सालासर बालाजी की मूर्ति की खोज की कहानी भी बहुत रोचक है कहा जाता है कि साल 1811 में आसोटा गांव के किसान मोहनदास खेत में हल जोत रहे थे तभी हल किसी नुकीली चीज से टकराया जब उन्होंने खुदाई की तो उन्हें हनुमान जी की मूर्ति मिली मोहनदास उस समय दोपहर का भोजन चूरमा लेकर आए थे उन्होंने उसी चूरमा का भोग अर्पित कर मूर्ति की पूजा की और रात को उन्हें हनुमान जी का सपना आया
सपने में हनुमान जी मोहनदास को दाढ़ी-मूंछों वाले रूप में दिखाई दिए उन्होंने मोहनदास को निर्देश दिया कि मूर्ति को बैलगाड़ी में रखकर वहीं स्थापित करें जहाँ बैल खुद रुक जाए मोहनदास ने वैसा ही किया और बैलगाड़ी वहीं रुकी जहाँ आज सालासर बालाजी धाम स्थित है चूंकि सपने में हनुमान जी दाढ़ी-मूंछों में दिखाई दिए इसलिए मोहनदास ने मूर्ति का शृंगार उसी रूप में किया यही कारण है कि सालासर बालाजी की मूर्ति पूरे देश में अनोखी मानी जाती है
भारत के अधिकांश हनुमान मंदिरों में मूर्तियां युवा और बिना दाढ़ी-मूंछ वाली होती हैं लेकिन सालासर बालाजी इस नियम का अपवाद हैं उनकी दाढ़ी-मूंछ उन्हें प्रौढ़, गंभीर और संकट मोचन स्वरूप में प्रस्तुत करती है भक्त मानते हैं कि इस स्वरूप से बालाजी अधिक शक्तिशाली और भक्तों के लिए तुरंत संकट मोचन बन जाते हैं
सालासर बालाजी धाम में दो प्रमुख मेले लगते हैं पहला मेला हनुमान जयंती पर और दूसरा शरद पूर्णिमा पर इन मेलों में दूर-दूर से भक्त आते हैं यहाँ धार्मिक किताबें हनुमान जी के चित्र चूरमा प्रसाद और पूजा सामग्री उपलब्ध होती है मेले के दौरान मंदिर में भारी भीड़ लगती है
सालासर बालाजी में नारियल चढ़ाने की अनोखी परंपरा भी है भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर लाल कपड़े में नारियल बांधकर मंदिर परिसर के खेजड़ी पेड़ पर चढ़ाते हैं ये नारियल ना तो फेंके जाते हैं ना जलाए जाते हैं इन्हें मंदिर से करीब 11 किलोमीटर दूर मुरड़ाकिया गांव के खेत में गाड़ दिया जाता है यह परंपरा भक्तों की अटूट श्रद्धा का प्रतीक है
सालासर बालाजी धाम भक्ति और विश्वास का केंद्र है यहाँ की दाढ़ी-मूंछ वाली मूर्ति भक्तों के हर संकट को दूर करती है और चूरमा प्रसाद हर भक्त के मन को शांति और विश्वास देता है यदि आप जीवन में किसी समस्या से गुजर रहे हैं तो सालासर बालाजी के दर्शन अवश्य करें
