भोपाल में किसान आंदोलन बना संघर्ष और परिवार की कहानी बेटियों ने खिलाया खाना पत्नी ने कहा खाली हाथ मत लौटना


भोपाल । भोपाल में जारी किसान आंदोलन अब केवल सरकारी नीतियों के विरोध तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह किसानों के संघर्ष उनके परिवारों की उम्मीदों और गांव की आर्थिक हकीकत की मार्मिक कहानी बन गया है। राजधानी के होशंगाबाद रोड पर हजारों किसान अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं। इस आंदोलन के बीच कई ऐसे दृश्य सामने आए जिन्होंने हर किसी को भावुक कर दिया। कहीं दो बेटियां अपने किसान पिता के लिए घर का बना खाना लेकर पहुंचीं तो कहीं एक पत्नी ने अपने पति को साफ शब्दों में कह दिया कि इस बार मांगें मनवाकर ही घर लौटना।

संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में निकली किसान क्रांति पैदल यात्रा नर्मदापुरम जिले के बरखेड़ा से शुरू होकर भोपाल पहुंची है। किसान मूंग की शत प्रतिशत सरकारी खरीदी खाद वितरण व्यवस्था में सुधार और न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी जैसी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लेती तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

आंदोलन के बीच कटारा हिल्स में रहने वाली प्रगति पटेल और उनकी बहन प्रकृति पटेल अपने पिता के लिए भोजन लेकर धरना स्थल पहुंचीं। दोनों भोपाल में पढ़ाई कर रही हैं। प्रगति ने कहा कि उन्होंने बचपन से अपने पिता को खेतों में मेहनत करते देखा है लेकिन मेहनत के अनुरूप उन्हें कभी उचित मूल्य नहीं मिला। उनका कहना था कि यदि किसान खेती करना छोड़ देगा तो देश की खाद्य व्यवस्था पर संकट खड़ा हो जाएगा। दोनों बहनों ने कहा कि अपने अधिकारों की लड़ाई में डरने का सवाल ही नहीं उठता और वे अपने पिता के संघर्ष के साथ मजबूती से खड़ी हैं।

हरदा से आए किसान अशोक गुर्जर ने बताया कि इस बार भीषण गर्मी में कड़ी मेहनत कर मूंग की फसल तैयार की लेकिन सरकार पूरी उपज खरीदने को तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि घर से निकलते समय उनकी पत्नी ने उन्हें सिर्फ एक बात कही कि इस बार मांगें पूरी कराकर ही वापस आना। चाहे जितना समय लगे लेकिन खाली हाथ मत लौटना। अशोक का कहना है कि गांव में किसान लगातार आर्थिक संकट से जूझ रहा है और खेती अब घाटे का सौदा बनती जा रही है।

कई किसानों ने आंदोलन के दौरान अपनी आर्थिक परेशानियां भी साझा कीं। हरदा के किसान बृजेश जाट ने बताया कि मूंग की खेती में उन्होंने गेहूं की पूरी कमाई लगा दी लेकिन सीमित खरीदी की वजह से भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालात इतने खराब हैं कि दो महीने से बच्चों की स्कूल फीस तक जमा नहीं कर पाए। फीस नहीं भरने पर स्कूल बस संचालकों ने बच्चों को बस में बैठाने से मना कर दिया और स्कूल प्रशासन ने भी चेतावनी दे दी। उनका कहना है कि किसान परिवार आज सम्मान और अस्तित्व दोनों की लड़ाई लड़ रहा है।

वहीं किसान दीपक पटवारे ने बताया कि आठ दिन पहले उनके पिता का घुटना बदलने का ऑपरेशन हुआ था लेकिन इसके बावजूद वे आंदोलन में शामिल होने भोपाल पहुंचे। खुद कमर दर्द की समस्या से जूझ रहे दीपक बेल्ट बांधकर पैदल यात्रा कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके पास लगभग 200 क्विंटल मूंग की उपज है लेकिन सरकारी खरीदी सीमित होने से पूरी फसल बिक नहीं पा रही है। परिवार की जिम्मेदारियों और बच्चों की पढ़ाई के बावजूद उन्होंने आंदोलन को प्राथमिकता दी है।

कई किसानों ने स्पष्ट कहा कि वे किसी भी परिस्थिति में पीछे हटने वाले नहीं हैं। उनका कहना है कि यदि अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए कठिनाइयों का सामना करना पड़े तो भी वे आंदोलन जारी रखेंगे। किसानों का मानना है कि यह केवल फसल की कीमत का मुद्दा नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य और खेती की सुरक्षा की लड़ाई है।

राजधानी भोपाल में जारी यह आंदोलन अब केवल नारों तक सीमित नहीं है बल्कि परिवार के त्याग संघर्ष और उम्मीदों की ऐसी तस्वीर बन गया है जिसने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अब सभी की नजर सरकार और किसान संगठनों के बीच होने वाली संभावित बातचीत पर टिकी हुई है।