Category: Entertainment

  • अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र की ब्लॉकबस्टर जोड़ी ने बॉक्स ऑफिस पर रचा था इतिहास, इन ९ फिल्मों में साथ आकर दर्शकों को बनाया दीवाना

    अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र की ब्लॉकबस्टर जोड़ी ने बॉक्स ऑफिस पर रचा था इतिहास, इन ९ फिल्मों में साथ आकर दर्शकों को बनाया दीवाना


    नई दिल्ली ।
    भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी सबसे प्रतिष्ठित और स्क्रीन पर तहलका मचाने वाली जोड़ियों का जिक्र होता है, तो अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। सत्तर और अस्सी के दशक में इन दोनों दिग्गज कलाकारों ने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा चमत्कारी तालमेल दिखाया कि डिस्ट्रीब्यूटर्स और दर्शकों के बीच यह माना जाने लगा था कि जिस फिल्म में ये दोनों साथ हैं, उसका सुपरहिट होना तय है। इस ब्लॉकबस्टर जोड़ी की लोकप्रियता का आलम यह था कि इनकी एक कल्ट क्लासिक फिल्म रिलीज के बाद लगातार पांच सालों तक सिनेमाघरों से नहीं उतरी थी, जो अपने आप में एक अटूट कीर्तिमान है। इन दोनों महानायकों ने मुख्य भूमिकाओं से लेकर खास कैमियो रोल्स तक, कुल ९ फिल्मों में एक साथ स्क्रीन शेयर कर सिल्वर स्क्रीन पर अपनी दोस्ती और अभिनय का लोहा मनवाया।

    इस बेमिसाल जोड़ी के करियर और हिंदी सिनेमा के इतिहास में साल १९७५ में आई फिल्म ‘शोले’ एक मील का पत्थर साबित हुई। निर्देशक रमेश सिप्पी की इस एक्शन-ड्रामा फिल्म में जय और वीरू के किरदारों में अमिताभ और धर्मेंद्र ने जिगरी दोस्ती की ऐसी अनूठी मिसाल पेश की, जो आज आधी सदी बीत जाने के बाद भी मुहावरा बनी हुई है। यह फिल्म न केवल उस दौर की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी, बल्कि मुंबई के मिनर्वा थिएटर में लगातार पांच सालों तक चलकर इसने इतिहास रच दिया। इसी साल इस सुपरहिट जोड़ी की एक और क्लासिक फिल्म ‘चुपके चुपके’ रिलीज हुई थी। ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी यह बेहतरीन कॉमेडी फिल्म बंगाली सिनेमा की रीमेक थी। फिल्म में दोनों की कॉमिक टाइमिंग कमाल की थी और एसडी बर्मन के संगीत से सजे इसके गाने आज भी चाव से सुने जाते हैं।

    एक्शन और कॉमेडी के बाद इस जोड़ी ने साल १९८० में आई फिल्म ‘राम बलराम’ के जरिए थ्रिलर जॉनर में अपनी धाक जमाई। विजय आनंद द्वारा निर्देशित इस एक्शन थ्रिलर फिल्म में दोनों ने ऐसे दो भाइयों का किरदार निभाया था, जिनका पालन-पोषण धोखे से उनके माता-पिता के हत्यारे चाचा ने किया था। इसके अलावा यह जोड़ी ऋषिकेश मुखर्जी की ही एक और कल्ट फिल्म ‘गुड्डी’ में भी एक साथ नजर आई थी। हालांकि इस फिल्म में मुख्य भूमिका अभिनेत्री जया बच्चन की थी, लेकिन धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन ने फिल्म इंडस्ट्री की असलियत दिखाते हुए इसमें बेहद प्रभावी कैमियो रोल किए थे, जिसने फिल्म की कहानी को एक नया आयाम दिया था।

    सिल्वर स्क्रीन पर नए प्रयोग करने के मामले में भी यह जोड़ी पीछे नहीं रही। साल १९७७ में रिलीज हुई फिल्म ‘चरणदास’ एकमात्र ऐसी अनूठी फिल्म है, जिसमें अमिताभ और धर्मेंद्र दोनों ने कव्वाली गायकों के रूप में एक विशेष और बेहद दिलचस्प भूमिका निभाई थी। आशा भोसले और मुकेश की आवाज में सजे इस फिल्म के कव्वाली गीत आज भी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। इसके बाद निर्देशक दुलल गुहा की फिल्म ‘दोस्त’ में भी अमिताभ बच्चन ने ‘आनंद’ नाम के किरदार में एक बेहद प्रभावशाली कैमियो किया था, जहां मुख्य भूमिका में धर्मेंद्र मौजूद थे। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत से सजी इस फिल्म में दोनों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री को दर्शकों ने खूब सराहा था।

    इन दोनों सितारों की जुगलबंदी का सिलसिला आगे भी जारी रहा, जिसमें एक हॉरर-थ्रिलर फिल्म ‘जादूगर’ शामिल है। इस रहस्यमयी कहानी में धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन ने क्रमशः वीरेंद्र और फ्रैंक जेम्स की भूमिकाएं निभाकर दर्शकों को चौंका दिया था, जिसकी पृष्ठभूमि एक सुनसान हवेली से जुड़ी थी। इसके बाद फिल्म ‘दिल्लगी’ में भी दोनों का जादू देखने को मिला, जहां अमिताभ बच्चन का रोल भले ही छोटा था, लेकिन एक गंभीर और सीधे-सादे प्रोफेसर की भूमिका निभा रहे धर्मेंद्र के साथ उनकी ऑनस्क्रीन मौजूदगी ने फिल्म की रौनक बढ़ा दी थी। इसके अतिरिक्त इस लिस्ट में एक अन्य फिल्म ‘हम कौन हैं’ का नाम भी प्रमुखता से शामिल है, जिसमें इस महान जोड़ी ने अपने अभिनय से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।

  • न मनमुटाव, न तलाक, फिर भी ३७ सालों से अलग शहरों में रह रहे हैं अलका याग्निक और नीरज कपूर, खुद सिंगर ने खोला इस अनोखे रिश्ते का राज

    न मनमुटाव, न तलाक, फिर भी ३७ सालों से अलग शहरों में रह रहे हैं अलका याग्निक और नीरज कपूर, खुद सिंगर ने खोला इस अनोखे रिश्ते का राज


    नई दिल्ली । भारतीय संगीत जगत पर दशकों तक राज करने वाली दिग्गज गायिका अलका याग्निक की सुरीली आवाज से तो हर कोई वाकिफ है, लेकिन उनकी निजी जिंदगी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। अलका याग्निक ने साल १९८९ में बिजनेसमैन नीरज कपूर से शादी की थी, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि शादी के करीब ३७ साल बीत जाने के बाद भी यह कपल एक-दूसरे से अलग रहता है। अमूमन फिल्म इंडस्ट्री में अलग रहने का मतलब मनमुटाव या तलाक माना जाता है, मगर इस जोड़े के बीच ऐसा कुछ भी नहीं है। दोनों के बीच आज भी अटूट प्यार और आपसी समझ कायम है। दरअसल, अलका याग्निक के पति नीरज कपूर मूल रूप से मेघालय की राजधानी शिलांग के रहने वाले हैं और वहीं रहकर अपना पूरा बिजनेस संभालते हैं, जबकि अलका अपने काम के सिलसिले में मुंबई में रहती हैं।

    इस अनोखे रिश्ते की शुरुआत एक पारिवारिक जुड़ाव से हुई थी। नीरज कपूर की आंटी और अलका याग्निक की मां बचपन में क्लासमेट हुआ करती थीं। इसी पारिवारिक कनेक्शन के चलते नीरज जब मुंबई आए, तो उनकी पहली मुलाकात अलका से हुई। धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला बढ़ा और यह दोस्ती गहरी मोहब्बत में बदल गई। उस दौर में दोनों के बीच रात-रात भर फोन पर बातें हुआ करती थीं और जब घर पर फोन का भारी-भरकम बिल आया, तब जाकर अलका की मां को इस अफेयर की भनक लगी। अलका उस समय तक यह पूरी तरह तय कर चुकी थीं कि वह जीवनसाथी के रूप में सिर्फ नीरज को ही चुनेंगी। हालांकि, जब दोनों ने अपने परिवारों के सामने शादी की इच्छा जताई, तो अलका के माता-पिता इस रिश्ते के सख्त खिलाफ खड़े हो गए।

    घरवालों के विरोध की सबसे बड़ी वजह दोनों के करियर और अलग-अलग शहर थे। नीरज शिलांग में पूरी तरह सेटल थे और अलका उस दौर में अपने सिंगिंग करियर के पीक पर थीं, जिसके कारण उनका मुंबई में रहना बेहद जरूरी था। माता-पिता का मानना था कि एक पार्टनर मुंबई में और दूसरा शिलांग में रहेगा, तो इतनी दूरी के बीच शादी का चलना नामुमकिन हो जाएगा। हालांकि, अलका और नीरज के दृढ़ निश्चय के आगे आखिरकार दोनों परिवारों को झुकना पड़ा और साल १९८९ में दोनों पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह के बंधन में बंध गए। शादी के शुरुआती दिनों में दोनों ने एक बीच का रास्ता निकाला था, जिसके तहत तय हुआ था कि अलका एक महीने के लिए शिलांग जाएंगी और नीरज अगले महीने मुंबई आएंगे।

    शादी के तुरंत बाद अलका याग्निक का करियर इतनी तेजी से चमका कि उनके लिए एक दिन के लिए भी मुंबई छोड़ना पूरी तरह नामुमकिन हो गया। साल १९९० में उनकी बेटी सायशा का जन्म हुआ और उसके ठीक बाद जनवरी १९९१ में उनका गाना ‘एक दो तीन’ ब्लॉकबस्टर साबित हुआ। इस सफलता ने अलका को बॉलीवुड की सबसे व्यस्त गायिका बना दिया। अलका बताती हैं कि उनके पति अक्सर मजाक में उन्हें चिढ़ाते हैं कि वह अलका के करियर के लिए तो बहुत लकी साबित हुए, लेकिन अपने खुद के वैवाहिक जीवन के लिए अनलकी रहे। खुद अलका भी मानती हैं कि पूरी जिंदगी अलग-अलग शहरों में रहने की वजह से जब भी वे लंबे समय बाद मिलते हैं, तो एक-दूसरे के तौर-तरीकों को दोबारा समझने में दो-चार दिन का समय लग जाता है, लेकिन इस दूरी ने उनके रिश्ते के विश्वास को कभी कमजोर नहीं होने दिया।

  • परदे पर शराबी का अमर अभिनय करने वाले केष्टो मुखर्जी की अनसुनी दास्तान, मंदिर जाते वक्त सड़क हादसे में थम गई थीं सांसें

    परदे पर शराबी का अमर अभिनय करने वाले केष्टो मुखर्जी की अनसुनी दास्तान, मंदिर जाते वक्त सड़क हादसे में थम गई थीं सांसें

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के सुनहरे इतिहास में कई ऐसे कलाकारों ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है, जिनकी रील और रीयल लाइफ में जमीन-आसमान का अंतर था। एक ऐसे ही बेमिसाल अभिनेता थे केष्टो मुखर्जी, जिन्होंने परदे पर हमेशा एक पक्के शराबी का किरदार निभाकर दर्शकों को लोटपोट किया, लेकिन असल जिंदगी में उन्होंने कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाया। अपनी खास कॉमिक टाइमिंग, अनूठी शारीरिक भाषा और लड़खड़ाती जुबान से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले केष्टो मुखर्जी ने अपने करियर में ९० से भी अधिक फिल्मों में काम किया, मगर उनका यह मुकाम कड़े संघर्षों और बेहद अजीबो-गरीब दौर से गुजरकर हासिल हुआ था। कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे केष्टो को बचपन से ही अभिनय का गहरा शौक था, जिसके चलते उन्होंने शुरुआती दिनों में नुक्कड़ नाटकों और रंगमंच का रुख किया था।

    कोलकाता के रंगमंच पर सक्रियता के दौरान मशहूर फिल्मकार ऋत्विक घटक की पारखी नजर उन पर पड़ी। घटक ने केष्टो की असाधारण प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें अपनी बांग्ला फिल्म ‘नागरिक’ में एक महत्वपूर्ण भूमिका दे दी। किस्मत का खेल देखिए कि यह फिल्म साल १९५२ में बनकर पूरी हो चुकी थी, लेकिन किन्हीं कारणों से इसे सिनेमाघरों तक पहुंचने में पूरे २५ साल लग गए। जब यह फिल्म १९७७ में रिलीज हुई, तब तक ऋत्विक घटक इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे। अपने गुरु और मार्गदर्शक के निधन के गहरे सदमे के कारण केष्टो मुखर्जी ने इस फिल्म को अपने जीवन में कभी नहीं देखा। कोलकाता में कई बंगाली फिल्मों का हिस्सा रहने के बावजूद केष्टो को भारी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा था, जिससे न तो उनके भीतर की अभिनय की भूख मिट रही थी और न ही परिवार का गुजारा हो पा रहा था।

    आर्थिक तंगहाली से जूझते हुए केष्टो मुखर्जी ने एक दिन आंखों में बड़े सपने लिए मायानगरी बॉम्बे का रुख किया। बॉम्बे आकर उन्होंने नए सिरे से काम की तलाश शुरू की और किसी तरह दिग्गज निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी से संपर्क साधे रखा। ऋषिकेश मुखर्जी ने उनकी अभिनय क्षमता का सम्मान करते हुए अपनी फिल्म ‘मुसाफिर’ में उन्हें एक स्ट्रीट डांसर का बेहद छोटा सा रोल दिया। इस छोटे से ब्रेक के बाद भी बॉम्बे जैसे बड़े शहर में खुद को स्थापित करने के लिए उनका संघर्ष थमा नहीं था। इसी जद्दोजहद के बीच एक दिन वह महान फिल्मकार बिमल रॉय से मिलने उनकी फिल्म के सेट पर पहुंच गए। बिमल रॉय उस समय शूटिंग के बेहद व्यस्त शेड्यूल में व्यस्त थे, इसलिए केष्टो वहीं एक कोने में बैठकर घंटों तक उनके फ्री होने का इंतजार करने लगे।

    काफी देर बाद जब बिमल रॉय फुर्सत में आए और केष्टो उनके सामने पहुंचे, तो उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि फिलहाल उनके पास कोई काम नहीं है और वह बाद में आएं। इस साफ इनकार के बाद भी केष्टो वहां से हिले नहीं, जिससे चिढ़कर बिमल रॉय ने उनसे पूछ लिया कि क्या तुम भौंक सकते हो, क्योंकि उन्हें अपनी फिल्म के एक दृश्य के लिए कुत्ते की आवाज की जरूरत थी। आम तौर पर ऐसा तीखा सवाल सुनकर कोई भी स्वाभिमानी कलाकार वहां से चला जाता, लेकिन केष्टो ने धैर्य रखा और तुरंत पूरी शिद्दत के साथ सेट पर ही कुत्ते की आवाज निकालने लगे। उनकी इस अप्रत्याशित हरकत और अभिनय के प्रति गजब का समर्पण देखकर बिमल रॉय पूरी तरह हैरान रह गए और उन्होंने तुरंत केष्टो को अपनी फिल्म के लिए साइन कर लिया।

    इस ऐतिहासिक घटना के बाद केष्टो मुखर्जी की बॉलीवुड में राह आसान हो गई और उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह हिंदी सिनेमा के सबसे पसंदीदा और भरोसेमंद हास्य कलाकारों में शुमार हो गए, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। महज ५६ वर्ष की उम्र में एक दर्दनाक सड़क हादसे ने उनके इस सुनहरे सफर पर हमेशा के लिए विराम लगा दिया। वह मुंबई के समीप स्थित एक प्रसिद्ध गणपति मंदिर में दर्शन के लिए जा रहे थे, तभी पीछे से आ रहे एक तेज रफ्तार ट्रक ने उनकी कार को जोरदार टक्कर मार दी। इस भीषण दुर्घटना में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तुरंत नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान अगले ही दिन दिल का दौरा पड़ने के कारण इस महान कलाकार का असमय निधन हो गया।

  • मिथुन चक्रवर्ती की बेटी दिशानी ने की सगाई, विदेशी बॉयफ्रेंड के प्रपोजल को कहा ‘हां’, रोमांटिक तस्वीरें वायरल

    मिथुन चक्रवर्ती की बेटी दिशानी ने की सगाई, विदेशी बॉयफ्रेंड के प्रपोजल को कहा ‘हां’, रोमांटिक तस्वीरें वायरल


    नई दिल्ली । बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती के परिवार में खुशियों ने दस्तक दी है। उनकी बेटी दिशानी चक्रवर्ती ने अपने लंबे समय से बॉयफ्रेंड रहे माइल्स मैंटजारिस के साथ सगाई कर ली है। सगाई की खूबसूरत तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आते ही वायरल हो गईं और फैंस से लेकर फिल्मी हस्तियों तक सभी उन्हें बधाई दे रहे हैं। इन तस्वीरों में दोनों का रोमांटिक अंदाज और एक-दूसरे के प्रति प्यार साफ नजर आ रहा है।

    दिशानी ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर सगाई समारोह की कई तस्वीरें साझा की हैं। तस्वीरों में वह अपनी इंगेजमेंट रिंग फ्लॉन्ट करती नजर आ रही हैं, जबकि उनके चेहरे पर इस खास पल की खुशी साफ दिखाई दे रही है। माइल्स मैंटजारिस ने बेहद खास अंदाज में उन्हें प्रपोज किया, जिसे यादगार बनाने के लिए खूबसूरत लोकेशन और शानदार सजावट का भी इंतजाम किया गया था। तस्वीरों में दोनों एक-दूसरे के साथ बेहद खुश और भावुक नजर आ रहे हैं।

    सगाई की तस्वीरों के साथ दिशानी ने अपनी शादी की तारीख का भी खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि वह और माइल्स 6 दिसंबर 2026 को शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं। इस खबर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर बधाइयों का तांता लग गया है। फैंस लगातार कमेंट कर कपल को नए जीवन की शुभकामनाएं दे रहे हैं।

    लुक की बात करें तो दिशानी ने इस खास मौके पर सफेद रंग की खूबसूरत ड्रेस पहनी थी, जिसमें वह बेहद आकर्षक और एलिगेंट नजर आ रही थीं। वहीं माइल्स ब्लैक आउटफिट में दिखाई दिए। दोनों की जोड़ी को सोशल मीडिया यूजर्स काफी पसंद कर रहे हैं। तस्वीरों में उनकी केमिस्ट्री और रोमांटिक अंदाज ने लोगों का ध्यान खींचा है।

    प्रपोजल की तस्वीरों में यह भी देखने को मिला कि माइल्स ने इस पल को यादगार बनाने के लिए खास तैयारी की थी। शानदार लोकेशन, खूबसूरत नजारा और रोमांटिक माहौल ने इस सगाई को और भी खास बना दिया। यही वजह है कि तस्वीरें इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रही हैं और चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

    गौरतलब है कि दिशानी चक्रवर्ती, मिथुन चक्रवर्ती की गोद ली हुई बेटी हैं। मिथुन ने उन्हें बचपन में अपनाया था और हमेशा अपनी बेटी की तरह प्यार और परवरिश दी। दिशानी अपने तीन भाइयों की इकलौती बहन हैं और परिवार के बेहद करीब मानी जाती हैं। अब उनकी सगाई की खबर से पूरा परिवार खुशी के माहौल में है।

    फैंस को अब 6 दिसंबर 2026 का इंतजार है, जब दिशानी और माइल्स शादी के बंधन में बंधकर अपने जीवन की नई शुरुआत करेंगे। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों ने इस खुशखबरी को और भी खास बना दिया है।

  • दबंग 2 नहीं, 56 साल पुरानी है ‘फुलौरी बिना चटनी’ की कहानी, अब धमाल 4 में फिर गूंजेगी लोकधुन

    दबंग 2 नहीं, 56 साल पुरानी है ‘फुलौरी बिना चटनी’ की कहानी, अब धमाल 4 में फिर गूंजेगी लोकधुन


    नई दिल्ली । भोजपुरी लोकसंगीत की अमर धुन ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ एक बार फिर चर्चा में है। फिल्म ‘धमाल 4’ के नए गीत ‘चटनी’ में इस लोकप्रिय लोकधुन को रीक्रिएट किया गया है, जिसके बाद सोशल मीडिया से लेकर मनोरंजन जगत तक इसकी खूब चर्चा हो रही है। हालांकि अधिकांश लोग इस गीत को सलमान खान की फिल्म ‘दबंग 2’ से जोड़कर देखते हैं, लेकिन इसकी असली कहानी इससे कहीं ज्यादा पुरानी और दिलचस्प है। यह गीत करीब 56 साल पहले भोजपुरी लोकसंस्कृति से निकलकर कैरेबियन देशों तक पहुंचा और फिर वहां से पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाने में सफल रहा।

    ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ मूल रूप से एक पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत है। फुलौरी एक लोकप्रिय पकवान है, जिसे आमतौर पर चटनी के साथ खाया जाता है। इसी वजह से गीत की पंक्ति ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ यह संदेश देती है कि कुछ चीजें एक-दूसरे के बिना अधूरी होती हैं। यही सरल लेकिन प्रभावी भाव इस गीत को आम लोगों से जोड़ता है।

    इतिहासकारों के अनुसार 19वीं सदी में भारत से त्रिनिदाद और टोबैगो सहित कई कैरेबियन देशों में गए गिरमिटिया मजदूर अपने साथ भोजपुरी भाषा, संस्कृति और लोकगीतों की विरासत भी लेकर गए थे। उन्हीं गीतों में ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ भी शामिल था। समय के साथ यह गीत वहां की स्थानीय संस्कृति का हिस्सा बन गया और पीढ़ी दर पीढ़ी गाया जाता रहा।

    इस गीत को वैश्विक पहचान दिलाने का सबसे बड़ा श्रेय प्रसिद्ध गायक सुंदर पोपो को जाता है। ‘किंग ऑफ चटनी म्यूजिक’ के नाम से मशहूर सुंदर पोपो ने वर्ष 1969 के आसपास भोजपुरी लोकधुनों को कैरेबियन संगीत और आधुनिक बीट्स के साथ जोड़कर नया प्रयोग किया। उनके गाए ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ ने जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की। यही वह दौर था जब ‘चटनी म्यूजिक’ नाम की नई संगीत शैली दुनिया के सामने आई। भोजपुरी लोकसंगीत, भारतीय सुरों और कैरेबियन लय का यह अनोखा संगम लोगों को बेहद पसंद आया।

    भारत में इस गीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का काम बाबला और कंचन की मशहूर जोड़ी ने किया। 1980 के दशक में उनके द्वारा पेश किया गया संस्करण सुपरहिट साबित हुआ। बड़ी संख्या में भारतीय श्रोताओं ने पहली बार इसी वर्जन के जरिए इस गीत को सुना। इसके बाद भोजपुरी संगीत जगत ने भी इस धुन को भरपूर अपनाया। लोकगायिका कल्पना पटवारी समेत कई कलाकारों ने अपने-अपने अंदाज में इसे गाया और यह गीत भोजपुरी संस्कृति का एक तरह से फोक एंथम बन गया।

    बॉलीवुड भी इस लोकप्रिय धुन के आकर्षण से अछूता नहीं रहा। 1994 की फिल्म ‘घर की इज्जत’ में इसकी झलक दिखाई दी, लेकिन वर्ष 2012 में फिल्म ‘दबंग 2’ के जरिए इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम हुआ। ममता शर्मा और वाजिद अली की आवाज में आया यह संस्करण देशभर में हिट साबित हुआ और आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है।

    अब एक बार फिर यह ऐतिहासिक धुन फिल्म ‘धमाल 4’ के जरिए दर्शकों के सामने लौट रही है। हाल ही में रिलीज हुए ‘चटनी’ गीत में रितेश देशमुख, अरशद वारसी, जावेद जाफरी और अंजलि देशपांडे मस्ती भरे अंदाज में नजर आ रहे हैं। गीत को आधुनिक संगीत के साथ पेश किया गया है, लेकिन इसकी लोकधुन आज भी वैसी ही ताजगी और अपनापन लिए हुए है।

    भोजपुरी गांवों से शुरू होकर कैरेबियन देशों तक और फिर बॉलीवुड की चमकदार दुनिया तक पहुंचने वाला ‘फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति की वैश्विक यात्रा का प्रतीक है। यही वजह है कि बदलते दौर, बदलती पीढ़ियों और नए संगीत ट्रेंड्स के बावजूद इस गीत का जादू आज भी कायम है।

  • वास्तविक जीवन में मदिरा को हाथ न लगाने वाले हास्य अभिनेता की अनसुनी दास्तान, मंदिर जाते समय हुए सड़क हादसे में थम गई थीं सांसें

    वास्तविक जीवन में मदिरा को हाथ न लगाने वाले हास्य अभिनेता की अनसुनी दास्तान, मंदिर जाते समय हुए सड़क हादसे में थम गई थीं सांसें

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे विलक्षण कलाकार हुए हैं, जिनकी ऑन-स्क्रीन छवि और वास्तविक जीवन के आचरण में जमीन-आसमान का अंतर था। इस फेहरिस्त में सबसे लोकप्रिय नामों में से एक नाम दिवंगत अभिनेता केष्टो मुखर्जी का है। केष्टो मुखर्जी ने रुपहले पर्दे पर हमेशा एक ऐसे शराबी के किरदारों को जीवंत किया, जिसे देखकर दर्शक अपनी हंसी नहीं रोक पाते थे। आम जनता उन्हें असल जिंदगी में भी शराबी समझने की भूल कर बैठती थी, जबकि हकीकत यह थी कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाया था। उनका पूरा सफरनामा कला के प्रति अटूट निष्ठा, कड़े संघर्षों और अप्रत्याशित मोड़ों की एक अनूठी दास्तान है।

    पश्चिम बंगाल के कोलकाता में जन्मे केष्टो मुखर्जी को बचपन से ही अभिनय का गहरा शौक था, जिसके कारण उन्होंने बेहद कम उम्र में ही नुक्कड़ नाटकों और स्थानीय रंगमंच से अपने अभिनय सफर की शुरुआत कर दी थी। रंगमंच पर उनकी शानदार प्रतिभा को देखकर उस दौर के महान बंगाली फिल्मकार ऋत्विक घटक बेहद प्रभावित हुए और उन्होंने केष्टो को अपनी प्रतिष्ठित बांग्ला फिल्म ‘नागरिक’ में एक महत्वपूर्ण भूमिका की पेशकश की। नियति का खेल देखिए कि यह फिल्म साल 1952 में ही बनकर पूरी तरह तैयार हो चुकी थी, लेकिन किन्हीं कारणों से इसे रिलीज होने में पूरे 25 साल का लंबा समय लग गया। जब यह फिल्म 1977 में सिनेमाघरों में पहुंची, तब तक ऋत्विक घटक इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे। अपने गुरु के जाने के गम में केष्टो मुखर्जी इतने भावुक हो गए थे कि उन्होंने इस फिल्म को जीवनभर कभी नहीं देखा।

    कोलकाता के सिनेमाई हलकों में कई बंगाली फिल्मों का हिस्सा रहने के बावजूद केष्टो मुखर्जी को वह पहचान और आर्थिक संबल नहीं मिल पा रहा था, जिसके वह हकदार थे। न तो उनके परिवार का गुजारा ठीक से हो पा रहा था और न ही उनके भीतर के कलाकार की भूख शांत हो रही थी। आखिरकार, अपनी आंखों में एक बड़ा मुकाम हासिल करने का सपना संजोकर उन्होंने देश की आर्थिक राजधानी और मायानगरी बॉम्बे का रुख किया। मुंबई आने के बाद शुरुआती दिन बेहद तंगहाली और संघर्ष में बीते। उन्होंने हार न मानते हुए लगातार प्रयास किए और किसी तरह मशहूर निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी से संपर्क स्थापित किया। ऋषिकेश मुखर्जी ने उनकी प्रतिभा का सम्मान करते हुए अपनी फिल्म ‘मुसाफिर’ में उन्हें एक स्ट्रीट डांसर का बहुत छोटा सा रोल दिया, जिससे उनके हिंदी सिनेमा के सफर का आधिकारिक तौर पर आगाज हुआ।

    बॉम्बे में खुद को स्थापित करने की इसी जद्दोजहद के दौरान केष्टो मुखर्जी से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक वाकया सामने आया, जब वह काम की तलाश में महान फिल्ममेकर बिमल रॉय के सेट पर पहुंचे थे। बिमल रॉय उस समय अपनी फिल्म की शूटिंग में बेहद व्यस्त थे और केष्टो बिना थके घंटों एक कोने में खड़े होकर उनकी फुर्सत का इंतजार करते रहे। काफी देर बाद जब बिमल रॉय की नजर उन पर पड़ी, तो उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि फिलहाल उनके पास देने के लिए कोई काम नहीं है और वह बाद में आएं। इसके बावजूद केष्टो वहां से नहीं गए। कुछ समय बाद बिमल रॉय ने जब दोबारा उन्हें वहीं खड़ा देखा, तो वह थोड़े असहज और चिढ़ गए। उन्होंने केष्टो से पूछा कि क्या तुम भौंक सकते हो, मुझे अपनी फिल्म के एक दृश्य के लिए कुत्ते की प्रामाणिक आवाज की जरूरत है, क्या तुम यह कर पाओगे।

    यह एक ऐसा सवाल था जो किसी भी स्वाभिमानी अभिनेता को निराश और आहत कर सकता था, लेकिन केष्टो मुखर्जी ने इसे एक बड़ी चुनौती और अवसर के रूप में स्वीकार किया। वह कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हुए और फिर पूरे समर्पण के साथ सेट पर ही जोर-जोर से कुत्ते की आवाज निकालने लगे। उनकी इस अप्रत्याशित और सजीव प्रस्तुति ने बिमल रॉय समेत पूरे सेट पर मौजूद लोगों को हैरान कर दिया। बिमल रॉय के पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं बचे थे और उन्होंने केष्टो की प्रतिभा का लोहा मानते हुए तुरंत उन्हें अपनी फिल्म के लिए अनुबंधित कर लिया। इस घटना के बाद केष्टो मुखर्जी के लिए बॉलीवुड के दरवाजे पूरी तरह खुल गए और उन्होंने अपने पूरे करियर में 90 से अधिक फिल्मों में अपनी विशिष्ट अदाकारी का लोहा मनवाया।

    सफलता के शिखर पर पहुंचने और दर्शकों को दशकों तक हंसाने वाले इस महान कलाकार का अंत बेहद दुखद रहा। मात्र 56 वर्ष की आयु में नियति ने उन्हें हमसे छीन लिया। एक दिन जब वह मुंबई के पास स्थित एक प्रसिद्ध गणपति मंदिर में दर्शन करने के लिए अपनी कार से जा रहे थे, तभी पीछे से आ रहे एक अनियंत्रित तेज रफ्तार ट्रक ने उनकी कार को जोरदार टक्कर मार दी। इस भीषण सड़क हादसे में केष्टो मुखर्जी गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तत्काल नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद दुर्घटना के अगले ही दिन दिल का दौरा पड़ने के कारण इस महान हास्य अभिनेता का असमय निधन हो गया।

  • रामायण पर कथित टिप्पणी को लेकर बढ़ा विवाद, अभिनेता प्रकाश राज के खिलाफ तिरुपति अदालत में आपराधिक शिकायत दर्ज

    रामायण पर कथित टिप्पणी को लेकर बढ़ा विवाद, अभिनेता प्रकाश राज के खिलाफ तिरुपति अदालत में आपराधिक शिकायत दर्ज

    नई दिल्ली । अभिनेता प्रकाश राज एक बार फिर अपने एक कथित बयान को लेकर विवादों के केंद्र में आ गए हैं। रामायण और हिंदू देवी-देवताओं से जुड़ी उनकी कथित टिप्पणियों के खिलाफ तिरुपति की एक अदालत में आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि अभिनेता द्वारा सार्वजनिक मंचों पर दिए गए कुछ बयान धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले हैं और समाज में अनावश्यक विवाद तथा तनाव की स्थिति पैदा कर सकते हैं।

    मामला उस समय चर्चा में आया जब एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित होने लगी। शिकायतकर्ता का दावा है कि इस वीडियो में अभिनेता रामायण और उससे जुड़े प्रमुख पात्रों के संबंध में ऐसी टिप्पणियां करते दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें हिंदू समुदाय के एक वर्ग ने आपत्तिजनक माना है। वीडियो के वायरल होने के बाद विभिन्न स्तरों पर प्रतिक्रिया सामने आई और विवाद ने कानूनी रूप ले लिया।

    शिकायत में कहा गया है कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रभावशाली व्यक्तियों को धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों पर टिप्पणी करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। आरोप लगाया गया है कि संबंधित बयान न केवल धार्मिक मान्यताओं को प्रभावित करते हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक संवेदनशीलता पर भी प्रतिकूल असर डाल सकते हैं। शिकायतकर्ता ने अदालत से मामले को गंभीरता से लेने और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू करने का अनुरोध किया है।

    अदालत में दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में धार्मिक आस्थाओं का सम्मान बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में यदि किसी सार्वजनिक टिप्पणी से किसी समुदाय की भावनाएं आहत होती हैं, तो उसकी निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। शिकायतकर्ता का मानना है कि इस मामले में तथ्यों की पड़ताल कर यह निर्धारित किया जाना आवश्यक है कि संबंधित बयान कानून के दायरे में किस प्रकार आते हैं।

    विवाद का एक पहलू यह भी है कि शिकायत में अभिनेता पर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विषयों को लेकर विवादास्पद बहस को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता का दावा है कि इस प्रकार के बयान समाज में अनावश्यक वैचारिक टकराव उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए मामले को केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का प्रश्न मानने के बजाय उसके व्यापक सामाजिक प्रभावों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

    कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत अब शिकायत में प्रस्तुत तथ्यों और दस्तावेजों की समीक्षा करेगी। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया किस प्रकार संचालित होगी। यदि अदालत प्रथम दृष्टया पर्याप्त आधार पाती है, तो संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करने या अन्य आवश्यक कदम उठाने पर विचार किया जा सकता है।

    वहीं, यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन को लेकर चल रही व्यापक बहस को भी एक बार फिर चर्चा में ले आया है। देश में समय-समय पर सार्वजनिक हस्तियों की टिप्पणियों को लेकर ऐसे विवाद सामने आते रहे हैं, जिनमें कानूनी और सामाजिक दोनों पहलुओं पर विमर्श होता है।

    फिलहाल मामला न्यायिक विचाराधीन प्रक्रिया की ओर बढ़ रहा है और सभी पक्षों की नजर अदालत की आगामी कार्रवाई पर बनी हुई है। आने वाले दिनों में इस प्रकरण में होने वाले कानूनी घटनाक्रम पर व्यापक ध्यान रहने की संभावना है।

  • तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय और संगीता के तलाक मामले में फिर टली सुनवाई, अदालत ने 7 अगस्त की नई तारीख की तय

    तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय और संगीता के तलाक मामले में फिर टली सुनवाई, अदालत ने 7 अगस्त की नई तारीख की तय

    नई दिल्ली । तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और तमिलगा वेत्री कझगम के अध्यक्ष सी. जोसेफ विजय तथा उनकी पत्नी संगीता के बीच चल रहे तलाक मामले की सुनवाई एक बार फिर आगे बढ़ा दी गई है। चेंगलपट्टू फैमिली कोर्ट में निर्धारित सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं होने के कारण अदालत ने मामले की अगली तारीख 7 अगस्त तय की है। इस घटनाक्रम के बाद यह मामला एक बार फिर सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चाओं का विषय बन गया है।

    सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान न तो मुख्यमंत्री विजय अदालत पहुंचे और न ही उनकी पत्नी संगीता ने व्यक्तिगत रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। हालांकि दोनों पक्षों की ओर से उनके अधिवक्ता अदालत में मौजूद रहे और उन्होंने कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखा। अदालत ने दोनों पक्षों की गैरहाजिरी को ध्यान में रखते हुए सुनवाई को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।

    यह मामला पिछले कई महीनों से फैमिली कोर्ट में विचाराधीन है। इससे पहले भी कई अवसरों पर सुनवाई निर्धारित होने के बावजूद दोनों पक्ष व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित नहीं हुए थे। कानूनी प्रक्रिया के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल होने की अनुमति को लेकर भी अदालत के समक्ष अनुरोध प्रस्तुत किए गए थे। मुख्यमंत्री पद से जुड़ी सुरक्षा व्यवस्थाओं और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण कारणों के रूप में बताया गया है।

    संगीता ने वर्ष 2025 के अंतिम महीनों में अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए वैवाहिक संबंध समाप्त करने की मांग की थी। याचिका में यह कहा गया था कि पति-पत्नी के बीच उत्पन्न मतभेद ऐसे स्तर तक पहुंच चुके हैं जहां वैवाहिक संबंधों को सामान्य रूप से आगे बढ़ाना संभव नहीं रह गया है। याचिका में वैधानिक अधिकारों से संबंधित अन्य मांगों को भी शामिल किया गया था।

    मुख्यमंत्री विजय का सार्वजनिक जीवन लंबे समय से लोगों के बीच चर्चा का विषय रहा है। फिल्म जगत में लोकप्रिय अभिनेता के रूप में पहचान बनाने के बाद उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और अपनी पार्टी के माध्यम से राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी राजनीतिक गतिविधियों और सार्वजनिक छवि पर लोगों की विशेष नजर बनी हुई है।

    इसी कारण उनके निजी जीवन से जुड़ा यह कानूनी मामला भी व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि सार्वजनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के निजी मामलों को लेकर लोगों की स्वाभाविक रुचि रहती है, हालांकि कानूनी प्रक्रिया को पूरी संवेदनशीलता और गोपनीयता के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

    कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार पारिवारिक विवादों से जुड़े मामलों में अदालत दोनों पक्षों को पर्याप्त अवसर देती है ताकि किसी भी संभावित समाधान की संभावना को परखा जा सके। ऐसे मामलों में अदालत की प्राथमिकता कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए दोनों पक्षों के अधिकारों की रक्षा करना होती है।

    अब इस मामले की अगली सुनवाई 7 अगस्त को होगी। उस दिन अदालत मामले की प्रगति, पक्षकारों की उपस्थिति और आगे की कानूनी कार्यवाही को लेकर निर्णय ले सकती है। फिलहाल सभी की निगाहें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस चर्चित मामले में आगे की दिशा स्पष्ट होने की संभावना है।

    Google Photo Search Suggestion:

  • ‘रेडी वॉटर’ से ‘सरबरी’ तक: बोलचाल की भाषा में छिपी सृजनात्मकता को अमिताभ बच्चन ने बताया भारतीय समाज की बड़ी ताकत

    ‘रेडी वॉटर’ से ‘सरबरी’ तक: बोलचाल की भाषा में छिपी सृजनात्मकता को अमिताभ बच्चन ने बताया भारतीय समाज की बड़ी ताकत

    नई दिल्ली । भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सोच, संस्कृति और रचनात्मकता का प्रतिबिंब भी होती है। यही संदेश वरिष्ठ अभिनेता अमिताभ बच्चन ने अपने हालिया ब्लॉग के माध्यम से साझा किया है। उन्होंने आम लोगों की बोलचाल में दिखाई देने वाली भाषाई सृजनात्मकता की सराहना करते हुए कहा कि लोग अक्सर विदेशी शब्दों को अपनी सुविधा, समझ और स्थानीय प्रभाव के अनुरूप नया रूप दे देते हैं, जिससे वे शब्द और भी आत्मीय तथा रोचक बन जाते हैं।

    अमिताभ बच्चन ने अपने प्रशंसकों को संबोधित करते हुए ब्लॉग की शुरुआत हल्के-फुल्के अंदाज में की। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्लॉग लिखने में हुई देरी का कारण आलस्य नहीं, बल्कि कार्य व्यस्तता थी। उन्होंने कहा कि दिनभर के कार्यों के बाद अपने प्रशंसकों से संवाद करना उनके लिए एक विशेष अनुभव होता है और यही उनके दैनिक कार्यों की पूर्णता का एहसास भी कराता है।

    अपने विचारों को समझाने के लिए उन्होंने अपने आवास ‘जलसा’ से जुड़ा एक रोचक प्रसंग साझा किया। उन्होंने बताया कि उनके यहां काम करने वाले एक माली को अंग्रेजी शब्दों का उच्चारण करने में कठिनाई होती थी। विशेष रूप से एक शब्द को वह सही ढंग से नहीं बोल पाता था, इसलिए उसने उसे अपनी सुविधा के अनुसार बदलकर नया रूप दे दिया। अभिनेता के अनुसार, यह नया उच्चारण इतना सहज और आत्मीय लगा कि कई बार वह मूल शब्द की तुलना में अधिक प्रभावशाली प्रतीत हुआ।

    उन्होंने एक अन्य उदाहरण का उल्लेख करते हुए बताया कि कुछ लोग ‘रेडिएटर’ शब्द को अपने तरीके से ‘रेडी वॉटर’ कहने लगे। इसके पीछे उनका अपना तर्क भी था कि जिस उपकरण में पानी भरा जाता है, उसके लिए ऐसा नाम अधिक उपयुक्त लगता है। अमिताभ बच्चन ने कहा कि यद्यपि यह तकनीकी रूप से सही शब्द नहीं है, लेकिन यह लोगों की सोचने और भाषा को अपने अनुरूप ढालने की क्षमता को दर्शाता है।

    अभिनेता का मानना है कि भाषा का वास्तविक सौंदर्य उसकी लचीलापन और स्वीकार्यता में निहित होता है। समाज के विभिन्न वर्ग, क्षेत्र और भाषाई पृष्ठभूमि वाले लोग जब किसी शब्द को अपनाते हैं, तो उसमें अपनी संस्कृति और अनुभवों का रंग भी जोड़ देते हैं। यही प्रक्रिया भाषा को स्थिर नहीं रहने देती, बल्कि उसे समय के साथ विकसित और समृद्ध बनाती है।

    उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति के लिए किसी विदेशी भाषा या उसके जटिल शब्दों का शुद्ध उच्चारण करना आसान नहीं होता। ऐसे में लोग अपनी समझ और सुविधा के अनुसार नए शब्द गढ़ लेते हैं। यह केवल उच्चारण की त्रुटि नहीं, बल्कि भाषा के प्रति मानवीय अनुकूलन क्षमता का उदाहरण है। इसी वजह से ऐसे शब्द लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों और दैनिक जीवन का हिस्सा बने रहते हैं।

    अमिताभ बच्चन ने यह भी कहा कि भाषा की यही सहजता उसे आम लोगों से जोड़ती है। जब कोई शब्द स्थानीय संदर्भों और बोलचाल में ढल जाता है तो वह केवल शब्द नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक अनुभव का हिस्सा बन जाता है। उन्होंने अपने प्रशंसकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्षों से मिलने वाला उनका स्नेह और समर्थन उनके जीवन को निरंतर ऊर्जा प्रदान करता है।

    भाषा और समाज के संबंध पर व्यक्त किए गए उनके विचार यह संकेत देते हैं कि रचनात्मकता केवल साहित्य या कला तक सीमित नहीं है, बल्कि सामान्य बातचीत और दैनिक जीवन में भी उतनी ही प्रभावशाली रूप से दिखाई देती है। यही विशेषता भाषा को जीवंत, प्रासंगिक और समय के साथ विकसित होने योग्य बनाती है।

  • मुगल-ए-आजम के सेट से सामने आया इतिहास का अनसुना पन्ना: मधुबाला के हुस्न के दीवाने थे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो

    मुगल-ए-आजम के सेट से सामने आया इतिहास का अनसुना पन्ना: मधुबाला के हुस्न के दीवाने थे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर में अपनी बेमिसाल खूबसूरती और जीवंत अभिनय से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली अभिनेत्री मधुबाला का जादू सिर्फ देश की सीमाओं तक ही सीमित नहीं था। हाल ही में सामने आए ऐतिहासिक और सिनेमाई संस्मरणों के अनुसार, पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो भी इस कदर हुस्न की मल्लिका के दीवाने थे कि वे अक्सर उनसे मिलने के लिए भारत आया करते थे। यह उस दौर की बात है जब मधुबाला अपनी सर्वकालिक महान फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ की शूटिंग में व्यस्त थीं। उस समय जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान की राजनीति में कोई बहुत बड़ा नाम नहीं थे, बल्कि एक बेहद पढ़े-लिखे, हैंडसम और उभरते हुए युवा राजनेता के तौर पर मुंबई के दौरों पर आते-जाते रहते थे।

    मध्य प्रदेश। इस ऐतिहासिक और दिलचस्प किस्से की पृष्ठभूमि साल 1950 के दशक के अंतिम वर्षों से जुड़ती है। यह वह दौर था जब एक तरफ मधुबाला और महानायक दिलीप कुमार के बीच के रिश्तों में गंभीर तल्खी आ चुकी थी और उनका सालों पुराना संबंध टूटने की कगार पर था। ठीक उसी समय जुल्फिकार अली भुट्टो की जिंदगी में मधुबाला की एंट्री हुई। भुट्टो अक्सर मुंबई प्रवास के दौरान ‘मुगल-ए-आजम’ के भव्य सेट पर पहुंच जाते थे, जहां वे घंटों बैठकर मधुबाला को अभिनय करते हुए निहारते थे। धीरे-धीरे दोनों के बीच मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा और यह दोस्ती गहरी होती चली गई। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, दोनों अक्सर फिल्म के सेट पर ही एक साथ दोपहर का भोजन करते थे और भुट्टो हमेशा मधुबाला के करीब रहने का बहाना ढूंढते थे।

    इस रिश्ते का सबसे जटिल पहलू यह था कि जब जुल्फिकार अली भुट्टो मधुबाला के करीब आ रहे थे, तब वे पहले से ही शादीशुदा थे और उनकी शादी शिरीन नामक महिला से हो चुकी थी। इसके बावजूद मधुबाला की जादुई शख्सियत के आकर्षण में बंधकर भुट्टो ने अपनी शादीशुदा जिंदगी की परवाह नहीं की। मीडिया रिपोर्ट्स और उस दौर के राजनैतिक-सिनेमाई गलियारों के दावों के अनुसार, भुट्टो ने एक दिन अपने दिल की बात खुलकर मधुबाला के सामने रख दी थी और उनके समक्ष बकायदा विवाह का प्रस्ताव भी पेश किया था। वे हर हाल में मधुबाला को अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहते थे और इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे।

    मधुबाला उस दौर में जुल्फिकार भुट्टो की बुद्धिमत्ता और उनके व्यक्तित्व का सम्मान जरूर करती थीं और उनके साथ पर्याप्त समय भी बिताती थीं, लेकिन वे एक बेहद व्यावहारिक महिला भी थीं। उन्हें इस बात का पूरा संज्ञान था कि भुट्टो न सिर्फ शादीशुदा हैं बल्कि एक दूसरे देश की सक्रिय राजनीति का हिस्सा भी हैं। ऐसे किसी संवेदनशील मोड़ पर शादी जैसा बड़ा और गंभीर फैसला लेना उनके करियर और व्यक्तिगत जीवन के लिए सही नहीं था। यही कारण रहा कि मधुबाला ने भुट्टो के प्रेम प्रस्ताव को बेहद शालीनता से ठुकरा दिया और अपने रिश्ते को एक सीमित दायरे से आगे नहीं बढ़ने दिया। आखिरकार उन्होंने भुट्टो से अपनी दूरियां बना लीं और इस तरह राजनीति और कला का यह अध्याय हमेशा के लिए अधूरा रह गया।

    इस अधूरी प्रेम कहानी के अंत के बाद दोनों की राहें पूरी तरह जुदा हो गईं। जुल्फिकार अली भुट्टो से अलग होने के तुरंत बाद साल 1960 में मधुबाला ने मशहूर गायक और अभिनेता किशोर कुमार से शादी कर ली। इसके कुछ समय बाद ही वे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ गईं और महज 36 वर्ष की अल्पायु में साल 1969 में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। दूसरी ओर, जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान की राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे और देश के विदेश मंत्री, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बने। हालांकि, नियति को कुछ और ही मंजूर था और साल 1979 में तख्तापलट के बाद महज 51 वर्ष की आयु में भुट्टो को पाकिस्तान में फांसी दे दी गई।