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  • TMC में बगावत के बीच ममता के साथ खड़े हुए शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद, बागियों पर साधा निशाना

    TMC में बगावत के बीच ममता के साथ खड़े हुए शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद, बागियों पर साधा निशाना


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इस समय गंभीर अंदरूनी संकट से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष और गुटबाजी की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। कई नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बागी रुख अपनाने की चर्चाओं के बीच पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को उस समय बड़ी राहत मिली जब वरिष्ठ सांसद शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद खुलकर उनके समर्थन में सामने आए।

    आसनसोल से सांसद और लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे Shatrughan Sinha ने पार्टी छोड़ने या किसी बागी गुट में शामिल होने की अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह ममता बनर्जी के साथ थे, हैं और आगे भी रहेंगे। उनके अनुसार राजनीति में कठिन समय ही रिश्तों और निष्ठा की असली परीक्षा होती है।

    शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि जब उनके राजनीतिक जीवन में चुनौतीपूर्ण दौर आया था, तब Mamata Banerjee ने उन पर भरोसा जताया था। उन्होंने दावा किया कि ऐसे समय में उनका कर्तव्य बनता है कि वे भी ममता बनर्जी का साथ दें। उन्होंने यह भी कहा कि उनके नाम को लेकर जो अटकलें लगाई जा रही हैं, वे निराधार हैं और उनका किसी कथित बागी समूह से कोई संबंध नहीं है।

    अपने विशेष अंदाज में शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि वह स्वयं अपने लिए “तीन लाइन का व्हिप” जारी कर रहे हैं कि उनका राजनीतिक और नैतिक समर्थन ममता बनर्जी तथा टीएमसी के साथ बना रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न राजनीतिक दलों में उनके मित्र हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे पार्टी छोड़ने जा रहे हैं।

    इसी क्रम में बर्धमान-दुर्गापुर से सांसद Kirti Azad भी पार्टी नेतृत्व के समर्थन में मजबूती से सामने आए। उन्होंने बागी नेताओं पर निशाना साधते हुए दावा किया कि कुछ लोग राजनीतिक दबाव और अन्य कारणों से पार्टी छोड़ रहे हैं। कीर्ति आजाद ने आरोप लगाया कि विपक्षी दल टीएमसी को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं और कुछ नेताओं को प्रभावित किया जा रहा है।

    उन्होंने बागी नेताओं के उस दावे को भी चुनौती दी, जिसमें बड़ी संख्या में सांसदों के समर्थन की बात कही गई थी। कीर्ति आजाद के अनुसार, पार्टी के भीतर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इससे संगठन की मूल ताकत कमजोर नहीं होती। उन्होंने विश्वास जताया कि ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक क्षमता और अनुभव के बल पर मौजूदा संकट से पार्टी को बाहर निकाल लेंगी।

    इस दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के बीच सामने आए मतभेदों पर भी प्रतिक्रिया दी गई। कीर्ति आजाद ने कहा कि कल्याण बनर्जी लंबे समय से पार्टी के महत्वपूर्ण नेता रहे हैं और उन्होंने हमेशा संगठन के लिए काम किया है। उनके अनुसार, नेतृत्व स्तर पर उत्पन्न मतभेदों का समाधान बातचीत और संगठनात्मक प्रक्रिया के जरिए निकाला जा सकता है।

    गौरतलब है कि हाल के दिनों में टीएमसी के कई नेताओं और सांसदों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। कुछ रिपोर्टों में बागी खेमे द्वारा समर्थन जुटाने की बात कही गई है, जबकि पार्टी नेतृत्व इन दावों को गंभीरता से नहीं ले रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी इस चुनौती से कैसे निपटती है।

    फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पार्टी के संकट के दौर में शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद जैसे वरिष्ठ नेताओं का सार्वजनिक समर्थन ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके बयानों ने यह संकेत दिया है कि टीएमसी के भीतर चल रही उठापटक के बावजूद नेतृत्व के साथ खड़े रहने वाले नेताओं की संख्या भी कम नहीं है।

  • अभिषेक बनर्जी पर बढ़ा दबाव: कल्याण बनर्जी के बेटे ने छोड़ा केस, बोले- सम्मान नहीं मिलेगा तो साथ नहीं देंगे

    अभिषेक बनर्जी पर बढ़ा दबाव: कल्याण बनर्जी के बेटे ने छोड़ा केस, बोले- सम्मान नहीं मिलेगा तो साथ नहीं देंगे


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रही खींचतान अब सार्वजनिक रूप से सामने आने लगी है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को लेकर वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी के परिवार की नाराजगी ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। अधिवक्ता शीर्षाण्य बनर्जी, जो वरिष्ठ टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी के पुत्र हैं, ने दावा किया है कि पेशेवर सम्मान और वकालत की परंपराओं की अनदेखी किए जाने के कारण उन्होंने अभिषेक बनर्जी से जुड़े कानूनी मामलों से खुद को अलग करने का निर्णय लिया है।

    शीर्षाण्य बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वे 2 जून से एक मामले पर काम कर रहे थे और उनका प्रयास था कि अभिषेक बनर्जी को कानूनी राहत मिल सके। उनका दावा है कि बाद में उन्हें जानकारी दी गई कि मामले की पैरवी के लिए किसी अन्य वकील को जिम्मेदारी दी जा रही है, जो उनके पिता कल्याण बनर्जी से जूनियर हैं। शीर्षाण्य के अनुसार, वकालत के पेशे में वरिष्ठता और पेशेवर शिष्टाचार का विशेष महत्व होता है और इसी सिद्धांत के आधार पर उन्होंने मामले से अलग होने का फैसला किया।

    उन्होंने कहा कि वकीलों का भी आत्मसम्मान होता है और पेशेवर सम्मान हर व्यक्ति का अधिकार है। उनका दावा है कि यदि किसी पेशेवर को उचित सम्मान नहीं दिया जाता है तो उसके लिए ऐसे मामलों में काम जारी रखना मुश्किल हो जाता है। शीर्षाण्य ने यह भी कहा कि उन्होंने जो निर्णय लिया है, वह पूरी तरह पेशेवर आधार पर लिया गया है और इसका उद्देश्य अपने पेशे की गरिमा बनाए रखना है।

    हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका यह फैसला पार्टी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के प्रति उनके रुख को प्रभावित नहीं करता। शीर्षाण्य ने कहा कि वे ममता बनर्जी के नेतृत्व और पार्टी के लिए पहले की तरह काम करते रहेंगे। उनका कहना था कि टीएमसी केवल किसी एक नेता का नाम नहीं है, बल्कि बूथ स्तर पर काम करने वाले हजारों कार्यकर्ताओं और नेताओं का सामूहिक संगठन है।

    इस बीच, वरिष्ठ टीएमसी नेता Kalyan Banerjee ने भी अभिषेक बनर्जी के खिलाफ नाराजगी जाहिर की है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी आपत्तियां रखते हुए अभिषेक बनर्जी पर अहंकारी व्यवहार का आरोप लगाया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि वे अभिषेक से जुड़े कानूनी मामलों में आगे काम नहीं करेंगे। हालांकि, इन बयानों पर पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी के भीतर विभिन्न स्तरों पर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। कई नेता संगठनात्मक फैसलों और नेतृत्व शैली को लेकर अपनी राय सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर रहे हैं। ऐसे में कल्याण बनर्जी और शीर्षाण्य बनर्जी की टिप्पणियां पार्टी के अंदर चल रही बहस को और तेज कर सकती हैं।

    फिलहाल यह पूरा विवाद राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक ओर अभिषेक बनर्जी पार्टी संगठन में अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी पार्टी के लिए नई चुनौती के रूप में देखी जा रही है। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व इस मुद्दे को किस तरह संभालता है, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

  • हाईकोर्ट की सख्ती के बावजूद सड़कों पर घुमाए गए TMC नेता जहांगीर खान, बंगाल पुलिस की कार्रवाई पर उठा विवाद

    हाईकोर्ट की सख्ती के बावजूद सड़कों पर घुमाए गए TMC नेता जहांगीर खान, बंगाल पुलिस की कार्रवाई पर उठा विवाद


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था और राजनीतिक घटनाक्रम के बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेता जहांगीर खान से जुड़ा मामला एक बार फिर चर्चा का केंद्र बन गया है। हाल ही में गिरफ्तार किए गए जहांगीर खान को पुलिस द्वारा दक्षिण 24 परगना जिले के फालता क्षेत्र में सार्वजनिक रूप से पैदल ले जाने के वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब कुछ दिन पहले ही कलकत्ता हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में आरोपियों को सार्वजनिक रूप से घुमाने की प्रथा पर कड़ी टिप्पणी की थी।

    जानकारी के अनुसार, जहांगीर खान को सोमवार को भारत-नेपाल सीमा के निकट उत्तर बंगाल के पानीटंकी क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया था। उनके खिलाफ जबरन वसूली सहित कई गंभीर आरोपों में सात एफआईआर दर्ज होने की बात कही जा रही है। गिरफ्तारी के बाद अदालत ने उन्हें पांच दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया था। गुरुवार को सामने आए वीडियो में पुलिसकर्मी उन्हें फालता और आसपास के इलाकों में पैदल ले जाते दिखाई दे रहे हैं, जिसके बाद इस कार्रवाई को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    जहांगीर खान पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक चर्चित नाम रहे हैं। उन्हें टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद Abhishek Banerjee का करीबी माना जाता है। विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी उनका नाम लगातार चर्चा में रहा था। बताया जाता है कि मतदान से पहले वह क्षेत्र से गायब हो गए थे और उसके बाद से उनके खिलाफ विभिन्न मामलों की जांच जारी थी।

    इस मामले ने इसलिए भी ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि हाल ही में कलकत्ता हाईकोर्ट की अवकाशकालीन पीठ ने आरोपियों को सार्वजनिक रूप से घुमाने के मामलों पर पश्चिम बंगाल पुलिस से रिपोर्ट मांगी थी। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा था कि पुलिस को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार अवश्य है, लेकिन उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित या बदनाम करने का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया था कि ऐसी कार्रवाइयों को संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में परखा जाना चाहिए।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) में पुलिस को कुछ विशेष परिस्थितियों में ही कड़े नियंत्रण या हथकड़ी के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है। कानून का उद्देश्य सुरक्षा और जांच सुनिश्चित करना है, न कि किसी आरोपी को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करना। यही कारण है कि आरोपी को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की घटनाएं अक्सर न्यायिक समीक्षा और मानवाधिकार संबंधी बहस का विषय बन जाती हैं।

    देश के अन्य राज्यों में भी इस तरह के मामलों पर अदालतें सख्त रुख अपना चुकी हैं। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय और राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी पूर्व में ऐसी घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि किसी भी आरोपी के सम्मान और गरिमा के अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए, चाहे उसके खिलाफ आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों।

    फिलहाल जहांगीर खान का मामला पश्चिम बंगाल की राजनीति और पुलिस प्रशासन दोनों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। एक ओर उनके खिलाफ दर्ज मामलों की जांच जारी है, वहीं दूसरी ओर पुलिस की कार्रवाई को लेकर कानूनी और संवैधानिक प्रश्न भी उठ रहे हैं। आने वाले दिनों में अदालत और प्रशासन की प्रतिक्रिया इस मामले की दिशा तय कर सकती है।

  • TMC में बगावत और गहराई: काकोली घोष ने ऋतब्रत बनर्जी से बनाई दूरी, NDA समर्थन के दावे से बढ़ी सियासी हलचल

    TMC में बगावत और गहराई: काकोली घोष ने ऋतब्रत बनर्जी से बनाई दूरी, NDA समर्थन के दावे से बढ़ी सियासी हलचल


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रही अंदरूनी कलह अब नए मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर उभरे बागी नेताओं के बीच भी रणनीतिक मतभेद सामने आने लगे हैं। लोकसभा में बागी सांसदों के कथित गुट का नेतृत्व करने का दावा कर रहीं टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उनका बंगाल विधानसभा में बागी गुट का नेतृत्व कर रहे ऋतब्रत बनर्जी से कोई संबंध नहीं है।

    काकोली घोष दस्तीदार का यह बयान ऐसे समय आया है जब टीएमसी के भीतर असंतोष और संभावित टूट की चर्चाएं लगातार तेज हो रही हैं। हाल ही में राज्यसभा के कुछ सदस्यों के इस्तीफों और पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों ने राजनीतिक हलकों में नई अटकलों को जन्म दिया है। इसी बीच काकोली ने दावा किया कि लोकसभा में उनके साथ कई सांसद खड़े हैं और वे बंगाल के हितों के लिए एक अलग राजनीतिक दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

    मीडिया से बातचीत में काकोली ने कहा कि जब उन्होंने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाई थी, तब वे अकेली थीं, लेकिन अब कई सांसद उनके साथ आ चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा की राजनीति में सक्रिय हैं, जबकि उनका संघर्ष संसद के स्तर पर है। इस कारण दोनों की राजनीतिक रणनीति और प्राथमिकताएं अलग हैं।

    टीएमसी के भीतर जारी इस घटनाक्रम में एक बड़ा विरोधाभास भी सामने आया है। जहां ऋतब्रत बनर्जी खुद को राज्य में भाजपा के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं काकोली घोष का दावा है कि उनका गुट केंद्र की एनडीए सरकार को समर्थन देने के पक्ष में है। यही कारण है कि दोनों नेताओं के बीच दूरी और अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगी है।

    काकोली घोष ने लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर कल्याण बनर्जी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। उनके अनुसार संसद के भीतर महिलाओं के प्रति कथित व्यवहार को लेकर उन्होंने आपत्ति जताई है। काकोली ने स्पष्ट कहा कि वे किसी भी परिस्थिति में कल्याण बनर्जी के साथ राजनीतिक रूप से नहीं जुड़ सकतीं।

    दूसरी ओर, ऋतब्रत बनर्जी ने काकोली के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है और वे इस तरह के विवादों में पड़ने से बचना चाहते हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि दोनों गुट फिलहाल अपने-अपने राजनीतिक रास्तों पर आगे बढ़ना चाहते हैं।

    सबसे बड़ा विवाद काकोली घोष के उस दावे को लेकर है जिसमें उन्होंने कहा कि टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग गुट को मान्यता दिलाने और एनडीए सरकार को समर्थन देने के लिए पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। हालांकि, स्पीकर कार्यालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक पत्र प्राप्त नहीं हुआ है।

    इतना ही नहीं, जिन सांसदों के नाम कथित रूप से बागी गुट में शामिल बताए जा रहे हैं, उनमें से कुछ ने सार्वजनिक रूप से इन दावों का खंडन भी किया है। आसनसोल से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि वे पूरी तरह टीएमसी और ममता बनर्जी के साथ हैं। वहीं जयनगर से सांसद प्रतिमा मंडल ने भी ऐसी खबरों को अफवाह बताते हुए चुनौती दी कि यदि कोई पत्र मौजूद है तो उसे सार्वजनिक किया जाए।

    इस बीच दिल्ली में केंद्रीय मंत्री के आवास पर कथित रूप से हुई एक बैठक की चर्चाओं ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। हालांकि बैठक में शामिल नेताओं और वहां हुई चर्चाओं को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। फिर भी काकोली घोष का दावा है कि उनके साथ सांसदों की संख्या लगातार बढ़ रही है और कई अन्य नेता भी संपर्क में हैं।

    पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी के भीतर बढ़ती यह हलचल आने वाले दिनों में राज्य और राष्ट्रीय राजनीति दोनों पर असर डाल सकती है। फिलहाल सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि पार्टी नेतृत्व इस चुनौती का सामना किस तरह करता है और बागी गुट अपने दावों को किस हद तक साबित कर पाता है।

  • TMC-कांग्रेस विलय की अटकलें तेज, ममता को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अभिषेक को महासचिव पद की पेशकश की चर्चा

    TMC-कांग्रेस विलय की अटकलें तेज, ममता को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अभिषेक को महासचिव पद की पेशकश की चर्चा


    नई दिल्ली । देश की राजनीति में एक बार फिर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के संभावित विलय की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। दिल्ली में गांधी परिवार और बनर्जी परिवार के बीच हुई हालिया मुलाकातों के बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि दोनों दलों की ओर से अब तक किसी भी प्रकार के विलय या औपचारिक समझौते की पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन सूत्रों के हवाले से सामने आ रही खबरों ने सियासी हलचल बढ़ा दी है।

    मीडिया रिपोर्ट्स में कांग्रेस सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि यदि भविष्य में तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय होता है, तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है। रिपोर्टों के अनुसार उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव दिया गया है। वहीं, टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को कांग्रेस महासचिव पद की पेशकश किए जाने की भी चर्चा है। हालांकि इन दावों की किसी भी पक्ष ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

    विलय की संभावनाओं को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में यह प्रक्रिया कितनी व्यावहारिक होगी। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि टीएमसी के भीतर कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बीच मतभेद उभरकर सामने आए हैं। कुछ बागी नेताओं की ओर से पार्टी के भीतर असंतोष की बात कही जा रही है। हालांकि इन दावों पर भी पार्टी नेतृत्व की ओर से कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्षी दलों को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करना है तो कांग्रेस और टीएमसी के बीच बेहतर तालमेल महत्वपूर्ण हो सकता है। इसी संदर्भ में हालिया बैठकों को देखा जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि इन मुलाकातों में विपक्षी एकता, INDIA गठबंधन की रणनीति और पश्चिम बंगाल की राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि बातचीत केवल गठबंधन तक सीमित है या भविष्य में किसी बड़े राजनीतिक समीकरण की भी संभावना है।

    इस बीच टीएमसी के कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से पार्टी के कांग्रेस में विलय की अटकलों को खारिज किया है। उनका कहना है कि तृणमूल कांग्रेस अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखेगी। दूसरी ओर कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि यदि ऐसा कोई प्रस्ताव आता है तो इससे विपक्षी राजनीति को नई दिशा मिल सकती है। हालांकि पश्चिम बंगाल कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय बताई जा रही है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार फिलहाल स्थिति पूरी तरह अटकलों और सूत्रों पर आधारित है। दोनों दलों की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और कांग्रेस नेतृत्व की ओर से आने वाले दिनों में दिए जाने वाले बयानों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी। फिलहाल इतना तय है कि दिल्ली में हुई मुलाकातों ने विपक्षी राजनीति को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है और आगामी दिनों में इस विषय पर और स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकती है।

  • टीएमसी संकट के बीच शत्रुघ्न सिन्हा की चुप्पी चर्चा में, बंगाल की सियासत में बढ़े नए कयास..

    टीएमसी संकट के बीच शत्रुघ्न सिन्हा की चुप्पी चर्चा में, बंगाल की सियासत में बढ़े नए कयास..

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभर रहे मतभेदों और सांसदों के रुख को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। इसी बीच पार्टी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा की चुप्पी राजनीतिक गलियारों में विशेष चर्चा का विषय बन गई है। जहां विभिन्न नेताओं की ओर से लगातार बयान सामने आ रहे हैं, वहीं अनुभवी नेता और अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा ने अब तक किसी भी पक्ष में सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की है। उनकी यही खामोशी राजनीतिक विश्लेषकों और पर्यवेक्षकों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है।

    तृणमूल कांग्रेस के भीतर कथित असंतोष और सांसदों के अलग-अलग रुख की चर्चाओं के बीच कई नेताओं ने खुलकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। इसके विपरीत शत्रुघ्न सिन्हा ने न तो किसी संभावित बागी समूह के समर्थन में कोई बयान दिया है और न ही सार्वजनिक रूप से पार्टी नेतृत्व के पक्ष में कोई विशेष प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इस कारण राजनीतिक हलकों में उनके अगले कदम को लेकर विभिन्न तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शत्रुघ्न सिन्हा का लंबा राजनीतिक अनुभव उन्हें जल्दबाजी में कोई निर्णय लेने से रोक सकता है। राष्ट्रीय राजनीति में कई दशक सक्रिय रहने और विभिन्न राजनीतिक परिस्थितियों का अनुभव रखने वाले सिन्हा अक्सर महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोच-समझकर प्रतिक्रिया देने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में मौजूदा घटनाक्रम पर उनकी चुप्पी को कुछ लोग रणनीतिक प्रतीक्षा की स्थिति के रूप में देख रहे हैं।

    शत्रुघ्न सिन्हा ने वर्ष 2022 में तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा था। इसके बाद उन्हें आसनसोल लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा गया, जहां उन्होंने जीत दर्ज की। बाद में आम चुनाव में भी उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका को स्थापित करने में पार्टी नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही कारण है कि उनके रुख को लेकर राजनीतिक हलकों में विशेष रुचि बनी हुई है।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि किसी भी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान वरिष्ठ नेता अक्सर तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय परिस्थितियों का आकलन करना पसंद करते हैं। शत्रुघ्न सिन्हा का नाम उन नेताओं में शामिल रहा है जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न दलों के नेताओं के साथ लंबे समय तक काम किया है। उनके राजनीतिक संबंध और अनुभव उन्हें परिस्थितियों को गहराई से समझने का अवसर देते हैं।

    राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि बंगाल की मौजूदा परिस्थितियों पर राष्ट्रीय दलों की भी नजर बनी हुई है। ऐसे माहौल में किसी भी वरिष्ठ नेता का सार्वजनिक रुख महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा सकता है। हालांकि अभी तक शत्रुघ्न सिन्हा की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है, इसलिए उनके बारे में लगाए जा रहे अधिकांश अनुमान केवल राजनीतिक चर्चाओं तक ही सीमित हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच पार्टी के कुछ सांसद नेतृत्व के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं, जबकि कुछ अन्य नेताओं ने सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है। इसी श्रेणी में शत्रुघ्न सिन्हा का नाम भी लिया जा रहा है। फिलहाल उनकी चुप्पी को लेकर कई तरह के राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति तभी स्पष्ट होगी जब वह स्वयं इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देंगे।

    बंगाल की राजनीति में आने वाले दिनों में घटनाक्रम किस दिशा में आगे बढ़ता है, इस पर सभी की नजर बनी हुई है। ऐसे समय में शत्रुघ्न सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेता का रुख न केवल पार्टी के भीतर बल्कि व्यापक राजनीतिक परिदृश्य में भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है। फिलहाल उनकी खामोशी ही सबसे अधिक चर्चा का विषय बनी हुई है।

  • "जमीन पर काम करने वालों को सीख न दें", महुआ पर काकोली घोष का तीखा हमला

    "जमीन पर काम करने वालों को सीख न दें", महुआ पर काकोली घोष का तीखा हमला


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में चल रही अंदरूनी कलह अब सार्वजनिक रूप से सामने आने लगी है। पार्टी की बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने वरिष्ठ सांसद महुआ मोइत्रा पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें राजनीति से ज्यादा प्रचार में रुचि रखने वाली नेता बताया है। उनके बयान ने टीएमसी के भीतर बढ़ते मतभेदों और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों को और तेज कर दिया है।

    एक समाचार चैनल से बातचीत के दौरान काकोली घोष ने कहा कि जब ममता बनर्जी ने राजनीति में अपनी पहचान बनानी शुरू की थी, तब आज खुद को उनका करीबी बताने वाले कई चेहरे राजनीतिक परिदृश्य में मौजूद भी नहीं थे। उन्होंने बिना नाम लिए महुआ मोइत्रा पर निशाना साधते हुए कहा कि विदेश में बैठकर ट्वीट करने वाले लोग वास्तविक राजनीति नहीं करते, बल्कि केवल मीडिया का ध्यान आकर्षित करने और अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए बयानबाजी करते हैं।

    काकोली घोष की यह प्रतिक्रिया उस समय सामने आई है जब हाल ही में महुआ मोइत्रा ने पार्टी के बागी सांसदों को “लालची”, “मतलबी” और “गद्दार” करार दिया था। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच जुबानी जंग और तेज हो गई है। घोष ने कहा कि कुछ नेता लगातार ऐसे बयान देते हैं, जिनसे मीडिया में उनकी चर्चा बनी रहे, लेकिन इससे पार्टी संगठन को नुकसान पहुंचता है।

    इस बीच बागी खेमे ने दावा किया है कि उसके साथ करीब 20 सांसदों का समर्थन मौजूद है। काकोली घोष ने स्वयं को भी इस गुट का हिस्सा बताया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बागी सांसदों ने हाल के दिनों में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ भी बैठकें की हैं, जिससे टीएमसी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ गई हैं।

    उधर, पार्टी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे ने भी टीएमसी में असंतोष की खबरों को बल दिया है। बताया जा रहा है कि रॉय कई सांसदों के साथ केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर पहुंचे थे, जहां महत्वपूर्ण राजनीतिक चर्चा हुई। इस बैठक में तृणमूल कांग्रेस के कई लोकसभा सांसदों की मौजूदगी की खबरें सामने आई हैं।

    दिल्ली में चल रहे इस राजनीतिक घटनाक्रम के समानांतर पश्चिम बंगाल में भी पार्टी के भीतर उथल-पुथल जारी है। रिपोर्टों के अनुसार, विधानसभा चुनाव के बाद कई विधायक पार्टी नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे हैं। बागी गुट का दावा है कि बड़ी संख्या में विधायकों ने पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग रुख अपनाया है और संगठनात्मक बदलाव की मांग कर रहे हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि टीएमसी के भीतर यह असंतोष और बढ़ता है, तो इसका असर आगामी राजनीतिक रणनीतियों और विपक्षी गठबंधन की एकजुटता पर भी पड़ सकता है। फिलहाल ममता बनर्जी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिशों में जुटी हैं, लेकिन पार्टी के भीतर उठ रहे विरोध के स्वर उनके लिए नई चुनौती बनते दिखाई दे रहे हैं।

  • बंगाल में TMC के भीतर बढ़ी हलचल! सांसदों की दिल्ली बैठक से तेज हुई अटकलें, ममता के सामने नई चुनौती?

    बंगाल में TMC के भीतर बढ़ी हलचल! सांसदों की दिल्ली बैठक से तेज हुई अटकलें, ममता के सामने नई चुनौती?


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों हलचल तेज है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कुछ सांसदों की दिल्ली में भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। हालांकि पार्टी की ओर से इसे सामान्य शिष्टाचार भेंट बताया गया, लेकिन घटनाक्रम को लेकर कई तरह के राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं।

    इस बैठक में राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा दे चुके सुखेंदु शेखर रॉय की मौजूदगी सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के दिनों में पार्टी के भीतर उभर रहे असंतोष के संकेत अब खुलकर सामने आने लगे हैं।

    दिल्ली में जुटे कई सांसद
    दिल्ली में हुई इस मुलाकात में TMC के सांसद जगदीश बसुनिया, प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार, अरूप चक्रवर्ती और कालीपदा सोरेन समेत कई नेता शामिल बताए गए। वहीं शाम को सांसद शताब्दी रॉय के आवास पर भी एक बैठक हुई, जिसमें विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा की खबरें सामने आईं। इसी बीच TMC सांसद काकोली घोष ने दावा किया कि प्रदेश के विकास से जुड़े मुद्दों पर केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है और इसी उद्देश्य से संवाद किया जा रहा है।

    इस्तीफे के बाद सुखेंदु शेखर रॉय के आरोप
    राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा देने के बाद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी नेतृत्व पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने संगठन में भ्रष्टाचार, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता और आंतरिक लोकतंत्र की कमी जैसे मुद्दों का जिक्र किया था। उनके बयान को पार्टी के अंदरूनी असंतोष का संकेत माना गया।

    कई महीनों से चल रही है नाराजगी की चर्चा
    राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, TMC के भीतर पिछले कुछ समय से असंतोष की चर्चा लगातार होती रही है। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से ऐसे दावों को खारिज किया जाता रहा है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने इन चर्चाओं को फिर हवा दे दी है। हाल के दिनों में पार्टी की बैठकों में कई नेताओं की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी रही है। इससे संगठन के भीतर चल रही गतिविधियों को लेकर राजनीतिक अटकलें और तेज हो गई हैं।

    ऋतब्रत बंद्योपाध्याय की भूमिका पर नजर
    विपक्ष के नेता ऋतब्रत बंद्योपाध्याय का नाम भी इस पूरे घटनाक्रम में प्रमुखता से सामने आ रहा है। उन्होंने दावा किया है कि TMC के कई नेता उनके संपर्क में हैं और पार्टी के भीतर चल रही हलचलों को लेकर लगातार संवाद जारी है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विपक्ष इसे राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के रूप में पेश कर रहा है।

    फिरहाद हाकिम की मुलाकात ने बढ़ाई चर्चा
    मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी माने जाने वाले फिरहाद हाकिम की विपक्षी नेताओं से हुई मुलाकात ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा को और तेज कर दिया है। इसे लेकर अलग-अलग राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। कुछ इसे संवाद की कोशिश मान रहे हैं तो कुछ इसे पार्टी के भीतर की स्थिति को समझने की कवायद बता रहे हैं।

    ममता बनर्जी की चुप्पी भी बनी चर्चा का विषय
    दिल्ली दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मीडिया से अपेक्षाकृत दूरी बनाए रखी। आमतौर पर राष्ट्रीय राजनीति और केंद्र सरकार के मुद्दों पर मुखर रहने वाली ममता की इस बार की चुप्पी को भी राजनीतिक विश्लेषक अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं।

    आगे क्या?
    फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने यह संकेत जरूर दिया है कि TMC के भीतर कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधियां चल रही हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी नेतृत्व इन चुनौतियों से कैसे निपटता है और क्या संगठन में किसी बड़े बदलाव की स्थिति बनती है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर अब TMC के अगले कदम और संभावित रणनीति पर टिकी हुई है, क्योंकि बंगाल की राजनीति में होने वाला हर बदलाव राज्य के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

  • चुनाव चिह्न विवाद के बीच TMC का सख्त संदेश, ममता बनर्जी पर सांसद का बड़ा बयान

    चुनाव चिह्न विवाद के बीच TMC का सख्त संदेश, ममता बनर्जी पर सांसद का बड़ा बयान



    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा सत्ता संघर्ष चर्चा का विषय बना हुआ है। पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी खेमे को विधानसभा अध्यक्ष द्वारा मुख्य विपक्षी दल की मान्यता दिए जाने के बाद TMC नेतृत्व और बागी गुट के बीच टकराव और तेज हो गया है। इसी बीच TMC सांसद Mahua Moitra ने बागी विधायकों पर जमकर हमला बोला है।

    एक इंटरव्यू में महुआ मोइत्रा ने कहा कि जिन नेताओं ने वर्षों तक Mamata Banerjee की लोकप्रियता और पार्टी के संगठनात्मक बल का लाभ उठाया, वही आज पार्टी को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बागी नेताओं को निशाने पर लेते हुए कहा कि सत्ता में रहने की आदत पड़ चुकी है, इसलिए वे विपक्ष में संघर्ष करने के बजाय आसान रास्ता चुन रहे हैं। महुआ ने दो टूक कहा कि यदि किसी नेता को पार्टी छोड़नी है तो वह खुलकर जाए, लेकिन खुद को तृणमूल कांग्रेस बताने का अधिकार नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बागी नेता चाहें तो अपनी अलग पार्टी बना लें, लेकिन TMC के नाम और पहचान का इस्तेमाल न करें।

    भाजपा पर गंभीर आरो
    महुआ मोइत्रा ने इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भारतीय जनता पार्टी की भूमिका होने का आरोप भी लगाया। उनका कहना है कि भाजपा योजनाबद्ध तरीके से TMC को तोड़ने की कोशिश कर रही है। उन्होंने पश्चिम बंगाल के नेता Suvendu Adhikari का नाम लेते हुए कहा कि वे कभी तृणमूल का हिस्सा रहे हैं और पार्टी के नेताओं की राजनीतिक कमजोरियों से भली-भांति परिचित हैं। इसी जानकारी का इस्तेमाल कर भाजपा नेताओं पर दबाव बनाया जा रहा है।

    महुआ ने दावा किया कि कुछ नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर पक्ष बदलने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ विधायकों और नेताओं को गिरफ्तारी की धमकियां दी गईं, जिसके चलते वे बागी खेमे के साथ चले गए।

    “असली TMC ममता के साथ”
    बागी गुट के बढ़ते प्रभाव और चुनाव चिह्न पर संभावित विवाद के सवाल पर महुआ मोइत्रा ने स्पष्ट कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस आज भी ममता बनर्जी और उनके साथ खड़े नेताओं के पास ही है। उन्होंने कहा कि पार्टी का मूल संगठन, विचारधारा और जनाधार ममता बनर्जी के नेतृत्व में कायम है।

    महुआ ने यह भी कहा कि यदि कभी ऐसी स्थिति आती है कि पार्टी को अपना मौजूदा चुनाव चिह्न छोड़ना पड़े, तब भी उन्हें कोई चिंता नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर नई राजनीतिक राह चुनी थी, तब उन्होंने अपनी पहचान और चुनावी प्रतीक खुद तैयार किया था।

    नया सिंबल बनाकर भी जीत सकती हैं ममता
    महुआ मोइत्रा ने विश्वास जताया कि ममता बनर्जी का राजनीतिक कद किसी चुनाव चिह्न का मोहताज नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस नेता ने नया दल बनाकर और नया प्रतीक लेकर पश्चिम बंगाल में तीन बार सरकार बनाई, वह भविष्य में भी नया चुनावी चिह्न बनाकर जनता का समर्थन हासिल कर सकती हैं।

    उनके अनुसार, चुनाव चिह्न या पार्टी का नाम बदल सकता है, लेकिन जनता के बीच ममता बनर्जी की पहचान और राजनीतिक प्रभाव को कोई नहीं छीन सकता।

  • TMC के विद्रोह में मुस्लिम MLA भी पीछे नहीं…. मुर्शिदाबाद के 9 में से 8 ने छोड़ा ममता का साथ

    TMC के विद्रोह में मुस्लिम MLA भी पीछे नहीं…. मुर्शिदाबाद के 9 में से 8 ने छोड़ा ममता का साथ


    कोलकाता।
    तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) में हुए विद्रोह में टीएमसी (TMC) के अल्पसंख्यक विधायक (Minority MLA) भी पीछे नहीं हैं. इन विधायकों ने ममता बनर्जी (Mamata Banerjee .) की बजाय ऋतब्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee) के साथ जाना ज्यादा बेहतर समझा है. मुर्शिदाबाद में TMC के जो 9 विधायक जीते थे उनमें से 8 ने ममता का साथ छोड़ दिया है और ऋतब्रत बनर्जी का दामन थाम लिया है।

    इस सूची में तृणमूल कांग्रेस के लंबे समय से विश्वसनीय और वरिष्ठ नेता जावेद खान के साथ-साथ काजल शेख जैसे प्रभावशाली नेता भी शामिल हैं। बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने इन मुस्लिम विधायकों को बगावत का भरपूर इनाम दिया है. बागियों में शामिल जावेद खान को विधानसभा में विपक्ष का उपनेता बनाया गया है. वहीं दूसरी ओर अखुरुज्जमां को चीफ व्हिप बनाया गया है।


    तृणमूल की ‘टूट’ बीजेपी के लिए बंगाल से ज्यादा दिल्ली में फायदेमंद

    एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले मंत्रिमंडल के चार अल्पसंख्यक मंत्री भी आंदोलनकारी विधायकों के इस समूह में शामिल हैं. ये विधायक हैं- जावेद खान, सबीना यास्मीन, गुलाम रब्बानी और अखरूजमां।

    तृणमूल के आंदोलनकारी खेमे के जिन अल्पसंख्यक विधायकों के नाम अब तक सामने आए हैं, वे इस प्रकार हैं – जावेद खान, अखरूजमां, काजल शेख, गुलाम रब्बानी, डॉ. मोशर्रफ हुसैन, इमानी बिस्वास, नियामत शेख, रेयात हुसैन, गुलशन मल्लिक, तौसीफुर रहमान, मुस्तफिजुर रहमान, बहारुल इस्लाम।

    लेकिन कुल आंकड़ा कही ज्यादा है. रिपोर्ट के अनुसार तृणमूल के टिकट पर चुनाव जीतने वाले 34 मुस्लिम विधायकों में से 17 बागी खेमे में शामिल हो गए हैं।

    सबसे खास बात यह है कि मुर्शिदाबाद के 9 अल्पसंख्यक विधायकों में से 8 ऋतब्रत बनर्जी के खेमे में शामिल हो गए हैं. अखरुजमां कहते हैं, ‘मुर्शिदाबाद जिले के 9 विधायकों में से 8 ने हमारा समर्थन किया है. हमने पार्टी के बहुमत के साथ खड़े रहने का फैसला किया है.’ केवल नव निर्वाचित विधायक और शिक्षाविद बाबर अली (जलंगी विधायक) ने ही पार्टी नेता ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भरोसा जताया है।

    रघुनाथगंज के विधायक अख्रुज्जमां को इस ‘विद्रोह’ के सूत्रधारों में से एक माना जा रहा है. अखरूजमां ने 2018 में कांग्रेस छोड़ दी थी और तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे, तब शुभेंदु अधिकारी मुर्शिदाबाद जिले में तृणमूल कांग्रेस के पर्यवेक्षक थे. इस बार वे ऋतब्रता के साथ आए हैं. जिले के दूसरे विधायकों शमशेरगंज के नूर आलम, सुती विधायक इमानी बिस्वास, लालगोला के अब्दुल अजीज, भगवानगोला के रियात हुसैन सरकार और हरिहरपारा के नियामत शेख तथा भरतपुर के विधायकों मुस्तफिजुर रहमान।

    आंकड़ों के अनुसार 2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने मुर्शिदाबाद जिले की 22 सीटों में से 20 सीटें जीती थीं. तृणमूल कांग्रेस के सुनहरे दिनों में जब अभिषेक बनर्जी या ममता बनर्जी कोलकाता में बैठक बुलाते थे तो मुर्शिदाबाद जिले से बुलाए गए सभी विधायक लगभग एक दिन पहले ही कोलकाता में होटल बुक कर लेते थे, ताकि वे समय पर बैठक में पहुंच सकें और पीछे की पंक्ति में न बैठना पड़े. लेकिन इस विधानसभा चुनाव के बाद स्थिति बदल गई है।

    पिछले रविवार को पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के घर पर हुई तृणमूल कांग्रेस विधायक दल की बैठक में ये विधायक नजर नहीं आए. 2011 से ही मुस्लिम बड़ी संख्या में तृणमूल को वोट देते आ रहे हैं. ममता बनर्जी को लगता था कि मुस्लिम उनके स्थायी वोट बैंक रहेंगे. लेकिन इस चुनाव में पूरी तस्वीर बदल गई है।