Category: Economy

  • सोलर सेक्टर की इस कंपनी ने मचाई हलचल, तिमाही नतीजों में रिकॉर्ड कमाई से निवेशक उत्साहित

    सोलर सेक्टर की इस कंपनी ने मचाई हलचल, तिमाही नतीजों में रिकॉर्ड कमाई से निवेशक उत्साहित

    नई दिल्ली ।  रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर की तेजी से उभरती कंपनी Solex Energy ने अपने ताजा तिमाही नतीजों से बाजार में हलचल पैदा कर दी है। कंपनी ने चौथी तिमाही में शानदार वित्तीय प्रदर्शन दर्ज करते हुए मुनाफे में 305 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी हासिल की है। इसके साथ ही कंपनी का रेवेन्यू भी कई गुना बढ़ा है, जिसने निवेशकों का ध्यान एक बार फिर अपनी ओर खींच लिया है।

    कंपनी के मुताबिक, चौथी तिमाही के दौरान उसका शुद्ध मुनाफा बढ़कर 57.9 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा केवल 14.3 करोड़ रुपये था। इसी तरह कंपनी की कुल आय में भी बड़ी छलांग देखने को मिली। इस तिमाही में कंपनी का रेवेन्यू 885.5 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो एक साल पहले 254.4 करोड़ रुपये था। आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि कंपनी ने बेहद तेज रफ्तार से कारोबार का विस्तार किया है।

    कंपनी के ऑपरेटिंग प्रदर्शन में भी मजबूत सुधार देखने को मिला। EBITDA यानी ऑपरेटिंग प्रॉफिट 251 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 98.3 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। पिछले साल इसी अवधि में यह 28 करोड़ रुपये था। EBITDA मार्जिन भी हल्के सुधार के साथ 11.1 प्रतिशत पर पहुंच गया, जो कंपनी की परिचालन क्षमता को मजबूत दर्शाता है।

    पूरे वित्त वर्ष 2025-26 की बात करें तो कंपनी का प्रदर्शन और भी प्रभावशाली रहा। इस दौरान कंपनी की कुल आय 1,621 करोड़ रुपये से अधिक रही, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में लगभग 144 प्रतिशत ज्यादा है। वहीं EBITDA 186 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया और कंपनी का प्रॉफिट आफ्टर टैक्स भी 132 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 98 करोड़ रुपये के पार निकल गया। इन आंकड़ों ने यह साबित किया है कि कंपनी केवल रेवेन्यू ग्रोथ ही नहीं बल्कि मुनाफे के स्तर पर भी मजबूत पकड़ बना रही है।

    कंपनी प्रबंधन का कहना है कि बीता वित्त वर्ष उसके लिए बदलाव और विस्तार का दौर रहा। Solex Energy अब केवल एक मैन्युफैक्चरिंग आधारित कंपनी नहीं रहना चाहती, बल्कि वह खुद को एक इंटीग्रेटेड क्लीन एनर्जी बिजनेस के रूप में स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। कंपनी आने वाले समय में वैश्विक बाजारों में भी अपनी मौजूदगी मजबूत करने की योजना पर काम कर रही है।

    शेयर बाजार में भी कंपनी का प्रदर्शन लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। पिछले पांच वर्षों में इस स्टॉक ने निवेशकों को लगभग 3900 प्रतिशत का मल्टीबैगर रिटर्न दिया है। यही वजह है कि यह स्टॉक लंबे समय से निवेशकों की पसंद बना हुआ है। पिछले तीन वर्षों में भी कंपनी के शेयरों में करीब 300 प्रतिशत की तेजी देखने को मिली है, जबकि एक साल के भीतर भी स्टॉक ने मजबूत रिटर्न दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर को मिल रहे सरकारी समर्थन और बढ़ती मांग का सीधा फायदा ऐसी कंपनियों को मिल रहा है, जो सोलर और क्लीन एनर्जी क्षेत्र में तेजी से विस्तार कर रही हैं। आने वाले वर्षों में यह सेक्टर और अधिक मजबूत हो सकता है, जिससे इस तरह की कंपनियों के कारोबार में और तेजी देखने को मिल सकती है।

    Solex Energy के ताजा नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कंपनी केवल तेजी से बढ़ ही नहीं रही, बल्कि निवेशकों के भरोसे पर भी लगातार खरी उतर रही है।

  • घाटे में चल रही कंपनी में भी रिलायंस को दिख रहा भविष्य, आलोक इंडस्ट्रीज के जरिए टेक्सटाइल कारोबार मजबूत करने की तैयारी

    घाटे में चल रही कंपनी में भी रिलायंस को दिख रहा भविष्य, आलोक इंडस्ट्रीज के जरिए टेक्सटाइल कारोबार मजबूत करने की तैयारी

    नई दिल्ली ।
     भारतीय कॉरपोरेट जगत में जब भी लंबी अवधि की रणनीति और बड़े निवेश की बात होती है, तब रिलायंस इंडस्ट्रीज का नाम प्रमुखता से सामने आता है। इसी रणनीतिक सोच के तहत कंपनी ने कुछ वर्ष पहले टेक्सटाइल सेक्टर की संघर्ष कर रही कंपनी आलोक इंडस्ट्रीज में बड़ी हिस्सेदारी खरीदकर बाजार को चौंका दिया था। उस समय यह निवेश कई लोगों के लिए जोखिम भरा माना गया, क्योंकि कंपनी भारी कर्ज, कमजोर वित्तीय स्थिति और लगातार बढ़ते घाटे से जूझ रही थी। हालांकि रिलायंस ने इस निवेश को तात्कालिक मुनाफे के बजाय भविष्य की औद्योगिक मजबूती और वैल्यू चेन विस्तार के नजरिए से देखा। आज भी आलोक इंडस्ट्रीज का शेयर लगभग 13 रुपए के आसपास कारोबार कर रहा है और कंपनी पूरी तरह लाभ में नहीं लौट पाई है, लेकिन इसके बावजूद रिलायंस की रणनीति में कोई बदलाव दिखाई नहीं देता।

    आलोक इंडस्ट्रीज कभी देश की बड़ी वर्टिकली इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल कंपनियों में गिनी जाती थी। कंपनी स्पिनिंग, यार्न, फैब्रिक, गारमेंट्स और होम टेक्सटाइल्स जैसे कई क्षेत्रों में मजबूत मौजूदगी रखती थी। लेकिन समय के साथ गलत विस्तार योजनाएं, प्रबंधन संबंधी चुनौतियां और बढ़ते कर्ज ने कंपनी की वित्तीय स्थिति को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया। हालात इतने खराब हो गए कि कंपनी को दिवाला प्रक्रिया के तहत पुनर्गठन के दौर से गुजरना पड़ा। इसी समय रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अवसर को पहचानते हुए कंपनी में हिस्सेदारी लेकर इसे फिर से खड़ा करने की दिशा में कदम बढ़ाया।

    रिलायंस की रणनीति केवल एक कंपनी को बचाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका उद्देश्य टेक्सटाइल कारोबार की पूरी सप्लाई चेन को मजबूत करना भी था। रिलायंस पहले से ही पॉलिएस्टर और संबंधित कच्चे माल के क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखती है, जबकि आलोक इंडस्ट्रीज यार्न और फाइबर उत्पादन में अच्छी क्षमता रखती है। ऐसे में दोनों कंपनियों के बीच तालमेल के जरिए उत्पादन लागत कम करने, सप्लाई सिस्टम मजबूत करने और बड़े स्तर पर लागत नियंत्रण हासिल करने की योजना बनाई गई। इसके अलावा टेक्सटाइल और रिटेल कारोबार के बीच बेहतर समन्वय भी इस निवेश का एक महत्वपूर्ण पहलू माना जा रहा है।

    हालांकि कंपनी के सामने अभी भी कई बड़े ऑपरेटिंग चैलेंज बने हुए हैं। बढ़ती कच्चे माल की कीमतें, बिजली और ईंधन पर बढ़ता खर्च, वैश्विक बाजार में कमजोर मांग और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े दबाव कंपनी की वित्तीय स्थिति पर असर डाल रहे हैं। कई बार परिचालन स्तर पर सुधार दिखाई देता है और आय में बढ़ोतरी भी दर्ज होती है, लेकिन भारी ब्याज भुगतान और पुराने वित्तीय बोझ के कारण कंपनी का कुल घाटा पूरी तरह खत्म नहीं हो पा रहा है। लगातार नुकसान का असर कंपनी की नेटवर्थ पर भी दिखाई दे रहा है।

    इसके बावजूद उद्योग जगत में माना जा रहा है कि रिलायंस इस निवेश को तात्कालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक औद्योगिक रणनीति के रूप में देख रही है। कंपनी का फोकस टेक्सटाइल सेक्टर में अपनी पकड़ मजबूत करने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और भविष्य के बाजार अवसरों का लाभ उठाने पर है। आने वाले वर्षों में यदि वैश्विक बाजार की स्थिति बेहतर होती है और परिचालन लागत नियंत्रित रहती है, तो आलोक इंडस्ट्रीज धीरे-धीरे मजबूत वापसी कर सकती है।

  • मुनाफा घटा लेकिन कारोबार में जबरदस्त तेजी, Hind Rectifiers की ऑर्डर बुक ₹845 करोड़ के पार

    मुनाफा घटा लेकिन कारोबार में जबरदस्त तेजी, Hind Rectifiers की ऑर्डर बुक ₹845 करोड़ के पार

    नई दिल्ली ।  शेयर बाजार में निवेशकों के बीच चर्चित कंपनी Hind Rectifiers एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है। दिग्गज निवेशक मुकुल अग्रवाल की हिस्सेदारी वाली इस कंपनी ने अपने चौथी तिमाही के नतीजे जारी किए हैं, जिसमें कंपनी का मुनाफा भले ही कमजोर रहा हो, लेकिन कारोबार की रफ्तार ने बाजार का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। कंपनी के रेवेन्यू में सालाना आधार पर 51 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि इसकी ऑर्डर बुक भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। ऐसे में निवेशकों की नजर अब आने वाले कारोबारी सत्र में इस शेयर की चाल पर बनी हुई है।

    ताजा वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, कंपनी का नेट प्रॉफिट पिछले साल की समान तिमाही की तुलना में लगभग 55 प्रतिशत घटकर 4.51 करोड़ रुपये रह गया। पिछले वर्ष इसी अवधि में कंपनी ने करीब 9.99 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया था। हालांकि मुनाफे में यह गिरावट बाजार के लिए चिंता का विषय बनी, लेकिन दूसरी ओर कंपनी के कारोबार में आई तेज वृद्धि ने स्थिति को संतुलित किया। चौथी तिमाही के दौरान कंपनी का रेवेन्यू 279.8 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 185.1 करोड़ रुपये के मुकाबले काफी अधिक है।

    कंपनी के ऑपरेटिंग प्रदर्शन में भी दबाव देखने को मिला। EBITDA में लगभग 58 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह घटकर 8.42 करोड़ रुपये रह गया। इसके साथ ही EBITDA मार्जिन भी घटकर 3 प्रतिशत पर आ गया, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 10.8 प्रतिशत था। विशेषज्ञ मानते हैं कि लागत बढ़ने और कुछ परिचालन दबावों के कारण कंपनी की लाभप्रदता प्रभावित हुई है, लेकिन मजबूत ऑर्डर बुक और बढ़ते कारोबार से भविष्य की संभावनाएं अभी भी सकारात्मक दिखाई दे रही हैं।

    Hind Rectifiers ने बताया कि 31 मार्च 2026 तक उसकी ऑर्डर बुक बढ़कर 845.5 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है, जो कंपनी के लिए एक बड़ा उपलब्धि स्तर माना जा रहा है। कंपनी का कहना है कि रेलवे सेक्टर में तेजी से बढ़ रहे निवेश और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के विस्तार ने ऑर्डर बुक को मजबूती दी है। इसके अलावा सरकार द्वारा इंफ्रास्ट्रक्चर और इलेक्ट्रिकल सिस्टम से जुड़े क्षेत्रों में किए जा रहे निवेश का भी कंपनी को सीधा फायदा मिल रहा है। यही वजह है कि बाजार में भविष्य को लेकर कंपनी के प्रति सकारात्मक उम्मीदें बनी हुई हैं।

    कंपनी ने अपने शेयरधारकों के लिए डिविडेंड का भी ऐलान किया है। बोर्ड ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए प्रति शेयर 1.40 रुपये के डिविडेंड की सिफारिश की है। यह फैसला निवेशकों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, क्योंकि कमजोर मुनाफे के बावजूद कंपनी ने शेयरधारकों को रिटर्न देने का भरोसा बनाए रखा है।

    बाजार में इस कंपनी को लेकर एक और बड़ी वजह चर्चा में है और वह है दिग्गज निवेशक मुकुल अग्रवाल की हिस्सेदारी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 तक उनके पास कंपनी में 1.45 प्रतिशत हिस्सेदारी थी, जो लगभग 5 लाख शेयरों के बराबर है। निवेशकों का मानना है कि किसी अनुभवी निवेशक की मौजूदगी अक्सर कंपनी के भविष्य को लेकर भरोसा बढ़ाती है। अब आने वाले समय में बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि मजबूत ऑर्डर बुक और बढ़ते कारोबार के दम पर कंपनी अपने मुनाफे को फिर से मजबूत कर पाती है या नहीं।

  • इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की बड़ी कंपनी को झटका, घटती कमाई और कमजोर मार्जिन से शेयर टूटा

    इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की बड़ी कंपनी को झटका, घटती कमाई और कमजोर मार्जिन से शेयर टूटा

    नई दिल्ली ।  इंफ्रास्ट्रक्चर और इंजीनियरिंग सेक्टर की प्रमुख कंपनी KEC International के हालिया तिमाही नतीजों ने बाजार और निवेशकों दोनों को चौंका दिया है। मजबूत ऑर्डर बुक और बड़े प्रोजेक्ट्स होने के बावजूद कंपनी का वित्तीय प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया, जिसके चलते शेयर बाजार में कंपनी के स्टॉक पर दबाव साफ दिखाई दिया। चौथी तिमाही के आंकड़ों में मुनाफे, रेवेन्यू और परिचालन आय में गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनी को बढ़ती लागत, प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन में चुनौतियों और मार्जिन दबाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा है, जिसका असर सीधे वित्तीय नतीजों पर दिखाई दिया।

    तिमाही रिपोर्ट के अनुसार कंपनी का शुद्ध लाभ सालाना आधार पर करीब 28 प्रतिशत घटकर 193 करोड़ रुपए रह गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा कहीं अधिक मजबूत था। कंपनी के कुल रेवेन्यू में भी गिरावट दर्ज की गई और परिचालन प्रदर्शन पर दबाव साफ दिखाई दिया। इसके साथ ही EBITDA में भी उल्लेखनीय कमी देखने को मिली, जिससे यह संकेत मिलता है कि लागत नियंत्रण और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंपनी के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। EBITDA मार्जिन में आई गिरावट ने निवेशकों की चिंता को और बढ़ा दिया, क्योंकि यह किसी भी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी की परिचालन क्षमता का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।

    कमजोर नतीजों का असर कंपनी के शेयर पर भी तुरंत दिखाई दिया और बाजार में स्टॉक दबाव में आ गया। बीते कारोबारी सत्र में कंपनी के शेयर में गिरावट दर्ज की गई और यह अपने 52 सप्ताह के निचले स्तर के करीब पहुंच गया। पिछले कुछ दिनों में स्टॉक में लगातार कमजोरी देखी गई है, जिससे अल्पकालिक निवेशकों के बीच सतर्कता बढ़ गई है। हालांकि कंपनी का बाजार पूंजीकरण अभी भी मजबूत बना हुआ है, लेकिन मौजूदा तिमाही के प्रदर्शन ने निवेशकों की उम्मीदों को झटका दिया है।

    इसके बावजूद कंपनी के पास मौजूद मजबूत ऑर्डर बुक और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत माने जा रहे हैं। पावर ट्रांसमिशन, रेलवे, सिविल कंस्ट्रक्शन और अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स में कंपनी की मजबूत मौजूदगी आने वाले समय में ग्रोथ को दोबारा गति दे सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कंपनी आने वाली तिमाहियों में प्रोजेक्ट्स के निष्पादन में सुधार करती है और कच्चे माल की लागत स्थिर रहती है, तो उसकी लाभप्रदता में सुधार संभव है।

    सरकार की ओर से लगातार बढ़ रहे इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और बड़े प्रोजेक्ट्स की घोषणाएं भी कंपनी के लिए दीर्घकालिक अवसर के रूप में देखी जा रही हैं। ऐसे में बाजार की मौजूदा कमजोरी के बावजूद लंबी अवधि में कंपनी के प्रदर्शन में सुधार की उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। फिलहाल निवेशकों की नजर आने वाली तिमाहियों में कंपनी के परिचालन सुधार और मार्जिन रिकवरी पर बनी रहेगी, जो आगे स्टॉक की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

  • Jio IPO अपडेट: निवेशकों की नजरें, जल्द आ सकता है ऑफिशियल अनाउंसमेंट

    Jio IPO अपडेट: निवेशकों की नजरें, जल्द आ सकता है ऑफिशियल अनाउंसमेंट


    नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार में एक बार फिर मेगा पब्लिक इश्यू की तैयारी तेज हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, Reliance Industries Limited की डिजिटल इकाई Jio Platforms Limited जल्द ही अपना बहुप्रतीक्षित IPO लॉन्च कर सकती है। जानकारी के अनुसार, कंपनी मई 2026 में ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) फाइल कर सकती है। अगर यह योजना आगे बढ़ती है तो यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा IPO साबित हो सकता है।

    IPO को लेकर क्यों बढ़ी हलचल
    कंपनी ने पिछले कुछ महीनों से इस मेगा इश्यू की तैयारी तेज कर दी है। शुरुआत में मार्च तक फाइलिंग का प्लान था, लेकिन वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और बाजार की अस्थिरता के कारण इसे टाल दिया गया। अब कंपनी अपने वित्तीय आंकड़ों और बाजार स्थितियों का आकलन करने के बाद आगे बढ़ने की रणनीति बना रही है।

    बड़ी टीम और ग्लोबल बैंकों की भागीदारी
    इस मेगा IPO को संभालने के लिए कंपनी ने बड़े स्तर पर तैयारी की है। करीब 19 घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेश बैंकों को सलाहकार के रूप में शामिल किया गया है, जिनमें शामिल हैं:
    Goldman Sachs
    Morgan Stanley
    Bank of America
    Citigroup
    HSBC
    Kotak Mahindra Capital
    JM Financial

    कितना बड़ा हो सकता है IPO?
    हालांकि कंपनी ने अभी तक IPO साइज को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा पब्लिक इश्यू हो सकता है। अगर यह IPO लॉन्च होता है, तो यह निवेशकों के लिए एक बड़ा अवसर और भारतीय टेक-टेलीकॉम सेक्टर के लिए ऐतिहासिक कदम होगा।

    क्यों है यह IPO खास?
    भारत का सबसे बड़ा संभावित IPO
    लंबे समय बाद रिलायंस समूह का बड़ा पब्लिक इश्यू
    डिजिटल और टेलीकॉम सेक्टर में मजबूत पकड़
    घरेलू और विदेशी निवेशकों की बड़ी दिलचस्पी

    जियो का संभावित IPO भारतीय शेयर बाजार में नई हलचल पैदा कर सकता है। हालांकि अभी आधिकारिक घोषणा का इंतजार है, लेकिन मई 2026 को लेकर निवेशकों की नजरें टिकी हुई हैं।

  • सेबी की बड़ी राहत: ज्यादा लीवरेज वाले InvITs के उधारी नियम आसान

    सेबी की बड़ी राहत: ज्यादा लीवरेज वाले InvITs के उधारी नियम आसान


    नई दिल्ली। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (इनविट्स) के लिए उधारी नियमों में महत्वपूर्ण राहत देने का फैसला किया है। नए नियमों के तहत अब ऐसे इनविट्स भी अतिरिक्त कर्ज ले सकेंगे, जिनका लीवरेज उनकी कुल एसेट वैल्यू के 49 प्रतिशत से अधिक है।

    सेबी का यह कदम इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में वित्तीय लचीलापन बढ़ाने और परियोजनाओं के लिए पूंजी उपलब्धता को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया है। माना जा रहा है कि इससे सड़क, परिवहन और अन्य बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को गति मिलेगी।

    पूंजीगत खर्च और क्षमता विस्तार के लिए मिलेगी मद
    सेबी द्वारा जारी सर्कुलर के अनुसार, अतिरिक्त उधारी का उपयोग पूंजीगत खर्चों के लिए किया जा सकेगा। इन खर्चों में परिसंपत्तियों के प्रदर्शन को बेहतर बनाना, क्षमता विस्तार करना और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को मजबूत करना शामिल है। नियामक ने सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए बड़े रखरखाव कार्यों पर होने वाले खर्चों को भी इस राहत के दायरे में शामिल किया है। ऐसे रखरखाव कार्य, जो सामान्य मरम्मत से अलग और कंसेशन एग्रीमेंट के तहत जरूरी होते हैं, अब अतिरिक्त कर्ज के जरिए पूरे किए जा सकेंगे।

    सड़क परियोजनाओं को होगा सबसे ज्यादा फायदा
    विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से सड़क क्षेत्र से जुड़े इनविट्स को सबसे अधिक लाभ मिलेगा। इन परियोजनाओं में समय-समय पर बड़े स्तर पर मरम्मत और रखरखाव की जरूरत होती है, जिसके लिए भारी फंडिंग की आवश्यकता पड़ती है। सेबी ने स्पष्ट किया है कि बड़े रखरखाव खर्च में केवल वही कार्य शामिल होंगे, जो सामान्य संचालन और नियमित रखरखाव से अलग हों और अनुबंध के तहत अनिवार्य हों।

    रीफाइनेंसिंग को भी मिली मंजूरी
    सेबी ने इनविट्स, स्पेशल पर्पस व्हीकल्स (SPVs) और होल्डिंग कंपनियों को कुछ शर्तों के तहत मौजूदा कर्ज की रीफाइनेंसिंग की अनुमति भी दी है। हालांकि यह सुविधा केवल मूल कर्ज राशि तक सीमित रहेगी। नियामक ने साफ किया कि जमा ब्याज, जुर्माना, फीस या अन्य शुल्कों को रीफाइनेंसिंग में शामिल नहीं किया जाएगा। यानी केवल मूल कर्ज की राशि को ही नए कर्ज से बदला जा सकेगा।

    तुरंत लागू हुए नए नियम
    सेबी ने बताया कि यह संशोधित ढांचा 17 अप्रैल 2026 को इनविट नियमों में किए गए बदलावों के बाद लागू किया गया है और नए नियम तत्काल प्रभाव से प्रभावी हो गए हैं। माना जा रहा है कि इस फैसले से इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को नई गति मिलेगी और इनविट्स को अपनी परिसंपत्तियों के विस्तार व रखरखाव में अधिक परिचालन स्वतंत्रता प्राप्त होगी।

  • सोने-चांदी में जबरदस्त उछाल, एक हफ्ते में सोना ₹8 हजार से ज्यादा महंगा

    सोने-चांदी में जबरदस्त उछाल, एक हफ्ते में सोना ₹8 हजार से ज्यादा महंगा

    नई दिल्ली। देश में सोने और चांदी की कीमतों में इस सप्ताह जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। लगातार बढ़ती कीमतों ने निवेशकों और आम खरीदारों दोनों का ध्यान खींचा है। इंडिया बुलियन ज्वेलर्स एसोसिएशन (आईबीजेए) के आंकड़ों के अनुसार, बीते एक हफ्ते में सोने की कीमत में 8 हजार रुपए से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि चांदी भी रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गई है।

    24 कैरेट सोना 1.58 लाख रुपए के पार
    आईबीजेए के मुताबिक, 24 कैरेट सोने की कीमत बढ़कर 1,58,210 रुपए प्रति 10 ग्राम पहुंच गई है। पिछले सप्ताह इसी अवधि में इसकी कीमत 1,51,078 रुपए प्रति 10 ग्राम थी। यानी सिर्फ एक हफ्ते में सोना 8,132 रुपए प्रति 10 ग्राम महंगा हो गया। इसी तरह 22 कैरेट सोने का दाम बढ़कर 1,44,920 रुपए प्रति 10 ग्राम पहुंच गया, जो पहले 1,38,387 रुपए था। वहीं 18 कैरेट सोने की कीमत भी 1,13,309 रुपए से बढ़कर 1,18,658 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गई।

    चांदी ने भी दिखाई तेज चमक
    सोने के साथ-साथ चांदी की कीमतों में भी बड़ी तेजी दर्ज की गई है। एक हफ्ते में चांदी 12,900 रुपए प्रति किलो महंगी होकर 2,68,500 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई। पिछले सप्ताह इसकी कीमत 2,55,600 रुपए प्रति किलो थी। हाजिर बाजार में चांदी ने 14 मई को सुबह के सत्र में 2,87,350 रुपए प्रति किलो का उच्चतम स्तर छुआ, जबकि सप्ताह का न्यूनतम भाव 11 मई को 2,55,300 रुपए प्रति किलो दर्ज किया गया।

    आयात शुल्क बढ़ने से बढ़े दाम
    विशेषज्ञों के अनुसार, इस सप्ताह सोने और चांदी की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी की बड़ी वजह केंद्र सरकार द्वारा कीमती धातुओं पर आयात शुल्क बढ़ाना है। सरकार ने सेस सहित आयात शुल्क को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया है, जिसका सीधा असर घरेलू बाजार पर दिखाई दे रहा है। आईबीजेए दिन में दो बार सुबह और शाम सोने और चांदी के दाम जारी करता है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक परिस्थितियों और आयात नीति के असर से आने वाले दिनों में कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

  • टाटा ट्रस्ट्स की बोर्ड बैठक पर रोक, महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर का निर्देश

    टाटा ट्रस्ट्स की बोर्ड बैठक पर रोक, महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर का निर्देश

    नई दिल्ली। टाटा समूह से जुड़े सर रतन टाटा ट्रस्ट के प्रशासनिक मामलों में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर ने ट्रस्ट की प्रस्तावित अहम बोर्ड बैठक को स्थगित करने का निर्देश जारी किया है। यह फैसला ट्रस्ट की बोर्ड संरचना को लेकर मिली कथित नियम उल्लंघन संबंधी शिकायतों के बाद लिया गया है।

    इस निर्देश के बाद टाटा ट्रस्ट्स की ओर से बयान जारी कर कहा गया है कि आदेश एकतरफा (एक्स-पार्टी) तरीके से दिया गया है और केवल सर रतन टाटा ट्रस्ट पर लागू होता है। ट्रस्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश की समीक्षा की जा रही है और कानूनी पहलुओं को समझा जा रहा है।

    महत्वपूर्ण बैठक पर लगी रोक
    यह बैठक इसलिए भी बेहद अहम मानी जा रही थी क्योंकि इसमें टाटा संस से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा प्रस्तावित थी। इनमें कंपनी की संभावित लिस्टिंग, चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और अन्य नॉमिनी डायरेक्टर्स से जुड़े मुद्दे शामिल थे। बैठक पहले 8 मई को होनी थी, जिसे बाद में 16 मई तक स्थगित किया गया था, लेकिन अब इसे फिर से टाल दिया गया है।

    जांच के घेरे में ट्रस्ट की संरचना
    महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर अमोघ एस. कालोटी के अनुसार, सर रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी बोर्ड की संरचना को लेकर प्राप्त शिकायतों की जांच जारी है। आदेश में कहा गया है कि जब तक इंस्पेक्टर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं करता, तब तक किसी भी प्रकार की बोर्ड बैठक आयोजित नहीं की जा सकती। वकील कात्यायनी अग्रवाल द्वारा दायर शिकायत में भी इस मामले को उठाया गया है। उन्होंने 18 अप्रैल को चैरिटी कमिश्नर से हस्तक्षेप की मांग की थी और जांच पूरी होने तक सभी आगामी बैठकों पर रोक लगाने का अनुरोध किया था।

    ट्रस्टी संरचना पर उठे सवाल
    जानकारी के अनुसार, सितंबर 2025 में लागू संशोधित नियमों के तहत किसी भी ट्रस्ट में स्थायी या आजीवन ट्रस्टियों की संख्या कुल बोर्ड के 25 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। शिकायत में कहा गया है कि वर्तमान में ट्रस्ट में छह ट्रस्टी हैं, जिनमें जिमी नवल टाटा, जहांगीर एचसी जहांगीर और नोएल नवल टाटा जैसे आजीवन ट्रस्टी शामिल हैं, जिससे अनुपात नियमों के उल्लंघन का सवाल उठता है।

    सर रतन टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस में 23.6 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो 180 अरब डॉलर से अधिक मूल्य वाले टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी है। ऐसे में यह मामला कॉरपोरेट और कानूनी दोनों स्तरों पर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान पर IMF की सख्ती, बढ़ेगा राजस्व लक्ष्य

    आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान पर IMF की सख्ती, बढ़ेगा राजस्व लक्ष्य


    नई दिल्ली/इस्लामाबाद। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की सख्ती एक बार फिर बढ़ गई है। आईएमएफ ने अगले वित्तीय वर्ष के लिए पाकिस्तान के पेट्रोलियम लेवी टारगेट को बढ़ाकर लगभग 1.73 लाख करोड़ रुपये तय कर दिया है, जो मौजूदा लक्ष्य से करीब 25,900 करोड़ रुपये अधिक है। इस फैसले के बाद पाकिस्तान में पहले से जारी महंगाई संकट के और गहराने की आशंका जताई जा रही है।

    आईएमएफ की स्टाफ-लेवल रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान सरकार को अपने राजस्व लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अब अतिरिक्त 86 हजार करोड़ रुपये के बराबर संसाधन जुटाने होंगे। इसके लिए केंद्र और प्रांतीय सरकारों पर भी अतिरिक्त जिम्मेदारी डाली गई है। केंद्र सरकार को नए टैक्स उपायों और प्रवर्तन सुधारों के जरिए लगभग आधा लक्ष्य हासिल करना होगा, जबकि प्रांतीय सरकारें सेवाओं पर सेल्स टैक्स और कृषि आयकर के माध्यम से राजस्व बढ़ाने की कोशिश करेंगी।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पाकिस्तान का कुल बजट आकार 17 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 9 प्रतिशत अधिक है। वहीं, देश का रक्षा बजट भी बढ़कर लगभग 2.66 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है।

    आईएमएफ ने पाकिस्तान के फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (FBR) के लिए भी लक्ष्य और कड़े कर दिए हैं। अब उसे 15 लाख करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व जुटाना होगा। लगातार दो वर्षों से लक्ष्य पूरा न कर पाने के कारण इस बार निगरानी व्यवस्था को और सख्त कर दिया गया है।

    सबसे अहम बदलाव यह है कि अब केवल इंडिकेटिव टारगेट नहीं बल्कि क्वांटिटेटिव परफॉर्मेंस क्राइटेरिया लागू किया गया है। इसका मतलब यह है कि लक्ष्य पूरा न होने पर पाकिस्तान को आईएमएफ बोर्ड से विशेष छूट लेनी होगी, जिससे उसकी वित्तीय स्वतंत्रता और सीमित हो जाएगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आईएमएफ की ये सख्त शर्तें पाकिस्तान की आर्थिक चुनौतियों को और बढ़ा सकती हैं। पहले से ही महंगाई, कर्ज और कमजोर राजस्व व्यवस्था से जूझ रहे देश पर यह फैसला आम जनता के लिए अतिरिक्त बोझ साबित हो सकता है।

  • पेट्रोल महंगा, डीजल-एटीएफ सस्ता? टैक्स स्ट्रक्चर में हुआ बदलाव

    पेट्रोल महंगा, डीजल-एटीएफ सस्ता? टैक्स स्ट्रक्चर में हुआ बदलाव


    नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से जुड़े टैक्स ढांचे में अहम बदलाव करते हुए पेट्रोल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) बढ़ा दिया है, जबकि डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर राहत दी गई है। सरकार के इस फैसले को वैश्विक तेल बाजार में बढ़ती अस्थिरता और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

    वित्त मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, पेट्रोल के निर्यात पर अब 3 रुपये प्रति लीटर का अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा। वहीं डीजल पर निर्यात शुल्क घटाकर 16.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इसके साथ ही पेट्रोल और डीजल दोनों पर लागू सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर सेस को शून्य कर दिया गया है।

    सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस संशोधन से घरेलू ईंधन की कीमतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और यह बदलाव केवल निर्यात से जुड़े ढांचे पर लागू होगा। नए आदेश को शनिवार से प्रभावी कर दिया गया है।

    गौरतलब है कि पश्चिम एशिया संकट के बाद पहली बार पेट्रोल निर्यात पर शुल्क लगाया गया है, जबकि डीजल और एटीएफ पर लगातार बदलावों के बाद अब दरों में कटौती की गई है। डीजल पर पहले 21.5 रुपये प्रति लीटर, फिर 55.5 रुपये प्रति लीटर तक वृद्धि और बाद में 23 रुपये प्रति लीटर तक कमी की गई थी, जिसे अब घटाकर 16.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है।

    इसी तरह एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर भी कई बार संशोधन किया गया। पहले यह शुल्क 29.5 रुपये प्रति लीटर था, जिसे बढ़ाकर 42 रुपये और फिर 33 रुपये किया गया था। अब इसे घटाकर 16 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, विंडफॉल टैक्स ढांचे के तहत यह बदलाव वैश्विक बाजार में अस्थिरता के बीच घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करने और निर्यात प्रवाह को नियंत्रित करने के उद्देश्य से किया गया है। सरकार ने यह कदम ऐसे समय उठाया है जब अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है।

    पश्चिम एशिया तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच जारी कूटनीतिक गतिरोध के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे में भारत का यह टैक्स संशोधन नीति संतुलन बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।