इस कठोर निर्णय के पीछे संस्थान प्रशासन का अपना तर्क है। अधिकारियों का मानना है कि नर्सिंग और स्वास्थ्य से जुड़े पाठ्यक्रम अत्यंत संवेदनशील और आवासीय प्रकृति के होते हैं जिनमें शत-प्रतिशत उपस्थिति और मानसिक एकाग्रता की आवश्यकता होती है। प्रशासन के अनुसार शैक्षणिक सत्र के मध्य में विवाह करने से छात्राओं का ध्यान अपनी पढ़ाई और नैदानिक अभ्यास से भटक जाता है जिससे उनके व्यावसायिक कौशल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। नोटिस में यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्रवेश के समय ही छात्राओं से इस आशय का एक शपथ पत्र लिया जाता है जिसमें वे पाठ्यक्रम पूर्ण होने तक अविवाहित रहने की प्रतिबद्धता जताती हैं। संस्थान का दावा है कि यह नियम अनुशासन सुनिश्चित करने और भविष्य के कुशल स्वास्थ्य कर्मियों को तैयार करने के उद्देश्य से बनाया गया है।
जैसे ही यह आदेश सार्वजनिक हुआ इसे लेकर नागरिक समाज और कानूनी विशेषज्ञों के बीच तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। कई जानकारों ने इसे छात्राओं के मौलिक अधिकारों का सीधा हनन और उनकी व्यक्तिगत पसंद के संवैधानिक अधिकार में अनावश्यक हस्तक्षेप करार दिया है। आलोचकों का मानना है कि उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही वयस्क छात्राओं पर इस तरह के प्रतिबंध लगाना न केवल सामाजिक रूप से पिछड़ापन दर्शाता है बल्कि यह कानून की नजर में भी अनुचित है। मामले की संवेदनशीलता और बढ़ते विरोध को देखते हुए जिला प्रशासन ने भी इस पर कड़ा रुख अपनाया है। संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस आदेश की वैधानिकता की जांच के निर्देश दिए हैं और संस्थान के प्रबंधन से इस संबंध में विस्तृत जवाब तलब किया गया है।
स्वास्थ्य विभाग के क्षेत्रीय अधिकारियों ने भी इस मुद्दे पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि किसी भी संस्थान के आंतरिक नियम देश के कानूनों और व्यक्तिगत गरिमा से ऊपर नहीं हो सकते। प्राथमिक जांच के आदेश जारी होने के बाद फिलहाल इस विवादित निर्देश के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। प्रशासन इस बात की पड़ताल कर रहा है कि क्या इस तरह के नियम किसी सरकारी नियमावली का हिस्सा हैं या यह केवल संस्थान की अपनी उपज है। इस घटना ने पूरे प्रदेश में शैक्षणिक संस्थानों की कार्यप्रणाली और वहां लागू होने वाले मनमाने नियमों की सीमाओं पर एक गंभीर विमर्श को जन्म दे दिया है।
वर्तमान में इस आदेश को लेकर स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है और छात्राएं अपनी शैक्षणिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं। जिला प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि किसी भी छात्रा के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा और नियमों की समीक्षा कर एक न्यायसंगत समाधान निकाला जाएगा। यह मामला अब केवल एक संस्थान तक सीमित न रहकर व्यक्तिगत स्वायत्तता और शिक्षा के अधिकार के बीच एक बड़े विधिक प्रश्न के रूप में उभरकर सामने आया है जिसका परिणाम भविष्य में अन्य संस्थानों के लिए भी एक नजीर साबित हो सकता है।
