थोक महंगाई में बढ़ोतरी, लेकिन रोजमर्रा की खाने की वस्तुएं नहीं हुईं महंगी


नई दिल्ली। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय से बुधवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 में थोक कीमतों पर आधारित भारत की महंगाई दर (WPI) 0.83 प्रतिशत रही। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से विनिर्मित वस्तुओं और खनिजों की कीमतों में इजाफे के कारण हुई। खाने-पीने की चीजों की थोक कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई, इसलिए खाद्य महंगाई दर शून्य प्रतिशत रही। इसका मतलब यह है कि पिछले साल की तुलना में खाने की चीजें महंगी नहीं हुईं, जिससे आम जनता को राहत मिली।

विनिर्मित वस्तुओं और अन्य समूहों का असर
थोक महंगाई में सबसे बड़ा हिस्सा रखने वाले विनिर्मित वस्तुओं के समूह का वजन 64.23 प्रतिशत है। दिसंबर में इस समूह की कीमतों में 0.41 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस समूह में शामिल 22 उत्पादों में से 13 की कीमतें बढ़ीं, 8 उत्पादों की कीमतें घटीं और एक उत्पाद की कीमत में कोई बदलाव नहीं हुआ। कीमतों में बढ़ोतरी मुख्य रूप से मूल धातुएं, रसायन और रासायनिक उत्पाद, वस्त्र और गैर-धातु खनिज उत्पादों में हुई।

वहीं, रबर और प्लास्टिक उत्पाद, खाद्य उत्पाद, कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक सामान, कागज और पेय पदार्थों की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई।

पिछले महीनों का रुझान
नवंबर 2025 में थोक महंगाई दर -0.32 प्रतिशत थी, जबकि अक्टूबर में यह -1.21 प्रतिशत रही थी। पिछले साल नवंबर में थोक महंगाई 2.16 प्रतिशत थी। दिसंबर में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित खुदरा महंगाई दर 1.33 प्रतिशत रही, जो नवंबर के 0.71 प्रतिशत से थोड़ी अधिक है।
खाद्य महंगाई लगातार सातवें महीने नकारात्मक रही (-2.71 प्रतिशत), जिससे आम लोगों के घर के बजट को स्थिरता और राहत मिली।

आरबीआई की प्रतिक्रिया और आर्थिक संकेत
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए महंगाई का अनुमान 2.6 प्रतिशत से घटाकर 2 प्रतिशत कर दिया। आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि महंगाई घटने के कारण रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की कटौती की गई है, जो अब 5.25 प्रतिशत हो गई है।

उन्होंने कहा कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 8.2 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि और महंगाई में गिरावट ने भारत को एक खास ‘सुनहरा समय’ दिया है, जिसमें विकास और स्थिरता दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।

कुल मिलाकर, दिसंबर 2025 में महंगाई नियंत्रण में रही, विनिर्मित वस्तुओं में मामूली बढ़ोतरी और खाद्य महंगाई में लगातार कमी ने आर्थिक स्थिरता बनाए रखी। आम लोगों के लिए खर्च करने की क्षमता बढ़ी और RBI ने रेपो रेट में कटौती कर आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया।