नई दिल्ली । दुनियाभर में बदलते सामरिक हालात और बढ़ते एरियल थ्रेट के बीच आधुनिक फाइटर जेट्स की रेस और तेज हो गई है। लंबी दूरी की मिसाइलें और ड्रोन तकनीक ने सुरक्षा चुनौतियों को और जटिल बना दिया है, जिसके चलते कई देश नई पीढ़ी के एयर डिफेंस सिस्टम और फाइटर एयरक्राफ्ट विकसित कर रहे हैं। भारत का ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ और अमेरिका का ‘गोल्डन डोम’ इसी दिशा में बड़े प्रयास माने जा रहे हैं।
6th जेनरेशन फाइटर जेट पर फोकस
इसी बदलाव के बीच अब छठी पीढ़ी के फाइटर जेट्स पर दुनिया का ध्यान केंद्रित हो गया है। यूरोप, भारत और अमेरिका सभी अपने-अपने एडवांस एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। भारत ने जहां AMCA प्रोजेक्ट शुरू किया है, वहीं अमेरिका ने अपने नए फाइटर जेट प्रोग्राम के तहत Boeing को बड़ा कॉन्ट्रैक्ट दिया है। अमेरिका के इस नए फाइटर जेट का नाम F-47 रखा गया है, जिसे F-22 Raptor का अगला और ज्यादा एडवांस संस्करण माना जा रहा है।
कीमत ने उड़ाए होश
F-47 को दुनिया का सबसे महंगा फाइटर जेट बताया जा रहा है। इसकी प्रति यूनिट कीमत करीब 300 मिलियन डॉलर (लगभग 3000 करोड़ रुपये) आंकी गई है। यह F-35 की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा महंगा है। इस कीमत में लगभग 4 से 5 हल्के लड़ाकू विमान HAL Tejas खरीदे जा सकते हैं, जिसकी एक यूनिट लागत करीब 600–650 करोड़ रुपये बताई जाती है।
F-47 को केवल एक लड़ाकू विमान नहीं बल्कि डिजिटल क्वार्टरबैक की तरह डिजाइन किया जा रहा है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑल-एंगल स्टील्थ और एडवांस मिशन सिस्टम जैसी तकनीकें शामिल होंगी। यह विमान मानव रहित ड्रोन (CCA) के साथ मिलकर काम करेगा और पूरे नेटवर्क सेंट्रिक युद्ध संचालन का नेतृत्व करेगा।
भारी-भरकम बजट खर्च
इस प्रोजेक्ट पर अब तक अरबों डॉलर खर्च किए जा चुके हैं और आने वाले वर्षों में इसमें और तेजी लाई जा रही है। अमेरिकी वायुसेना का लक्ष्य 185 से अधिक F-47 विमान तैयार करने का है, जो F-22 बेड़े के बराबर होंगे। हालांकि, इस परियोजना को फंडिंग और अन्य रक्षा कार्यक्रमों से प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है।
F-22 की विरासत और आगे की रणनीति
F-47 को F-22 की तकनीकी विरासत को आगे बढ़ाने वाला विमान माना जा रहा है, लेकिन इसकी भूमिका और भी व्यापक होगी। यह अकेले लड़ाई लड़ने के बजाय ड्रोन और अन्य सिस्टम के साथ मिलकर एक समन्वित युद्ध नेटवर्क का हिस्सा होगा।
वैश्विक प्रतिस्पर्धा तेज
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सैन्य प्रतिस्पर्धा और चीन जैसे देशों द्वारा छठी पीढ़ी के फाइटर जेट्स पर काम करने के चलते अमेरिका इस प्रोजेक्ट को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मान रहा है।
