भिंड के दबोह क्षेत्र में संगठित अवैध शराब नेटवर्क: ‘कंजर व्हिस्की’ 30 रुपए में, महिलाओं के भरोसे चलता कारोबार


भिंड । मध्य प्रदेश शहर से लगभग 85 किमी दूर दबोह क्षेत्र में स्थित कंजर डेरा आज एक संगठित और बड़े पैमाने पर चल रहे अवैध शराब नेटवर्क के रूप में चर्चा में है, जहां कच्ची शराब खुलेआम बिना किसी रोक टोक के बिक रही है। स्थानीय लोगों और जांचकर्ताओं के अनुसार यहाँ का यह नेटवर्क इतना व्यवस्थित है कि खरीदारों को कहीं भटकना नहीं पड़ता, बल्कि एक तय शुदा प्रक्रिया के मुताबिक शराब आसानी से उपलब्ध कराई जाती है।

कंजर डेरे में शराब को स्थानीय लोग कंजर व्हिस्की के नाम से जानते हैं, जिसका एक एक पॉलिथीन पाउच महज 30 रुपए में बिकता है। इस कच्ची शराब की बिक्री एक अनूठे तरीके से होती है प्रत्येक घर के बाहर एक चारपाई रखी होती है जिस पर एक थैला होता है जिसमें आठ से दस पाउच शराब रखे रहते हैं। ग्राहक उस थैले को पहचानकर थैलों में से पाउच लेते हैं और पैसे वहीं रख देते हैं। इस तरीके से शराब विक्रेताओं और ग्राहकों के बीच न्यूनतम संपर्क होता है और बिक्री आसान एवं तेजी से होती है।

डेरे के गिरोह में शामिल महिलाओं की भूमिका प्रमुख रूप से सामने आती है। कई महिलाओं ने रिपोर्टरों से बातचीत में स्वीकार किया कि यही उनकी आमदनी का साधन है और इसी से परिवार का भरण पोषण होता है। पुरुष इस दौरान डेरे से बाहर रहते हैं और शराब के निर्माण तथा आपूर्ति से जुड़े कामों में लगे रहते हैं। गलियों के बीच सात पक्के मकानों के नेटवर्क में सप्ताह के हर दिन के लिए अलग अलग घर शराब की बिक्री का काम संभालता है, जिससे किसी प्रकार की आपसी प्रतिस्पर्धा और टकराव नहीं होता।

स्थानीय ग्राहकों के अलावा, यह अवैध शराब नेटवर्क कुछ शराब ठेकेदारों तक भी कच्ची शराब की आपूर्ति करता है, जो इसे पाउचों और बोतलों में पैक कर आसपास के गांवों और इलाकों में बेचते हैं। इससे व्यापारियों को दो से चार गुना तक मुनाफा होता है, और यह नेटवर्क और भी अधिक फैलता जा रहा है।

रेहकोला माता मंदिर के निकट स्थित इस डेरे में रहने वाले कुछ परिवारों का कहना है कि वे शराब को या तो स्वयं बनाते हैं या बाहर से लाते हैं, हालांकि उसके स्रोत स्पष्ट रूप से बताने से इनकार कर देते हैं। पुरुष शराब बनाने के लिए आसपास के बीहड़ों में जाते हैं, जहाँ गड्ढों में स्टॉक छिपाया जाता है और ज़रूरत के समय उसे लाकर बेचा जाता है।

यह अवैध शराब कारोबार स्थानीय आबकारी कानूनों और प्रतिबंधों के खिलाफ चल रहा है, जिससे सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि कई लोग इस कच्ची शराब को सरकारी या कानूनी समझकर भी पी लेते हैं, जबकि गांवों के कुछ लोगों को डर होता है कि यदि वे प्रशासन को सूचना देंगे तो उन्हें प्रतिकूल परिणामों का सामना करना पड़ेगा।

विशेष रूप से यह नेटवर्क स्थानीय आबकारी अधिकारियों या पुलिस की निगरानी को चुनौती देता प्रतीत होता है, क्योंकि यह व्यापार बिना किसी तत्काल कार्रवाई के चलता दिखाई दे रहा है। वहीं, आबकारी विभाग और पुलिस को ऐसी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता है ताकि अवैध शराब के कारण होने वाले स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभावों से लोगों को बचाया जा सके।