Tag: Trump

  • ईरान के रहस्यमयी परमाणु ठिकाने पर ट्रंप की नजर, पिकएक्स माउंटेन को लेकर फिर दी हमले की चेतावनी

    ईरान के रहस्यमयी परमाणु ठिकाने पर ट्रंप की नजर, पिकएक्स माउंटेन को लेकर फिर दी हमले की चेतावनी

    नई दिल्ली ।अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्लोरिडा में ईरान के साथ अप्रत्यक्ष बातचीत की तारीफ करते हुए भी उसके एक महत्वपूर्ण भूमिगत परमाणु ठिकाने पिकएक्स माउंटेन का जिक्र किया। उन्होंने संकेत दिया कि ईरान के कुछ परमाणु प्रतिष्ठान अभी भी ऐसे हैं, जिनसे निपटना बाकी है। ट्रंप ने विशेष रूप से पिकएक्स माउंटेन को संभावित सैन्य लक्ष्य बताते हुए कहा कि इस पर तेजी से हमला किया जा सकता है। उनकी इस टिप्पणी ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अमेरिकी सैन्य रणनीति को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

    पिकएक्स माउंटेन ईरान के इस्फहान प्रांत में स्थित एक पहाड़ी क्षेत्र है। इसे स्थानीय भाषा में कूह-ए कोलांग गज ला कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे पिकएक्स माउंटेन नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि स्थानीय शब्द कोलांग का संबंध कुदाल या पहाड़ खोदने वाले औजार से है। यह स्थान ईरान के प्रमुख परमाणु प्रतिष्ठान नतांज से लगभग दो किलोमीटर दक्षिण में और राजधानी तेहरान से करीब 220 किलोमीटर दूर स्थित है।

    इस पहाड़ी के भीतर सुरंगों का एक बड़ा भूमिगत परिसर विकसित किया गया है। यहां दो अलग-अलग सुरंग परिसरों के प्रवेश मार्ग बनाए गए हैं। इस ठिकाने की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्राकृतिक भौगोलिक सुरक्षा है। पहाड़ के भीतर मजबूत ग्रेनाइट चट्टानों के बीच सुरंगें बनाई गई हैं। माना जाता है कि इसकी गहराई और चट्टानों की मजबूती इसे सामान्य हवाई हमलों से काफी हद तक सुरक्षित बना सकती है।

    पश्चिमी देशों के परमाणु विशेषज्ञों की चिंता इस परिसर के संभावित इस्तेमाल को लेकर है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान यहां यूरेनियम संवर्धन की सुविधा विकसित कर सकता है। ऐसी भूमिगत संरचना का उद्देश्य संवेदनशील परमाणु गतिविधियों को संभावित सैन्य हमलों से सुरक्षित रखना हो सकता है। हालांकि, अभी तक इस बात की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है कि यहां यूरेनियम संवर्धन का काम शुरू हो चुका है।

    यूरेनियम संवर्धन परमाणु ईंधन तैयार करने की प्रक्रिया है। कम संवर्धित यूरेनियम का इस्तेमाल बिजली उत्पादन करने वाले परमाणु संयंत्रों में किया जा सकता है, जबकि अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का उपयोग परमाणु हथियार बनाने में भी संभव है। इसी वजह से ईरान की भूमिगत परमाणु सुविधाओं को लेकर अमेरिका और पश्चिमी देशों की चिंता बनी हुई है।

    16 अक्टूबर 2026 की एक विशेषज्ञ रिपोर्ट में उपग्रह तस्वीरों के आधार पर इस परिसर की स्थिति का आकलन किया गया था। इसमें बताया गया कि सुरंगों के प्रवेश मार्गों पर मिट्टी के अवरोध अब भी मौजूद हैं। इससे संकेत मिलता है कि वहां फिलहाल नियमित परिचालन या बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां नहीं हो रही हैं। हालांकि, परिसर में महत्वपूर्ण उपकरण या सामग्री मौजूद होने की संभावना से इनकार नहीं किया गया।

    इससे पहले जुलाई में आई मीडिया रिपोर्टों में इजरायली खुफिया एजेंसियों के हवाले से दावा किया गया था कि ईरान ने यहां सेंट्रीफ्यूज और उनके पुर्जे पहुंचाए हैं। हालांकि, इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    इस ठिकाने को निशाना बनाने में अमेरिका के सामने सैन्य चुनौती भी कम नहीं होगी। अमेरिकी सेना के पास जीबीयू-57 जैसे शक्तिशाली बंकर बस्टर बम हैं, जिन्हें जमीन के भीतर बने मजबूत ठिकानों को भेदने के लिए तैयार किया गया है। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ के भीतर काफी गहराई में मौजूद पूरे परिसर को नष्ट करना आसान नहीं होगा।

    संभावित हमले में सुरंगों के प्रवेश द्वार, बिजली आपूर्ति, वेंटिलेशन और दूसरे सहायक ढांचे को नुकसान पहुंचाया जा सकता है। लेकिन इससे यह सुनिश्चित नहीं होगा कि पहाड़ के भीतर मौजूद सभी सुविधाएं भी पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। अमेरिका के सामने एक बड़ी चुनौती संभावित परमाणु उपकरणों और सामग्री को दोबारा इस्तेमाल होने से रोकने की भी होगी।

    ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जबकि पश्चिमी देशों को उसकी संवर्धन गतिविधियों और भूमिगत ढांचे पर संदेह है। नतांज और फोर्दो जैसे परमाणु ठिकानों पर हमलों के बाद भी पिकएक्स माउंटेन चर्चा में बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने अब तक इस परिसर का निरीक्षण नहीं किया है। ऐसे में वहां मौजूद उपकरणों, गतिविधियों और वास्तविक उद्देश्य को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

  • तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं के बीच कई देशों में आपातकालीन तैयारी पर जोर, नागरिकों को जरूरी सामान जुटाने की सलाह

    तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं के बीच कई देशों में आपातकालीन तैयारी पर जोर, नागरिकों को जरूरी सामान जुटाने की सलाह


    नई दिल्ली ।
    दुनिया के कई देशों में संभावित आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए नागरिकों को पहले से तैयार रहने की सलाह दी जा रही है। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और यूरोप के कई देशों ने लोगों से घरों में पर्याप्त भोजन, पीने का पानी, जरूरी दवाएं और अन्य आवश्यक वस्तुएं रखने पर जोर दिया है। इन तैयारियों का उद्देश्य किसी संकट के दौरान सामान्य आपूर्ति व्यवस्था बाधित होने पर लोगों को शुरुआती दिनों में जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

    जर्मनी, नॉर्वे, फिनलैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, आयरलैंड, स्वीडन, चेकिया और लिथुआनिया सहित कई देशों में आपातकालीन तैयारियों को लेकर जागरूकता बढ़ाई जा रही है। यूरोपीय संघ भी संकट प्रबंधन और नागरिकों की तैयारी को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है। सरकारों की इन सलाहों में प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ साइबर हमले, बिजली संकट और संभावित सैन्य संघर्ष जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया है।

    अलग-अलग देशों में जरूरी सामान जमा रखने की अवधि को लेकर अलग-अलग सुझाव दिए गए हैं। कुछ देशों में कम से कम तीन दिन की जरूरतों के लिए तैयारी करने को कहा गया है, जबकि अन्य जगहों पर सात से दस दिनों तक का भोजन, पानी और दवाएं उपलब्ध रखने पर जोर दिया जा रहा है। इसका मकसद यह है कि किसी आपात स्थिति में बाजार, परिवहन या अन्य आपूर्ति सेवाएं प्रभावित होने पर परिवारों को तत्काल परेशानी का सामना न करना पड़े।

    अमेरिका में भी आपातकालीन तैयारियों को लेकर चर्चा हो रही है। हालांकि, सैन्य ठिकानों को 90 दिनों तक बाहरी आपूर्ति पर निर्भरता कम रखते हुए काम करने में सक्षम बनाने की योजना का उल्लेख नागरिकों के लिए 90 दिनों का राशन जमा करने के निर्देश के रूप में नहीं किया जा सकता। सैन्य प्रतिष्ठानों की यह तैयारी रक्षा व्यवस्था से संबंधित है और इसे आम नागरिकों के लिए जारी किसी समान निर्देश से अलग समझना जरूरी है।

    ब्रिटेन ने अपने ‘बी रेडी’ अभियान के माध्यम से नागरिकों को आपातकालीन परिस्थितियों के लिए जरूरी सामान तैयार रखने की सलाह दी है। इस तैयारी में पीने का पानी, लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाला भोजन, आवश्यक दवाएं, टॉर्च, अतिरिक्त बैटरियां, रेडियो, पावर बैंक और कुछ नकदी शामिल हैं। इसका उद्देश्य यह है कि बिजली, संचार या अन्य सार्वजनिक सेवाएं बाधित होने की स्थिति में लोग कुछ समय तक अपनी बुनियादी जरूरतें खुद पूरी कर सकें।

    जापान में भी आपदा प्रबंधन और नागरिकों की तैयारी को विशेष महत्व दिया जा रहा है। भूकंप की आशंका और उसके बाद बिजली, पानी तथा परिवहन सेवाओं में संभावित रुकावट को ध्यान में रखते हुए लोगों को कम से कम तीन दिन और संभव हो तो एक सप्ताह तक के जरूरी सामान का इंतजाम रखने की सलाह दी जाती है। जापान में प्राकृतिक आपदाओं के दौरान आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने की संभावना को देखते हुए ऐसी तैयारियों को नागरिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

    इन देशों में बढ़ती सतर्कता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के तीसरे विश्व युद्ध को लेकर दिए गए बयान ने भी अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चर्चाओं को ध्यान आकर्षित किया है। हालांकि, विभिन्न देशों की ओर से जारी आपातकालीन तैयारियों की सलाह को सीधे तौर पर विश्व युद्ध की शुरुआत या किसी निश्चित सैन्य टकराव का संकेत नहीं माना जा सकता। इन निर्देशों का दायरा प्राकृतिक आपदाओं से लेकर तकनीकी और सुरक्षा संबंधी संकटों तक फैला हुआ है।

    सरकारों की चिंता केवल युद्ध तक सीमित नहीं है। बाढ़, भीषण मौसम, भूकंप, लंबे समय तक बिजली गुल रहने, इंटरनेट सेवाओं में रुकावट और साइबर हमलों जैसी घटनाएं भी जनजीवन को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में खाद्य सामग्री की आपूर्ति, पेयजल उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाओं और संचार व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। पहले से जरूरी सामान रखने से परिवारों को संकट के शुरुआती दौर में राहत मिल सकती है।

    आपातकालीन तैयारी को लेकर अलग-अलग देशों के निर्देशों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अंतर है। इसलिए नागरिकों को अपने देश और क्षेत्र में जारी आधिकारिक दिशा-निर्देशों के मुताबिक तैयारी करने की सलाह दी जाती है। कुल मिलाकर, कई देशों में नागरिक सुरक्षा को लेकर बढ़ता जोर इस बात को दर्शाता है कि सरकारें अब केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने के बजाय लोगों को पहले से तैयार करने पर भी ध्यान दे रही हैं।

  • चुनाव में जीत के लिए भी ट्रंप के भरोसे नेतन्याहू, समर्थन बढ़ाने के लिए तीन दिन में दो बार किया फोन

    चुनाव में जीत के लिए भी ट्रंप के भरोसे नेतन्याहू, समर्थन बढ़ाने के लिए तीन दिन में दो बार किया फोन


    तेल अवीव।
    इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर चुनावी जीत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन की उम्मीद कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में पिछड़ने के अनुमानों के बीच नेतन्याहू ने पिछले तीन दिनों में ट्रंप से दो बार फोन पर बात कर समर्थन बढ़ाने की मांग की। हालांकि, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने इन दावों से इनकार किया है। व्हाइट हाउस ने भी इस संबंध में पूछे गए सवालों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

    एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, मामले की जानकारी रखने वाले एक अमेरिकी और एक इजरायली सूत्र ने नेतन्याहू की ओर से अतिरिक्त समर्थन मांगे जाने की जानकारी दी है। अमेरिकी सूत्र के मुताबिक, व्हाइट हाउस ने इस कोशिश को नेतन्याहू की ‘हताशा की निशानी’ के रूप में देखा। रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि इजरायली प्रधानमंत्री को चुनावी मुकाबले में अपनी स्थिति कमजोर होने की चिंता है।

    हालांकि, लिकुड पार्टी की प्रवक्ता नेटा मोल्चो ने इन दावों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने हाल के दिनों में या ट्रंप के समर्थन वाले बयान से पहले उनसे मदद नहीं मांगी थी।

    ट्रंप पहले ही कर चुके हैं नेतन्याहू का समर्थन

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर नेतन्याहू के समर्थन में बयान दे चुके हैं। उन्होंने इजरायली मतदाताओं को आगाह करते हुए कहा था कि नेतन्याहू की चुनावी हार का असर अमेरिका और इजरायल के संबंधों पर पड़ सकता है।

    एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बावजूद नेतन्याहू की ओर से ट्रंप से और समर्थन देने का अनुरोध किया गया। इजरायली सूत्र ने बताया कि नेतन्याहू की ओर से सुझाव दिया गया था कि ट्रंप इजरायली पत्रकारों से फोन पर बातचीत करें और चुनाव अभियान के प्रति अपना समर्थन जाहिर करें।

    इसी दौरान नेतन्याहू ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी फोन पर बातचीत की थी। हालांकि, इस बातचीत के बाद प्रधानमंत्री मोदी की ओर से इजरायल के चुनाव को लेकर कोई समर्थन संदेश जारी नहीं किया गया।

    पहले भी विदेशी नेताओं के साथ दिखा चुके हैं नजदीकी

    नेतन्याहू इससे पहले भी चुनाव प्रचार के दौरान विदेशी नेताओं के साथ अपने संबंधों को प्रमुखता देते रहे हैं। पिछले चुनावों में इजरायल की इमारतों पर प्रधानमंत्री मोदी, डोनाल्ड ट्रंप और अन्य विदेशी नेताओं के साथ उनकी तस्वीरों वाले पोस्टर लगाए गए थे। इन तस्वीरों के जरिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नेताओं के साथ अपने संबंधों को चुनाव प्रचार में जगह दी थी।

    सर्वेक्षणों में बहुमत से दूर दिख रहा नेतन्याहू का गठबंधन

    नेतन्याहू की चिंता की एक प्रमुख वजह चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के अनुमान हैं। रिपोर्ट के अनुसार, तीन सर्वेक्षणों में 120 सदस्यीय इजरायली संसद नेसेट में उनके गठबंधन को बहुमत के आंकड़े से पीछे रहने का अनुमान जताया गया है।

    इन सर्वेक्षणों में नेतन्याहू के गठबंधन को करीब 50 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। यह उनके मौजूदा गठबंधन की सीटों की संख्या से 17 कम है। उनकी प्रमुख पार्टी लिकुड, जिसके पास वर्तमान में 32 सीटें हैं, के घटकर करीब 20 सीटों पर सिमटने का अनुमान लगाया गया है।

    हालांकि, नेतन्याहू समर्थक चैनल 14 के सर्वेक्षण में तस्वीर अलग दिखाई गई है। सप्ताह की शुरुआत में जारी इस सर्वेक्षण में नेतन्याहू के गठबंधन को 60 सीटें और लिकुड पार्टी को 30 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया था।

    इस तरह अलग-अलग सर्वेक्षणों में नेतन्याहू के गठबंधन की संभावनाओं को लेकर अंतर दिखाई दे रहा है। चुनाव में उनकी पार्टी और सहयोगी दलों का प्रदर्शन ही तय करेगा कि वे सत्ता में बने रह पाते हैं या नहीं।

  • US का अगला राष्ट्रपति कौन होगा….. ट्रंप ने जेडी वेंस और रुबियो को बताया संभावित दावेदार

    US का अगला राष्ट्रपति कौन होगा….. ट्रंप ने जेडी वेंस और रुबियो को बताया संभावित दावेदार


    मिशिगन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने 2028 के राष्ट्रपति चुनाव (Presidential Election) को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के संभावित दावेदारों के नाम बताए हैं। उन्होंने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (Vice President JD Vance) और विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Foreign Minister Marco Rubio) का नाम लेते हुए कहा कि पार्टी में कई मजबूत नेता हैं। ट्रंप ने रिपब्लिकन पार्टी की टीम को मजबूत बताते हुए डेमोक्रेटिक पार्टी पर निशाना साधा।

    मिशिगन में रैली से पहले एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में ट्रंप से पूछा गया कि 2028 में राष्ट्रपति पद के लिए कौन चुनाव लड़ सकता है। इस पर उन्होंने कहा कि अभी किसी एक नेता को सबसे आगे बताना जल्दबाजी होगी। हालांकि, पार्टी में कई अच्छे नाम मौजूद हैं।

    ट्रंप ने कहा “मैं आपको बता सकता हूं कि मेरी नजर में कौन है, लेकिन अभी थोड़ा जल्दी है।” उन्होंने जेडी वेंस और मार्को रुबियो का नाम लेते हुए कहा कि रिपब्लिकन पार्टी के पास मजबूत नेताओं की कमी नहीं है, जबकि डेमोक्रेट्स के पास ऐसी टीम नहीं है।


    रूस-यूक्रेन युद्ध और तेल को लेकर भी बोले ट्रंप

    मिशिगन रवाना होने से पहले ट्रंप ने रूस-यूक्रेन युद्ध और ऊर्जा सुरक्षा पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अमेरिका तेल उद्योग को मौजूदा संघर्ष के कारण बंधक नहीं बनने देगा। ट्रंप ने दोहराया कि उनके विचार में यह युद्ध शुरू ही नहीं होना चाहिए था।


    3 नवंबर के मध्यावधि चुनाव पर नजर

    अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव भी ट्रंप प्रशासन के लिए अहम माने जा रहे हैं। इन चुनावों से तय होगा कि कांग्रेस के दोनों सदनों (प्रतिनिधि सभा और सीनेट) में किस पार्टी की स्थिति मजबूत होगी। इसका असर ट्रंप के विधायी एजेंडे और वॉशिंगटन में राजनीतिक शक्ति के संतुलन पर पड़ सकता है।


    ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट की चर्चा

    ट्रंप प्रशासन के सामने आर्थिक चिंताओं और घटती लोकप्रियता जैसी चुनौतियां भी हैं। द वॉल स्ट्रीट जर्नल की सितंबर में प्रकाशित एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग 37 प्रतिशत तक गिर गई थी। अखबार के अनुसार, 1990 से उसके सर्वे रिकॉर्ड में मध्यावधि चुनाव से पहले किसी राष्ट्रपति की रेटिंग का यह सबसे निचला स्तर था।

  • तेहरान में अनूठा विरोध… ट्रंप को पिंजरे में कैद कर ईरानी जता रहे अपना गुस्सा…

    तेहरान में अनूठा विरोध… ट्रंप को पिंजरे में कैद कर ईरानी जता रहे अपना गुस्सा…


    तेहरान।
    ईरान और अमेरिका (Iran and America) के बीच बढ़ता तनाव अब केवल कूटनीतिक बयानों और सैन्य सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि तेहरान की सड़कों पर एक अनोखे विरोध के रूप में सामने आया है। ईरान की राजधानी के सबसे व्यस्त इलाकों में शुमार तज्रीश स्क्वायर पर एक विशाल इलेक्ट्रॉनिक बिलबोर्ड (Electronic billboard) से लोहे का पिंजरा लटकाया गया है, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) का हमशक्ल बंद है।

    ईरान सरकार के तेहरान ब्यूटिफिकेशन ऑर्गनाइजेशन की तरफ से शुरू किए गए 15 दिवसीय इस अभियान का मकसद अमेरिकी हमले की ओर दुनिया का ध्यान खींचना है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी हमलों और ईरान को पाषाण युग में धकेलने जैसे बयानों ने आम ईरानी नागरिकों के गुस्से को भड़का दिया है। अमेरिकी सैन्य ताकत के खिलाफ उपजी एकजुटता को हवा देने के लिए ऐसे प्रदर्शनों को एक नया मनोवैज्ञानिक हथियार माना जा रहा है।

    मास्क और विग पहने कलाकार दिन-रात पिंजरे में रहता है, जहां उसके रहने के लिए बिस्तर, टॉयलेट और सिंक की व्यवस्था की गई है। यह कभी सलाखों को झकझोरता है, तो कभी पॉप म्यूजिक पर डांस करता है।


    यह संदेश न देखना अपराध…

    इस नाटकीय प्रदर्शन के पीछे एक गंभीर राजनीतिक संदेश छिपा है। पिंजरे के पीछे बिलबोर्ड पर लगातार उन तस्वीरों का प्रसारण हो रहा है, जो पिछले महीने ईरान के कुहस्तक कस्बे में एक शादी समारोह पर अमेरिकी बमबारी के भीषण दृश्यों को दिखाती हैं। तस्वीरों के साथ एक पीले रंग की क्राइम सीन टेप पर । लिखा गया है-इस दृश्य को न देखना एक अपराध है।

    चौराहे पर कई जगह पर ऐसे होर्डिंग भी लगाए गए हैं जिसमें ट्रंप के अलावा इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को निशाना बनाया गया है।


    हार्न बजाकर जता रहे समर्थन

    लाइव प्रदर्शन को देखने के लिए राहगीरों और वाहन चालकों की भारी भीड़ जुट रही है। लोग गाड़ियां रोककर वीडियो बना रहे हैं और हॉर्न बजाकर अपना समर्थन जता रहे हैं। अमूमन तेहरान में ऐसे प्रदर्शनों के लिए इंकलाब स्क्वायर का इस्तेमाल होता रहा है, लेकिन इस बार व्यापारिक और व्यस्त इलाके तज्जीश स्क्वायर को चुना गया है।

  • पुलित्जर पुरस्कार नहीं मिलने पर ट्रंप ने जताई नाराजगी, रूस जांच की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर साधा निशाना

    पुलित्जर पुरस्कार नहीं मिलने पर ट्रंप ने जताई नाराजगी, रूस जांच की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर साधा निशाना

    नई दिल्ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नोबेल पुरस्कार के बाद अब पुलित्जर पुरस्कार नहीं मिलने पर भी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने दावा किया कि लेखन के क्षेत्र में उनके काम के लिए उन्हें पुलित्जर सम्मान मिलना चाहिए था। बुधवार को दक्षिण कैरोलिना में आयोजित एक रैली के दौरान उन्होंने यह बात कही। इस मौके पर ट्रंप ने रूस से जुड़े मामलों की जांच पर रिपोर्टिंग करने वाले उन पत्रकारों की भी आलोचना की, जिन्हें पुलित्जर पुरस्कार दिया गया था। उनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर इस दावे को लेकर चर्चा शुरू हो गई और कई यूजर्स ने उनकी लेखन क्षमता पर सवाल उठाए।

    ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा कि उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके साथ ही उन्होंने लेखन के लिए पुलित्जर पुरस्कार पर भी अपना दावा जताया। उनका आरोप था कि रूस से जुड़े मामलों पर रिपोर्टिंग करने वाले जिन पत्रकारों को यह सम्मान दिया गया, उनकी रिपोर्टिंग गलत थी। ट्रंप के मुताबिक, ऐसे पत्रकारों को पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए था।

    रूस से संबंधित जांच और उसकी मीडिया रिपोर्टिंग पहले भी अमेरिकी राजनीति में विवाद का विषय रही है। इस बार ट्रंप ने पुरस्कार विजेता पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर सवाल उठाते हुए सम्मान के फैसले की आलोचना की। हालांकि, उनके बयान में रिपोर्टिंग की किन विशिष्ट खबरों या तथ्यों को गलत बताया गया, इसका विस्तृत विवरण नहीं दिया गया।

    ट्रंप अब तक 19 किताबें लिख चुके हैं। उनकी चर्चित पुस्तकों में ‘द आर्ट ऑफ द डील’ शामिल है। इस पुस्तक के जरिए वह कारोबारी दुनिया में अपनी पहचान और व्यावसायिक अनुभवों को सामने रख चुके हैं। पुलित्जर पुरस्कार के लिए अपना दावा पेश करते समय उन्होंने अपने लेखन का उल्लेख किया, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह किस पुस्तक या रचना के आधार पर इस सम्मान के हकदार होने की बात कर रहे थे।

    उनके बयान पर सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ यूजर्स ने ट्रंप की लेखन क्षमता को लेकर व्यंग्य किया। एक यूजर ने टिप्पणी की कि जो व्यक्ति बच्चों की किताब तक नहीं लिख सकता, वह पुलित्जर पुरस्कार पाने की उम्मीद कैसे कर सकता है। एक अन्य यूजर ने उनके अंग्रेजी लिखने और बोलने के तरीके पर तंज कसते हुए कहा कि उनके वाक्यों को समझने के लिए खोजी दल की जरूरत पड़ सकती है। ये प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर उनके दावे को लेकर होने वाली आलोचना का हिस्सा रहीं।

    पुलित्जर पुरस्कार को दुनिया के प्रतिष्ठित सम्मानों में गिना जाता है। यह मुख्य रूप से पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट काम के लिए दिया जाता है, लेकिन इसका दायरा केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं है। साहित्य, नाटक और संगीत के क्षेत्र में भी इस पुरस्कार के तहत सम्मान प्रदान किए जाते हैं। इसकी प्रतिष्ठा के कारण इसे कई बार पत्रकारिता के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जैसी अहमियत वाला सम्मान भी कहा जाता है।

    ट्रंप की टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है, जब वह पहले भी नोबेल पुरस्कार नहीं मिलने को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में युद्ध रुकवाने का श्रेय लेते हुए नोबेल पुरस्कार के लिए अपनी दावेदारी का उल्लेख किया है। अब पुलित्जर पुरस्कार को लेकर दिए गए बयान में भी उन्होंने अपने काम को सम्मान के योग्य बताया और पूर्व में सम्मानित पत्रकारों की आलोचना की।

    हालांकि, किसी पुरस्कार के लिए पात्रता और चयन का फैसला संबंधित पुरस्कार संस्था के नियमों तथा निर्णायक प्रक्रिया के आधार पर होता है। ट्रंप के बयान से उनकी व्यक्तिगत अपेक्षा सामने आती है, जबकि रूस से जुड़ी रिपोर्टिंग और पुरस्कार विजेताओं के काम को लेकर उठाए गए उनके सवालों का आकलन संबंधित खबरों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना जरूरी है।

  • मैक्रों का ट्रंप-नेतन्याहू पर हमला, बोले- फ्रांस की कीमत पर चला रहे सियासी अभियान; क्या है पूरा विवाद?

    मैक्रों का ट्रंप-नेतन्याहू पर हमला, बोले- फ्रांस की कीमत पर चला रहे सियासी अभियान; क्या है पूरा विवाद?


    दोहा।
    फ्रांस में हिंसा और लूटपाट की घटनाओं के बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बयानों पर कड़ी नाराजगी जताई है। मैक्रों ने आरोप लगाया कि विदेशी नेता फ्रांस के हालात का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हित साधने के लिए कर रहे हैं। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से तैयार फर्जी तस्वीरों के जरिए गलत सूचनाएं फैलाए जाने पर भी सवाल उठाए। दूसरी ओर, ट्रंप ने फ्रांस में हिंसा के लिए आव्रजन को जिम्मेदार ठहराया, जबकि नेतन्याहू ने इसे ‘चरमपंथी इस्लाम का आक्रमण’ बताते हुए फ्रांसीसी सरकार की आलोचना की। घटनाओं के बाद फ्रांस के कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है और कुछ स्थानों पर कर्फ्यू भी लगाया गया है।

    मैक्रों ने विदेशी नेताओं को क्या कहा?

    फ्रांस में हालिया हिंसा को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू की टिप्पणियों के बीच मैक्रों ने विदेशी नेताओं की आलोचना की। बुधवार को कतर की राजधानी दोहा में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि कुछ नेता फ्रांस की कीमत पर अपना राजनीतिक अभियान चला रहे हैं।

    मैक्रों ने किसी का नाम लिए बिना कहा कि अटलांटिक के इस पार और उस पार, दोनों तरफ के नेता चुनावी अभियान की मुद्रा में हैं। उन्होंने कहा, “कुछ लोग फ्रांस की कीमत पर अपना अभियान चलाते हैं। इनमें ऐसे नेता भी हैं, जो यहां इस क्षेत्र में या अटलांटिक की दूसरी तरफ अपने राजनीतिक अभियान में जुटे हैं।”

    मैक्रों तीन दिवसीय कतर और खाड़ी क्षेत्र की यात्रा पर हैं। उनकी इस यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य फ्रांस में जीवनयापन की बढ़ती लागत के संकट के बीच देश की ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित करना भी है।

    ट्रंप ने फ्रांस के हालात के लिए किसे ठहराया जिम्मेदार?

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को फ्रांस में जारी विरोध प्रदर्शनों और हिंसा के लिए आव्रजन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने दावा किया कि पेरिस जल्द ही एक मुस्लिम शहर बन जाएगा। ट्रंप ने फ्रांस की सीमाएं बंद नहीं करने को लेकर मैक्रों की आलोचना भी की।

    व्हाइट हाउस के बाहर पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि फ्रांस में जो कुछ हो रहा है, उसका संबंध स्कूलों या किसी दूसरी समस्या से नहीं, बल्कि आव्रजन से है। उन्होंने मैक्रों को अपना दोस्त बताते हुए कहा कि दुनिया भर से लोगों को फ्रांस में आने देने का फैसला गलत था।

    ट्रंप ने अमेरिकी मतदाताओं को चेतावनी देते हुए फ्रांस के हालात की तुलना अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी की संभावित जीत के परिणामों से भी की। उनके इन बयानों ने फ्रांस में आव्रजन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया।

    एआई से बनी फर्जी तस्वीरों पर मैक्रों ने जताई नाराजगी

    मैक्रों ने कहा कि फ्रांस में हुई घटनाओं के पीछे विदेशी हस्तक्षेप के स्पष्ट संकेत नहीं हैं, लेकिन घटनाओं के बाद गलत सूचनाएं फैलाने के लिए विदेशी स्तर पर हेरफेर किया गया। उनके मुताबिक, इसके चलते कई विदेशी नेताओं की ओर से गलत और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियां सामने आईं।

    उन्होंने एआई की मदद से तैयार की गई उन तस्वीरों पर भी आपत्ति जताई, जिनमें फ्रांस में ऐसी घटनाएं दिखाई गईं, जो वास्तव में हुई ही नहीं थीं। मैक्रों ने कहा कि कुछ लोगों ने फ्रांस में प्रवासियों और इस्लामवादियों की भारी भीड़ के घुस आने के दावे किए।

    जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि क्या उनकी टिप्पणी सीधे ट्रंप के लिए थी, तो मैक्रों ने जवाब दिया, “हां।” उन्होंने आगे कहा कि मौजूदा परिस्थितियां बताती हैं कि फ्रांस से कौन प्यार करता है और कौन नहीं। उनके अनुसार, जो लोग इस समय उनके देश के बारे में बुरा बोल रहे हैं, वे फ्रांस से प्यार नहीं करते।

    नेतन्याहू ने फ्रांस पर क्या आरोप लगाए?

    इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने मंगलवार को फ्रांस के हालात को ‘चरमपंथी इस्लाम का आक्रमण’ बताया। टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक, फ्रेंच भाषा के समाचार चैनल आई24न्यूज को दिए साक्षात्कार में नेतन्याहू ने फ्रांसीसी अधिकारियों पर स्थिति का पहले से आकलन करने में नाकाम रहने का आरोप लगाया।

    नेतन्याहू ने कहा, “उन्होंने समय रहते तैयारी नहीं की। उन्होंने बस हार मान ली। वे चरमपंथी इस्लाम के आक्रमण के आगे झुक गए।”

    फ्रांस को सलाह देने के सवाल पर नेतन्याहू ने कहा कि उसे चरमपंथियों के खिलाफ लड़ना चाहिए और तुष्टीकरण की नीति नहीं अपनानी चाहिए। उनके इस बयान ने फ्रांस में सुरक्षा, आव्रजन और धार्मिक चरमपंथ को लेकर चल रही बहस को अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विवाद का रूप दे दिया।

    फ्रांस में कैसे हैं हालात?

    सप्ताहांत में फ्रांस के कई इलाकों में प्रदर्शन हुए। अधिकांश मार्च शांतिपूर्ण रहे, लेकिन शनिवार को लूटपाट और सुरक्षा बलों के साथ झड़पों के बाद स्थिति बिगड़ गई। इसके बाद अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी और कुछ क्षेत्रों में कर्फ्यू लागू किया।

    बोर्दो शहर में अकेले बाहर निकलने वाले नाबालिगों के लिए एक सप्ताह का रात्रिकालीन कर्फ्यू लगाया गया है। गिरोंद और नोवेल-अकितेन की प्रीफेक्ट सोफी ब्रोका ने सोमवार को इस संबंध में आदेश घोषित किया था। यह आदेश मंगलवार से 26 अक्टूबर की सुबह तक प्रभावी रहेगा।

    आदेश के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के नाबालिग रात 10 बजे से सुबह सात बजे तक माता-पिता या कानूनी अभिभावक के बिना सार्वजनिक स्थानों पर नहीं रह सकेंगे।

    फ्रांस की घटनाओं को लेकर अब केवल कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि आव्रजन, धार्मिक चरमपंथ, सोशल मीडिया पर गलत सूचना और विदेशी नेताओं की राजनीतिक बयानबाजी भी विवाद के केंद्र में है। मैक्रों ने जहां फ्रांस के आंतरिक मामलों पर विदेशी नेताओं की टिप्पणियों को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बताया है, वहीं ट्रंप और नेतन्याहू ने फ्रांसीसी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए हैं।

  • जर्मनी-नीदरलैंड दौरा…. ट्रंप की टैरिफ नीति और ट्रेड डील पर अनिश्चितता के बीच भारत का नया दांव

    जर्मनी-नीदरलैंड दौरा…. ट्रंप की टैरिफ नीति और ट्रेड डील पर अनिश्चितता के बीच भारत का नया दांव


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) ने बीते डेढ़ साल में भारतीय माल (Indian goods) पर शुल्क (Tariff) की दर तीन बार बदली। अब अधिकतर भारतीय सामान पर सामान्य शुल्क के ऊपर 10 फीसदी लगता है। फरवरी 2026 में 18% की दर वाले जिस अंतरिम ढांचे का एलान हुआ था, उस पर आठ महीने बाद भी हस्ताक्षर नहीं हुए। इसी अनिश्चितता के बीच केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल (Piyush Goyal) 22 से 24 अक्तूबर तक जर्मनी (Germany) और 24 से 27 अक्तूबर तक नीदरलैंड (Netherlands) के दौरे पर रहेंगे। उनके साथ करीब 100 कंपनियों और नवउद्यमों का दल है।

    बीते चार साल में भारत ने एक के बाद एक समझौते किए हैं और यूरोपीय संघ उसका 22वां मुक्त व्यापार साझेदार बना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और विदेश मंत्री मार्को रुबियो के व्यापार समझौते पर सकारात्मक बयान के बावजूद अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीयर का कहना है कि घोषणा तुरंत होने वाली नहीं है। यानी तस्वीर अब भी साफ नहीं।


    यूरोप का दरवाजा खुला, पर ताला अब तक नहीं हटा

    यूरोपीय संघ के साथ हुआ समझौता भारत का अब तक का सबसे बड़ा सौदा है। यूरोपीय संघ अपने 99.3 प्रतिशत और भारत अपने 96.6 प्रतिशत कारोबार पर शुल्क हटाएगा या घटाएगा। भारत यूरोपीय कारों पर शुल्क 110 प्रतिशत तक के स्तर से घटाकर 40 प्रतिशत पर लाएगा। पर नौ महीने बाद भी यह लागू नहीं हुआ है। गोयल का यह दौरा इसलिए नीतिगत कम और व्यावहारिक ज्यादा है।


    बर्लिन और हेग में क्या होगा

    गोयल बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में हिस्सा लेंगे और जर्मनी के आर्थिक मामलों एवं ऊर्जा मंत्री तथा चांसलर कार्यालय के जी-7 और जी-20 शेरपा से द्विपक्षीय बातचीत करेंगे। भारतीय कारोबारी दल की अलग बैठकें वाहन और उन्नत विनिर्माण, सूचना तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कृषि एवं उपभोक्ता सामान, दवा और स्वास्थ्य में होंगी।

    नीदरलैंड में बातचीत सरकार से सरकार के स्तर पर होगी। 25 अक्तूबर को भारतीय दल रॉटरडम बंदरगाह देखने जाएगा और 26 अक्तूबर को हेग में भारत-नीदरलैंड कारोबार मंच की बैठक होगी।


    अब तक की कोशिशों से क्या मिला

    वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल निर्यात 863.1 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। इसमें वस्तुओं का निर्यात 441.8 अरब डॉलर और सेवाओं का 421.3 अरब डॉलर रहा। यह उसी साल हुआ जिस साल अमेरिका ने शुल्क बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया था।

    मुक्त व्यापार समझौते वाले बाजारों में आसियान देश सबसे ऊपर रहे, जहां 38.42 अरब डॉलर का माल गया। संयुक्त अरब अमीरात 37.36 अरब डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर रहा। ब्रिटेन के साथ समझौता 15 जुलाई 2026 को लागू हुआ और उसी वित्त वर्ष में वहां 13.44 अरब डॉलर का निर्यात दर्ज हुआ।

    ऑस्ट्रेलिया के साथ समझौते से पहले वित्त वर्ष 2020-21 में वहां भेजे माल के लिए सिर्फ 1,482 मूल प्रमाणपत्र जारी हुए थे, समझौते के बाद यह औसतन 45 हजार से ऊपर पहुंच गया। ऑस्ट्रेलिया को निर्यात चार अरब डॉलर से बढ़कर 7.28 अरब डॉलर हो गया।

    ओमान के साथ समझौता एक जून 2026 को लागू हुआ और जून में ही वहां निर्यात पिछले महीने से 54.7 प्रतिशत और पिछले साल के मुकाबले 189.6 प्रतिशत बढ़ गया। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के साथ समझौता अक्तूबर 2025 से लागू है और अब तक 7,885 मूल प्रमाणपत्र जारी हो चुके हैं।

  • ट्रंप और जिनपिंग के साथ बैठक करेंगे पुतिन….त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन का रखा प्रस्ताव

    ट्रंप और जिनपिंग के साथ बैठक करेंगे पुतिन….त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन का रखा प्रस्ताव


    मास्को।
    रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) ने अगले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) के साथ एक त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन का प्रस्ताव रखा है। इस सम्मेलन में यूक्रेन संघर्ष पर चर्चा होगी। इसका उद्देश्य एक ऐसा शांति समझौता करना है जो मॉस्को के पक्ष में हो। यह जानकारी ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ (WSJ) की रिपोर्ट के अनुसार है।

    रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रस्ताव राष्ट्रपति ट्रंप के साथ बेहतर होते संबंधों का फायदा उठाने की पुतिन की कोशिश को दिखाता है। इस कदम ने यूक्रेन और वाशिंगटन के यूरोपीय सहयोगियों के बीच चिंताएं पैदा कर दी हैं, खासकर इसलिए क्योंकि इसमें यूक्रेन का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।


    पुतिन ने बातचीत का प्रस्ताव कब रखा?

    इस मामले की जानकारी रखने वाले रूस के एक पूर्व खुफिया अधिकारी का हवाला देते हुए, डब्लूएसजे ने बताया कि पुतिन ने सबसे पहले 9 अक्तूबर को ट्रंप के साथ फोन पर बातचीत के दौरान एक त्रिपक्षीय बैठक का विचार रखा था। इसी बातचीत के दौरान एक समझौता भी हुआ, जिसके तहत अमेरिका को रूस से डीजल खरीदने और उसे वैश्विक बाजारों में वितरित करने की अनुमति मिल गई।


    क्रेमलिन के प्रवक्ता ने क्या कहा?

    क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने डब्लूएसजे को पुष्टि की कि एक संभावित बैठक को लेकर बातचीत चल रही है। पेस्कोव ने डब्लूएसजे से कहा, ‘बैठक या इसके संभावित एजेंडे को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट सहमति नहीं बनी है, हालांकि तीनों पक्ष इस बात को मानते हैं कि ऐसी बैठक होने की एक संभावना हो सकती है।’


    अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने क्या कहा?

    वहीं, अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ को बताया कि ट्रंप ने इस शिखर सम्मेलन के लिए औपचारिक रूप से सहमति नहीं दी है, लेकिन अधिकारी ने संकेत दिया कि युद्ध को सुलझाने की अपनी कोशिशों को देखते हुए, अमेरिकी राष्ट्रपति इस प्रस्ताव पर विचार कर सकते हैं।


    कब हो सकती है बैठक?

    बातचीत से जुड़े सूत्रों ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ को बताया कि क्रेमलिन ने सुझाव दिया है कि यह त्रिपक्षीय वार्ता आगामी ‘एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन’ (APEC) शिखर सम्मेलन के साथ आयोजित की जा सकती है। यह सम्मेलन 18 और 19 नवंबर को दक्षिणी चीन के टेक हब, शेन्जेन में होने वाला है।

    मॉस्को और बीजिंग के बीच हाल ही में हुई बातचीत से जुड़े सूत्रों ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ को बताया कि रूसी राजनयिकों ने चीनी अधिकारियों के सामने एक प्रस्ताव रखा। चीनी अधिकारियों ने संकेत दिया कि अगर ट्रंप इसमें शामिल होने के लिए सहमत हो जाते हैं, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी।


    ट्रंप ने जेलेंस्की पर क्या आरोप लगाया?

    रविवार को ट्रंप ने दावा किया कि रूस-यूक्रेन संघर्ष को खत्म करने के लिए चल रही बातचीत में काफी प्रगति हो रही है। उन्होंने मॉस्को के प्रति अपने प्रशासन के राजनयिक रुख का बचाव किया और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की पर आरोप लगाया कि वे दो साल पहले एक बेहतर समझौता करने में विफल रहे थे।

    इसके साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और रूसी ऊर्जा खरीदने वाले बड़े देशों पर नए कड़े प्रतिबंधों और टैरिफ को फिलहाल लागू न करने के अपने फैसले का बचाव किया है। उनका कहना है कि वह यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए चल रही शांति वार्ता को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते। ट्रंप ने कहा कि उनकी सरकार युद्ध को खत्म करने के लिए बातचीत में प्रगति कर रही है। उनके मुताबिक, अगर इस समय रूस पर नए आर्थिक दबाव डाले गए, तो वह बातचीत की मेज छोड़ सकता है।

  • रूसी तेल खरीदने वाले भारत समेत पांच देशों को ट्रंप ने टैरिफ से दी छूट, अमेरिकी राष्ट्रपति ने फैसले की बताई वजह

    रूसी तेल खरीदने वाले भारत समेत पांच देशों को ट्रंप ने टैरिफ से दी छूट, अमेरिकी राष्ट्रपति ने फैसले की बताई वजह

    नई दिल्ली । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले भारत समेत पांच देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने से जुड़े प्रावधानों को लागू नहीं किया है। इस फैसले के बाद अमेरिकी राजनीति में बहस शुरू हो गई है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के कई नेताओं ने इस निर्णय पर सवाल उठाए हैं। वहीं, ट्रंप ने अपने कदम का बचाव करते हुए कहा कि यह अमेरिका के हित में है और इससे दुनिया को भी फायदा हो सकता है। उन्होंने कहा कि अभी कई लोगों को उनके फैसले का वास्तविक अर्थ समझ नहीं आया है।

    जिन पांच देशों को इस टैरिफ से छूट मिली है, उनमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। ये देश रूस से तेल और गैस खरीदते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसले के तहत इन देशों पर प्रस्तावित 100 प्रतिशत टैरिफ फिलहाल लागू नहीं होगा। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने और उसकी ऊर्जा खरीद से जुड़े व्यापारिक संबंधों को लेकर अमेरिका में चर्चा जारी है।

    ट्रंप ने रविवार को मियामी में मीडिया से बातचीत के दौरान अपने निर्णय का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बहुत से लोगों को अभी यह जानकारी नहीं है कि उनके फैसले का वास्तविक मतलब क्या है। उनके मुताबिक, समय के साथ इस निर्णय के पीछे का उद्देश्य समझ में आएगा। उन्होंने यह भी कहा कि उनका कदम अमेरिका के हित में होगा और वैश्विक स्तर पर भी इसका लाभ देखने को मिल सकता है। हालांकि, उन्होंने अपने बयान में इस फैसले से होने वाले संभावित लाभों का विस्तृत विवरण नहीं दिया।

    इससे पहले शुक्रवार को ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत रूस से संबंधित नए प्रतिबंध कानून के कुछ प्रावधानों को लागू करने से छूट दी गई। अमेरिकी कांग्रेस ने सितंबर में इस कानून को पारित किया था। इसमें रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रावधान शामिल था। भारत और चीन समेत पांच देशों को इस कार्रवाई से फिलहाल राहत मिलने के बाद कानून के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    आदेश के अनुसार, यह छूट तब तक लागू रहेगी, जब तक राष्ट्रपति या विदेश मंत्री और वित्त मंत्री यह तय नहीं कर लेते कि आगे क्या कार्रवाई आवश्यक है। इस व्यवस्था के कारण संबंधित देशों पर टैरिफ लगाने का निर्णय तत्काल लागू नहीं हुआ है। हालांकि, इससे भविष्य में टैरिफ लगाने की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती। आगे की कार्रवाई अमेरिकी प्रशासन के निर्णय पर निर्भर करेगी।

    ट्रंप के इस कदम की आलोचना उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के साथ-साथ डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने भी की है। दोनों दलों के नेताओं ने पिछले महीने इस कानून को भारी बहुमत से पारित किया था। ऐसे में राष्ट्रपति के फैसले को लेकर अमेरिकी राजनीतिक हलकों में मतभेद सामने आए हैं। आलोचकों का मानना है कि रूस पर आर्थिक दबाव बनाने के लिए इस कानून का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

    दक्षिण कैरोलिना की रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वह रूस पर दबाव बनाने का विकल्प चुनतीं, ताकि युद्ध समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया जा सके और गैस की कीमतें कम हों। उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर भरोसा नहीं होने की बात भी कही। इस कानून का नाम ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ रखा गया है। यह घटनाक्रम दिखाता है कि रूस से ऊर्जा खरीद और उस पर प्रतिबंधों को लेकर अमेरिकी प्रशासन तथा कांग्रेस के कुछ नेताओं के बीच मतभेद बने हुए हैं।