वैश्विक व्यापार पर मंडराया खतरा: बाब-अल-मंदेब पर संकट, भारतीय नौसेना सतर्क


नई दिल्ली । नई दिल्ली में वेस्ट एशिया का बढ़ता संघर्ष अब वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी टकराव में अब हूती विद्रोही भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ गई है। हूतियों द्वारा इजरायल पर किए गए मिसाइल हमलों ने इस संघर्ष को और व्यापक बना दिया है।

पहले ही स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज के बाधित होने की आशंका से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है, और अब स्ट्रेट ऑफ बाब-अल-मंदेब पर भी संकट गहराने की संभावना जताई जा रही है। यह अहम समुद्री मार्ग रेड सी और अदन की खाड़ी को जोड़ता है और दुनिया के करीब 12 प्रतिशत व्यापार का रास्ता है।

इसी बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय नौसेना पूरी तरह अलर्ट मोड में है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, ओमान की खाड़ी और अदन की खाड़ी के आसपास उत्तरी अरब सागर में भारतीय नौसेना के कई युद्धपोत तैनात किए गए हैं। एंटी-पायरेसी मिशन के तहत पहले से मौजूद निगरानी को अब और मजबूत किया गया है।

भारतीय नौसेना इस समय कच्चे तेल और एलपीजी ले जाने वाले भारतीय टैंकरों को एस्कॉर्ट कर रही है ताकि उन्हें किसी भी संभावित खतरे से सुरक्षित रखा जा सके। आवश्यकता पड़ने पर भारतीय ध्वज वाले जहाजों को अतिरिक्त सुरक्षा देने की भी तैयारी है।

हालांकि अभी तक हूती विद्रोहियों ने रेड सी में किसी बड़े जहाज को निशाना नहीं बनाया है, लेकिन हालात तेजी से बदल सकते हैं। रक्षा विशेषज्ञ संजय कुलकर्णी का मानना है कि ईरान पर बढ़ते दबाव के चलते हूती इस रणनीतिक मार्ग को ‘वेपोनाइज’ कर सकते हैं, यानी इसे दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।

यदि ऐसा होता है, तो इसका असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया के व्यापार पर पड़ेगा। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। महंगाई बढ़ सकती है, उर्वरकों की कीमतों में इजाफा हो सकता है और निर्यात प्रभावित हो सकता है।

जिबूती जैसे रणनीतिक स्थानों पर अमेरिका, चीन, जापान और फ्रांस की सैन्य मौजूदगी के कारण इस क्षेत्र को पूरी तरह बाधित करना आसान नहीं है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला भी नहीं है। यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा है। एक प्रमुख मार्ग फारस की खाड़ी से होकर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज, ओमान की खाड़ी और अरब सागर तक जाता है, जबकि दूसरा मार्ग स्वेज नहर, रेड सी और अदन की खाड़ी के जरिए अरब सागर से जुड़ता है।

यदि ये दोनों मार्ग प्रभावित होते हैं, तो जहाजों को केप ऑफ गुड होप के लंबे रास्ते से गुजरना पड़ेगा, जिससे समय और लागत दोनों में भारी बढ़ोतरी होगी। भारत के लिए यह स्थिति और भी संवेदनशील है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जो मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, यूएई, रूस और अमेरिका से आता है।

कुल मिलाकर, वेस्ट एशिया में बढ़ता यह संघर्ष अब वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। आने वाले समय में स्थिति किस दिशा में जाएगी, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।