कौन था अपना और कौन निकला मुखबिर, हंगरी में 60 हजार संदिग्ध एजेंटों की फाइलें खुलेंगी, दशकों पुराने राज से उठेगा पर्दा


नई दिल्ली । यूरोपीय देश हंगरी में करीब चार दशक पुराने कम्युनिस्ट शासन से जुड़ा एक बड़ा खुलासा होने जा रहा है। देश की नई सरकार ने सरकारी सुरक्षा एजेंसियों के लिए काम करने वाले हजारों मुखबिरों के नाम सार्वजनिक करने का फैसला किया है। इसके तहत 4 नवंबर को एक ऑनलाइन डेटाबेस जारी किया जाएगा। इसमें 1945 से 1989 के बीच सुरक्षा एजेंसियों के लिए जानकारी जुटाने वाले लोगों के नाम खोजे जा सकेंगे। इस फैसले के बाद हंगरी के हजारों परिवारों में पुराने रिश्तों और छिपे हुए सच को लेकर नई बहस शुरू होने की संभावना है।

प्रधानमंत्री पीटर माग्यार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस फैसले की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी तिस्जा के प्रमुख चुनावी वादों में से एक को पूरा करते हुए तानाशाही के दौर की गुप्त पुलिस फाइलें सार्वजनिक की जाएंगी। प्रधानमंत्री के मुताबिक यह कदम कई परिवारों के लिए भावनात्मक रूप से कठिन हो सकता है लेकिन अतीत का सामना किए बिना वास्तविक राजनीतिक बदलाव संभव नहीं है। सरकार का कहना है कि इन दस्तावेजों को सार्वजनिक करने का उद्देश्य इतिहास से जुड़े दबे हुए तथ्यों को सामने लाना और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा मजबूत करना है।

हंगरी में कम्युनिस्ट शासन के दौरान सुरक्षा एजेंसियों ने समाज पर निगरानी रखने के लिए मुखबिरों का व्यापक नेटवर्क तैयार किया था। इस नेटवर्क के जरिए सरकार विरोधी गतिविधियों और असहमति जताने वाले लोगों की जानकारी जुटाई जाती थी। बताया जाता है कि मुखबिर अपने पड़ोसियों दोस्तों सहकर्मियों और यहां तक कि परिवार के सदस्यों के बारे में भी सुरक्षा एजेंसियों को सूचनाएं देते थे। हालांकि इस नेटवर्क में शामिल सभी लोगों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं। कुछ लोगों को कथित तौर पर दबाव और ब्लैकमेल के जरिए जानकारी देने के लिए मजबूर किया गया जबकि कुछ अन्य लोगों को सुविधाओं और लाभ का लालच देकर इस काम में शामिल किया गया था।

इतने बड़े नेटवर्क की वास्तविक जानकारी दशकों तक आम जनता से छिपी रही। सरकारी सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज अभिलेखागार में बंद रहे और आम लोगों को उन तक पहुंच नहीं मिल सकी। समय समय पर इन फाइलों को सार्वजनिक करने की मांग उठती रही। कुछ दस्तावेज लीक भी हुए लेकिन पूरी जानकारी सामने नहीं आई। अब नई सरकार ने कानून बनाकर इन अभिलेखों को आम लोगों के लिए उपलब्ध कराने की तैयारी की है।

प्रधानमंत्री माग्यार ने अप्रैल में हुए संसदीय चुनाव से पहले ही इन फाइलों को सार्वजनिक करने का वादा किया था। सत्ता में आने के बाद उनकी सरकार ने सितंबर में इस संबंध में कानून पारित किया। सर्वेक्षणों के मुताबिक हंगरी के दो तिहाई से अधिक लोग इस फैसले का समर्थन कर रहे हैं। सामाजिक संबंध एवं संस्कृति मंत्री जोल्टान तार ने भी फेसबुक पर लिखा कि लोकतांत्रिक समाज को अपने अतीत को जानने का अधिकार है। अभी तक इन फाइलों की रिपोर्ट तक मुख्य रूप से शोधकर्ताओं और पीड़ितों के परिजनों की ही पहुंच थी।

इतिहासकारों का अनुमान है कि इन दस्तावेजों में करीब 50 हजार से 60 हजार लोगों के नाम दर्ज हो सकते हैं। इनमें से लगभग 10 प्रतिशत लोग ही आज जीवित बताए जा रहे हैं। इतिहासकारों का मानना है कि ऑनलाइन व्यवस्था शुरू होने के बाद हंगरी पूर्वी यूरोप के उन देशों में शामिल हो सकता है जहां कम्युनिस्ट शासन के सुरक्षा अभिलेखागार सबसे अधिक पारदर्शी होंगे।

इस मामले में हंगरी अकेला देश नहीं है। पूर्वी जर्मनी ने 1992 में अपनी कुख्यात स्टासी गुप्त पुलिस की फाइलें सार्वजनिक की थीं। चेक गणराज्य ने 2003 में लोगों को ऐसे दस्तावेजों तक पहुंच दी थी जबकि लातविया ने 2018 में मुखबिरों से जुड़ी फाइलें खोली थीं। अब हंगरी का यह कदम भी इतिहास के उन पन्नों को सामने लाने की कोशिश है जिनका असर आज भी समाज और परिवारों के रिश्तों पर पड़ सकता है।