Category: Economy

  • बड़े पैमाने पर नए पीएनजी कनेक्शनों से गैस नेटवर्क का तेजी से विस्तार और ऊर्जा बदलाव को बढ़ावा

    बड़े पैमाने पर नए पीएनजी कनेक्शनों से गैस नेटवर्क का तेजी से विस्तार और ऊर्जा बदलाव को बढ़ावा

    नई दिल्ली: वैश्विक तनावों और आपूर्ति संबंधी आशंकाओं के बीच देश में घरेलू एलपीजी आपूर्ति पूरी तरह सामान्य बनी हुई है और वितरण प्रणाली बिना किसी बाधा के सुचारू रूप से काम कर रही है। सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार देशभर में गैस की उपलब्धता स्थिर है और उपभोक्ताओं को समय पर सिलेंडर की डिलीवरी सुनिश्चित की जा रही है। किसी भी क्षेत्र में गैस की कमी या एजेंसियों पर आपूर्ति रुकने जैसी स्थिति सामने नहीं आई है, जिससे उपभोक्ताओं में भरोसा बना हुआ है।

    आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार एलपीजी की ऑनलाइन बुकिंग के मुकाबले डिलीवरी दर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और यह अब लगभग पूर्ण स्तर के करीब पहुंच चुकी है। डिजिटल सत्यापन प्रणाली के उपयोग से डिलीवरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सुरक्षित हुई है, जिससे गैस के गलत इस्तेमाल और कालाबाजारी पर प्रभावी नियंत्रण संभव हुआ है। इससे उपभोक्ताओं को सीधे और समय पर सेवा मिल रही है और आपूर्ति श्रृंखला अधिक मजबूत हुई है।

    सरकार ने पाइप्ड नेचुरल गैस कनेक्शन के विस्तार पर भी तेजी से काम किया है और लाखों नए कनेक्शनों को सक्रिय किया गया है। इसके साथ ही बड़ी संख्या में उपभोक्ता पारंपरिक एलपीजी से पाइप्ड गैस की ओर स्थानांतरित हो रहे हैं, जिससे शहरी गैस वितरण नेटवर्क का विस्तार और मजबूत हो रहा है। यह बदलाव ऊर्जा क्षेत्र में संरचनात्मक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    घरेलू और व्यावसायिक गैस आपूर्ति में प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को विशेष रूप से सुरक्षित रखा गया है। अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और आवश्यक सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों को निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है। इसके अलावा औद्योगिक क्षेत्रों में भी मांग के अनुसार आपूर्ति बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है ताकि उत्पादन और सेवाओं पर कोई असर न पड़े।

    सरकार ने छोटे उपभोक्ताओं और प्रवासी श्रमिकों के लिए भी विशेष व्यवस्था की है जिसके तहत छोटे सिलेंडरों की उपलब्धता बढ़ाई गई है। इससे उन वर्गों को राहत मिली है जो सीमित संसाधनों में दैनिक उपयोग के लिए एलपीजी पर निर्भर हैं। साथ ही डिजिटल बुकिंग प्रणाली को बढ़ावा देकर वितरण को अधिक सहज और संपर्क रहित बनाया गया है।

    इस अवधि में एलपीजी की खपत और बिक्री के आंकड़ों में भी वृद्धि दर्ज की गई है जो यह दर्शाता है कि मांग के बावजूद आपूर्ति व्यवस्था मजबूत बनी हुई है। सरकार का दावा है कि बढ़ती मांग को देखते हुए उत्पादन और वितरण क्षमता दोनों को लगातार बढ़ाया जा रहा है ताकि भविष्य में किसी प्रकार की कमी न हो।

    इसके साथ ही बाजार में जमाखोरी और अवैध वितरण पर सख्त निगरानी रखी जा रही है और कई स्तरों पर कार्रवाई की जा रही है। निरीक्षण और छापेमारी की गतिविधियों से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि उपभोक्ताओं तक उचित दर पर गैस पहुंचे और किसी प्रकार की अनियमितता न हो।

    ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सरकार ने वैकल्पिक ईंधन विकल्पों को भी बढ़ावा दिया है जिससे एलपीजी पर दबाव कम किया जा सके। साथ ही कोयला और अन्य पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की आपूर्ति बढ़ाकर समग्र ऊर्जा संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है।

    विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा कदमों से देश की ऊर्जा आपूर्ति प्रणाली अधिक स्थिर और लचीली हुई है जिससे किसी भी वैश्विक संकट का असर घरेलू उपभोक्ताओं पर सीमित रह जाता है।

  • वित्तीय निगरानी को मजबूत करने के लिए प्रमुख नियामक संस्थानों के बीच ऐतिहासिक और व्यापक समझौता

    वित्तीय निगरानी को मजबूत करने के लिए प्रमुख नियामक संस्थानों के बीच ऐतिहासिक और व्यापक समझौता

    नई दिल्ली :वित्तीय प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने और मनी लॉन्ड्रिंग जैसी अवैध गतिविधियों पर सख्ती से अंकुश लगाने के उद्देश्य से देश के प्रमुख वित्तीय नियामक संस्थानों के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। इस पहल के तहत फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट इंडिया ने सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया तथा पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी के साथ अलग अलग समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं। इस कदम को भारत की वित्तीय निगरानी व्यवस्था को और अधिक मजबूत और समन्वित बनाने की दिशा में एक अहम प्रयास माना जा रहा है।

    इस समझौते का मुख्य उद्देश्य वित्तीय क्षेत्र से जुड़ी विभिन्न एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना और संदिग्ध वित्तीय गतिविधियों की समय पर पहचान सुनिश्चित करना है। इसके माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद के वित्तपोषण और अन्य वित्तीय अपराधों पर रोक लगाने के लिए एक मजबूत ढांचा विकसित करने की योजना है। विभिन्न नियामक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय से जांच और निगरानी की प्रक्रिया अधिक तेज और सटीक होने की उम्मीद है।

    नई व्यवस्था के तहत संबंधित संस्थाएं अपने अपने डेटाबेस से आवश्यक जानकारी और खुफिया इनपुट साझा करेंगी जिससे संदिग्ध लेनदेन की पहचान करना आसान होगा। इसके साथ ही रिपोर्टिंग की एकीकृत और मानकीकृत प्रक्रिया विकसित की जाएगी ताकि वित्तीय संस्थानों द्वारा दी जाने वाली जानकारी अधिक व्यवस्थित और उपयोगी हो सके। यह प्रक्रिया मौजूदा नियमों के अनुरूप होगी और वित्तीय अनुशासन को और सख्त बनाएगी।

    इस सहयोग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सूचना साझा करने की व्यवस्था को भी शामिल किया गया है जिससे विदेशी वित्तीय खुफिया इकाइयों के साथ समन्वय स्थापित किया जा सकेगा। इससे वैश्विक स्तर पर फैले वित्तीय अपराध नेटवर्क की पहचान और नियंत्रण में मदद मिलेगी। यह कदम अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप वित्तीय निगरानी प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    समझौते के तहत प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों पर भी विशेष जोर दिया जाएगा। वित्तीय संस्थानों और नियामक एजेंसियों के अधिकारियों को मनी लॉन्ड्रिंग विरोधी नियमों और आतंकवाद के वित्तपोषण की रोकथाम से संबंधित प्रक्रियाओं पर नियमित प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे संस्थागत स्तर पर जागरूकता और दक्षता दोनों में वृद्धि होगी।

    इसके अलावा जोखिम आकलन प्रणाली को भी अधिक प्रभावी बनाने पर काम किया जाएगा ताकि वित्तीय क्षेत्र में संभावित खतरों की पहचान पहले से की जा सके। संदिग्ध लेनदेन से जुड़े संकेतकों को साझा करने और विश्लेषण करने की व्यवस्था को भी मजबूत किया जाएगा जिससे निगरानी प्रक्रिया अधिक वैज्ञानिक और डेटा आधारित हो सके।

    इस पूरे ढांचे में नियमित समन्वय बैठकें भी शामिल होंगी जिनमें विभिन्न एजेंसियां समय समय पर अपने अनुभव और जानकारी साझा करेंगी। इससे नीति निर्माण और उसके क्रियान्वयन में अधिक स्पष्टता और गति आने की उम्मीद है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह समझौता भारत की वित्तीय निगरानी प्रणाली को एकीकृत दिशा देने की ओर महत्वपूर्ण कदम है जिससे न केवल घरेलू वित्तीय अपराधों पर नियंत्रण मिलेगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की भूमिका और अधिक मजबूत होगी।

  • पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद से कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट…

    पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद से कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट…

    नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में तनाव में नरमी की उम्मीदों के बीच अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के बाजार में शुक्रवार को तेज गिरावट दर्ज की गई। भू राजनीतिक मोर्चे पर संघर्ष कम होने और संभावित शांति वार्ताओं की उम्मीदों ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया, जिसके चलते कच्चे तेल की कीमतों में करीब 2 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिली। लंबे समय से जारी अस्थिरता के बीच यह गिरावट वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखी जा रही है।

    बाजार में कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स में दबाव बना रहा और यह शुरुआती सत्र में गिरकर दिन के निचले स्तर के करीब पहुंच गया। दिनभर के उतार चढ़ाव के बीच इसमें एक प्रतिशत से अधिक की कमजोरी दर्ज की गई और यह 97 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेड करता नजर आया। इसी तरह अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड में भी कमजोरी देखने को मिली और यह लगभग 2 प्रतिशत गिरकर 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया। इस गिरावट ने ऊर्जा बाजार में सतर्कता का माहौल और गहरा कर दिया है।

    हालांकि इससे पहले के कारोबारी सत्र में कच्चे तेल की कीमतों में मजबूत तेजी देखने को मिली थी, जब ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई दोनों में उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की गई थी। उस समय भू राजनीतिक तनाव और आपूर्ति को लेकर चिंताओं ने कीमतों को ऊपर धकेला था, लेकिन ताजा घटनाक्रमों ने इस रुझान को उलट दिया है।

    घरेलू बाजार में भी कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव देखा गया। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज में क्रूड ऑयल के भाव में तेज गिरावट आई और यह 2 प्रतिशत से अधिक टूटकर निचले स्तर पर आ गया। वैश्विक संकेतों के असर से घरेलू ट्रेडर्स में भी सतर्कता बढ़ी और खरीदारी का रुझान कमजोर रहा।

    इस बीच पश्चिम एशिया में कूटनीतिक हलचल और संघर्ष विराम की चर्चाओं ने बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई है। प्रमुख वैश्विक संकेतों और शांति की संभावनाओं ने निवेशकों के बीच जोखिम कम होने की उम्मीद को मजबूत किया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति अभी पूरी तरह स्थिर नहीं है और किसी भी नए घटनाक्रम से बाजार में तेजी से बदलाव संभव है।

    वैश्विक शेयर बाजारों पर भी इस घटनाक्रम का मिश्रित असर देखने को मिला। एशियाई बाजारों में कमजोरी दर्ज की गई और प्रमुख सूचकांक दबाव में रहे। दूसरी ओर अमेरिकी बाजारों में हल्की बढ़त के साथ कारोबार बंद हुआ, जिससे वैश्विक निवेश भावना में संतुलन का संकेत मिला।

    घरेलू शेयर बाजार में भी शुरुआती कारोबार में स्थिरता रही और बाद में हल्की तेजी देखने को मिली। निवेशकों ने वैश्विक संकेतों को ध्यान में रखते हुए सतर्क रुख अपनाया और बड़े दांव लगाने से परहेज किया।

    विश्लेषकों के अनुसार कच्चे तेल की कीमतों में यह गिरावट मुख्य रूप से भू राजनीतिक तनाव में संभावित कमी और आपूर्ति को लेकर चिंता घटने के कारण आई है। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि ऊर्जा बाजार अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है और आने वाले समय में वैश्विक घटनाक्रम इसकी दिशा को फिर से प्रभावित कर सकते हैं।

  • ईरान संकट का असर: केले के दाम धराशायी, 2 रुपये किलो तक पहुंचे, महाराष्ट्र के किसान संकट में

    ईरान संकट का असर: केले के दाम धराशायी, 2 रुपये किलो तक पहुंचे, महाराष्ट्र के किसान संकट में

    मुंबई। पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब भारत के कृषि व्यापार पर भी साफ दिखने लगा है।
    खासतौर पर ईरान से जुड़े हालात और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते संकट ने महाराष्ट्र के केला उत्पादक किसानों की कमर तोड़ दी है। निर्यात ठप होने से बाजार में सप्लाई बढ़ गई है और कीमतें गिरकर बेहद निचले स्तर पर पहुंच गई हैं।

    निर्यात रुका, घरेलू बाजार में बढ़ा दबाव

    महाराष्ट्र के प्रमुख केला उत्पादक जिले जलगांव और सोलापुर इस समय सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। बेहतर मौसम और अच्छी बारिश के कारण इस बार उत्पादन अच्छा हुआ था, लेकिन खाड़ी देशों में जारी संकट के चलते निर्यात लगभग ठप पड़ गया।

    कोल्ड स्टोरेज में बड़ी मात्रा में केले फंसे हुए हैं और शिपमेंट रुकने से किसानों को मजबूरन माल घरेलू बाजार में उतारना पड़ रहा है।

    कीमतों में भारी गिरावट

    फरवरी तक केले के दाम 18 से 22 रुपये प्रति किलो के बीच थे, लेकिन हालात तेजी से बिगड़े।

    मार्च में कीमतें घटकर 8–10 रुपये प्रति किलो रह गईं
    अप्रैल के पहले हफ्ते में ये गिरकर सिर्फ 2–3 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गईं

    कीमतों में यह गिरावट तब और तेज हुई जब होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर तनाव बढ़ा और आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई।

    किसानों को भारी नुकसान

    सोलापुर जिले के करमाला क्षेत्र के एक किसान के मुताबिक, उन्होंने 10 एकड़ में केले की खेती पर करीब 20 लाख रुपये का निवेश किया था। फरवरी में जहां उन्हें 22 रुपये प्रति किलो तक भाव मिला, वहीं अब कीमतें 2–3 रुपये पर आ गई हैं।
    ऐसे में उन्हें कुल मिलाकर सिर्फ 2.5 से 3 लाख रुपये मिलने की उम्मीद है, यानी 17 लाख रुपये से ज्यादा का नुकसान झेलना पड़ सकता है।

    सालभर की फसल, जोखिम भी बड़ा

    केले की खेती अन्य फसलों की तरह मौसमी नहीं होती, बल्कि इसमें सालभर निवेश करना पड़ता है। ऐसे में कीमतों में अचानक गिरावट किसानों के लिए भारी संकट खड़ा कर देती है। लागत निकलना भी मुश्किल हो जाता है।

    सरकार से मदद की मांग

    निर्यात पर निर्भर किसान अब सरकार से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि

    मुआवजा दिया जाए
    नए निर्यात बाजार तलाशे जाएं
    खाड़ी देशों के विकल्प विकसित किए जाएं

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही निर्यात के रास्ते नहीं खुले, तो किसानों की आर्थिक स्थिति और बिगड़ सकती है।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं और डॉलर की मजबूती के बीच सोने पर लगातार दबाव और चांदी में सीमित लेकिन स्थिर मजबूती का रुझान

    वैश्विक अनिश्चितताओं और डॉलर की मजबूती के बीच सोने पर लगातार दबाव और चांदी में सीमित लेकिन स्थिर मजबूती का रुझान

    नई दिल्ली: कीमती धातुओं और वैश्विक बाजारों में उतार चढ़ाव का मिला जुला असर निवेशकों की धारणा पर भारी पड़ा सोना दबाव में रहा जबकि चांदी ने मजबूती दिखाई रुपया भी डॉलर के मुकाबले उतार चढ़ाव के बीच हल्की बढ़त के साथ खुला और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना रहा

    सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन वैश्विक संकेतों के बीच घरेलू कमोडिटी बाजार में अस्थिरता साफ दिखाई दी मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज में जून डिलीवरी वाला सोना कारोबार की शुरुआत में मजबूती के साथ खुला लेकिन दिन बढ़ने के साथ इसमें गिरावट देखने को मिली सोने ने कारोबार के दौरान एक सीमित दायरे में उतार चढ़ाव दिखाया और निवेशकों की सतर्कता के कारण इसमें बड़ी तेजी नहीं बन सकी शुरुआती कारोबार में जहां सोने को वैश्विक मांग और सुरक्षित निवेश के रुझान से समर्थन मिला वहीं बाद में डॉलर की मजबूती और मुनाफावसूली के चलते इसमें दबाव बढ़ गया

    दूसरी ओर चांदी ने दिनभर अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया और इसमें हल्की तेजी दर्ज की गई चांदी की कीमतों को औद्योगिक मांग से समर्थन मिला हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार इसमें स्थायी तेजी के लिए अभी और मजबूत संकेतों की आवश्यकता बनी हुई है बाजार प्रतिभागियों का मानना है कि जब तक प्रमुख स्तरों को निर्णायक रूप से पार नहीं किया जाता तब तक इसमें सीमित दायरे में कारोबार जारी रह सकता है

    मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले हल्की मजबूती दिखाई शुरुआती कारोबार में रुपया पिछले सत्र की तुलना में मजबूत खुला जिसका प्रमुख कारण घरेलू शेयर बाजार में स्थिरता और विदेशी बाजारों में जोखिम भावना में सुधार रहा साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से भी रुपये को समर्थन मिला हालांकि वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती ने रुपये की बढ़त पर दबाव बनाए रखा और इसका प्रभाव दिनभर देखने को मिला

    कच्चे तेल के बाजार में भी नरमी का रुख रहा ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी कच्चे तेल दोनों में गिरावट दर्ज की गई जिसका कारण वैश्विक मांग को लेकर अनिश्चितता और भू राजनीतिक घटनाक्रम में अपेक्षाकृत स्थिरता माना जा रहा है मध्य पूर्व में तनाव में कमी और संघर्ष विराम की खबरों ने भी ऊर्जा बाजार की धारणा को प्रभावित किया जिससे तेल की कीमतों में नरमी आई

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू राजनीतिक घटनाक्रमों ने बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई इजरायल और लेबनान के बीच संघर्ष विराम की घोषणा और अमेरिका ईरान वार्ता में प्रगति की उम्मीदों ने वैश्विक निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को बढ़ाया है हालांकि इसके बावजूद निवेशक पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखे और उन्होंने सुरक्षित निवेश विकल्पों में संतुलित रुख बनाए रखा

    घरेलू शेयर बाजार में भी सीमित दायरे में हल्की बढ़त देखने को मिली जिससे रुपये को कुछ समर्थन मिला लेकिन समग्र बाजार माहौल सतर्क ही बना रहा कमोडिटी विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल बाजार में स्पष्ट दिशा का अभाव है और यह स्थिति वैश्विक आर्थिक संकेतों तथा भू राजनीतिक घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी

    इस पूरे परिदृश्य में निवेशकों की नजर आगामी आर्थिक आंकड़ों और केंद्रीय बैंकों की नीतिगत टिप्पणियों पर टिकी हुई है जो आने वाले समय में बाजार की दिशा तय कर सकती हैं फिलहाल बाजार में सतर्कता और अवसर दोनों का मिश्रण बना हुआ है और हर बदलाव पर निवेशक नजर बनाए हुए हैं

  • Air India को घाटे से उबारने की कवायद….. एयरलाइंस पार्टनर से मिले टाटा के चेयरमैन चंद्रशेखरन

    Air India को घाटे से उबारने की कवायद….. एयरलाइंस पार्टनर से मिले टाटा के चेयरमैन चंद्रशेखरन


    नई दिल्ली।
    घाटे में चल रही एयर इंडिया (Air India) को लेकर टाटा समूह (Tata Group) एक्शन मोड में है। इसी कड़ी में सिंगापुर एयरलाइंस (Singapore Airlines.) के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) गोह चून फोंग और टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के बीच मुलाकात भी हुई है। माना जा रहा है कि दोनों पक्षों ने घाटे में चल रही एयर इंडिया के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की। फोंग सुबह टाटा समूह के मुख्यालय बॉम्बे हाउस पहुंचे और शाम को रवाना हो गए।

    एक सूत्र ने बताया कि उन्होंने एयर इंडिया के चेयरमैन चंद्रशेखरन और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। टाटा समूह के अधिकारियों के साथ हुई बैठकों के बारे में फिलहाल कोई विस्तृत जानकारी नहीं मिल सकी है। बता दें कि टाटा समूह ने जनवरी, 2022 में भारत सरकार से एयर इंडिया का अधिग्रहण किया था और बाद में सिंगापुर एयरलाइंस ने विमानन कंपनी में 25.1 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी थी।


    प्रतिबंधों से पड़ा असर

    यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब एयर इंडिया कई चुनौतियों का सामना कर रही है जिनमें पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण हवाई क्षेत्र पर प्रतिबंध से बढ़ती परिचालन लागत और करीब एक वर्ष से पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र के बंद रहने का प्रभाव शामिल है। इन प्रतिबंधों के कारण महत्वाकांक्षी बदलाव योजना के तहत काम कर रही विमानन कंपनी को लंबी दूरी की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए लंबा मार्ग अपनाना पड़ रहा है जिससे ईंधन खपत एवं खर्च बढ़ गया है।


    सीईओ का इस्तीफा

    इस महीने की शुरुआत में एयर इंडिया ने घोषणा की थी कि उसके सीईओ एवं प्रबंध निदेशक कैंपबेल विल्सन पद छोड़ेंगे। एयरलाइन ने उनके उत्तराधिकारी की तलाश के लिए एक समिति का गठन किया है। न्यूजीलैंड मूल के विल्सन पिछले चार वर्ष से टाटा समूह के स्वामित्व वाली एयर इंडिया के सीईओ एवं प्रबंध निदेशक के रूप में कार्य कर रहे हैं। बता दें कि एयरलाइन की लंदन जाने वाली उड़ान के पिछले साल अहमदाबाद में दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद विल्सन की आलोचना भी हुई थी। इस हादसे में 250 से अधिक लोगों की जान गई थी। इसके अलावा कई मौकों पर सुरक्षा मानकों के कथित उल्लंघन को लेकर भी उन पर सवाल उठे थे।

    31 मार्च, 2026 को समाप्त वित्त वर्ष में एयर इंडिया को 22,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान होने का अनुमान है। एयर इंडिया का प्रदर्शन सिंगापुर एयरलाइंस के लिए भी वित्तीय दबाव का कारण बन रहा है। ऐसे में यह मुलाकात काफी अहम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इस मुलाकात में एयर इंडिय को घाटे से उबारने के मुद्दे पर जोर दिया गया है।

  • सावधान! आसान लोन का झांसा देकर हो रही ठगी, बढ़ रहे साइबर फ्रॉड केस

    सावधान! आसान लोन का झांसा देकर हो रही ठगी, बढ़ रहे साइबर फ्रॉड केस


    नई दिल्ली। प्रेस सूचना ब्यूरो ने आधार कार्ड के नाम पर फैल रहे लोन स्कैम (लोन फ्रॉड) को लेकर लोगों को सतर्क रहने की चेतावनी दी है। सरकार ने साफ किया है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट पर चल रहे कई विज्ञापन पूरी तरह फर्जी हैं, जिनमें आधार कार्ड पर आसान लोन देने का दावा किया जा रहा है।
    सरकारी फैक्ट चेक यूनिट के मुताबिक, इन फर्जी विज्ञापनों में लोगों को बिना किसी दस्तावेज या कम ब्याज दर पर तुरंत लोन देने का लालच दिया जाता है। ऐसे मैसेज और विज्ञापन खासतौर पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिनका मकसद लोगों को ठगना है।

    सोने-चांदी के दाम में हलचल, पेट्रोल-डीजल के रेट में उतार-चढ़ाव; जानें आज का पूरा बाजार अपडेट
    सोने-चांदी के दाम में हलचल, पेट्रोल-डीजल के रेट में उतार-चढ़ाव; जानें आज का पूरा बाजार अपडेट
    15 Apr 2026
    आपका लोन बार बार क्यों हो रहा है रिजेक्ट, ये रहा कारण

    स्कीम के नाम पर लोगों को बना रहे शिकार
    सरकार ने बताया कि इन स्कैम में ठग खुद को सरकारी योजना या अधिकृत संस्था से जुड़ा हुआ बताते हैं। कई मामलों में प्रधानमंत्री योजना या सरकारी स्कीम का नाम इस्तेमाल कर भरोसा जीतने की कोशिश की जाती है। जबकि हकीकत यह है कि ऐसी कोई भी आधिकारिक योजना मौजूद नहीं है।

    फैक्ट चेक में यह भी सामने आया है कि इस तरह के मैसेज पहले भी वायरल हो चुके हैं, जिनमें दावा किया गया था कि सभी आधार कार्ड धारकों को लाखों रुपये का लोन दिया जा रहा है, लेकिन सरकार ने इसे पूरी तरह फर्जी बताया था।

    Loan Fraud से ऐसे करें खुद को सुरक्षित
    सरकार ने लोगों को सलाह दी है कि किसी भी अनजान लिंक, ऐप या विज्ञापन पर भरोसा न करें। खासतौर पर ऐसे ऑफर्स से दूर रहें, जो बिना वेरिफिकेशन या तुरंत लोन देने का वादा करते हैं।

    इसके अलावा, किसी भी प्लेटफॉर्म पर अपनी पर्सनल जानकारी जैसे आधार नंबर, बैंक डिटेल या OTP साझा करने से बचें। केवल आधिकारिक वेबसाइट या विश्वसनीय संस्थाओं के जरिए ही लोन से जुड़ी जानकारी प्राप्त करें।

  • भारत का सबसे बड़ा Trade पार्टनर बना चीन… अमेरिका को छोड़ा पीछे

    भारत का सबसे बड़ा Trade पार्टनर बना चीन… अमेरिका को छोड़ा पीछे


    नई दिल्ली।
    चीन (China), अमेरिका (America) को पीछे छोड़कर 2025-26 में भारत (India) का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार (Largest Trading Partner) बन गया है। उद्योग और वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, चीन के साथ द्विपक्षीय व्यापार (Bilateral Trade) 151.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इस दौरान चीन के साथ देश का व्यापार घाटा बढ़कर 112.16 अरब डॉलर हो गया। अमेरिका 2024-25 तक लगातार चार वर्षों तक भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था।


    व्यापार घाटा भी रिकॉर्ड स्तर पर

    चीन 2013-14 से 2017-18 तक और फिर 2020-21 में भी भारत का शीर्ष व्यापारिक साझेदार रहा। चीन से पहले यूएई देश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था। पिछले वित्त वर्ष के दौरान चीन को भारत का निर्यात 36.66 फीसदी बढ़कर 19.47 अरब डॉलर हो गया, जबकि आयात 16 फीसदी बढ़कर 131.63 अरब डॉलर रहा। व्यापार घाटा 2025-26 में बढ़कर 112.16 अरब डॉलर के अब तक के उच्च स्तर पर पहुंच गया, जो 2024-25 में 99.2 अरब डॉलर था।


    व्यापार संतुलन में बदलाव

    2025-26 में अमेरिका को निर्यात मामूली रूप से 0.92 प्रतिशत बढ़कर 87.3 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 15.95 फीसदी बढ़कर 52.9 अरब डॉलर हो गया। व्यापार अधिशेष 2024-25 के 40.89 अरब डॉलर से घटकर 34.4 अरब डॉलर रह गया। जिन प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ भारत का निर्यात घटा है, उनमें नीदरलैंड, ब्रिटेन, सिंगापुर, बांग्लादेश, सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका और मलयेशिया शामिल हैं। जिन प्रमुख देशों के साथ 2025-26 में आयात बढ़ा है, उनमें रूस, इराक, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, कतर और ताइवान शामिल हैं।

  • भारत अब रूस से नहीं खरीद पाएगा सस्ता तेल…. अमेरिका ने फिर लगाई पाबंदी

    भारत अब रूस से नहीं खरीद पाएगा सस्ता तेल…. अमेरिका ने फिर लगाई पाबंदी


    वाशिंगटन।
    ईरान युद्ध (Iran War) के बाद गहराए ईंधन संकट के बीच अमेरिका (America) ने रूसी तेल (Russian oil) खरीद पर लगाई पाबंदी में ढील दी थी। इसकी मियाद 11 अप्रैल को पूरी हो गई। इस दौरान भारत ने अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद देश रूस से जमकर कच्चे तेल (Crude oil) की खरीद की। अब अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के ताजा फैसले ने भारत समेत कई एशियाई देशों की चिंता बढ़ा दी है। ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने बुधवार को घोषणा की कि अमेरिका रूसी और ईरानी तेल खरीद के लिए दी गई प्रतिबंधों की छूट की समय सीमा को नहीं बढ़ाएगा।

    अमेरिका का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया के तेल बाजार में भारी अस्थिरता है। भारत जैसे देशों ने अपनी आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए इन छूटों का भरपूर लाभ उठाया था।

    क्या है पूरा मामला?
    फरवरी के अंत में अमेरिका-ईरान युद्ध छिड़ने के बाद कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थीं। दुनिया के तेल बाजार को स्थिर करने के लिए ट्रंप प्रशासन ने एक अस्थायी नीति अपनाई थी। इसके तहत 12 मार्च को भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की विशेष छूट दी गई थी। यह केवल उस तेल के लिए थी जो 11 मार्च से पहले जहाजों पर लद चुका था। इसी तरह ईरान के लिए भी 30 दिनों का लाइसेंस दिया गया था। रूस के लिए दी गई छूट 11 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गई है, जबकि ईरान के लिए यह छूट 19 अप्रैल को समाप्त होने जा रही है।


    भारत के लिए बड़ा झटका

    भारत इस छूट का सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रिलायंस जैसी भारतीय रिफाइनरियों ने पहले रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसे रूसी आपूर्तिकर्ताओं से किनारा कर लिया था। रिपोर्ट्स के अनुसार, छूट मिलने के बाद भारत ने रूस से लगभग 3 करोड़ बैरल तेल के ऑर्डर दिए थे। भारत समेत कई एशियाई देशों ने अमेरिका से इन छूटों को आगे बढ़ाने की अपील की थी, जिसे अब अमेरिकी ट्रेजरी ने ठुकरा दिया है।

    ट्रंप के फैसले की खूब हुई आलोचना
    ट्रंप प्रशासन के इस रुख की अमेरिका के भीतर खासकर विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा कड़ी आलोचना की जा रही थी। सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंटल और अल्पसंख्यक नेता चक शूमर जैसे नेताओं ने आरोप लगाया कि इस छूट से रूस को यूक्रेन के खिलाफ अपनी युद्ध मशीनरी के लिए भारी पैसा मिल रहा है।

    डेमोक्रेट्स का कहना है कि एक तरफ रूस यूक्रेन में बच्चों की हत्या कर रहा है, तो दूसरी तरफ वह ईरान को अमेरिकी सैनिकों पर हमला करने के लिए खुफिया जानकारी दे रहा है। ऐसे में उन्हें आर्थिक राहत देना खतरनाक है। ट्रेजरी सचिव बेसेंट ने स्पष्ट किया कि अब कोई नया लाइसेंस जारी नहीं किया जाएगा क्योंकि समुद्र में जो तेल 11 मार्च से पहले था, वह इस्तेमाल किया जा चुका है।


    अब आगे क्या?

    रूस और ईरान से तेल की आयात बंद होने से भारत को अब खाड़ी के अन्य देशों या अमेरिकी घरेलू बाजार पर निर्भरता बढ़ानी होगी, जो महंगा पड़ सकता है। आपूर्ति कम होने से घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ेगा। भारत को अब रूस के साथ व्यापार करने के लिए वैकल्पिक पेमेंट गेटवे जैसे रुपया-रुबल पर गंभीरता से विचार करना होगा, जो अमेरिकी प्रतिबंधों की जद में न आए।

  • ईरान युद्ध के चलते कई देशों में आसमान पर पहुंचे पेट्रोल-डीजल के दाम… भारत में अब तक राहत

    ईरान युद्ध के चलते कई देशों में आसमान पर पहुंचे पेट्रोल-डीजल के दाम… भारत में अब तक राहत


    नई दिल्ली।
    ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध (Iran–US–Israel War.) शुरू होने के बाद से अबतक कई देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम (Petrol-Diesel Price) आसमान पर पहुंच गए। फिलीपिंस में डीजल के रेट में 172 प्रतिशत उछाल आया तो म्यांमार में पेट्रोल के रेट डबल हो गए। लेकिन, भारत में पेट्रोल-डीजल के रेट में अभी राहत है। दिल्ली में पेट्रोल 94.77 और डीजल 87.67 रुपये प्रति लीटर पर पिछले कई साल से अटका हुआ है। यह आशंका प्रबल है कि यह राहत चुनाव के बाद छिन सकती है।


    पेट्रोल के दाम सबसे अधिक बढ़ाने वाले देश

    globalpetrolprices.com के लेटेस्ट डेटा के मुताबिक पेट्रोल के सबसे अधिक दाम बढ़ाने वाले देशों में म्यांमार (101.1%), फिलीपींस (72.6%), मलेशिया (68.1%), लाओस (45.6%), जिम्बाब्वे (42.9%) पाकिस्तान (42.0%), यूएई (40.8%), कंबोडिया (40.4%) और नेपाल (39.5%)।


    डीजल के दाम सबसे अधिक बढ़ाने वाले देश

    फिलीपींस 172.0%
    लाओस 169.5%
    म्यांमार 161.4%
    मलेशिया 124.7%
    न्यूजीलैंड 89.9%
    यूएई 86.1%
    कंबोडिया 84.0%
    लेबनान 80.5%
    वियतनाम 77.9%
    ऑस्ट्रेलिया 65.3%
    स्रोत: globalpetrolprices.com


    कई देशों को क्यों बढ़ाने पड़े पेट्रोल-डीजल के दाम

    युद्ध के शुरू होने के बाद ्रबेंट क्रूड की कीमत 71 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 111 डॉलर तक पहुंच गईं। सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ी, जिससे मार्च के मध्य तक ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के ऊपर पहुंच गया। 6 अप्रैल तक यह 111.73 डॉलर पर था। हालांकि, सीजफायर के बीच इसमें गिरावट आई और कीमत 95.49 डॉलर पर आ गई।

    इस उतार-चढ़ाव का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ा। दुनिया भर में औसत पेट्रोल कीमत 1.2 डॉलर प्रति लीटर से बढ़कर 1.44 डॉलर और डीजल 1.2 से 1.6 डॉलर प्रति लीटर तक पहुंच गया। डेटा के अनुसार कुछ देशों में ईंधन कीमतों में विस्फोटक उछाल देखने को मिली। खासतौर पर एशिया और छोटे आयात-निर्भर देशों में दाम तेजी से बढ़े।


    भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम क्यों नहीं बढ़े?

    एक ओर जब पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल की कीमतो में आग लगी हई है तो दूसरी ओर भारत में शांति है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत में इस दौरान पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण बंगाल समेत 5 राज्यों का चुनाव और सरकार द्वारा टैक्स में कटौती। केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल को महंगा होने से बचाने के लिए 10-10 रुपये टैक्स कम कर दिए। वहीं, निर्यात पर टैक्स बढ़ाया, ताकि घरेलू सप्लाई में दिक्कत न हो।

    क्या चुनाव बाद पेट्रोल-डीजल हो जाएगा महंगा?
    चाय की दुकानों से लेकर चौक-चौराहों तक यह चर्चा आम है कि पेट्रोल-डीजल के दाम 5 राज्यों के चुनाव के बाद बढ़ जाएंगे। Macquarie Group ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पेट्रोल पर कंपनियों को 18 और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा होने की संभावना है। क्यांकि, एक बैरल कच्चे तेल में 10 डॉलर की बढ़ोतरी की वजह से कंपनियों को करीब 6 रुपये प्रति लीटर का नुकसान होता है।