Author: bharati

  • BJP की बैठक में मास्टर प्लान और परिसीमन पर मंथन, ध्रुवनारायण बोले पूरा ड्राफ्ट रद्द हो, आलोक शर्मा ने विधानसभा सीटों को लेकर उठाए सवाल

    BJP की बैठक में मास्टर प्लान और परिसीमन पर मंथन, ध्रुवनारायण बोले पूरा ड्राफ्ट रद्द हो, आलोक शर्मा ने विधानसभा सीटों को लेकर उठाए सवाल


    भोपाल । भोपाल में मास्टर प्लान के प्रस्तावित ड्राफ्ट को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी की कोर ग्रुप बैठक में पार्टी के नेताओं ने ही इस ड्राफ्ट पर आपत्ति जताई और इसे लेकर जनता तथा व्यापारियों में नाराजगी होने की बात कही। शनिवार को प्रदेश भाजपा कार्यालय में आयोजित भोपाल जिले की बैठक में मध्य विधानसभा के पूर्व विधायक ध्रुवनारायण सिंह ने मास्टर प्लान के ड्राफ्ट को पूरी तरह रद्द करने की मांग रखी। वहीं सांसद आलोक शर्मा ने विधानसभा सीटों के आगामी परिसीमन को लेकर पिछले परिसीमन की खामियों का मुद्दा उठाया। बैठक में दोनों विषयों पर नेताओं ने अपनी राय रखी।
    ध्रुवनारायण सिंह ने कहा कि भोपाल के मास्टर प्लान के ड्राफ्ट से शहर के लोगों और व्यापारियों में नाराजगी है। उनके मुताबिक प्रस्तावित योजना को लेकर लोगों की चिंताओं को गंभीरता से समझने की जरूरत है। उन्होंने मांग की कि मौजूदा ड्राफ्ट को रद्द किया जाए। मास्टर प्लान शहर के विकास और भविष्य की जरूरतों से जुड़ा अहम दस्तावेज होता है। ऐसे में इसके प्रावधानों को लेकर जनप्रतिनिधियों और प्रभावित लोगों की आपत्तियां चर्चा का विषय बन गई हैं। बैठक में उठी मांग से संकेत मिला कि इस मुद्दे पर भाजपा के भीतर भी विचार-विमर्श की जरूरत महसूस की जा रही है।
    बैठक में आगामी विधानसभा परिसीमन पर भी चर्चा हुई। सांसद आलोक शर्मा ने पिछले परिसीमन की प्रक्रिया में खामियां होने की बात कही। उन्होंने कहा कि उस प्रक्रिया के चलते भोपाल की दो विधानसभा सीटें कांग्रेस के खाते में चली गई थीं। उनका कहना था कि इस बार परिसीमन के दौरान विशेष सावधानी बरतनी होगी। निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव का असर प्रतिनिधित्व और चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। इसलिए इस प्रक्रिया को लेकर पार्टी नेताओं ने अपनी राय रखी और भविष्य की तैयारियों पर चर्चा की।
    परिसीमन के संबंध में पूर्व विधायक ध्रुवनारायण सिंह ने सुझाव दिया कि मुस्लिम बहुल इलाकों को एक विधानसभा क्षेत्र में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने अनुसूचित जाति की बहुलता वाले क्षेत्रों को भी इसमें जोड़ने का सुझाव दिया ताकि संबंधित सीट को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किए जाने की संभावना बन सके। हालांकि परिसीमन और आरक्षण का निर्धारण संबंधित कानूनी प्रावधानों तथा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होता है। किसी सीट की सीमाओं या आरक्षण में बदलाव केवल राजनीतिक सुझाव के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इस मुद्दे पर आगे क्या निर्णय होगा यह संबंधित प्रक्रिया और नियमों पर निर्भर करेगा।
    बैठक की अध्यक्षता प्रदेश संगठन महामंत्री चंद्रशेखर ने की। उन्होंने भोपाल और रायसेन जिले के कोर ग्रुप तथा जिला स्तर के नेताओं से संगठन की गतिविधियों पर चर्चा की। चंद्रशेखर ने संगठन को मजबूत बनाने के लिए नियमित जनसंपर्क और कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी की मजबूती उसके समर्पित कार्यकर्ताओं और जनता के बीच निरंतर उपस्थिति से जुड़ी है। संगठनात्मक गतिविधियां केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि लोगों की समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए काम करना जरूरी है।
    चंद्रशेखर ने बूथ स्तर पर सक्रियता बढ़ाने और समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद कायम रखने की जरूरत भी बताई। उन्होंने जिला अध्यक्षों से संगठनात्मक कार्यक्रमों की प्रगति की जानकारी ली और नियमित बैठकों तथा जनसंपर्क अभियानों की समीक्षा पर जोर दिया। बैठक में जहां संगठन को मजबूत करने की रणनीति पर चर्चा हुई वहीं मास्टर प्लान और परिसीमन जैसे मुद्दों ने राजनीतिक विमर्श को भी केंद्र में रखा। अब देखना होगा कि भोपाल के मास्टर प्लान पर उठी आपत्तियों और परिसीमन से जुड़े सुझावों पर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।

  • बेटी की मौत से टूटे पिता का छलका दर्द, भोपाल में बच्ची की हत्या के बाद थाने का घेराव, परिजनों ने पुलिस पर लगाए गंभीर आरोप

    बेटी की मौत से टूटे पिता का छलका दर्द, भोपाल में बच्ची की हत्या के बाद थाने का घेराव, परिजनों ने पुलिस पर लगाए गंभीर आरोप


    भोपाल । भोपाल के बैरागढ़ इलाके में 12 साल की बच्ची की हत्या के मामले ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है। रोजाना की तरह कबाड़ा बीनने के लिए घर से निकली बच्ची का शव अगले दिन एक खंडहर में मिला। घटना के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है और इलाके के लोगों में भारी आक्रोश है। बच्ची के पिता आरोपी को कठोरतम सजा देने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे अपनी बेटी को बचा नहीं सके और अब चाहते हैं कि दोषी को ऐसी सजा मिले जिससे भविष्य में कोई इस तरह का अपराध करने की हिम्मत न करे। परिजनों ने पुलिस की शुरुआती कार्रवाई पर भी सवाल उठाए हैं।
    परिवार के मुताबिक बच्ची 15 अक्टूबर की शाम करीब सात बजे घर से कबाड़ा बीनने के लिए निकली थी। इसी दौरान रास्ते में उसकी मुलाकात मोबिन नाम के युवक से हुई। परिजनों का आरोप है कि वह बच्ची को अपने साथ ले गया और इसके बाद वह घर वापस नहीं लौटी। काफी देर तक बच्ची के नहीं लौटने पर परिवार ने उसकी तलाश शुरू की। पिता का कहना है कि उसी रात करीब 11 से 12 बजे के बीच वे बैरागढ़ थाने पहुंचे और बच्ची के लापता होने की सूचना दी। परिवार का आरोप है कि शिकायत दर्ज कराने के बाद भी बच्ची की तलाश के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।
    परिजन रातभर बच्ची को खोजते रहे और अगले दिन भी तलाश जारी रखी। 16 अक्टूबर की दोपहर एक अन्य बच्ची कचरा बीनने के लिए एक खंडहर में पहुंची तो वहां उसे लापता बच्ची का शव दिखाई दिया। इसके बाद परिवार और पुलिस को सूचना दी गई। शव मिलने की खबर फैलते ही इलाके में तनाव और आक्रोश बढ़ गया। परिवार के लिए यह खबर असहनीय थी क्योंकि वे पूरी रात अपनी बेटी को सुरक्षित वापस लाने की उम्मीद में तलाश कर रहे थे।
    बच्ची के पिता ने आरोप लगाया कि उनकी बेटी के साथ गलत काम करने के बाद उसकी हत्या की गई। उनका यह भी दावा है कि सबूत छिपाने के लिए बच्ची के मुंह में कपड़ा ठूंसा गया और शव के ऊपर पुरानी अलमारी डालकर उसे कपड़े से ढक दिया गया। ये आरोप परिवार की ओर से लगाए गए हैं और मामले की वास्तविक परिस्थितियों का खुलासा जांच के बाद ही हो सकेगा। पिता आरोपी मोबिन को फांसी देने की मांग कर रहे हैं। गहरे दुख और गुस्से के बीच उन्होंने यह भी कहा कि यदि कानून दोषी को सजा नहीं दिला सकता तो आरोपी को उनके हवाले कर दिया जाए।
    परिवार के सदस्यों ने पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। बच्ची की बुआ का आरोप है कि मोहल्ले की एक बच्ची ने उनकी भतीजी को आखिरी बार मोबिन के साथ जाते हुए देखा था। इस जानकारी के आधार पर परिजनों को उस पर संदेह हुआ और उन्होंने उसे पकड़कर पुलिस के हवाले किया। बुआ के मुताबिक पुलिस ने पूछताछ की लेकिन बच्ची के बारे में जानकारी होने से इनकार करने पर उसे छोड़ दिया गया। उनका दावा है कि शव मिलने के बाद आरोपी को दोबारा पकड़ा गया। परिजन चाहते हैं कि शुरुआती शिकायत पर हुई कार्रवाई की भी जांच हो और यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
    घटना के बाद बैरागढ़ में लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया और थाने का घेराव किया। प्रदर्शन के दौरान मुख्य मार्ग पर जाम की स्थिति बनी और किसी अप्रिय घटना से बचने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया। लोगों की मांग है कि बच्ची को न्याय मिले और मामले की निष्पक्ष जांच हो। परिवार का कहना है कि उनकी बेटी अब लौटकर नहीं आएगी लेकिन दोषियों को सजा मिलना जरूरी है। फिलहाल इस मामले में आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और पुलिस की कथित लापरवाही से जुड़े आरोप जांच के महत्वपूर्ण पहलू बने हुए हैं।

  • ओम पुरी जयंती पर याद आया संघर्ष का वह दौर, जब ढाबे पर बर्तन मांजने वाले इस अभिनेता ने दुनिया में बनाई पहचान

    ओम पुरी जयंती पर याद आया संघर्ष का वह दौर, जब ढाबे पर बर्तन मांजने वाले इस अभिनेता ने दुनिया में बनाई पहचान

    नई दिल्ली ।भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता ओम पुरी की जयंती 18 अक्टूबर को मनाई जाती है। 18 अक्टूबर 1950 को हरियाणा के अंबाला में जन्मे ओम पुरी ने अपने जीवन में गरीबी, पारिवारिक परेशानियों और संघर्ष का सामना किया। इसके बावजूद उन्होंने अभिनय की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। अपनी प्रभावशाली अदाकारी के दम पर उन्होंने न केवल हिंदी फिल्मों में नाम कमाया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। उनका सफर उन कलाकारों में गिना जाता है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत से अभिनय के क्षेत्र में उल्लेखनीय मुकाम हासिल किया।

    ओम पुरी का जन्म एक पंजाबी परिवार में हुआ था। उनके पिता भारतीय रेलवे में काम करते थे, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उनके बचपन पर एक बड़ी परेशानी तब आई, जब वह लगभग छह साल के थे। उनके पिता को सीमेंट चोरी के आरोप में जेल भेज दिया गया था। इसके बाद परिवार के सामने रहने और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने का संकट खड़ा हो गया। परिवार को घर छोड़ना पड़ा और कम उम्र में ही ओम पुरी तथा उनके भाई को जिम्मेदारियां उठानी पड़ीं।

    परिवार की मदद के लिए उनके भाई ने कुली का काम किया, जबकि ओम पुरी ने एक ढाबे पर बर्तन मांजे। वह आसपास से कोयला इकट्ठा करके भी लाते थे, ताकि घर में खाना बनाने के लिए चूल्हा जल सके। इन कठिन परिस्थितियों के बाद वह अपने ननिहाल चले गए, जहां उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की। आर्थिक परेशानियों के बीच भी अभिनय के प्रति उनकी रुचि बनी रही और धीरे-धीरे यही रुचि उनके करियर का आधार बन गई।

    पढ़ाई के दौरान ओम पुरी ने एक वकील के यहां मुंशी के रूप में भी काम किया। एक बार नाटक में भाग लेने के कारण वह काम पर नहीं पहुंच सके, जिसके बाद वकील ने उन्हें नौकरी से हटा दिया। इस घटना के बाद उनके कॉलेज के प्राचार्य ने उन्हें रसायन विज्ञान प्रयोगशाला में सहायक की नौकरी दिलाई। कॉलेज में नाटकों में हिस्सा लेते हुए उनकी मुलाकात हरपाल और नीना तिवाना से हुई। उनके सहयोग से वह पंजाब कला मंच नामक नाट्य संस्था से जुड़े। इसके बाद अभिनय की दुनिया में आगे बढ़ने के लिए उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का रुख किया।

    ओम पुरी ने वर्ष 1975 में बच्चों की फिल्म ‘चोर चोर छुप जा’ में काम किया। शुरुआती दौर में आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने एक्टर्स स्टूडियो में भी काम किया। वहां गुलशन ग्रोवर और अनिल कपूर जैसे कलाकार उनके विद्यार्थी रहे। बाद में उन्होंने ‘घाशीराम कोतवाल’ के जरिए मुख्यधारा के सिनेमा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। वर्ष 1983 में आई फिल्म ‘अर्ध सत्य’ उनके करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शामिल रही। इस फिल्म में उनके अभिनय ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई।

    टेलीविजन पर भी ओम पुरी ने अपनी प्रतिभा दिखाई। वर्ष 1988 में प्रसारित ‘भारत एक खोज’ में उन्होंने कई भूमिकाएं निभाईं। हिंदी के अलावा उन्होंने पंजाबी, मराठी, गुजराती, उर्दू और दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी काम किया। ‘आक्रोश’, ‘स्पर्श’, ‘मंडी’, ‘आरोहण’, ‘मिर्च मसाला’, ‘जाने भी दो यारो’, ‘चाची 420’, ‘हेराफेरी’ और ‘मालामाल वीकली’ जैसी फिल्मों में उनके अलग-अलग किरदार दर्शकों के बीच लोकप्रिय हुए।

    उनकी अभिनय यात्रा भारतीय फिल्मों तक सीमित नहीं रही। ओम पुरी ने ‘ईस्ट इज ईस्ट’, ‘सिटी ऑफ जॉय’, ‘वुल्फ’ और ‘द घोस्ट एंड द डार्कनेस’ जैसी अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में भी काम किया। उनके अभिनय की खासियत यह थी कि वह अलग-अलग तरह की भूमिकाओं में सहजता से ढल जाते थे।अनिल कपूर के साथ जुड़ा एक किस्सा भी उनके शुरुआती दिनों की याद दिलाता है। एक नाटक में ओम पुरी को अमीर व्यक्ति की भूमिका निभानी थी। इसके लिए उन्होंने अपने विद्यार्थी अनिल कपूर से सोने की चेन मांगी थी। अनिल कपूर ने बिना देर किए अपनी चेन उन्हें दे दी थी।

    निजी जीवन में ओम पुरी ने दो शादियां की थीं। उनकी पहली पत्नी सीमा से तलाक के बाद उन्होंने नंदिता पुरी से विवाह किया। उनका एक बेटा ईशान है। ओम पुरी का निधन 6 जनवरी 2017 को 66 वर्ष की उम्र में हुआ था। अपने पीछे वह ऐसी फिल्मी विरासत छोड़ गए, जिसमें संघर्ष, विविधता और सशक्त अभिनय की छाप आज भी दिखाई देती है।

  • मक्के की फसल बनी किसानों के लिए अन्नलक्ष्मी, लुकवासा और बदरवास मंडियों में उपज का मेला, कम बोवनी के बावजूद रिकॉर्ड उत्पादन

    मक्के की फसल बनी किसानों के लिए अन्नलक्ष्मी, लुकवासा और बदरवास मंडियों में उपज का मेला, कम बोवनी के बावजूद रिकॉर्ड उत्पादन


    शिवपुरी। कोलारस बदरवास और लुकवासा की मंडियों में मक्के की भारी आवक हो रही है। उपज से भरी ट्रॉलियों की लंबी कतारें मंडियों से लेकर फोरलेन हाईवे के किनारों तक दिखाई दे रही हैं। मक्के के अच्छे उत्पादन और बाजार में मिल रहे भाव से किसानों को बेहतर कमाई की उम्मीद है। मंडियों में मक्का 1800 से 2600 रुपए प्रति क्विंटल तक बिक रहा है। ऐसे में इस बार कई किसानों के लिए मक्के की फसल अन्नलक्ष्मी साबित होती नजर आ रही है।
    जिले की कृषि व्यवस्था में मक्के का महत्व लगातार बढ़ रहा है। कभी सोयाबीन की खेती के लिए पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र में अब किसान तेजी से मक्के की ओर रुख कर रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक जिले में मक्के का रकबा पहले करीब 17 हजार हेक्टेयर था जो बढ़कर 90 हजार हेक्टेयर के पार पहुंच गया है। खेती के इस बदलाव के पीछे किसानों को मिलने वाला बेहतर लाभ और हाइब्रिड बीजों का इस्तेमाल अहम वजह माना जा रहा है। मक्के की खेती से जुड़ी संभावनाओं ने किसानों को इसे बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए प्रेरित किया है।
    इस साल तय लक्ष्य की तुलना में मक्के की बोवनी करीब 31 प्रतिशत कम रहने के बावजूद रिकॉर्ड उत्पादन होने की जानकारी सामने आई है। बेहतर बीज और फसल की उपज ने किसानों की उम्मीदों को मजबूत किया है। हालांकि वास्तविक उत्पादन और किसानों के शुद्ध मुनाफे का आकलन लागत तथा अन्य आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है। फिलहाल मंडियों में बड़ी मात्रा में मक्का पहुंचने से कृषि व्यापार में तेजी दिखाई दे रही है।
    दीपावली से पहले लुकवासा बदरवास और कोलारस मंडियों में कारोबार का माहौल काफी व्यस्त है। रिपोर्ट के मुताबिक इन तीनों मंडियों में प्रतिदिन दो हजार से अधिक ट्रॉलियों की डाक लग रही है। मंडी परिसर में जगह कम पड़ने के कारण कई ट्रॉलियां फोरलेन हाईवे के किनारे कतारों में खड़ी दिखाई दे रही हैं। किसान अपनी उपज बेचने के लिए मंडियों तक पहुंच रहे हैं। अधिक आवक के चलते खरीद और बिक्री की गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। मंडियों में बढ़ी हलचल से स्थानीय व्यापार को भी गति मिलने की उम्मीद है।
    मक्के के भाव किसानों के लिए इस समय खास महत्व रखते हैं। मंडियों में 1800 से 2600 रुपए प्रति क्विंटल तक के दाम मिलने से किसानों को अपनी फसल का उचित मूल्य मिलने की आशा है। हालांकि हर किसान को एक जैसा भाव नहीं मिलता क्योंकि उपज की गुणवत्ता नमी और बाजार की स्थिति के आधार पर कीमतों में अंतर हो सकता है। किसानों के लिए वास्तविक मुनाफा इस बात पर भी निर्भर करेगा कि खेती में बीज खाद मजदूरी सिंचाई और परिवहन पर कितना खर्च हुआ है।
    शिवपुरी जिले में मक्के का बढ़ता रकबा खेती के बदलते रुझान को दर्शाता है। यदि किसानों को आने वाले समय में भी अच्छे बाजार भाव और खरीदार मिलते रहे तो मक्के की खेती क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभा सकती है। फिलहाल दीपावली से पहले मंडियों में उमड़ती भीड़ और उपज से भरी ट्रॉलियां किसानों की मेहनत और बेहतर कमाई की उम्मीद की तस्वीर पेश कर रही हैं।

  • शिवपुरी में सड़क हादसे ने छीन ली एक जिंदगी, सत्संग से लौट रहे युवक को अज्ञात वाहन ने कुचला, पुलिस ने दर्ज किया केस

    शिवपुरी में सड़क हादसे ने छीन ली एक जिंदगी, सत्संग से लौट रहे युवक को अज्ञात वाहन ने कुचला, पुलिस ने दर्ज किया केस


    शिवपुरी । मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में सड़क हादसे में एक बाइक सवार की मौत हो गई। मृतक की पहचान 38 वर्षीय देशराज अहिरवार निवासी बांसगढ़ थाना करैरा के रूप में हुई है। जानकारी के मुताबिक देशराज बदरवास में आयोजित सत्संग में शामिल होने के बाद बाइक से अपने गांव लौट रहे थे। इसी दौरान शनिवार रात राष्ट्रीय राजमार्ग 46 पर रायश्री कट के पास एक अज्ञात वाहन ने उनकी बाइक को टक्कर मार दी। टक्कर इतनी गंभीर थी कि वाहन का पहिया उनके शरीर के ऊपर से निकल गया। हादसे में देशराज की मौके पर ही मौत हो गई। घटना के बाद इलाके में शोक का माहौल है।
    हादसे की सूचना मिलते ही देहात थाना पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने घटनास्थल का जायजा लिया और आवश्यक कार्रवाई शुरू की। मृतक के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। रविवार को शव का पोस्टमार्टम कराया गया। इसके बाद पुलिस ने मामले की जांच आगे बढ़ाई। शुरुआती जानकारी के अनुसार दुर्घटना में शामिल वाहन की पहचान अभी नहीं हो सकी है। पुलिस अज्ञात वाहन चालक का पता लगाने का प्रयास कर रही है।
    पुलिस ने इस मामले में अज्ञात वाहन चालक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है। अब जांच के दौरान यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि हादसा किस वाहन से हुआ और दुर्घटना के समय चालक किस दिशा में जा रहा था। पुलिस घटनास्थल से जुड़े तथ्यों और उपलब्ध जानकारी के आधार पर वाहन की पहचान करने में जुटी है। चालक का पता चलने के बाद दुर्घटना के संबंध में आगे की कार्रवाई की जाएगी।
    राष्ट्रीय राजमार्गों पर तेज रफ्तार और लापरवाही से वाहन चलाने के कारण गंभीर दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। खासकर कट और मोड़ वाले स्थानों पर वाहन चालकों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत होती है। हालांकि देशराज के साथ हुए हादसे की वास्तविक वजह पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल यह सामने आया है कि सत्संग से लौटते समय उनकी बाइक को अज्ञात वाहन ने टक्कर मारी और इस दुर्घटना में उनकी जान चली गई।
    देशराज की मौत से उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। वह सत्संग में शामिल होकर घर लौट रहे थे लेकिन रास्ते में हुई दुर्घटना ने उनकी जिंदगी खत्म कर दी। पुलिस अब हादसे में शामिल वाहन और उसके चालक की पहचान करने पर ध्यान दे रही है। जांच पूरी होने के बाद दुर्घटना से जुड़े अन्य तथ्य सामने आने की उम्मीद है।

  • मुंबई के विद्याविहार पुल के नाम पर महाराष्ट्र में सियासी घमासान, शिवसेना यूबीटी ने नाना पाटेकर तो भाजपा ने स्मित मच्छार का नाम सुझाया

    मुंबई के विद्याविहार पुल के नाम पर महाराष्ट्र में सियासी घमासान, शिवसेना यूबीटी ने नाना पाटेकर तो भाजपा ने स्मित मच्छार का नाम सुझाया


    नई दिल्ली । महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में विद्याविहार के नए ईस्ट-वेस्ट पुल के नाम को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। पुल का उद्घाटन होने से पहले ही इसे किसके नाम पर रखा जाए, इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रस्ताव सामने आए हैं। शिवसेना (यूबीटी) इस पुल का नाम दिवंगत अभिनेता नाना पाटेकर के नाम पर रखने की मांग कर रही है, जबकि भाजपा विधायक पराग शाह ने कैप्टन स्मित मच्छार के नाम का सुझाव दिया है। दोनों नामों के पीछे अलग-अलग वजहें बताई जा रही हैं, जिससे यह मामला राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।

    शिवसेना (यूबीटी) ने पुल पर ‘पद्मश्री नाना पाटेकर सेतु’ नाम का बैनर भी लगाया है। पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने मुंबई की मेयर ऋतु तावड़े से मुलाकात कर उन्हें एक पत्र सौंपा। इस पत्र में मांग की गई कि नए पुल का नाम नाना पाटेकर के नाम पर रखा जाए। पार्टी का मानना है कि नाना पाटेकर ने फिल्मों के अलावा सामाजिक कार्यों के जरिए भी महाराष्ट्र के लोगों के बीच विशेष पहचान बनाई थी।

    दूसरी ओर, भाजपा विधायक पराग शाह ने पुल का नाम कैप्टन स्मित मच्छार के नाम पर रखने का प्रस्ताव दिया है। मच्छार ने 30 सितंबर को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान में अपहरण की कोशिश को नाकाम करने में अहम भूमिका निभाई थी। इस घटना के दौरान गंभीर चोटों के बावजूद उन्होंने विमान की सुरक्षा से जुड़ी परिस्थितियों का सामना किया। उनके साहस और यात्रियों की सुरक्षा के लिए किए गए प्रयासों के कारण उनका नाम भी पुल के नामकरण की चर्चा में शामिल हो गया है।

    बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में सदन के नेता गणेश खनकर ने शिवसेना (यूबीटी) पर इस मामले में राजनीतिक श्रेय लेने के लिए विवाद खड़ा करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि नाना पाटेकर को सम्मान देने के लिए पुल के बजाय किसी थिएटर या थिएटर परिसर का नाम उनके नाम पर रखना अधिक उपयुक्त होगा। इस तरह पुल के नाम को लेकर दोनों पक्षों की राय अलग-अलग है। फिलहाल नामकरण को लेकर कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।

    बीएमसी के अनुसार, विद्याविहार का यह पुल लगभग 650 मीटर लंबा और दो लेन वाला है। यह विद्याविहार स्टेशन के पूर्वी हिस्से में रामचंद्र चेंबूरकर मार्ग को घाटकोपर के पश्चिमी हिस्से में लाल बहादुर शास्त्री मार्ग से जोड़ता है। पुल का लगभग 100 मीटर हिस्सा रेलवे पटरियों के ऊपर बनाया गया है। इस संपर्क मार्ग से पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के बीच आवागमन में सुविधा मिलने की उम्मीद है।

    नाना पाटेकर का जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। उन्होंने अपने अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल किए और वर्ष 2013 में पद्मश्री से सम्मानित हुए। फिल्मों के अलावा किसानों की मदद के लिए किए गए कार्यों के कारण भी उन्हें पहचान मिली। उन्होंने राज कपूर पुरस्कार के तहत मिली 10 लाख रुपये की राशि सूखा राहत के लिए दान कर दी थी। वर्ष 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन की स्थापना की।

    यह संस्था सूखे से प्रभावित किसानों और उनके परिवारों की मदद करती है। उसी वर्ष उन्होंने विदर्भ के 62 परिवारों और लातूर तथा उस्मानाबाद के 113 परिवारों को चेक वितरित किए थे। उन्होंने प्रादेशिक सेना में भी सेवा दी थी और 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उनकी भूमिका का भी उल्लेख किया जाता है। 8 अक्टूबर 2026 को गोवा में 75 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

    कैप्टन स्मित मच्छार का परिवार मुंबई के घाटकोपर पूर्व में रहता है। वह कपड़ा कारोबारी परिवार से आते हैं और उन्होंने टेक्सटाइल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। एक पॉडकास्ट में उन्होंने बताया था कि बचपन से पायलट बनना उनका सपना नहीं था। उन्होंने स्पाइसजेट में 11 साल काम करने के बाद वर्ष 2022 में फ्लाईदुबई में नौकरी शुरू की।

    30 सितंबर को वह उड़ान एफजेड-1073 के कप्तान थे। दुबई से तेल अवीव जा रहे इस विमान में 174 लोग सवार थे। उड़ान के दौरान उनके सह-पायलट ने उन पर कुल्हाड़ी से हमला कर दिया। गंभीर चोटों के बावजूद मच्छार ने कॉकपिट का दरवाजा खोला, जिसके बाद यात्रियों और चालक दल के सदस्यों ने हमलावर को काबू करने में मदद की।

    अब विद्याविहार पुल के नामकरण पर अंतिम फैसला संबंधित प्राधिकरणों को लेना है। नाना पाटेकर के सामाजिक योगदान और स्मित मच्छार के साहसिक कार्य, दोनों को उनके समर्थक सम्मान देने योग्य बता रहे हैं। ऐसे में देखना होगा कि मुंबई के इस नए पुल को आखिर किस नाम से पहचान मिलती है।

  • OTT पर देखिए ब्लैक विडो की खौफनाक मर्डर मिस्ट्री, तीन महिलाओं की कहानी जो पतियों से छुटकारा पाने के लिए बनाती हैं जानलेवा प्लान

    OTT पर देखिए ब्लैक विडो की खौफनाक मर्डर मिस्ट्री, तीन महिलाओं की कहानी जो पतियों से छुटकारा पाने के लिए बनाती हैं जानलेवा प्लान

    नई दिल्ली । ओटीटी पर सस्पेंस, थ्रिलर और डार्क कॉमेडी पसंद करने वाले दर्शकों के लिए ब्लैक विडो एक दिलचस्प विकल्प है। इस सीरीज की कहानी तीन महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी शादीशुदा जिंदगी से परेशान हैं और हालात से बाहर निकलने के लिए खतरनाक रास्ता चुनती हैं। कहानी में रहस्य, अपराध और अप्रत्याशित मोड़ एक साथ देखने को मिलते हैं। जैसे-जैसे घटनाएं आगे बढ़ती हैं, यह सवाल भी गहराता जाता है कि क्या तीनों महिलाएं अपनी साजिश को छिपा पाएंगी या पुलिस उनके राज तक पहुंच जाएगी।

    सीरीज में मोना सिंह, स्वास्तिका मुखर्जी और शमिता शेट्टी अहम भूमिकाओं में हैं। इनके अलावा शरद केलकर, सब्यसाची चक्रवर्ती, आमिल अली और रायमा सेन भी कलाकारों में शामिल हैं। अलग-अलग किरदारों और उनके आपसी संबंधों के जरिए कहानी को आगे बढ़ाया गया है। इसमें रिश्तों की उलझन, निजी परेशानियां और अपराध की योजना प्रमुख रूप से दिखाई देती हैं।

    कहानी की तीन मुख्य महिलाएं वीरा, जयंती और कविता हैं। तीनों अपनी शादीशुदा जिंदगी में मुश्किलों का सामना कर रही हैं। उनके लिए वैवाहिक रिश्ते तनाव और परेशानी का कारण बन चुके हैं। वे मानती हैं कि केवल तलाक लेने से उनकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इसी सोच के चलते वे अपने पतियों को रास्ते से हटाने की योजना बनाती हैं। उनकी साजिश के तहत वीकेंड पर झील के किनारे छुट्टियां बिताने के दौरान पतियों की हत्या करने का फैसला किया जाता है।

    योजना को अंजाम देने के लिए तीनों महिलाएं स्पीडबोट में बम लगाने की साजिश रचती हैं। उनका मकसद इस वारदात के जरिए अपने पतियों से हमेशा के लिए छुटकारा पाना होता है। शुरुआत में उनकी योजना सफल होती दिखाई देती है, लेकिन कहानी में जल्द ही एक नया मोड़ आता है। वीरा का पति जतिन इस घटना में बच जाता है और छिप जाता है। उसके बचने से तीनों महिलाओं के सामने नई मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं।

    घटना के बाद पुलिस जांच शुरू होती है। जांच अधिकारियों को धीरे-धीरे संदेह होने लगता है कि तीनों महिलाएं उतनी मासूम नहीं हैं, जितनी वे दिखाई देती हैं। उनके व्यवहार और घटना से जुड़े हालात के बीच संबंध तलाशने की कोशिश की जाती है। इसके बाद कहानी में संदेह, पूछताछ और साजिश से जुड़े सवाल अहम हो जाते हैं। पुलिस उन परिस्थितियों की पड़ताल करती है, जिनके कारण यह घटना हुई। हालांकि, तीनों महिलाओं तक पुलिस पहुंच पाती है या नहीं, इसका जवाब सीरीज देखने पर ही मिलता है।

    ब्लैक विडो की कहानी केवल एक हत्या की साजिश तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसमें उन महिलाओं की जिंदगी भी दिखाई जाती है, जो अपनी शादी में परेशानियों का सामना कर रही हैं। उनके रिश्तों में मौजूद तनाव और उससे बाहर निकलने की कोशिश कहानी को आगे बढ़ाती है। हालांकि, इस दौरान वे जिस रास्ते को चुनती हैं, वह उन्हें अपराध और उसके संभावित परिणामों के बीच खड़ा कर देता है। इसी वजह से कहानी में रिश्तों की जटिलता के साथ अपराध की गंभीरता भी बनी रहती है।

    सीरीज की खासियत इसके लगातार आने वाले ट्विस्ट और टर्न्स हैं। दर्शकों के सामने कई ऐसी परिस्थितियां आती हैं, जिनसे आगे की कहानी का अनुमान लगाना आसान नहीं होता। डार्क कॉमेडी के तत्वों के साथ सस्पेंस को बनाए रखने की कोशिश की गई है। कहानी में कुछ दृश्य प्रभावशाली हैं और कलाकारों के अभिनय से घटनाओं का असर बढ़ता है।

    तीनों मुख्य महिला कलाकारों के अभिनय को सीरीज का प्रमुख आकर्षण माना गया है। मोना सिंह, स्वास्तिका मुखर्जी और शमिता शेट्टी अपने-अपने किरदारों के जरिए कहानी को आगे ले जाती हैं। वहीं, शरद केलकर का किरदार भले ही अपेक्षाकृत कम समय के लिए दिखाई देता हो, लेकिन उनका अभिनय प्रभाव छोड़ता है। अन्य कलाकार भी कहानी के अलग-अलग हिस्सों में अपनी भूमिका निभाते हैं।

    अगर आपको रहस्य, अपराध और डार्क कॉमेडी वाली कहानियां पसंद हैं, तो ब्लैक विडो आपकी देखने की सूची में शामिल हो सकती है। तीन महिलाओं की खतरनाक योजना, एक पति का बच जाना और उसके बाद शुरू होने वाली पुलिस जांच इस सीरीज को सस्पेंस से भरपूर बनाती है।

  • रणबीर कपूर बनेंगे राम और यश निभाएंगे रावण, रामायण को लेकर राजामौली हुए एक्साइटेड, फिल्म की पूरी टीम को दी बधाई

    रणबीर कपूर बनेंगे राम और यश निभाएंगे रावण, रामायण को लेकर राजामौली हुए एक्साइटेड, फिल्म की पूरी टीम को दी बधाई


    नई दिल्ली। रणबीर कपूर की आगामी फिल्म रामायण को लेकर दर्शकों के साथ-साथ फिल्म इंडस्ट्री की बड़ी हस्तियों में भी जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। अब मशहूर फिल्म निर्देशक एसएस राजामौली ने भी इस फिल्म को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने रामायण का ट्रेलर साझा करते हुए फिल्म की कहानी और कलाकारों की तारीफ की है। राजामौली के इस रिएक्शन के बाद फिल्म को लेकर चर्चा और तेज हो गई है। भारतीय सिनेमा की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल हो चुकी रामायण को बड़े पर्दे पर देखने के लिए दर्शक लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं।
    एसएस राजामौली ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर फिल्म का ट्रेलर साझा करते हुए लिखा कि रामायण ऐसी कहानी है जिसे भारत के हर स्टोरीटेलर ने अपने अंदाज में सुनाया है। उन्होंने कहा कि निर्देशक नितेश तिवारी और निर्माता नमित मल्होत्रा इस कहानी को जिस रूप में पर्दे पर लेकर आ रहे हैं उसे देखने के लिए वह काफी उत्साहित हैं। राजामौली ने फिल्म के कलाकारों की भी तारीफ की और कहा कि हर अभिनेता ने इन कालजयी किरदारों में जीवन और गहराई लाने की कोशिश की है। उन्होंने पांच नवंबर का इंतजार करने की बात कही और पूरी टीम को बधाई दी।
    राजामौली की यह प्रतिक्रिया इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि वह भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले निर्देशकों में गिने जाते हैं। बाहुबली और आरआरआर जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने भव्य दृश्यांकन और प्रभावशाली कहानी कहने की शैली से दर्शकों का ध्यान खींचा है। ऐसे में रामायण जैसी पौराणिक कथा पर आधारित फिल्म को लेकर उनका उत्साह फिल्म के प्रति बढ़ती दिलचस्पी को दिखाता है। हालांकि किसी भी फिल्म की असली सफलता दर्शकों की प्रतिक्रिया और बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन से ही तय होगी।
    रामायण का दूसरा ट्रेलर हाल ही में रिलीज किया गया है। इसमें भगवान राम और रावण के बीच होने वाले संघर्ष की झलक दिखाई गई है। ट्रेलर को दर्शकों से अच्छा रिस्पॉन्स मिलने की खबरें हैं और फिल्म के विजुअल इफेक्ट्स भी चर्चा में हैं। फिल्म को बड़े स्तर पर तैयार किया जा रहा है ताकि भारतीय महाकाव्य की कहानी को भव्य सिनेमाई अनुभव के रूप में पेश किया जा सके। दर्शकों की दिलचस्पी इसकी स्टार कास्ट और रामायण के प्रसिद्ध प्रसंगों को नए अंदाज में देखने को लेकर भी बनी हुई है।
    फिल्म में रणबीर कपूर भगवान राम की भूमिका निभा रहे हैं जबकि साई पल्लवी माता सीता के किरदार में दिखाई देंगी। यश रावण की भूमिका निभा रहे हैं और रवि दुबे लक्ष्मण का किरदार निभाएंगे। वहीं सनी देओल भगवान हनुमान की भूमिका में नजर आएंगे। इसके अलावा फिल्म में रकुल प्रीत सिंह लारा दत्ता अरुण गोविल काजल अग्रवाल और कुणाल कपूर सहित कई कलाकार शामिल हैं। इतनी बड़ी स्टार कास्ट के कारण भी फिल्म को लेकर दर्शकों की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं।
    निर्देशक नितेश तिवारी की इस फिल्म का निर्माण नमित मल्होत्रा कर रहे हैं। रामायण को दो भागों में रिलीज करने की योजना है। रिपोर्ट के मुताबिक पहला भाग इस साल दिवाली के मौके पर और दूसरा भाग अगले साल दिवाली पर रिलीज किया जाना है। फिल्म को 3डी आईमैक्स और अन्य प्रीमियम बड़े पर्दों के प्रारूपों में रिलीज करने की तैयारी है। हिंदी के साथ तमिल तेलुगु कन्नड़ और मलयालम भाषाओं में भी इसे दर्शकों तक पहुंचाने की योजना है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए अंग्रेजी संस्करण भी रिलीज किया जाएगा। अब दर्शकों की निगाहें फिल्म की रिलीज और बड़े पर्दे पर इसकी प्रस्तुति पर टिकी हैं।

  • सलीम खान से नाराज थे सलमान के नाना, शादी के बाद 5 साल तक नहीं किया दामाद से बात, फिर जलेबी का डिब्बा लेकर पहुंचे घर

    सलीम खान से नाराज थे सलमान के नाना, शादी के बाद 5 साल तक नहीं किया दामाद से बात, फिर जलेबी का डिब्बा लेकर पहुंचे घर


    नई दिल्ली । बॉलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान अक्सर अपनी फिल्मों और निजी जिंदगी को लेकर चर्चा में रहते हैं। इस बार उन्होंने अपने परिवार से जुड़ा एक ऐसा किस्सा साझा किया है जिसने उनके माता-पिता सलीम खान और सलमा खान की शादी के शुरुआती दिनों की कहानी को फिर सुर्खियों में ला दिया है। बिग बॉस 20 के वीकेंड का वार में सलमान ने बताया कि उनके नाना माता-पिता की शादी से खुश नहीं थे और इस नाराजगी के कारण उन्होंने करीब पांच साल तक सलीम खान से बातचीत नहीं की थी। सलमान के मुताबिक इस नाराजगी की वजह धर्म नहीं बल्कि सलीम खान का अभिनेता बनने की कोशिश करना और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा होना था।

    शो के दौरान सलमान खान घर के सदस्यों के बीच हुए विवाद पर बात कर रहे थे। जो गुल्लू और नकुल के बीच हुई लड़ाई का जिक्र करते हुए उन्होंने साफ किया कि वह घर में हिंसा बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसी बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी जिंदगी से जुड़ा पुराना किस्सा सुनाया। सलमान ने बताया कि जब उनके माता-पिता ने शादी की थी तब उनके नाना को यह चिंता सताती थी कि उनकी बेटी ऐसे माहौल में कैसे रहेगी जहां उसका पति फिल्म इंडस्ट्री में काम करने का सपना देख रहा है। सलमान के अनुसार उनके नाना को सलीम खान के व्यक्तित्व और उनके अभिनेता बनने की इच्छा पर आपत्ति थी।

    सलमान ने बताया कि इस नाराजगी के चलते उनके नाना ने सलीम खान से पांच साल तक बात नहीं की। परिवार के बीच यह दूरी लंबे समय तक बनी रही। हालांकि समय के साथ हालात बदले और परिवार के रिश्तों में फिर से गर्मजोशी लौटने लगी। सलमान के मुताबिक उनके छोटे भाई सोहेल खान के जन्म के बाद उनके नाना उनसे मिलने पहुंचे थे। वह माहिम से बांद्रा जलेबी का डिब्बा लेकर आए थे। यह मुलाकात परिवार के लिए खास थी क्योंकि लंबे समय से चली आ रही नाराजगी के बाद नाना ने खुद आगे बढ़कर रिश्ते सुधारने की पहल की थी।

    सलमान ने बताया कि मुलाकात के दौरान उनके नाना ने अफसोस जताया कि उनसे बड़ी गलती हुई जो उन्होंने अपने नाती और नातिन को बड़ा होते नहीं देखा। उन्होंने सलमा खान से यह भी कहा कि वह जब चाहें अपने मायके आ सकती हैं लेकिन घर आने पर झगड़ा नहीं होना चाहिए। इस तरह परिवार में बनी दूरी धीरे-धीरे कम हुई और रिश्तों को एक नई शुरुआत मिली। सलमान की इस बात से पता चलता है कि पारिवारिक नाराजगी कितनी भी लंबी क्यों न हो समय और आपसी समझ से उसे दूर किया जा सकता है।

    सलीम खान और सलमा खान की प्रेम कहानी भी दिलचस्प रही है। बताया जाता है कि दोनों की नजदीकियां एक-दूसरे को बालकनी में खड़े होकर देखने से शुरू हुई थीं। सलीम खान ने पहले भी बताया था कि वे शाम और रात के समय कभी-कभी मिलते थे। जब सलमा के घरवालों को इस रिश्ते के बारे में पता चला तो परिवार की ओर से दबाव बढ़ने लगा। इसके बाद दोनों ने शादी करने का फैसला किया। उनकी शादी के बाद परिवार में सलमान खान अरबाज खान सोहेल खान और अलवीरा खान का जन्म हुआ।

    बाद के वर्षों में सलीम खान की जिंदगी में अभिनेत्री हेलेन भी आईं। सलीम और हेलेन की मुलाकात 1963 में फिल्म कबली खान के सेट पर हुई थी। धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती प्यार में बदली और साल 1980 में उन्होंने शादी कर ली। सलीम खान पहले से शादीशुदा थे और उनके चार बच्चे थे। समय के साथ परिवार ने हेलेन को भी अपनाया और आज खान परिवार में उनके प्रति सम्मान और अपनापन दिखाई देता है। सलमान खान का यह किस्सा एक बार फिर उनके परिवार के निजी जीवन और रिश्तों के उतार-चढ़ाव को चर्चा में ले आया है।

  • एबी डिविलियर्स ने बताया विराट कोहली को देखकर कैसा था पहला इंप्रेशन, बोले- शुरुआत में घमंडी लगते थे भारतीय स्टार बल्लेबाज

    एबी डिविलियर्स ने बताया विराट कोहली को देखकर कैसा था पहला इंप्रेशन, बोले- शुरुआत में घमंडी लगते थे भारतीय स्टार बल्लेबाज

    नई दिल्ली । भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली और दक्षिण अफ्रीका के पूर्व दिग्गज बल्लेबाज एबी डिविलियर्स की दोस्ती क्रिकेट जगत में काफी लोकप्रिय रही है। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के लिए साथ खेलते हुए दोनों ने कई यादगार पारियां खेलीं और अपनी बल्लेबाजी से टीम को मुश्किल परिस्थितियों से बाहर निकाला। मैदान पर उनकी साझेदारी जितनी प्रभावशाली रही, मैदान के बाहर भी दोनों के बीच दोस्ती उतनी ही मजबूत दिखाई दी। हालांकि, डिविलियर्स ने हाल ही में विराट कोहली को पहली बार देखने के बाद बनी अपनी शुरुआती धारणा के बारे में दिलचस्प खुलासा किया है।

    एक पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान डिविलियर्स से पूछा गया कि विराट कोहली को पहली बार देखने पर उनके मन में क्या विचार आए थे। इस सवाल के जवाब में उन्होंने मजाकिया अंदाज में स्वीकार किया कि शुरुआत में उन्हें विराट घमंडी और मगरूर लगते थे। उन्होंने यह भी कहा कि संभव है विराट खुद भी उनकी इस बात से सहमत हों। हालांकि, डिविलियर्स ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी को पूरी तरह गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। वह इसे हल्के-फुल्के अंदाज में कह रहे थे और उनका मकसद विराट के व्यक्तित्व पर नकारात्मक टिप्पणी करना नहीं था।

    डिविलियर्स के मुताबिक, जब विराट कोहली 19, 20 या 21 साल के थे, तब उनके अंदर आत्मविश्वास भरपूर था। युवा उम्र में ही विराट अपने खेल को लेकर काफी दृढ़ दिखाई देते थे और उन्हें खुद की क्षमताओं पर पूरा भरोसा था। डिविलियर्स ने इसी आत्मविश्वास को उनके शुरुआती व्यवहार की एक प्रमुख वजह बताया। उनके अनुसार, कई बार किसी खिलाड़ी का खुद पर मजबूत भरोसा दूसरों को घमंड या मगरूर होने जैसा लग सकता है, जबकि वास्तविकता में वह अपने प्रदर्शन को लेकर आश्वस्त होता है।

    उन्होंने यह भी समझाया कि शीर्ष स्तर पर क्रिकेट खेलने और सफलता हासिल करने के लिए आत्मविश्वास बेहद जरूरी होता है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में जगह बनाए रखने और लगातार अच्छा प्रदर्शन करने के लिए खिलाड़ी को अपनी क्षमताओं पर भरोसा करना पड़ता है। युवा खिलाड़ियों में यह विश्वास कभी-कभी उनके व्यवहार में अधिक आक्रामकता के रूप में नजर आ सकता है। विराट कोहली के मामले में भी डिविलियर्स ने उनके शुरुआती अंदाज को इसी नजरिए से देखा।

    समय के साथ विराट के व्यक्तित्व में आए बदलाव का जिक्र करते हुए डिविलियर्स ने बताया कि उम्र बढ़ने के साथ वह एक खिलाड़ी और इंसान के तौर पर अधिक परिपक्व हुए। उनके शुरुआती करियर में खुद को साबित करने की चुनौती काफी बड़ी थी। ऐसे दौर में उनका आक्रामक रवैया और खुद पर जरूरत से ज्यादा भरोसा होने की छवि कुछ लोगों को अलग तरह से दिखाई दे सकती थी। लेकिन अनुभव बढ़ने और क्रिकेट में लगातार आगे बढ़ने के साथ उनके व्यवहार में भी बदलाव आया।

    विराट कोहली ने अपने करियर में बल्लेबाजी के दम पर कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। उनकी आक्रामकता और जीत के लिए लगातार प्रयास करने की प्रवृत्ति उनके खेल की पहचान रही है। मैदान पर उनका जोशीला अंदाज कई बार चर्चा का विषय बनता रहा है, लेकिन उनके प्रशंसक इसी प्रतिस्पर्धी भावना को उनकी ताकत भी मानते हैं। डिविलियर्स की टिप्पणी इसी शुरुआती छवि और समय के साथ आए बदलाव को सामने लाती है।

    आईपीएल के दौरान विराट कोहली और एबी डिविलियर्स ने रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के लिए लंबे समय तक साथ खेला। दोनों के बीच तालमेल ने टीम को कई मुकाबलों में मजबूत स्थिति दिलाई। बल्लेबाजी के दौरान एक-दूसरे की शैली को समझना और मैदान पर बेहतरीन साझेदारियां करना उनकी जोड़ी की खासियत रही। साथ खेलने के दौरान उनकी दोस्ती भी मजबूत हुई और दोनों कई मौकों पर एक-दूसरे की तारीफ करते दिखाई दिए।

    डिविलियर्स का यह बयान विराट कोहली के शुरुआती दिनों की उनकी व्यक्तिगत धारणा पर आधारित है। उन्होंने इसे मजाकिया संदर्भ में रखते हुए विराट के आत्मविश्वास और समय के साथ उनके परिपक्व होने की बात कही। उनकी टिप्पणी से यह भी स्पष्ट होता है कि किसी खिलाड़ी के शुरुआती व्यवहार को समझने के लिए उसकी उम्र, अनुभव और करियर की परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।