हाईकोर्ट में बहस से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला, सीजेआई बोले आंख दिखाओगे तो जवाब भी मिलेगा


नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने उस वकील को कड़ी चेतावनी दी है जो हाईकोर्ट में जज से कहासुनी के चलते आपराधिक अवमानना के नोटिस का सामना कर रहे हैं। यह मामला झारखंड हाईकोर्ट से जुड़ा है जहां सुनवाई के दौरान वकील और न्यायाधीश के बीच तनाव की स्थिति बन गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत की गरिमा से ऊपर कोई नहीं है और यदि कोई आंख दिखाने की कोशिश करेगा तो न्यायपालिका भी उसी दृढ़ता से जवाब देगी।

यह पूरा विवाद पिछले साल सोलह अक्तूबर को झारखंड हाईकोर्ट में हुई एक सुनवाई से शुरू हुआ। एडवोकेट महेश तिवारी एक विधवा महिला का पक्ष रख रहे थे जिनका बिजली कनेक्शन एक लाख तीस हजार रुपये से अधिक बकाया होने के कारण काट दिया गया था। सुनवाई के दौरान बहस के तरीके को लेकर न्यायमूर्ति राजेश कुमार ने टिप्पणी की और बाद में राज्य बार काउंसिल के अध्यक्ष से वकील के आचरण पर संज्ञान लेने को कहा।इसी दौरान वकील तिवारी ने न्यायाधीश के प्रति असंतोष जताया और उंगली दिखाते हुए कहा कि वह अपनी शैली में बहस करेंगे और किसी प्रकार के अपमान को स्वीकार नहीं करेंगे। इस घटनाक्रम को न्यायालय की अवमानना मानते हुए झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने वकील के खिलाफ आपराधिक अवमानना का नोटिस जारी कर दिया।

इस नोटिस को चुनौती देने के लिए वकील सुप्रीम कोर्ट पहुंचे जहां सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि अदालत से आदेश केवल यह साबित करने के लिए नहीं मांगे जा सकते कि कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि यदि कोई माफी मांगना चाहता है तो उसे साफ शब्दों में माफी मांगनी चाहिए और यदि कोई जजों को चुनौती देना चाहता है तो न्यायपालिका भी पूरी ताकत से स्थिति को संभालना जानती है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए झारखंड हाईकोर्ट से यह भी कहा कि यदि संबंधित वकील माफी मांग लेते हैं तो उनके प्रति सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जा सकता है। अदालत ने यह संकेत दिया कि न्यायपालिका का उद्देश्य दंड देना नहीं बल्कि मर्यादा और अनुशासन बनाए रखना है।यह मामला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि अदालत में असहमति व्यक्त करने का भी एक मर्यादित तरीका होता है। न्यायिक प्रक्रिया में वकीलों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है लेकिन न्यायालय की गरिमा और सम्मान सर्वोपरि है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न केवल संबंधित वकील के लिए बल्कि पूरे कानूनी समुदाय के लिए एक स्पष्ट संदेश है।