लोन लेने की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव अकाउंट एग्रीगेटर बना गेमचेंजर होम लोन से MSME तक तेजी से बढ़ा इस्तेमाल


नई दिल्ली। भारत के वित्तीय क्षेत्र में डिजिटल तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच अकाउंट एग्रीगेटर इकोसिस्टम ने कर्ज देने और लेने की प्रक्रिया को नई दिशा दी है। गुरुवार को जारी रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान अकाउंट एग्रीगेटर व्यवस्था के जरिए करीब 3.82 लाख करोड़ रुपए के लोन वितरण में मदद मिली। यह रकम कुल 3.68 करोड़ कर्जों से जुड़ी रही। आंकड़े बताते हैं कि अब रिटेल और एमएसएमई लेंडिंग में अकाउंट एग्रीगेटर की भूमिका पहले के मुकाबले काफी मजबूत हो चुकी है। लोन की कुल राशि के आधार पर इसकी हिस्सेदारी 8.4 प्रतिशत जबकि लोन की संख्या के आधार पर 11.8 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अकाउंट एग्रीगेटर व्यवस्था की खासियत यह है कि इसमें ग्राहक की सहमति के बाद उसकी वित्तीय जानकारी को सुरक्षित तरीके से संबंधित संस्थान के साथ साझा किया जा सकता है। इससे बैंकों और अन्य कर्जदाताओं को संभावित उधारकर्ता की वित्तीय स्थिति समझने और उसकी कर्ज पात्रता का आकलन करने में मदद मिलती है। यही वजह है कि यह व्यवस्था अब केवल छोटे या बिना गारंटी वाले रिटेल लोन तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि सुरक्षित कर्ज के क्षेत्र में भी तेजी से अपनी जगह बना रही है।

रिपोर्ट में सबसे बड़ी बढ़ोतरी होम लोन और लोन अगेंस्ट प्रॉपर्टी के क्षेत्र में देखने को मिली है। वित्त वर्ष 2025-26 में अकाउंट एग्रीगेटर के जरिए ऐसे 1.09 लाख लोन दिए गए जिनकी कुल राशि 20,777 करोड़ रुपए रही। यह पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले 624 प्रतिशत की सालाना बढ़ोतरी है। इससे संकेत मिलता है कि वित्तीय संस्थान बड़े और सुरक्षित कर्जों के लिए भी डिजिटल वित्तीय जानकारी साझा करने वाली इस व्यवस्था को तेजी से अपना रहे हैं।

इस इकोसिस्टम के विस्तार में बैंकों की बढ़ती भागीदारी भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी छमाही में अकाउंट एग्रीगेटर के जरिए वितरित कुल लोन की राशि में बैंकों की हिस्सेदारी 47.3 प्रतिशत रही। यह हिस्सेदारी एनबीएफसी के लगभग बराबर पहुंच गई। इससे साफ है कि मुख्यधारा की बैंकिंग व्यवस्था में भी अकाउंट एग्रीगेटर मॉडल को लेकर भरोसा बढ़ रहा है।

अकाउंट एग्रीगेटर व्यवस्था वित्तीय समावेशन के लिहाज से भी अहम साबित हो सकती है। आंकड़ों के अनुसार एए के जरिए कर्ज पाने वालों में 18.2 प्रतिशत ऐसे लोग थे जिनका पहले कोई औपचारिक क्रेडिट रिकॉर्ड नहीं था। वहीं महिला उधारकर्ताओं की हिस्सेदारी लोन की संख्या में 19.8 प्रतिशत और वितरित राशि में 19.1 प्रतिशत रही। इससे उन लोगों तक औपचारिक कर्ज की पहुंच बढ़ने की संभावना मजबूत होती है जो पारंपरिक क्रेडिट सिस्टम में अब तक सीमित रूप से शामिल थे।

आने वाले समय में इस व्यवस्था का दायरा और बढ़ने की उम्मीद है। जीएसटी सीबीडीटी और ईपीएफओ जैसे वित्तीय और आय संबंधी सूचना स्रोत अगर अकाउंट एग्रीगेटर इकोसिस्टम से और मजबूती से जुड़ते हैं तो नियमित आय और कैश फ्लो के आधार पर कर्ज देने की प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सकता है। इससे रिटेल एमएसएमई और सिक्योर्ड लेंडिंग में नए अवसर खुल सकते हैं और भारत की डिजिटल क्रेडिट व्यवस्था को और गति मिल सकती है।