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  • US ने 13 दिन बाद रोके हमले…, जहाज पर अटैक को लेकर अब यूक्रेन-ईरान के बीच ठनी

    US ने 13 दिन बाद रोके हमले…, जहाज पर अटैक को लेकर अब यूक्रेन-ईरान के बीच ठनी


    तेहरान।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में पिछले दो हफ्तों से लगातार बढ़ रहे तनाव के बीच अचानक बड़ा मोड़ आया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने शुक्रवार को अमेरिकी सेना को ईरान पर नए हवाई हमले नहीं करने का निर्देश दिया. इससे पहले ट्रंप लगातार 13 दिनों तक हर दिन सैन्य हमलों की मंजूरी दे रहे थे. वहीं दूसरी तरफ अब ईरान और यूक्रेन में एक जहाज पर हमले को लेकर ठनी हुई है. लेकिन पहले ईरान और अमेरिका की खबर समझ लेते हैं।

    भारतीय समय के मुताबक हर सुबह 5 बजे से पहले अमेरिकी सेंट्रल कमांड एक्स पर पोस्ट करके बताता था कि वह हमले कर रहा है. लेकिन 25 जुलाई को ऐसा कोई भी पोस्ट नहीं आया. हालांकि ट्रंप ने साफ किया कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका दोबारा हमले शुरू कर सकता है, लेकिन फिलहाल उनकी प्राथमिकता बातचीत के जरिए समाधान निकालना है।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका चाहे तो हमले जारी रख सकता है या उन्हें और तेज कर सकता है. लेकिन उन्होंने इसे ‘समझौते का सही समय’ बताते हुए कहा कि ईरान के साथ बातचीत चल रही है और उन्हें लगता है कि तेहरान अब पहले से ज्यादा गंभीर नजर आ रहा है. एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी दौरान ओमान का एक प्रतिनिधिमंडल ईरान पहुंचा, जहां होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने से जुड़े संभावित समझौते पर बातचीत हुई. रिपोर्ट का दावा है कि इस बातचीत में कुछ प्रगति हुई है।


    इजरायल भी था बड़े हमले की तैयारी में

    रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल के सुरक्षा तंत्र को उम्मीद थी कि शुक्रवार को अमेरिका ईरान पर एक और बड़ा हमला करेगा. इसी आशंका के चलते इजरायली सेना और सुरक्षा कैबिनेट हाई अलर्ट पर थे. बाद में उन्हें जानकारी दी गई कि ट्रंप ने नए हमलों की मंजूरी नहीं दी।


    यूक्रेन पर भड़का ईरान

    इसी बीच ईरान ने एक अलग मोर्चे पर यूक्रेन के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया है. ईरान के विदेश मंत्रालय ने आरोप लगाया कि कैस्पियन सागर जो रूस और ईरान को जोड़ता है वहां एक वाणिज्यिक जहाज पर यूक्रेन ने हमला किया. इस हमले में एक नाविक की मौत हो गई और दूसरा घायल हो गया. ईरान ने इस घटना को संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन बताते हुए तेहरान में यूक्रेन के प्रभारी राजनयिक को तलब किया. विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख से बातचीत में भी इस घटना की निंदा करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से कार्रवाई की मांग की. वहीं ईरान से जुड़े कई टेलीग्राम चैनलों ने ईरानी मिसाइलों की रेंज दिखाते हुए धमकी दे रहे हैं कि कि वह यूक्रेन तक हमला कर सकते हैं।


    यूक्रेन का क्या कहना है?

    यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की ने इससे पहले कहा था कि उनकी सेना ने कैस्पियन सागर में एक रूसी युद्धपोत और ईरान से जुड़े सैन्य सामान ले जा रहे जहाजों को निशाना बनाया है. जेलेंस्की ने यह आरोप भी लगाया कि रूस खाड़ी देशों और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सैटेलाइट तस्वीरें ईरान को उपलब्ध करा रहा है, ताकि ईरान हमलों की योजना बना सके. इन आरोपों पर रूस की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

  • US में फिर ट्रेड वॉर…. ट्रंप ने किया कनाड़ा से आयातित सामान पर 50% टैरिफ लगाने का ऐलान

    US में फिर ट्रेड वॉर…. ट्रंप ने किया कनाड़ा से आयातित सामान पर 50% टैरिफ लगाने का ऐलान


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने एक बार फिर ट्रेड वॉर (Trade War) शुरू कर दिया है। ट्रंप ने सोमवार को पड़ोसी देश कनाडा (Canada) से आयातित अधिकांश सामानों पर 50 फीसदी टैरिफ (50 Percent Tariff) लगाने का ऐलान किया है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि कनाडा अमेरिकी ऑटोमोबाइल, शराब और डेयरी उत्पादों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार कर रहा है। अब ट्रंप के इस कदम से दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ बढ़ाने से जुड़े तीन फैसलों को मंजूरी दी है। अमेरिका के ट्रेड एक्ट ऑफ 1930 की धारा 338 के तहत फैसला तत्काल प्रभाव से ही लागू कर दिया गया है। ट्रंप प्रशासन से जुड़े एक अधिकारी ने फैसले के पीछे की वजह बताते हुए कहा कि चीन के अलावा कनाडा ही उन चुनिंदा देशों में शामिल था, जिसने ट्रंप द्वारा पहले लगाए गए टैरिफ का जवाब जवाबी शुल्क से दिया था। प्रशासन का कहना है कि इस तरह के रवैये के लिए कनाडा की जवाबदेही तय की जानी जरूरी थी।

    बता दें कि ट्रेड एक्ट की धारा 338 को लागू कर ट्रंप पहले भी कई देशों पर इस तरह के शुल्क लगा चुके हैं। इसके बाद बीते साल डेमोक्रेटिक सांसदों ने इस सेक्शन को खत्म करने का प्रस्ताव रखा था। सांसदों ने चेतावनी दी थी कि ट्रंप इस कानून का इस्तेमाल एकतरफा टैरिफ लगाने के लिए कर सकते हैं। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था अस्थिर हो सकती है।


    किन चीजों पर पड़ेगा असर?

    ट्रंप के नए आदेश के तहत कनाडा के कुछ अहम सेक्टरों को बढ़े हुए टैरिफ से राहत दी गई है। ऊर्जा उत्पाद, पोटाश, मछली और दुर्लभ खनिजों को 50 फीसदी टैरिफ के दायरे से बाहर रखा गया है। हालांकि यह 50 फीसदी टैरिफ उन कई उत्पादों पर भी लागू होगा जिन्हें पहले ‘यूनाइटेड स्टेट्स-मेक्सिको-कनाडा एग्रीमेंट’ (USMCA) के तहत सीमा शुल्क से सुरक्षा मिली हुई थी। 2020 में लागू हुआ यह व्यापार समझौता हाल ही में खत्म हुआ था। फिलहाल इसे दोबारा लागू करने के लिए बातचीत जारी है।


    बढ़ सकती है महंगाई, रिश्तों में खटास

    अमेरिका और कनाडा की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से दोनों देशों के बीच अनिश्चितता बढ़ेगी। अमेरिका में महंगाई बढ़ने का खतरा मंडराने लगा है। वहीं दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों में भी दरार आ सकती है। यही नहीं ट्रंप आने वाले दिनों में टैरिफ और बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। मामले की जानकारी देने वाले अधिकारी ने बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सहयोगियों को कनाडा पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की संभावना तलाशने का निर्देश दिया है।

  • ट्रंप के नए प्रस्ताव से अमेरिका में डेढ़ लाख भारतीय ट्रक ड्राइवरों की नौकरी खतरे में

    ट्रंप के नए प्रस्ताव से अमेरिका में डेढ़ लाख भारतीय ट्रक ड्राइवरों की नौकरी खतरे में


    नई दिल्ली।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने प्रवासियों (Migrants) को लेकर एक नया और बेहद विवादित प्रस्ताव पेश किया है, जिसका सीधा और बड़ा असर अमेरिका में रह रहे लाखों भारतीय प्रवासियों (Indian Migrants) पर पड़ सकता है. ट्रंप ने घोषणा की है कि उनकी सरकार देश की सड़कों पर दौड़ रहे बड़ी संख्या में अप्रवासी ट्रक ड्राइवरों को हटाकर उनकी जगह अमेरिकी सेना के सेवानिवृत्त सैनिकों को तैनात करेगी।

    ट्रंप ने आरोप लगाया कि प्रवासियों में से अधिकांश ड्राइवर नशे की लत में डूबे हैं और सड़कों पर कई लोगों की जान ले रहे हैं. पेंसिल्वेनिया में आयोजित मिलिट्री इन्वेस्टमेंट समिट में बोलते हुए ट्रंप ने कहा कि उनका प्रशासन गैर-कानूनी और बिना उचित दस्तावेजों के बड़े ट्रक चलाने वाले ड्राइवरों के खिलाफ देशव्यापी कार्रवाई कर रहा है।

    ट्रंप ने कहा, “मेरा प्रशासन जल्द ही अवैध विदेशी ट्रक ड्राइवरों के खिलाफ ऐतिहासिक कार्रवाई करेगा, जो सड़कों पर कई लोगों की जान ले रहे हैं. वे सड़कों पर लगे साइन बोर्ड तक नहीं पढ़ सकते. उनमें से कई ड्रग्स या शराब के नशे में होते हैं. वे पूरी तरह से अवैध रूप से देश में आए हैं, और हम उन्हें अमेरिकी सड़कों पर गाड़ियां चलाते हुए नहीं देखना चाहते।

    ट्रंप ने आगे कहा कि इन ड्राइवरों की जगह गर्वित अमेरिकी दिग्गजों को दी जाएगी. प्रस्ताव के तहत, सेना में भारी ट्रक चलाने का अनुभव रखने वाले किसी भी अमेरिकी नागरिक को बिना किसी परेशानी के सीधे कमर्शियल ड्राइविंग लाइसेंस (CDL) जारी कर दिया जाएगा।


    2 लाख प्रवासियों के लाइसेंस पहले ही हो चुके हैं रद्द

    यह कोई हवाई घोषणा नहीं है, बल्कि ट्रंप प्रशासन इस पर पहले से ही एक बड़ा क्रैकडाउनकर रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी साल मार्च में नए नियमों के तहत लगभग 2,00,000 अप्रवासी ड्राइवरों के कमर्शियल लाइसेंस रद्द कर दिए गए हैं, जिनके पास पहले अमेरिका में रहने और काम करने का कानूनी अधिकार था।

    दरअसल, अमेरिकी नागरिकों द्वारा ट्रक ड्राइविंग से दूरी बनाने के कारण हाल के वर्षों में वैध और अवैध दोनों तरह के प्रवासियों के लिए यह सेक्टर मोटी कमाई का जरिया बन गया था।

    भारतीय समुदाय, खासकर सिख और पंजाबी ड्राइवरों को लगेगा तगड़ा झटकानॉर्थ अमेरिकन पंजाबी ट्रकर्स एसोसिएशन (NAPTA) के आंकड़ों के मुताबिक, इस समय अमेरिका में करीब 1.3- 1.5 लाख ट्रक ड्राइवर पंजाब और हरियाणा के रहने वाले हैं।

    यदि ट्रंप का यह नया प्रस्ताव पूरी तरह लागू होता है, तो इन परिवारों की रोजी-रोटी पर सीधा संकट आ जाएगा. भारतीय मूल के ट्रक चालक पहले से ही सरकार के कड़े फैसलों, जैसे- अनिवार्य अंग्रेजी दक्षता परीक्षा और नए दलीला कानून की मार झेल रहे हैं।

  • रूस से तेल खरीदने पर 100% अमेरिकी टैरिफ का प्रस्ताव, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या पड़ेगा असर?

    रूस से तेल खरीदने पर 100% अमेरिकी टैरिफ का प्रस्ताव, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या पड़ेगा असर?

    नई दिल्ली। रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के अमेरिकी प्रस्ताव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी सीनेटरों के एक समूह ने संशोधित विधेयक पेश किया है, जिसमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों पर रूसी तेल का आयात जारी रखने की स्थिति में भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रस्ताव के कानून बनने की संभावना फिलहाल सीमित है।

    संशोधित विधेयक में क्या है?

    प्रस्तावित बिल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रीय हित के आधार पर प्रतिबंधों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। वहीं, 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित कार्रवाई से बाहर रखा गया है, क्योंकि वे सीमित मात्रा में रूसी गैस आयात करते हैं और रूस पर अपनी निर्भरता लगातार कम कर रहे हैं।

    डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह केवल टैरिफ लगाने का प्रस्ताव नहीं, बल्कि रूस की ऊर्जा, वित्तीय और रक्षा अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। यदि यह कानून बनता है तो पहली बार अमेरिकी कांग्रेस किसी तीसरे देश के साथ व्यापार करने वाले देशों पर टैरिफ को दंडात्मक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति देगी।

    वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है असर

    ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रूसी तेल की खरीद पर इस प्रकार के सेकेंडरी टैरिफ लागू होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    केप्लर के मॉडलिंग एवं रिफाइनिंग विशेषज्ञ सुमित रिटोलिया के अनुसार, वैश्विक बाजार में रूसी कच्चे तेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यदि इसकी आपूर्ति में बड़ी कमी आती है तो उसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा। सीमित अतिरिक्त उत्पादन क्षमता, होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिम और वैकल्पिक आपूर्ति की कमी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।

    भारत के लिए क्यों अहम है रूसी तेल?

    पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत के सबसे बड़े कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया है। रियायती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को लागत कम रखने, ईंधन आपूर्ति बनाए रखने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में मदद की है।

    उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, जून में भारत ने प्रतिदिन लगभग 26 लाख बैरल (2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन) रूसी कच्चे तेल का आयात किया, जो देश के कुल क्रूड आयात का 50 प्रतिशत से अधिक था। जुलाई में भी आयात का स्तर मजबूत बना हुआ है।

    क्या भारत को चिंतित होना चाहिए?

    ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का मानना है कि भारत को फिलहाल इस प्रस्ताव को लेकर अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उनके अनुसार, ऐसा ही एक विधेयक लंबे समय से अमेरिकी सीनेट में लंबित है, जिससे स्पष्ट होता है कि ऐसे कठोर प्रावधानों को पर्याप्त राजनीतिक समर्थन नहीं मिल पाया है।

    उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी न्यायिक फैसलों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े कानूनी पहलुओं को देखते हुए इस प्रस्ताव के लागू होने की राह आसान नहीं है। साथ ही यूरोपीय देशों को दी गई छूट यह भी दर्शाती है कि प्रस्ताव सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा रहा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तय करनी चाहिए। यदि भविष्य में इस प्रस्ताव पर आगे बढ़त होती है, तब भी भारत के सामने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और आयात रणनीति का संतुलित मूल्यांकन करना महत्वपूर्ण होगा।

  • इजरायल को फंडिंग करने पर अमेरिका में बवाल… सांसदों ने की कटौती की मांग

    इजरायल को फंडिंग करने पर अमेरिका में बवाल… सांसदों ने की कटौती की मांग


    वाशिंगटन।
    इजरायल (Israel) की मदद करना अमेरिकी सरकार (American Government) को भारी पड़ता दिख रहा है. इस मुद्दे को लेकर अमेरिका (America) की राजनीति में हंगामा शुरू हो गया है. हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (House of Representatives) के आधे से ज्यादा डेमोक्रेटिक सांसदों (Democratic lawmakers) ने इजरायल को दी जाने वाली 3.3 अरब डॉलर की सहायता राशि में कटौती करने के पक्ष में मतदान किया है।

    बुधवार को सदन में इस संशोधन प्रस्ताव पर मतदान हुआ. प्रस्ताव के पक्ष में 104 और विरोध में 314 वोट पड़े. हालांकि, ये राष्ट्रीय सुरक्षा खर्च विधेयक में इस संशोधन को जोड़ने के लिए काफी नहीं था। इस मतदान से ये साफ हो गया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Prime Minister Benjamin Netanyahu) की युद्ध रणनीति को लेकर अमेरिकी संसद और डेमोक्रेटिक पार्टी में गहरी दरार है।


    चुनाव से ठीक पहले पार्टी में मतभेद

    ये मतदान अमेरिक में होने वाले मिड-टर्म चुनावों से ठीक पहले हुआ है, जो ये तय करेंगे कि अमेरिकी कांग्रेस पर किसका कंट्रोल होगा. इस वोटिंग में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व के बीच भी मतभेद खुलकर सामने आए. 100 से ज्यादा डेमोक्रेट्स ने विदेशी सैन्य सहायता राशि को पूरी तरह खत्म करने वाले इस संशोधन के पक्ष में वोट दिया, जबकि लगभग इतने ही डेमोक्रेट्स ने इसके खिलाफ मतदान किया।

    वहीं, जबकि रिपब्लिकन सांसदों ने इजरायल को दी जाने वाली सहायता को बनाए रखने के पक्ष में वोट डाला. सदन में डेमोक्रेटिक नेता हकीम जेफ्रीस ने इस प्रस्ताव का विरोध किया. हालांकि, उन्होंने अपने सहयोगियों को लिखे पत्र में इस बात पर जोर दिया कि इजरायल और फिलिस्तीनी लोगों की भलाई के लिए मिडिल-ईस्ट में अमेरिकी नीति को बदलना होगा। जेफ्रीस ने कहा कि नेतन्याहू सरकार के रवैये में जरूरी बदलाव लाने के लिए और भी सही तरीके मौजूद हैं।


    पार्टी में बढ़ता आंतरिक दबाव

    इजरायल को लेकर बढ़ती विरोध डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है. पार्टी को अपने ही भीतर लेफ्ट विंग के बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ रहा है. हालांकि, रिपब्लिकन पार्टी इस फूट का फायदा उठाकर डेमोक्रेट्स को ‘कट्टर वामपंथी’ साबित करने की कोशिश कर रही है।

    इस बीच, डेमोक्रेटिक व्हिप और मैसाचुसेट्स की प्रतिनिधि कैथरीन क्लार्क ने फंड रोकने का समर्थन किया. एक हालिया AP-NORC पोल के मुताबिक, लगभग एक-तिहाई अमेरिकी एडल्ट- जिनमें करीब आधे डेमोक्रेट शामिल हैं, उनका मानना है कि इजरायल ने गाजा में फिलिस्तीनियों के खिलाफ नरसंहार किया है. हालांकि, इजरायल और अमेरिकी सरकार इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते रहे हैं।

  • ब्रिटेन द्वारा IRGC को 'सुरक्षा के लिए खतरा' बताने पर भड़का ईरान, राजदूत को किया तलब

    ब्रिटेन द्वारा IRGC को 'सुरक्षा के लिए खतरा' बताने पर भड़का ईरान, राजदूत को किया तलब


    लंदन।
    ईरान-अमेरिका (Iran-America) के बीच जंग नए मोड़ पर पहुंच चुकी है. दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है. इस बीच, ईरान (Iran) ने तेहरान में ब्रिटेन (Britain) के राजदूत को तलब किया. यह कदम लंदन द्वारा यूके के ‘काउंटरिंग स्टेट थ्रेट्स एक्ट’ (‘Countering State Threats Act’) के तहत इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (Islamic Revolutionary Guard Corps- IRGC) को नामित करने के बाद उठाया गया. एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी विदेश मंत्रालय ने चेतावनी दी कि इस कदम का जवाब दिया जाएगा।

    यह घटनाक्रम ब्रिटेन द्वारा लंदन में ईरान के चार्ज डी’अफेयर्स अली नसीमफार को तलब किए जाने के एक दिन बाद हुआ. ब्रिटेन सरकार का आरोप था कि हाल के महीनों में पूरे यूरोप में हमले करने के लिए प्रॉक्सी समूहों को निर्देशित करने में ईरान की भूमिका रही है।

    बता दें, ब्रिटेन ने सोमवार को IRGC और उससे जुड़े एक समूह को सुरक्षा के लिए खतरा घोषित किया. यह कदम उन नए अधिकारों के तहत उठाया गया जिनका मकसद विदेशी देशों को निगरानी और तोड़फोड़ जैसी गतिविधियों के लिए प्रॉक्सी का इस्तेमाल करने से रोकना है।


    होर्मुज को लेकर बढ़ी चिंताएं

    ईरान-अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर चिंताएं फिर बढ़ गई हैं. रॉयटर्स के मुताबिक, समुद्री सुरक्षा और शिपिंग इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों ने बताया कि जहाजों पर ईरानी हमलों के सिलसिले के बाद सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं, जिसके चलते शिपिंग कंपनियां स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने के लिए अमेरिकी सेना की निगरानी वाली योजना का इस्तेमाल करने से बच रही हैं।

    28 फरवरी को ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से ईरानी सेना ने इस इलाके में माइंस बिछा दी हैं, जिससे जहाजों को ईरान या ओमान के तट के करीब बने दो वैकल्पिक रास्तों में से किसी एक का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

  • US: ट्रंप को बड़ा झटका…. यौन शोषण मामले में जीन कैरोल को मिले 5.63 मिलियन डॉलर

    US: ट्रंप को बड़ा झटका…. यौन शोषण मामले में जीन कैरोल को मिले 5.63 मिलियन डॉलर


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी लेखिका ई. जीन कैरोल (American writer E. Jean Carroll) को डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) से करीब 56 लाख 30 हजार डॉलर (लगभग 5.63 मिलियन डॉलर) मिल गए हैं. यह पैसा उन्हें 2023 में एक जूरी के फैसले के बाद मिला है, जिसमें ट्रंप को कैरोल का यौन उत्पीड़न करने और उन्हें बदनाम करने का दोषी ठहराया गया था।

    अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक यह रकम सोमवार को कैरोल की लॉ फर्म को भेज दी गई. यह फैसला ट्रंप की आपत्तियों के बावजूद लिया गया. जज लुईस कैप्लान (Judge Lewis Kaplan) ने पांच दिन पहले ही इस भुगतान को मंजूरी दी थी। यह रकम मूल रूप से 5 मिलियन डॉलर के सिविल वर्डिक्ट और उस पर लगे ब्याज को मिलाकर बनी है. यह पहली बार है जब ट्रंप को कैरोल को कोई भुगतान करने पर मजबूर होना पड़ा है।

    पिछले सात साल में कैरोल कुल 88.3 मिलियन डॉलर के सिविल फैसले ट्रंप के खिलाफ जीत चुकी हैं. यह मामला 1996 के आसपास न्यूयॉर्क के बर्गडॉर्फ गुडमैन डिपार्टमेंट स्टोर की एक ड्रेसिंग रूम में हुई कथित घटना से जुड़ा है, जिसे ट्रंप ने हमेशा नकारा है।

    राष्ट्रपति ट्रंप कैरोल के आरोपों को झूठा बताते रहे हैं. उनका कहना है कि वे कैरोल को जानते तक नहीं और कैरोल ने अपनी किताब बेचने के लिए यह कहानी गढ़ी है. पिछले महीने अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रंप की उस अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने 5 मिलियन डॉलर के फैसले को चुनौती दी थी. ट्रंप की कानूनी टीम ने मंगलवार को फिर कहा कि यह पूरा मामला राजनीति से प्रेरित है।

    इससे पहले ट्रंप के वकील ने अदालत से भुगतान रोकने की मांग की थी. वकील का कहना था कि अगर कैरोल यह पैसा दान कर देती हैं, जैसा उन्होंने पहले कहा था, तो यह रकम वापस मिलनी मुश्किल हो जाएगी. हालांकि कैरोल ने बाद में भरोसा दिलाया कि वे इस पैसे को अपने रिटायरमेंट के लिए एक ब्याज वाले खाते में रखेंगी।

  • US ने ईरान पर लगाया सात कारोबारी जहाजों पर हमले का आरोप, भारतीय नाविक भी प्रभावित

    US ने ईरान पर लगाया सात कारोबारी जहाजों पर हमले का आरोप, भारतीय नाविक भी प्रभावित


    वॉशिंगटन।
    पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव (West Asia Crisis) के बीच अमेरिका (America) ने ईरान (Iran) पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) (US Central Command -CENTCOM) ने कहा है कि पिछले सात दिनों में ईरान ने सात वाणिज्यिक (कमर्शियल) जहाजों को निशाना बनाया, जिससे करीब एक दर्जन नागरिक चालक दल (क्रू) के सदस्य मारे गए, लापता हुए या घायल हुए हैं। अमेरिका ने कहा कि इन घटनाओं के लिए वह ईरान को जिम्मेदार मानता है।

    सेंटकॉम के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने बयान जारी कर कहा कि ईरानी बलों ने जानबूझकर नागरिक जहाजों को निशाना बनाया है। उनके मुताबिक, पिछले एक सप्ताह में ईरान ने सात कारोबारी जहाजों पर हमले किए। इसके अलावा ईरान ने पड़ोसी खाड़ी देशों की ओर दर्जनों मिसाइलें और ड्रोन भी दागे। उन्होंने कहा कि अमेरिका निर्दोष लोगों की जान को खतरे में डालने वाली ईरान की आक्रामक गतिविधियों के लिए उसे जवाबदेह ठहरा रहा है।


    होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ा तनाव

    अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और जहाजों की आवाजाही को बाधित कर रहा है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे व्यस्त तेल और व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है। सेंटकॉम ने बताया कि उसने ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों से आने-जाने वाले जहाजों पर नौसैनिक नाकेबंदी फिर से शुरू कर दी है। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह कदम ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने के लिए उठाया गया है, जिनका इस्तेमाल व्यापारिक जहाजों पर हमलों में किया जा रहा है। अमेरिका के अनुसार, इस अभियान के तहत क्षेत्र में 20 से अधिक अमेरिकी युद्धपोत और सैकड़ों सैन्य विमान तैनात किए गए हैं।


    भारत ने जताई चिंता

    इस बीच भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे दो जहाजों; एमटी अल बहियाह और एमटी मोम्बासा; पर हुए हमले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। इन दोनों जहाजों पर कुल 46 चालक दल के सदस्य सवार थे, जिनमें 30 भारतीय नाविक शामिल थे।


    यूएई ने भी हमले की पुष्टि की

    संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि यूएई के झंडे वाले टैंकर मोम्बासा और बहियाह को होर्मुज जलडमरूमध्य के दक्षिणी हिस्से में, ओमान के क्षेत्रीय जल में, ईरानी क्रूज मिसाइलों से निशाना बनाया गया। इन घटनाओं के बाद पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति और अधिक गंभीर हो गई है। समुद्री व्यापार, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। वहीं, अमेरिका और ईरान के बीच टकराव और तेज होने की आशंका भी जताई जा रही है।

  • US की H-1B वीजा फर्जीवाड़े पर बड़ी कार्रवाई….. भारतीय दिग्गज IT समेत कई बड़ी कंपनियां रडार पर

    US की H-1B वीजा फर्जीवाड़े पर बड़ी कार्रवाई….. भारतीय दिग्गज IT समेत कई बड़ी कंपनियां रडार पर


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) ने H-1B और पर्म (PERM) वर्क वीजा में चल रही कथित धोखाधड़ी के खिलाफ एक बड़ा जांच अभियान छेड़ दिया है। अमेरिकी श्रम विभाग के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि इस बड़े फर्जीवाड़े की जांच के रडार पर दिग्गज भारतीय आईटी कंपनी ‘कॉग्निजेंट’ (Leading Indian IT company ‘Cognizant’) समेत कई बड़ी कंपनियां शामिल हैं।


    उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में हुआ एक्शन

    वीजा से जुड़े इस बड़े गोरखधंधे के खिलाफ यह सख्त कदम अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (US Vice President JD Vance) के नेतृत्व वाली ‘टास्क फोर्स टू एलिमिनेट फ्रॉड’ के तहत उठाया गया है।


    कैसे खुला फर्जीवाड़े का राज?

    श्रम विभाग के तहत काम करने वाले ‘ऑफिस ऑफ द इंस्पेक्टर जनरल’ (OIG) ने बड़े स्तर पर चल रहे इस फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया है। OIG के आधिकारिक बयान में जांच से जुड़ी कई अहम बातें सामने आई हैं।

    कई नियोक्ताओं और लेबर ब्रोकर्स ने मिलकर वीजा के लिए फर्जी आवेदन जमा किए। विदेशी कामगारों का शोषण किया गया, उनसे जबरन कम वेतन पर काम कराया गया और उनके पैसों में अवैध कटौती की गई। कम मजदूरी वाले विदेशी कर्मचारियों से बाजार को भर दिया गया, जिसका सीधा नुकसान अमेरिकी कामगारों को हुआ और उनकी नौकरियां छिन गईं।


    ‘दर्जनों कंपनियों को जारी किए गए समन’

    बुधवार को फॉक्स बिजनेस से बातचीत के दौरान श्रम विभाग के इंस्पेक्टर जनरल एंथोनी डी एस्पोसिटो ने इस कार्रवाई को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने कहा, “हमने इस मामले में पहले ही दर्जनों समन जारी कर दिए हैं। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि हम जांच में मिले हर एक सुराग की तह तक जाएं।”

    आईटी दिग्गज कॉग्निजेंट का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया, “हमारे पास ऐसे व्हिसलब्लोअर्स मौजूद हैं जो ‘कॉग्निजेंट’ जैसी कुछ सबसे बड़ी कंपनियों के बारे में जानकारी दे रहे हैं। ये कंपनियां पर्म और H-1B वीजा से जुड़े मुद्दों में पहले से ही काफी चर्चा में रही हैं।”


    अमेरिकी नागरिकों की नौकरियों से समझौता नहीं

    OIG ने अपने बयान में स्पष्ट किया है कि ऐसे जालसाज उन श्रम कार्यक्रमों की साख को नुकसान पहुंचाते हैं, जिन्हें देश में श्रमिकों की वास्तविक कमी को दूर करने के लिए बनाया गया है। इन कार्यक्रमों का मकसद अमेरिकी नागरिकों की नौकरियों की कीमत पर भ्रष्ट लोगों की जेब भरना बिल्कुल नहीं है।

    जांच एजेंसी ने कहा कि वह विदेशी गेस्ट वर्कर वीजा सिस्टम का गलत इस्तेमाल करने वाले मानव तस्करी और जबरन मजदूरी कराने वाले पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। संस्था का साफ कहना है कि वह उन सभी साजिशों को जड़ से खत्म करेगी जो मजबूर मजदूरों का शोषण करते हैं और अमेरिकी नागरिकों के हक की नौकरियां छीनते हैं।

  • अमेरिका ने ट्रेड डील से पहले दिए सकारात्मक संकेत… 4 भारतीय कंपनियों को से हटाए बैन

    अमेरिका ने ट्रेड डील से पहले दिए सकारात्मक संकेत… 4 भारतीय कंपनियों को से हटाए बैन


    नई दिल्ली।
    भारत (India) के लिए अमेरिका (America) से अच्छी खबर आई है. रूस के साथ कथित व्यापार संबंधों को लेकर चार भारतीय कंपनियों (Indian Companies) पर लगाए गए प्रतिबंध हटा लिए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, बुधवार से अमेरिका द्वारा ये बैन हटाए गए हैं और इसकी जानकारी अमेरिकी वित्त विभाग ने शेयर करते हुए कहा है कि US ने चार भारतीय कंपनियों पर उन बैन को हटाया है, जो रूस के सैन्य-औद्योगिक अड्डे का समर्थन करने के लिए लेटेस्ट टेक्नोलॉजी और उपकरण की आपूर्ति करने के आरोपों पर लगाए गए थे. अब अमेरिका की प्रतिबंध लिस्ट से अलग हो गई हैं।


    इन कंपनियों को बड़ी राहत

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी वित्त विभाग के मुताबिक हैदराबाद स्थित आरआरजी इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड (RRG Engineering Technologies) और लोकेश मशीन्स लिमिटेड पर से प्रतिबंध हटाए गए हैं. तो वहीं अहमदाबाद स्थित गैलेक्सी बियरिंग्स और नई दिल्ली स्थित शौर्य एरोनॉटिक्स प्राइवेट लिमिटेड को विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFC) की बैन लिस्ट से हटा दिया गया है.


    गैलेक्सी पर 2024 में लगा था बैन

    भारतीय कंपनी गैलेक्सी बियरिंग्स लिमिटेड पर अक्टूबर 2024 में प्रतिबंध लगाया गया था. अमेरिका ने उस समय कंपनी पर रोलर बियरिंग और रोलर असेंबली समेत दर्जनों हाई क्वालिटी वाले दोहरे उपयोग वाली वस्तुओं को रूसी संस्थाओं को निर्यात करने का आरोप लगाया था. अब अमेरिकी वित्त विभाग ने इन आरोपों को वापस लेते हुए कंपनी पर से हैन हटा दिए हैं.

    अन्य तीन कंपनियों में अगला नाम शौर्य एरोनॉटिक्स प्राइवेट लिमिटेड का है, जिसे बैन मुक्त कर दिया गया है. इसपर कथित तौर पर रडार उपकरण, रेडियो नेविगेशनल एंड उपकरण, रेडियो रिमोट कंट्रोल उपकरण और दूसरे इलेक्ट्रिक उपकरण रूस को भेजने के आरोप लगा गए थे.


    RRG पर इसलिए था प्रतिबंध

    अमेरिका ने भारतीय कंपनी आरआरजी इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजीज पर रूस स्थित कंपनी आर्टेक्स लिमिटेड को माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स की 100 से अधिक खेपें भेजने का आरोप लगाया गया था. इसके बाद इसे प्रतिबंध वाली अमेरिकी लिस्ट में शामिल किया गया था.

    एक अन्य भारतीय कंपनी अमेरिका की इस प्रतिबंधों वाली लिस्ट में शामिल थी, जिसका नाम लोकेश मशीन्स है और इस पर विभिन्न रूसी मैन्युफेक्चरिंग कंपनियों को मशीन टूल्स की दर्जनों खेपों की आपूर्ति करने का आरोप लगाया गया था.


    ट्रेड डील से पहले आई खबर

    US-Iran Trade Deal पर बातचीत का दौर जारी है और दोनों ही देश टैरिफ विवाद के बाद अब अपने रिश्तों को ट्रैक पर लाने की कोशिश में लगे हुए हैं. अमेरिका की ओर से भारतीय कंपनियों पर प्रतिबंध हटाया जाना एक पॉजिटिव सिग्नल माना जा रहा है. रिपोर्ट्स में दोनों देशों के बीच डील पर बातचीत अब अंतिम चरण में बताई जा रही है।