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  • अमेरिका में निचले सदन में दिसंबर तक फंडिंग वाला बिल पारित…. शटडाउन का संकट टला?

    अमेरिका में निचले सदन में दिसंबर तक फंडिंग वाला बिल पारित…. शटडाउन का संकट टला?


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी संसद (American Parliament) के निचले सदन प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स-House of Representatives) ने मंगलवार को एक अस्थायी विधेयक (Provisional Bill) पारित किया। इसका मकसद संघीय सरकार के कामकाज के लिए दिसंबर की शुरुआत तक धन उपलब्ध कराना है। यह कदम इसलिए उठाया गया है, ताकि सांसदों के दोबारा चुनाव के लिए प्रचार के दौरान सरकार का कामकाज बंद (शटडाउन-Shutdown) न हो।

    सांसदों के लिए सितंबर के आखिर में खत्म हो रहे वित्त वर्ष से पहले यह कदम उठाना जरूरी था। ऐसा नहीं करने पर सरकारी कामकाज के लिए पैसा खत्म हो सकता था। सांसद नहीं चाहते थे कि चुनाव प्रचार के दौरान सरकार के कामकाज को लेकर कोई संकट खड़ा हो। पिछले साल भी सरकार के कामकाज के लंबे समय तक बंद रहने से बड़ा संकट पैदा हुआ था।

    प्रतिनिधि सभा ने 370-48 वोट से विधेयक (Short-Term Funding Bill) पारित किया। सीनेट इसे पहले ही भारी बहुमत से मंजूर कर चुका है। अब यह विधेयक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास जाएगा। उनकी मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा।

    प्रतिनिधि सभा की विनियोग समिति के अध्यक्ष सांसद टॉम कोल ने कहा कि इससे देश और लोगों को यह भरोसा मिलेगा कि सरकार का कामकाज चलता रहेगा। उन्होंने कहा कि इससे यह भी तय रहेगा कि सेना के जवानों को उनका वेतन मिलता रहेगा।


    पिछले साल कितने लंबे शटडाउन हुए थे?

    पिछली शरद ऋतु में रिकॉर्ड 43 दिनों तक सरकारी कामकाज बंद रहा था। दोनों पार्टियों में उस टैक्स क्रेडिट को जारी रखने को लेकर सहमति नहीं बनी थी, जिसकी समय सीमा खत्म हो रही थी। यह टैक्स क्रेडिट अफोर्डेबल केयर एक्ट के तहत मिलने वाली स्वास्थ्य बीमा योजनाओं की लागत कम करता है।

    इसके बाद गृह सुरक्षा विभाग का कामकाज भी बंद हुआ था। यह शटडाउन 76 दिनों तक चला। बाद में सांसदों ने विभाग के बड़े हिस्से के लिए फंडिंग पर सहमति बना ली। हालांकि, आव्रजन कानून लागू करने से जुड़े कामों के लिए फंडिंग नहीं दी गई।


    सांसद इस बार क्या चाहते थे?

    सांसद नहीं चाहते थे कि चुनाव से पहले फिर ऐसी स्थिति बने। उन्होंने हाल के गतिरोध के लिए एक-दूसरे की पार्टी को जिम्मेदार ठहराया। प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष माइक जॉनसन ने वोटिंग से पहले पत्रकारों से कहा कि वे एक और डेमोक्रेटिक शटडाउन के खतरे से बचेंगे।

    वोटिंग के बाद जॉनसन ने कहा कि प्रतिनिधि सभा ने अपना काम कर दिया। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को शक था कि रिपब्लिकन बहुमत अपने अंदर के मतभेदों को दूर कर पाएगा या नहीं। इसके बावजूद समर्थन जुटाया गया। उन्होंने कहा कि वे जिम्मेदारी से काम कर रहे हैं और काम पूरा कर रहे हैं।


    डेमोक्रेट्स ने विधेयक का समर्थन क्यों किया?

    प्रतिनिधि सभा की विनियोग समिति में डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख सांसद रोजा डेलॉरो ने मंगलवार सुबह बंद कमरे में हुई बैठक में अपने साथी डेमोक्रेट सांसदों से बिल के पक्ष में वोट करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह विधेयक उस प्रस्ताव से काफी बेहतर है, जिसे इस साल की गर्मियों की शुरुआत में प्रतिनिधि सभा ने लगभग पार्टी लाइन के आधार पर पारित किया था।

    उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि विधेयक गृह सुरक्षा विभाग को बॉर्डर पेट्रोल के लिए पैसा ट्रांसफर करने से रोकता है। यह उस प्रस्तावित नियम को भी टालता है, जिसके तहत ट्रंप प्रशासन में राजनीतिक नियुक्ति पाने वाले अधिकारियों को उन संघीय अनुदानों को रोकने की ज्यादा ताकत मिल जाती, जिन्हें वे राष्ट्रपति के एजेंडे के मुताबिक नहीं मानते।

    ये बदलाव सीनेट ने अपने विधेयक के संस्करण को मंजूरी देते समय किए थे। डेमोक्रेट्स को चिंता है कि प्रशासन अनुदानों से जुड़े इस प्रस्तावित नियम का इस्तेमाल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाले राज्यों से पैसा दूर करने के लिए कर सकता है। डेलॉरो ने नियम को टालने को एक अहम पहला कदम बताया। हालांकि, उन्होंने कहा कि इस नीति को लागू होने से रोकने के लिए अभी और काम करना होगा।

    डेलॉरो ने कहा कि किसी समुदाय को आपदा राहत मिलेगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि उसने पिछले चुनाव में किसे वोट दिया था।


    विधेयक में कितने समय की फंडिंग है?

    यह अस्थायी विधेयक संघीय एजेंसियों को आम तौर पर मौजूदा स्तर पर 11 दिसंबर तक फंडिंग देगा। इससे सांसदों को पूरे साल के लिए फंडिंग वाले विधेयक पर सहमति बनाने के लिए और समय मिलेगा। हालांकि, इस पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बनना आसान नहीं होगा

    रिपब्लिकन सैन्य खर्च के लिए सैकड़ों अरब डॉलर की अतिरिक्त फंडिंग चाहते हैं। इसके साथ ही वे रक्षा से जुड़े नहीं ज्यादातर कार्यक्रमों के खर्च में कटौती करना चाहते हैं। डेमोक्रेट्स का कहना है कि वे इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकते। उनका जोर ऐसी द्विदलीय व्यवस्था पर है, जिसमें घरेलू कार्यक्रमों को भी रक्षा कार्यक्रमों के बराबर महत्व और फंडिंग मिले।

  • US वीजा पर बड़े एक्शन की तैयारी….. 2 लाख लोगों पर लटकी देश निकाला की तलवार!

    US वीजा पर बड़े एक्शन की तैयारी….. 2 लाख लोगों पर लटकी देश निकाला की तलवार!


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) का प्रशासन देश में शरण पाने के लिए आवेदन कर चुके या फिलहाल आवेदन की प्रक्रिया में शामिल दो लाख तक विदेशी नागरिकों के कारोबारी और पर्यटन वीजा (Tourist Visa) रद्द करने की तैयारी कर रहा है। यदि ऐसा होता है, तो यह अमेरिकी इतिहास (American History) में एक साथ इतनी बड़ी संख्या में वीजा रद्द किए जाने की सबसे बड़ी कार्रवाई होगी और इसे लेकर कानूनी चुनौतियां सामने आने की संभावना है।

    अमेरिकी विदेश विभाग के दस्तावेजों और दो अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, यदि इस फैसले को चुनौती नहीं दी गई या इसमें बदलाव नहीं किया गया, तो विदेश विभाग आने वाले हफ्तों में 2016 से 2026 के बीच जारी किए गए बी1 और बी2 वीजा रद्द करने की घोषणा कर सकता है। इसमें ऐसे वीजा धारक शामिल होंगे, जिन्होंने अमेरिका में शरण के लिए आवेदन किया है या वर्तमान में शरण मांग रहे हैं। यह कार्रवाई गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) के समन्वय से की जाएगी।


    क्या है बी1 और बी2 वीजा

    बी1 वीजा आम तौर पर कारोबारी यात्राओं के लिए जारी किए जाते हैं, जबकि बी2 वीजा पर्यटन, परिवार से मिलने या चिकित्सा उपचार के लिए जारी किए जाते हैं। विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने कहा, ‘हम डीएचएस के साथ समन्वय कर ऐसे विदेशी नागरिकों की पहचान करने और उनके गैर-आप्रवासी वीजा रद्द करने का काम कर रहे हैं, जो अमेरिका में अल्पकालिक आगंतुक के रूप में आए थे, लेकिन बाद में यहां स्थायी रूप से रहने के लिए शरण का आवेदन दाखिल कर देते हैं।’

    उन्होंने वीजा रद्द किए जाने की संभावित संख्या पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा, ‘चूंकि यह प्रक्रिया जारी रहेगी, इसलिए रद्द किए जाने वाले वीजा की संख्या लगातार बदलती रहेगी और यह कार्रवाई चरणबद्ध तरीके से की जाएगी।’


    क्या तुरंत देश से निकाल दिए जाएंगे 2 लाख लोग

    अधिकारियों ने कहा कि वीजा रद्द होने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि संबंधित लोगों को तुरंत अमेरिका से निर्वासित कर दिया जाएगा। अधिकारियों ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया कि फिलहाल जिन लोगों के शरण संबंधी मामले लंबित हैं, उनमें से अधिकांश की श्रेणी बदली जा सकती है, लेकिन वे कारोबारी या पर्यटन यात्री के रूप में अपना वीजा दर्जा खो देंगे।


    वीजा पर जारी हैं पाबंदियां

    राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पिछले साल दूसरी बार कार्यभार संभालने के बाद से उनके प्रशासन ने वीजा आवेदकों पर लगातार पाबंदियां कड़ी की हैं। इनमें आवेदकों से उनके सोशल मीडिया इतिहास के बारे में अधिक जानकारी मांगना, वीजा प्रक्रिया के लिए महंगे बॉन्ड जमा करने की अनिवार्यता और कुछ देशों के नागरिकों को वीजा जारी करने पर पूरी तरह रोक लगाना शामिल है।

    उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने सोमवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में ऐसे लोगों को निशाने पर लिया, जिनके बारे में उनका कहना था कि वे अमेरिका में प्रवेश करने के लिए पर्यटक और कारोबारी वीजा का इस्तेमाल करते हैं और फिर शरण के लिए आवेदन कर देते हैं।

    वर्तमान में बी1 और बी2 वीजा के लिए आवेदन करने वाले लोगों से यह पुष्टि करने को कहा जाता है कि वे अमेरिका में शरण के लिए आवेदन नहीं करेंगे। साथ ही, उन्हें यह भी साबित करना होता है कि वे अपने देश लौटने का इरादा रखते हैं।


    करीब 2 लाख हो चुके हैं रद्द

    पिछले 18 महीनों में विदेश विभाग करीब 1.75 लाख वीजा रद्द कर चुका है। इनमें ऐसे लोग शामिल हैं जिन्हें नशे में वाहन चलाने से लेकर दुष्कर्म और लूट जैसे अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है या जिन पर ऐसे अपराधों के आरोप हैं। इसके अलावा अमेरिका की नीतियों, खासकर पश्चिम एशिया से जुड़ी नीतियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बोलने वाले कुछ लोगों के वीजा भी रद्द किए गए हैं।

    ट्रंप प्रशासन ने गर्भवती महिलाओं द्वारा अमेरिका आकर यहां बच्चे को जन्म देकर उसे यहां की नागरिकता दिलाने के उद्देश्य वाले विदेशियों के ‘बर्थ टूरिज्म’ (जन्म पर्यटन) पर भी कार्रवाई तेज कर दी है।

  • ईरान के खिलाफ आर्थिक युद्ध छेड़ेगा अमेरिका…. अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंधों की दी चेतावनी!

    ईरान के खिलाफ आर्थिक युद्ध छेड़ेगा अमेरिका…. अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंधों की दी चेतावनी!


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच तनाव अब आर्थिक मोर्चे (Economic front) पर और गहराता दिख रहा है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट (US Treasury Secretary Scott Bessent) ने ईरान के खिलाफ इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका तेहरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश करेगा और ईरान की सरकार पर दबाव बढ़ाएगा। बेसेंट ने यह भी कहा कि अधिकतम आर्थिक दबाव का मतलब फिलहाल सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू करना नहीं है।


    अमेरिका ईरान पर क्या बड़ी कार्रवाई करने वाला है?

    बेसेंट के मुताबिक अमेरिका ऐसे कदम उठाएगा, जिससे ईरान की आर्थिक क्षमता और उसके सहयोगी सशस्त्र समूहों तक पहुंच सीमित हो सके। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ कारोबार जारी रखने वाले देशों पर भी अमेरिकी कार्रवाई हो सकती है। बेसेंट ने संकेत दिया कि सोमवार को होने वाली एक मीडिया बैठक में ईरान के खिलाफ उठाए जाने वाले कदमों की विस्तृत जानकारी दी जाएगी। यानी अमेरिका की नई रणनीति केवल प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं रह सकती है।

    चीन को अमेरिका ने क्यों दी चेतावनी?
    ईरान के साथ चीन के व्यापारिक संबंधों को लेकर भी अमेरिका ने दबाव बढ़ाया है। बेसेंट ने चीन से अमेरिकी कार्यक्रम के साथ आने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के प्रयासों में सहयोग करने को कहा। उन्होंने कहा कि चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से पूरा करता है। इसलिए होर्मुज का खुला रहना चीन के अपने हित में भी है। अमेरिका ने चीन पर संभावित कार्रवाई के सवाल पर साफ जवाब नहीं दिया, लेकिन कहा कि कुछ बातचीत निजी स्तर पर बेहतर होती है।


    ट्रंप ने ईरान पर क्या ऐलान किया था?

    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक दिन पहले ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई करने का ऐलान किया था। उन्होंने इसे अभूतपूर्व आर्थिक युद्ध और अलगाव की रणनीति बताया। ट्रंप ने ईरान के तेल तस्करी नेटवर्क, वित्तीय लेनदेन, मुद्रा विनिमय केंद्रों, जहाज पंजीकरण और फर्जी कंपनियों को निशाना बनाने की बात कही। उन्होंने सहयोगी देशों से भी ईरान को अलग-थलग करने में अमेरिका का साथ देने की अपील की।

    होर्मुज जलडमरूमध्य इस पूरे विवाद में क्यों अहम है?
    अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव में होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे अहम मुद्दों में से एक बन गया है। यह दुनिया के प्रमुख ऊर्जा मार्गों में शामिल है। ट्रंप का कहना है कि जलडमरूमध्य खुला है और अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी प्रभावी रही है। दूसरी ओर ईरान की ओर से इसे लेकर सख्त रुख सामने आया है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ पहले कह चुके हैं कि अमेरिका की ओर से अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी किए जाने तक तेहरान इसे फिर से खोलने पर सहमत नहीं होगा।


    ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों को क्या बताया?

    ईरान के विदेश मंत्रालय ने अमेरिका के नए प्रतिबंधों की कड़ी निंदा की है। ईरान ने इन्हें ‘आर्थिक आतंकवाद’ और मानवता के खिलाफ अपराध बताया है। तेहरान का आरोप है कि अमेरिका दशकों से ईरानी लोगों के खिलाफ शत्रुतापूर्ण नीति अपना रहा है। ईरान ने कहा कि आर्थिक प्रतिबंध और दबाव युद्ध और सैन्य हमले के ही दूसरे रूप हैं। साथ ही उसने साफ किया कि अमेरिकी दबाव के बावजूद वह अपनी सुरक्षा, स्वतंत्रता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करता रहेगा।


    क्या आर्थिक दबाव के बाद सैन्य कार्रवाई का खतरा टल गया?

    बेसेंट ने कहा है कि अधिकतम आर्थिक दबाव का मतलब संभवतः सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू करना नहीं है। इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल अमेरिका आर्थिक और वित्तीय दबाव को प्राथमिकता दे रहा है। हालांकि, ट्रंप ने ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देने की बात दोहराई है। ऐसे में सैन्य विकल्प को पूरी तरह खत्म माना नहीं जा सकता। होर्मुज में तनाव और ईरान की प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में स्थिति की दिशा तय कर सकती है।


    क्या अमेरिका-ईरान टकराव में चीन भी खिंच सकता है?

    फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच सीधा आर्थिक टकराव है, लेकिन चीन का मुद्दा इसे और बड़ा बना सकता है। चीन के ईरान के साथ व्यापारिक संबंध हैं और उसकी ऊर्जा जरूरतों का संबंध खाड़ी क्षेत्र से है। अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान पर दबाव बढ़ाने में सहयोग करे। वहीं ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों को स्वीकार करने के संकेत नहीं दे रहा है। ऐसे में अगर अमेरिका ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर भी कार्रवाई करता है तो वैश्विक व्यापार, ऊर्जा कीमतों और कूटनीतिक संबंधों पर इसका असर पड़ सकता है।

  • US: सरकारी मदद पाने वाले प्रवासियों के ग्रीन कार्ड आवेदन हो सकते हैं रद्द…. 18 सितंबर को लागू होंगे नए नियम

    US: सरकारी मदद पाने वाले प्रवासियों के ग्रीन कार्ड आवेदन हो सकते हैं रद्द…. 18 सितंबर को लागू होंगे नए नियम


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) में स्थायी नागरिकता यानी ग्रीन कार्ड (Green Card Applications) पाने की कोशिश कर रहे प्रवासियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। ट्रंप प्रशासन ने सार्वजनिक बोझ से जुड़े नियमों का दायरा बढ़ा दिया है। नए नियम के तहत सरकारी आर्थिक मदद लेने वाले कुछ प्रवासियों के ग्रीन कार्ड आवेदन (Green Card Applications) पर सवाल उठ सकते हैं और आवेदन खारिज भी किया जा सकता है। अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (U.S. Citizenship and Immigration Services) का यह नियम 18 सितंबर से लागू होगा। इसका असर अमेरिका में रहने वाले भारतीय प्रवासियों और उनके परिवारों पर भी पड़ सकता है।


    क्या सरकारी मदद लेने से ग्रीन कार्ड पर असर पड़ेगा?

    पहले सार्वजनिक बोझ का आकलन मुख्य रूप से दो तरह की सरकारी मदद के आधार पर किया जाता था। नए नियम में अधिकारियों को ज्यादा पहलुओं को देखने का अधिकार दिया गया है। अब आवेदक की उम्र, स्वास्थ्य, पारिवारिक स्थिति, आर्थिक हालत और शिक्षा को भी देखा जा सकेगा। इसके अलावा आवेदक पर निर्भर लोगों की ओर से ली गई कुछ सरकारी मदद को भी आवेदन पर फैसला करते समय ध्यान में रखा जा सकता है।


    भारतीयों पर कितना पड़ सकता है असर?
    वर्ष 2023 में 78,100 भारतीयों को अमेरिका का ग्रीन कार्ड मिला था। इनमें करीब 60 प्रतिशत भारतीयों ने परिवार के किसी सदस्य या अमेरिकी नागरिक रिश्तेदार के आधार पर ग्रीन कार्ड हासिल किया था। नए नियम के कारण ऐसे परिवारों में सरकारी सहायता लेने की स्थिति महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर परिवार का कोई सदस्य सरकारी सब्सिडी का इस्तेमाल करता है तो अधिकारी आवेदक की आयु, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति और पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखते हुए आवेदन पर फैसला कर सकते हैं।


    क्या अधिकारियों को आवेदन खारिज करने की ज्यादा ताकत मिलेगी?

    आव्रजन मामलों के जानकारों के अनुसार नए नियम से अधिकारियों के पास आवेदन को लेकर फैसला करने की गुंजाइश बढ़ जाएगी। यानी केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि आवेदक ने सरकारी मदद ली है या नहीं। अधिकारी उसकी पूरी परिस्थिति को देखकर यह आकलन कर सकते हैं कि वह भविष्य में सरकार पर आर्थिक रूप से निर्भर हो सकता है या नहीं। इससे ग्रीन कार्ड आवेदन की जांच पहले के मुकाबले ज्यादा सख्त हो सकती है।


    किन लोगों को नियम से छूट मिलेगी?

    नए नियम का असर सभी प्रवासियों पर एक जैसा नहीं होगा। शरणार्थियों, उत्पीड़न के पीड़ितों और कुछ विशेष श्रेणियों के आवेदकों को इससे छूट दी गई है। यानी इन लोगों के आवेदन पर सार्वजनिक बोझ से जुड़े नए नियम उसी तरह लागू नहीं होंगे। हालांकि सामान्य ग्रीन कार्ड आवेदकों के लिए उम्र, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति और परिवार की परिस्थितियां अब ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती हैं।


    18 सितंबर के बाद क्या बदलेगा?
    यह नया नियम 2022 में बाइडन प्रशासन के दौरान लागू किए गए नियम को रद्द करने के बाद आया है। 18 सितंबर से इसके लागू होने के बाद ग्रीन कार्ड आवेदन की जांच में सरकारी सहायता के साथ आवेदक की व्यक्तिगत और पारिवारिक स्थिति को भी ज्यादा महत्व दिया जाएगा। भारतीयों की बड़ी संख्या परिवार आधारित ग्रीन कार्ड के जरिए स्थायी नागरिकता हासिल करती है। ऐसे में नए नियम के बाद भारतीय आवेदकों को अपनी आर्थिक और पारिवारिक स्थिति को लेकर ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ सकती है।

  • भारत की तर्ज पर अमेरिका में भी SIR ….. वोटर लिस्ट की सफाई में जुटे ट्रंप, अब तक मिले 24 हजार फर्जी मतदाता

    भारत की तर्ज पर अमेरिका में भी SIR ….. वोटर लिस्ट की सफाई में जुटे ट्रंप, अब तक मिले 24 हजार फर्जी मतदाता


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में वोटर लिस्ट (Voter List) की शुद्धता को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने दावा किया है कि 2020 के वोटर रिकॉर्ड और नागरिकता संबंधी रिकॉर्ड के मिलान किया गया है. इस दावे के मुताबिक, 12.8 करोड़ मतदाताओं के शुरुआती विश्लेषण में 24 हजार से अधिक गैर-नागरिक मतदाताओं की पहचान हुई है।

    ट्रंप ने इसकी जानकारी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth पर पोस्ट की और कहा कि अब बचे हुए 3.2 करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड की भी जांच की जाएगी जिसके बाद यह आंकड़ा और बढ़ सकता है।

    ट्रंप ने लिखा, ‘पहले 12.8 करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच में यूएस सेंसस ब्यूरो ने साबित कर दिया है कि 24,000 से अधिक गैर-नागरिकों ने अवैध वोट डाले. अभी अगले 3.2 करोड़ मतदाताओं का विश्लेषण बाकी है और यह आंकड़ा और बढ़ेगा. मैं चुनाव जीता था! हमें हर हाल में ‘सेव अमेरिका एक्ट’ पास करना होगा.।

    व्हाइट हाउस द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, जिन गैर-नागरिकों के वोटर रिकॉर्ड मिले हैं उनमें मेक्सिको में जन्मे लोगों की संख्या सबसे अधिक (3,800) बताई गई है. इसके बाद कनाडा (950), फिलीपींस (900), जमैका (900), जर्मनी (700), ब्रिटेन (650), क्यूबा (450), वियतनाम (400), हैती (400) और दक्षिण कोरिया (350)का नंबर आता है. ट्रंप का दावा है कि है कि बाकी बचे 3.2 करोड़ वोटों के विश्लेषण के बाद यह संख्या और बढ़ सकती है।

    ट्रंप ने कहा कि यूएस सेंसस ब्यूरो 2020 के मतदाता रिकॉर्ड की नागरिकता संबंधी रिकॉर्ड के साथ जांच कर रहा है. उन्होंने इसे चुनावी पारदर्शिता से जोड़ते हुए दावा किया कि इससे 2020 के चुनाव को लेकर उनकी पुरानी आपत्तियां पुख्ता होती हैं. हालांकि, ट्रंप के इन दावों को लेकर भी सवार उठ रहे हैं।

    इस पूरे विवाद के बीच ट्रंप ने एक बार फिर ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को पारित करने की मांग दोहराई है. इस प्रस्तावित कानून के तहत संघीय चुनावों में मतदान के लिए नागरिकता का प्रमाण और फोटो पहचान पत्र अनिवार्य करने का प्रावधान है. साथ ही राज्यों को मतदाता सूचियों से गैर-नागरिकों के नाम हटाने की दिशा में भी कदम उठाने होंगे।

    भारत के चुनावी मॉडल की कर चुके हैं तारीफ
    दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने इस मुद्दे पर भारत के चुनावी मॉडल की भी सराहना की थी. उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ हुई बातचीत का जिक्र करते हुए कहा था कि भारत में 64.6 करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया और लगभग सभी मतदाताओं के पास वैध फोटो पहचान पत्र था. ट्रंप ने भारत की मतदाता पहचान प्रणाली को अमेरिका के लिए एक उदाहरण बताया।

    हालांकि, इस मुद्दे पर अमेरिका में राजनीतिक मतभेद भी सामने आए हैं. आलोचकों का कहना है कि बड़े पैमाने पर गैर-नागरिकों के मतदान के दावों के समर्थन में पर्याप्त सार्वजनिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, जबकि ट्रंप प्रशासन इसे चुनावी सुधारों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार मान रहा है।

  • US: ट्रंप के नए आदेश से बदल जाएगी बच्चों के टीकाकरण की व्यवस्था….

    US: ट्रंप के नए आदेश से बदल जाएगी बच्चों के टीकाकरण की व्यवस्था….


    वॉशिंगटन ।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) के नए कार्यकारी आदेश से बच्चों के टीकाकरण (Child Vaccination) की मौजूदा व्यवस्था में बड़ा बदलाव आने की संभावना है। आदेश में खसरा, गलसुआ और रूबेला यानी एमएमआर जैसे संयुक्त टीकों को अलग-अलग टीकों में बांटने और जहां संभव हो, टीकों के बीच ज्यादा अंतर रखने की बात कही गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक इसका असर सिर्फ टीका लगाने के तरीके पर नहीं पड़ेगा, बल्कि दवा कंपनियों, डॉक्टरों और माता-पिता पर भी पड़ेगा। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अमेरिका में इन बीमारियों के अलग-अलग टीके दशकों से व्यापक रूप से इस्तेमाल नहीं हुए हैं।

    ट्रंप के आदेश में आखिर क्या बदलने की बात कही गई?
    ट्रंप के आदेश के तहत संघीय अधिकारियों को 90 दिनों के भीतर एमएमआर टीके को अलग-अलग करने और दूसरे टीकों के बीच अंतर बढ़ाने की योजना तैयार करने को कहा गया है। अभी एमएमआर टीका तीनों बीमारियों से एक साथ बचाव करता है। अमेरिका में इस तीन-इन-वन व्यवस्था का इस्तेमाल 1970 के दशक से मानक रूप में हो रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि संयुक्त टीकों से बच्चों के स्कूल जाने की उम्र तक संक्रामक बीमारियों से पूरी तरह सुरक्षित होने की संभावना बढ़ती है।

    क्या कंपनियों को दशकों पुराने टीके फिर बनाने पड़ेंगे?
    अमेरिका में फिलहाल खसरा, गलसुआ और रूबेला के अलग-अलग टीके उपलब्ध नहीं हैं। इन तीनों बीमारियों के लिए खाद्य एवं औषधि प्रशासन से मंजूर टीके संयुक्त रूप में हैं। अगर उन्हें अलग किया जाता है तो दवा कंपनियों को पुराने व्यक्तिगत टीकों का उत्पादन फिर शुरू करना होगा। इसके लिए नए अध्ययन, उत्पादन सुविधाएं और संघीय मंजूरी की जरूरत पड़ सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक नई वैक्सीन फैक्टरी तैयार करने और उसे मंजूरी मिलने में करीब पांच साल तक लग सकते हैं। इसके अलावा कंपनियों को नए उत्पादन संयंत्रों पर करोड़ों डॉलर खर्च करने पड़ सकते हैं।


    क्या अलग-अलग टीकों को मंजूरी लेना भी मुश्किल होगा?

    अलग-अलग टीकों को तैयार करने के बाद उन्हें अलग-अलग मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। पूर्व एफडीए वैक्सीन प्रमुख जेसी गुडमैन के मुताबिक कंपनियों को यह दिखाने के लिए बड़े अध्ययन करने पड़ सकते हैं कि नए व्यक्तिगत टीके बच्चों में मौजूदा टीकों जैसी प्रतिरोधक क्षमता पैदा करते हैं। साथ ही उत्पादन की नई प्रक्रिया और संयंत्र की सुरक्षा भी साबित करनी होगी। अमेरिका में दशकों से व्यक्तिगत खसरा टीके का बड़े स्तर पर उत्पादन नहीं हुआ है। इसलिए यह प्रक्रिया सामान्य बदलाव की तुलना में काफी जटिल हो सकती है।

    माता-पिता को बच्चों को लेकर कितने ज्यादा चक्कर लगाने पड़ेंगे?
    एमएमआर टीका फिलहाल दो खुराक में दिया जाता है। पहली खुराक आम तौर पर एक साल की उम्र में और दूसरी चार साल की उम्र के बाद दी जाती है। अगर हर खुराक को खसरा, गलसुआ और रूबेला के तीन अलग-अलग टीकों में बांट दिया जाए तो छह अलग-अलग टीकाकरण यात्राएं करनी पड़ सकती हैं। दूसरे संक्रामक रोगों के टीकों के बीच भी अंतर बढ़ाया गया तो डॉक्टर के चक्कर और बढ़ सकते हैं। विशेषज्ञों को डर है कि ज्यादा समय और खर्च के कारण कुछ माता-पिता टीकाकरण के लिए अपॉइंटमेंट छोड़ सकते हैं।


    क्या इससे बच्चों का टीकाकरण कम हो सकता?

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि टीकाकरण की प्रक्रिया जितनी लंबी और महंगी होगी, उतने ही ज्यादा लोगों के बीच इसे पूरा कराना मुश्किल हो सकता है। विशेषज्ञ एना डर्बिन ने कहा कि संयुक्त टीकों को अलग करने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और इससे व्यवस्था कम सुविधाजनक और महंगी हो सकती है। इसके विपरीत ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस बदलाव से माता-पिता को बच्चों के टीकाकरण के समय और अंतर को लेकर ज्यादा विकल्प मिलेंगे और इससे तीनों बीमारियों के खिलाफ टीकाकरण दर बढ़ सकती है।


    क्या ट्रंप का यह आदेश कंपनियों को टीके बनाने के लिए मजबूर कर सकता?

    आदेश के बावजूद दवा कंपनियों को नए व्यक्तिगत टीके बनाने और मंजूरी के लिए आवेदन करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कंपनियों के लिए भी अलग टीके बनाना कारोबारी रूप से आकर्षक नहीं हो सकता, क्योंकि वे पहले से संयुक्त टीके बेच रही हैं। मर्क और जीएसके ने अपने मौजूदा टीकों की सुरक्षा और प्रभावशीलता पर भरोसा जताया है। मर्क ने कहा है कि अब तक ऐसा कोई प्रकाशित वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, जो एमएमआर टीके को तीन अलग-अलग टीकों में बांटने से कोई फायदा दिखाता हो।


    क्या यह आदेश तुरंत लागू हो जाएगा?

    ट्रंप के आदेश के बावजूद बदलाव तुरंत लागू होना तय नहीं है। संघीय अधिकारियों को पहले योजनाएं तैयार करनी होंगी और फिर अलग-अलग टीकों के विकास, उत्पादन और मंजूरी की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। विशेषज्ञों ने भी इसकी कानूनी और व्यावहारिक प्रभावशीलता पर सवाल उठाए हैं। व्हाइट हाउस और एफडीए दवा कंपनियों को नए टीके विकसित करने के लिए सीधे मजबूर नहीं कर सकते। ऐसे में ट्रंप प्रशासन के आदेश और वास्तविक टीकाकरण व्यवस्था में बदलाव के बीच लंबी प्रक्रिया हो सकती है। यही वजह है कि आने वाले समय में इस योजना को लेकर वैज्ञानिक, कारोबारी और कानूनी स्तर पर बहस तेज होने की संभावना है।

  • US: ट्रंप प्रशासन का भारतीयों पर एक और प्रहार…. F-1 छात्र वीजा में की भारी कटौती

    US: ट्रंप प्रशासन का भारतीयों पर एक और प्रहार…. F-1 छात्र वीजा में की भारी कटौती


    वाशिंगटन।
    ट्रंप प्रशासन (Trump Administration) ने बीते साल भारतीय और चीनी छात्रों को जारी किए जाने वाले एफ-1 छात्र वीजा (F-1 Student Visa) में भारी कटौती की है। सेंटर फॉर इमिग्रेशन स्टडीज (Center for Immigration Studies) की रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में 2025 में भारतीय और चीनी नागरिकों को जारी किए छात्र वीजा की संख्या में पिछले वर्षों की तुलना में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।

    2024-25 शैक्षणिक सत्र में अमेरिका के उच्च शिक्षण संस्थानों में 11,77,766 विदेशी छात्र पढ़ रहे थे। इनमें भारत के 3,63,019 और चीन के 2,65,919 छात्र शामिल थे। दोनों देशों के छात्र मिलाकर कुल विदेशी छात्रों का 53 प्रतिशत हिस्सा थे।


    अमेरिका में ओपीटी योजना भी प्रभावित

    डिग्री पूरी करने के बाद ओपीटी कार्यक्रम के तहत विदेशी छात्रों को अमेरिका में काम करने की अनुमति मिलती है। वीजा कटौती से ये योजना भी प्रभावित हुई। आईआईई के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में 2,94,253 विदेशी छात्र ओपीटी के तहत काम कर रहे थे। इनमें भारत के 1,43,740 और चीन के 61,981 छात्र शामिल थे। 2024 में ओपीटी के तहत काम करने वाले 1,65,524 विदेशी छात्रों में से 68 प्रतिशत भारत और चीन के नागरिक थे। इनमें 79,331 भारतीय और 33,807 चीनी छात्र शामिल थे।

    सीआईएस का कहना है कि यदि भारत और चीन से आने वाले छात्रों की संख्या घटती है तो ओपीटी के माध्यम से अमेरिकी श्रम बाजार में आने वाले विदेशी पेशेवरों की संख्या भी प्रभावित हो सकती है।


    22 हजार भारतीयों को बीते वर्ष जारी हुआ वीजा

    रिपोर्ट की मानें तो बीते साल मई से अगस्त के बीच 22149 भारतीयों को एफ-1 छात्र वीजा जारी किए गए। साल 2024 में इसी अवधि के दौरान अमेरिकी प्रशासन द्वारा 58,694 वीजा जारी किए गए थे, यानी 62 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी। चीनी छात्रों की बात करें तो मई-अगस्त 2025 के दौरान चीनी छात्रों को 40,034 वीजा जारी किए गए। 2024 में ये संख्या 61,075 वीजा जारी हुए थे। इसमें 34 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।


    OPT पर बड़े प्रस्ताव की तैयारी

    खबर है कि अगर अब अगर कोई छात्र ग्रेजुएशन के बाद अमेरिका में ही रहकर काम करना चाहता है, तो उसे 1 लाख डॉलर की मोटी फीस सरकार को देनी होगी। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। वॉल स्ट्रीट जनरल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षा के बाद काम की फीस के अलावा नए वीजा नियम भी जारी किए गए हैं। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय छात्र पढ़ाई के बाद लंबे समय तक अमेरिका में नहीं रह सकेंगे। हालांकि, इस पर अब तक अंतिम मुहर नहीं लगाई गई है।

    OPT का मतलब एक अस्थायी नौकरी से है, जो F-1 वीजा पर अमेरिका पहुंचे छात्र के पढ़ाई के क्षेत्र से जुड़ी होती है। पात्र छात्र 12 महीने का ओपीटी काम हासिल कर सकते हैं।

    मौजूदा व्यवस्था है कि जब तक पढ़ाई चल रही है और वीजा के नियमों का पालन किया जा रहा है, तब तक छात्र अमेरिका में रह सकता है। अगर उसकी पढ़ाई लंबी चलती है, तो समय को नियमों का पालन कर बढ़ाया जाता है। अब यह व्यवस्था खत्म होने जा रही है।

  • US : ट्रंप का शवोन के CEO पर तीखा हमला….. तेल कंपनी से की पेट्रोल-डीजल के रेट घटाने की मांग

    US : ट्रंप का शवोन के CEO पर तीखा हमला….. तेल कंपनी से की पेट्रोल-डीजल के रेट घटाने की मांग


    वॉशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने तेल कंपनी शवोन (Oil company Chevron) के चेयरमैन और सीईओ माइक वर्थ (Mike Wirth) पर तीखा हमला बोला है। ट्रंप ने आरोप लगाया कि वर्थ ने कंपनी की सफलता का श्रेय अपनी नीतियों को दिया, लेकिन यह भूल गए कि उनकी सरकार की नीतियों के बिना अमेरिकी तेल उद्योग और देश दोनों मुश्किल में पड़ जाते। साथ ही उन्होंने तेल कंपनियों से उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें तुरंत कम करने की मांग भी की।


    ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर क्या कहा?

    ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि माइक वर्थ ने एक इंटरव्यू में शवोन की सफलता के कई कारण गिनाए, लेकिन उन्होंने ट्रंप प्रशासन की भूमिका का जिक्र नहीं किया। ट्रंप ने दावा किया कि उनकी सरकार की दूरदर्शिता, मजबूती और स्थिर नीतियों की वजह से ही अमेरिकी तेल उद्योग आज मजबूत स्थिति में है। उन्होंने कहा कि अगर उनकी सरकार नहीं होती, तो तेल उद्योग लगभग खत्म हो चुका होता।


    वेनेजुएला का भी किया जिक्र

    ट्रंप ने कहा कि उनके कार्यकाल में वेनेजुएला पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने अमेरिकी रणनीति को मजबूती दी। उनके मुताबिक, शवोन को पहले वेनेजुएला से बाहर होना पड़ा था, लेकिन अब कंपनी पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में वहां लौट रही है और बड़ा मुनाफा कमाने की उम्मीद कर रही है।


    तेल कंपनियों को दी सीधी चेतावनी

    ट्रंप ने सिर्फ शवोन ही नहीं, बल्कि अन्य तेल कंपनियों को भी खुदरा ईंधन कीमतें तुरंत कम करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आम उपभोक्ताओं को राहत मिलनी चाहिए और कंपनियों को पेट्रोल-डीजल के दाम घटाने चाहिए।


    शवोन CEO ने क्या कहा था?

    इससे पहले शवोन के सीईओ माइक वर्थ ने फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ईरान से जुड़े युद्ध और पश्चिम एशिया के तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार अब भी अस्थिर बना हुआ है। उन्होंने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर में जारी संकट के कारण तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है। दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है, जबकि लाल सागर में जारी व्यवधान के कारण भी वैश्विक आपूर्ति पर असर पड़ा है।


    ईंधन कीमतों पर बढ़ा दबाव

    रिपोर्टों के अनुसार, ईरान से जुड़े संघर्ष के बाद अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। अमेरिकी ऑटोमोबाइल एसोसिएशन (AAA) के आंकड़ों के मुताबिक, देश में पेट्रोल की औसत कीमत 4.10 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है, जो संघर्ष शुरू होने के समय की तुलना में एक डॉलर से अधिक ज्यादा है।


    ट्रंप पर भी बढ़ रहा राजनीतिक दबाव

    ईंधन की बढ़ती कीमतों और महंगाई को लेकर ट्रंप विपक्ष के निशाने पर हैं। अमेरिका में होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले बढ़ती लागत उनके लिए राजनीतिक चुनौती बनती दिख रही है। हालांकि ट्रंप का दावा है कि यदि ईरान के साथ संघर्ष समाप्त हो जाता है, तो ईंधन की कीमतें तेजी से नीचे आएंगी। वहीं, कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि युद्ध के आर्थिक प्रभाव लंबे समय तक बने रह सकते हैं और कीमतों में तत्काल बड़ी गिरावट की संभावना सीमित है।

  • US में विदेशी छात्रों को बड़ा झटका देने की तैयारी…. पढ़ाई के बाद नौकरी के लिए देनी पड़ेगी 83 लाख की फीस!

    US में विदेशी छात्रों को बड़ा झटका देने की तैयारी…. पढ़ाई के बाद नौकरी के लिए देनी पड़ेगी 83 लाख की फीस!


    वाशिंगटन।
    ट्रंप सरकार (Trump Government) अमेरिका (America) में उच्च शिक्षा लेने वाले विदेशी छात्रों को बड़ा झटका देने की तैयारी में है. इसके तहत अमेरिकी यूनिवर्सिटी (American University) से पढ़ाई पूरी करने के बाद विदेशी छात्रों को काम करने के लिए 1 लाख डॉलर (लगभग 83 लाख रुपये) की फीस देनी पड़ सकती है।

    अमेरिकी सरकार ये फीस ‘ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग’ (OPT) प्रोग्राम पर लागू करेगी. ये व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अपने स्टूडेंट वीजा पर ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद एक से तीन साल तक अमेरिका में काम करने की परमिशन देती है।

    साल 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 4,19,000 विदेशी छात्र इस प्रोग्राम के तहत अमेरिका में काम कर रहे थे. सूत्रों की मानें तो अगर ये नियम लागू होता है, तो अमेरिका जाकर पढ़ाई करने का विदेशी छात्रों का रुझान काफी कम हो सकता है।

    इस कदम को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लीगल इमिग्रेशन को सीमित करने के फैसले के तहत भी देखा जा रहा है. इस फैसले से अमेरिकी विश्वविद्यालयों की वित्तीय स्थिति पर बुरा असर पड़ सकता है, जो विदेशी छात्रों की फीस पर काफी हद तक निर्भर हैं. इसके अलावा सिलिकॉन वैली और वॉल स्ट्रीट की दिग्गज तकनीकी और वित्तीय कंपनियों को भी तकनीकी पदों पर टैलेंट्स हायर करने में भारी मशक्कत करनी पड़ेगी।

    इससे पहले ट्रंप सरकार ने H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर की लेवी लगाने की कोशिश की थी. हालांकि, बोस्टन की एक अदालत ने पिछले सप्ताह ही सरकार को H-1B फीस वसूलने से रोक दिया था. अब माना जा रहा है कि OPT पर ये भारी फीस लगाकर सरकार अपने उसी मकसद को हासिल करना चाहती है।

    हालांकि, होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (DHS) में अभी इस पर चर्चा जारी है. व्हाइट हाउस इसे अंतिम मंजूरी देगा या नहीं, ये फैसला होना अभी बाकी है. साथ ही ये भी तय नहीं हुआ है कि ये फीस छात्र खुद भरेंगे या उन्हें नौकरी देने वाली कंपनियां।

  • US: चीनी रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर्स से देश की सुरक्षा पर खतरा…! ट्रंप सरकार ने किए बैन

    US: चीनी रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर्स से देश की सुरक्षा पर खतरा…! ट्रंप सरकार ने किए बैन


    वाशिंगटन।
    रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर्स (Robotic Vacuum Cleaners) इनोवेशन और इंजीनियरिंग (Innovation and Engineering) का शानदार नमूने की तरह हैं. लेकिन रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर्स सुरक्षा के लिहाज से कई बार खतरनाक साबित हो सकते हैं. अमेरिका (America) में अब रोबोट वैक्यूम क्लीनर को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है. अमेरिकी सरकार ने नए नियम लागू किए हैं, जिनकी वजह से चीन समेत दूसरे देशों में बने कई नए रोबोट वैक्यूम क्लीनर अमेरिकी बाजार में नहीं आ पाएंगे. इस फैसले के पीछे वजह नैशनल सिक्योरिटी बताई गई है।

    यह फैसला अमेरिकी फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) ने लिया है. पहले माना जा रहा था कि यह नियम सिर्फ ह्यूमनॉइड रोबोट और रोबोट डॉग पर लागू होगा, लेकिन बाद में साफ किया गया कि इसमें ऐसे रोबोट वैक्यूम क्लीनर भी शामिल हैं जो सेंसर, कैमरा, वायरलेस कनेक्टिविटी और सॉफ्टवेयर की मदद से अपने आसपास का नक्शा बनाकर काम करते हैं।


    रोबोट वैक्यूम से डर क्यों?

    आज के रोबोट वैक्यूम सिर्फ फर्श साफ नहीं करते. इनमें कैमरा, LiDAR सेंसर, Wi-Fi और कई स्मार्ट फीचर होते हैं. ये घर का नक्शा तैयार करते हैं और मोबाइल ऐप से कंट्रोल किए जाते हैं. यही नहीं, रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर्स आपके घर का पूरा खाका तैयार करते हैं ताकि बेहतर तरीके से सफाई की जा सके. लेकिन इससे ये भी सवाल उठता है कि अगर लोगों के घरों के मैप्स गलती से किसी साइबर क्रिमिनल्स या स्टेट स्पॉन्सर्ड स्पाई एजेंसी को मिल जाए तो किसी मुल्क के लिए काफी खतरनाक हो सकता है.

    रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर में सेंसर्स के साथ कैमरे भी लगे होते हैं. यानी घर का कोना कोना इनकी जद में होता है और बाकायदा रिकॉर्डिंग भी की जाती है. पूरे घर का वीडियो बनता है. घर में कौन रह रहा है कितने लोग हैं और क्या कर रहे हैं सबकुछ रिकॉर्ड हो सकता है. हालांकि बड़ी रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर्स कंपनियां प्राइवेसी को लेकर बड़े दावे करती हैं. जैसे – यूजर डेटा एन्क्रिप्टेड होता है और इसका मिसयूज किसी भी हालत में नहीं किया जा सकता है।

    बहरहाल, अमेरिकी सरकार का कहना है कि ऐसे डिवाइस बड़ी मात्रा में डेटा इकट्ठा करते हैं. अगर यह डेटा गलत हाथों में चला जाए तो सुरक्षा से जुड़ी चिंता पैदा हो सकती है. इसी वजह से यह कदम उठाया गया है।


    किन कंपनियों पर पड़ सकता है असर?

    रोबोट वैक्यूम बाजार में चीन की कंपनियों का दबदबा है. Roborock, Ecovacs, Xiaomi, Narwal और Dreame जैसे ब्रांड दुनिया के कई देशों में अपने प्रोडक्ट बेचते हैं. नए नियमों का सबसे ज्यादा असर इन्हीं कंपनियों पर पड़ सकता है।


    क्या पुराने रोबोट वैक्यूम बंद हो जाएंगे?

    नहीं. अगर आपने पहले से कोई रोबोट वैक्यूम खरीदा हुआ है तो उसे इस्तेमाल करने पर कोई रोक नहीं है. यह नियम सिर्फ नए मॉडल और फ्यूचर में होने वाले नए आयात पर लागू होगा. यानी पहले से बिक चुके या मंजूरी पा चुके डिवाइस फिलहाल प्रभावित नहीं होंगे।


    क्या सिर्फ रोबोट वैक्यूम पर ही असर होगा?

    नहीं. यह फैसला सिर्फ रोबोट वैक्यूम तक लिमिटेड नहीं है. कुछ दूसरे एडवांस मोबाइल रोबोट भी इस दायरे में आते हैं. हालांकि ड्रोन, मेडिकल रोबोट, कनेक्टेड वाहन और कई दूसरे रोबोट इस नियम से बाहर रखे गए हैं.


    चीन ने क्या कहा?

    अमेरिका के इस फैसले के बाद चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. चीन का कहना है कि नैशनल सिक्योरिटी का हवाला देकर चीनी कंपनियों को निशाना बनाया जा रहा है. उसने चेतावनी दी है कि अगर यह नीति जारी रही तो जवाबी कदम उठाए जा सकते हैं.


    भारत के यूजर्स पर क्या असर पड़ेगा?

    फिलहाल इस फैसले का भारत में सीधे तौर पर कोई असर नहीं पड़ेगा. भारत में Roborock, Dreame, Ecovacs, Xiaomi और दूसरे ब्रांड अपने प्रोडक्ट बेचते रहेंगे. हालांकि अगर अमेरिका में इन कंपनियों की बिक्री प्रभावित होती है, तो फ्यूचर में में उनकी ग्लोबल स्ट्रैटिजी, कीमतों या नए प्रोडक्ट लॉन्च पर कुछ असर देखने को मिल सकता है।