Category: Economy

  • फ्रांस की अर्थव्यवस्था पर संकट, बढ़ा कर्ज का दबाव, विशेषज्ञों की चेतावनी- समय रहते कदम नहीं उठाए तो…

    फ्रांस की अर्थव्यवस्था पर संकट, बढ़ा कर्ज का दबाव, विशेषज्ञों की चेतावनी- समय रहते कदम नहीं उठाए तो…


    नई दिल्ली। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल फ्रांस पर बढ़ता सार्वजनिक कर्ज चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते प्रभावी वित्तीय सुधार नहीं किए, तो आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था गंभीर दबाव में आ सकती है। बढ़ती उधारी लागत और राजनीतिक अनिश्चितता को लेकर निवेशकों और अर्थशास्त्रियों ने भी चिंता जताई है।

    फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज फिलहाल करीब 3.5 ट्रिलियन यूरो तक पहुंच चुका है और विशेषज्ञों का मानना है कि अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले राजनीतिक परिस्थितियों के कारण राजकोषीय सुधारों की संभावना कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में कर्ज का बोझ और बढ़ने का जोखिम बना हुआ है।

    ‘स्नोबॉल इफेक्ट’ से बढ़ सकती है मुश्किल
    अर्थशास्त्रियों ने फ्रांस के सामने ‘स्नोबॉल इफेक्ट’ का खतरा बताया है। इसका मतलब ऐसी स्थिति से है, जब सरकारी बॉन्ड पर चुकाई जाने वाली ब्याज दर आर्थिक विकास की गति से अधिक हो जाती है। इससे सरकार का कर्ज लगातार बढ़ता जाता है और अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में उसका बोझ तेजी से बढ़ने लगता है। यदि सरकार लगातार प्राथमिक बजट अधिशेष (प्राइमरी सरप्लस) हासिल नहीं कर पाती, तो इस स्थिति से बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो सकता है।

    2050 तक GDP के 203% तक पहुंच सकता है कर्ज
    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मौजूदा हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ तो फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज वर्ष 2050 तक उसकी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 203 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यह चेतावनी आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) के महासचिव मैथियास कोरमैन के हालिया बयान के आधार पर दी गई है। अनुमान है कि वर्ष 2029 तक केवल ब्याज भुगतान का खर्च ही लगभग 100 अरब यूरो तक पहुंच सकता है।

    निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों की बढ़ी चिंता
    क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सारा कार्लसन ने भी कहा है कि सार्वजनिक कर्ज पर बढ़ता ब्याज भुगतान फ्रांस के लिए सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में से एक बन सकता है। वहीं निवेश बैंक मॉर्गन स्टेनली ने वित्तीय जोखिमों का हवाला देते हुए अपने ग्राहकों को फ्रांसीसी सरकारी कर्ज में निवेश कम करने की सलाह दी है।

    कोविड के बाद भी कम नहीं हुआ कर्ज
    आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष की पहली तिमाही में फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज 3.5 ट्रिलियन यूरो (करीब 4 ट्रिलियन डॉलर) से अधिक हो गया, जो देश की GDP का 117.5 प्रतिशत है। फ्रांस की ऑडिट संस्था कोर्ट डेस कॉम्प्टेस के मुताबिक यह स्तर कोविड-19 महामारी के दौरान बने रिकॉर्ड के करीब पहुंच चुका है। संस्था का कहना है कि यूरोजोन में फ्रांस ऐसा प्रमुख देश है, जिसने महामारी के बाद अपने कर्ज के बोझ को उल्लेखनीय रूप से कम नहीं किया।

    ब्याज भुगतान बना सबसे बड़ा खर्च
    वर्ष 2025 में फ्रांस ने अपने कर्ज पर ब्याज चुकाने के लिए करीब 66 अरब यूरो खर्च किए, जो शिक्षा और रक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के बजट से भी अधिक माना जा रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2029 तक यह राशि बढ़कर 100 अरब यूरो तक पहुंच सकती है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि तेज आर्थिक विकास या लगातार प्राथमिक बजट अधिशेष के जरिए इस संकट से बाहर निकला जा सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसे संकेत नहीं दिखाई दे रहे हैं। कोर्ट डेस कॉम्प्टेस की वरिष्ठ अधिकारी कैरिन कैम्बी ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए तो फ्रांस कर्ज के ब्याज के बढ़ते बोझ तले दब सकता है और इस स्थिति से बाहर निकलने में कई वर्ष लग सकते हैं।

    चुनाव से पहले बना बड़ा राजनीतिक मुद्दा
    बढ़ता सार्वजनिक कर्ज अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले फ्रांस की राजनीति का भी अहम मुद्दा बन गया है। प्रमुख सेंट्रिस्ट नेता एडुआर्ड फिलिप और गैब्रियल अट्टल ने इसे अपने चुनावी एजेंडे का प्रमुख हिस्सा बनाया है। वहीं सांसद केविन मौविएक्स का कहना है कि कर्ज का बढ़ता स्तर गंभीर चेतावनी है और यदि सुधार में देर की गई तो इसके परिणाम और अधिक गंभीर हो सकते हैं।

  • आज बाजार में दिख सकता है उतार चढ़ाव विदेशी संकेतों के बीच समझदारी से निवेश करने की सलाह

    आज बाजार में दिख सकता है उतार चढ़ाव विदेशी संकेतों के बीच समझदारी से निवेश करने की सलाह


    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार में आज नौ जुलाई को कारोबार की शुरुआत सतर्क माहौल के बीच हल्की मजबूती के साथ होने की संभावना जताई जा रही है। वैश्विक बाजारों से मिले मिश्रित संकेतों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों के कारण निवेशक पूरे दिन सोच समझकर कदम उठा सकते हैं। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स और निफ्टी सीमित बढ़त के साथ खुल सकते हैं लेकिन दिनभर बाजार में उतार चढ़ाव देखने को मिल सकता है। ऐसे में विशेषज्ञ निवेशकों को जल्दबाजी से बचने और मजबूत कंपनियों में ही निवेश की सलाह दे रहे हैं।

    बीते कारोबारी सत्र में घरेलू बाजार ने स्थिर प्रदर्शन किया था जबकि विदेशी बाजारों में अलग अलग रुख देखने को मिला। अमेरिकी बाजारों में सीमित बढ़त दर्ज की गई जबकि एशियाई बाजारों में मिला जुला कारोबार देखने को मिला। इसका असर भारतीय बाजार की शुरुआत पर भी दिखाई दे सकता है। निवेशकों की नजर आज वैश्विक आर्थिक संकेतों कच्चे तेल की कीमतों डॉलर की चाल और विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीद बिक्री पर बनी रहेगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आईटी बैंकिंग एफएमसीजी और ऑटो सेक्टर के शेयर आज बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि इन क्षेत्रों में खरीदारी का माहौल बना रहता है तो प्रमुख सूचकांक मजबूती के साथ कारोबार कर सकते हैं। दूसरी ओर मुनाफावसूली बढ़ने पर बाजार में दबाव भी देखने को मिल सकता है। इसलिए हर तेजी को लंबी अवधि का संकेत मानना फिलहाल उचित नहीं होगा।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों और घरेलू संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार की चाल तय करने में अहम रहेंगी। यदि विदेशी निवेशकों की ओर से खरीदारी जारी रहती है तो बाजार को मजबूती मिल सकती है। वहीं वैश्विक स्तर पर किसी भी नकारात्मक खबर या आर्थिक अनिश्चितता का असर भारतीय बाजार पर तुरंत दिखाई दे सकता है। इसलिए निवेशकों को हर बड़ी खबर पर नजर बनाए रखने की जरूरत होगी।

    विश्लेषकों का कहना है कि छोटे और मझोले शेयरों में भी अच्छी गतिविधि देखने को मिल सकती है लेकिन इनमें जोखिम अपेक्षाकृत अधिक रहता है। ऐसे शेयरों में निवेश केवल पर्याप्त जानकारी और रणनीति के साथ ही करना बेहतर माना जा रहा है। बाजार विशेषज्ञों का सुझाव है कि अल्पकालिक उतार चढ़ाव से घबराने के बजाय निवेशक अपने वित्तीय लक्ष्य और जोखिम क्षमता के अनुसार निर्णय लें।

    दीर्घकालिक निवेश करने वालों के लिए मौजूदा बाजार अभी भी कई अच्छे अवसर उपलब्ध करा सकता है। मजबूत वित्तीय स्थिति वाली कंपनियों के शेयरों में चरणबद्ध निवेश भविष्य में बेहतर रिटर्न दे सकता है। वहीं इंट्रा डे ट्रेडिंग करने वाले निवेशकों को बाजार खुलने के बाद शुरुआती रुझान को ध्यान से समझकर ही कोई बड़ा फैसला लेना चाहिए।

    कुल मिलाकर आज भारतीय शेयर बाजार में हल्की सकारात्मक शुरुआत की उम्मीद है लेकिन पूरे कारोबारी सत्र के दौरान उतार चढ़ाव बना रह सकता है। ऐसे माहौल में धैर्य संतुलित रणनीति और सोच समझकर किया गया निवेश ही बेहतर परिणाम देने की संभावना रखता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अफवाहों के बजाय आधिकारिक आंकड़ों और विश्वसनीय बाजार संकेतों के आधार पर लिया गया निर्णय निवेशकों के लिए अधिक लाभदायक साबित होगा।

  • केन्या में अदाणी एनर्जी की ट्रांसमिशन परियोजना से भारत-अफ्रीका सहयोग को नई रफ्तार, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी होगी मजबूत

    केन्या में अदाणी एनर्जी की ट्रांसमिशन परियोजना से भारत-अफ्रीका सहयोग को नई रफ्तार, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी होगी मजबूत

    नई दिल्ली । केन्या में अदाणी एनर्जी को प्रस्तावित बिजली ट्रांसमिशन परियोजना की मंजूरी भारत और केन्या के बीच आर्थिक तथा रणनीतिक सहयोग के नए दौर का संकेत मानी जा रही है। लगभग 117 अरब केन्याई शिलिंग की इस परियोजना से केवल बिजली अवसंरचना को मजबूती मिलने की उम्मीद नहीं है, बल्कि इसे दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक विकास साझेदारी और निवेश सहयोग के विस्तार के रूप में भी देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल भारत की अफ्रीका नीति और केन्या की ऊर्जा विकास रणनीति के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

    केन्या ने पिछले कुछ वर्षों में जियोथर्मल, पवन और सौर ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। हालांकि उत्पादन क्षमता बढ़ने के बावजूद देश का बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क उसी गति से विकसित नहीं हो पाया, जिसके कारण उपलब्ध ऊर्जा का पूरा उपयोग संभव नहीं हो सका। प्रस्तावित आधुनिक ट्रांसमिशन नेटवर्क इस कमी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और नवीकरणीय ऊर्जा को अधिक प्रभावी ढंग से उपभोक्ताओं तक पहुंचाने में सहायता करेगा।

    इस परियोजना को केन्या की व्यापक आर्थिक रणनीति का भी हिस्सा माना जा रहा है। लंबे समय तक अफ्रीका में बड़े बुनियादी ढांचा निवेश मुख्य रूप से पश्चिमी वित्तीय संस्थानों और चीन के सहयोग से संचालित होते रहे हैं। ऐसे समय में भारत की बढ़ती भागीदारी केन्या के लिए एक अतिरिक्त विकल्प प्रस्तुत करती है। इससे प्रतिस्पर्धी निवेश, तकनीकी विशेषज्ञता और विविध अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर उपलब्ध हो सकते हैं, जिससे परियोजनाओं के क्रियान्वयन में अधिक संतुलन और लचीलापन आने की संभावना है।

    विश्लेषकों का मानना है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी इस मॉडल की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। निजी निवेश और तकनीकी दक्षता के माध्यम से बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को गति देने का प्रयास दोनों देशों के लिए दीर्घकालिक लाभ का आधार बन सकता है। इससे परियोजनाओं के वित्तपोषण, संचालन और तकनीकी प्रबंधन में भी नए विकल्प विकसित होने की संभावना है।

    भारत के लिए केन्या केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि पूर्वी अफ्रीका और हिंद महासागर क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी माना जाता है। दोनों देशों के बीच व्यापार, समुद्री संपर्क, निवेश और विकास सहयोग लगातार बढ़ रहा है। ऊर्जा अवसंरचना में निवेश को भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत अफ्रीकी देशों के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत करने, संपर्क बढ़ाने और दीर्घकालिक विकास सहयोग को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

    भारत और केन्या के बीच ऐतिहासिक संबंध भी इस साझेदारी को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और भारतीय मूल के समुदाय की सक्रिय भूमिका ने दशकों से दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाए रखा है। यही कारण है कि नई ऊर्जा परियोजनाओं को केवल व्यावसायिक निवेश नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और साझा विकास के प्रतीक के रूप में भी देखा जा रहा है।

    ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परियोजना निर्धारित समयसीमा के अनुसार आगे बढ़ती है तो इससे केन्या की बिजली आपूर्ति व्यवस्था अधिक सक्षम होगी और नवीकरणीय ऊर्जा के बेहतर उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा। साथ ही भारत और केन्या के बीच तकनीकी सहयोग, निवेश और आर्थिक संबंधों को भी नई गति मिलेगी। आने वाले वर्षों में इस प्रकार की परियोजनाएं दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और अधिक मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

  • अमेरिका-ईरान तनाव से वैश्विक तेल बाजार में उछाल, कच्चा तेल 80 डॉलर प्रति बैरल के करीब; भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट

    अमेरिका-ईरान तनाव से वैश्विक तेल बाजार में उछाल, कच्चा तेल 80 डॉलर प्रति बैरल के करीब; भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर साफ दिखाई देने लगा है। क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर बढ़ी अनिश्चितता के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में छह प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई, जिससे ब्रेंट क्रूड लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया। तेल बाजार में आई इस तेजी का प्रभाव वैश्विक निवेशकों की धारणा पर भी पड़ा और भारतीय शेयर बाजार में व्यापक बिकवाली देखने को मिली।

    बाजार के आंकड़ों के अनुसार, ब्रेंट क्रूड की कीमत में लगभग 6.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी उल्लेखनीय तेजी के साथ करीब 75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। विश्लेषकों का मानना है कि मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी आशंकाओं ने तेल की कीमतों को ऊपर धकेलने में प्रमुख भूमिका निभाई है। निवेशकों को आशंका है कि यदि तनाव और बढ़ता है तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।

    तनाव उस समय और बढ़ गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ नए सैन्य हमलों की जानकारी देते हुए कहा कि हालिया घटनाक्रम के बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम प्रभावी नहीं रहा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी कार्रवाई होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में की गई है। ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व की तीखी आलोचना करते हुए भविष्य में किसी समझौते या वार्ता की संभावना पर भी संदेह व्यक्त किया।

    होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या सुरक्षा जोखिम अंतरराष्ट्रीय तेल बाजारों पर तत्काल प्रभाव डालता है। निवेशकों और ऊर्जा कंपनियों की नजर फिलहाल इस क्षेत्र की स्थिति पर बनी हुई है, क्योंकि आगे की घटनाएं तेल की कीमतों की दिशा तय कर सकती हैं।

    कच्चे तेल की कीमतों में आई इस तेजी का असर भारतीय वित्तीय बाजारों पर भी दिखाई दिया। कारोबार के दौरान सेंसेक्स में 1,600 अंकों से अधिक की गिरावट दर्ज की गई, जबकि निफ्टी भी दो प्रतिशत से ज्यादा फिसल गया। इसके साथ ही मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों में भी उल्लेखनीय कमजोरी देखने को मिली। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि ऊंची तेल कीमतें आयात लागत बढ़ा सकती हैं, जिससे महंगाई, चालू खाते के घाटे और कॉर्पोरेट लागत पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता जारी रह सकती है। ऊर्जा कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर परिवहन, विनिर्माण और अन्य तेल-निर्भर क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल निवेशकों की निगाहें मध्य पूर्व की स्थिति, कूटनीतिक प्रयासों और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े आगामी घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इन्हीं के आधार पर आने वाले दिनों में तेल बाजार और शेयर बाजार की दिशा तय होगी।

  • कच्चे तेल में उछाल और वैश्विक तनाव का असर, तीन महीने की सबसे बड़ी गिरावट के साथ धड़ाम हुए सेंसेक्स-निफ्टी

    कच्चे तेल में उछाल और वैश्विक तनाव का असर, तीन महीने की सबसे बड़ी गिरावट के साथ धड़ाम हुए सेंसेक्स-निफ्टी


    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़े भू-राजनीतिक तनाव का असर बुधवार को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। वैश्विक स्तर पर बढ़ी अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और निवेशकों की सतर्कता के चलते घरेलू बाजार में पूरे कारोबारी सत्र के दौरान बिकवाली हावी रही। दिन के अंत में प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी दोनों दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट के साथ बंद हुए। इसके साथ ही पिछले कई कारोबारी सत्रों से जारी तेजी का सिलसिला भी थम गया और निवेशकों की संपत्ति में एक ही दिन में 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कमी दर्ज की गई।

    बाजार बंद होने पर बीएसई का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 1,677.12 अंक यानी 2.15 प्रतिशत टूटकर 76,503.60 अंक पर बंद हुआ। वहीं एनएसई का निफ्टी 50 भी 516.65 अंक यानी 2.12 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,882.05 अंक पर पहुंच गया। कारोबार के दौरान दोनों सूचकांकों ने दिन का निचला स्तर भी छुआ और पिछले तीन महीनों की सबसे बड़ी दैनिक गिरावट दर्ज की।

    गिरावट केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि व्यापक बाजार में भी दबाव देखने को मिला। मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांक भी उल्लेखनीय कमजोरी के साथ बंद हुए। इससे स्पष्ट संकेत मिला कि बिकवाली लगभग सभी वर्गों के शेयरों में फैली रही और निवेशकों ने जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाना उचित समझा।

    सेक्टरवार प्रदर्शन पर नजर डालें तो बैंकिंग, निजी बैंक, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, एफएमसीजी, मीडिया, ऑटो, ऑयल एंड गैस तथा इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के शेयरों में सबसे अधिक दबाव रहा। हालांकि फार्मा और मेटल क्षेत्र में भी गिरावट दर्ज हुई, लेकिन अन्य क्षेत्रों की तुलना में नुकसान अपेक्षाकृत कम रहा। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितता के दौरान निवेशक रक्षात्मक क्षेत्रों की ओर झुकाव दिखाते हैं, जिससे कुछ सेक्टरों में गिरावट सीमित रही।

    दिनभर की बिकवाली का सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ा तनाव माना गया। हालिया घटनाक्रम के बाद पश्चिम एशिया में हालात फिर से संवेदनशील हो गए हैं, जिससे ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई दोनों में छह प्रतिशत से अधिक की तेजी ने आयातक देशों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए कच्चे तेल की महंगाई का असर महंगाई, व्यापार घाटे और कॉर्पोरेट लागत पर पड़ सकता है।

    विदेशी घटनाक्रम का असर भारतीय मुद्रा पर भी दिखाई दिया। रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर बंद हुआ, जिससे आयात लागत बढ़ने की आशंका और मजबूत हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर टिकती हैं तो भारतीय बाजारों में निकट भविष्य में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

    तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार आने वाले कारोबारी सत्रों में निफ्टी के लिए 23,780 से 23,750 अंक का दायरा महत्वपूर्ण समर्थन माना जा रहा है। यदि सूचकांक इस स्तर से नीचे टिकता है तो गिरावट और गहरी हो सकती है। वहीं 24,020 से 24,050 अंक का स्तर निकट अवधि में प्रमुख प्रतिरोध रहेगा। बाजार की अगली दिशा काफी हद तक वैश्विक घटनाक्रम, कच्चे तेल की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर निर्भर करेगी। निवेशकों को फिलहाल सतर्क रणनीति अपनाने और अंतरराष्ट्रीय संकेतों पर लगातार नजर बनाए रखने की सलाह दी जा रही है।

  • भारत की आर्थिक प्रगति का नया आधार बनी डिजिटल अर्थव्यवस्था, विशेषज्ञों ने सुरक्षित और समावेशी डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम पर दिया जोर

    भारत की आर्थिक प्रगति का नया आधार बनी डिजिटल अर्थव्यवस्था, विशेषज्ञों ने सुरक्षित और समावेशी डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम पर दिया जोर

    नई दिल्ली । भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति की प्रमुख ताकत बनकर उभर रही है। डिजिटल भुगतान, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और नई तकनीकों के विस्तार ने न केवल वित्तीय सेवाओं की पहुंच को व्यापक बनाया है, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी अधिक पारदर्शी, तेज और प्रभावी बनाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत की विकास यात्रा में डिजिटल इकोसिस्टम की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।

    राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित डिजिटल भुगतान विषयक एक विचार-विमर्श कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने डिजिटल परिवर्तन के कई पहलुओं पर अपने विचार साझा किए। उनका कहना था कि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने वित्तीय समावेशन को नई दिशा दी है और देश के करोड़ों नागरिकों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके माध्यम से सरकारी सेवाओं, वित्तीय लेनदेन और डिजिटल सुविधाओं तक लोगों की पहुंच पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हुई है।

    विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि डिजिटल अर्थव्यवस्था केवल तकनीक के विस्तार से मजबूत नहीं होगी। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण मानव संसाधन, मजबूत संस्थागत ढांचा, अनुसंधान, नवाचार और लगातार निवेश की आवश्यकता है। उनका मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती तकनीकों का प्रभावी उपयोग करने वाले देश भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अधिक मजबूत स्थिति हासिल कर सकेंगे। इसलिए नई तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ कौशल विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।

    डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को लेकर विशेषज्ञों ने कहा कि इसकी सफलता का सबसे बड़ा आधार नागरिकों का भरोसा है। यदि डिजिटल सेवाओं में डेटा सुरक्षा, गोपनीयता, उपयोगकर्ता की सहमति और सभी के लिए समान पहुंच सुनिश्चित की जाती है, तभी डिजिटल परिवर्तन का वास्तविक लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंच सकेगा। उन्होंने तकनीकी विकास के साथ सामाजिक जिम्मेदारी और पारदर्शिता बनाए रखने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

    डिजिटल भुगतान प्रणाली के भविष्य को लेकर भी कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए। विशेषज्ञों का मानना है कि अब तक डिजिटल भुगतान व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य व्यापक पहुंच और इंटरऑपरेबिलिटी रहा है, लेकिन आने वाले समय में इसकी मजबूती, बैकअप सिस्टम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित धोखाधड़ी पहचान प्रणाली को प्राथमिकता देनी होगी। इससे लेनदेन अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय बन सकेंगे।

    कार्यक्रम में सीमा पार डिजिटल भुगतान को आसान बनाने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि इसके लिए एकीकृत डिजिटल अवसंरचना, समान तकनीकी मानक और स्पष्ट कानूनी व्यवस्था विकसित करना जरूरी होगा। इससे भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेगी तथा अंतरराष्ट्रीय लेनदेन भी सरल और सुरक्षित बनेंगे।

    साइबर सुरक्षा को डिजिटल अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया। विशेषज्ञों ने बढ़ते साइबर अपराध और डिजिटल धोखाधड़ी को देखते हुए मजबूत संस्थागत समन्वय, आधुनिक सुरक्षा तकनीकों और आम नागरिकों में जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया। उनका मानना है कि डिजिटल वित्तीय प्रणाली में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए सुरक्षा उपायों को लगातार मजबूत करना आवश्यक है।

    विशेषज्ञों के अनुसार भारत का डिजिटल इकोसिस्टम अब केवल भुगतान प्रणाली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास, नवाचार, रोजगार, उद्यमिता और सामाजिक समावेशन का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। यदि तकनीकी प्रगति के साथ सुरक्षा, भरोसा और समावेशिता को समान प्राथमिकता दी जाती है, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में और अधिक मजबूत स्थान हासिल कर सकता है।

  • हथकरघा क्षेत्र में नवाचार को नई उड़ान, सरकार ने लॉन्च किया ‘हैंडलूम हैकाथॉन 2026’, युवाओं और बुनकरों को मिलेगा साझा मंच

    हथकरघा क्षेत्र में नवाचार को नई उड़ान, सरकार ने लॉन्च किया ‘हैंडलूम हैकाथॉन 2026’, युवाओं और बुनकरों को मिलेगा साझा मंच

    नई दिल्ली । भारत के पारंपरिक हथकरघा क्षेत्र को आधुनिक तकनीक और नवाचार से जोड़ने की दिशा में केंद्र सरकार ने ‘हैंडलूम हैकाथॉन 2026’ की शुरुआत की है। इस राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता का उद्देश्य तकनीक, डिजाइन, उद्यमिता और टिकाऊ समाधानों के माध्यम से हथकरघा उद्योग को नई गति देना है। सरकार का मानना है कि देश की समृद्ध बुनाई परंपरा को आधुनिक सोच और नवाचार के साथ जोड़कर इस क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।

    यह पहल राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2026 के अवसर पर आयोजित की जा रही है। प्रतियोगिता का ग्रैंड फिनाले 1 अगस्त को आयोजित होगा, जहां चयनित प्रतिभागी अपने नवाचारी विचार और समाधान विशेषज्ञों के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। शिक्षा, उद्योग, डिजाइन, प्रौद्योगिकी और हथकरघा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ इन प्रस्तावों का मूल्यांकन करेंगे और सबसे प्रभावी समाधानों का चयन करेंगे।

    हैकाथॉन का मुख्य उद्देश्य युवाओं की रचनात्मक सोच को देश की पारंपरिक बुनाई कला से जोड़ना है। सरकार चाहती है कि आधुनिक तकनीकी ज्ञान और पारंपरिक शिल्प कौशल के मेल से ऐसे समाधान विकसित हों, जो हथकरघा क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत कर सकें। इससे उत्पादन क्षमता बढ़ाने, उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने और वैश्विक बाजार में भारतीय हथकरघा उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

    इस प्रतियोगिता में वस्त्र, फैशन, डिजाइन, इंजीनियरिंग, प्रबंधन और प्रौद्योगिकी जैसे विभिन्न विषयों के विद्यार्थी भाग ले सकेंगे। इसके अलावा हथकरघा बुनकर, कारीगर, शोधकर्ता, स्टार्टअप, उद्यमी, नवाचारकर्ता और विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर भी इसमें अपने विचार प्रस्तुत कर सकते हैं। इस तरह यह मंच पारंपरिक अनुभव और आधुनिक तकनीकी दृष्टिकोण को एक साथ लाने का अवसर प्रदान करेगा।

    प्रतियोगिता के लिए कई महत्वपूर्ण विषय निर्धारित किए गए हैं। इनमें उत्पाद एवं डिजाइन नवाचार, टिकाऊ विकास, सर्कुलर इकोनॉमी, डिजिटल तकनीक का उपयोग, बाजार तक पहुंच, ब्रांडिंग, आपूर्ति श्रृंखला की दक्षता, उत्पादकता में वृद्धि, व्यवसाय विकास और सामाजिक प्रभाव जैसे क्षेत्र शामिल हैं। सरकार को उम्मीद है कि इन विषयों पर प्रस्तुत होने वाले नए विचार हथकरघा उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

    ऑनलाइन पंजीकरण की प्रक्रिया निर्धारित अवधि तक खुली रहेगी, जिसके दौरान इच्छुक प्रतिभागी अपने विचार और परियोजनाएं प्रस्तुत कर सकेंगे। चयनित प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए विशेषज्ञों की ओर से मार्गदर्शन, मेंटरशिप और आवश्यकता पड़ने पर इनक्यूबेशन जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इससे नवाचारों को व्यावसायिक रूप देने और उन्हें व्यवहार में लागू करने का मार्ग आसान होगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का हथकरघा क्षेत्र न केवल लाखों लोगों की आजीविका का आधार है, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में यदि इस क्षेत्र को आधुनिक तकनीक, डिजिटल समाधान और नवाचार से जोड़ा जाता है तो इससे रोजगार, निर्यात और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती मिल सकती है।

    सरकार की यह पहल पारंपरिक शिल्प और आधुनिक नवाचार के बीच मजबूत साझेदारी स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इससे हथकरघा उद्योग को नई पहचान मिलने के साथ-साथ देश के नवाचार और स्टार्टअप इकोसिस्टम को भी पारंपरिक उद्योगों के साथ जुड़कर नए अवसर प्राप्त होने की उम्मीद है।

  • सेबी का बड़ा फैसला, विदेशी निवेशकों की पंजीकरण फीस अब डॉलर नहीं बल्कि रुपये में होगी, छह महीने बाद लागू होंगे नए नियम

    सेबी का बड़ा फैसला, विदेशी निवेशकों की पंजीकरण फीस अब डॉलर नहीं बल्कि रुपये में होगी, छह महीने बाद लागू होंगे नए नियम

    नई दिल्ली । भारतीय पूंजी बाजार के नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) और विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों (एफवीसीआई) के लिए पंजीकरण शुल्क व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। नए नियमों के तहत अब इन निवेशकों की पंजीकरण फीस अमेरिकी डॉलर के बजाय भारतीय रुपये में निर्धारित की जाएगी। यह बदलाव करीब छह महीने बाद लागू होगा, ताकि सभी संबंधित संस्थाओं और निवेशकों को नई व्यवस्था के अनुरूप अपनी प्रक्रियाएं व्यवस्थित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।

    नए शुल्क ढांचे के अनुसार अब पहले लागू 1,000 अमेरिकी डॉलर की पंजीकरण फीस के स्थान पर 90,000 रुपये का भुगतान करना होगा। इसी प्रकार कैटेगरी-1 एफपीआई और एफवीसीआई के लिए पहले निर्धारित 2,500 अमेरिकी डॉलर की फीस को बदलकर 2.30 लाख रुपये कर दिया गया है। इसके साथ ही विलंब शुल्क और पंजीकरण जारी रखने से संबंधित शुल्कों में भी संशोधन किया गया है, जिससे पूरी शुल्क प्रणाली भारतीय मुद्रा पर आधारित हो जाएगी।

    सेबी का मानना है कि रुपये में शुल्क निर्धारित करने से विदेशी मुद्रा आधारित भुगतान व्यवस्था से जुड़ी कई व्यावहारिक चुनौतियां समाप्त होंगी। अब तक डॉलर आधारित शुल्क प्रणाली के कारण लेखांकन, बिलिंग, भुगतान मिलान और वित्तीय रिपोर्टिंग जैसी प्रक्रियाओं में अतिरिक्त समय और संसाधनों की आवश्यकता पड़ती थी। नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन प्रक्रियाओं को अधिक सरल, पारदर्शी और प्रभावी बनाया जा सकेगा।

    संशोधित नियमों के तहत डिपॉजिटरी संस्थानों की जिम्मेदारी भी तय की गई है। अब उन्हें एफपीआई और एफवीसीआई से प्राप्त शुल्क पंजीकरण स्वीकृत होने के पांच कार्य दिवसों के भीतर सेबी के पास जमा कराना होगा। इससे शुल्क संग्रह और नियामकीय प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित होने की उम्मीद है। नियामक का उद्देश्य पूरी प्रणाली को समयबद्ध और डिजिटल प्रक्रियाओं के अनुरूप बनाना है।

    सेबी ने पंजीकरण प्रक्रिया को भी पहले की तुलना में अधिक सरल बनाने की दिशा में कदम उठाया है। अब सामान्य आवेदन पत्र में व्यक्तिगत निवेशकों के लिए जन्मतिथि तथा संस्थागत आवेदकों के लिए कंपनी की स्थापना तिथि जैसी आवश्यक जानकारियों को शामिल किया गया है। इससे आवेदन प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित होगी और अन्य नियामकीय औपचारिकताओं को पूरा करना भी आसान हो जाएगा।

    यह बदलाव कर संबंधी प्रक्रियाओं को सरल बनाने की व्यापक पहल के अनुरूप भी माना जा रहा है। विशेष रूप से स्थायी खाता संख्या (पैन) के आवेदन और उससे जुड़ी औपचारिकताओं को आसान बनाने के उद्देश्य से विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय बढ़ाया गया है। इससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय पूंजी बाजार में प्रवेश और अनुपालन की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक सहज हो सकती है।

    इसके अतिरिक्त सेबी ने कस्टोडियन संस्थानों के शुल्क भुगतान के तरीके में भी संशोधन किया है। पहले जहां उन्हें वार्षिक आधार पर शुल्क जमा करना पड़ता था, वहीं अब मासिक भुगतान व्यवस्था लागू की गई है। इससे भुगतान प्रक्रिया अधिक नियमित और प्रबंधन के लिहाज से सुविधाजनक बनने की उम्मीद है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रुपये में शुल्क निर्धारण से प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी, विनिमय दर के उतार-चढ़ाव का प्रभाव कम होगा और विदेशी निवेशकों के लिए अनुपालन प्रक्रिया अधिक स्पष्ट बनेगी। यह कदम भारतीय पूंजी बाजार को और अधिक पारदर्शी, आधुनिक और निवेशक-अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

  • मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच सोना-चांदी पर दबाव, एमसीएक्स में दोनों कीमती धातुओं के दाम गिरे, कच्चा तेल हुआ महंगा

    मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच सोना-चांदी पर दबाव, एमसीएक्स में दोनों कीमती धातुओं के दाम गिरे, कच्चा तेल हुआ महंगा

    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर वैश्विक कमोडिटी बाजार पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। बुधवार को घरेलू वायदा बाजार में सोना और चांदी दोनों गिरावट के साथ कारोबार करते नजर आए। निवेशकों की ओर से मुनाफावसूली और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच बदले निवेश रुझान के कारण कीमती धातुओं पर दबाव बना रहा। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया, जिससे वैश्विक आर्थिक चिंताएं और बढ़ गई हैं।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोने के अगस्त डिलीवरी अनुबंध की शुरुआत पिछले कारोबारी सत्र की तुलना में गिरावट के साथ हुई। शुरुआती कारोबार में सोने की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिला और कारोबार के दौरान यह अपने शुरुआती स्तर से भी नीचे फिसल गया। इससे संकेत मिला कि निवेशक फिलहाल सतर्क रणनीति अपनाते हुए बड़े निवेश से बच रहे हैं।

    चांदी के वायदा अनुबंध में भी कमजोरी का रुख देखने को मिला। कारोबार की शुरुआत गिरावट के साथ होने के बाद इसकी कीमत दो लाख तीस हजार रुपये प्रति किलोग्राम के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे पहुंच गई। कारोबार के दौरान चांदी में बिकवाली का दबाव बना रहा, जिससे इसकी कीमतों में और नरमी दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं और निवेशकों की बदलती रणनीति का असर चांदी की कीमतों पर भी पड़ा है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सोना और चांदी दोनों पर दबाव बना रहा। वैश्विक निवेशकों ने जोखिम से जुड़े परिसंपत्तियों के साथ-साथ कीमती धातुओं में भी सतर्क रुख अपनाया। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा हालात में निवेशकों की प्राथमिकता लगातार बदल रही है, जिससे कमोडिटी बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। ऐसे समय में विभिन्न वैश्विक घटनाक्रम निवेश निर्णयों को सीधे प्रभावित कर रहे हैं।

    बाजार पर सबसे बड़ा प्रभाव मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का माना जा रहा है। क्षेत्र में हालिया घटनाओं के बाद ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं, जिसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। ऊर्जा कीमतों में यह तेजी वैश्विक महंगाई और उत्पादन लागत को प्रभावित कर सकती है, जिससे वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बनी रहने की संभावना है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, भू-राजनीतिक घटनाओं के दौरान कमोडिटी बाजार में तेज उतार-चढ़ाव सामान्य माना जाता है। निवेशक लगातार बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपनी निवेश रणनीति में बदलाव करते हैं। यही कारण है कि एक ओर ऊर्जा बाजार में तेजी देखने को मिल रही है, जबकि दूसरी ओर कीमती धातुओं में मुनाफावसूली और बिकवाली का दबाव बना हुआ है।

    आने वाले दिनों में सोना, चांदी और कच्चे तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर निर्भर करेगी। यदि मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ता है तो वैश्विक बाजारों में अस्थिरता जारी रह सकती है। वहीं स्थिति सामान्य होने पर कमोडिटी बाजार में भी स्थिरता लौटने की संभावना है। फिलहाल निवेशकों की नजर वैश्विक आर्थिक संकेतों, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाओं पर बनी हुई है, जो आने वाले कारोबारी सत्रों की दिशा तय करेंगे।

  • अमेरिका-ईरान तनाव का भारतीय बाजार पर असर, सेंसेक्स 78 हजार से नीचे फिसला, बढ़ते कच्चे तेल ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता

    अमेरिका-ईरान तनाव का भारतीय बाजार पर असर, सेंसेक्स 78 हजार से नीचे फिसला, बढ़ते कच्चे तेल ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़े सैन्य तनाव का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों के साथ भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। बुधवार को कारोबार की शुरुआत गिरावट के साथ हुई और शुरुआती सत्र में निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया। सेंसेक्स 78 हजार के स्तर से नीचे फिसल गया, जबकि निफ्टी में भी उल्लेखनीय कमजोरी दर्ज की गई। वैश्विक अनिश्चितता और ऊर्जा बाजार में बढ़ती अस्थिरता ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी।

    शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 400 अंकों से अधिक टूटकर 77 हजार के स्तर के आसपास पहुंच गया। वहीं निफ्टी भी 24,300 के नीचे कारोबार करता दिखाई दिया। बाजार में बिकवाली केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर भी दबाव देखने को मिला। इससे यह संकेत मिला कि निवेशकों ने व्यापक स्तर पर जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई।

    क्षेत्रवार प्रदर्शन पर नजर डालें तो ऑयल एवं गैस, ऑटो, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, इंफ्रास्ट्रक्चर, मीडिया, कमोडिटी और एफएमसीजी कंपनियों के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली। दूसरी ओर फार्मा, हेल्थकेयर, सूचना प्रौद्योगिकी और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कुछ शेयरों में अपेक्षाकृत मजबूती बनी रही। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अनिश्चित वैश्विक परिस्थितियों में निवेशक ऐसे क्षेत्रों की ओर रुख करते हैं जिन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है।

    वैश्विक बाजारों में भी मिश्रित संकेत देखने को मिले। एशिया के कुछ प्रमुख बाजारों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि कुछ सूचकांक सीमित बढ़त के साथ कारोबार करते रहे। अमेरिकी बाजार भी पिछले कारोबारी सत्र में दबाव के साथ बंद हुए थे। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की निगाहें अब पश्चिम एशिया की स्थिति और उससे जुड़े अगले घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं।

    विश्लेषकों के अनुसार बाजार पर सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी का पड़ा है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर महंगाई, आयात बिल और कॉरपोरेट लागत पर पड़ सकता है। यही कारण है कि ऊर्जा कीमतों में उछाल का प्रभाव शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया।

    निवेशक फिलहाल वैश्विक घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है या ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है, तो वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। दूसरी ओर यदि स्थिति सामान्य होती है तो निवेशकों का भरोसा दोबारा मजबूत होने की संभावना भी बनी रहेगी।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में निवेशकों को जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय दीर्घकालिक रणनीति पर ध्यान देना चाहिए। वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाएं अक्सर अल्पकालिक अस्थिरता पैदा करती हैं, लेकिन मजबूत आर्थिक आधार वाली कंपनियां लंबे समय में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। आने वाले कारोबारी सत्रों में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।