Category: Economy

  • एचडीएफसी बैंक के खिलाफ अमेरिका में निवेशकों की कानूनी जंग ब्याज भुगतान को मार्केटिंग खर्च दिखाने का आरोप

    एचडीएफसी बैंक के खिलाफ अमेरिका में निवेशकों की कानूनी जंग ब्याज भुगतान को मार्केटिंग खर्च दिखाने का आरोप


    नई दिल्ली। एचडीएफसी बैंक के खिलाफ न्यूयॉर्क की फेडरल कोर्ट में क्लास एक्शन मुकदमा दायर किया गया है। शिकायत में एक राज्य सरकार की एजेंसी को कथित अतिरिक्त ब्याज भुगतान को मार्केटिंग खर्च के तौर पर दिखाने और निवेशकों को गलत जानकारी देने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। बैंक ने मुकदमे को निराधार बताते हुए मजबूती से बचाव करने की बात कही है। गुरुवार को बैंक के शेयर 1.75 प्रतिशत गिरकर 714.45 रुपए पर बंद हुए।

    देश के सबसे बड़े निजी बैंकों में शामिल एचडीएफसी बैंक के सामने अमेरिका में दायर एक क्लास एक्शन मुकदमे के बाद नई कानूनी चुनौती खड़ी हो गई है। न्यूयॉर्क के दक्षिणी जिले की अमेरिकी जिला अदालत में निवेशक ज्वलंत नटवरलाल सोनेजी की ओर से यह मुकदमा दायर किया गया है। मामले में बैंक के साथ उसके सीईओ शशिधर जगदीशन और सीएफओ श्रीनिवासन वैद्यनाथन को भी प्रतिवादी बनाया गया है। मुकदमा उन निवेशकों की ओर से दायर किया गया है जिन्होंने 17 जुलाई 2023 से 26 मई 2026 के बीच एचडीएफसी बैंक के अमेरिकन डिपॉजिटरी शेयर खरीदे थे।

    शिकायत में बैंक पर आरोप लगाया गया है कि महाराष्ट्र स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन यानी एमएसआरडीसी से बड़े जमा हासिल करने के लिए उसे सामान्य दर से अधिक ब्याज देने का कथित इंतजाम किया गया। आरोप के मुताबिक एजेंसी को 6.01 प्रतिशत ब्याज देने का वादा किया गया था जबकि आम ग्राहकों के लिए मानक बचत दर 3.5 प्रतिशत थी। शिकायत में दावा किया गया है कि यह व्यवस्था बैंकिंग नियमों के विपरीत थी और इसी वजह से कथित तौर पर भुगतान को दूसरे तरीके से दिखाने का रास्ता अपनाया गया।

    मुकदमे के अनुसार 2023 से 2025 के बीच करीब 45 करोड़ रुपए का अतिरिक्त ब्याज राज्य की एजेंसी को दिया गया। आरोप है कि इस रकम को सीधे ब्याज भुगतान के रूप में दर्ज करने के बजाय मार्केटिंग खर्च के तौर पर दिखाया गया और सड़क सुरक्षा जागरूकता अभियान की स्पॉन्सरशिप के माध्यम से भुगतान किया गया। शिकायत में यह भी कहा गया है कि भुगतान तीसरे पक्ष के विक्रेताओं के जरिए किया गया। हालांकि ये सभी आरोप फिलहाल मुकदमे में लगाए गए दावे हैं और अदालत में इनका परीक्षण होना बाकी है।

    मामले में बैंक की कथित आंतरिक सतर्कता जांच का भी उल्लेख किया गया है। शिकायत के अनुसार जांच में इस तरीके को आरबीआई के मास्टर निर्देशों और बैंक की आंतरिक एंटी ब्राइबरी नीतियों के अनुरूप नहीं पाया गया। इसके बाद वादियों ने आरोप लगाया कि बैंक ने अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग के समक्ष दाखिल अपनी रिपोर्टों में निवेशकों को पर्याप्त जानकारी नहीं दी। वित्त वर्ष 2024 और 2025 की फॉर्म 20 एफ रिपोर्टों में बैंक प्रबंधन ने वित्तीय रिपोर्टिंग से जुड़े आंतरिक नियंत्रणों को प्रभावी बताया था।

    मुकदमे में यह भी आरोप लगाया गया है कि कथित अतिरिक्त भुगतान को मार्केटिंग बजट में दिखाए जाने से बैंक के परिचालन खर्च और शुद्ध ब्याज आय से जुड़े आंकड़ों की वास्तविक तस्वीर प्रभावित हुई। शिकायतकर्ता पक्ष का दावा है कि इससे निवेशकों को बैंक की वित्तीय और परिचालन स्थिति का सही आकलन करने में परेशानी हुई और शेयर की कीमत पर भी असर पड़ा।

    मामला उस समय और चर्चा में आया जब 18 मार्च 2026 को एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती ने इस्तीफा दिया। उनके इस्तीफे से जुड़ी वजहों में बैंक के भीतर कुछ ऐसी घटनाओं और प्रथाओं का उल्लेख किया गया था जो उनके व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिकता के अनुरूप नहीं थीं। इसके बाद अमेरिकी बाजार में एचडीएफसी बैंक के शेयरों में तेज गिरावट देखी गई। 27 मई 2026 को एमएसआरडीसी को किए गए कथित भुगतानों से जुड़ी आंतरिक जांच की खबर सामने आने के बाद भी शेयरों पर दबाव बढ़ा।

    शिकायतकर्ता ने अमेरिकी सिक्योरिटी एक्सचेंज एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की मांग की है। इसके साथ ही क्लास एक्शन के रूप में मामले को प्रमाणित करने मुआवजे और जूरी ट्रायल की मांग भी की गई है। दूसरी ओर एचडीएफसी बैंक ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि अमेरिका में शेयर कीमतों में गिरावट के बाद इस तरह के मुकदमे आम हैं। बैंक ने मामले को निराधार बताते हुए अदालत में मजबूती से अपना बचाव करने की बात कही है। इस कानूनी विवाद के बीच गुरुवार को एचडीएफसी बैंक के शेयर 1.75 प्रतिशत गिरकर 714.45 रुपए पर बंद हुए।

  • दलाल स्ट्रीट पर फिर दिखेगा उतार चढ़ाव सेंसेक्स निफ्टी के रुख से तय होगी निवेशकों की रणनीति

    दलाल स्ट्रीट पर फिर दिखेगा उतार चढ़ाव सेंसेक्स निफ्टी के रुख से तय होगी निवेशकों की रणनीति

    नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार में कारोबार करने वाले निवेशकों के लिए हर कारोबारी दिन नई संभावनाओं और जोखिमों के साथ आता है। सेंसेक्स और निफ्टी में होने वाला उतार चढ़ाव केवल बाजार की मौजूदा स्थिति को नहीं दर्शाता बल्कि इसका असर निवेशकों के फैसलों और शेयरों की खरीद बिक्री पर भी पड़ता है। ऐसे समय में बाजार की दिशा को प्रभावित करने वाले घरेलू और वैश्विक संकेतों पर नजर रखना बेहद जरूरी हो जाता है। निवेशकों के बीच इस बात को लेकर लगातार उत्सुकता बनी रहती है कि बाजार में तेजी का सिलसिला आगे बढ़ेगा या ऊंचे स्तरों पर मुनाफावसूली देखने को मिलेगी।

    शेयर बाजार की चाल पर सबसे पहले वैश्विक संकेतों का असर दिखाई देता है। अमेरिका समेत दुनिया के प्रमुख बाजारों का प्रदर्शन भारतीय बाजार के सेंटीमेंट को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा विदेशी निवेशकों की खरीदारी और बिकवाली भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत मानी जाती है। अगर विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयरों में पैसा लगाते हैं तो बाजार में सकारात्मक माहौल बन सकता है जबकि लगातार बिकवाली से दबाव बढ़ने की संभावना रहती है। घरेलू संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार को सहारा देने में अहम भूमिका निभाती हैं।

    घरेलू मोर्चे पर कंपनियों के तिमाही नतीजे कारोबार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रहते हैं। जिन कंपनियों के नतीजे उम्मीद से बेहतर रहते हैं उनके शेयरों में खरीदारी बढ़ सकती है जबकि कमजोर प्रदर्शन करने वाली कंपनियों पर बिकवाली का दबाव देखने को मिल सकता है। बैंकिंग आईटी ऑटो फार्मा और एफएमसीजी जैसे प्रमुख सेक्टरों में होने वाली गतिविधियां भी पूरे बाजार के रुख को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए केवल सेंसेक्स और निफ्टी को देखना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि अलग अलग सेक्टर के प्रदर्शन पर भी नजर रखना जरूरी है।

    बाजार में ब्याज दरें महंगाई कच्चे तेल की कीमतें और रुपये की स्थिति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारत जैसी आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए चिंता बढ़ा सकती है। वहीं रुपये में कमजोरी का असर आयात लागत और कंपनियों के मुनाफे पर पड़ सकता है। दूसरी ओर ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद बाजार में निवेशकों का भरोसा बढ़ा सकती है क्योंकि इससे कंपनियों और कारोबार के लिए कर्ज की लागत कम होने की संभावना बनती है।

    निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बाजार में तेजी देखकर जल्दबाजी में खरीदारी या गिरावट देखकर घबराहट में बिकवाली करने से बचा जाए। शेयर बाजार में जोखिम हमेशा बना रहता है और किसी भी शेयर की पिछली तेजी उसके भविष्य के प्रदर्शन की गारंटी नहीं होती। इसलिए निवेश से पहले कंपनी के कारोबार वित्तीय स्थिति मुनाफे कर्ज और भविष्य की संभावनाओं को समझना जरूरी है। लंबी अवधि के निवेशकों के लिए मजबूत बुनियादी स्थिति वाली कंपनियां ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती हैं जबकि अल्पकालिक कारोबार करने वालों को बाजार की अस्थिरता और जोखिम प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

    आने वाले कारोबारी सत्रों में वैश्विक बाजारों की दिशा विदेशी निवेशकों की गतिविधियां घरेलू आर्थिक आंकड़े और कंपनियों से जुड़ी खबरें भारतीय शेयर बाजार की चाल को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में निवेशकों के लिए बाजार में अवसर जरूर हैं लेकिन हर अवसर के साथ जोखिम भी जुड़ा हुआ है। समझदारी इसी में है कि निवेशक भावनाओं के बजाय तथ्यों और अपनी जोखिम क्षमता के आधार पर फैसला लें।

  • रिकॉर्डतोड़ कीमत ने बदले आभूषण बाजार के नियम…. अब कम वजन का सोना खरीद रहा आम उपभोक्ता

    रिकॉर्डतोड़ कीमत ने बदले आभूषण बाजार के नियम…. अब कम वजन का सोना खरीद रहा आम उपभोक्ता


    नई दिल्ली।
    सोने (Gold) की रिकॉर्डतोड़ कीमतों (Record-Breaking Prices) ने भारत के करीब 7 लाख करोड़ रुपये के आभूषण बाजार के बुनियादी नियमों को पूरी तरह बदल दिया है। पहली नजर में यह बड़ा विरोधाभास लगता है, लेकिन आम उपभोक्ता कम वजन का सोना (Low Weight Gold) खरीद रहा है, जबकि कारोबारियों की तिजोरियां रिकॉर्ड कमाई से भर रही हैं। यानी अब बाजार की वृद्धि ज्यादा ग्राम सोना बेचने से नहीं, बल्कि प्रति ग्राम अधिक वैल्यू निकालने से तय हो रही है।

    वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2026 की पहली छमाही में देश में सोने के जेवरों की मांग वजन के लिहाज से 17.1 फीसदी गिर गई, लेकिन खर्च की गई कुल रकम 40 फीसदी बढ़कर 2.13 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गई। इस बदलाव को भांपते हुए आभूषण कारोबारियों ने हल्के वजन, कम कैरेट, स्टड डायमंड्स और पुराने सोने की रीसाइक्लिंग को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है।


    ब्रांडेड जूलरी पर बढ़ रहा भरोसा :

    जीएसटी, अनिवार्य हॉलमार्किंग और पैन कार्ड नियमों ने असंगठित सुनारों के पारंपरिक बाजार को झटका दिया है। केयरएज के निदेशक अखिल गोयल के मुताबिक, पहले ग्राहक अपने खानदानी सुनार के व्यक्तिगत संबंध पर भरोसा करते थे। लेकिन अब संगठित ब्रांड्स ने इसकी जगह मानकीकृत शुद्धता, पारदर्शी बिलिंग, आसान बायबैक व डिजिटल डिस्कवरी का ऐसा मजबूत ढांचा खड़ा किया है, जो टियर-2 व टियर-3 शहरों में भी तेजी से अपनी पैठ बना रहा है।


    वजन घटा फिर भी बिल बढ़ा

    आंकड़े बताते हैं कि सोने की रिकॉर्ड कीमतों के कारण खरीदारों का व्यवहार और बाजार का ढांचा तेजी से बदल रहा है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, साल 2026 की दूसरी तिमाही (अप्रैल-जून) में देश में सोने के जेवरों की मांग वजन के लिहाज से 15.4 फीसदी गिरकर 75.1 टन रह गई, लेकिन इसी अवधि में खर्च की गई कुल रकम 34.4 फीसदी के उछाल के साथ 1.13 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गई। वहीं, पूरे 2026 की पहली छमाही की बात करें तो सोने की मांग वजन में 17.1 फीसदी घटी, जबकि कुल खरीदारी की वैल्यू 40 फीसदी बढ़कर 2.13 लाख करोड़ रुपये दर्ज की गई, जो यह साबित करता है कि उपभोक्ता अब बजट तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन वजन कम खरीद रहे हैं।

    इस बदलाव का सीधा फायदा संगठित और बड़े ब्रांड्स को मिला है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में टाइटन की जूलरी आय में 43 फीसदी की वृद्धि हुई, जिसमें तनिष्क और कैरेटलेन में खरीदारों की संख्या दोहरे अंकों में बढ़ी। इसी तरह कल्याण ज्वैलर्स का समेकित राजस्व 46 फीसदी बढ़कर 10,589 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जिसमें कुल बिक्री का 55 फीसदी से अधिक हिस्सा पुराने सोने की रीसाइक्लिंग से आया।

    खुदरा बाजार में भी बड़ा बदलाव आया है। सीबीआरई के आंकड़ों के अनुसार, कुल संगठित रिटेल लीजिंग में ज्वैलरी सेक्टर की हिस्सेदारी 2019 के मात्र 2 फीसदी से बढ़कर 2025-26 में 8 फीसदी हो गई है। 8,000 वर्ग फुट से बड़े एक्सपीरियंस सेंटर्स और मेगा शोरूम का दबदबा 50 फीसदी तक पहुंच चुका है।


    पुराना सोना बना ग्रोथ इंजन

    महंगे अंतरराष्ट्रीय आभूषणों से बचने के लिए कंपनियों ने भारतीय घरों की तिजोरियों में पड़े सोने को रिसाइकिल करने का नया मॉडल खड़ा किया है। कल्याण ज्वैलर्स के कार्यकारी निदेशक रमेश कल्याणरामन के अनुसार, मई में शुरू हुए शाइन विद इंडिया अभियान के बाद जून में कंपनी के कुल राजस्व में पुराने सोने के एक्सचेंज की हिस्सेदारी 55 से 60 फीसदी तक पहुंच गई है। कंपनियों को अब महंगा विदेशी सोना आयात करने के बजाय घरेलू ग्राहकों से ही कच्चा माल मिल रहा है, जिससे उनकी पूंजी की लागत घटी है और मुनाफा मार्जिन सुरक्षित हुआ है।


    आभूषण अब निवेश नहीं

    केयरएज रेटिंग्स और सीबीआरई की संयुक्त रिपोर्ट बताती है कि युवा पीढ़ी के बीच सोने की पारंपरिक 22 कैरेट वाली भारी जूलरी की जगह डेली वियर और स्टाइलिश गहनों ने ले ली है। सेनको गोल्ड और तनिष्क जैसे ब्रांड्स ने 9-कैरेट और 14-कैरेट में स्टडड डायमंड जूलरी पेश की है। जो ग्राहक 22 कैरेट के भारी सोने का सेट नहीं खरीद पा रहे, वे उसी बजट में हल्के 14 कैरेट सोने के साथ हीरे जड़े आकर्षक डिजाइन खरीद रहे हैं। सेनको ने लाइफस्टाइल ब्रांड सेनेस और पुरुषों के लिए 20,000 से एक लाख रुपये के टाइटेनियम गहनों का दायरा बढ़ाया है। युवा खरीदार अब गहनों को सिर्फ लॉकर में बंद रखने वाले निवेश के बजाय रोज पहनने वाले फैशन एक्सेसरी के रूप में देख रहे हैं।

  • तीन साल की नई ऊंचाई पर पहुंचा चावल का निर्यात…. बढ़ती महंगाई के बीच दाम भी बढ़े

    तीन साल की नई ऊंचाई पर पहुंचा चावल का निर्यात…. बढ़ती महंगाई के बीच दाम भी बढ़े


    नई दिल्ली।
    एक तरफ जहां देश में चावल के दाम (Rice prices) में तेजी (Rise) आ रही है, वहीं इसके निर्यात में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। 26 प्रमुख उपभोक्ता देशों को भारत का चावल निर्यात (Rice Exports) सिर्फ पांच महीनों में तीन साल की नई उंचाई पर आ गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच बासमती और गैर-बासमती चावल (Non-Basmati rice) का कुल निर्यात 23,476 करोड़ रुपये और 47.9 लाख टन तक पहुंच गया।

    पश्चिम एशिया संकट के कारण खाड़ी क्षेत्रों में चावल का आयात घट गया है। इसके बावजूद भारत का निर्यात प्रभावित नहीं हुआ है। भारतीय चावल निर्यातक महासंघ (आईआरईएफ) के अनुसार, पिछले तीन वर्षों की इसी अवधि (नवंबर-मार्च) के औसत की तुलना में निर्यात मूल्य में 1.1 प्रतिशत और मात्रा में 5.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

    15% बढ़े दाम तीन हफ्ते में
    पिछले दो-तीन हफ्तों में चावल की खुदरा कीमतों में करीब 15 फीसदी की तेजी आई है। कई किस्मों के चावल 15-20 रुपये प्रति किलो तक महंगे हो गए हैं। सबसे अधिक तेजी प्रीमियम बासमती में देखी जा रही है। इसका भाव 85 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 110 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। साधारण और परमल चावल की किस्मों में भी प्रति क्विंटल 100 से 500 रुपये की बढ़ोतरी हो चुकी है।

    दालों की खरीद के लिए खुलेंगे 500 नए केंद्र
    दलहन उत्पादकों को उनकी फसल का उचित मूल्य देने और बिक्री की परेशानियों से बचाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (नैफेड) और भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ लिमिटेड दोनों मिलकर देशभर में 500 नए केंद्र खोलेंगे। ये दोनों एजेंसियां किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सीधा दालों की खरीद करेंगी।

    नैफेड के प्रबंध निदेशक दीपक कुमार के मुताबिक, खरीफ सीजन की दालें जल्द बाजार में आने वाली हैं। इन केंद्रों पर अरहर के साथ ही चना और उड़द जैसी प्रमुख दालों की खरीद होगी। दाल उत्पादन वाले राज्यों में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान और उत्तर प्रदेश प्रमुख रूप से शामिल हैं। नैफेड देश के करीब 50 जिलों में किसानों के बीच अभियान चलाकर पोर्टल पर उनका पंजीकरण कराएगा।

  • मोदी सरकार की गजब की बीमा स्कीम…. सिर्फ 20 रुपये प्रीमियम और 2 लाख रुपये का कवर

    मोदी सरकार की गजब की बीमा स्कीम…. सिर्फ 20 रुपये प्रीमियम और 2 लाख रुपये का कवर


    नई दिल्ली।
    आप बीमा पॉलिसी (Insurance Policy) लेते हैं, तो हजारों रुपये का प्रीमियम आता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मोदी सरकार सिर्फ 20 रुपये सालाना प्रीमियम पर 2 लाख रुपये का बीमा कवर देती है. जी हां, ये सच है प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (Pradhan Mantri Suraksha Bima Yojana) खासी पॉपुलर है, जो एक एक्सीडेंटल बीमा स्कीम है. सरकार ने निम्न आय वर्ग वालों को बीमा का लाभ देने के लिए PMSBY की शुरुआत की थी।

    PMSBY मोदी सरकार की पर्सनल एक्सीडेंट इंश्योरेंस कवर स्कीम है, इसमें सालाना प्रीमियम देना होता है, जो सिर्फ 20 रुपये का है और 2 लाख रुपये की Insurance Cover मिल जाता है. किसी भी दुर्घटना में मृत्यु होने या फिर विकालांग होने पर सरकार तय कवरेज मुहैया कराती है।


    बीमा योजना का ये नियम जान लें

    प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY) में बीमाधारक व्यक्ति की अगर एक्‍सीडेंट में मृत्यु हो जाती है या फिर वो पूरी तरह से विकलांग हो जाता है, तो फिर दो लाख रुपये का कवर दिया जाता है. वहीं अगर व्यक्ति किसी दुर्घटना के दौरान आंशिक विकलांग होता है, तो भी सरकार एक लाख रुपये का कवर देती है।


    ये है बीमा योजना की ऐज लिमिट

    आज के समय में 20 रुपये में सिर्फ एक प्याली चाय आती है, लेकिन आप इस एक चाय का पैसा बचाकर 2 लाख रुपये का बीमा करा सकते हैं और भी सरकार की गारंटी के साथ. प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY) का लाभ लेना संकट के समय परिवार को आर्थिक रूप से मदद कर सकता है. इस स्कीम को सालाना आधार पर रिन्यू किया जाता है. इस योजना का लाभ 18 से 70 साल तक की उम्र के लोग ले सकते हैं।


    PMSBY में ऑटो डेबिट की सर्विस

    प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना का लाभ उठाने के लिए आपके पास एक्टिव बैंक खाता होना अनिवार्य है. एक से ज्यादा बैंक खाते होने पर भी सिर्फ एक ही बैंक से इस योजना के तहत बीमा कवर ले सकते हैं. हर साल 1 जून को या इससे पहले ‘ऑटो डेबिट’ सुविधा के जरिए आपके बैंक खाते से 20 रुपये के प्रीमियम की कटौती की जाएगी. बैंक खाते से बीमा प्रीमियम का पैसा सीधे डेबिट होता है. इसलिए अपने बैंक खाते में कम से कम 20 रुपये की राशि जरूर रखें. PMSBY के तहत एनरोलमेंट पीरियड 1 जून से 31 मई तक होता है।

    सरकार ने अब तक किया इतना पेमेंट
    PMSBY Scheme को मोदी सरकार ने 9 मई 2015 को लॉन्च किया था. सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें, तो इसकी शुरुआत से मई 2024 तक ही सरकार को कुल 1,80,812 दावे प्राप्त हुए और 1,37,404 दावों का क्लेम सेटलमेंट किया गया था. इस पर सरकार ने 2,728.85 करोड़ रुपये की बीमा राशि का भुगतान किया. वहीं जून 2024 से बीते साल 16 अप्रैल 2025 तक योजना में 36.86 करोड़ नए नामांकन जोड़े गए. इस अवधि में 33,906 दावों में से 19,024 का सेटलमेंट हुआ और सरकार ने 377.73 करोड़ रुपये की राशि क्लेम पेमेंट में खर्च की थी।

  • LPG से हवाई यात्रा तक… 1 सितंबर से बदलेंगे ये 5 बड़े नियम, कार खरीदना भी होगा महंगा

    LPG से हवाई यात्रा तक… 1 सितंबर से बदलेंगे ये 5 बड़े नियम, कार खरीदना भी होगा महंगा


    नई दिल्ली। अगस्त का महीना खत्म होने वाला है और 1 सितंबर से देश में कई अहम बदलाव लागू होने जा रहे हैं। इनका असर सीधे आपकी रसोई के बजट, गैस कनेक्शन, हवाई यात्रा और कार खरीदने के खर्च पर पड़ सकता है। ऑयल मार्केटिंग कंपनियां एलपीजी और एटीएफ की नई कीमतें जारी करेंगी, जबकि टाटा और हुंडई की कारें महंगी होने की तैयारी में हैं। वहीं, विदेश जाने वाले यात्रियों के लिए एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन प्रक्रिया भी आसान होने वाली है।

    1. LPG सिलेंडर के दाम बदलेंगे
    हर महीने की पहली तारीख को ऑयल मार्केटिंग कंपनियां एलपीजी सिलेंडर की कीमतों की समीक्षा करती हैं। ऐसे में 1 सितंबर को घरेलू और कमर्शियल गैस सिलेंडर के नए दाम जारी किए जा सकते हैं। अगस्त में 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमत में 202 रुपए की कटौती की गई थी, जबकि 14.2 किलो वाले घरेलू सिलेंडर के दाम में कोई बदलाव नहीं हुआ था। सितंबर में होने वाला बदलाव सीधे घरेलू बजट पर असर डाल सकता है।

    2. LPG e-KYC के लिए 31 अगस्त तक मौका
    घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं के लिए e-KYC भी जरूरी है। IOCL, BPCL और HPCL ने e-KYC पूरा करने की अंतिम तारीख 31 अगस्त 2026 तक बढ़ाई थी। अगर तय समय सीमा में e-KYC पूरी नहीं की जाती है, तो आगे गैस सिलेंडर की सुविधा या सब्सिडी से जुड़ी दिक्कत सामने आ सकती है। इसलिए जिन उपभोक्ताओं की KYC प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, उन्हें समय रहते इसे पूरा करना होगा।

    3. ATF के साथ CNG-PNG के दाम भी बदल सकते हैं
    हर महीने की पहली तारीख को तेल कंपनियां एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी ATF की कीमतों में संशोधन करती हैं। सितंबर में भी नई दरें जारी होने की उम्मीद है। ATF महंगा या सस्ता होने का असर एयरलाइंस की परिचालन लागत और आगे चलकर हवाई किराए पर पड़ सकता है। इसके अलावा कुछ शहरों में CNG और PNG की कीमतों में भी बदलाव देखने को मिल सकता है।

    4. टाटा की कारें 25 हजार रुपए तक महंगी
    कार खरीदने वालों को सितंबर से झटका लग सकता है। टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स लिमिटेड 1 सितंबर 2026 से अपनी कारों और SUV की कीमतों में 25,000 रुपए तक की बढ़ोतरी करने वाली है।

    कंपनी के मुताबिक, यह बढ़ोतरी पेट्रोल-डीजल यानी ICE मॉडल के साथ इलेक्ट्रिक वाहनों पर भी लागू होगी। हालांकि, कीमत में बढ़ोतरी मॉडल और वेरिएंट के हिसाब से अलग-अलग होगी। टाटा के अलावा हुंडई मोटर इंडिया ने भी इस साल कारों की कीमतों में तीसरी बार बढ़ोतरी का ऐलान किया है।

    5. विदेश जाने वालों के लिए एयरपोर्ट पर बदलेगा नियम
    विदेश यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए 1 सितंबर से इमिग्रेशन प्रक्रिया आसान होने की उम्मीद है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत से विदेश जाने वाले यात्रियों को इमिग्रेशन काउंटर पर बोर्डिंग पास पर स्टांप लगवाने की जरूरत नहीं होगी।

    यात्री मोबाइल पर इलेक्ट्रॉनिक बोर्डिंग पास या उसकी प्रिंटेड कॉपी दिखाकर इमिग्रेशन प्रक्रिया पूरी कर सकेंगे। इससे एयरपोर्ट पर यात्रियों का समय बचने और प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है।

    आपकी जेब पर सीधा असर
    सितंबर की शुरुआत में होने वाले इन बदलावों में सबसे सीधा असर LPG, कार और हवाई यात्रा से जुड़ा होगा। वहीं, CNG-PNG और ATF की कीमतों में होने वाले बदलाव का असर भी आने वाले दिनों में दिखाई दे सकता है।

  • टाटा संस के पूर्व चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को मोदी कैबिनेट में जगह मिलने की अटकलों से दिल्ली में सियासी चर्चा तेज हुई

    टाटा संस के पूर्व चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को मोदी कैबिनेट में जगह मिलने की अटकलों से दिल्ली में सियासी चर्चा तेज हुई

    नई दिल्ली । टाटा संस के चेयरमैन पद से हाल ही में इस्तीफा देने वाले एन चंद्रशेखरन का नाम अब केंद्र सरकार में संभावित मंत्री पद को लेकर राजनीतिक चर्चाओं में सामने आ रहा है। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में यह अटकल तेज है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में संभावित फेरबदल के दौरान चंद्रशेखरन को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है। हालांकि, इस संबंध में सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा या पुष्टि नहीं हुई है।

    राजनीतिक हलकों में चल रही चर्चाओं के अनुसार चंद्रशेखरन को कॉर्पोरेट मामलों या शिक्षा जैसे किसी मंत्रालय की जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना पर बात हो रही है। कुछ नेताओं का कहना है कि उन्होंने इस तरह की चर्चा सुनी है। ऐसे में फिलहाल इसे संभावित राजनीतिक नियुक्ति से जुड़ी अटकल के तौर पर ही देखा जा रहा है।

    चंद्रशेखरन ने हाल में टाटा संस के चेयरमैन पद से इस्तीफा दिया था। उन्होंने अपने मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति के बाद दोबारा नियुक्ति नहीं लेने की इच्छा जताई थी। बताया गया कि उन्होंने 12 अगस्त को इस्तीफा दिया था और उनका वर्तमान कार्यकाल 20 फरवरी को समाप्त होना था। उनके इस्तीफे के पीछे टाटा ट्रस्ट बोर्ड के सदस्यों के साथ मतभेदों की चर्चा भी सामने आई है।

    चंद्रशेखरन की उम्र 63 वर्ष है। राजनीतिक नियुक्तियों के संदर्भ में यह उम्र अपेक्षाकृत कम मानी जा रही है। भारतीय जनता पार्टी में वरिष्ठ पदों के लिए 75 वर्ष की आयु सीमा का नियम चर्चा में रहा है, हालांकि अलग-अलग परिस्थितियों में इसके अपवाद भी देखे गए हैं। इसी वजह से उनकी उम्र को संभावित जिम्मेदारी के रास्ते में बड़ी बाधा के रूप में नहीं देखा जा रहा है।

    शिक्षा मंत्रालय को लेकर चंद्रशेखरन का नाम सामने आने की चर्चा ने इस पूरे घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी कई नेताओं के पास रही है। स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल और धर्मेंद्र प्रधान इस पद पर रह चुके हैं। अलग-अलग राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों में इन सभी को बाद में पद से हटना पड़ा।

    शिक्षा क्षेत्र में हालिया घटनाक्रमों ने भी संभावित बदलाव को लेकर चर्चाओं को बढ़ाया है। परीक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं में सुधार से जुड़े मुद्दे लगातार राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का हिस्सा रहे हैं। परीक्षा सुधारों के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति की जिम्मेदारी इंफोसिस के पूर्व सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि को दिए जाने के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सरकार शिक्षा व्यवस्था में विशेषज्ञता रखने वाले गैर-राजनीतिक व्यक्तियों को अधिक भूमिका देने पर विचार कर रही है।

    इसी संदर्भ में चंद्रशेखरन की संभावित नियुक्ति को लेकर भी चर्चा हो रही है। उद्योग और प्रबंधन क्षेत्र में लंबे अनुभव के कारण उन्हें प्रशासनिक और आर्थिक मामलों की समझ रखने वाला व्यक्ति माना जाता है। यदि सरकार उन्हें कोई जिम्मेदारी देती है तो यह पारंपरिक राजनीतिक नियुक्तियों से अलग एक महत्वपूर्ण प्रयोग हो सकता है।

    फिलहाल शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी अंतरिम रूप से प्रह्लाद जोशी के पास है। यह व्यवस्था उस समय बनी थी जब NEET-UG 2026 पेपर लीक मामले के बाद शिक्षा क्षेत्र में व्यापक सवाल उठे और धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा। ऐसे में अब निगाहें संभावित कैबिनेट फेरबदल और शिक्षा मंत्रालय के लिए सरकार के अगले फैसले पर टिकी हैं। चंद्रशेखरन के नाम पर चल रही चर्चाओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि उनकी नियुक्ति को लेकर अभी कोई आधिकारिक निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया है।

  • अंडे की कीमतों में 35 से 40 प्रतिशत बढ़ोतरी, पोल्ट्री फीड महंगा होने से मक्का और इथेनॉल की बढ़ती मांग बनी अहम वजह

    अंडे की कीमतों में 35 से 40 प्रतिशत बढ़ोतरी, पोल्ट्री फीड महंगा होने से मक्का और इथेनॉल की बढ़ती मांग बनी अहम वजह

    नई दिल्ली ।अंडों की कीमतों में पिछले एक साल के दौरान तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है। पोल्ट्री फार्म से निकलने वाले एक अंडे की कीमत करीब 7 रुपये तक पहुंच गई है, जबकि कई खुदरा बाजारों में उपभोक्ताओं को इसके लिए 8.50 से 9 रुपये तक भुगतान करना पड़ रहा है। कीमतों में करीब 35 से 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने रोजमर्रा के खाद्य खर्च पर दबाव बढ़ाया है।

    अंडों की कीमत बढ़ने के पीछे पोल्ट्री फीड की बढ़ती लागत को एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। मुर्गियों के चारे में मक्का प्रमुख कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होता है। इसके अलावा सोयाबीन और दूसरे फीड इनपुट की कीमतों में बदलाव भी पोल्ट्री उत्पादन की कुल लागत को प्रभावित करता है।

    मक्के की मांग इस समय केवल पोल्ट्री उद्योग तक सीमित नहीं है। भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति के तहत अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन का महत्व लगातार बढ़ा है। इस प्रक्रिया में मक्का प्रमुख फीडस्टॉक के रूप में तेजी से इस्तेमाल किया जा रहा है।

    इथेनॉल क्षेत्र में मक्के की बढ़ती मांग का सीधा असर इसकी उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है। जब एक ही कृषि उत्पाद की मांग अलग-अलग क्षेत्रों से बढ़ती है, तो बाजार में उसकी कीमत पर दबाव बनने की संभावना रहती है। इसका असर उन उद्योगों पर भी पड़ता है जो उसी कच्चे माल पर निर्भर हैं।

    पोल्ट्री उद्योग के लिए मक्का फीड का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए मक्के की कीमत में बढ़ोतरी होने पर चारे की लागत बढ़ सकती है। चारे की लागत बढ़ने के बाद उसका प्रभाव मुर्गियों के पालन, उत्पादन लागत और अंततः अंडों के बाजार मूल्य पर दिखाई देता है।

    हालांकि अंडों की मौजूदा महंगाई को केवल इथेनॉल की बढ़ती मांग से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं होगी। मक्के की कीमत पर पोल्ट्री फीड की मांग, मौसम, उत्पादन में बदलाव और दूसरे कृषि इनपुट की लागत का भी प्रभाव पड़ता है। मुर्गियों की उत्पादकता और बाजार में अंडों की उपलब्धता भी कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    आने वाले महीनों में मांग का मौसमी असर भी महत्वपूर्ण हो सकता है। सर्दियों के दौरान अंडों की खपत आम तौर पर बढ़ जाती है। ऐसे में यदि पोल्ट्री फीड की लागत ऊंची बनी रहती है और बाजार में आपूर्ति मांग के अनुरूप नहीं रहती, तो अंडों की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।

    सरकार की ओर से इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की उपलब्धता बढ़ाने और उत्पादन को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जा रहा है। इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के के इस्तेमाल में हुई वृद्धि से इस फसल की औद्योगिक मांग का महत्व बढ़ा है। ESY 2025-26 में इथेनॉल उत्पादन के लिए करीब 125.78 लाख टन मक्के के इस्तेमाल का अनुमान इसी बढ़ती मांग को दर्शाता है।

    मक्के की बढ़ती औद्योगिक मांग और पोल्ट्री क्षेत्र की जरूरतों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण हो गया है। यदि मक्के की उपलब्धता बढ़ती है और उत्पादन लागत नियंत्रित रहती है, तो पोल्ट्री उद्योग पर दबाव कम हो सकता है। वहीं, फीड लागत ऊंची रहने पर इसका असर अंडों की कीमतों में आगे भी दिखाई दे सकता है।

    फिलहाल अंडों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी उपभोक्ताओं के साथ पोल्ट्री कारोबार के लिए भी चुनौती बनी हुई है। आने वाले समय में मक्का उत्पादन, फीड लागत, इथेनॉल की मांग, अंडों की आपूर्ति और मौसमी खपत जैसे कारक मिलकर बाजार की दिशा तय करेंगे।

  • जापान में पीयूष गोयल की बड़ी कारोबारी बैठकें, भारत में निवेश बढ़ाने के लिए वित्तीय और औद्योगिक अवसरों पर जोर

    जापान में पीयूष गोयल की बड़ी कारोबारी बैठकें, भारत में निवेश बढ़ाने के लिए वित्तीय और औद्योगिक अवसरों पर जोर

    नई दिल्ली ।केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जापान दौरे के तीसरे दिन देश के प्रमुख कारोबारी और वित्तीय संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कई महत्वपूर्ण बैठकें कीं। इन बैठकों में भारत में निवेश बढ़ाने, व्यापारिक भागीदारी मजबूत करने और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई गति देने से जुड़े अवसरों पर विस्तार से चर्चा हुई।

    गोयल ने जापान के प्रमुख कारोबारी समूह टोयोटा त्सुशो कॉर्पोरेशन, सुमितोमो मित्सुई बैंकिंग कॉर्पोरेशन यानी एसएमबीसी ग्रुप, मित्सुबिशी यूएफजे फाइनेंशियल ग्रुप यानी एमयूएफजी तथा निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। बातचीत में अलग-अलग क्षेत्रों में भारत की बढ़ती संभावनाओं और जापानी कंपनियों के लिए उपलब्ध कारोबारी अवसरों को सामने रखा गया।

    टोयोटा त्सुशो कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी तोशिमित्सु इमाई के साथ बैठक में भारत में व्यापार, मोबिलिटी और औद्योगिक क्षेत्रों में कंपनी की भागीदारी बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार किया गया। इस दौरान भारत की लागत प्रतिस्पर्धात्मकता और वैश्विक निर्यात केंद्र के रूप में देश की भूमिका को मजबूत करने के अवसरों पर विशेष जोर दिया गया।

    भारत सरकार जापानी कंपनियों को देश में उत्पादन, कारोबार और निर्यात से जुड़े अवसरों का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। ऐसे में औद्योगिक और मोबिलिटी क्षेत्र में जापानी कंपनियों की भागीदारी बढ़ना दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को और मजबूत कर सकता है।

    गोयल ने एसएमबीसी ग्रुप के डिप्टी प्रेसिडेंट एग्जीक्यूटिव ऑफिसर योशिहिरो हयाकुतोमे के साथ भी बैठक की। इसमें बैंकिंग क्षेत्र में निवेश बढ़ाने और भारत-जापान के वित्तीय संबंधों को अधिक मजबूत बनाने के अवसरों पर चर्चा हुई। भारत के तेजी से विकसित होते वित्तीय क्षेत्र को जापानी वित्तीय संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण अवसर के रूप में पेश किया गया।

    इसके बाद गोयल ने एमयूएफजी के डिप्टी चेयरमैन यासुशी इतागाकी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बातचीत की। बैठक में बैंकिंग, वाणिज्यिक वित्त और निवेश के क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग को विस्तार देने की संभावनाओं पर चर्चा की गई। भारतीय बाजार की बढ़ती जरूरतों और वित्तीय क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों को भी बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया।

    निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस के मैनेजिंग एग्जीक्यूटिव ऑफिसर और ग्लोबल बिजनेस प्रमुख मिनोरू किमुरा के साथ बैठक में बीमा और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर विचार हुआ। गोयल ने भारत के तेजी से विस्तार कर रहे बीमा बाजार में जापानी संस्थानों के लिए मौजूद संभावनाओं को रेखांकित किया।

    इन बैठकों के माध्यम से भारत ने जापान के प्रमुख कारोबारी और वित्तीय समूहों के सामने निवेश के विभिन्न अवसरों को स्पष्ट किया। व्यापार, औद्योगिक उत्पादन, मोबिलिटी, बैंकिंग, वाणिज्यिक वित्त, बीमा और निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।

    भारत और जापान के बीच आर्थिक साझेदारी पहले से ही कई क्षेत्रों में व्यापक है। भारत की बड़ी घरेलू अर्थव्यवस्था, बढ़ती औद्योगिक क्षमता और वैश्विक निर्यात केंद्र बनने की दिशा में जारी प्रयास जापानी कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा कर रहे हैं। वहीं, जापान की पूंजी, तकनीकी क्षमता और वित्तीय विशेषज्ञता भारत की विकास जरूरतों के साथ महत्वपूर्ण तालमेल बना सकती है।

    पीयूष गोयल की जापान यात्रा के दौरान हुई इन बैठकों का प्रमुख उद्देश्य कारोबारी संबंधों को मजबूत करना और जापानी निवेशकों को भारत में उपलब्ध अवसरों से जोड़ना रहा। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश सहयोग को आगे बढ़ाने की दिशा में संवाद को मजबूती मिलने की उम्मीद है।