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  • भारत का बड़ा एनर्जी सप्लायर बनकर उभर रहा अमेरिका… LPG निर्यात करने वाला सबसे बड़ा देश बना

    भारत का बड़ा एनर्जी सप्लायर बनकर उभर रहा अमेरिका… LPG निर्यात करने वाला सबसे बड़ा देश बना


    नई दिल्ली।
    भारत और अमेरिका (India and America) के रिश्ते पिछले एक साल में और मजबूत हुए हैं. खास तौर पर ऊर्जा के क्षेत्र (Energy sectors) में दोनों देशों के बीच कारोबार बढ़ा है. अमेरिका (America) अब भारत को LPG सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा देश बन गया है. अमेरिकी विदेश विभाग की वरिष्ठ अधिकारी बेथनी मॉरिसन ने यह जानकारी दी है।

    न्यूयॉर्क फॉरेन प्रेस सेंटर में एक कार्यक्रम के दौरान मॉरिसन ने भारत-अमेरिका संबंधों पर बात की. उन्होंने कहा कि पिछले एक साल में दोनों देशों के बीच साझेदारी का दायरा काफी बढ़ा है. अब भारत और अमेरिका ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और कूटनीति समेत कई क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं.

    मॉरिसन ने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अलग-अलग देशों और स्रोतों से सप्लाई बढ़ा रहा है. ऐसे में अमेरिका भी भारत का एक बड़ा एनर्जी सप्लायर बनकर उभरा है. उन्होंने कहा, ‘हमें गर्व है कि अमेरिका अब भारत को LPG निर्यात करने वाला सबसे बड़ा देश है. भारत जब अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला रहा है तो हमें खुशी है कि अमेरिका भी उसका सप्लायर बन रहा है।


    अमेरिका में नॉर ईस्टर तूफान का कहर, 400 से ज्यादा फ्लाइट्स कैंसिल

    मॉरिसन ने भारत और अमेरिका के बीच हुए 10 साल के डिफेंस फ्रेमवर्क एग्रीमेंट का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि रक्षा के साथ-साथ परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी दोनों देश आगे बढ़ रहे हैं. उन्होंने कहा कि भारत ने करीब 20 साल बाद अपने परमाणु क्षेत्र से जुड़े नियमों में बदलाव करते हुए SHANTI Act पारित किया है. इससे भारत और अमेरिका के बीच असैन्य परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ने की उम्मीद है।

    अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच सहयोग सिर्फ ऊर्जा और रक्षा तक सीमित नहीं है. दोनों देशों के बीच बड़े व्यापारिक समझौते भी हो रहे हैं. इसके अलावा क्वाड जैसे मंचों पर भी दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं. मॉरिसन ने कहा कि ट्रंप प्रशासन के लिए पूरा दक्षिण एशिया महत्वपूर्ण है. उनके मुताबिक, पहले दुनिया के दूसरे हिस्सों में होने वाली घटनाओं के कारण दक्षिण एशिया पर अक्सर तभी ज्यादा ध्यान दिया जाता था, जब यहां कोई संकट पैदा होता था।

    उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन दक्षिण एशिया को दुनिया का एक बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र मानता है और अब अमेरिका इस क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।

  • भारत-अमेरिका के बीच निर्णायक मोड़ पर पहुंची ट्रेड डील, 90 फीसदी से ज्यादा काम पूरा

    भारत-अमेरिका के बीच निर्णायक मोड़ पर पहुंची ट्रेड डील, 90 फीसदी से ज्यादा काम पूरा


    नई दिल्‍ली।
    भारत और अमेरिका (India and America) के संबंधों में सालो से व्‍यापार सबसे बड़ा अड़चन बना हुआ था, लेकिन अब दोनों देश एक निर्णायक मोड़ क करीब दिख रहे हैं. अमेरिकी विदेश विभाग के सीनियर अधिकारी ने कहा है कि प्रस्‍ताव‍ित समझौता 90 फीसदी (Agreement 90% Complete) से ज्‍यादा पूरा हो चुका है, बस मसले बचे हुए हैं.।

    अधिकारी ने कहा कि यह डील दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को एक नए स्तर पर ले जा सकता है। इस सवाल- कब डील पर साइन हो सकता है, के जवाब में अधिकार ने कहा कि मैं यही कहूंगा कि देखते रहिए, जैसा कि हम बार-बार कहते हैं, 90 फीसदी काम पूरा हो चुका है और बस कुछ आखिरी चीजें तय की जा रही हैं. इस कारण मुझे उम्‍मीद है कि आपको इस बारे में बहुत जल्‍द कुछ जानकारी मिलेगी.।

    अधिकारी ने आगे कहा कि यह समझौता द्विपक्षीय संबंधों को एक नए स्तर पर ले जाएगा. अधिकारी ने यह भी कहा कि और इससे वास्तव में अमेरिका-भारत संबंधों में एक नया आयाम जुड़ेगा, जो व्यापार के मामले में दशकों से हमारे लिए संभव नहीं हो पाया है. यह हमेशा से ही संबंधों में सबसे बड़ी बाधा रही है।


    पीयूष गोयल ने कहा- बस ये काम बाकी

    इससे पहले कमर्शियल और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी संकेत दिया था कि बातचीत लगभग पूरी होने वाली है. गुरुवार को नई दिल्ली में पब्लिक अफेयर्स फोरम ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने नौ मुक्त व्यापार समझौतों को अंतिम रूप दे दिया है, जिनमें अमेरिका के साथ समझौता लगभग पूरा हो चुका है. उन्होंने आगे कहा कि हमें बस अपने लिए सही लाभ खोजना है ताकि हम समझौते को जल्‍द से लागू कर सकें।

    भारत और अमेरिका ने फरवरी में द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण के ढांचे का ऐलान किया था. हालांकि, अमेरिकी टैरिफ में बदलाव के कारण आगे की बातचीत की आवश्यकता पड़ी. गोयल ने कहा कि भारत के व्यापार समझौते वैश्विक जीडीपी के लगभग 75 प्रतिशत हिस्से वाले बाजारों तक तरजीही पहुंच प्रदान करेंगे।


    पीएम मोदी दिसंबर में अमेरिकी यात्रा पर

    अमेरिकी अधिकरी ने संबंधों में चल रही व्‍यस्‍तता की ओर भी इशारा किया. विदेश मंत्री मार्को रुबियो अक्‍टूबर में भारी दौरे पर आने वाले हैं, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिसंबर में फ्लोरिडा में होने वाले G20 शिखर सम्‍मेलन के लिए अमेरिका की यात्रा करेंगे. अधिकारी ने कहा कि संबंधों में बहुत कुछ चल रहा है. अधिकारी ने कहा कि क्वाड देशों के विदेश मंत्री इस साल तीसरी बार मिलने वाले हैं।

  • ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका जा रहे F-35 के संवेदनशील पुर्जे हॉन्गकॉन्ग कैसे पहुंचे? चीन तक पहुंचने की आशंका से बढ़ी चिंता

    ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका जा रहे F-35 के संवेदनशील पुर्जे हॉन्गकॉन्ग कैसे पहुंचे? चीन तक पहुंचने की आशंका से बढ़ी चिंता


    सिडनी।
    पांचवीं पीढ़ी के अमेरिकी स्टील्थ लड़ाकू विमान F-35 लाइटनिंग II के बेहद संवेदनशील स्पेयर पार्ट्स की एक खेप ऑस्ट्रेलिया से मरम्मत के लिए अमेरिका भेजे जाने के दौरान रहस्यमय तरीके से हॉन्गकॉन्ग की ओर डायवर्ट हो गई। घटना सामने आने के बाद अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन और अमेरिकी संसद कांग्रेस के राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हलकों में चिंता बढ़ गई है। पेंटागन ने पुष्टि की है कि इस शिपमेंट में शामिल F-35 के कुछ संवेदनशील पुर्जों का पता नहीं चल पाया है।

    क्या गायब हुआ और क्यों अहम है?

    मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, गायब खेप में F-35 का कॉकपिट कैनोपी भी शामिल था। F-35 का कैनोपी सामान्य कांच या प्लास्टिक का कवर नहीं है। यह विशेष ऐक्रेलिक सामग्री से तैयार किया जाता है और इसकी सतह पर रडार-अब्जॉर्बेंट मटेरियल (RAM) की बेहद पतली पारदर्शी परत होती है।

    यह तकनीक विमान की स्टील्थ क्षमता का हिस्सा है। इसका उद्देश्य रडार तरंगों के परावर्तन को कम करना है, जिससे विमान को दुश्मन के रडार पर पकड़ना कठिन हो जाता है।

    रक्षा विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि यदि ऐसा कोई वास्तविक पुर्जा किसी प्रतिद्वंद्वी देश के हाथ लग जाए तो उसकी तकनीकी जांच से संबंधित सामग्री और तकनीक के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी हासिल करने का प्रयास किया जा सकता है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है कि गायब पुर्जे चीन की सेना के हाथ लगे हैं।

    ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका भेजे जा रहे थे पुर्जे

    अमेरिका के अलावा ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, नॉर्वे, पोलैंड और नीदरलैंड समेत कई सहयोगी देश F-35 लड़ाकू विमानों का संचालन करते हैं। ऑस्ट्रेलिया में F-35 के रखरखाव की सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन कैनोपी की विशेष मरम्मत सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण इसे अमेरिका भेजा जा रहा था।

    रिपोर्टों के मुताबिक, लॉकहीड मार्टिन के एक ठेकेदार या कमर्शियल शिपिंग प्रदाता के माध्यम से भेजे जा रहे कंटेनर को रास्ते में हॉन्गकॉन्ग की ओर डायवर्ट कर दिया गया। इसी कारण यह सवाल उठ रहा है कि संवेदनशील रक्षा सामग्री वाली खेप को इस मार्ग पर कैसे भेजा गया और बाद में उसके कुछ पुर्जों का पता क्यों नहीं चल सका।

    हॉन्गकॉन्ग पहुंचने से बढ़ी चिंता

    हॉन्गकॉन्ग में चीन का प्रशासनिक और सुरक्षा नियंत्रण होने के कारण अमेरिकी पक्ष के लिए यह मामला संवेदनशील माना जा रहा है। आशंका जताई जा रही है कि हॉन्गकॉन्ग में पहुंचने के बाद खेप की सुरक्षा से समझौता हुआ हो सकता है। हालांकि, अभी तक यह साबित नहीं हुआ है कि किसी चीनी एजेंसी ने F-35 के पुर्जों को जब्त या स्कैन किया है।

    अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के F-35 जॉइंट प्रोग्राम ऑफिस (JPO) ने कहा है कि वह गायब पुर्जों की स्थिति का पता लगाने और उन्हें वापस हासिल करने के लिए अमेरिकी एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रहा है। मामले की जांच भी जारी है।

    F-35 स्पेयर पार्ट्स की ट्रैकिंग पर पहले भी उठे सवाल

    F-35 के स्पेयर पार्ट्स की निगरानी को लेकर पहले भी सवाल उठ चुके हैं। 2023 की अमेरिकी सरकारी जवाबदेही कार्यालय (GAO) की रिपोर्ट में बताया गया था कि लॉकहीड मार्टिन और पेंटागन की व्यवस्था में खामियों के कारण पिछले पांच वर्षों में F-35 के करीब 8.5 करोड़ डॉलर मूल्य के 10 लाख से अधिक छोटे-बड़े स्पेयर पार्ट्स की ट्रैकिंग खो गई थी।

    2025 में भारत में भी कई सप्ताह खड़ा रहा था F-35B

    F-35 को लेकर इससे पहले भी संवेदनशीलता का मामला सामने आया था। 14 जून 2025 को ब्रिटेन का F-35B स्टील्थ लड़ाकू विमान केरल के तिरुवनंतपुरम अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर आपात लैंडिंग के बाद करीब पांच सप्ताह तक वहां खड़ा रहा था। विमान 22 जुलाई 2025 तक भारत में रहा।

    विमान अरब सागर में नियमित उड़ान पर था। खराब मौसम के कारण वह अपने मूल बेस और रॉयल नेवी के विमानवाहक पोत HMS Prince of Wales पर वापस नहीं लौट सका। ईंधन कम होने के कारण उसने तिरुवनंतपुरम को आपातकालीन रिकवरी एयरफील्ड के तौर पर चुना था।

    विमान की संवेदनशील तकनीक को देखते हुए ब्रिटेन ने भारत की ओर से उपलब्ध कराई गई हैंगर सुविधा और तकनीकी सहायता का इस्तेमाल नहीं किया था। उस समय F-35 की स्टील्थ कोटिंग और एडवांस्ड सेंसर फ्यूजन सिस्टम जैसी तकनीकों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं सामने आई थीं। विमान को हवाईअड्डे पर खुले में रखा गया था और उसकी सुरक्षा CISF के जिम्मे थी।

    F-35 के पुर्जों की मौजूदा घटना ने एक बार फिर इस अत्याधुनिक लड़ाकू विमान की सप्लाई चेन, स्पेयर पार्ट्स की निगरानी और संवेदनशील तकनीकी सामग्री की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • चीन को साधने का प्रयास… US ने दिया AI से जुड़ी घटनाओं के लिए नई सूचना व्यवस्था का प्रस्ताव

    चीन को साधने का प्रयास… US ने दिया AI से जुड़ी घटनाओं के लिए नई सूचना व्यवस्था का प्रस्ताव


    न्यूयॉर्क।
    अमेरिका (America) ने चीन (China) के साथ बातचीत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) (Artificial Intelligence – AI) से जुड़ी घटनाओं के लिए नई सूचना व्यवस्था का प्रस्ताव रखा है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट (American Treasury Secretary Scott Bessent) ने रविवार को कहा कि इस व्यवस्था के तहत एआई से जुड़ी ऐसी घटनाओं की जानकारी साझा की जा सकेगी, जिनसे राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

    यह प्रस्ताव इस सप्ताह व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) के बीच होने वाली बातचीत से पहले हुई चर्चा का हिस्सा है। न्यूयॉर्क में चीन के उपप्रधानमंत्री हे लिफेंग के साथ बातचीत के बाद बेसेंट ने कहा कि अमेरिका साझा लक्ष्यों और साझा खतरों को लेकर एक समान दृष्टिकोण चाहता है।


    एआई शक्तियों के बीच हो पारदर्शिता : स्कॉट बेसेंट

    स्कॉट बेसेंट ने कहा कि दुनिया की नंबर एक और नंबर दो एआई शक्तियों के बीच पारदर्शिता बढ़ाना जरूरी है। बेसेंट ने कहा, “हमारा मानना है कि किसी भी सीमा पार गतिविधि की तरह, दुनिया की नंबर एक और नंबर दो एआई शक्तियों के बीच अपारदर्शिता से अधिक पारदर्शिता की ओर बढ़ना बहुत महत्वपूर्ण है।” ट्रंप एआई विकास धीमा करने के सुझावों का विरोध कर चुके हैं। उनका कहना है कि ऐसा करने से चीन को अमेरिकी कंपनियों की बराबरी करने का मौका मिल सकता है।


    अमेरिका-चीन में व्यापार वार्ता को लेकर बनी सहमति

    रविवार देर रात जेपी मॉर्गन चेज के मुख्यालय की लॉबी में बेसेंट और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर ने कहा कि इस सप्ताह ट्रंप और शी के बीच होने वाली बातचीत के लिए आधार तैयार हो चुका है। दोनों नेताओं की बैठक आगामी गुरुवार को होने वाली है।

    बेसेंट और ग्रीर ने बताया कि दोनों देश एक नई ‘व्यापार परिषद’ को अमल में लाने पर सहमत हुए हैं। इस व्यवस्था पर ट्रंप और शी ने मई में बीजिंग में मुलाकात के दौरान चर्चा की थी। ग्रीर ने कहा, “आज वे विचार वास्तविकता बन गए हैं।”

    कम संवेदनशील वस्तुओं पर कम शुल्क की चर्चा
    ग्रीर ने कहा कि दोनों देश अभी भी इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि किन ‘गैर-संवेदनशील’ वस्तुओं को कम शुल्क की श्रेणी में रखा जा सकता है। संभावित सूची में उपभोक्ता वस्तुएं, कृषि उत्पाद, ऊर्जा उत्पाद और चिकित्सा उपकरण शामिल हो सकते हैं। दोनों देशों के बीच हुई ताजा चर्चा ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और चीन एआई, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अपने संबंधों को लेकर बातचीत कर रहे हैं।

  • सऊदी अरब में हूती के हमलों के बाद US में बड़ा अलर्ट… यात्रा के लिए अनुमति लेना अनिवार्य

    सऊदी अरब में हूती के हमलों के बाद US में बड़ा अलर्ट… यात्रा के लिए अनुमति लेना अनिवार्य


    वाशिंगटन।
    यमन (Yemen) के हूती समूह (Houthi Group) के मिसाइल और ड्रोन हमलों (Missile- Drone Attacks) के बाद सऊदी अरब (Saudi Arabia) में सुरक्षा को लेकर अमेरिका ने बड़ा अलर्ट जारी किया है। अमेरिकी मिशन ने सऊदी अरब में काम कर रहे अपने सरकारी कर्मचारियों को ताइफ और यनबू शहरों की यात्रा के लिए विशेष अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया है। यह नियम सरकारी काम के साथ-साथ निजी यात्रा पर भी लागू होगा। अमेरिकी मिशन ने कहा कि यह फैसला मौजूदा सुरक्षा स्थिति को देखते हुए लिया गया है। साथ ही सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी नागरिकों से सतर्क रहने और सुरक्षा निर्देशों का पालन करने को कहा गया है।


    हूतियों ने सऊदी अरब को कैसे निशाना बनाया?

    यह अमेरिकी अलर्ट ऐसे समय आया है जब हूती समूह ने सऊदी अरब की ओर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। इनमें राजधानी रियाद की ओर दागी गई एक बैलिस्टिक मिसाइल भी शामिल है। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने कहा कि मिसाइल को रास्ते में ही रोक दिया गया। गठबंधन ने बिश, ताइफ, फरासन और यनबू में नागरिक आबादी और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की कोशिशों की भी जानकारी दी है। रियाद में एयरपोर्ट के पास विस्फोट और धुएं का बड़ा गुबार दिखाई देने की खबर भी सामने आई, हालांकि सऊदी अधिकारियों के मुताबिक इस घटना में किसी के हताहत होने या नुकसान की सूचना नहीं है।


    अमेरिका ने सऊदी अरब में रहने वाले नागरिकों को क्या कहा?

    अमेरिकी मिशन ने अपने नागरिकों से सतर्क रहने, स्थानीय मीडिया और सरकारी घोषणाओं पर नजर रखने तथा फोन चार्ज रखने को कहा है। हवाई हमले की स्थिति में लोगों को खिड़कियों और कांच के दरवाजों से दूर रहने की सलाह दी गई है। अमेरिका ने लोगों से प्रदर्शन और बड़ी भीड़ से बचने तथा ऐसे स्थानों पर अतिरिक्त सावधानी बरतने को भी कहा है, जिन्हें सार्वजनिक रूप से अमेरिका से जुड़ा माना जाता है। अमेरिकी विदेश विभाग सऊदी अरब के लिए फिलहाल लेवल-3 ‘यात्रा पर पुनर्विचार करें’ की सलाह दे रहा है। इसमें ड्रोन और मिसाइल हमलों, सशस्त्र संघर्ष और आतंकवाद का खतरा बताया गया है।


    ईरान ने अमेरिका और उसके सहयोगियों को क्या चेतावनी दी?

    सऊदी अरब पर हमलों के बीच ईरान ने भी अमेरिका और उसके सहयोगियों को कड़ी चेतावनी दी है। ईरानी सैन्य केंद्रीय कमान ने रविवार को सरकारी मीडिया पर कहा कि अगर अमेरिका और उसके सहयोगी कोई नया बड़ा हमला करते हैं तो ईरान अमेरिका के खिलाफ लगातार जवाबी कार्रवाई करेगा। ईरान ने यह भी कहा कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिका के सहयोगियों को संघर्ष का पक्ष माना जाएगा। हालांकि, ईरान ने उस कथित हमले की कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी, जिसकी तैयारी होने की बात उसने कही है।


    कतर ने हूती हमलों पर क्या कहा?

    कतर ने रियाद को निशाना बनाकर किए गए बैलिस्टिक मिसाइल हमले और बिश, ताइफ, फरासन तथा यनबू में नागरिक आबादी और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की कोशिशों की कड़ी निंदा की है। कतर के विदेश मंत्रालय ने इन हमलों को सऊदी अरब की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया और सऊदी अरब के साथ एकजुटता जताई है। इस बीच अमेरिका ने पश्चिम एशिया की यात्रा करने या वहां से गुजरने वाले अपने नागरिकों को भी सतर्क रहने को कहा है। अमेरिकी चेतावनी में उड़ानें रद्द होने और हवाई क्षेत्र बंद होने जैसी संभावित परेशानियों का भी जिक्र किया गया है।

  • US में ब्याज दरें बढ़ने का भारत में भी दिखेगा असर… रुपया, सोना और शेयर बाजार होगा प्रभावित

    US में ब्याज दरें बढ़ने का भारत में भी दिखेगा असर… रुपया, सोना और शेयर बाजार होगा प्रभावित


    नई दिल्ली।
    करीब तीन साल के अंतराल के बाद अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व (American Central bank Federal Reserve) ने ब्याज दरों में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी कर दी है, जिससे ब्याज दरें (Interest rates) 3.75 से 4% तक पहुंच गई हैं। फेडरल रिजर्व के इस रुख के बाद दुनियाभर के बाजारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। इसका सबसे तगड़ा असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं, खासकर भारत (India) पर बिल्कुल साफ दिखेगा।

    अमेरिकी दरें बढ़ने से डॉलर इंडेक्स मजबूत होकर एक महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। इसके दबाव में रुपया कमजोर होकर 95 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया है। रुपये की इस कमजोरी से आयातित महंगाई बढ़ने का खतरा है।


    विदेशी निवेशकों की निकासी

    अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से वैश्विक निवेशक सुरक्षित अमेरिकी संपत्तियों की तरफ रुख कर रहे हैं। यही वजह है कि भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली और तेज हो सकती है। इस साल अब तक एफपीआई भारतीय बाजार से 2.41 लाख करोड़ रुपये से अधिक निकाल चुके हैं। इस फैसले से सोने की चमक पर भी अल्पकालिक दबाव के आसार हैं। 


    आपकी जेब पर क्या होगा असर?

    बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो जाएगा, जिसके चलते वे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ा देंगे। जिन लोगों के लोन फ्लोटिंग रेट पर हैं, उनकी मासिक ईएमआई बढ़ जाएगी, जिससे आम जनता के पास खर्च करने योग्य आय कम हो जाएगी। कर्ज लेने वालों के लिए जहां यह बुरी खबर होगी, वहीं बचत करने वाले सीनियर सिटीजन और निवेशकों को बैंक एफडी पर पहले से बेहतर ब्याज मिलना शुरू हो जाएगा।


    क्या आरबीआई बढ़ाएगा ब्याज दरें?

    जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व अपनी नीतिगत दरों में बदलाव करता है, तो आरबीआई ब्याज दर के अंतर, पूंजी प्रवाह और मुद्रा बाजारों पर पड़ने वाले प्रभाव पर करीब से नजर रखता है। हालांकि, आरबीआई के नीतिगत फैसले घरेलू महंगाई, विकास और अन्य आर्थिक स्थितियों से भी तय होते हैं। घरेलू मुद्रास्फीति का दबाव बना हुआ है, ऐसे में आरबीआई को पूंजी की निकासी और मुद्रा की स्थिरता को लेकर अतिरिक्त बातों पर विचार करना पड़ सकता है।

    एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेस का मानना है कि देश में महंगाई के दबाव को देखते हुए अक्तूबर में होने वाली समीक्षा बैठक में आरबीआई 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी कर सकता है। एचडीएफसी बैंक का मानना है कि आरबीआई दिसंबर तक इंतजार कर सकता है ताकि यह पूरी तरह स्पष्ट हो सके कि महंगाई का दबाव कितना व्यापक और टिकाऊ है।

  • US: महंगाई को काबू में करने के लिए फेडरल रिजर्व का बड़ा फैसला…. ब्याज दरों में किया इजाफा

    US: महंगाई को काबू में करने के लिए फेडरल रिजर्व का बड़ा फैसला…. ब्याज दरों में किया इजाफा


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में जिद्दी बनी महंगाई (Inflation) पर लगाम कसने के लिए केंद्रीय बैंक ‘फेडरल रिजर्व’ (Central Bank ‘Federal Reserve’) ने एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। व्हाइट हाउस (White House) के लगातार दबाव को दरकिनार करते हुए फेडरल रिजर्व ने बुधवार को बेंचमार्क ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर दी है। वर्ष 2023 के बाद से यह पहला मौका है जब अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में इजाफा किया है। इस फैसले से न केवल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) की कम ब्याज दरों की मांग को झटका लगा है, बल्कि इसका असर वैश्विक बाजारों पर भी देखने को मिल सकता है।


    महंगाई पर लगाम लगाने के लिए उठाया सख्त कदम

    फेडरल रिजर्व ने मुख्य ब्याज दर (बेंचमार्क रेट) में 25 बेसिस प्वाइंट (0.25 फीसदी) की बढ़ोतरी की है। इस फैसले के बाद अमरीका में मुख्य ब्याज दर बढ़कर लगभग 3.9 फीसदी हो गई है। बैंक के इस कदम का सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा, जिससे समय के साथ होम लोन, ऑटो लोन और क्रेडिट कार्ड पर ब्याज दरें महंगी हो जाएंगी। त्रैमासिक अनुमानों को जारी करते हुए फेड की दर-निर्धारण समिति (एफओएमसी) ने संकेत दिया है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए इस साल के अंत तक ब्याज दरों को एक बार फिर बढ़ाकर 4.1 फीसदी तक किया जा सकता है।

    केंद्रीय बैंक ने अपने आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया, ‘आज की नीतिगत कार्रवाई मुद्रास्फीति (महंगाई) को केंद्रीय बैंक के दो प्रतिशत के लक्ष्य पर समयबद्ध तरीके से वापस लाने में मदद करेगी।’


    चुनाव से ठीक पहले आम जनता पर दोहरा बोझ?

    फेड का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी जनता पहले से ही खाद्य पदार्थों, पेट्रोल-डीजल और आवास की बढ़ती कीमतों से जूझ रही है। अमेरिका में महज सात हफ्ते बाद मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं, और ऐसे में बढ़ती महंगाई चुनावी अभियानों का सबसे मुख्य मुद्दा बन चुका है। ब्याज दरों के बढ़ने से आम उपभोक्ताओं के लिए कर्ज लेना और महंगा हो जाएगा।


    चेयरपर्सन केविन वॉश का क्या रुख?

    यह फैसला फेडरल रिजर्व के नए चेयरपर्सन केविन वॉश के रुख में आए एक बड़े मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से नियुक्त किए गए केविन वॉश ने इसी साल मई में फेड अध्यक्ष का पद संभाला था। पिछले साल जब ट्रंप इस पद के लिए उनके नाम पर विचार कर रहे थे, तब वॉश ने कई बार संकेत दिए थे कि फेड ब्याज दरों में कटौती कर सकता है। उन्होंने कम ब्याज दरों की राष्ट्रपति ट्रंप की मांग का समर्थन भी किया था। हालांकि, पद संभालने और लगातार ऊंची बनी महंगाई के आंकड़ों के बीच वॉश ने राजनीतिक दबाव के बजाय केंद्रीय बैंक की नीतिगत स्वायत्तता और महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता दी है।

    अमेरिकी सेंट्रल बैंक ने जनवरी 2026 से यूएस फेड रेट्स को स्थिर रखा है। बैंक ने एनर्जी की कीमतों में अचानक आए उछाल के असर को समझने और कीमतों पर टैरिफ के असर को पूरी इकॉनमी में फैलने देने के लिए इंतजार करने का फैसला किया था। हालांकि, पिछली यूएस फेड मीटिंग में वोटिंग करने वाले सदस्यों में से एक-चौथाई ने तुरंत यूएस फेड रेट बढ़ाने की मांग की, जो बाकी नौ वोटिंग सदस्यों की राय से अलग थी।

    अमरीका के केंद्रीय बैंक ‘फेडरल रिजर्व’ ने लगातार बनी हुई महंगाई पर रोक लगाने के उद्देश्य से 2023 के बाद पहली बार अपनी बेंचमार्क ब्याज दर में 0.25% की बढ़ोतरी की है। इससे ब्याज दरें बढ़कर 3.9% हो गई हैं, जिससे होम लोन, कार लोन और क्रेडिट कार्ड महंगे होंगे। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दरें घटाने के दबाव को दरकिनार करते हुए फेड ने इस साल के अंत तक दरों को 4.1% तक ले जाने का संकेत दिया है।

  • Report : अमेरिका ने ईरान जंग में अब तक 38 अरब डॉलर फूंके….., महंगाई पर पड़ेगा युद्ध का असर

    Report : अमेरिका ने ईरान जंग में अब तक 38 अरब डॉलर फूंके….., महंगाई पर पड़ेगा युद्ध का असर


    वाशिंगटन।
    ईरान के खिलाफ युद्ध (Iran War) पर 1 अगस्त तक अमेरिका (America) के रक्षा विभाग के 38 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। यह खर्च आगे भी जारी रहेगा। युद्ध की स्थिति और उसकी तीव्रता के आधार पर हर महीने तीन अरब डॉलर या उससे ज्यादा खर्च हो सकते हैं। यह आकलन मंगलवार को गैर-दलीय संस्था कांग्रेसनल बजट कार्यालय (सीबीओ) (Congressional Budget Office – CBO) ने जारी किया।

    सीबीओ ने कहा कि इस युद्ध का असर महंगाई पर 2027 की पहली तिमाही तक रह सकता है। इसके कारण महंगाई पहले के अनुमान से करीब 0.5 प्रतिशत अंक ज्यादा रह सकती है। इसकी बड़ी वजह तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में कमी है। ईरान युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से इनकी आवाजाही प्रभावित हुई है। लाल सागर से होने वाली जहाजों की आवाजाही में भी बाधा आई है।

    यह अनुमान प्रतिनिधि ब्रेंडन बॉयल के जानकारी मांगने के बाद तैयार किया गया। बॉयल प्रतिनिधि सभा की बजट समिति में सबसे वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य हैं। सीबीओ का यह अनुमान पहले दिए गए रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के अनुमान से काफी मिलता है। हेगसेथ ने सीनेट में गवाही के दौरान युद्ध की लागत 37.5 अरब डॉलर बताई थी।

    सीबीओ के मुताबिक, इस खर्च का बड़ा हिस्सा युद्ध में इस्तेमाल हुई या नष्ट हुई मिसाइलों, हथियारों और सैन्य उपकरणों को फिर से खरीदने पर हो रहा है। इसमें युद्ध में मारे गए या घायल हुए अमेरिकी सैनिकों का खर्च शामिल नहीं है। इसमें भविष्य में सैनिकों की स्वास्थ्य देखभाल और विकलांगता मुआवजे का खर्च भी शामिल नहीं किया गया है।

    ब्रेंडन बॉयल ने कहा कि युद्ध की मानवीय कीमत के अलावा अमेरिकी लोगों को इसकी आर्थिक कीमत भी चुकानी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि सीबीओ की गैर-दलीय रिपोर्ट से साफ है कि युद्ध पर अमेरिकी करदाताओं के अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं। खर्च अभी भी बढ़ रहा है। इसके साथ ही आम लोगों के लिए चीजों की कीमतें भी बढ़ रही हैं।

    बॉयल ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन कई वर्षों से अमेरिकी लोगों से कहते रहे हैं कि देश में परिवारों की मदद करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। लेकिन उनके मुताबिक, सरकार एक ऐसे युद्ध पर अरबों डॉलर खर्च कर सकती है, जिसे उन्होंने गैर-जिम्मेदाराना बताया। उन्होंने कहा कि इस युद्ध की कीमत आखिरकार अमेरिकी लोगों को चुकानी पड़ रही है।


    50 से ज्यादा विमान-हेलिकॉप्टर और ड्रोन गंवाए

    ईरान के खिलाफ 28 फरवरी से 30 जून तक चले ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में अमेरिका को भारी सैन्य और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। पेंटागन के महानिरीक्षक की सोमवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी हमलों और युद्ध से जुड़े हादसों में अमेरिका के 50 से ज्यादा विमान, हेलिकॉप्टर और ड्रोन नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए। इनमें 30 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन शामिल हैं।

    रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी मिसाइल व ड्रोन हमलों से कुवैत, बहरीन, कतर, यूएई, सऊदी अरब, इराक, ओमान व जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सैकड़ों इमारतों को नुकसान पहुंचा।

    अमेरिका ने ये विमान खोए : अमेरिका के चार एफ-15ई लड़ाकू विमान नष्ट हुए। इसके अलावा ए-10 थंडरबोल्ट- एक, ई-3 सेंट्री- एक व एक एएच-64 अपाचे भी गंवाया। एक एफ-35ए और 7 केसी-135 विमान भी क्षतिग्रस्त हुए। इनमें से एक 12 मार्च को इराक में ईंधन भरने के मिशन में दुर्घटनाग्रस्त हुआ, जिसमें सभी छह सदस्यों की मौत हो गई थी।


    गोला-बारूद के भंडार पर बढ़ा दबाव :

    रिपोर्ट ने अमेरिकी हथियारों और गोला-बारूद के भंडार पर बढ़ते दबाव तथा आपूर्ति शृंखला में बाधाओं की ओर भी इशारा किया है। ट्रंप ने हथियारों की कमी के दावे को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका इतिहास में सबसे अधिक आधुनिक हथियार बना रहा है।

  • US : FBI चीफ ने भर्ती नीति में बदलाव का किया बचाव…. बोले- पीड़ितो को भी मिलेगा मौका

    US : FBI चीफ ने भर्ती नीति में बदलाव का किया बचाव…. बोले- पीड़ितो को भी मिलेगा मौका


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) के FBI चीफ काश पटेल (FBI Chief Kash Patel) ने भर्ती नीति में बदलाव (Recruitment Policy Changes) का बचाव किया है. उन्होंने मंगलवार को सीनेट की सुनवाई में इस मुद्दे पर सफाई दी. पटेल ने कहा कि FBI के मानक कमजोर नहीं किए गए हैं. बदलाव का मकसद पीड़ितों को मौका देना है।

    दरअसल, FBI ने हाल में भर्ती नियमों में बदलाव किया है. इसके तहत कुछ आवेदकों को प्रॉस्टिट्यूशन के पुराने मामलों के बावजूद नौकरी के लिए विचार किया जा सकता है. बचपन में बेस्टियलिटी का शिकार रहे लोगों को भी मौका दिया जा सकता है।


    ‘पीड़ितों को सजा नहीं देना चाहते’

    सुनवाई के दौरान FBI की भर्ती नीति को लेकर सवाल हुए. रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कैनेडी ने बेस्टियलिटी से जुड़े नियम पर सवाल उठाया. उन्होंने पूछा कि इस नियम को बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? कैनेडी ने कहा कि इस नियम की सिफारिश करने वाले व्यक्ति से पूछा जाना चाहिए कि वह आखिर ऐसा सुझाव कहां से लेकर आया है।

    इसका जवाब देते हुए पटेल ने कहा कि शुरुआत में उनका भी यही रिएक्शन था. लेकिन बाद में अधिकारियों ने उन्हें कुछ मामले दिखाए. इनमें कुछ लोग ऐसी घटनाओं के लिए मजबूर किए गए थे. इसके बाद पटेल को लगा कि ऐसे लोगों को नौकरी के लिए विचार करने का मौका मिलना चाहिए।

    मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 साल में वेश्यावृत्ति में शामिल रहे कुछ लोगों को FBI में नौकरी नहीं मिल सकेगी। गौरतलब है, सीनेट की सुनवाई के दौरान माहौल काफी गर्म रहा. डेमोक्रेट सांसदों ने पटेल से कई सवाल किए. उन्होंने ट्रंप से जुड़े मामलों की जांच करने वाले FBI अधिकारियों की बर्खास्तगी का भी मुद्दा उठाया. सीनेटर कोरी बुकर ने पटेल पर तीखा हमला किया. उन्होंने पटेल को FBI के लिए अयोग्य तक बताया. पटेल ने भी पलटकर जवाब दिया. दोनों के बीच तीखी बहस हुई।


    चुनाव के दिन FBI की भूमिका पर भी सवाल

    नवंबर में अमेरिका में मिडटर्म चुनाव होने हैं. ऐसे में FBI की भूमिका पर भी सवाल उठे. चुनाव को लेकर भी पटेल से सवाल किया गया. डेमोक्रेट सीनेटर पीटर वेल्च ने पूछा कि क्या वह नवंबर में होने वाले चुनाव में लोगों के वोट के अधिकार में किसी तरह का दखल नहीं देंगे। इसका जवाब देते हुए FBI चीफ काश पटेल ने कहा कि वह किसी भी तरह के हस्तक्षेप में शामिल नहीं होंगे. हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि क्या चुनाव के दिन FBI एजेंटों को मतदान केंद्रों पर भेजा जा सकता है, तो उन्होंने इससे साफ इनकार नहीं किया।

    पटेल ने कहा कि चुनाव की निगरानी की जिम्मेदारी होमलैंड सिक्योरिटी विभाग की है. FBI के 56 फील्ड ऑफिस में चुनाव से जुड़े अपराधों के लिए अधिकारी मौजूद रहेंगे. जरूरत पड़ने पर एजेंसी कार्रवाई कर सकती है।


    ट्रंप से जुड़े मामलों पर भी घिरे FBI चीफ

    डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने FBI अधिकारियों की बर्खास्तगी पर सवाल किया. उन्होंने ईरान मामलों के विशेषज्ञ रहे अधिकारियों को हटाए जाने का मुद्दा उठाया. ब्लूमेंथल ने पूछा कि क्या ट्रंप के राजनीतिक विरोधियों को हटाना ज्यादा जरूरी था. या ईरान से जुड़े खतरों पर नजर रखने वाले अनुभवी अधिकारियों को बनाए रखना?

    पटेल ने जवाब दिया कि उनके लिए सबसे जरूरी FBI को राजनीतिक हथियार बनने से रोकना है. उन्होंने कहा कि वह ऐसे लोगों को एजेंसी में नहीं रखना चाहते जो FBI का गलत इस्तेमाल कर रहे हों. हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि ट्रंप से जुड़े मामले की जांच में शामिल होना किस तरह FBI को ‘राजनीतिक हथियार’ बनाता है.

  • रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाएगा अमेरिका…, भारत की दो टूक

    रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाएगा अमेरिका…, भारत की दो टूक


    नई दिल्ली।
    अमेरिका (America) ने रूस (Russia) से ज्यादा तेल खरीद (Buy Oil) रहे देशों पर 100 फीसदी टैरिफ (Tariff) लगाने के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सीनेट से बिल को मंजूरी मिलने के बाद अब इसे हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव (House of Representatives) में भी लाया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक अमेरिकी कांग्रेस के निचले सदन में इस बिल पर गुरुवार को वोटिंग होगी। अगर यह बिल पास हो जाता है तो भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लग सकता है। हालांकि इसके बावजूद भारत (India) ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका चाहे जो कर ले, भारत रूस से तेल खरीदता रहेगा और दबाव के आगे नहीं झुकेगा।

    भारत ने मंगलवार को एक बयान में कहा है कि अमेरिका भले ही टैरिफ लगा ले, भारत दबाव में नहीं आएगा और रूस से तेल की खरीद जारी रखेगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों से जुड़े फैसले अपने 140 करोड़ नागरिकों के हितों को ध्यान में रखकर करता है। वह आगे भी इस पर कायम रहेगा।


    लिंडसे ग्राहम बिल सीनेट से हुआ था पास

    अमेरिका में इस बिल को लिंडसे ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान बिल का नाम दिया गया है। अमेरिकी सीनेट में 86-11 के भारी बहुमत से इसे पास करा लिया गया था। इसका सीधा सीधा मकसद भारत और चीन जैसे देशों पर टैरिफ थोपना है। इसमें रूस से सबसे ज्यादा तेल खरीदने वाले पांच देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। भारत सरकार से जुड़े सूत्रों ने कहा कि वे स्थिति पर नजर रखे हुए हैं, लेकिन यह साफ है कि भारत सरकार इस बारे में अपनी नीति में कोई बदलाव नहीं करेगी और रूस से तेल की खरीद जारी रखेगी।


    भारत का नाम लिखने की मांग

    इससे पहले यह खबर सामने आई थी कि हाल ही में कुछ अमेरिकी सांसदों ने इस बिल में कुछ बदलावों की सिफारिश की है। सांसदों ने मांग की है कि इस बिल में प्रतिबंध लगाने वाले देशों में सीधे भारत का नाम लिख दिया जाए। इससे पहले बिल में पहले सिर्फ ‘रूस से तेल खरीदने वाले देशों’ का जिक्र था। इसमें किसी देश का नाम नहीं था। हालांकि अब इसमें भारत का नाम अलग से जोड़ने की मांग की गई है।

    इसके अलावा सांसदों का कहना है कि बिल में रूस से सबसे ज्यादा तेल खरीदने वाले 10 देशों का नाम साफ-साफ लिखा जाए और उन पर 100 फीसदी टैरिफ ठोका जाए। इन देशों में भारत, चीन, तुर्की, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाक गणराज्य, यूएई, सिंगापुर, कजाखिस्तान और किर्गिस्तान शामिल हैं।


    अमेरिका ने पहले लगाया है जुर्माना

    अमेरिका इस मुद्दे को लेकर भारत को कई बार निशाना बना चुका है। अमेरिका ने आरोप लगाए है कि भारत रूस से तेल खरीद कर यूक्रेन युद्ध में उसकी आर्थिक मदद कर रहा है। अमेरिका ने इसका हवाला देते हुए पिछले साल भारत पर 50 फीसदी टैरिफ भी लगा दिया था। हालांकि भारत ने तब भी स्पष्ट किया था कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा।