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  • महिलाओं को संसद-विधानसभाओं में तत्काल 33% आरक्षण देने की मांग… SC में आज होगी सुनवाई

    महिलाओं को संसद-विधानसभाओं में तत्काल 33% आरक्षण देने की मांग… SC में आज होगी सुनवाई


    नई दिल्ली।
    देशभर में जहां एक ओर महिलाओं को संसद और विधानसभा (Parliament and Legislative Assemblies) में 33% आरक्षण (33% Women Reservation ) देने के मुद्दे को लेकर सियासत तेज हो गई है। वहीं दूसरी ओर अब इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में अहम सुनवाई होने जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) आज यानी सोमवार 13 अप्रैल को इस मामले पर सुनवाई करेगा। यह याचिका कांग्रेस नेता जया ठाकुर (Jaya Thakur) ने दाखिल की है। इसमें मांग की गई है कि महिलाओं को आरक्षण देने वाला कानून नारी शक्ति वंदन अधिनियम तुरंत लागू किया जाए और इसे जनगणना व परिसीमन से न जोड़ा जाए।

    फिलहाल इस कानून में यह प्रावधान है कि महिलाओं को 33% आरक्षण तभी मिलेगा, जब अगली जनगणना और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। लेकिन याचिका में कहा गया है कि यह शर्त जरूरी नहीं है, क्योंकि सीटों की संख्या पहले से तय है और देश की लगभग आधी आबादी होने के बावजूद महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है।


    जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच करेगी सुनवाई

    इस मामले की सुनवाई जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच करेगी। इससे पहले 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कानून के इस प्रावधान को रद्द करना बहुत मुश्किल होगा। यह सुनवाई इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि 16 अप्रैल से संसद का विशेष सत्र शुरू होने वाला है, जिसमें महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए संशोधन बिल लाया जा सकता है।


    पीएम मोदी ने सभी नेताओं से की है अपील

    बता दें कि इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को पत्र लिखकर इस कानून को सर्वसम्मति से पास करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि देश को विकसित बनाने के लिए महिलाओं की ज्यादा भागीदारी जरूरी है। हालांकि, कांग्रेस ने इस विशेष सत्र का विरोध किया है। पार्टी का कहना है कि यह कदम चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन हो सकता है, क्योंकि इस समय तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। साथ ही कांग्रेस ने मांग की है कि पहले परिसीमन पर सभी दलों की बैठक होनी चाहिए, उसके बाद ही महिला आरक्षण पर आगे बढ़ना चाहिए।

  • बदलेगा संसद का स्वरूप…! लोकसभा में महिलाओं के लिए 273 सीटें बढ़ाने की तैयारी… 409 होगा बहुमत का आंकड़ा?

    बदलेगा संसद का स्वरूप…! लोकसभा में महिलाओं के लिए 273 सीटें बढ़ाने की तैयारी… 409 होगा बहुमत का आंकड़ा?


    नई दिल्ली।
    सरकार (Government) संसद (Parliament) के मौजूदा सत्र में महिला आरक्षण (Women’s Reservation) को लागू करने के लिए कम से कम दो विधेयक (Bills) (संविधान संशोधन सहित) पेश करने की तैयारी कर रही है। इसके तहत अगले लोकसभा (Lok Sabha) और उसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित की जाएंगी। इस कदम से देश का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह से बदलने की उम्मीद है।


    लोकसभा की सीटों में 50% का इजाफा

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार की योजना के अनुसार लोकसभा की कुल सीटें मौजूदा 543 से बढ़ाकर 816 की जा सकती हैं। यानी 273 नई सीटें जोड़ी जाएंगी, जिनमें से अधिकांश महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इससे संसद में बहुमत का आंकड़ा भी बढ़कर 409 हो जाएगा।

    यह वृद्धि पिछले पांच दशकों में पहली बार होगी। इससे मौजूदा पुरुष सांसदों की राजनीतिक स्थिति पर कोई खतरा नहीं मंडराएगा। राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों की सदस्य संख्या पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।


    परिसीमन और 2011 की जनगणना का इस्तेमाल

    2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ में महिला आरक्षण को नई जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ा गया था। अब सरकार इस प्रावधान को अलग कर रही है। नई जनगणना के आंकड़ों में समय लग सकता है, इसलिए सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही नया परिसीमन कराने पर विचार कर रही है ताकि 31 मार्च 2029 के बाद होने वाले चुनावों में यह कोटा लागू किया जा सके।


    राज्यों और SC/ST सीटों पर असर

    दक्षिण भारतीय राज्यों की यह चिंता थी कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन के कारण संसद में उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है। सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि हर राज्य की सीटों में 50% की वृद्धि होगी, जिससे उनका आनुपातिक प्रतिनिधित्व बरकरार रहेगा।
    उत्तर प्रदेश: सीटें 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी।
    बिहार: सीटें 40 से बढ़कर 60 हो जाएंगी।
    केरल: सीटें 20 से बढ़कर 30 हो जाएंगी।

    इसी अनुपात में अनुसूचित जाति (SC) की सीटें 84 से बढ़कर 126 और अनुसूचित जनजाति (ST) की सीटें 47 से बढ़कर 70 हो जाने का अनुमान है। छोटे राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों (जहां केवल 1 या 2 सीटें हैं) में हर तीसरे चुनाव में महिलाओं के लिए रोटेशन के आधार पर सीट आरक्षित की जाएगी।


    राजनीतिक सरगर्मी और आगे की राह

    सरकार 4 अप्रैल को समाप्त हो रहे बजट सत्र में ही इन विधेयकों को पारित कराने की इच्छुक है। यदि सहमति बनाने में कुछ और दिन लगते हैं, तो बजट सत्र को बढ़ाया जा सकता है या महिलाओं के कोटे के लिए एक विशेष छोटा सत्र भी बुलाया जा सकता है।


    अमित शाह की बैठकें

    संविधान संशोधन के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जो NDA के पास अकेले नहीं है। इसलिए गृह मंत्री अमित शाह समर्थन जुटाने के लिए बैठकें कर रहे हैं। उन्होंने NDA के सहयोगियों के साथ-साथ सपा, शिवसेना (UBT), बीजेडी और YSR कांग्रेस जैसे विपक्षी और गैर-गठबंधन दलों के साथ भी चर्चा की है।

    कांग्रेस और वामपंथी दलों ने इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने अमित शाह की बैठक से किनारा कर लिया। वहीं, कांग्रेस और सपा जैसी पार्टियां महिला कोटे के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए अलग से आरक्षण की मांग कर रही हैं।

  • Inter-Religious विवाह में महिलाओं की धार्मिक पहचान के मामले में SC कर रहा सुनवाई

    Inter-Religious विवाह में महिलाओं की धार्मिक पहचान के मामले में SC कर रहा सुनवाई


    नई दिल्ली।
    क्या अंतर-धार्मिक विवाह (Inter-Religious Marriage) करने पर महिलाओं को उनकी धार्मिक पहचान से वंचित किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) इस मामले पर सुनवाई कर रहा है। ताजा केस पारसी समुदाय से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ता दीना बुढ़राजा ने नागपुर पारसी पंचायत के नियम 5(2) को चुनौती दी है। इस नियम के अनुसार, अगर कोई पारसी महिला गैर-पारसी से विवाह करती है तो उसकी धार्मिक पहचान समाप्त कर दी जाती है और उसे अगियारी जैसे धार्मिक स्थलों में प्रवेश से वंचित कर दिया जाता है। वहीं, पारसी पुरुषों पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है।

    याचिका में दावा किया गया कि यह नियम लिंग आधारित भेदभावपूर्ण है। साथ ही, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) तथा 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सोमवार को इस याचिका पर सुनवाई की। इसने केंद्र सरकार, नागपुर पारसी पंचायत, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, महाराष्ट्र सरकार और चैरिटी कमिश्नर को नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दिवान ने तर्क दिया कि यह नियम असंवैधानिक है क्योंकि यह केवल महिलाओं को लक्षित करता है और समुदाय की परंपराओं के नाम पर लैंगिक असमानता को बढ़ावा देता है।


    कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा

    अदालत ने माना कि यह मामला महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठाता है और पारसी समुदाय में ऐसे मुद्दे पहले भी बार-बार अदालत में आए हैं। यह नियम नागपुर अगियारी के प्रबंधन से संबंधित है, जो पारसी धार्मिक स्थल है। यह मामला पारसी व्यक्तिगत कानूनों से जुड़ा है, जहां समुदाय की परंपराएं विवाह और धार्मिक पहचान को नियंत्रित करती हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि अंतर-धार्मिक विवाह करने वाली महिला को उसकी जन्मजात धार्मिक पहचान से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा के खिलाफ है।

    विशेष विवाह अधिनियम जैसे कानून अंतर-धार्मिक विवाह की इजाजत देते हैं, जहां दोनों पक्ष अपनी धार्मिक पहचान बनाए रख सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी ऐसे मामलों में कहा है कि विवाह से महिला की धार्मिक पहचान स्वतः पति की धर्म में विलय नहीं होती, जब तक वह स्वेच्छा से परिवर्तन न करे। इस मामले में भी समान सिद्धांत लागू हो सकता है। वर्तमान में मामला प्रारंभिक चरण में है, जहां नोटिस जारी होने के बाद संबंधित पक्षों से जवाब मांगा गया है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला न केवल पारसी समुदाय बल्कि पूरे देश में अंतर-धार्मिक विवाहों और लैंगिक समानता के मुद्दे पर प्रभाव डालेगा।

  • केन्द्र की नई पहल, संसद से लेकर विधानसभाओं में महिलाओं को जल्द 33% आरक्षण देने की तैयारी

    केन्द्र की नई पहल, संसद से लेकर विधानसभाओं में महिलाओं को जल्द 33% आरक्षण देने की तैयारी


    नई दिल्ली।
    संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण (33 Percent Reservation Women) देने को लेकर केंद्र सरकार (Central Government) नई पहल की तैयारी में है। लंबे समय से चर्चा में रहे महिला आरक्षण के मुद्दे पर सरकार अब ऐसा रास्ता तलाश रही है, जिससे इसका लाभ वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले ही लागू किया जा सके। इसके लिए कानून में संशोधन किया जा सकता है।

    वर्ष 2023 में संसद द्वारा पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (‘Women’s Empowerment Act’) के तहत महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। लेकिन इस कानून के अनुसार आरक्षण तभी लागू होना था जब अगली जनगणना पूरी हो जाए और उसके बाद नई परिसीमन प्रक्रिया लागू की जाए। चूंकि जनगणना और परिसीमन दोनों प्रक्रियाओं में काफी समय लग सकता है, इसलिए आशंका जताई जा रही थी कि महिलाओं को आरक्षण का वास्तविक लाभ मिलने में कई वर्ष लग सकते हैं।


    अनौपचारिक बातचीत शुरू

    सूत्रों का कहना है कि इस विषय पर विपक्षी दलों के साथ अनौपचारिक बातचीत भी शुरू कर दी गई है। सरकार का प्रयास है कि संसद में आवश्यक समर्थन जुटाकर महिला आरक्षण को जल्द लागू करने का रास्ता साफ किया जाए। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि इस मुद्दे पर व्यापक सहमति बनती है, तो मौजूदा संसद सत्र में ही संविधान संशोधन विधेयक लाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।


    वरिष्ठजनों को रेल किराये में छूट दें, संसद में मांग

    संसदीय समिति ने एक बार फिर वरिष्ठ नागरिकों को रेल किराये में छूट देने की पुरजोर वकालत की है। समिति ने रेलवे के पहले से सभी यात्रियों को छूट देने से होने वाले घाटे के तर्क को दरकिनार करते हुए कहा कि उक्त मद की धनराशि को रेलवे विज्ञापन अथवा अन्य तरीके से पूरा कर सकता है।

    विदित हो कि वरिष्ठ नागरिक सहित अन्य रेल किराये में छूट से रेलवे को सालाना 2,000 करोड़ से अधिक राजस्व का नुकसान होता है। रेलवे संबंधी स्थायी समिति मंगलवार को संसद में पेश अपनी आठवीं रिपोर्ट में भारतीय रेलवे के सामाजिक दायित्व और वित्तीय अनुशासन के बीच तालमेल बिठाने की सलाह दी है। सांसद डा. सीएम रमेश की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए रियायत को फिर से शुरू किया जाता है, तो रेलवे पर सालाना लगभग 2,000 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा।

    समिति ने मंत्रालय को सुझाव दिया है कि इसे केवल स्लीपर और थर्ड एसी (एसी-3) जैसी श्रेणियों तक सीमित रखकर इस बोझ को कम किया जा सकता है, ताकि जरूरतमंद बुजुर्गों को लाभ मिले और रेलवे की आर्थिक स्थिति भी न बिगड़े। वरिष्ठ नागरिक को रियायत देना केवल एक वित्तीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक सामाजिक कर्तव्य है। इसलिए मंत्रालय को मानवीय आधार पर रियायतें बहाल करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

  • Women's Day: महिलाओं के सम्मान का दिन…. हाउसमेकर हो कामकाजी, जानें अपने ये 5 अधिकार

    Women's Day: महिलाओं के सम्मान का दिन…. हाउसमेकर हो कामकाजी, जानें अपने ये 5 अधिकार


    नई दिल्ली।
    हर साल की तरह आज भी 8 मार्च को पूरे विश्व में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (International Women’s Day) मनाया जा रहा है। ये दिन हर महिला को सम्मान (Women Respect) देने के लिए होता है, भले ही वो हाउसमेकर (Housemaker) हो, या फिर कामकाजी महिला (Working Woman) हों।

    महिला दिवस केवल उत्सव और सम्मान का दिन नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के अधिकारों, सुरक्षा और सशक्तिकरण के महत्व को समझने का अवसर भी है। सही जानकारी और जागरूकता ही महिलाओं को अपने जीवन में स्वतंत्र निर्णय लेने, समान अवसर पाने और समाज में सम्मान सुनिश्चित करने में मदद करती है।

    आज हम आपको पांच ऐसे अहम अधिकारों के बारे में बताएंगे, जिनका हर महिला को पता होना चाहिए। ये अधिकार न केवल उन्हें सशक्त बनाते हैं, बल्कि घर और समाज में उनकी सुरक्षा और सम्मान भी सुनिश्चित करते हैं। महिला दिवस पर इन अधिकारों को जानना और अपनाना हर महिला के लिए एक जरूरी कदम है।


    1. शिक्षा का अधिकार

    भारतीय संविधान की अनुच्छेद 15(1) और 15(3) महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को रोकते हैं और शिक्षा के समान अवसर सुनिश्चित करते हैं। ऐसे में कोई भी परिवार ये नहीं कह सकता कि वो सिर्फ अपने घर के लड़कों को पढ़ने भेजेगा, और लड़कियों को नहींं।


    2. स्वास्थ्य का अधिकार

    भारतीय कानून के तहत महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं मिलना अनिवार्य है। मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 सुरक्षित प्रसव और मातृत्व अवकाश सुनिश्चित करता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति और प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से महिलाओं की स्वास्थ्य सुरक्षा को कानूनी मान्यता दी गई है।


    3. समान वेतन और रोजगार का अधिकार

    भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39(a) और 39(d) समान वेतन और काम के समान अवसर सुनिश्चित करता है। इसके अलावा भेदभाव उन्मूलन अधिनियम 1976 के तहत पुरुष और महिला कर्मचारियों को समान काम के लिए समान वेतन देना अनिवार्य है।


    4. सुरक्षा का अधिकार

    भारतीय संविधान की अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देती है। इसके अलावा महिला सुरक्षा कानून जैसे घरेलू हिंसा अधिनियम 2005, शोषण रोकथाम अधिनियम और धारा 498A महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।


    5. संपत्ति और आर्थिक स्वतंत्रता का अधिकार

    भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के तहत बेटियों को पिता की संपत्ति में बराबर हिस्सा मिलता है। इसके अलावा अनुच्छेद 15 और 19 महिलाओं को आर्थिक निर्णय और व्यापार करने का अधिकार भी सुनिश्चित करते हैं। महिलाएं अपने बैंक खाता और निवेश पर स्वतंत्र निर्णय ले सकती हैं।

  • आज महिला दिवस पर काशी विश्वनाथ मंदिर में महिलाओं के लिए खास पहल, वीआईपी दर्शन और फ्री एंट्री

    आज महिला दिवस पर काशी विश्वनाथ मंदिर में महिलाओं के लिए खास पहल, वीआईपी दर्शन और फ्री एंट्री


    नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर काशी विश्वनाथ मंदिर ने महिलाओं के लिए एक खास पहल की है। इस दिन मंदिर प्रशासन ने महिलाओं को विशेष वीआईपी दर्शन और मुफ्त प्रवेश की सुविधा देने की घोषणा की है, ताकि श्रद्धालु महिलाएं बाबा विश्वनाथ के दर्शन आसानी से कर सकें और महिला दिवस को एक आध्यात्मिक अनुभव के रूप में मना सकें।

    गेट नंबर 4-बी से मिलेगा निशुल्क प्रवेश

    मंदिर प्रशासन के अनुसार आज रविवार को सभी महिला श्रद्धालुओं के लिए गेट नंबर 4-बी से विशेष प्रवेश की व्यवस्था की गई है। चाहे महिलाएं काशी की निवासी हों या बाहर से आई हों, सभी को इस दिन निशुल्क दर्शन का अवसर मिलेगा। इस व्यवस्था के तहत महिलाएं सीधे बाबा विश्वनाथ की झांकी तक पहुँच सकेंगी और किसी भी प्रकार का टिकट लेने की आवश्यकता नहीं होगी।

    बच्चों के साथ आई महिलाओं को मिलेगी प्राथमिकता

    काशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन ने यह भी कहा कि जो महिलाएं अपने छोटे बच्चों के साथ आएंगी, उन्हें विशेष प्राथमिकता दी जाएगी। बालक या बालिका के साथ आई महिलाओं को पहले प्रवेश मिलेगा। मंदिर में आने वाली महिलाओं को भीड़ से बचाने और सहज दर्शन कराने के लिए अलग व्यवस्था की गई है, ताकि लंबी कतारों में खड़े होने की परेशानी न हो।

    सीईओ ने दी जानकारी

    काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विश्वभूषण मिश्रा ने बताया कि महिला दिवस पर सुबह चार बजे से पांच बजे तक और शाम चार बजे से पांच बजे तक का समय काशीवासियों के लिए आरक्षित रहेगा। इस दौरान पहले से चल रही विशेष दर्शन व्यवस्था जारी रहेगी। दिन के बाकी समय में महिलाओं के लिए वीआईपी प्रवेश और दर्शन की विशेष सुविधा लागू रहेगी।

    आसान और सम्मानजनक दर्शन का उद्देश्य

    मंदिर प्रशासन का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य महिलाओं को सम्मान देना और उन्हें सहज तरीके से दर्शन कराने का अवसर प्रदान करना है। हर साल बड़ी संख्या में महिलाएं काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन करने आती हैं और महिला दिवस पर यह सुविधा उनके लिए एक विशेष उपहार की तरह है।

    महिलाओं के लिए अनूठा अनुभव

    वीआईपी दर्शन और मुफ्त प्रवेश की यह व्यवस्था महिला श्रद्धालुओं के लिए एक यादगार अनुभव साबित होगी। कई महिलाएं दूर-दूर से बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने आती हैं, और इस सुविधा के कारण उनकी यात्रा और भी सुखद और आरामदायक बन जाएगी।

    काशी विश्वनाथ मंदिर की धार्मिक महत्ता

    काशी विश्वनाथ मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध और पवित्र मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं। काशी को भगवान शिव की नगरी माना जाता है और मंदिर के पुनर्विकास के बाद यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या और भी बढ़ गई है।

    मंदिर प्रशासन की सकारात्मक पहल

    महिला दिवस पर वीआईपी दर्शन की यह सुविधा मंदिर प्रशासन की एक सकारात्मक पहल मानी जा रही है। इससे न केवल महिलाओं को विशेष सम्मान मिलेगा, बल्कि यह दिखाता है कि धार्मिक स्थलों पर भी महिलाओं की सुविधा और सम्मान का ध्यान रखा जा रहा है।

  • हिजाब हटाने को लेकर विवाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से माफी की मांग इमारत-ए-शरिया के सचिव भड़के

    हिजाब हटाने को लेकर विवाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से माफी की मांग इमारत-ए-शरिया के सचिव भड़के


    पटना । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक महिला आयुष चिकित्सक के चेहरे से हिजाब हटाने का विवाद तूल पकड़ता जा रहा है। इस घटना पर अब इमारत-ए-शरिया के सचिव मौलाना मुफ्ती मोहम्मद सईदउर रहमान कासमी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री को ऐसा नहीं करना चाहिए था और इस कदम की सख्त निंदा करते हुए उन्होंने नीतीश कुमार से माफी की मांग की है।

    घटना उस समय की है जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक कार्यक्रम में नवनियुक्त आयुष चिकित्सकों को नियुक्ति पत्र दे रहे थे। कार्यक्रम के दौरान जब नुसरत परवीन नामक महिला चिकित्सक की बारी आई तो वह हिजाब पहने हुए थीं। मुख्यमंत्री ने यह देखकर कहा यह क्या है और फिर महिला के चेहरे से हिजाब हटा दिया। इससे महिला असहज हो गई और एक अधिकारी ने जल्दी से उन्हें एक और कर दिया। इस घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया जिस पर इमारत-ए-शरिया के सचिव ने तीखी प्रतिक्रिया दी।

    मौलाना रहमान कासमी ने कहा कि पर्दा महिलाओं और समाज की इज्जत है और हिजाब को हटाना महिला का अपमान है। मुख्यमंत्री को ऐसा नहीं करना चाहिए था क्योंकि यह महिलाओं की इज्जत और गरिमा की तौहीन है। उन्होंने यह भी कहा कि नीतीश कुमार को माफी मांगनी चाहिए क्योंकि उन्होंने महिला के सम्मान को ठेस पहुंचाई है।

    मुख्यमंत्री कार्यालय ने हालांकि इस घटना पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन यह मामला अब राजनीति में भी गहरे विवाद का कारण बन गया है। विपक्षी दलों खासकर राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने इस वीडियो को साझा करते हुए इसे मुख्यमंत्री की मानसिक स्थिति पर सवाल उठाया है। राजद ने एक्स पर पोस्ट किया नीतीश जी का क्या हो गया है अब उनकी मानसिक स्थिति पूरी तरह से अस्थिर हो गई है।

    मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार सरकार ने हाल ही में 685 आयुर्वेद 393 होम्योपैथी और 205 यूनानी पद्धति के चिकित्सकों को नियुक्त किया था जिनमें से कुछ को मंच से नियुक्ति पत्र सौंपे गए थे। हालांकि यह घटना और इसके बाद की प्रतिक्रिया राज्य की राजनीति में नई बहस का कारण बन गई है। विपक्षी नेताओं ने इसे नीतीश कुमार के विचारधारा परिवर्तन के रूप में भी देखा है और इसपर तीखे हमले किए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह विवाद आने वाले समय में बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है।

  • यूरोप के इस देश में पति किराए पर ले रही महिलाएं….यहां पुरुषों की भारी कमी

    यूरोप के इस देश में पति किराए पर ले रही महिलाएं….यहां पुरुषों की भारी कमी


    रीगा।
    यूरोपीय देश लातविया (European country Latvia) इस समय एक गंभीर लैंगिक समस्या (Serious Gender Problem) का सामना कर रहा है। हालात यह हो गए हैं कि यहां पर महिलाओं (Women) के बीच में घंटों के हिसाब से पति किराए पर लेने की सेवा में तेजी आई है। इन अस्थायी पतियों की सहायता से यह महिलाएं घर के छोटे-मोटे काम जैसे मरम्मत या घरेलू जिम्मेदारियों को पूरा करती है। इसके अलावा वह अकेलेपन की जिंदगी में बात करने के लिए भी प्रभावी होते हैं।

    न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक लातवियाई समाज की यह हालत गंभीर लैंगिक असंतुलन की वजह से हुई है। इस देश में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में 15.5 फीसदी तक कम है। यह अनुपात यूरोपीय संघ के लैंगिक अनुपात से तीन गुना कम है। वर्ल्ड एटलस की रिपोर्ट के मुताबिक लातविया में पुरुषों की औसत उम्र भी महिलाओं से कम है। यहां पर 65 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में दो गुनी है।

    रिपोर्ट में कहा गया कि देश में पुरुषों की कमी स्पष्ट रूप रे रोजमर्रा की जिंदगी में भी नजर आ जाती है। फेस्टिवल ऑर्गनाइज करवाने का काम करने वाली दानिया नाम की एक महिला ने बताया कि उसके सभी सहकर्मी महिलाएं ही हैं। ऐसा नहीं है कि उन्होंने भर्ती करने के लिए पुरुषों को नहीं तलाशा… उन्होंने ऐसा किया था, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया। दानिया की दोस्त जेन ने बताया कि देश में पुरुषों की संख्या का कम होना स्वाभाविक रूप से नजर आ जाता है। हालात यह है कि कई लातवियाई महिलाएं विकल्प कम होने की वजह से शादी के लिए विदेश जाने को मजबूर हैं।

    देश में पुरुषों की कमी की वजह से कई ऐसी महिलाएं हैं, जो बिना साथी के ही रह रही हैं। ऐसे में इस देश में हैंडिमेन किराए पर मिलने की सेवाओं का प्रचलन भी तेजी के साथ बढ़ रहा है। यह प्लेटफार्म ऐसे पुरुषों को उपलब्ध कराते हैं,जो प्लंबिंग, बढ़ईगिरी, मरम्मत जैसे कामों को बढ़िया तरीके से करते हैं। इसके अलावा बेहतर बातें भी करते हैं। एक और कंपनी है, जो घंटे भर के लिए पति किराए पर देने का काम करती है। इसमें फोन के माध्यम से या ऑनलाइन बुक करने पर एक आदमी तुरंत घर पहुंचकर घरेलू कामों में मदद करता है।


    क्या है पुरुषों की कमी का कारण

    विशेषज्ञों के मुताबिक लातविया में लैंगिक समस्या का मुख्य कारण पुरुषों की कम जीवन प्रत्याशा दर है। इसके पीछे धुम्रपान की उच्च दर और जीवनशैली से जुड़ी समस्याएं प्रमुख हैं।