नॉर्वे का 4 महीने का अंधेरा: इंसानों से ज्यादा भालू और ‘कोसेलिग’ में बसा जीवन


नई दिल्ली। सोचिए सुबह 8 बजे दफ्तर निकलें और बाहर घना अंधेरा हो। लंच ब्रेक में भी तारे चमक रहे हों और शाम को लौटते समय भी वही सन्नाटा। नॉर्वे के लॉन्गइयरबायेन में करीब 2500 लोग हर साल नवंबर से फरवरी तक लगातार चार महीने इसी घने अंधेरे में बिताते हैं। विज्ञान की भाषा में इसे पोलर नाइट कहते हैं जब सूरज पर्दे के पीछे ही रहता है और दुनिया पूरी तरह कृत्रिम रोशनी पर निर्भर हो जाती है।

यहां की डेली रूटीन सूरज पर नहीं बल्कि नंबरों और कृत्रिम लाइट पर निर्भर होती है। लोग विटामिन-डी की गोलियां और विशेष लैंप्स का सहारा लेते हैं ताकि शरीर को लगे कि दिन हो गया।अंधेरे में मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए लोग कोसेलिग नाम की फिलॉसफी अपनाते हैं। यह उनके लिए सुकून की भावना है। घरों को मोमबत्तियों ऊनी कंबलों और गर्म कॉफी से सजाया जाता है। संगीत बोर्ड गेम्स और कहानियों की महफिल घर-घर में सजती रहती है।

सामूहिक जीवन और नॉर्दर्न लाइट्स:
अकेलेपन को दूर करने के लिए सामूहिक भोज यानी कम्युनिटी डिनर आयोजित होते हैं। द्वीप पर करीब 50 देशों के लोग रहते हैं जो मुख्य रूप से रिसर्च और माइनिंग के लिए आए हैं। अंधेरे के महीनों में यहां की सोशल लाइफ बेहद एक्टिव रहती है। लोग स्नोमोबाइल में सवार होकर नीली बर्फ की वादियों में नॉर्दर्न लाइट्स देखने निकलते हैं। पोलर जैज जैसे संगीत फेस्टिवल्स सन्नाटे को संगीत से भर देते हैं।

अंधेरे में सुरक्षा और भालू का खतरा:
यहां इंसानों से ज्यादा भालू हैं और अंधेरे में वे और भी खतरनाक हो जाते हैं। लोग हमेशा हेडलाइट्स और रिफ्लेक्टिव जैकेट्स पहनकर चलते हैं। सड़कों पर अजनबियों का हेलो कहना आम है क्योंकि हर इंसान एक-दूसरे का सहारा है।

सूरज की वापसी का उत्सव:
फरवरी के अंत में जब पहली बार सूरज की किरण गिरती है तो पूरा शहर सोलफेस्टुका मनाता है। लोग हफ्तों से उस एक किरण का इंतजार करते हैं जो उन्हें याद दिलाती है कि अंधेरा कितना लंबा भी हो उजाला लौटकर जरूर आता है।स्वालबार्ड का यह द्वीप सिखाता है कि खुशियां बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होतीं। चार महीने का अंधेरा भी लोग प्यार उत्सव और समुदाय के साथ जीत सकते हैं।