मर्दानी से थप्पड़ तक: 2014 के बाद बॉलीवुड ने महिलाओं की आवाज़ को बनाया ताकत


नई दिल्ली। 2014 के बाद बॉलीवुड में हीरोइन की परिभाषा बदल गई। अब महिलाएं केवल कहानी का हिस्सा नहीं बल्कि कहानी की धुरी बन चुकी हैं। इस दौर में फिल्में न केवल मनोरंजन का माध्यम बनी हैं बल्कि समाज में बदलाव और महिलाओं के सशक्तिकरण का संदेश देने का भी जरिया हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 22 जनवरी 2015 को शुरू किया गया बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान और सुकन्या समृद्धि योजना के साथ इस बदलाव ने देश में बालिकाओं और महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण को भी नया आयाम दिया।

रानी मुखर्जी की मर्दानी फ्रैंचाइजी इसकी बेहतरीन मिसाल है। 2014 में रिलीज हुई फिल्म मर्दानी में रानी ने शिवानी शिवाजी रॉय का किरदार निभाया। यह निडर पुलिस अधिकारी महिला उत्पीड़न और अपराध के खिलाफ लड़ती है। गोपी पुथरान के निर्देशन में बनी यह क्राइम थ्रिलर पुरुष प्रधान मानसिकता के खिलाफ महिला की ताकत और साहस को प्रदर्शित करती है।2018 में रानी मुखर्जी की हिचकी ने महिलाओं की मानसिक और शारीरिक चुनौतियों पर भी ध्यान खींचा। नैना माथुर के किरदार में रानी ने टॉरेट सिंड्रोम जैसी चुनौती का सामना करते हुए बच्चों को पढ़ाने और अपने सपनों को पूरा करने का संदेश दिया।

आलिया भट्ट की फिल्में डियर जिंदगी और राजी महिलाओं के आत्मविश्वास और साहस को अलग अंदाज में पेश करती हैं। डियर जिंदगी मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-जागरूकता पर ध्यान केंद्रित करती है जबकि राजी में आलिया की भूमिका देशभक्ति और बुद्धिमानी से जोखिम भरे कार्यों में सफल होने की मिसाल बनती है।अनुभव सिन्हा की फिल्म थप्पड़ ने घरेलू हिंसा और पारिवारिक दबाव की कहानियों को पर्दे पर उतारा। तापसी पन्नू ने अमृता के किरदार में दिखाया कि कैसे एक छोटे से थप्पड़ ने उसकी जिंदगी बदल दी और उसने अपने हक के लिए आवाज उठाई।

2023 में द केरल स्टोरी ने महिलाओं की पहचान और स्वतंत्रता की लड़ाई को नए ढंग से पेश किया। अदा शर्मा के किरदार फातिमा के माध्यम से फिल्म दिखाती है कि डर और पीड़ा के बावजूद महिलाएं अपनी हिम्मत और समझदारी से संघर्ष कर सकती हैं।2014 के बाद की ये फिल्में साबित करती हैं कि बॉलीवुड अब महिलाओं की आवाज़ को ताकत बना रहा है। ये फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक जागरूकता और महिलाओं के आत्मविश्वास की मिसाल भी हैं।