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  • US: ट्रंप की तेल कंपनियों को सख्त चेतावनी, बोले- 'पेट्रोल के दाम कम करो वरना…'

    US: ट्रंप की तेल कंपनियों को सख्त चेतावनी, बोले- 'पेट्रोल के दाम कम करो वरना…'


    वाशिंगटन।
    अंतरराष्ट्रीय बाजार (International Market) में कच्चे तेल की कीमतों (Crude Oil Prices) में आई भारी गिरावट के बाद अब अमेरिकी राजनीति में उबाल आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने देश के सभी पेट्रोल रिटेलर्स (पेट्रोल पंप मालिकों) और बड़ी तेल कंपनियों को सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए ईंधन की कीमतों में तुरुंत कटौती करने का आदेश दिया है। ट्रंप ने तेल कंपनियों पर आम जनता की जेब काटने और ‘प्राइस गॉजिंग’ यानी नाजायज मुनाफाखोरी का सीधा आरोप लगाया है।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया और आधिकारिक बयानों के जरिए अमेरिकी तेल कंपनियों और पेट्रोल पंप एसोसिएशनों को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने कहा कि हाल ही में वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों (जैसे अमेरिका-इरान वार्ता) और बाजार के रुख के कारण कच्चे तेल की कीमत गिरकर लगभग $68 प्रति बैरल पर आ गई।

    ट्रंप का तर्क है कि जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो ये कंपनियां कुछ ही घंटों में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा देती हैं। लेकिन अब जब कच्चा तेल $68 पर आ चुका है, तो आम अमेरिकी नागरिकों को इसका फायदा क्यों नहीं दिया जा रहा है?

    राष्ट्रपति ने केवल चेतावनी ही नहीं दी, बल्कि अमेरिकी न्याय विभाग को इस पूरे मामले की जांच करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने साफ कहा कि अगर रिटेलर्स ने तुरंत कीमतें कम नहीं कीं, तो उन्हें इसके गंभीर कानूनी नतीजे भुगतने होंगे।


    बड़ी कंपनियों पर आपदा में अवसर खोजने का आरोप

    Fortune और Al Jazeera की रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में मिडिल-ईस्ट संकट और युद्ध के हालातों के चलते अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही थीं, जिससे आम जनता पर भारी आर्थिक दबाव था। इस संकट के दौरान वैश्विक तेल कंपनियों (जैसे एक्सॉनमोबिल, शेल और शेवरॉन) ने अरबों डॉलर का ‘अप्रत्याशित मुनाफा’ कमाया है।

    एक तरफ जहां आम अमेरिकी नागरिक $4.50 प्रति गैलन तक की दर से महंगा ईंधन खरीदने को मजबूर थे, वहीं शीर्ष तेल कंपनियों ने युद्ध के शुरुआती महीनों में ही करीब 23 अरब डॉलर का अतिरिक्त मुनाफा कूट लिया। ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि बड़ी तेल कंपनियां इस मुनाफे का इस्तेमाल आम उपभोक्ताओं को राहत देने या भविष्य के संकट से निपटने के लिए निवेश करने के बजाय, अपने शेयर होल्डर्स को डिविडेंड बांटने और खुद की जेबें भरने में कर रही हैं।


    तेल कंपनियों की सफाई: “दाम हमारे हाथ में नहीं”

    इस तीखे हमले के बाद तेल उद्योग और रिफाइनिंग संगठनों ने भी अपनी सफाई पेश की है। उद्योग से जुड़े समूहों का कहना है कि पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें सीधे तौर पर केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं। इसके पीछे कई अन्य वैश्विक कारक होते हैं, जैसे:


    रिफाइनिंग क्षमता की कमी:
    कच्चे तेल को पेट्रोल में बदलने वाली रिफाइनरियों की अपनी सीमाएं और लागतें होती हैं।

    स्थानीय टैक्स का बोझ: कैलिफोर्निया जैसे अमेरिकी राज्यों में भारी स्थानीय गैस टैक्स लागू हैं, जिसकी वजह से भी पेट्रोल की कीमतें नीचे नहीं आ पा रही हैं, जिसकी खुद ट्रंप ने भी आलोचना की है।

    अमेरिका में इस समय महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतें सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा बनी हुई हैं। महंगे डीजल के कारण खाने-पीने की चीजों की ढुलाई महंगी हो गई है, जिससे सीधे तौर पर ग्रोसरी और अन्य जरूरी सामान के दाम बढ़ रहे हैं। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन ने अब अपनी पुरानी ‘घरेलू तेल उत्पादन समर्थक’ छवि को थोड़ा बदलते हुए तेल कंपनियों के खिलाफ सीधे टकराव का रास्ता चुना है ताकि आम उपभोक्ताओं को तुरंत राहत पहुंचाई जा सके।

  • ट्रंप ने दोहा बैठक का किया ऐलान, तेहरान ने कहा- कोई कार्यक्रम तय नहीं, अमेरिका-ईरान रिश्तों में नई कूटनीतिक उलझन

    ट्रंप ने दोहा बैठक का किया ऐलान, तेहरान ने कहा- कोई कार्यक्रम तय नहीं, अमेरिका-ईरान रिश्तों में नई कूटनीतिक उलझन


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक असमंजस की स्थिति बन गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान ने बातचीत का अनुरोध किया है और दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच अगले दिन कतर की राजधानी दोहा में बैठक होगी। हालांकि, ट्रंप के इस बयान के कुछ ही समय बाद ईरान ने ऐसी किसी भी प्रस्तावित बैठक से साफ इनकार कर दिया। दोनों देशों के विपरीत दावों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा छेड़ दी है और यह संकेत दिया है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद की प्रक्रिया अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

    ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर एक संक्षिप्त संदेश जारी करते हुए कहा कि ईरान की ओर से बैठक का अनुरोध किया गया है और यह बातचीत दोहा में आयोजित होगी। उनके इस बयान को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना गया जब पश्चिम एशिया में हाल के घटनाक्रमों के बाद क्षेत्रीय तनाव लगातार बना हुआ है और कई देश किसी भी संभावित कूटनीतिक पहल पर नजर बनाए हुए हैं।

    दूसरी ओर, ईरान के उप विदेश मंत्री काज़ेम ग़रीबाबादी ने स्पष्ट किया कि इस सप्ताह कतर में अमेरिकी अधिकारियों के साथ किसी भी तकनीकी स्तर की बैठक की कोई योजना तय नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि विभिन्न मध्यस्थ देशों के माध्यम से बातचीत की प्रक्रिया सामान्य रूप से जारी है, लेकिन जिन बैठकों की चर्चा मीडिया में की जा रही है, उनकी पुष्टि नहीं की जा सकती। उनके अनुसार, किसी भी औपचारिक तकनीकी वार्ता से पहले समय, स्थान और अन्य आवश्यक शर्तों पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बनना जरूरी होगा।

    ईरानी पक्ष के इस बयान से स्पष्ट संकेत मिला कि बैकचैनल संपर्क और औपचारिक वार्ता के बीच अभी भी अंतर बना हुआ है। विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में दोनों देश सार्वजनिक बयानों और वास्तविक कूटनीतिक प्रयासों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में आधिकारिक घोषणा से पहले किसी भी संभावित बैठक को लेकर अनिश्चितता बनी रह सकती है।

    हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव, समुद्री सुरक्षा से जुड़े मुद्दों और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहे प्रभाव ने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी चाहता है कि दोनों देशों के बीच किसी प्रकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संवाद जारी रहे ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सके। हालांकि दोनों पक्ष अब भी कई प्रमुख मुद्दों पर अलग-अलग रुख अपनाए हुए हैं।

    इसी बीच ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। 4 से 9 जुलाई के बीच आयोजित होने वाले राजकीय कार्यक्रम में विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। भारत की ओर से विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा और बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन इस अवसर पर देश का प्रतिनिधित्व करेंगे। इसे भारत और ईरान के बीच जारी राजनयिक संपर्कों के एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

    फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। एक ओर ट्रंप का सार्वजनिक दावा है तो दूसरी ओर तेहरान का आधिकारिक खंडन। ऐसे में अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच वास्तव में कोई औपचारिक बैठक होती है या कूटनीतिक संपर्क केवल मध्यस्थ देशों के माध्यम से ही आगे बढ़ता है।

  • ईरानी स्कूल त्रासदी पर ट्रंप का बयान, 168 छात्राओं की मौत वाले मिसाइल हमले को बताया ‘अनजाने में हुई गलती’

    ईरानी स्कूल त्रासदी पर ट्रंप का बयान, 168 छात्राओं की मौत वाले मिसाइल हमले को बताया ‘अनजाने में हुई गलती’

    नई दिल्ली । ईरान के मीनाब शहर में एक प्राथमिक विद्यालय पर हुए विनाशकारी मिसाइल हमले को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी बहस के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नया बयान सामने आया है। इस हमले में 168 छात्राओं और कई शिक्षकों की मौत हुई थी, जिसके बाद पूरी दुनिया में गहरी चिंता और संवेदना व्यक्त की गई थी। अब इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्रंप ने कहा है कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह हमला जानबूझकर नहीं किया गया था और मामले की विस्तृत जांच अभी भी जारी है।

    फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि युद्ध और सैन्य अभियानों के दौरान कई बार ऐसी घटनाएं हो जाती हैं जिन्हें जानबूझकर अंजाम नहीं दिया जाता। उनके अनुसार इस मामले में भी वास्तविक परिस्थितियों और जिम्मेदारियों का निर्धारण जांच पूरी होने के बाद ही संभव होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम निष्कर्ष आने से पहले किसी भी पक्ष पर निश्चित आरोप लगाना उचित नहीं होगा।

    प्रेस वार्ता के दौरान जब पत्रकारों ने इस हमले के लिए जवाबदेही और जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठाए, तो ट्रंप ने अपेक्षाकृत तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इस घटना को लेकर जांच एजेंसियां लगातार काम कर रही हैं और सभी तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि रक्षा विभाग के पास इस मामले से जुड़ी अधिक विस्तृत जानकारी उपलब्ध है और जांच प्रक्रिया वहीं से संचालित की जा रही है।

    गौरतलब है कि फरवरी महीने में मीनाब स्थित एक प्राथमिक विद्यालय पर मिसाइल गिरने से भारी तबाही मच गई थी। इस हमले में बड़ी संख्या में छात्राओं की मौत हुई थी, जिनमें अधिकांश की आयु छह से तेरह वर्ष के बीच बताई गई थी। इस घटना ने न केवल ईरान बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी झकझोर कर रख दिया था। बच्चों को निशाना बनाने या उनकी मौत का कारण बनने वाली किसी भी सैन्य कार्रवाई को लेकर वैश्विक स्तर पर गंभीर सवाल उठाए गए थे।

    हमले के बाद विभिन्न देशों और मानवाधिकार संगठनों ने घटना की निष्पक्ष जांच की मांग की थी। अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मानना है कि यदि किसी सैन्य कार्रवाई के कारण निर्दोष नागरिकों की जान गई है, तो उसके लिए जिम्मेदार परिस्थितियों और निर्णय प्रक्रिया की पूरी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। इसी कारण यह मामला लगातार वैश्विक चर्चा का विषय बना हुआ है।

    घटना से जुड़े प्रारंभिक आकलनों और विभिन्न रिपोर्टों ने इस हमले की प्रकृति को लेकर कई सवाल खड़े किए थे। कुछ रिपोर्टों में सैन्य गतिविधियों और मिसाइल संचालन से जुड़े संभावित पहलुओं का उल्लेख किया गया, जिसके बाद जांच का दायरा और व्यापक कर दिया गया। अब सभी पक्ष अंतिम निष्कर्षों का इंतजार कर रहे हैं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि त्रासदी किन परिस्थितियों में हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार था।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं केवल सैन्य या राजनीतिक मुद्दा नहीं होतीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी अत्यंत गंभीर होती हैं। निर्दोष बच्चों की मौत ने वैश्विक स्तर पर युद्ध और संघर्षों के मानवीय प्रभावों को फिर से केंद्र में ला दिया है। ऐसे मामलों में पारदर्शी जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करना अंतरराष्ट्रीय विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है।

    फिलहाल पूरी दुनिया की नजर जांच एजेंसियों की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हुई है। माना जा रहा है कि जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद इस मामले की दिशा और इससे जुड़ी राजनीतिक तथा कूटनीतिक चर्चाओं को नया आयाम मिल सकता है।

  • अमेरिका-ईरान शांति समझौते से बाजार में लौटा भरोसा, सेंसेक्स 1200 अंक उछला, निफ्टी 24 हजार के करीब पहुंचा

    अमेरिका-ईरान शांति समझौते से बाजार में लौटा भरोसा, सेंसेक्स 1200 अंक उछला, निफ्टी 24 हजार के करीब पहुंचा

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की घोषणा का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों के साथ-साथ भारतीय शेयर बाजार पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार को घरेलू बाजारों ने मजबूत शुरुआत की और प्रमुख सूचकांकों सेंसेक्स तथा निफ्टी में डेढ़ प्रतिशत के आसपास की तेजी दर्ज की गई। पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव कम होने की संभावना ने निवेशकों के बीच सकारात्मक माहौल तैयार किया, जिसका लाभ भारतीय बाजार को भी मिला।

    कारोबार की शुरुआत से ही निवेशकों में खरीदारी का उत्साह देखने को मिला। बीएसई सेंसेक्स ने करीब 1,200 अंकों की मजबूती के साथ कारोबार शुरू किया, जबकि एनएसई निफ्टी भी लगभग 24 हजार अंकों के स्तर के करीब पहुंच गया। शुरुआती घंटों में दोनों प्रमुख सूचकांक मजबूत बढ़त के साथ हरे निशान में कारोबार करते रहे। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर जोखिम कम होने की धारणा ने निवेशकों को इक्विटी बाजारों की ओर आकर्षित किया है।

    विशेष रूप से व्यापक बाजार में भी मजबूती देखने को मिली। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में अच्छी खरीदारी दर्ज की गई, जिससे यह संकेत मिला कि तेजी केवल चुनिंदा बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही। निवेशकों ने विभिन्न क्षेत्रों में सक्रियता दिखाई और बाजार का समग्र रुझान सकारात्मक बना रहा।

    सेक्टरवार प्रदर्शन पर नजर डालें तो धातु, रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल और उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं से जुड़े शेयरों में उल्लेखनीय तेजी रही। वित्तीय सेवाओं, तेल एवं गैस तथा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयरों में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली। दूसरी ओर, फार्मा और हेल्थकेयर क्षेत्र में सीमित दबाव दर्ज किया गया, हालांकि इससे बाजार की कुल सकारात्मक धारणा पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा।

    बाजार में तेजी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की खबर रही। दोनों देशों के बीच शांति समझौते की दिशा में हुई प्रगति को वैश्विक निवेशकों ने सकारात्मक संकेत के रूप में लिया। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य के संचालन को लेकर बनी अनिश्चितता दूर होने से ऊर्जा आपूर्ति संबंधी चिंताएं भी कम हुई हैं। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और इसके सुचारु संचालन से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में स्थिरता आने की उम्मीद बढ़ी है।

    इस सकारात्मक घटनाक्रम का असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिखाई दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों में तेज गिरावट दर्ज की गई। तेल की कीमतों में कमी को भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है। इससे आयात बिल पर दबाव घट सकता है और महंगाई नियंत्रण में रखने के प्रयासों को भी समर्थन मिल सकता है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में शांति प्रक्रिया आगे बढ़ती है और ऊर्जा आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए परिस्थितियां और अधिक अनुकूल हो सकती हैं। कम तेल कीमतों का लाभ उद्योगों, परिवहन क्षेत्र और उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। साथ ही आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति से जुड़े अनुमानों में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है।

    फिलहाल बाजार की दिशा वैश्विक घटनाक्रमों पर निर्भर बनी हुई है, लेकिन सप्ताह की शुरुआत जिस मजबूती के साथ हुई है, उसने निवेशकों का विश्वास बढ़ाया है। आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान समझौते से जुड़े आगे के घटनाक्रम और वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिति निवेशकों की नजर में प्रमुख कारक बने रहेंगे।

  • तेल बाजार में लौटी स्थिरता, अमेरिका-ईरान समझौते के संकेत से कच्चा तेल टूटा, एशियाई और भारतीय शेयर बाजारों में जोरदार उछाल

    तेल बाजार में लौटी स्थिरता, अमेरिका-ईरान समझौते के संकेत से कच्चा तेल टूटा, एशियाई और भारतीय शेयर बाजारों में जोरदार उछाल

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती कूटनीतिक सहमति तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की घोषणा ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को बड़ी राहत दी है। इस घटनाक्रम के बाद सोमवार को अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों में सकारात्मक संकेत देखने को मिले। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता कम होने से आने वाले समय में ऊर्जा बाजारों में स्थिरता बढ़ सकती है।

    सप्ताह के पहले कारोबारी दिन अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार दबाव में दिखाई दिए। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब पांच प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई और यह 83 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड भी तेज गिरावट के साथ 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के करीब कारोबार करता दिखाई दिया। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि तेल की कीमतों में यह गिरावट मुख्य रूप से भू-राजनीतिक तनाव कम होने की उम्मीदों से प्रेरित रही।

    हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंकाओं के कारण कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखा गया था। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी रास्ते से विभिन्न देशों तक पहुंचता है। ऐसे में इसके संचालन को लेकर किसी भी प्रकार की अनिश्चितता का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ता है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति का संकेत दिए जाने के बाद निवेशकों के बीच भरोसा बढ़ा। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी अतिरिक्त प्रतिबंध के खोलने की घोषणा ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी चिंताओं को काफी हद तक कम कर दिया। बाजार ने इस खबर को सकारात्मक रूप से लिया और तेल की कीमतों में तत्काल प्रतिक्रिया देखने को मिली।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच प्रस्तावित समझौता औपचारिक रूप लेता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति और अधिक सुचारु हो सकती है। इससे न केवल ऊर्जा बाजारों को राहत मिलेगी बल्कि कई देशों में महंगाई के दबाव को भी कम करने में मदद मिल सकती है। तेल की कीमतें कम होने से परिवहन, विनिर्माण और अन्य ऊर्जा-आधारित क्षेत्रों की लागत पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है।

    इस घटनाक्रम का असर केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं रहा। एशिया के प्रमुख शेयर बाजारों में भी उत्साह का माहौल दिखाई दिया। जापान, हांगकांग, दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया सहित कई बाजारों में निवेशकों ने खरीदारी बढ़ाई, जिससे प्रमुख सूचकांकों में मजबूत बढ़त दर्ज की गई। निवेशकों को उम्मीद है कि वैश्विक आर्थिक गतिविधियों पर दबाव कम होगा और व्यापारिक माहौल अधिक अनुकूल बनेगा।

    भारतीय शेयर बाजारों में भी इसका सकारात्मक असर देखने को मिला। सप्ताह की शुरुआत में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों मजबूती के साथ खुले। विश्लेषकों के अनुसार भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट विशेष रूप से लाभकारी होती है क्योंकि इससे आयात लागत कम होती है और महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है।

    वैश्विक स्तर पर अब निवेशकों और नीति निर्माताओं की नजर अमेरिका और ईरान के बीच संभावित औपचारिक समझौते पर टिकी हुई है। यदि वार्ताएं सफल रहती हैं तो ऊर्जा बाजारों में स्थिरता और वैश्विक आर्थिक विश्वास को अतिरिक्त मजबूती मिलने की संभावना जताई जा रही है।

  • अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद कमोडिटी बाजार में जोरदार उछाल, सोना-चांदी की कीमतों ने छुए नए शिखर

    अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद कमोडिटी बाजार में जोरदार उछाल, सोना-चांदी की कीमतों ने छुए नए शिखर

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव में कमी आने और शांति समझौते की पुष्टि के बाद वैश्विक वित्तीय बाजारों में सकारात्मक माहौल देखने को मिला है। इस घटनाक्रम का असर भारतीय कमोडिटी बाजार पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जहां सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोना और चांदी की कीमतों में मजबूत तेजी दर्ज की गई। निवेशकों की बढ़ती सक्रियता और बाजार की बेहतर होती धारणा के बीच दोनों प्रमुख कीमती धातुओं ने शुरुआती कारोबार में उल्लेखनीय बढ़त हासिल की।

    कमोडिटी बाजार में कारोबारी गतिविधियों की शुरुआत के साथ ही सोने की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। बाजार खुलते ही सोना अपने पिछले बंद स्तर की तुलना में हजारों रुपये की बढ़त के साथ कारोबार करता दिखाई दिया। शुरुआती सत्र में कीमतें लगातार मजबूत बनी रहीं और दिन के उच्च स्तर तक पहुंच गईं। निवेशकों ने इसे वैश्विक परिस्थितियों में आए बदलाव और बाजार की स्थिरता की दिशा में सकारात्मक संकेत के रूप में देखा।

    चांदी के बाजार में भी इसी तरह का रुझान देखने को मिला। कारोबार शुरू होते ही चांदी की कीमतों में जोरदार तेजी आई और शुरुआती घंटों में ही यह तीन प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज करने में सफल रही। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि औद्योगिक मांग और निवेशकों की नई खरीदारी ने चांदी को अतिरिक्त समर्थन प्रदान किया है। इसके चलते चांदी ने महत्वपूर्ण स्तरों को पार करते हुए नई मजबूती के संकेत दिए हैं।

    विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की पुष्टि से वैश्विक निवेशकों में विश्वास बढ़ा है। लंबे समय से जारी भू-राजनीतिक अनिश्चितता कम होने से वित्तीय बाजारों में स्थिरता लौटने की उम्मीद जगी है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने की खबर को वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह समुद्री मार्ग अंतरराष्ट्रीय तेल और ऊर्जा व्यापार की दृष्टि से अत्यंत अहम माना जाता है।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार सोना फिलहाल एक महत्वपूर्ण तकनीकी स्तर के करीब कारोबार कर रहा है। यदि कीमतें मौजूदा प्रतिरोध क्षेत्र के ऊपर स्थिर रहने में सफल होती हैं तो निकट अवधि में इसमें और तेजी देखने को मिल सकती है। दूसरी ओर, प्रमुख समर्थन स्तरों के नीचे फिसलने पर कीमतों में सीमित गिरावट की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल बाजार का रुख सकारात्मक बना हुआ है और निवेशक आगे के वैश्विक घटनाक्रमों पर नजर बनाए हुए हैं।

    चांदी के संबंध में भी विशेषज्ञों का दृष्टिकोण उत्साहजनक बना हुआ है। प्रमुख प्रतिरोध स्तरों को पार करने की स्थिति में इसमें और मजबूती देखने को मिल सकती है। हालांकि बाजार विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा तेजी को बनाए रखने के लिए कीमतों का ऊंचे स्तरों पर टिके रहना आवश्यक होगा। यदि ऐसा होता है तो निवेशकों का भरोसा और मजबूत हो सकता है।

    वित्तीय बाजारों के जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में वैश्विक आर्थिक संकेतक, ऊर्जा बाजार की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रम सोना एवं चांदी की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। फिलहाल शांति समझौते से पैदा हुए सकारात्मक माहौल ने निवेशकों को राहत दी है और कीमती धातुओं के बाजार में नई ऊर्जा का संचार किया है।

  • पेट्रोल-डीजल और LPG होंगे सस्ते…. ! ट्रंप का दावा- US-ईरान के बीच हुई डील, होर्मुज खोलने पर बनी सहमति

    पेट्रोल-डीजल और LPG होंगे सस्ते…. ! ट्रंप का दावा- US-ईरान के बीच हुई डील, होर्मुज खोलने पर बनी सहमति


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया में कई महीनों से जारी तनाव के बीच एलपीजी (LPG), पेट्रोल-डीजल (Petrol Diesel) को लेकर राहत भरी खबर है। आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल (Petrol Diesel) और एलपीजी के दाम (LPG Price) में कटौती देखने को मिल सकती है। बड़ी खबर यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Pakistan’s Prime Minister Shehbaz Sharif) ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो गया है। इस समझौते के तहत होर्मुज स्ट्रेट को फिर से आवाजाही के लिए खोलने और सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति बनी है।


    भारत के लिए क्यों है अहम यह शांति समझौता?

    भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। होर्मुज स्ट्रेट से भारत के लिए बड़ी मात्रा में तेल और LPG की सप्लाई होती है। अगर यह समझौता सफल रहता है तो पेट्रोल-डीजल पर दबाव कम हो सकता है। LPG कीमतों में राहत की उम्मीद बढ़ सकती है। साथ ही महंगाई पर नियंत्रण में मदद मिलेगी।


    ऑयल मार्केट में बड़ी गिरावट

    शांति समझौते की खबर आते ही ब्रेंट क्रूड 3% से ज्यादा टूटकर 84 डॉलर प्रति बैरल के नीचे पहुंच गया। वहीं अमेरिकी WTI क्रूड भी 3.4% गिरकर 81.99 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज खुलने से ग्लोबल ऑयल सप्लाई सामान्य हो सकती है, जिससे ऊर्जा बाजार पर दबाव कम होगा।


    शेयर बाजार में लौटी रौनक

    इस खबर के बाद दुनिया भर के शेयर बाजारों में जोरदार तेजी आई, जबकि कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। S&P 500 फ्यूचर्स में 0.8% की तेजी आई और बिटकॉइन 2.1% उछलकर 65,341 डॉलर पर पहुंच गया जबकि, एथेरियम 3.1% बढ़कर 1,721 डॉलर पर। निवेशक अब मान रहे हैं कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से वैश्विक आर्थिक गतिविधियों को राहत मिलेगी।

    – रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्तावित समझौते में अमेरिका और ईरान एक-दूसरे पर हमला नहीं करेंगे।
    – होर्मुज स्ट्रेट में नाकाबंदी खत्म होगी।
    – ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नई बातचीत शुरू होगी।
    – ईरान के तेल निर्यात पर लगे कुछ प्रतिबंधों में राहत मिल सकती है।
    – लेबनान में सैन्य गतिविधियां रोकने पर भी सहमति बनी है।
    – समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर होने की संभावना बताई गई है।

    बता दें दिल्ली में पेट्रोल करीब ₹102 प्रति लीटर और डीजल ₹95 प्रति लीटर के आसपास बिक रहा है। जबकि, यहां आज भी 14.2 किलो वाले घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत ₹942 और 19 किलो वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमत ₹3,113.50 है। ईरान युद्ध के दौरान घरेलू एलपीजी सिलेंडर 89 रुपये महंगा हुआ है और कमर्शियल 1373 रुपये। पेट्रोल और डीजल चार बार में 7.50-7.50 रुपये महंगे हुए।

  • अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर बढ़ी वैश्विक नजरें, ट्रंप ने आज हस्ताक्षर का जताया भरोसा, तेहरान ने कहा- अंतिम सहमति में लग सकते हैं कुछ और दिन

    अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर बढ़ी वैश्विक नजरें, ट्रंप ने आज हस्ताक्षर का जताया भरोसा, तेहरान ने कहा- अंतिम सहमति में लग सकते हैं कुछ और दिन

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है और दोनों देशों के बीच प्रस्तावित शांति समझौता अब अंतिम चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है। हालांकि समझौते को लेकर दोनों पक्षों के सार्वजनिक बयानों में समयसीमा को लेकर अंतर देखने को मिला है। अमेरिका ने जहां रविवार को समझौते पर हस्ताक्षर होने की संभावना जताई है, वहीं ईरान ने संकेत दिया है कि दस्तावेज को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में अभी कुछ और समय लग सकता है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि समझौते पर हस्ताक्षर होते ही क्षेत्रीय समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को सभी जहाजों के लिए पूरी तरह खोल दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान वार्ता का स्वरूप पूर्व की सरकारों के दौरान हुई बातचीत से अलग है और दोनों देशों के बीच इस बार अधिक व्यावहारिक तथा संतुलित समझ विकसित हुई है।

    दूसरी ओर, ईरान ने समझौते की दिशा में हुई प्रगति को स्वीकार किया है, लेकिन तत्काल हस्ताक्षर की संभावना को लेकर सतर्क रुख अपनाया है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन समझौता रविवार को ही अंतिम रूप ले लेगा, यह कहना जल्दबाजी होगी। उनके अनुसार आने वाले दिनों में समझौता ज्ञापन को अंतिम रूप दिए जाने की पूरी संभावना है।

    ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी समझौते के स्वरूप और प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि प्रस्तावित दस्तावेज लगभग डेढ़ से दो पृष्ठों का है, जिसमें 14 प्रमुख बिंदुओं को शामिल किया गया है। इस दस्तावेज पर पिछले दो महीनों से अधिक समय से दोनों देशों के बीच गहन वार्ताएं चल रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समझौते के प्रत्येक प्रावधान की समीक्षा ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और सैन्य नेतृत्व द्वारा की गई है।

    प्रस्तावित समझौते के पहले चरण में क्षेत्रीय संघर्षों को समाप्त करने पर विशेष जोर दिया गया है। इसके तहत लेबनान सहित विभिन्न मोर्चों पर चल रहे संघर्षों के औपचारिक अंत की रूपरेखा तय की गई है। साथ ही दोनों पक्षों द्वारा भविष्य में किसी नए सैन्य टकराव की शुरुआत नहीं करने की प्रतिबद्धता भी शामिल है। इसके अतिरिक्त ईरानी बंदरगाहों पर लागू अमेरिकी नौसैनिक प्रतिबंधों को हटाने तथा ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को जारी करने के लिए एक ढांचा तैयार करने का प्रस्ताव रखा गया है।

    समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य के संचालन को लेकर भी विशेष व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। इसके तहत 60 दिनों की एक संक्रमणकालीन अवधि निर्धारित की जा सकती है, जिसके दौरान समुद्री यातायात और सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं को स्थिर किया जाएगा। यह कदम वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    दूसरे चरण में अगले 60 दिनों तक व्यापक वार्ताओं का दौर जारी रखने की योजना बनाई गई है। इन चर्चाओं का मुख्य उद्देश्य परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम संवर्धन और अन्य रणनीतिक मुद्दों पर स्थायी समाधान तलाशना होगा। साथ ही दोनों देशों के बीच लंबे समय से लंबित राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी प्रश्नों पर भी चर्चा की जाएगी।

    विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो इससे न केवल पश्चिम एशिया में तनाव कम होगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दोनों पक्ष अंतिम सहमति तक कब पहुंचते हैं और औपचारिक हस्ताक्षर की प्रक्रिया कब पूरी होती है।

  • इजरायल-ईरान से तुरंत हमले रोकने की अपील, ट्रंप बोले– “अब गोलीबारी बंद होनी चाहिए, बातचीत की मेज पर लौटें”

    इजरायल-ईरान से तुरंत हमले रोकने की अपील, ट्रंप बोले– “अब गोलीबारी बंद होनी चाहिए, बातचीत की मेज पर लौटें”

    नई दिल्ली । मध्य-पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल और ईरान से तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील की है। उन्होंने दोनों देशों से स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब “गोलीबारी बंद” कर देनी चाहिए और स्थिति को और आगे बढ़ाने के बजाय बातचीत के रास्ते पर लौटना चाहिए।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान और इजरायल के बीच मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद तनाव एक बार फिर तेज हो गया है। हाल ही में ईरान की ओर से इजरायल पर मिसाइल दागे जाने की खबर सामने आई, जिसके जवाब में इजरायल ने भी तेहरान के कई ठिकानों को निशाना बनाया। इन जवाबी कार्रवाइयों ने क्षेत्र में व्यापक संघर्ष की आशंका को और बढ़ा दिया है।

    ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए बेहद संक्षिप्त लेकिन सख्त संदेश जारी करते हुए दोनों देशों से संयम बरतने की अपील की। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को अपने-अपने हमले रोक देने चाहिए क्योंकि आगे टकराव बढ़ाने से केवल स्थिति और गंभीर होगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अब समय संघर्ष नहीं बल्कि कूटनीति का है।

    इससे पहले भी ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में ईरान से अपील करते हुए कहा था कि मिसाइल हमलों को रोककर उसे वार्ता की मेज पर लौटना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका और ईरान किसी समझौते के बेहद करीब थे, लेकिन हालिया घटनाओं ने उस प्रक्रिया को प्रभावित किया है। ट्रंप के अनुसार, अगर हालात शांत रहते तो आने वाले दिनों में समझौता संभव था।

    एक अन्य बयान में ट्रंप ने यह भी कहा कि वह इजरायल के प्रधानमंत्री से सीधे बात करेंगे और उनसे जवाबी कार्रवाई को रोकने का आग्रह करेंगे। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हमला कर दिया है और अब आगे की कार्रवाई से बचना चाहिए। उनका कहना था कि क्षेत्र को और अधिक अस्थिर होने से बचाने के लिए तत्काल कदम जरूरी हैं।

    इस बीच क्षेत्र में लगातार बढ़ते सैन्य टकराव ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। मिसाइल हमलों, ड्रोन स्ट्राइक और जवाबी कार्रवाइयों के कारण स्थिति तेजी से अस्थिर होती जा रही है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो यह संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय संकट का रूप ले सकता है।

    इजरायली रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की ओर से दिए गए बयान में कहा गया है कि यह स्थिति पहले के हमलों और गतिविधियों का परिणाम है, जिससे तनाव और अधिक गहरा गया है। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या कूटनीतिक प्रयासों के जरिए इस टकराव को रोका जा सकेगा या हालात और बिगड़ेंगे।

  • US: ट्रंप को बड़ा झटका…. संसद में ईरान युद्ध रोकने का प्रस्ताव मंजूर

    US: ट्रंप को बड़ा झटका…. संसद में ईरान युद्ध रोकने का प्रस्ताव मंजूर


    नई दिल्ली।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) को अपनी ही संसद (Parliament) में बड़े झटके का सामना करना पड़ा है. अमेरिकी संसद (American Parliament) के निचले सदन ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स’ ने ईरान के खिलाफ युद्ध रोकने के एक प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी है।

    डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व में लाए गए इस प्रस्ताव का मकसद बिना संसद (कांग्रेस) की अनुमति के ईरान के खिलाफ किसी भी तरह के युद्ध पर रोक लगाना था. इस दौरान वोटिंग से साफ हो गया है कि ईरान के साथ युद्ध की आशंका को लेकर अमेरिकी सांसदों में चिंता काफी बढ़ गई है. खास बात ये है कि राष्ट्रपति ट्रंप की अपनी पार्टी यानी रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों ने भी ईरान जंग पर पाला बदल लिया।


    7 वोटों से पास हुआ प्रस्ताव

    सदन में ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन’ पर कड़ा मुकाबला देखने को मिला. प्रस्ताव के पक्ष में 215 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में 208 सांसदों ने मतदान किया. हालांकि दोनों सदनों में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के पास मामूली बहुमत है, लेकिन इसके बावजूद ट्रंप इस प्रस्ताव को रोकने में नाकाम रहे. इस वोटिंग के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों ने अपनी ही पार्टी के रुख के खिलाफ जाकर डेमोक्रेट्स के पक्ष में वोट डाला. कांग्रेस में ट्रंप के लिए ये किसी बड़े झटके से कम नहीं है।


    अब ट्रंप के पास क्या विकल्प?

    संसद के जानकारों का कहना है कि ये वोटिंग फिलहाल काफी हद तक प्रतीकात्मक है. इस प्रस्ताव को कानूनी रूप से प्रभावी बनाने के लिए अभी इसे अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन ‘सीनेट’ से भी पास कराना होगा. इसके बाद, अगर ट्रंप इस प्रस्ताव पर वीटो लगा देते हैं, तो उस वीटो को बेअसर करने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी, जो कि बहुत मुश्किल है।

    हालांकि, ये फैसला काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि संसद में युद्ध के अधिकारों को सीमित करने वाले तीन प्रस्ताव पेश किए गए थे. लेकिन वो बेहद कम अंतर से नाकाम हो गए थे. इसके अलावा, पिछले महीने अमेरिकी सीनेट ने भी एक प्रक्रियात्मक वोटिंग के दौरान इसी तरह के एक प्रस्ताव को आगे बढ़ाया था. सीनेट में भी ये सात बार की नाकाम कोशिशों के बाद कामयाब हुई थी।