Author: bharati

  • सऊदी अरब की ऐतिहासिक तेल कटौती, 20 साल की सबसे बड़ी कीमत गिरावट से भारत को मिल सकती है बड़ी राहत

    सऊदी अरब की ऐतिहासिक तेल कटौती, 20 साल की सबसे बड़ी कीमत गिरावट से भारत को मिल सकती है बड़ी राहत


    नई दिल्ली । सऊदी अरब ने वैश्विक तेल बाजार में बड़ा कदम उठाते हुए एशियाई ग्राहकों के लिए अपने प्रमुख अरब लाइट क्रूड की कीमत में अगस्त 2026 से प्रभावी ऐतिहासिक कटौती का ऐलान किया है। सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने कीमत में 11 डॉलर प्रति बैरल की कमी की है, जिसे पिछले दो दशकों की सबसे बड़ी कटौती माना जा रहा है। इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय ऑयल मार्केट में हलचल मचा दी है और भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए राहत की उम्मीद बढ़ा दी है।

    क्यों घटाई गई कीमत?

    तेल बाजार में हाल के दिनों में वैश्विक मांग कमजोर हुई है, जबकि आपूर्ति लगातार बढ़ रही है। इजरायल-ईरान तनाव कम होने और हॉर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति सामान्य होने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है। इसी बीच ओपेक प्लस देशों ने भी उत्पादन बढ़ाने पर सहमति बनाई है, जिससे बाजार में सप्लाई और बढ़ गई है। इन परिस्थितियों को देखते हुए सऊदी अरब ने एशियाई बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत करने के लिए कीमतों में बड़ी कटौती की है।

    भारत को क्या होगा फायदा?

    भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है और सऊदी अरब उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। ऐसे में सऊदी की इस कीमत कटौती का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है।

    सबसे पहले, भारत का तेल आयात बिल कम हो सकता है, जिससे चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) पर दबाव घटेगा। विदेशी मुद्रा भंडार पर बोझ कम होने और रुपये को मजबूती मिलने की भी संभावना है।

    यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक नीचे रहती हैं, तो इसका लाभ घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी के रूप में भी मिल सकता है। हालांकि, खुदरा ईंधन कीमतों में बदलाव सरकार की कर नीति और तेल विपणन कंपनियों के मूल्य निर्धारण पर भी निर्भर करेगा।

    महंगाई पर भी पड़ सकता है असर

    कच्चा तेल सस्ता होने से परिवहन लागत घट सकती है, जिसका असर खाद्य पदार्थों, औद्योगिक उत्पादों और लॉजिस्टिक्स पर पड़ता है। इससे महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। साथ ही तेल विपणन कंपनियों के मुनाफे में भी सुधार होने की संभावना जताई जा रही है।

    एशियाई बाजार में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा

    विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब के इस फैसले के बाद अन्य तेल निर्यातक देशों पर भी कीमतों में प्रतिस्पर्धी बदलाव का दबाव बढ़ सकता है। इससे एशियाई बाजार में खरीदारों को बेहतर शर्तों पर कच्चा तेल मिलने की संभावना बनेगी। अगर वैश्विक परिस्थितियां स्थिर रहती हैं और कच्चे तेल की कीमतें इसी स्तर पर बनी रहती हैं, तो भारत सहित कई आयातक देशों को आने वाले महीनों में आर्थिक राहत मिल सकती है।

  • भारत विरोधी साजिशों के बीच पाकिस्तान-यूक्रेन का सीक्रेट गठजोड़: 'ऑपरेशन सिंदूर' में मुंह की खाने के बाद ड्रोन तकनीक के लिए मुनीर सेना ने थामा कीव का हाथ

    भारत विरोधी साजिशों के बीच पाकिस्तान-यूक्रेन का सीक्रेट गठजोड़: 'ऑपरेशन सिंदूर' में मुंह की खाने के बाद ड्रोन तकनीक के लिए मुनीर सेना ने थामा कीव का हाथ

    नई दिल्ली । भारतीय सीमाओं पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत रची गई एक बहुत बड़ी सैन्य साजिश के पूरी तरह विफल होने के बाद पाकिस्तानी सेना और उसके प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की बौखलाहट साफ नजर आ रही है। भारत द्वारा रणनीतिक मोर्चे पर मात खाने और सिंधु जल समझौते को लेकर सख्त रुख अपनाने के बाद पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व अब सीधे युद्ध की धमकियां देने पर उतर आया है। इस करारी शिकस्त और भारी नाकामी के बावजूद पाकिस्तानी सेना के इस अप्रत्याशित आक्रामक तेवर और बढ़े हुए आत्मविश्वास के पीछे एक नया अंतरराष्ट्रीय कोण सामने आ रहा है। रक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिक हलकों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, पाकिस्तान ने अब रूस के साथ भीषण युद्ध में लगे यूक्रेन के साथ एक गुप्त सैन्य समझौता किया है।

    इस गुप्त सैन्य गठजोड़ के तहत यूक्रेन की सेना पाकिस्तानी मिलिट्री को आधुनिक ड्रोन ऑपरेशन्स और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर की सीक्रेट ट्रेनिंग दे रही है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों पाकिस्तानी सेना ने भारत के खिलाफ एक अत्यंत आधुनिक और घातक साजिश रचने का प्रयास किया था, जिसके तहत भारतीय सीमाओं के भीतर महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने के लिए एक साथ करीब 600 ड्रोन्स को लॉन्च करने की योजना बनाई गई थी। हालांकि, भारतीय सुरक्षा बलों की मुस्तैदी और अचूक रक्षा प्रणाली के सामने पाकिस्तानी सेना का यह ‘मेगा ड्रोन प्लान’ पूरी तरह मटियामेट हो गया।

    पाकिस्तानी सेना के अधिकांश लड़ाकू ड्रोन्स को भारतीय सेना ने सीमा पर ही मार गिराया, जबकि कई ड्रोन तकनीकी खामियों के कारण स्वयं ही क्रैश हो गए। इस रणनीतिक विफलता ने पाकिस्तानी जनरलों को यह स्पष्ट संदेश दे दिया कि उनकी मौजूदा सैन्य तकनीक और परिचालन क्षमता भारत के आधुनिक रक्षा तंत्र के सामने बेहद कमजोर और अपर्याप्त है। इसी कमजोरी को छिपाने और आधुनिक युद्ध कौशल सीखने के लिए पाकिस्तान ने अपने पुराने रणनीतिक सहयोगी यूक्रेन का रुख किया है, जो पिछले कई वर्षों से रूस के खिलाफ अत्यधिक हाई-टेक और ड्रोन-आधारित युद्ध लड़ रहा है।

    लगातार जारी इस युद्ध ने यूक्रेन को ‘कामिकेजे ड्रोन्स’ (आत्मघाती ड्रोन) और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-मेजर्स के क्षेत्र में दुनिया का सबसे अनुभवी और युद्ध-प्रशिक्षित देश बना दिया है। अब यूक्रेन अपनी इस सैन्य महारत और युद्ध के अनुभवों को एक कमर्शियल एसेट के रूप में इस्तेमाल करते हुए आर्थिक लाभ के लिए पाकिस्तानी सेना को प्रशिक्षित कर रहा है। पाकिस्तान इस ड्रोन ट्रेनिंग को अपने लिए एक संजीवनी बूटी की तरह देख रहा है, जिसके बल पर वह भारत के हाथों मिली तकनीकी शिकस्त का बदला लेने का सपना देख रहा है। यही मुख्य कारण है कि जनरल मुनीर का कॉन्फिडेंस अचानक बढ़ा हुआ नजर आ रहा है।

    रणनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो सोवियत संघ से अलग होने के बाद यूक्रेन का भारत के प्रति रुख हमेशा से उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पूर्व के वर्षों में यूक्रेन ने कई महत्वपूर्ण वैश्विक मंचों और संयुक्त राष्ट्र में भारत के परमाणु परीक्षणों तथा कश्मीर मुद्दे पर नई दिल्ली की नीतियों के खिलाफ रुख अपनाया था। हालांकि, बाद के वर्षों में यूक्रेन की आधिकारिक नीति में बड़ा कूटनीतिक बदलाव देखा गया और उसने जम्मू-कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच का एक द्विपक्षीय मामला मानते हुए इसे 1972 के शिमला समझौते के तहत सुलझाने की बात कही थी। परंतु, वर्तमान में पाकिस्तान के साथ उसका यह गुप्त सैन्य सहयोग भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाने वाला है।

  • भारत-इंडोनेशिया के सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊंचाई: 1170 साल पुराने प्राम्बानन शिव मंदिर के जीर्णोद्धार में तकनीक और एआई की मदद देगा भारत

    भारत-इंडोनेशिया के सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊंचाई: 1170 साल पुराने प्राम्बानन शिव मंदिर के जीर्णोद्धार में तकनीक और एआई की मदद देगा भारत

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान भारत और इंडोनेशिया के बीच ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक साझेदारी को एक नई और अभूतपूर्व मजबूती मिलने जा रही है। वैश्विक भू-राजनीति में जारी उथल-पुथल के बीच दोनों देश अपने प्राचीन संबंधों को रणनीतिक दिशा देने में जुट गए हैं। इस महत्वपूर्ण राजनयिक पहल के तहत भारत, इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित 1170 साल पुराने ऐतिहासिक प्राम्बानन शिव मंदिर परिसर के जीर्णोद्धार और संरक्षण कार्य में अपना तकनीकी सहयोग प्रदान करेगा। यह प्राचीन हिंदू मंदिर परिसर वर्तमान में यूनेस्को (UNESCO) का एक प्रतिष्ठित विश्व धरोहर स्थल है।

    इस विशाल मंदिर परिसर के इतिहास की खोज का सफर काफी दिलचस्प रहा है। वर्ष 1733 में डच औपनिवेशिक शासन के दौरान एक अधिकारी ने जावा के जंगलों में पत्थरों का एक विशाल ढेर देखा था, जिसे स्थानीय लोग ‘रोरो जोंग्रांग’ नामक राजकुमारी की लोककथा से जोड़कर देखते थे। इसके बाद 19वीं और 20वीं शताब्दी में जब इस स्थान पर वैज्ञानिक पद्धति से खुदाई की गई, तब वहां पत्थरों पर प्राचीन संस्कृत और पुरानी जावानीज भाषा में लिखे कई महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुए। इन शिलालेखों में इस स्थान को ‘शिवगृह’ के रूप में संबोधित किया गया था और इस पर वर्ष 856 अंकित था, जिससे इसके शिव मंदिर होने की आधिकारिक पुष्टि हुई।

    ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इस भव्य मंदिर का निर्माण मातरम साम्राज्य के हिंदू संजय वंश के राजाओं द्वारा करवाया गया था। इसकी शुरुआत राजा राकाई पिकातन ने वर्ष 850 के आसपास की थी, जबकि मुख्य शिव मंदिर का उद्घाटन उनके उत्तराधिकारी राजा लोकपाल ने वर्ष 856 में संपन्न कराया था। यह परिसर केवल भगवान शिव को ही समर्पित नहीं है, बल्कि यह हिंदू धर्म के तीनों मुख्य देवताओं—ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित होने के कारण ‘त्रिमूर्ति मंदिर’ भी कहलाता है। परिसर का मुख्य शिव मंदिर लगभग 47 मीटर ऊंचा है और इसकी दीवारों पर पत्थरों को तराशकर रामायण की संपूर्ण गाथा अत्यंत खूबसूरती से उकेरी गई है।

    ऐतिहासिक शोधों से स्पष्ट होता है कि इंडोनेशिया में हिंदू धर्म का प्रसार किसी सैन्य आक्रमण या बलप्रयोग के कारण नहीं, बल्कि ईसा की पहली शताब्दी में भारत के दक्षिणी छोर (वर्तमान तमिलनाडु) से समुद्री जहाजों द्वारा पहुंचे व्यापारियों के माध्यम से हुआ था। इन व्यापारियों के साथ गई हिंदू संस्कृति, कला, संस्कृत भाषा और पूजा पद्धतियों ने स्थानीय राजाओं को काफी प्रभावित किया, जिसके बाद उन्होंने भारत से विद्वान ब्राह्मणों को अपने राज्य में आमंत्रित किया। बाद में 10वीं शताब्दी के दौरान पास के मेरापी ज्वालामुखी में हुए भीषण विस्फोट और भूकंप के कारण इस क्षेत्र की आबादी को पूर्व की ओर पलायन करना पड़ा, जिससे यह संस्कृति मुख्य रूप से बाली द्वीप तक ही सीमित रह गई।

    अब इस नए दौर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के विशेषज्ञ इस प्राचीन धरोहर को पुनर्जीवित करने के लिए इंडोनेशियाई प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इस जीर्णोद्धार कार्य में ‘अनास्टाइलोसिस’ तकनीक का उपयोग किया जाएगा, जिसके तहत परिसर में बिखरे मूल पत्थरों को ही आपस में जोड़कर मंदिर को उसकी पुरानी शक्ल दी जाएगी। इस जटिल कार्य को सुगम बनाने के लिए आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक का भी सहारा लिया जाएगा, जो पत्थरों के सटीक मिलान में मदद करेगी। शुरुआत में इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत एक या दो छोटे मंदिरों पर काम शुरू किया जाएगा। वैश्विक पटल पर यह अनूठी पहल दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश और सबसे बड़ी हिंदू आबादी वाले देश के बीच आपसी सौहार्द का एक बेजोड़ उदाहरण पेश कर रही है।

  • 14 जुलाई को आषाढ़ अमावस्या का महायोग स्नान दान और इन उपायों से मिलेगी सुख समृद्धि की सौगात

    14 जुलाई को आषाढ़ अमावस्या का महायोग स्नान दान और इन उपायों से मिलेगी सुख समृद्धि की सौगात


    नई दिल्ली । 14 जुलाई 2026 को आषाढ़ अमावस्या मंगलवार के दिन पड़ रही है। मंगलवार के साथ अमावस्या का संयोग बनने के कारण इसे भौमवती अमावस्या कहा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह तिथि स्नान दान पितरों के तर्पण और भगवान हनुमान की आराधना के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। माना जाता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि विधान से किए गए धार्मिक कार्यों से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है तथा जीवन में सुख शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    धार्मिक परंपराओं के अनुसार आषाढ़ अमावस्या की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी सरोवर या घर पर गंगाजल मिले जल से स्नान करना शुभ माना जाता है। इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर पितरों का स्मरण किया जाता है। जिन लोगों के लिए संभव हो वे तिल और जल से पितरों का तर्पण भी कर सकते हैं। मान्यता है कि इससे पितृ दोष के प्रभाव को कम करने में सहायता मिलती है और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    चूंकि इस बार अमावस्या मंगलवार को पड़ रही है इसलिए भगवान हनुमान की पूजा का महत्व और बढ़ जाता है। इस दिन हनुमान मंदिर में जाकर सिंदूर चमेली का तेल लाल फूल और गुड़ चने का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है। हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ करने से मानसिक शांति साहस और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है।

    आषाढ़ अमावस्या पर दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंद लोगों को अन्न वस्त्र तिल गुड़ फल या दक्षिणा का दान करना पुण्यदायी माना जाता है। गाय को हरा चारा खिलाना और पक्षियों को दाना पानी देना भी शुभ माना जाता है। इन कार्यों को सेवा और करुणा की भावना से करने की परंपरा रही है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन एक सरल उपाय भी किया जाता है। शाम के समय दो या तीन लौंग के साथ कपूर जलाकर पूरे घर में उसका धुआं किया जाता है। मान्यता है कि इससे घर की नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मक वातावरण बनता है। हालांकि इसे धार्मिक आस्था का हिस्सा माना जाता है और इसके आध्यात्मिक महत्व को ही प्रमुखता दी जाती है।

    आषाढ़ अमावस्या के दिन क्रोध झूठ और अनावश्यक विवाद से बचने की सलाह दी जाती है। सात्विक भोजन करना ईश्वर का स्मरण करना और जरूरतमंद लोगों की सहायता करना इस दिन के शुभ कार्यों में शामिल माना गया है। कई श्रद्धालु इस अवसर पर व्रत रखकर दिनभर पूजा पाठ और दान पुण्य करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भौमवती अमावस्या आत्मचिंतन सेवा और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर है। श्रद्धा और विश्वास के साथ किए गए स्नान दान तर्पण और हनुमान जी की आराधना से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने तथा सुख समृद्धि की प्राप्ति होने की मान्यता है। हालांकि इन मान्यताओं को आस्था और परंपरा के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।

  • भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी के सभी कानूनी रास्ते बंद: मानवाधिकार अदालत में आखिरी लड़ाई भी हारा, प्रत्यर्पण की प्रशासनिक औपचारिकताएं शुरू

    भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी के सभी कानूनी रास्ते बंद: मानवाधिकार अदालत में आखिरी लड़ाई भी हारा, प्रत्यर्पण की प्रशासनिक औपचारिकताएं शुरू

    नई दिल्ली । पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) घोटाले के मुख्य आरोपी और लंबे समय से फरार चल रहे हीरा कारोबारी नीरव मोदी को भारत लाए जाने की दिशा में एक बहुत बड़ी सफलता हाथ लगी है। यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स (ECHR) में अपनी आखिरी कानूनी लड़ाई हारने के बाद अब नीरव मोदी का भारत प्रत्यर्पण पूरी तरह से तय हो गया है। राजनयिक और आधिकारिक सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, ब्रिटेन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरव मोदी के पास मौजूद सभी कानूनी विकल्प अब पूरी तरह से समाप्त हो चुके हैं। इसके साथ ही ब्रिटिश सरकार की ओर से उसे भारत सौंपने की प्रशासनिक प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।

    इससे पहले यह तथ्य सामने आया था कि स्ट्रैसबर्ग स्थित यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स ने नीरव मोदी द्वारा दायर की गई याचिका को पूरी तरह गोपनीय रखा था। इस अदालत की यह स्थापित प्रक्रिया है कि मामलों के लंबित रहने के दौरान वह किसी भी प्रकार की जानकारी सार्वजनिक नहीं करती है। नीरव मोदी ने ब्रिटेन की अदालतों में अपने सभी कानूनी रास्ते बंद होने के बाद अप्रैल 2026 में ईसीएचआर का दरवाजा खटखटाया था। इस कदम से ठीक पहले यूके सरकार ने उसे तुरंत भारत भेजने से संबंधित आवश्यक प्रत्यर्पण दस्तावेजों को अपनी मंजूरी दे दी थी, जिसे रोकने के लिए उसने मानवाधिकार अदालत की शरण ली थी।

    नीरव मोदी द्वारा अंतरराष्ट्रीय अदालत में यह याचिका तब दायर की गई थी, जब यूके हाईकोर्ट ने उसे प्रत्यर्पण के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत में अपील करने की अनुमति देने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया था। ब्रिटिश अदालत ने अपने फैसले में माना था कि भारत सरकार द्वारा भारतीय जेलों की स्थिति, चिकित्सा सुविधाओं और आरोपी की सुरक्षा को लेकर दिए गए आश्वासन पूरी तरह से पर्याप्त और संतोषजनक हैं। अब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार अदालत द्वारा भी किसी भी प्रकार की राहत देने से मना किए जाने के बाद उसके प्रत्यर्पण के मार्ग में मौजूद अंतिम तकनीकी और कानूनी अड़चन भी समाप्त हो गई है।

    उल्लेखनीय है कि नीरव मोदी मार्च 2019 में लंदन में अपनी गिरफ्तारी के बाद से ही वहां की वांड्सवर्थ जेल में न्यायिक हिरासत में बंद है। भारत में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडीडी) को पीएनबी धोखाधड़ी, कर्ज जालसाजी और मनी लॉन्ड्रिंग के बेहद गंभीर मामलों में उसकी लंबे समय से तलाश है। भारतीय जांच एजेंसियों ने ब्रिटेन की अदालत में बेहद प्रभावी ढंग से पैरवी की है, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश अधिकारियों ने अब उसे भारतीय कानून के हवाले करने की अंतिम कागजी कार्रवाई शुरू कर दी है और उसे किसी भी समय भारत लाया जा सकता है।

    इससे पूर्व, लंदन की हाईकोर्ट ऑफ जस्टिस ने नीरव मोदी की उस याचिका को भी पूरी तरह खारिज कर दिया था, जिसमें उसने अपने प्रत्यर्पण आदेश के खिलाफ बंद हो चुकी अदालती कार्यवाही को दोबारा शुरू करने की गुहार लगाई थी। नीरव मोदी ने ब्रिटेन के एक अन्य चर्चित मामले का हवाला देते हुए दावा किया था कि भारत भेजे जाने पर उसे प्रताड़ना और मानसिक टॉर्चर का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, भारतीय जांच एजेंसी सीबीआई के अधिकारियों ने अदालत में अकाट्य तथ्य और पुख्ता सबूत पेश कर नीरव मोदी के इन दावों को पूरी तरह से खारिज करवा दिया, जिसके बाद अदालत ने उसकी दलीलों को आधारहीन माना था।

  • पीओके में 1971 जैसा जनविद्रोह: ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में पाकिस्तानी फौज को चुनौती, मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी के बीच उठी भारत में विलय की मांग

    पीओके में 1971 जैसा जनविद्रोह: ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में पाकिस्तानी फौज को चुनौती, मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी के बीच उठी भारत में विलय की मांग

    नई दिल्ली । वर्ष 1971 में पाकिस्तान की दमनकारी नीतियों और सैन्य बर्बरता के परिणामस्वरूप तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में विद्रोह की जो आग भड़की थी, उसने इतिहास की दिशा बदलते हुए बांग्लादेश को जन्म दिया था। आज करीब 55 साल बाद, इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता हुआ प्रतीत हो रहा है। इस बार बगावत का यह मुख्य केंद्र पूर्वी पाकिस्तान नहीं, बल्कि पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला कश्मीर यानी पीओके बना हुआ है। पिछले कई दिनों से जारी भारी विरोध प्रदर्शनों के कारण स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण हो गई है और राजनीतिक विश्लेषक अब पाकिस्तान के एक और संभावित विभाजन की अटकलें लगाने लगे हैं।

    पीओके के मुजफ्फरराबाद, डड्याल, रावलकोट और मीरपुर जैसे प्रमुख शहरों में स्थानीय अवाम अपनी बुनियादी जरूरतों जैसे आटा, चावल और सस्ती बिजली की मांग को लेकर सड़कों पर उतरी है। इस शांतिपूर्ण नागरिक प्रदर्शन को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना और सरकार द्वारा अत्यधिक दमनकारी नीतियां अपनाई जा रही हैं। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए सैन्य बलों ने प्रमुख पुलों और रास्तों को अपने नियंत्रण में ले लिया है और भीड़ पर सीधे गोलीबारी की है। इस सैन्य कार्रवाई में अब तक दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं और कई नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, जिससे क्षेत्र में आक्रोश की अग्नि और अधिक धधक गई है।

    वर्तमान में पीओके के भीतर जो परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं, वे काफी हद तक 1971 के घटनाक्रम से मेल खाती हैं। उस दौर में जिस प्रकार तत्कालीन केंद्र सरकार पूर्वी पाकिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर उसे पश्चिमी हिस्से के विकास में लगाती थी, ठीक वैसा ही व्यवहार आज पीओके के साथ किया जा रहा है। क्षेत्र में स्थित जलविद्युत बांधों से बड़े पैमाने पर बिजली का उत्पादन तो किया जाता है, परंतु उसका लाभ स्थानीय निवासियों को देने के बजाय पाकिस्तान के अन्य प्रांतों को भेज दिया जाता है, जिससे पूरा पीओके अक्सर अंधेरे में डूबा रहता है।

    इस दमन और शोषण के विरुद्ध लड़ रहे लोगों की आवाज को संगठित करने के लिए वहां ‘ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (JAAC) नामक संस्था प्रमुख भूमिका निभा रही है, जिसकी तुलना जानकार 1971 की ‘मुक्ति वाहिनी’ से कर रहे हैं। हालांकि, इस ऐतिहासिक घटनाक्रम और वर्तमान आंदोलन में एक बड़ा वैचारिक अंतर भी साफ देखा जा सकता है। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र की मांग कर रहा था, जबकि आज पीओके की जनता न केवल पाकिस्तान से पूर्ण मुक्ति चाहती है, बल्कि वे सार्वजनिक रूप से भारत के पक्ष में नारे लगाते हुए भारत सरकार से सैन्य व कूटनीतिक हस्तक्षेप की गुहार लगा रहे हैं।

    इस बेहद गंभीर मानवीय संकट के बावजूद, वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों का ढोल पीटने वाले कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और प्रमुख पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने इस विषय पर पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। कश्मीर के नाम पर अक्सर भारत के खिलाफ नकारात्मक प्रचार करने वाले वैश्विक मंच और समाचार एजेंसियां पीओके में हो रहे इस दमन पर मौन हैं। दूसरी ओर, भारत का रुख इस मामले पर हमेशा से अत्यंत स्पष्ट रहा है कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और पीओके भारत का अभिन्न अंग है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की उपेक्षा के बीच एलओसी के उस पार से उठ रही यह पुकार आने वाले समय में दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को एक नया मोड़ दे सकती है।

  • बदरीनाथ चढ़ावा विवाद में नया खुलासा, आरोपी कर्मचारी को मिला प्रमोशन और नोट गिनने की जिम्मेदारी

    बदरीनाथ चढ़ावा विवाद में नया खुलासा, आरोपी कर्मचारी को मिला प्रमोशन और नोट गिनने की जिम्मेदारी


    नई दिल्ली । उत्तराखंड के प्रसिद्ध बदरीनाथ धाम में चढ़ावे में कथित हेराफेरी के मामले ने नया मोड़ ले लिया है। जांच के बीच सामने आई जानकारी के अनुसार, आरोपों के घेरे में आए कर्मचारी को मंदिर समिति में लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जाती रहीं। यही नहीं, उन्हें पदोन्नति देकर चढ़ावे की गणना जैसे संवेदनशील कार्य में भी लगाया गया था, जिससे पूरे मामले पर नए सवाल खड़े हो गए हैं।

    जानकारी के मुताबिक संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति वर्ष 2014 में इंटरनेट कोऑर्डिनेटर के रूप में हुई थी। यह ऐसा पद था, जहां पदोन्नति की व्यवस्था नहीं थी। इसके बावजूद वर्ष 2018 में उन्हें व्यक्तिगत सहायक के पद पर समायोजित किया गया। बाद में नियमों में संशोधन कर उनके लिए जनसंपर्क विशेष अधिकारी पद तक पदोन्नति का रास्ता भी तैयार किया गया। इसी दौरान उन्हें मंदिर में आने वाले चढ़ावे की गणना की जिम्मेदारी भी सौंपी गई।

    जांच समिति की रिपोर्ट का इंतजार

    मामले की जांच के लिए गठित समिति को अपनी रिपोर्ट सौंपनी है, हालांकि समिति के सभी सदस्य अब तक बदरीनाथ नहीं पहुंचे हैं। रिपोर्ट मिलने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

    बीकेटीसी अध्यक्ष ने क्या कहा

    बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर स्वतंत्र या प्रशासनिक जांच भी कराई जा सकती है। उनका कहना है कि संबंधित कर्मचारी मंदिर समिति का स्थायी कर्मचारी है और विभिन्न अध्यक्षों के साथ कार्य कर चुका है। शिकायत मिलने के दिन ही जांच समिति गठित कर संबंधित कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया था।

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर परिसर में सीसीटीवी कैमरे बदले जरूर गए हैं, लेकिन पुराने कैमरों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखा गया है। यात्रा सीजन में कर्मचारियों की कमी के कारण कई बार अलग-अलग विभागों के कर्मचारियों को अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी दी जाती हैं।

    संपत्ति की भी होगी जांच

    मंदिर समिति ने संकेत दिए हैं कि संदेह के घेरे में आए कर्मचारियों की संपत्ति की भी जांच की जाएगी। समिति के अनुसार चढ़ावे की राशि प्रतिदिन बैंक में जमा होती है और उसकी गणना बैंक प्रतिनिधि, गणना अधिकारी तथा तीर्थयात्रियों की मौजूदगी में की जाती है। अब तक रिकॉर्ड में किसी तरह की ओवरराइटिंग सामने नहीं आई है।

    कांग्रेस ने उठाए निष्पक्ष जांच पर सवाल

    प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने जांच समिति की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिन लोगों पर आरोप हैं, उनसे जुड़े अधिकारियों को ही जांच में शामिल करना उचित नहीं है। उन्होंने इस पूरे मामले की जांच विधानसभा की संयुक्त समिति या उच्च न्यायालय की निगरानी में कराने की मांग की है। कांग्रेस का कहना है कि निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के बिना श्रद्धालुओं का विश्वास बहाल नहीं हो सकता। अब सभी की निगाहें जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई और जिम्मेदारियों का निर्धारण किया जाएगा।

  • योगिनी एकादशी व्रत की तारीख और शुभ मुहूर्त घोषित: दो दिन तिथि होने से गृहस्थ और वैष्णव संप्रदाय के लिए अलग-अलग नियम, दशमी से ही शुरू हो जाएंगे कड़े नियम

    योगिनी एकादशी व्रत की तारीख और शुभ मुहूर्त घोषित: दो दिन तिथि होने से गृहस्थ और वैष्णव संप्रदाय के लिए अलग-अलग नियम, दशमी से ही शुरू हो जाएंगे कड़े नियम


    नई दिल्ली ।
    हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है, जिसमें आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को ‘योगिनी एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। पौराणिक ग्रंथों और पद्मपुराण के अनुसार, इस व्रत को विधि-विधान के साथ करने से व्रती को 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस व्रत को सच्चे मन से रखने पर व्यक्ति के समस्त संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। इस वर्ष एकादशी तिथि दो दिनों में विभाजित होने के कारण आम जनमानस में व्रत की सही तारीख को लेकर काफी असमंजस की स्थिति बनी हुई थी, जिसे पंचांग की गणनाओं के आधार पर स्पष्ट कर दिया गया है।

    द्रिक पंचांग के विश्लेषण के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण एकादशी तिथि की शुरुआत 10 जुलाई, शुक्रवार को सुबह 8 बजकर 16 मिनट पर होने जा रही है। इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 11 जुलाई, शनिवार को सुबह 5 बजकर 22 मिनट पर होगा। इस बार विशेष स्थिति यह बन रही है कि दोनों ही दिन एकादशी तिथि सूर्योदय के समय पूर्ण रूप से व्याप्त नहीं है। शनिवार 11 जुलाई को सुबह 5 बजकर 22 मिनट के बाद ही द्वादशी तिथि का प्रारंभ हो जाएगा, जिससे ज्योतिषीय गणना के अनुसार 11 जुलाई को एकादशी तिथि का क्षय माना गया है। शास्त्रों में वर्णित नियमों के अनुसार, जब दोनों दिन सूर्यकाल में एकादशी तिथि व्याप्त न हो, तब पहले दिन ही व्रत रखना श्रेयस्कर होता है।

    इस पंचांगीय नियम के आधार पर सभी गृहस्थ लोगों के लिए 10 जुलाई को ही योगिनी एकादशी का व्रत रखना पूरी तरह से मान्य और शास्त्रसम्मत होगा। दूसरी ओर, वैष्णव संप्रदाय से जुड़े श्रद्धालु और संत समाज के लोग अगले दिन यानी 11 जुलाई को इस एकादशी का व्रत अनुष्ठान कर सकते हैं। तिथि के इस विभाजन के कारण दोनों ही पक्षों के लिए व्रत के पारण का समय भी अलग-अलग निर्धारित किया गया है, जिसका कड़ाई से पालन करना व्रत की पूर्णता के लिए आवश्यक माना जाता है।

    जो श्रद्धालु 10 जुलाई, शुक्रवार को योगिनी एकादशी का उपवास रखेंगे, वे अगले दिन 11 जुलाई को अपने व्रत का पारण करेंगे। गृहस्थों के लिए 11 जुलाई को पारण का शुभ समय दोपहर 1 बजकर 50 मिनट से लेकर शाम 4 बजकर 36 मिनट तक निर्धारित किया गया है। इसके विपरीत, जो वैष्णव जन 11 जुलाई, शनिवार को एकादशी का व्रत रखेंगे, उनके लिए पारण की समय अवधि अगले दिन यानी 12 जुलाई की सुबह 5 बजकर 32 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 18 मिनट तक रहेगी। व्रत खोलने के इस नियत समय का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत का पालन करने वाले श्रद्धालुओं को दशमी तिथि से ही कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। इसके तहत दशमी तिथि यानी 9 जुलाई की शाम से ही केवल सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और भोजन में लहसुन, प्याज, बैंगन, मूंग तथा मसूर की दाल जैसी वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिए। व्रत के मुख्य दिन बाल, नाखून काटना और बाल धोना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। व्रतियों को इस दिन अन्न का पूरी तरह त्याग कर केवल फलाहार करना चाहिए और पूरे विधि-विधान से भगवान विष्णु की आराधना में समय बिताना चाहिए।

  • जब अस्पताल के बिस्तर से मीना कुमारी ने गुलजार को दी थीं अपनी डायरियां, अमर हो गई दोस्ती

    जब अस्पताल के बिस्तर से मीना कुमारी ने गुलजार को दी थीं अपनी डायरियां, अमर हो गई दोस्ती


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा की ‘ट्रेजडी क्वीन’ कही जाने वाली मीना कुमारी अपनी दमदार अदाकारी के साथ-साथ संवेदनशील शायरी के लिए भी जानी जाती थीं। पर्दे पर दर्द को जीवंत करने वाली मीना कुमारी की निजी जिंदगी भी अकेलेपन और संघर्षों से भरी रही। उनके जीवन के अंतिम दिनों से जुड़ा एक भावुक किस्सा आज भी फिल्म प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय है।

    शायरी ने जोड़े थे मीना और गुलजार

    मीना कुमारी की शादीशुदा जिंदगी में दूरियां बढ़ने लगी थीं। इसी दौर में फिल्म ‘बेनजीर’ के दौरान उनकी मुलाकात लेखक, गीतकार और फिल्मकार गुलजार से हुई। दोनों के बीच साहित्य, कविता और शायरी को लेकर गहरा जुड़ाव बना। गुलजार ने मीना कुमारी के भीतर छिपी कवयित्री को पहचानते हुए उन्हें लगातार लिखने के लिए प्रेरित किया। धीरे-धीरे यह रिश्ता आपसी सम्मान, संवेदनाओं और शब्दों की दुनिया में गहरी दोस्ती में बदल गया।

    गंभीर बीमारी के बीच भी निभाया काम का वादा

    जीवन के अंतिम वर्षों में मीना कुमारी लिवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। इसके बावजूद उन्होंने अपने पेशेवर दायित्व निभाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। खराब स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने गुलजार की पहली निर्देशित फिल्म ‘मेरे अपने’ की शूटिंग पूरी की।

    आखिरी वक्त की सबसे अनमोल सौगात

    31 मार्च 1972 को मीना कुमारी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। कहा जाता है कि अस्पताल में अपने अंतिम दिनों के दौरान उन्होंने अपनी सबसे प्रिय धरोहर अपनी निजी डायरियां गुलजार को सौंप दी थीं। इन डायरियों में उनकी लिखी नज्में, गजलें और निजी भावनाएं दर्ज थीं। मीना कुमारी का विश्वास था कि उनके शब्दों की असली अहमियत अगर कोई समझ सकता है, तो वह गुलजार ही हैं।

    गुलजार ने निभाया भरोसा

    मीना कुमारी के निधन के बाद गुलजार ने उनकी डायरियों को सहेजकर रखा और बाद में उनकी रचनाओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराया। इन प्रकाशित रचनाओं ने दुनिया को यह बताया कि मीना कुमारी सिर्फ एक महान अभिनेत्री ही नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील और प्रतिभाशाली शायरा भी थीं।

    आज भी उनकी कविताएं और नज्में पाठकों के बीच उतनी ही लोकप्रिय हैं, जितनी उनकी फिल्में दर्शकों के बीच हैं। मीना कुमारी और गुलजार की यह दोस्ती हिंदी सिनेमा और साहित्य की दुनिया में विश्वास, सम्मान और संवेदनाओं की एक अनूठी मिसाल मानी जाती है।

  • अगर सस्पेंस थ्रिलर पसंद है तो मिस न करें 'जुबली', 8.3 IMDb रेटिंग वाली दमदार सीरीज

    अगर सस्पेंस थ्रिलर पसंद है तो मिस न करें 'जुबली', 8.3 IMDb रेटिंग वाली दमदार सीरीज


    नई दिल्ली । अगर आप ऐसी वेब सीरीज की तलाश में हैं जिसमें सिर्फ एक्शन या गोलीबारी नहीं, बल्कि दमदार कहानी, शानदार अभिनय और लगातार बना रहने वाला सस्पेंस हो, तो ‘जुबली’ आपके लिए बेहतरीन विकल्प हो सकती है। साल 2023 में रिलीज हुई यह पीरियड ड्रामा-सस्पेंस सीरीज दर्शकों और समीक्षकों दोनों की सराहना बटोर चुकी है।

    अमेजन प्राइम वीडियो पर उपलब्ध इस 10 एपिसोड की सीरीज की कहानी भारत की आजादी से ठीक पहले और उसके बाद के दौर की फिल्म इंडस्ट्री के इर्द-गिर्द घूमती है। इसमें 1940 और 50 के दशक की मुंबई, फिल्म स्टूडियो, पुरानी कारें और उस दौर की चमक-दमक को बेहद बारीकी से पर्दे पर उतारा गया है।

    क्या है कहानी?

    कहानी की शुरुआत मशहूर रॉय टॉकीज स्टूडियो से होती है, जहां एक नए हीरो की तलाश चल रही है। इसी दौरान फिल्मी दुनिया के रिश्ते, महत्वाकांक्षा, प्यार, विश्वासघात और सत्ता की राजनीति कहानी को अप्रत्याशित मोड़ों तक पहुंचा देती है।

    एक तरफ स्टूडियो का मालिक अपनी प्रतिष्ठा बचाने की कोशिश करता है, तो दूसरी ओर एक साधारण लैब असिस्टेंट हालात के चलते अपनी पहचान बदलने का सपना देखने लगता है। इसी के समानांतर कराची से आया एक शरणार्थी युवक फिल्म निर्देशक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचता है, जबकि लखनऊ से आई एक डांसर भी अपनी किस्मत बदलने की जद्दोजहद में जुट जाती है।

    इन सभी किरदारों की किस्मत एक-दूसरे से इस तरह जुड़ती है कि साजिश, धोखा और महत्वाकांक्षा की परतें धीरे-धीरे खुलती जाती हैं। सीरीज का क्लाइमेक्स कई दर्शकों के लिए अप्रत्याशित साबित होता है।

    क्यों देखें यह सीरीज?

    ‘जुबली’ सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि सफलता पाने की चाह इंसान को किस हद तक बदल सकती है। इसकी सिनेमैटोग्राफी, बैकग्राउंड म्यूजिक और पीरियड सेट डिजाइन इसकी सबसे बड़ी खूबियों में शामिल हैं। कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और हर एपिसोड के साथ रोमांच बढ़ता जाता है।

    स्टारकास्ट और रेटिंग

    सीरीज में प्रोसेनजीत चटर्जी, अपारशक्ति खुराना, सिद्धांत गुप्ता, अदिति राव हैदरी, वामिका गब्बी और राम कपूर ने दमदार अभिनय किया है। IMDb पर इसे 8.3/10 की रेटिंग मिली है, जो इसे हाल के वर्षों की चर्चित भारतीय वेब सीरीज में शामिल करती है।

    ओटीटी प्लेटफॉर्म: अमेजन प्राइम वीडियो