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  • CM योगी की नई नीति ने बदली UP की तस्वीर… रोजगार बढ़े…. कमाई में भी इजाफा

    CM योगी की नई नीति ने बदली UP की तस्वीर… रोजगार बढ़े…. कमाई में भी इजाफा


    लखनऊ।
    उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की योगी आदित्यनाथ सरकार (Yogi Adityanath Government) द्वारा लागू की गई नई आबकारी नीति (New excise policy) ने राज्य के राजस्व, सुरक्षा और औद्योगिक निवेश की तस्वीर बदल दी है। साल 2025 आबकारी विभाग के लिए संरचनात्मक सुधारों और तकनीकी बदलावों का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ है। सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और ‘ई-गवर्नेंस’ के समन्वय ने इस क्षेत्र में पारदर्शिता के साथ-साथ रिकॉर्ड तोड़ कमाई सुनिश्चित की है।

    नई आबकारी नीति के तहत विभाग की पूरी कार्यप्रणाली को ‘टेक्नोलॉजी ड्रिवेन’ बनाया गया है। अब शराब की दुकानों का आवंटन पूरी तरह से ई-लॉटरी प्रणाली के माध्यम से किया जाता है, जिससे भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म हो गई है। इसके अलावा, लेबल की मंजूरी, एमआरपी का निर्धारण और निर्यात परमिट जैसी सभी प्रक्रियाओं को ऑनलाइन कर दिया गया है।

    निगरानी को सख्त करने के लिए उत्पादन इकाइयों और डिस्टिलरीज में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। साथ ही, शराब ले जाने वाले टैंकरों में डिजिटल लॉक और जीपीएस (GPS) अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि रास्ते में मिलावट या चोरी की संभावना को पूरी तरह समाप्त किया जा सके।


    राजस्व में 15% से ज्यादा की रिकॉर्ड बढ़ोतरी

    योगी सरकार की नीतियों का सीधा असर सरकारी खजाने पर दिख रहा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार नवंबर 2025 तक राज्य को कुल 35,144.11 करोड़ रुपये का आबकारी राजस्व प्राप्त हुआ है। यह पिछले वर्ष (2024-25) की इसी अवधि के मुकाबले 15.59 प्रतिशत अधिक है। सरकार ने पिछले साल की तुलना में केवल आठ महीनों में 4,741.77 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय दर्ज की है।


    एथेनॉल उत्पादन में यूपी बना नंबर-1

    उत्तर प्रदेश अब देश के एक बड़े एथेनॉल हब के रूप में उभरा है। इस साल राज्य में एथेनॉल का उत्पादन 182 करोड़ लीटर तक पहुंच गया है, जो अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। इसमें से 105.25 करोड़ लीटर एथेनॉल की खपत राज्य के भीतर हुई, जबकि 40.96 करोड़ लीटर अन्य राज्यों को निर्यात किया गया। इससे न केवल उद्योगों को मजबूती मिली है, बल्कि गन्ना किसानों की आय में भी वृद्धि हुई है।


    अवैध शराब के खिलाफ एक्शन

    अवैध शराब के कारोबार को जड़ से मिटाने के लिए सरकार ने इस साल व्यापक अभियान चलाया। प्रदेश भर में कुल 79,990 मामले दर्ज किए गए और लगभग 20.86 लाख लीटर अवैध शराब जब्त की गई। इस कार्रवाई के तहत 15,085 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 2,755 को जेल भेजा गया। जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ‘यूपी एक्साइज सिटीजन ऐप’ और टोल-फ्री नंबर (14405) भी जारी किया गया है।


    निवेश और रोजगार के नए अवसर

    ‘इन्वेस्ट यूपी’ के माध्यम से आबकारी क्षेत्र में अब तक 35,378 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों वाले 140 एमओयू (MoU) साइन किए गए हैं। वर्तमान में 35 परियोजनाएं धरातल पर काम कर रही हैं, जिनमें 4,045 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश हो चुका है। इन परियोजनाओं ने सीधे तौर पर 5,000 से अधिक युवाओं को रोजगार प्रदान किया है, जो राज्य की अर्थव्यवस्था को $1 ट्रिलियन (एक ट्रिलियन डॉलर) बनाने के लक्ष्य में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

  • यूपी के भोजपुर में ‘रोहिंग्या’ संदिग्धों को मिला सरकारी आवास और राशन जांच एजेंसियां सतर्क

    यूपी के भोजपुर में ‘रोहिंग्या’ संदिग्धों को मिला सरकारी आवास और राशन जांच एजेंसियां सतर्क


    मेरठ । भोजपुर उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश के भोजपुर क्षेत्र के रानी नागल गांव में सरकारी योजनाओं का गड़बड़ तरीके से वितरण किए जाने का मामला सामने आया है। गांव में रह रहे घूमंतू परिवारों को बिना उचित प्रक्रिया के मुफ्त राशन प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ और वोटर बनाने की कोशिश की गई है। इन परिवारों में से कुछ को रोहिंग्या माना जा रहा है जिनके खिलाफ खुफिया विभाग और पुलिस की जांच अब तेज़ हो गई है।

    सरकारी योजनाओं का बंदरबांट

    रानी नागल में कुछ परिवारों को सरकारी योजनाओं का फायदा गलत तरीके से दिया गया है। यह परिवार मूलतः घूमंतू समुदाय से हैं और इनका नाम असल में रजिस्टर्ड वोटर सूची में नहीं था। शिकायतों के बाद यह सामने आया कि इन परिवारों को राशन कार्ड प्रधानमंत्री आवास योजना का घर और आधार कार्ड भी जारी कर दिया गया था। इसके अलावा वोटर लिस्ट में इनका नाम जोड़ने के लिए फर्जी तरीके से प्रक्रिया की जा रही थी जिसमें केवल महिलाओं ने ही अपनी गणना प्रपत्र भरे थे।

    गांव छोड़ने पर मजबूर हुए लोग

    गांव में हो रही इस गड़बड़ी के उजागर होते ही कई परिवारों ने गांव छोड़ दिया और भागने को मजबूर हो गए। इस संदिग्ध गतिविधि की जानकारी के बाद खुफिया विभाग की टीम गांव में पहुंची और मामले की गहन जांच शुरू की। रानी नागल के पूर्व प्रधान सईदुल ने डीएम अनुज सिंह और एसएसपी सतपाल अंतिल से इस मामले की शिकायत की थी। इसके बाद एसडीएम सदर डॉ. राम तोहन मीणा द्वारा की गई जांच में यह तथ्य सामने आया कि 2018 में कुल 92 घूमंतू लोग गांव में पहुंचे थे और इनकी फर्जी वोटर बनने की प्रक्रिया चल रही थी।

    किसी और के नाम पर आवास देना

    इन घूमंतू परिवारों में से दस परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने घरों में रह रहे हैं। इस योजना के तहत ये आवास ग्राम समाज की भूमि पर बने थे लेकिन सवाल उठता है कि क्या इन आवासों का नाम इन परिवारों के नाम पर दर्ज किया गया या फिर किसी और के नाम पर इन्हें आवास दिया गया। यह मामला अब जांच का विषय बन चुका है। जांच में यह भी सामने आया कि इन परिवारों के पास राशन कार्ड भी हैं और उनके आधार कार्ड भी बनवाए गए हैं। इस संदिग्ध गतिविधि का पता चलते ही खुफिया विभाग ने तुरंत अपनी टीम भेजी और मामले की गहरी जांच शुरू कर दी।

    पुलिस और खुफिया विभाग की जांच

    भोजपुर पुलिस ने भी इस मामले की गंभीरता को समझते हुए जांच शुरू की है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि इस गड़बड़ी में किसकी भूमिका है। एसएसपी सतपाल अंतिल ने बताया कि मामले की जांच पूरी होने के बाद ही इस पर कोई बयान दिया जा सकेगा। फिलहाल खुफिया विभाग और पुलिस विभाग के अधिकारी पूरी स्थिति की जांच कर रहे हैं और मामले के सभी पहलुओं को उजागर करने का प्रयास कर रहे हैं।

    फर्जी वोटर बनाने की कोशिश

    गांव में फर्जी वोटर बनाने की प्रक्रिया का खुलासा होने के बाद जांच टीम ने यह पुष्टि की कि 92 लोगों में से केवल 10 परिवारों ने ही वोटर बनने के लिए अपना गणना प्रपत्र भरा था और इन सभी ने इसे केवल महिलाओं के नाम से भरा था। इस प्रक्रिया में भी कई असंगतियां पाई गईं और यही कारण है कि जांच की दिशा और तेज़ कर दी गई है। रानी नागल गांव में हो रही इस सरकारी योजनाओं की गड़बड़ी से सवाल उठ रहे हैं कि क्या अधिकारियों ने इन गतिविधियों पर सही समय पर नजर नहीं रखी। यह मामला न केवल भ्रष्टाचार और सरकारी प्रणाली की नाकामी को उजागर करता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि गलत तरीके से योजनाओं का लाभ उठाने की कोशिश की जा रही थी। खुफिया विभाग और पुलिस की जांच अब यह निर्धारित करेगी कि इन गतिविधियों में कितनी साजिश शामिल थी और इसके पीछे कौन लोग थे।

  • उत्तर प्रदेश में भूतों ने एक रात में बनाया शिव मंदिर जानिए इसके रहस्यमयी इतिहास के बारे में

    उत्तर प्रदेश में भूतों ने एक रात में बनाया शिव मंदिर जानिए इसके रहस्यमयी इतिहास के बारे में


    नई दिल्ली । भारत में भगवान शिव के अनेक प्रसिद्ध मंदिर हैं जिनसे जुड़ी कई रहस्यमयी और दिलचस्प मान्यताएं प्रचलित हैं। इनमें से कई मंदिरों का संबंध देवताओं ऋषि-मुनियों या प्रमुख धार्मिक हस्तियों से होता है। मगर उत्तर प्रदेश में स्थित एक शिव मंदिर के निर्माण को लेकर एक अनोखी और हैरान करने वाली मान्यता है जिसमें दावा किया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भूतों ने किया था। खास बात यह है कि मंदिर की संरचना और इसकी ईंटें इतनी अद्वितीय हैं कि इस पर यकीन करना काफी मुश्किल हो सकता है।

    यह मंदिर उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में स्थित है और इसके निर्माण से जुड़ी किंवदंती काफी पुरानी है। यह माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण सिर्फ एक रात में हुआ था। जब गांव में भूतों की कहानी प्रचलित हुई तो लोगों का ध्यान इस मंदिर की ओर आकर्षित हुआ। खास बात यह है कि मंदिर की सभी ईंटें एक ही रंग की हैं जो आमतौर पर देखने में बहुत ही असामान्य होती हैं। कहा जाता है कि रात के अंधेरे में भूतों ने मिलकर इस मंदिर का निर्माण किया और सुबह होते ही मंदिर पूरी तरह से तैयार था।

    मंदिर के निर्माण के समय की कहानी काफी दिलचस्प और रहस्यमयी मानी जाती है। किंवदंती के अनुसार गांव में एक पुराना शिव मंदिर था लेकिन वह काफी जर्जर हो चुका था और उसकी स्थिति बहुत ही खराब थी। गांव के लोग चाहते थे कि इस मंदिर को फिर से नया रूप मिले लेकिन इसके लिए किसी तरह का कोई प्रयास नहीं हो पा रहा था। एक रात जब गांव में कोई नहीं था तो भूतों ने रात भर मेहनत करके इस मंदिर का निर्माण किया। सुबह होते ही गांववाले यह देख कर हैरान रह गए कि एक रात में मंदिर बनकर तैयार हो गया था।

    मंदिर के निर्माण को लेकर जितनी भी कथाएं प्रचलित हैं वे सभी काफी रोमांचक और रहस्यमयी हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह मंदिर भगवान शिव की कृपा से बना है और भूतों ने उनकी प्रेरणा से इस मंदिर का निर्माण किया। वहीं कुछ लोग इसे एक अद्वितीय घटना मानते हैं जो बिना किसी भौतिक कारण के घटित हुई। मंदिर की ईंटों के रंग की विशेषता भी इस घटना को और अधिक रहस्यमयी बनाती है। मंदिर की दीवारें और छत पर उकेरी गई आकृतियाँ भी काफी असामान्य हैं और इन्हें देखकर कोई भी यह कह सकता है कि यह कुछ अलौकिक शक्तियों का काम है।

    मंदिर के अंदर शिवलिंग की स्थापना है और वहां पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालु आते रहते हैं। भक्तों का मानना है कि इस मंदिर में शिवजी की विशेष कृपा है और यहां आने से उनके सभी दुख दूर हो जाते हैं। मंदिर का माहौल बहुत ही शांत और ध्यानमग्न है जो भक्तों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है।

    इस मंदिर का इतिहास न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह रहस्यों और किंवदंतियों से भी भरा हुआ है। जो लोग इस मंदिर का दौरा करते हैं वे इसके रहस्यमयी इतिहास और उसकी अनकही कहानियों के बारे में सुनकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं। हालांकि इस मंदिर के निर्माण के सही कारणों का पता लगाना संभव नहीं हो पाया है लेकिन यह कहानी आज भी लोगों में एक जिज्ञासा और आकर्षण का कारण बन चुकी है।

    कुल मिलाकर यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि इसकी रहस्यमयी उत्पत्ति और निर्माण की कहानी इसे एक अनोखा स्थान बनाती है। यह स्थान उन लोगों के लिए एक आकर्षण का केंद्र बन चुका है जो रहस्य इतिहास और धर्म के बीच के कनेक्शन को समझने में रुचि रखते हैं।

  • जानें—कार में ब्लैक-फिल्म लगाने पर कितना जुर्माना लगता है, किसे है छूट..

    जानें—कार में ब्लैक-फिल्म लगाने पर कितना जुर्माना लगता है, किसे है छूट..


    नई दिल्ली/ हाल ही में देश के कई राज्यों में कारों पर ब्लैक या टिंटेड फिल्म लगाने वालों पर पुलिस ने सख्त कार्रवाई तेज कर दी है। दिल्ली यातायात पुलिस ने सिर्फ एक हफ्ते में 2,235 से अधिक चालान काटे, जबकि उत्तर प्रदेश के मेरठ में ‘ऑपरेशन ब्लैक कैट’ चलाकर तीन दिन में 454 वाहनों पर चालान किए गए। आंकड़े बताते हैं कि लाखों लोग अब भी इस नियम को या तो जानते नहीं, या जानबूझकर उसका उल्लंघन करते हैं। सिर्फ दिल्ली में पिछले एक साल में 20,232 चालान ब्लैक फिल्म को लेकर किए गए। लेकिन आखिर ब्लैक फिल्म हटाने पर इतनी कड़ाई क्यों है? इसका सीधा संबंध सड़क सुरक्षा, कानून व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा से है।

    लोग ब्लैक फिल्म क्यों लगवाते हैं?
    अक्सर कार मालिक कुछ कारणों से ब्लैक/टिंटेड फिल्म लगवा लेते हैं- कार के अंदर गर्मी को कम करने के लिए  ज़्यादा प्राइवेसी पाने के लिए मॉडिफिकेशन और लग्जरी लुक के शौक के चलते  कानून की जानकारी न होने के कारण  लेकिन फायदे के बावजूद यह पूरी तरह अवैध है-चाहे फिल्म हल्की ही क्यों न हो या VLT मानकों को पूरा करती हो।

    कानून क्या कहता है?
    इस विषय में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सबसे महत्वपूर्ण है।सुप्रीम कोर्ट का 2012 का आदेश Abhishek Goenka vs Union of India कोर्ट ने साफ कहा- कार खरीदने के बाद बाहर से किसी भी प्रकार की फिल्म लगवाना गैर-कानूनी है, चाहे वह ब्लैक हो, कलर्ड हो, स्मोक्ड हो या हल्की ही क्यों न हो।पुलिस को अधिकार है कि वह मौके पर फिल्म उतरवाए और चालान करे।

    CMVR नियम 100 (1989)
    यह नियम फैक्ट्री में बने ग्लास के VLT Visible Light Transmission मानक तय करता है-फ्रंट और रियर विंडशील्ड – कम से कम 70% विजिबिलिटी साइड विंडो – कम से कम 50% विजिबिलिटी अर्थात् कार कंपनियां हल्का टिंट दे सकती हैं लेकिन यह फैक्ट्री से ही होना चाहिए और मानक के भीतर होना चाहिए। बाजार में लगवाई गई कोई भी फिल्म अवैध है।

    ब्लैक फिल्म से होने वाले खतरे

    1. सड़क सुरक्षा को बड़ा जोखिम
    ब्लैक या स्मोक्ड फिल्म से विजिबिलिटी 40–70% तक कम हो जाती है।
    रात, धुंध, बारिश या हाईवे पर इससे दुर्घटना की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

    2. अपराधों को बढ़ावा
    पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि- ब्लैक फिल्म के कारण कार के अंदर क्या हो रहा है, यह बाहर से दिखाई नहीं देता। अपहरण, छेड़छाड़, तस्करी और कई आपराधिक गतिविधियों में ऐसे वाहनों का उपयोग बढ़ता है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें सुरक्षा के लिए खतरा बताया था।

    कितना जुर्माना लगता है?

    अधिकतर राज्यों में चालान- 100 से 1,000 कुछ राज्यों में इसे बढ़ाकर- ₹2,000 तक कर दिया गया है। बार-बार पकड़े जाने पर जुर्माना और अधिक लगाया जा सकता है। पुलिस मौके पर फिल्म उतरवाने का अधिकार भी रखती है।

    किन लोगों को छूट मिलती है?

    केवल Z+ या Z श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त VIPs को वह भी सरकारी अनुमति पत्र के साथ।
    Ministers, MPs, MLAs, Judges-किसी को भी व्यक्तिगत छूट नहीं। छूट सिर्फ विशेष सुरक्षा श्रेणी के लिए है। फिल्म हटाने का सुरक्षित तरीका फिल्म को खींचकर नहीं उतारें। हेयर ड्रायर या हीट गन से ग्लास को हल्का गर्म करें। किनारे से धीरे-धीरे फिल्म निकालें। बचा गोंद ग्लास क्लीनर या साबुन-पानी से साफ करें।

    क्या इससे इंश्योरेंस क्लेम पर असर पड़ता है?

    हाँ! अवैध मॉडिफिकेशन होने पर- क्लेम कम किया जा सकता है या पूरी तरह रिजेक्ट भी हो सकता है अगर पहले चालान हो चुका है  तो बीमा कंपनी इसे रूल वायलेशन मानकर केस और सख्ती से जांचती है।

    पुलिस कैसे जांच करती है?

    VLT मीटर टिंट मीटर से विजुअल इंस्पेक्शन – अगर फिल्म साफ दिख रही हो, तो चालान तुरंत

     किया जाता है।