Author: bharati

  • वेश्यावृत्ति व तस्करी के आरोपों पर हाईकोर्ट सख्त, IG से कहा– सोच बदलिए, 11 साल का डेटा पेश करें

    वेश्यावृत्ति व तस्करी के आरोपों पर हाईकोर्ट सख्त, IG से कहा– सोच बदलिए, 11 साल का डेटा पेश करें


    ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने लड़कियों की कथित तस्करी और जबरन वेश्यावृत्ति से जुड़े एक गंभीर मामले में पुलिस प्रशासन के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। ग्वालियर खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महिलाओं और नाबालिगों से जुड़े अपराधों को हल्के में लेना अस्वीकार्य है। अदालत ने ग्वालियर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक अरविंद सक्सेना को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश देते हुए वर्ष 2014 से अब तक के 11 वर्षों में ग्वालियर संभाग से लापता हुई लड़कियों और उनकी बरामदगी से जुड़ा विस्तृत रिकॉर्ड तलब किया है।

    यह सख्त आदेश पायल नामक महिला द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि शिवपुरी जिले में कुछ संगठित गिरोह युवतियों को बंधक बनाकर उनसे जबरन देह व्यापार करवा रहे हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ऋषिकेश बोहरे ने अदालत को बताया कि इस संबंध में पुलिस और प्रशासन को कई बार शिकायतें दी गईं, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश जवाब पर अदालत ने तीखी आपत्ति जताई। शासन ने अपने जवाब में इस पूरे मामले को आपसी पारिवारिक विवाद बताया था। हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यदि आरोपों में जरा भी सच्चाई है, तो यह केवल निजी विवाद नहीं बल्कि संगठित अपराध, मानव तस्करी और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन का मामला बनता है।

    खंडपीठ ने टिप्पणी की कि पुलिस का दृष्टिकोण बेहद चिंताजनक है। अदालत ने कहा कि महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी सबसे अहम है। इसी क्रम में कोर्ट ने आईजी को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि केवल फाइलों और कागजी जवाबों से काम नहीं चलेगा, बल्कि सोच और कार्यशैली में बदलाव जरूरी है।हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि वर्ष 2014 से अब तक ग्वालियर संभाग में दर्ज सभी गुमशुदगी मामलों का विस्तृत ब्योरा पेश किया जाए। इसमें यह जानकारी भी शामिल करनी होगी कि कितनी लड़कियां लापता घोषित की गईं, कितनी को बरामद किया गया और कितने मामलों की जांच अब तक लंबित है। अदालत ने संकेत दिए हैं कि इन आंकड़ों के विश्लेषण के बाद पुलिस प्रशासन पर और भी सख्त निर्देश जारी किए जा सकते हैं।

    गौरतलब है कि इससे पहले शिवपुरी जिले के पुलिस अधीक्षक को भी इस मामले में तलब किया जा चुका है। हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि गंभीर आरोपों को नजरअंदाज करना या उन्हें घरेलू विवाद बताकर दबाना कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।अदालत के इस सख्त रुख के बाद पुलिस महकमे में हलचल मच गई है। अधिकारियों के अनुसार, पुराने रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं और आंकड़ों को संकलित करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। वहीं महिला अधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हाईकोर्ट के हस्तक्षेप को अहम बताते हुए कहा है कि इससे लड़कियों की सुरक्षा और पुलिस की जवाबदेही तय करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।

  • बजट 2026 की उम्मीदें क्या मिडिल क्लास को मिलेगा राहत या फिर टैक्स की नई टेंशन

    बजट 2026 की उम्मीदें क्या मिडिल क्लास को मिलेगा राहत या फिर टैक्स की नई टेंशन


    नई दिल्ली । जैसे-जैसे फरवरी का महीना नजदीक आता है, देश के करोड़ों नौकरीपेशा और मध्यम वर्गीय परिवारों की निगाहें वित्त मंत्री के बजट भाषण पर टिक जाती हैं। 1 फरवरी 2026 को मोदी सरकार का तीसरा पूर्ण बजट पेश किया जाएगा, जो केवल आंकड़ों का हिसाब-किताब नहीं बल्कि आम आदमी की जेब और उसकी बचत का भविष्य तय करेगा।

    मौजूदा टैक्स सिस्टम का अंतिम बजट

    इस बार का यूनियन बजट 2026-27 खास और ऐतिहासिक माना जा रहा है, क्योंकि यह मौजूदा इनकम टैक्स कानून के तहत पेश होने वाला आखिरी पूर्ण बजट होगा। सरकार 1 अप्रैल 2026 से नए ‘Income Tax Act 2025’ को लागू करने की तैयारी कर रही है, जो करीब 60 साल पुराने टैक्स कानूनों को बदलने वाला है। ऐसे में, यह बजट न केवल वर्तमान टैक्स व्यवस्था को सुधारने की दिशा में अहम कदम होगा, बल्कि आने वाली टैक्स व्यवस्था की नींव भी रखेगा। आइए जानते हैं कि इस बार के बजट से टैक्सपेयर्स को किन प्रमुख राहतों की उम्मीद है

    पुराने टैक्स रिजीम का दर्द: क्या मिलेगा राहत

    पिछले साल, यानी बजट 2025 में, सरकार ने न्यू टैक्स रिजीम को आकर्षक बना दिया था। इसमें 12 लाख रुपये तक की आय को टैक्स-फ्री करने और बेसिक छूट सीमा को 4 लाख रुपये तक बढ़ाने जैसे फैसले किए गए थे। हालांकि, इसका फायदा उन लोगों को कम हुआ जिन्होंने ‘ओल्ड टैक्स रिजीम पुराना टैक्स सिस्टम अपनाया है। पुराने सिस्टम में टैक्स देने वाले लोग पीएफ होम लोन और इंश्योरेंस जैसी योजनाओं के जरिए अपनी बचत पर जोर देते हैं।

    इन लोगों की सबसे बड़ी मांग है कि बेसिक छूट सीमा जो अभी 2.5 लाख रुपये पर अटकी हुई है उसे बढ़ाकर कम से कम 3 लाख रुपये किया जाए। इसके अलावा, धारा 80C के तहत मिलने वाली 1.5 लाख रुपये की छूट अब महंगाई के दौर में नाकाफी हो चुकी है। टैक्सपेयर्स की मांग है कि इसे बढ़ाकर कम से कम 2 लाख रुपये किया जाए ताकि बच्चों की पढ़ाई स्वास्थ्य बीमा और अन्य आवश्यक खर्चों को ध्यान में रखते हुए उन्हें राहत मिल सके।

    घर और इलाज पर राहत मिडिल क्लास की बड़ी जरूरत

    महंगाई के इस दौर में घर खरीदना और बीमारी का इलाज कराना मिडिल क्लास के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। टैक्सपेयर्स का मानना है कि राहत केवल टैक्स स्लैब बदलने से नहीं मिलेगी बल्कि जरूरी खर्चों पर छूट देने से ही असली फायदा होगा। खासतौर पर होम लोन के ब्याज पर मिलने वाली 2 लाख रुपये की छूट अब घर की बढ़ती कीमतों को देखते हुए बहुत कम लगती है। ऐसे में उम्मीद है कि सरकार होम लोन ब्याज छूट को बढ़ाकर अधिक लाभकारी बनाएगी।इसके अलावा मिडिल क्लास की यह भी मांग है कि अगर सरकार न्यू टैक्स रिजीम को भविष्य के लिए स्थायी बनाना चाहती है तो इसमें स्वास्थ्य बीमा और होम लोन पर टैक्स छूट की सुविधा भी शामिल की जाए। इससे बचत और निवेश को बढ़ावा मिलेगा और मिडिल क्लास को राहत मिलेगी।

    आसान नियम और सरल टैक्स प्रक्रिया

    टैक्सपेयर्स केवल टैक्स कम करने की उम्मीद नहीं कर रहे, बल्कि वे जटिल प्रक्रियाओं से भी राहत चाहते हैं। कई बार इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने के बाद रिफंड के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है या फिर टीडीएस मैचिंग में समस्याएं आती हैं। नए से सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि नियमों को सरल और स्पष्ट बनाया जाए।इसके अलावा ईयर की जगह टैक्स ईयर का कॉन्सेप्ट लाने की चर्चा भी हो रही है जो प्रक्रिया को और भी सरल बनाएगा। साथ ही टैक्सपेयर्स को उम्मीद है कि कैपिटल गेन टैक्स से जुड़ी जटिलताओं को दूर किया जाएगा। फिलहाल शेयर बाजार म्यूचुअल फंड और प्रॉपर्टी पर अलग-अलग टैक्स नियम लागू हैं जिससे भ्रम पैदा होता है। लोग चाहते हैं कि सभी एसेट्स के लिए एक जैसी और सरल टैक्स व्यवस्था लागू हो।

    टैक्स स्लैब में बदलाव: क्या मिलेगा राहत

    मिडिल क्लास उम्मीद कर रहा है कि टैक्स स्लैब में भी कुछ बदलाव किए जाएं ताकि उनकी टैक्स भार को हल्का किया जा सके। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि आयकर स्लैब की सीमा को बढ़ाने से टैक्सपेयर्स को सीधा फायदा होगा। खासकर उन लोगों को जिनकी आय 5 लाख रुपये से 10 लाख रुपये के बीच है उन्हें राहत की जरूरत है। इस स्लैब को बढ़ाकर टैक्स रेट को कम किया जा सकता है।

    भविष्य की टैक्स व्यवस्था क्या है नई उम्मीदें

    वित्त मंत्री द्वारा पेश किए जाने वाले बजट 2026 में सबसे बड़ी उम्मीद यही होगी कि नए टैक्स कानूनों का खाका तैयार किया जाएगा ताकि टैक्सपेयर्स को आने वाले समय में सटीक और सही जानकारी मिल सके। नए टैक्स कानूनों का उद्देश्य टैक्स सिस्टम को और अधिक पारदर्शी सटीक और आसान बनाना होगा ताकि आम नागरिक को किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। बजट 2026 के जरिए मिडिल क्लास और नौकरीपेशा वर्ग को उम्मीद है कि सरकार उनके लिए टैक्स राहत, आसान नियम, और आवश्यक खर्चों पर छूट की सुविधाएं प्रदान करेगी। इस बजट का असर सीधे-सीधे लाखों लोगों की जेब और जीवनशैली पर पड़ेगा, इसलिए इस बार के बजट में टैक्सपेयर्स को खास राहत मिलने की उम्मीदें जताई जा रही हैं।

  • वंदे मातरम् के 150 साल भारतीय सेना का बैंड कार्यक्रम, इंडिया गेट से नैहाटी तक पूरे देश में धूम

    वंदे मातरम् के 150 साल भारतीय सेना का बैंड कार्यक्रम, इंडिया गेट से नैहाटी तक पूरे देश में धूम


    नई दिल्ली । भारतीय सेना वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने के अवसर पर देश भर में विशेष कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है। इसके तहत 19 से 26 जनवरी 2026 तक भारतीय सेना कई प्रमुख शहरों में मिलिट्री बैंड की परफॉर्मेंस पेश करेगी। इस आयोजन का उद्देश्य न केवल वंदे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व को सम्मान देना है, बल्कि देशवासियों में देशभक्ति एकता और राष्ट्रीय गर्व की भावना को भी मजबूत करना है।

    कार्यक्रम का शेड्यूल

    इस विशेष कार्यक्रम का हिस्सा बनने वाले प्रमुख शहरों में बिहार के पटना और गया, झारखंड के रांची, उत्तर प्रदेश के लखनऊ और प्रयागराज, उत्तराखंड के देहरादून, छत्तीसगढ़ के रायपुर, ओडिशा के गोपालपुर कर्नाटक के बेंगलुरु, मध्य प्रदेश के जबलपुर ,महाराष्ट्र के मुंबई और पुणे, तेलंगाना के हैदराबाद हिमाचल प्रदेश के शिमला, लद्दाख के कारगिल ,राजस्थान के जयपुर और दिल्ली के इंडिया गेट शामिल हैं। इन बैंड परफॉर्मेंस का उद्देश्य भारतीय सेना के संगीत और सेना के गौरव को प्रदर्शित करना है साथ ही लोगों में एकता और राष्ट्रीय गौरव का एहसास दिलाना है।

    वंदे मातरम् के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की जन्मस्थली पर कार्यक्रम

    विसेष महत्व रखने वाले कार्यक्रमों में से एक पश्चिम बंगाल के नैहाटी में आयोजित होगा, जो वंदे मातरम् के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की जन्मस्थली है। यहां सेना के बैंड द्वारा खास प्रस्तुति दी जाएगी। यह कार्यक्रम वंदे मातरम् के इतिहास को सम्मान देने और लोगों में देशभक्ति का भाव जागृत करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

    दिल्ली में इंडिया गेट पर आर्मी सिम्फनी बैंड की विशेष प्रस्तुति

    18 जनवरी 2026 को दिल्ली के इंडिया गेट पर आर्मी सिम्फनी बैंड का एक विशेष परफॉर्मेंस आयोजित होगा। इस कार्यक्रम का समय दोपहर 2 से 5 बजे के बीच होगा और यह आयोजन वंदे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व को सम्मानित करने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय गर्व को प्रदर्शित करेगा। सभी कार्यक्रम करीब 45 मिनट के होंगे, जो दर्शकों को भारतीय सेना की संगीत कला और देशभक्ति की भावना से प्रेरित करेंगे। इस दौरान हर शहर में सेना के मिलिट्री बैंड की लयबद्ध धुनें गूंजेंगी जो ना केवल ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बल्कि देशवासियों के दिलों में गहरी पैठ भी बनाएंगी।

    देशभर में एकता और गौरव की लहर

    इन कार्यक्रमों का उद्देश्य वंदे मातरम् की अनमोल धुन और उसके संदेश को जनता तक पहुंचाना है। इस आयोजन के माध्यम से भारतीय सेना ने देशभर में एकता और राष्ट्रीय गौरव की लहर को फैलाने का एक बड़ा कदम उठाया है। भारत के इतिहास और संस्कृति में वंदे मातरम् का जो स्थान है, उसे और भी मजबूत बनाने की दिशा में यह आयोजन अहम साबित हो सकता है।

  • बीजेपी ने नेहरू पर निशाना साधा, सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के विरोध में लिखे थे 17 पत्र

    बीजेपी ने नेहरू पर निशाना साधा, सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के विरोध में लिखे थे 17 पत्र


    गुजरात। गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर, जिसे महमूद ग़ज़नी और अलाउद्दीन खिलजी जैसे आक्रमणकारियों ने लूटा था अब 1000 साल का उत्सव मना रहा है। इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर से पंडित जवाहरलाल नेहरू पर निशाना साधा है, जिनकी सरकार ने स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का विरोध किया था। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने दावा किया कि पंडित नेहरू ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को 17 पत्र लिखे थे जिनमें उन्होंने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के खिलाफ अपनी नापसंदगी व्यक्त की थी।

    सुधांशु त्रिवेदी ने 21 अप्रैल, 1951 को नेहरू द्वारा लियाकत अली खान को लिखे पत्र का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि पंडित नेहरू ने मंदिर के पुनर्निर्माण के प्रयास को झूठा बताया और इसे लेकर किसी प्रकार की आस्था या राजनीति को अस्वीकार किया। त्रिवेदी ने कहा कि नेहरू ने लियाकत अली खान को प्रिय नवाबजादा कहकर संबोधित किया और सोमनाथ मंदिर के बारे में किसी भी पुनर्निर्माण के प्रयास की बात से इनकार किया।

    इस पत्र को बीजेपी ने तुष्टीकरण की राजनीति का उदाहरण बताते हुए कहा कि नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए यह कदम उठाया। सुधांशु त्रिवेदी ने यह भी दावा किया कि पंडित नेहरू ने एक तरह से पाकिस्तान के प्रति आत्मसमर्पण करते हुए सोमनाथ मंदिर के निर्माण को नकार दिया था और यह दिखाता है कि स्वतंत्र भारत में नेहरू को भगवान सोमनाथ से सबसे ज्यादा नफरत थी।

    बीजेपी के प्रवक्ता ने यह सवाल भी उठाया कि अगर यह तुष्टीकरण की राजनीति और मुग़ल आक्रमणकारियों के महिमामंडन के अलावा कुछ और था तो पंडित नेहरू को लियाकत अली खान को पत्र क्यों लिखना पड़ा उन्होंने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता के बाद के दौर में पंडित नेहरू ने भारतीय संस्कृति धार्मिक आस्थाओं और इतिहास से दूर रहते हुए पाकिस्तान के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी।

    सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के इस विवाद ने कई बार राजनीतिक हलकों में चर्चा पैदा की है, जहां एक तरफ बीजेपी इसे भारतीय संस्कृति और धार्मिक पुनर्निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानती है वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इस मुद्दे पर विभाजन और तुष्टीकरण की राजनीति के आरोप लगाता रहा है।

    वर्तमान में सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का यह उत्सव न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह भारतीय राजनीति और इतिहास को भी पुन परिभाषित करने का एक अवसर बन चुका है। सोमनाथ के पुनर्निर्माण की कहानी को लेकर न केवल हिंदू धर्म के अनुयायी बल्कि भारतीय राजनीति में भी एक गहरी बहस छिड़ चुकी है।

  • शुरू हुई जनगणना की प्रक्रिया, पहले चरण के लिए टाइमलाइन घोषित

    शुरू हुई जनगणना की प्रक्रिया, पहले चरण के लिए टाइमलाइन घोषित

    नई दिल्ली । केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बुधवार को भारत की जनगणना 2027 के पहले चरण यानी हाउसिंग और हाउसलिस्टिंग की समय-सीमा को औपचारिक रूप से अधिसूचित कर दिया। इसके तहत मकान सूचीकरण और आवास गणना की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, यह प्रक्रिया इस साल 1 अप्रैल से 30 सितंबर के बीच आयोजित की जाएगी। प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस अवधि के दौरान अपनी सुविधानुसार 30 दिनों का समय तय करेंगे। इस अधिसूचना के साथ ही 7 जनवरी 2020 की पिछली अधिसूचना को निरस्त कर दिया गया है, हालांकि उससे पहले किए गए कार्यों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

    आत्म-गणना का विकल्प
    अधिसूचना में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जनगणना 2027 में नागरिकों को सेल्फ-एन्यूमरेशन यानी स्वयं विवरण भरने का विकल्प मिलेगा। यह प्रक्रिया संबंधित राज्य/केंद्र शासित प्रदेश में 30 दिवसीय घर-घर जाकर होने वाली हाउसलिस्टिंग से ठीक पहले 15 दिनों की अवधि में पूरी की जाएगी।

    नागरिक इस दौरान जनगणना ऐप या पोर्टल के माध्यम से स्वयं जानकारी दर्ज कर सकेंगे।
    दो चरणों में होगी जनगणना

    कोविड-19 महामारी के कारण टल गई जनगणना 2021 के बाद, अब 2027 की जनगणना करने की यह कवायद दो चरणों में संपन्न की जाएगी- अप्रैल से सितंबर 2026 तक घरों की सूची बनाना और आवास गणना, और फरवरी 2027 में आबादी की गणना।

    यह पूरी प्रक्रिया 1 अप्रैल 2026 से 28 फरवरी 2027 तक चलेगी। जनगणना के लिए 1 मार्च 2027 की मध्यरात्रि (00:00 बजे) को संदर्भ तिथि माना जाएगा। हालांकि, लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश, बर्फीले क्षेत्र तथा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ गैर-समानांतर इलाकों के लिए अलग प्रावधान किए गए हैं।
    कैबिनेट की मंजूरी और लागत

    पिछले वर्ष 12 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जनगणना 2027 के आयोजन को मंजूरी दी थी। इस व्यापक अभियान पर कुल 11,718.2 करोड़ रुपये का खर्च अनुमानित है। इस बार की जनगणना में जातिगत पहचान से संबंधित आंकड़े भी दर्ज किए जाएंगे।
    पहली डिजिटल जनगणना

    जनगणना 2027 भारत की पहली पूर्णतः डिजिटल जनगणना होगी। इसके तहत:

    डेटा कलेक्शन के लिए मोबाइल ऐप का उपयोग किया जाएगा
    निगरानी के लिए केंद्रीय पोर्टल विकसित किया गया है
    लगभग 30 लाख फील्ड फंक्शनरी इस प्रक्रिया में शामिल होंगे

    यह जनगणना दुनिया का सबसे बड़ा प्रशासनिक और सांख्यिकीय अभ्यास मानी जा रही है।
    बेहतर डेटा और ‘’सेंसस-एज-ए-सर्विस’

    सरकार ने हाल ही में कहा है कि इस बार जनगणना के आंकड़ों का प्रकाशन अधिक पारदर्शी और यूजर-फ्रेंडली होगा। नीति-निर्माण से जुड़े सभी आवश्यक आंकड़े एक क्लिक पर उपलब्ध कराए जाएंगे। इसके तहत ‘सेंसस-एज-ए-सर्विस’ (CaaS) मॉडल अपनाया जाएगा, जिससे विभिन्न मंत्रालयों को स्वच्छ, मशीन-रीडेबल और उपयोगी डेटा उपलब्ध कराया जा सकेगा।

    घर-घर जाकर होगी गणना

    जनगणना प्रक्रिया के तहत प्रत्येक परिवार से अलग-अलग प्रश्नावलियों के जरिए हाउसलिस्टिंग एवं हाउसिंग जनगणना तथा जनसंख्या गणना की जाएगी। आमतौर पर सरकारी शिक्षक और अन्य नामित कर्मचारी, जिन्हें राज्य सरकारें नियुक्त करती हैं, वे अपने नियमित कार्यों के साथ-साथ यह गणना कार्य करेंगे।
    रीयल-टाइम मॉनिटरिंग और सुरक्षा

    पूरी प्रक्रिया के प्रबंधन और निगरानी के लिए जनगणना प्रबंधन और निगरानी प्रणाली (CMMS) नामक एक विशेष पोर्टल विकसित किया गया है। डिजिटल जनगणना को सुरक्षित बनाने के लिए उचित साइबर सुरक्षा प्रावधान भी किए गए हैं। कुल मिलाकर, जनगणना 2027 न केवल आंकड़ों के लिहाज से बल्कि तकनीक, पारदर्शिता और नीति निर्माण के स्तर पर भी भारत के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होने जा रही है।

  • होमवर्क न करने पर 6 साल की बच्ची को टीचर ने ऐसा मारा थप्पड़ कि गिरने से टूटा हाथ

    होमवर्क न करने पर 6 साल की बच्ची को टीचर ने ऐसा मारा थप्पड़ कि गिरने से टूटा हाथ

    सतना। मध्यप्रदेश के सतना जिले के एक प्राइवेट स्कूल में 6 साल की मासूम बच्ची को होमवर्क पूरा न करने की ऐसी सजा मिली कि उसका हाथ टूट गया। इंग्लिश टीचर ने बच्ची को इतनी जोर से थप्पड़ मारा कि वह जमीन पर गिरी और उसका हाथ फ्रैक्चर हो गया। अब बच्ची के हाथ पर प्लास्टर चढ़ा है। हैरानी की बात यह है कि जब पिता स्कूल पहुंचे और सीसीटीवी फुटेज मांगा, तो प्रबंधन ने रटा-रटाया जवाब दे दिया कि “कैमरे खराब हैं”।
    फिलहाल पिता की शिकायत पर सिविल लाइन पुलिस ने सम्बंधित टीचर के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।

    बर्थडे, होमवर्क और टीचर की सजा
    दरअसल पूरा मामला शहर के सिविल लाइन थाना क्षेत्र अंतर्गत आने वाले अमौधा स्थित सीएमए विद्यालय का है। यहां पतेरी के चौहान नगर निवासी पीड़ित बच्ची के पिता ने बताया की बच्ची मंगलवार को स्कूल गई थी। घर पर छोटी बहन का जन्मदिन होने के कारण वह अपना इंग्लिश का होमवर्क पूरा नहीं कर पाई थी। क्लास में जब इंग्लिश टीचर सपना खरे ने होमवर्क चेक किया और अधूरा पाया, तो वे गुस्से में तमतमा गईं।

    उन्होंने बच्ची को जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। थप्पड़ लगते ही मासूम का संतुलन बिगड़ा और वह जमीन पर गिर पड़ी, जिससे उसके हाथ की हड्डी टूट गई।
    डरी सहमी बच्ची घर पहुंची और…

    स्कूल से लौटने के बाद डरी-सहमी बच्ची ने शाम को हाथ में दर्द की शिकायत की। मां को लगा मामूली चोट होगी, इसलिए बाम लगा दिया और बच्ची सो गई। बुधवार सुबह जब स्कूल जाने के लिए बच्ची को उठाया गया, तो उसका हाथ बुरी तरह सूजा हुआ था। परिजन घबराकर उसे जिला अस्पताल ले गए। वहां एक्स-रे करने पर फ्रैक्चर की पुष्टि हुई और डॉक्टरों ने तुरंत प्लास्टर चढ़ाया है।
    सीसीटीवी फुटेज की मांग पर क्या बोला स्कूल

    बेटी की हालत देख पिता का गुस्सा फूट पड़ा है। वे पहले सिविल लाइन थाने गए और फिर स्कूल पहुंचे।

    पिता ने प्रिंसिपल से घटना की शिकायत की और क्लासरूम का सीसीटीवी फुटेज दिखाने को कहा। लेकिन स्कूल प्रबंधन ने अपनी लापरवाही छिपाते हुए कह दिया कि कैमरे कई दिनों से खराब हैं। परिजनों का यह भी आरोप है की कभी कभार फीस लेट हो जाने पर बच्ची को परीक्षा में न बैठने की धमकी भी दी जा चुकी है। स्कूल में अनुशासन के नाम पर बच्चों के साथ शारीरिक हिंसा की जा रही है, जो कानूनन अपराध है। प्रबंधन आरोपी टीचर को बचाने की कोशिश कर रहा है।

    वही, सिविल लाइन पुलिस ने पिता की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए सम्बंधित शिक्षिका के खिलाफ बीएनएस की धाराओं के तहत मामला दर्ज लिया है और मामले पर आंगे जांच कर रही है।

  • जिनपिंग बनने जा रहे 'शांति दूत'; चीन की मदद से सुधरेंगे उत्तर और दक्षिण कोरिया के रिश्ते?

    जिनपिंग बनने जा रहे 'शांति दूत'; चीन की मदद से सुधरेंगे उत्तर और दक्षिण कोरिया के रिश्ते?


    वीजिंग। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्योंग ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से एक महत्वपूर्ण अपील की है। उत्तर कोरिया के परमाणु संकट को सुलझाने और दोनों कोरियाई देशों के बीच बढ़ती शत्रुता को कम करने के लिए उन्होंने चीन से शांति मध्यस्थ की भूमिका निभाने का आग्रह किया है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्योंग ने बुधवार को कहा कि उन्होंने उत्तर कोरियाई परमाणु संकट के समाधान और दोनों कोरियाई देशों के बीच शत्रुता कम करने में मदद के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मध्यस्थता करने का अनुरोध किया है।
    म्योंग ने कहा कि उन्होंने यह अनुरोध दोनों नेताओं के इस सप्ताह की शुरुआत में बीजिंग में हुए शिखर सम्मेलन के दौरान किया था।

    दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ने अपने बयान में कहा कि हम प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उत्तर कोरिया के साथ हमारे सभी संपर्क चैनल पूरी तरह से बंद हैं, इसलिए हम बिल्कुल संवाद नहीं कर पा रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि चीन का शांति के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाना अच्छा होगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हमारे प्रयासों की सराहना की और कहा कि धैर्य रखने की जरूरत है।

    चीन उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और प्रमुख कूटनीतिक समर्थक है। दक्षिण कोरिया और अमेरिका ने बार-बार चीन से अपने प्रभाव का उपयोग करके उत्तर कोरिया को लंबे समय से ठप पड़ी कूटनीति को फिर से शुरू करने या परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए मनाने का आग्रह किया है।

    चीन ने उत्तर कोरिया से जुड़े मुद्दों में शामिल सभी पक्षों से संयम बरतने का आह्वान किया है। उसने हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के तहत प्रतिबंधित हथियारों के परीक्षणों के बावजूद उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध कड़े करने के अमेरिका और अन्य देशों के प्रयासों को रोक दिया है।

    उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया और अमेरिका के साथ बातचीत करने से इनकार कर दिया है और 2019 में उसके नेता किम जोंग उन की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ उच्च स्तरीय परमाणु कूटनीति विफल होने के बाद से अपने परमाणु शस्त्रागार का विस्तार करने के कदम उठाए हैं।

  • कितनी ताकतवर है लैटिन अमेरिकी सेना? US को नाकों चने चबा सकते हैं ये देश

    कितनी ताकतवर है लैटिन अमेरिकी सेना? US को नाकों चने चबा सकते हैं ये देश


    वाशिंगटन । हाल ही में वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के ‘अपहरण’ के बाद लैटिन अमेरिका में तनाव चरम पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब कोलंबिया, क्यूबा और मैक्सिको को भी सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा कि यदि ये देश अपना रवैया नहीं सुधारते हैं तो अमेरिका कार्रवाई करेगा। उन्होंने इस रुख को मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ कदम और पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी हितों की सुरक्षा से जोड़ा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन देशों की सेनाएं दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका का सामना करने में सक्षम हैं?

    सैन्य शक्ति में भारी असमानता
    इन बयानों ने लैटिन अमेरिका में अमेरिकी दखल को लेकर पुराने तनावों को फिर जीवित कर दिया है।

    जिन देशों को चेतावनी दी गई है, वे वॉशिंगटन के हस्तक्षेप के पक्षधर नहीं हैं, लेकिन उनकी सेनाओं की क्षमता अमेरिका के मुकाबले बेहद सीमित है। अमेरिका की सैन्य ताकत दुनिया में सबसे अधिक मानी जाती है। 2025 में उसका रक्षा बजट 895 अरब डॉलर रहा- जो सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3.1 प्रतिशत है। 2025 की ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग के अनुसार ब्राजील लैटिन अमेरिका की सबसे शक्तिशाली सेना है और वैश्विक स्तर पर 11वें स्थान पर है। सक्रिय सैनिकों की संख्या, लड़ाकू विमान, टैंक, नौसैनिक संसाधन और सैन्य बजट- हर पैमाने पर ये देश अमेरिका से काफी पीछे हैं। पारंपरिक युद्ध में अमेरिकी बढ़त स्पष्ट है। लैटिन अमेरिकी सेनाएं अमेरिकी हस्तक्षेप का प्रभावी मुकाबला करने में असमर्थ हैं। हालांकि, कुछ देशों में पैरामिलिट्री फोर्सेस (अर्द्धसैनिक बल) मजबूत हैं, जो असममित युद्ध (गुरिल्ला टैक्टिक्स) में इस्तेमाल हो सकते हैं।

    अर्धसैनिक बल: लैटिन अमेरिका का गुप्त हथियार
    ऊपर कुछ प्रमुख लैटिन अमेरिकी देशों के नाम दिए गए हैं। लेकिन मुख्य खतरा केवल चार देशों- क्यूबा, कोलंबिया, वेनेजुएला और मेक्सिको पर मंडरा रहा है। इनमें वेनेजुएला पर अमेरिका पहले ही हमला कर उसके राष्ट्रपति को पकड़ लाया है। हालांकि एक क्षेत्र ऐसा है जहां इन देशों के पास तुलनात्मक बढ़त मानी जाती है और वे अमेरिका को नाकों चने चबा सकते हैं।

    ये हैं उनके अर्धसैनिक (पैरामिलिट्री) बल। ये समूह अक्सर नियमित सेनाओं के समानांतर काम करते हैं और असममित युद्ध व अपरंपरागत रणनीतियों का सहारा लेते हैं।

    क्यूबा के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अर्धसैनिक बल बताया जाता है- करीब 11.4 लाख सदस्य। इनमें देश-नियंत्रित मिलिशिया और पड़ोस आधारित रक्षा समितियां शामिल हैं। सबसे बड़ा संगठन ‘टेरिटोरियल ट्रूप्स मिलिशिया’ है, जो बाहरी खतरों या आंतरिक संकट में नियमित सेना की सहायता के लिए नागरिक रिजर्व के रूप में काम करता है।

    वेनेजुएला में सरकार समर्थक नागरिक सशस्त्र समूह- जिन्हें “कोलेक्टिवोस” कहा जाता है पर राजनीतिक नियंत्रण लागू करने और विरोधियों को डराने के आरोप लगते रहे हैं। औपचारिक रूप से ये सशस्त्र बलों का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन व्यापक रूप से माना जाता है कि राष्ट्रपति मादुरो के शासन में इन्हें राज्य का संरक्षण मिलता रहा है।

    कोलंबिया में 1980 के दशक में दक्षिणपंथी अर्धसैनिक समूह उभरे थे, जिनका उद्देश्य वामपंथी विद्रोहियों से लड़ना था। 2000 के दशक के मध्य में इनके औपचारिक विमोचन के बावजूद, कई समूह बाद में आपराधिक या नियो-पैरामिलिट्री संगठनों के रूप में फिर सक्रिय हो गए। शुरुआती दौर में इनका गठन शीत युद्ध के दौरान अमेरिकी काउंटर-इंसर्जेंसी सलाहकारों के मार्गदर्शन में कोलंबियाई सेना की भागीदारी से हुआ था।

    मेक्सिको में भारी हथियारों से लैस ड्रग कार्टेल- जैसे जेटास व्यवहार में अर्धसैनिक ताकत की तरह काम करते हैं।

    पूर्व सैनिकों द्वारा बनाए गए इन समूहों के पास सैन्य-स्तरीय हथियार हैं और वे कई इलाकों में क्षेत्रीय नियंत्रण रखते हैं, जिससे स्थानीय पुलिस पर भारी पड़ते हैं। इसी कारण मैक्सिकन सेना को कानून-व्यवस्था में तैनात करना पड़ा है।
    किस देश के पास कितने अर्द्धसैनिक बल?
    क्यूबा, वेनेजुएला, कोलंबिया और मैक्सिको दुनिया के कुछ सबसे बड़े अर्द्धसैनिक बलों (पैरामिलिट्री फोर्सेस) वाले देशों में शामिल हैं। ग्लोबल फायरपावर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में सबसे बड़ी पैरामिलिट्री फोर्सेस इस प्रकार हैं: सबसे ज्यादा बांग्लादेश में 68 लाख, भारत में 25.27 लाख, क्यूबा में 11.45 लाख, चीन में 6.25 लाख, सर्बिया में 6 लाख, पाकिस्तान में 5 लाख, मिस्र में 3 लाख, इंडोनेशिया में 2.5 लाख, रूस में 2.5 लाख, वियतनाम में 2.5 लाख, ईरान में 2.2 लाख, वेनेजुएला में 2.2 लाख, ब्राजील में 2 लाख, अल्जीरिया में 1.5 लाख, कोलंबिया में 1.5 लाख, फ्रांस में 1.5 लाख, सऊदी अरब में 1.5 लाख, तुर्की में 1.5 लाख, लाओस में 1.2 लाख और मैक्सिको में 1.2 लाख सदस्य हैं। इनमें क्यूबा की टेरिटोरियल ट्रूप्स मिलिशिया जैसी इकाइयां, वेनेजुएला के प्रो-गवर्नमेंट कोलेक्टिवोस, कोलंबिया के विभिन्न पैरामिलिट्री ग्रुप्स और मैक्सिको की सुरक्षा बल प्रमुख हैं, जो आंतरिक सुरक्षा और रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
    अमेरिकी हस्तक्षेप का लंबा इतिहास
    पिछले दो सौ वर्षों में अमेरिका ने कई बार लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप किया है। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में ‘बनाना वॉर्स’ के दौरान अमेरिकी सेनाएं मध्य अमेरिका में कॉरपोरेट हितों की सुरक्षा के लिए तैनात रहीं।
    1934 में राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ने ‘गुड नेबर पॉलिसी’ के तहत गैर-हस्तक्षेप का वादा किया।

    लेकिन शीत युद्ध के दौरान स्थिति बदली। 1947 में स्थापित अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के समन्वय से अमेरिका ने कई निर्वाचित सरकारों को गिराने के अभियानों को फंड किया। पनामा एकमात्र लैटिन अमेरिकी देश है, जहां अमेरिका ने औपचारिक रूप से सैन्य हमला किया। इसने 1989 में राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश के नेतृत्व में Operation Just Cause चलाया गया। इसका उद्देश्य राष्ट्रपति मैनुअल नोरिएगा को हटाना था, जिन्हें बाद में ड्रग तस्करी सहित अन्य अपराधों में दोषी ठहराया गया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पूर्ण युद्ध होता है, तो लैटिन अमेरिकी देशों की नियमित सेनाएं अमेरिकी तकनीक और वायु सेना का मुकाबला नहीं कर पाएंगी। हालांकि, इन देशों में मौजूद विशाल अर्धसैनिक नेटवर्क और छापामार लड़ाके अमेरिका के लिए किसी भी जमीनी कार्रवाई को बेहद जटिल और खूनी बना सकते हैं।

  • ड्रीम मिलिट्री बनाने ट्रंप का 1.5 ट्रिलियन बजट का ऐलान; भारत भी पीछे नहीं

    ड्रीम मिलिट्री बनाने ट्रंप का 1.5 ट्रिलियन बजट का ऐलान; भारत भी पीछे नहीं

    वाशिंगटन। अमेरिका 2027 में रक्षा पर पहले से ज्यादा खर्च करने पर विचार कर रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रक्षा बजट बढ़ाने की बात कही है। साथ ही उन्होंने ज्यादा खर्च करने की क्षमता की वजह टैरिफ से होने वाली कमाई को बताया है। डिफेंस बजट बढ़ाए जाने की तैयारी ऐसे समय पर हो रही है, जब ट्रंप ने हाल ही में वेनेजुएला पर ऐक्शन लिया है और कई देशों पर कार्रवाई के संकेत दे रहे हैं।
    ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, ‘सीनेटर्स, कांग्रेसमैन, सेक्रेटरी और अन्य राजनेताओं से लंबी और मुश्किल बातचीत के बाद, मैंने तय किया है कि हमारी देश की भलाई के लिए 2027 के लिए सैन्य बजट 1 ट्रिलियन डॉलर की जगह 1.5 ट्रिलियन डॉलर होगा। खासतौर से ऐसे मुश्किल भरे और खतरनाक समय में।’

    उन्होंने कहा कि ज्यादा खर्च के जरिए अमेरिका ऐसी सेना तैयार कर सकता है, जो किसी भी दुश्मन से देश को सुरक्षित रख सके। अमेरिकी राष्ट्रपति इसे ‘ड्रीम मिलिट्री’ बता रहे हैं।
    टैरिफ को बताया वजह

    ट्रंप ने टैरिफ से होने वाली कमाई का हवाला देते हुए खर्च बढ़ाने की बात कही है। उन्होंने कहा, ‘अगर अन्य देशों से टैरिफ (सीमा शुल्क) के माध्यम से इतनी बड़ी मात्रा में राशि प्राप्त न हो रही होती, जिनमें से कई देशों ने अतीत में संयुक्त राज्य अमेरिका को ऐसे स्तरों पर ‘लूटा’ है जो पहले कभी नहीं देखे गए, तो मैं 1 ट्रिलियन डॉलर की संख्या पर ही टिका रहता।’

    भारत का कितना था 2025 का बजट

    साल 2025-26 के लिए रक्षा मंत्रालय को 6.81 लाख करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया था। खास बात है कि आंकड़े में 2024-25 की तुलना में 9.53 प्रतिशत का इजाफा किया गया था।

    रक्षा मंत्रालय की 1 फरवरी 2025 को जारी विज्ञप्ति के अनुसार, सशस्त्र बलों के पूंजीगत बजट के तहत 1.80 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। साथ ही घरेलू रक्षा उद्योगों से खरीद के लिए 1.12 लाख करोड़ रुपये निर्धारित हुए। रक्षा अनुसंधान और विकास बजट में 12% की बढ़त हुई थी। भारतीय तटरक्षक बल के पूंजी बजट में 43% की उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई थी।

  • अमेरिकी सेना ने रूसी तेल टैंकर को किया जब्त, हो सकता है महासंग्राम

    अमेरिकी सेना ने रूसी तेल टैंकर को किया जब्त, हो सकता है महासंग्राम

    वाशिंगटन। अमेरिका ने उत्तरी अटलांटिक और कैरिबियन में एक के बाद एक की गई कार्रवाइयों में वेनेजुएला से जुड़े दो प्रतिबंधित तेल टैंकरों को जब्त कर लिया है।
    अमेरिकी यूरोपीय कमान ने “अमेरिकी प्रतिबंधों के उल्लंघन” के आरोप में व्यापारिक पोत बेला 1 को जब्त करने की घोषणा की। तटरक्षक बल के एक कटर ने टैंकर का पीछा करते हुए उसे स्कॉटलैंड और आइसलैंड के बीच के जलक्षेत्र में धकेल दिया, जब उसने वेनेजुएला के आसपास प्रतिबंधित तेल जहाजों पर अमेरिकी नाकाबंदी से बचने की कोशिश की।

    इसके बाद, गृह सुरक्षा सचिव क्रिस्टी नोएम ने खुलासा किया कि अमेरिकी सेना ने कैरिबियन में टैंकर सोफिया पर भी नियंत्रण कर लिया है। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि दोनों जहाज “या तो आखिरी बार वेनेजुएला में रुके थे या उसकी ओर जा रहे थे।”

    जानें अमेरिकी अधिकारी ने क्या कहा

    यूरोप की ओर मुड़ने के बाद बेला 1 को रूसी ध्वज के तहत पंजीकृत किया गया और उसका नाम बदलकर मरीनरा कर दिया गया।

    एक अमेरिकी अधिकारी ने, जिन्होंने संवेदनशील सैन्य अभियानों पर चर्चा करने के लिए नाम न छापने की शर्त पर बुधवार को एसोसिएटेड प्रेस से बात की, बताया कि अमेरिकी सेना ने इसे जब्त करने के बाद कानून प्रवर्तन अधिकारियों को इसका नियंत्रण सौंप दिया। ईरान समर्थित लेबनानी आतंकवादी समूह हिज़्बुल्लाह से जुड़ी एक कंपनी के लिए माल की तस्करी करने के आरोप में इस जहाज पर 2024 में अमेरिका द्वारा प्रतिबंध लगाया गया था।

    एसोसिएटेड प्रेस ने अमेरिकी सेना के हवाले से बताया कि बुधवार को संयुक्त राज्य अमेरिका ने अटलांटिक महासागर में दो सप्ताह से अधिक समय तक चले पीछा करने के बाद वेनेजुएला से जुड़े एक रूसी ध्वज वाले तेल टैंकर को जब्त कर लिया, जबकि एक रूसी पनडुब्बी और युद्धपोत भी पास ही थे।

    रूसी विदेश मंत्रालय ने क्या कहा

    रूसी विदेश मंत्रालय ने जहाज़ ज़ब्त किए जाने से पहले कहा था कि वह रूसी तेल टैंकर मेरिनेरा के आसपास पैदा हुई असामान्य स्थिति पर नज़र रख रहा है। आधिकारिक समाचार एजेंसी तास द्वारा प्रकाशित मंत्रालय के बयान में आगे कहा गया कि “पिछले कई दिनों से अमेरिकी तटरक्षक बल का एक जहाज़ मेरिनेरा का पीछा कर रहा है, जबकि हमारा जहाज़ अमेरिकी तट से लगभग 4,000 किलोमीटर दूर है।” बुधवार को सार्वजनिक समुद्री ट्रैकिंग साइटों ने जहाज़ की स्थिति स्कॉटलैंड और आइसलैंड के बीच उत्तर की ओर बढ़ते हुए दिखाई। अमेरिकी अधिकारी ने भी पुष्टि की कि जहाज़ उत्तरी अटलांटिक में था।

    रूस के परिवहन मंत्रालय ने बुधवार को एक बयान में कहा कि अमेरिकी नौसेना बलों ने “किसी भी देश के क्षेत्रीय जलक्षेत्र के बाहर” मरीनरा टैंकर पर कब्जा कर लिया और “जहाज से संपर्क टूट गया।” मंत्रालय ने कहा कि 24 दिसंबर, 2025 को जहाज को “रूसी कानून और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार जारी रूसी संघ का ध्वज फहराने का अस्थायी परमिट प्राप्त हुआ था।”

    जब्ती की खबर के तुरंत बाद, परिवहन मंत्रालय के बयान में कहा गया कि “किसी भी देश को अन्य देशों के अधिकार क्षेत्र में विधिवत पंजीकृत जहाजों के खिलाफ बल प्रयोग करने का अधिकार नहीं है,” और इसके लिए 1982 के संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन का हवाला दिया गया।