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए आवश्यक दस्तावेजी व्यवस्थाओं पर काम कर रही है।

    मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में सीमा सुरक्षा और जनसंख्या संबंधी विषयों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में केंद्र और राज्य स्तर पर निगरानी को मजबूत किया जा रहा है। उनके अनुसार सरकारी योजनाओं का लाभ केवल वास्तविक और पात्र नागरिकों तक पहुंचे, यह सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि अवैध रूप से आने वाले लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने से रोकने के लिए विभिन्न स्तरों पर जांच और सत्यापन की प्रक्रिया को मजबूत किया जा रहा है।

    अपने संबोधन में शुभेंदु अधिकारी ने पूर्ववर्ती प्रशासन पर सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप भी लगाया। उन्होंने दावा किया कि विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां वास्तविक पात्रता की जांच किए बिना लाभ वितरित किया गया। मुख्यमंत्री के अनुसार कुछ क्षेत्रों में ऐसे लाभार्थियों की पहचान हुई है, जिन्हें नियमों के अनुरूप सहायता नहीं मिलनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि सरकार ऐसे मामलों की समीक्षा कर रही है और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।

    उन्होंने छात्रवृत्ति वितरण और अन्य कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े कथित फर्जी खातों का भी जिक्र किया। मुख्यमंत्री का कहना था कि लाभार्थी डेटा के सत्यापन के दौरान कई संदिग्ध प्रविष्टियां सामने आई हैं, जिनकी जांच जारी है। उनका दावा है कि सरकारी संसाधनों का उपयोग केवल वास्तविक जरूरतमंद लोगों तक सीमित रखने के लिए प्रशासनिक स्तर पर व्यापक सुधार किए जा रहे हैं।

    रोजगार और ग्रामीण विकास के मुद्दे पर भी मुख्यमंत्री ने महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने कहा कि रोजगार उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार नए विकल्पों पर काम कर रही है और कार्यदिवसों को बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। इसके लिए बजटीय प्रावधान भी सुनिश्चित किए गए हैं ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का विस्तार किया जा सके।

    सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को लेकर भी मुख्यमंत्री ने नई व्यवस्था का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भविष्य में अभ्यर्थियों को परीक्षा से संबंधित दस्तावेजों तक अधिक पहुंच दी जाएगी। उनका मानना है कि इससे भर्ती प्रक्रिया पर विश्वास बढ़ेगा और किसी भी प्रकार की अनियमितता की आशंका कम होगी। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक सुधारों का उद्देश्य केवल व्यवस्था को पारदर्शी बनाना ही नहीं, बल्कि युवाओं के विश्वास को मजबूत करना भी है।

    मुख्यमंत्री के इन बयानों के बाद राज्य की राजनीति में बहस तेज होने की संभावना है। आने वाले दिनों में विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया और सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदम इस मुद्दे को और अधिक चर्चा में ला सकते हैं।

  • TMC में बड़ा सियासी संकट, 19 सांसद अलग गुट बनाने की तैयारी में, NDA के साथ जाने के संकेत

    TMC में बड़ा सियासी संकट, 19 सांसद अलग गुट बनाने की तैयारी में, NDA के साथ जाने के संकेत


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर अंदरूनी कलह अब संसद तक पहुंचती नजर आ रही है। पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 19 सांसदों के एक अलग गुट बनाने के दावे ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। यह बागी समूह सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अलग गुट के रूप में मान्यता देने की मांग कर सकता है और साथ ही सदन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ बैठने की अनुमति भी चाहता है।

    सूत्रों और बागी गुट के नेताओं के अनुसार, सांसद खुद को “असली टीएमसी” के रूप में मान्यता देने की मांग करेंगे। इस समूह की ओर से वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार को नेता और शताब्दी रॉय को उपनेता के रूप में प्रस्तावित किए जाने की बात भी सामने आई है। साथ ही यह भी दावा किया जा रहा है कि उनके पास 19 सांसदों का समर्थन है और अन्य सांसदों के लिए भी दरवाजे खुले हैं।

    बताया जा रहा है कि इस घटनाक्रम के बाद NDA की संसदीय ताकत बढ़ सकती है, जिससे संसद में विपक्षी समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, इस पूरे मामले में अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष और आगे चलकर चुनाव आयोग (EC) की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

    बागी गुट के नेताओं ने आरोप लगाया है कि पार्टी में आंतरिक असंतोष की वजह नेतृत्व शैली और संगठनात्मक फैसले हैं। उनका कहना है कि पहले जब तक ममता बनर्जी का सीधा नियंत्रण था, स्थिति स्थिर थी, लेकिन अब संगठन में बदलाव के बाद असंतोष बढ़ा है। कुछ नेताओं ने यहां तक दावा किया है कि पार्टी अब “कॉरपोरेट ढांचे” की तरह काम कर रही है, जहां जमीनी नेताओं की अनदेखी हो रही है।

    बागी सांसदों का यह भी तर्क है कि वे जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि हैं और अपने क्षेत्रों के विकास कार्यों के लिए केंद्र सरकार के साथ बेहतर समन्वय आवश्यक है। इसी वजह से वे NDA के साथ जुड़कर काम करने की बात कर रहे हैं। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि पहले लोकसभा अध्यक्ष से मान्यता लेने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी और उसके बाद चुनाव आयोग का रुख किया जाएगा।

    इसी बीच, पार्टी के भीतर अन्य स्तरों पर भी असंतोष के संकेत सामने आए हैं। वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी और बैठक से दूरी बनाए जाने की खबरों ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। कुछ नेताओं ने संगठनात्मक फैसलों और रणनीतिक प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं, जिससे TMC के भीतर गुटबाजी की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम पर सभी की नजरें लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय और चुनाव आयोग की संभावित भूमिका पर टिकी हुई हैं, जो आगे की राजनीतिक दिशा तय कर सकते हैं।

  • TMC के 20वें सांसद के भी बगावत के चर्चे…. बागी गुट ने पार्टी सिंबल पर ठोका अपना दावा

    TMC के 20वें सांसद के भी बगावत के चर्चे…. बागी गुट ने पार्टी सिंबल पर ठोका अपना दावा


    कोलकाता।
    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों (West Bengal Assembly elections) में तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress- TMC) की करारी शिकस्त के बाद पार्टी के भीतर मची बगावत अब दिल्ली दरबार तक पहुंच गई है। टीएमसी के बागी गुट ने लोकसभा स्पीकर को एक पत्र भेजकर संसद में खुद को असली टीएमसी के रूप में मान्यता देने और पार्टी सिंबल पर अपना दावा ठोका है। इस चिट्ठी के सामने के बाद 20वें सांसद के बगावत की भी चर्चा तेज हो गई है।

    सूत्रों के मुताबिक, यह पत्र 18 मई का है जिस पर टीएमसी के 19 लोकसभा सांसदों के हस्ताक्षर हैं। दिलचस्प बात यह है कि पत्र में हस्ताक्षर करने वालों के सीरियल नंबर 1 से 20 तक हैं, लेकिन 13वें नंबर के आगे किसी का हस्ताक्षर नहीं है। इससे यह राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं कि टीएमसी का कोई अन्य कद्दावर सांसद भी इस बागी गुट के संपर्क में है और सही समय पर सामने आ सकता है।

    बागी गुट की वरिष्ठ नेता और सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा, “हां, मैंने पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं और हमने इसे काफी समय पहले ही स्पीकर को भेज दिया था।” वहीं, सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने कहा कि इस पत्र से यह साफ हो जाता है कि लोकसभा में असली टीएमसी हम ही हैं।


    इन 19 सांसदों के हस्ताक्षर

    शुक्रवार को सामने आई चिट्ठी में जिन सांसदों के हस्ताक्षर हैं उनमें काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय, बापी हालदार, शर्मिला सरकार, प्रसून बंदोपाध्याय, जगदीश बर्मा बसुनिया, असित कुमार माल, अरूप चक्रवर्ती, रचना बनर्जी, सयानी घोष, खलीलुर रहमान, अबू ताहेर खान, यूसुफ पठान, मिताली बाग, माला रॉय, कालीपद सोरेन, दीपक अधिकारी (देव), जून मालिया और पार्थ भौमिक जैसे नाम शामिल हैं।


    बागी गुट के सामने क्या विकल्प

    लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसद हैं। इनमें ममता बनर्जी के भतीजे और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी भी शामिल हैं, जो इस समय बागियों के मुख्य निशाने पर हैं। दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए बागी गुट के पास दो मुख्य रास्ते हैं। बागी गुट खुद को मूल पार्टी बताकर चुनाव आयोग (EC) के पास जा सकता है। इसके लिए उन्हें विधायी बहुमत साबित करना होगा। दलबदल कानून के तहत अयोग्य घोषित होने से बचने के लिए कम से कम दो-तिहाई सांसदों का साथ होना जरूरी है। 28 सांसदों का दो-तिहाई यानी 19 होता है। यही वजह है कि बागी गुट 19 सांसदों के साथ सुरक्षित होने का दावा कर रहा है।

    हाल ही में अप्रैल में आम आदमी पार्टी (AAP) के 10 राज्यसभा सांसदों ने इसी तरह दो-तिहाई बहुमत के साथ भाजपा में अपना विलय कर लिया था। यदि टीएमसी के ये 19 सांसद भी भाजपा या एनडीए में सीधे विलय करते हैं, तो उनकी सदस्यता बची रहेगी।

    टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने इस पर पलटवार करते हुए एक्स लिखा, “गद्दार टीएमसी सांसदों को कानून नहीं पता। 2003 के 91वें संविधान संशोधन ने पार्टी में विभाजन या अलग ब्लॉक के प्रावधान को खत्म कर दिया है। सांसदों की संख्या मायने नहीं रखती, मूल राजनीतिक दल के 2/3 हिस्से का किसी अन्य दल में विलय होना जरूरी है। इन सभी 19 गद्दारों को इस्तीफा देकर भाजपा के टिकट पर दोबारा चुनाव लड़ना चाहिए।”

    भाजपा इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए है, लेकिन वह फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रही है। राज्यसभा के नवनिर्वाचित सदस्य और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ ने इसे टीएमसी का आंतरिक विस्फोट और उनके पापों का नतीजा बताया है। सूत्रों के अनुसार, बागी गुट की नेता काकोली घोष दस्तीदार ने इस हफ्ते दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से उनके आवास पर मुलाकात की थी। भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, “हमने टीएमसी को नहीं तोड़ा, वे खुद एनडीए और राष्ट्रवादी विचारधारा का समर्थन करने के लिए हमारे पास आए हैं। अब यह उन्हें तय करना है कि वे एकनाथ शिंदे या अजीत पवार का रास्ता चुनते हैं या नहीं।”

    हालांकि, इस कूटनीतिक बढ़त के बीच बंगाल भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं में थोड़ा असंतोष भी है। भाजपा का एक धड़ा इन टीएमसी बागियों को पार्टी में शामिल करने और भविष्य में एनडीए सरकार में कैबिनेट मंत्री पद दिए जाने की संभावना का खुलकर विरोध कर रहा है।


    केंद्र सरकार को क्या होगा फायदा?

    भले ही स्थानीय स्तर पर मतभेद हों, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए के लिए यह बहुत बड़ी राहत होगी। लोकसभा में इन 19 सांसदों का समर्थन मिलने से मोदी सरकार को परिसीमन विधेयक और ‘एक देश, एक चुनाव’ जैसे बड़े और कड़े नीतिगत कानूनों को आसानी से पारित कराने में भारी मदद मिलेगी। वहीं राज्यसभा में भी टीएमसी के 3 सांसदों सुखेन्दु शेखर, सुष्मिता देव और प्रकाश बड़ाईक के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीटों को भाजपा विधानसभा में बहुमत के दम पर आसानी से जीत लेगी।