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  • 27 भारतीयों वाले जहाज पर चुंबक बम से हमला…. होर्मुज में पहली बार हुआ लिंपेट माइंस का इस्तेमाल

    27 भारतीयों वाले जहाज पर चुंबक बम से हमला…. होर्मुज में पहली बार हुआ लिंपेट माइंस का इस्तेमाल


    नई दिल्ली।
    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में समुद्री जहाजों पर हमलों का खतरा बढ़ता जा रहा है. 30 अक्टूबर को 27 भारतीय नाविकों (27 Indian Sailors) को लेकर जा रहे पनामा के झंडे वाले तेल टैंकर MT LOUISE 1 पर लिंपेट माइंस (चुंबक बम) (Limpet Mines -Magnetic Bombs) से हमला किया गया. धमाके के बाद जहाज के इंजन रूम में आग लग गई और टैंकर कुछ समय के लिए काम करना बंद कर गया. हालांकि, सभी 27 भारतीय क्रू मेंबर सुरक्षित हैं. केंद्रीय जहाजरानी मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इसकी पुष्टि की है.

    जानकारी के मुताबिक, फरवरी में अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज में चुंबक विस्फोट के इस्तेमाल से किया गया यह पहला सफल हमला है. हमले में एक छोटी नाव टैंकर के पास पहुंची और उसके बाहरी हिस्से पर दो लिंपेट माइंस चिपकाकर वहां से निकल गई. इसके बाद जहाज में आग लग गई. क्रू मेंबर्स ने आग पर काबू पा लिया. घटना में किसी के घायल होने या समुद्र में तेल फैलने की जानकारी नहीं है. आग बुझने के बाद टैंकर ने फिर से अपना सफर शुरू कर दिया.


    एक दिन पहले दूसरे टैंकर पर भी हुआ था हमला

    केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने बताया कि 29 अक्टूबर को लाइबेरिया के झंडे वाले बड़े तेल टैंकर MT ARZANAH पर भी होर्मुज में प्रोजेक्टाइल से हमला किया गया था. इस जहाज पर दो भारतीय नागरिक सवार थे. इस तरह दोनों जहाजों पर कुल 29 भारतीय नागरिक मौजूद थे और सभी सुरक्षित हैं। सोनोवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि सरकार हालात पर लगातार नजर रख रही है. जहाजों का प्रबंधन करने वाली कंपनियों के साथ संपर्क बनाए रखा जा रहा है, ताकि भारतीय नाविकों की सुरक्षा और उनके हालात का ध्यान रखा जा सके.


    ओमान के पास हुई घटना

    ब्रिटिश नौसेना से जुड़ी एजेंसी UKMTO के मुताबिक, गुरुवार को यह घटना ओमान के खासाब शहर से करीब 25 समुद्री मील यानी लगभग 46 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में हुई. एजेंसी ने अपनी शुरुआती एडवाइजरी में जहाज का नाम नहीं बताया था. हालांकि, समुद्री सुरक्षा से जुड़े तीन सूत्रों ने रॉयटर्स को बताया कि हमला MT LOUISE 1 पर हुआ और जहाज के बाहरी हिस्से पर लिंपेट माइंस लगाई गई थीं। सूत्रों के मुताबिक, सितंबर में भी इसी तरह का हमला करने की कोशिश हुई थी, लेकिन उस समय विस्फोटक नहीं फटे थे. गुरुवार के हमले के पीछे किसका हाथ है, यह अभी साफ नहीं हो पाया है।


    क्या होती हैं लिंपेट माइंस?

    लिंपेट माइंस छोटे आकार के विस्फोटक उपकरण होते हैं, जिन्हें चुंबक की मदद से जहाज के बाहरी हिस्से पर चिपकाया जा सकता है. समुद्री सुरक्षा कंपनी Marisks के मुताबिक, इस क्षेत्र में 2017 से इनका इस्तेमाल किया जा रहा है. ये विस्फोटक अपेक्षाकृत सस्ते और आसानी से उपलब्ध होते हैं. छोटी नाव के जरिए इन्हें किसी चलते हुए जहाज पर लगाकर हमलावर आसानी से वहां से निकल सकते हैं।

  • मदीना को निशाना बनाने की कोशिश! हूती विद्रोहियों ने अदन में राष्ट्रपति भवन और एयरपोर्ट पर दागी मिसाइलें

    मदीना को निशाना बनाने की कोशिश! हूती विद्रोहियों ने अदन में राष्ट्रपति भवन और एयरपोर्ट पर दागी मिसाइलें


    नई दिल्ली। यमन के हूती विद्रोहियों ने शुक्रवार को हमलों की नई लहर शुरू की। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने मदीना क्षेत्र के ऊपर एक ड्रोन को मार गिराने का दावा किया है, जबकि अदन में राष्ट्रपति भवन परिसर और हवाई अड्डे पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागे जाने की खबर है। हालांकि, हूती प्रवक्ता ने सऊदी अरब की ओर ड्रोन भेजने के आरोपों को खारिज किया है।

    हूतियों के खिलाफ लड़ रहे सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने शुक्रवार को बताया कि उसने मदीना क्षेत्र के ऊपर एक ड्रोन को रोककर नष्ट कर दिया। मदीना में पैगंबर मोहम्मद की मस्जिद (मस्जिद-ए-नबवी) स्थित है, जो इस्लाम के सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों में से एक है। इससे पहले गठबंधन ने मक्का क्षेत्र में भी एक ड्रोन को रोकने की जानकारी दी थी।

    अदन में राष्ट्रपति महल और हवाई अड्डे पर मिसाइलें

    एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक, हूतियों ने दो मिसाइलों से अदन स्थित राष्ट्रपति महल को निशाना बनाया। यमन सरकार के एक सैन्य प्रवक्ता ने भी बताया कि शुक्रवार को अदन हवाई अड्डे और अल-माशीक राष्ट्रपति महल परिसर पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया गया। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि मिसाइलें अपने लक्ष्य पर लगीं या नहीं। हमले में किसी के हताहत होने या नुकसान की भी पुष्टि नहीं हुई है।

    दो प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि उन्होंने राष्ट्रपति महल परिसर की ओर एम्बुलेंस जाते देखीं। इस परिसर में कई इमारतें हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इससे कुछ समय पहले शहर में दो धमाकों की आवाज भी सुनाई दी थी।

    दक्षिणी बंदरगाह शहर अदन यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का प्रमुख केंद्र है। वर्ष 2014 में हूतियों ने इस सरकार को राजधानी सना से बाहर कर दिया था। इसके बाद से यमन में संघर्ष जारी है और जुलाई में लड़ाई तेज होने के बाद अदन को लगातार हमलों का सामना करना पड़ रहा है।

    शुक्रवार के मिसाइल हमलों से पहले बुधवार को भी हूतियों ने अदन हवाई अड्डे को निशाना बनाया था। इस हमले से पहले संगठन ने लोगों को हवाई अड्डे से दूर चले जाने की चेतावनी दी थी। यह हवाई अड्डा दक्षिणी यमन में मानवीय सहायता पहुंचाने के लिहाज से एक महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है।

    मक्का और मदीना के धार्मिक महत्व के कारण बढ़ी चिंता

    मक्का में ग्रैंड मस्जिद (मस्जिद अल-हरम) और काबा स्थित हैं, जबकि मदीना में पैगंबर की मस्जिद यानी मस्जिद-ए-नबवी है। इस्लाम में दोनों शहरों का विशेष धार्मिक महत्व है। यहां हर साल बड़ी संख्या में तीर्थयात्री और आगंतुक पहुंचते हैं।

    सऊदी अरब पहले भी हूतियों पर मक्का और मदीना के आसपास हमले की कोशिश करने का आरोप लगा चुका है। सितंबर में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने दावा किया था कि उसने मक्का के दक्षिण में एक ड्रोन को रोककर नष्ट किया। गठबंधन के मुताबिक, यह ड्रोन मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा था। उसने इसे मक्का को निशाना बनाने की हूतियों की दूसरी कोशिश बताया था।

    हूतियों ने आरोपों को किया खारिज

    हूती संगठन ने मक्का और मदीना को निशाना बनाने के आरोपों को बार-बार खारिज किया है। उसका कहना है कि उसके सैन्य अभियान सऊदी अरब के सैन्य ठिकानों और ऊर्जा बुनियादी ढांचे तक सीमित हैं।

    शुक्रवार को हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर सऊदी अरब की ओर ड्रोन भेजने के आरोपों को झूठा बताया। उन्होंने कहा कि संगठन ने सऊदी क्षेत्र के खिलाफ कोई सैन्य अभियान नहीं चलाया है। उनके मुताबिक, हूतियों के हमलों का निशाना केवल सऊदी अरब के तेल ठिकाने और सैन्य अड्डे रहे हैं। हूतियों ने सऊदी अरब पर हमलों के झूठे दावे गढ़ने का आरोप भी लगाया है।

  • मक्का पैक्ट से बदल सकते हैं मध्य पूर्व के समीकरण, IMEC को लेकर भारत के सामने उभरी नई रणनीतिक चुनौती

    मक्का पैक्ट से बदल सकते हैं मध्य पूर्व के समीकरण, IMEC को लेकर भारत के सामने उभरी नई रणनीतिक चुनौती

    नई दिल्ली ।मध्य पूर्व में बदलते रणनीतिक समीकरणों के बीच तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच उभर रहा मक्का पैक्ट अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। इस समझौते को क्षेत्रीय सुरक्षा और सहयोग की नई व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, इसके साथ भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे यानी IMEC की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मक्का पैक्ट और IMEC के पीछे क्षेत्रीय प्रभाव तथा संपर्क मार्गों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण काम कर रहे हैं। हालांकि, इसे सीधे तौर पर IMEC को रोकने के लिए बनाया गया गठबंधन मानने के पर्याप्त आधार अभी स्पष्ट नहीं हैं।

    IMEC में भारत के साथ संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन, इजरायल और यूरोपीय देशों की भागीदारी की परिकल्पना है। इस आर्थिक गलियारे का उद्देश्य भारत को मध्य पूर्व के रास्ते यूरोप से जोड़ना है। इसके तहत समुद्री और रेल संपर्क के माध्यम से व्यापार तथा परिवहन को बेहतर बनाने की योजना है। दूसरी ओर, मक्का पैक्ट से जुड़े क्षेत्रीय संपर्क और सुरक्षा सहयोग को लेकर अलग तरह की रणनीतिक चर्चाएं सामने आ रही हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम में तुर्की की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। IMEC की प्रस्तावित रूपरेखा में तुर्की को शामिल नहीं किया गया है। इस कारण क्षेत्रीय संपर्क व्यवस्था में उसकी स्थिति को लेकर पहले भी चर्चा होती रही है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन की क्षेत्रीय नीतियों और मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों को भी इस संदर्भ में देखा जा रहा है।

    अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों के कुछ विशेषज्ञों ने मक्का पैक्ट और IMEC के बीच संभावित प्रतिस्पर्धा का विश्लेषण किया है। उनका कहना है कि इस क्षेत्र में बन रही नई व्यवस्था को केवल आर्थिक गलियारों या रक्षा सहयोग तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे क्षेत्रीय नेतृत्व, व्यापारिक संपर्क और राजनीतिक प्रभाव जैसे कई मुद्दे जुड़े हुए हैं।

    मक्का रक्षा समझौते के तहत तीनों देशों ने सामूहिक रक्षा और सैन्य सहयोग को मजबूत करने पर सहमति जताई है। समझौते की एक प्रमुख शर्त के अनुसार, किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला बाकी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। इसमें खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, रक्षा उद्योग में सहयोग, संयुक्त हथियार निर्माण और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में साझेदारी जैसे विषय भी शामिल हैं। हालांकि, इस व्यवस्था की वास्तविक भूमिका और प्रभाव को लेकर आगे के घटनाक्रम महत्वपूर्ण होंगे।

    इस रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम 15 अक्टूबर को अजरबैजान की राजधानी बाकू में देखने को मिला। एक क्षेत्रीय सम्मेलन के दौरान इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने संबोधन शुरू किया तो तुर्की के विदेश मंत्री हकन फिदान कार्यक्रम से बाहर चले गए। उनके साथ ईरान, पाकिस्तान, कुवैत, सऊदी अरब और फिलिस्तीनी प्राधिकरण के कुछ अधिकारी भी बाहर निकल गए। हालांकि, अजरबैजान के अधिकारी कार्यक्रम में मौजूद रहे।

    इस घटनाक्रम में मध्य एशिया के पांच देशों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उनके प्रतिनिधि सम्मेलन में मौजूद रहे और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव ने इजरायली राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय बैठक भी की। इससे संकेत मिला कि मध्य एशिया के देश तुर्की की क्षेत्रीय प्राथमिकताओं से अलग अपने कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों को भी महत्व दे रहे हैं।

    मध्य पूर्व में अमेरिका की भूमिका को लेकर भी चर्चा हो रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय देश अब अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अधिक स्वतंत्र विकल्प तलाश रहे हैं। ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन से जुड़ी एसली आयदिनताशबाश ने मक्का पैक्ट को अमेरिका के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था विकसित करने की दिशा में एक शुरुआती प्रयोग के रूप में देखा है। वहीं, सोनार कागाप्टे ने समझौते में शामिल नहीं किए गए देशों के आधार पर इसके रणनीतिक उद्देश्य समझने की बात कही है।

    इस चर्चा में भारत, ईरान और इजरायल को तीन महत्वपूर्ण देशों के रूप में देखा जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि इन देशों को नई क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था से बाहर रखने की रणनीति हो सकती है। हालांकि, यह सभी विशेषज्ञों की एक समान राय नहीं है। मक्का पैक्ट को लेकर अलग-अलग आकलन मौजूद हैं और इसके वास्तविक प्रभाव का पता आगे के फैसलों तथा सदस्य देशों के आपसी सहयोग से ही चलेगा।

    भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी है क्योंकि IMEC में सऊदी अरब शामिल है, जबकि मक्का पैक्ट में भी उसकी प्रमुख भूमिका है। ऐसे में रियाद के सामने सुरक्षा सहयोग और आर्थिक संपर्क परियोजनाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती हो सकती है। फिलहाल दोनों व्यवस्थाओं के बीच सीधा टकराव तय नहीं है। आने वाले समय में मध्य एशिया, दक्षिण काकेशस और खाड़ी क्षेत्र के देशों के फैसले यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि क्षेत्रीय व्यापार और सुरक्षा का नया ढांचा किस दिशा में आगे बढ़ता है।

  • तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं के बीच कई देशों में आपातकालीन तैयारी पर जोर, नागरिकों को जरूरी सामान जुटाने की सलाह

    तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं के बीच कई देशों में आपातकालीन तैयारी पर जोर, नागरिकों को जरूरी सामान जुटाने की सलाह


    नई दिल्ली ।
    दुनिया के कई देशों में संभावित आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए नागरिकों को पहले से तैयार रहने की सलाह दी जा रही है। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और यूरोप के कई देशों ने लोगों से घरों में पर्याप्त भोजन, पीने का पानी, जरूरी दवाएं और अन्य आवश्यक वस्तुएं रखने पर जोर दिया है। इन तैयारियों का उद्देश्य किसी संकट के दौरान सामान्य आपूर्ति व्यवस्था बाधित होने पर लोगों को शुरुआती दिनों में जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

    जर्मनी, नॉर्वे, फिनलैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, आयरलैंड, स्वीडन, चेकिया और लिथुआनिया सहित कई देशों में आपातकालीन तैयारियों को लेकर जागरूकता बढ़ाई जा रही है। यूरोपीय संघ भी संकट प्रबंधन और नागरिकों की तैयारी को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है। सरकारों की इन सलाहों में प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ साइबर हमले, बिजली संकट और संभावित सैन्य संघर्ष जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया है।

    अलग-अलग देशों में जरूरी सामान जमा रखने की अवधि को लेकर अलग-अलग सुझाव दिए गए हैं। कुछ देशों में कम से कम तीन दिन की जरूरतों के लिए तैयारी करने को कहा गया है, जबकि अन्य जगहों पर सात से दस दिनों तक का भोजन, पानी और दवाएं उपलब्ध रखने पर जोर दिया जा रहा है। इसका मकसद यह है कि किसी आपात स्थिति में बाजार, परिवहन या अन्य आपूर्ति सेवाएं प्रभावित होने पर परिवारों को तत्काल परेशानी का सामना न करना पड़े।

    अमेरिका में भी आपातकालीन तैयारियों को लेकर चर्चा हो रही है। हालांकि, सैन्य ठिकानों को 90 दिनों तक बाहरी आपूर्ति पर निर्भरता कम रखते हुए काम करने में सक्षम बनाने की योजना का उल्लेख नागरिकों के लिए 90 दिनों का राशन जमा करने के निर्देश के रूप में नहीं किया जा सकता। सैन्य प्रतिष्ठानों की यह तैयारी रक्षा व्यवस्था से संबंधित है और इसे आम नागरिकों के लिए जारी किसी समान निर्देश से अलग समझना जरूरी है।

    ब्रिटेन ने अपने ‘बी रेडी’ अभियान के माध्यम से नागरिकों को आपातकालीन परिस्थितियों के लिए जरूरी सामान तैयार रखने की सलाह दी है। इस तैयारी में पीने का पानी, लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाला भोजन, आवश्यक दवाएं, टॉर्च, अतिरिक्त बैटरियां, रेडियो, पावर बैंक और कुछ नकदी शामिल हैं। इसका उद्देश्य यह है कि बिजली, संचार या अन्य सार्वजनिक सेवाएं बाधित होने की स्थिति में लोग कुछ समय तक अपनी बुनियादी जरूरतें खुद पूरी कर सकें।

    जापान में भी आपदा प्रबंधन और नागरिकों की तैयारी को विशेष महत्व दिया जा रहा है। भूकंप की आशंका और उसके बाद बिजली, पानी तथा परिवहन सेवाओं में संभावित रुकावट को ध्यान में रखते हुए लोगों को कम से कम तीन दिन और संभव हो तो एक सप्ताह तक के जरूरी सामान का इंतजाम रखने की सलाह दी जाती है। जापान में प्राकृतिक आपदाओं के दौरान आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने की संभावना को देखते हुए ऐसी तैयारियों को नागरिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

    इन देशों में बढ़ती सतर्कता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के तीसरे विश्व युद्ध को लेकर दिए गए बयान ने भी अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चर्चाओं को ध्यान आकर्षित किया है। हालांकि, विभिन्न देशों की ओर से जारी आपातकालीन तैयारियों की सलाह को सीधे तौर पर विश्व युद्ध की शुरुआत या किसी निश्चित सैन्य टकराव का संकेत नहीं माना जा सकता। इन निर्देशों का दायरा प्राकृतिक आपदाओं से लेकर तकनीकी और सुरक्षा संबंधी संकटों तक फैला हुआ है।

    सरकारों की चिंता केवल युद्ध तक सीमित नहीं है। बाढ़, भीषण मौसम, भूकंप, लंबे समय तक बिजली गुल रहने, इंटरनेट सेवाओं में रुकावट और साइबर हमलों जैसी घटनाएं भी जनजीवन को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में खाद्य सामग्री की आपूर्ति, पेयजल उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाओं और संचार व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। पहले से जरूरी सामान रखने से परिवारों को संकट के शुरुआती दौर में राहत मिल सकती है।

    आपातकालीन तैयारी को लेकर अलग-अलग देशों के निर्देशों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अंतर है। इसलिए नागरिकों को अपने देश और क्षेत्र में जारी आधिकारिक दिशा-निर्देशों के मुताबिक तैयारी करने की सलाह दी जाती है। कुल मिलाकर, कई देशों में नागरिक सुरक्षा को लेकर बढ़ता जोर इस बात को दर्शाता है कि सरकारें अब केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने के बजाय लोगों को पहले से तैयार करने पर भी ध्यान दे रही हैं।

  • इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की अग्निपरीक्षा, गाजा और ईरान युद्ध के बीच विपक्ष ने बढ़ाई सत्ता की चुनौती..

    इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की अग्निपरीक्षा, गाजा और ईरान युद्ध के बीच विपक्ष ने बढ़ाई सत्ता की चुनौती..

    नई दिल्ली ।इजरायल में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव के लिए मतदान कराया गया। इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 2023 में हमास के हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए सैन्य अभियान के साथ ईरान के साथ संघर्ष को संभालने के तरीके को लेकर नेतन्याहू की सरकार की आलोचना होती रही है। ऐसे में चुनाव के परिणाम देश की राजनीति और आने वाली सरकार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

    इस चुनाव में करीब 73 लाख मतदाता मतदान के पात्र थे। नेतन्याहू के सामने पूर्व सैन्य प्रमुख और मध्यमार्गी नेता गादी आइजेनकोट प्रमुख चुनौती के रूप में मैदान में हैं। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी उनके राजनीतिक गठबंधन को चुनौती दे रहे हैं। चुनाव से पहले हुए सर्वेक्षणों में दोनों पक्षों के बीच कड़ी टक्कर के संकेत मिले थे। हालांकि, इजरायल की गठबंधन आधारित राजनीतिक व्यवस्था के कारण किसी एक दल या गठबंधन के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

    77 वर्षीय बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। उनके समर्थक सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर उनके नेतृत्व को महत्वपूर्ण मानते हैं। वहीं, आलोचक 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले को रोकने में हुई विफलताओं, युद्ध से जुड़े फैसलों और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर उनकी सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं। चुनाव में इन मुद्दों का असर राजनीतिक दलों के प्रदर्शन पर पड़ सकता है।

    गादी आइजेनकोट इजरायल डिफेंस फोर्सेज के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। वह याशर पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं और खुद को नेतन्याहू के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी विपक्षी खेमे में सक्रिय हैं। उनके नेतृत्व वाले बी’याचद गठबंधन में पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड की येश अतीद पार्टी भी शामिल है। इस तरह नेतन्याहू के सामने अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं का संयुक्त मुकाबला है।

    चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू के समर्थन में बयान दिया था। सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि नेतन्याहू ने कठिन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री के रूप में अच्छा काम किया है। नेतन्याहू ने भी अमेरिका और इजरायल के संबंधों को लेकर ट्रंप की प्रशंसा की थी। उन्होंने दोनों देशों के नेताओं के बीच असाधारण मित्रता होने की बात कही। चुनाव के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति का यह समर्थन भी राजनीतिक चर्चा का विषय रहा।

    इजरायल में संसदीय चुनाव की प्रक्रिया भारत से अलग है। यहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर मतदान होता है। पूरे देश को एक ही चुनाव क्षेत्र माना जाता है। मतदाता किसी व्यक्तिगत उम्मीदवार के बजाय राजनीतिक दल की सूची के पक्ष में वोट डालते हैं। इसी प्रक्रिया के जरिए संसद यानी नेसेट के 120 सदस्यों का चयन किया जाता है।

    संसद में प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए किसी राजनीतिक दल को कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध मत प्राप्त करना जरूरी है। इस व्यवस्था के कारण कई छोटे दल भी चुनाव में हिस्सा लेते हैं और संसद में उनकी मौजूदगी सरकार गठन के दौरान महत्वपूर्ण हो सकती है।

    इजरायल में सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय संसद में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाला दल अपने आप सरकार नहीं बना सकता। चुनाव के बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करते हैं और उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर देते हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की संभावना होती है।

    इसके बाद राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन बनाने को लेकर बातचीत होती है। यदि कोई दल या गठबंधन 61 सांसदों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। ऐसी स्थिति में छोटे दलों और गठबंधन सहयोगियों की भूमिका निर्णायक बन जाती है।

    इस चुनाव के परिणामों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रहेगी। नई सरकार की संरचना का असर इजरायल की सुरक्षा नीति, गाजा और ईरान से जुड़े क्षेत्रीय संघर्षों तथा अमेरिका सहित अन्य देशों के साथ उसके संबंधों पर पड़ सकता है। अंतिम राजनीतिक तस्वीर मतदान के परिणाम और उसके बाद होने वाली गठबंधन वार्ताओं से स्पष्ट होगी।

  • आर्मेनिया की संसद में बहस के दौरान भिड़े सत्ता पक्ष और विपक्षी सांसद, लात-घूंसे चले और कुर्सियां तक फेंकी गईं

    आर्मेनिया की संसद में बहस के दौरान भिड़े सत्ता पक्ष और विपक्षी सांसद, लात-घूंसे चले और कुर्सियां तक फेंकी गईं

    नई दिल्ली ।आर्मेनिया की संसद में 29 अक्टूबर को एक बहस के दौरान ऐसा हंगामा हुआ कि सदन की कार्यवाही हिंसक झड़प में बदल गई। सत्ताधारी सिविल कॉन्ट्रैक्ट पार्टी और विपक्षी स्ट्रॉन्ग आर्मेनिया गुट के सांसदों के बीच पहले तीखी बहस हुई और फिर मामला हाथापाई तक पहुंच गया। सदन के भीतर सांसद एक-दूसरे पर लात-घूंसे चलाते और धक्का-मुक्की करते नजर आए। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि संसद का मुख्य हॉल ही नहीं, बल्कि गलियारा भी झगड़े का मैदान बन गया। इस पूरी घटना का सीधा प्रसारण हो रहा था, जिसके कारण देशभर के लोगों ने सांसदों के बीच हुई मारपीट के दृश्य देखे।

    बताया गया कि विवाद की शुरुआत ऑडिट चैंबर के एक सदस्य की नियुक्ति को लेकर हो रही चर्चा के दौरान हुई। उस समय सत्ताधारी दल के सांसद तारोन चाखोयान अपनी बात रख रहे थे। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने विपक्षी नेता नारेक करापेत्यान के एक रिश्तेदार से जुड़ी पुरानी विवादित टिप्पणी का उल्लेख किया। चाखोयान के अनुसार, करापेत्यान के चचेरे भाई ने पहले विपक्ष के सत्ता में आने की स्थिति में महिलाओं को संतुष्ट करने के लिए अलग मंत्रालय बनाने का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित व्यक्ति ने इस बयान के लिए अब तक माफी नहीं मांगी है।

    चाखोयान की इस टिप्पणी पर नारेक करापेत्यान ने अपनी सीट से ही विरोध जताना शुरू कर दिया। उन्होंने बयान को आपत्तिजनक बताया। कुछ ही देर में दोनों पक्षों के बीच बहस और तेज हो गई। इसके बाद करापेत्यान अपनी सीट से उठकर मंच की ओर बढ़ने लगे। इसी दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के कई सांसद भी अपनी जगह से उठकर एक-दूसरे की तरफ बढ़े और देखते ही देखते हाथापाई शुरू हो गई।

    शुरुआत में सांसदों के बीच धक्का-मुक्की हुई, लेकिन जल्द ही स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। दोनों पक्षों के सदस्य एक-दूसरे को पकड़कर नीचे गिराने लगे। इस दौरान लात और घूंसे भी चले। संसद के उपाध्यक्ष वहागन अलेक्सान्यान को भी विपक्षी सांसदों की तरफ कुर्सी फेंकते हुए देखा गया। घटनास्थल के वीडियो में कई सांसदों को कुर्सियां उठाते और एक-दूसरे पर हमला करते देखा जा सकता है।

    सदन के भीतर शुरू हुआ विवाद कुछ समय बाद संसद भवन के गलियारे तक पहुंच गया। वहां भी दोनों पक्षों के सांसदों के बीच धक्का-मुक्की और कहासुनी जारी रही। सुरक्षाकर्मियों तथा अन्य सदस्यों ने कई बार हस्तक्षेप कर दोनों गुटों को अलग करने की कोशिश की, लेकिन तनाव कम नहीं हुआ। इस दौरान कुछ सांसदों के कपड़े फट गए और कई लोगों को चोटें आईं।

    घटना के बाद संसद भवन में एम्बुलेंस बुलाई गई। विपक्षी गुट स्ट्रॉन्ग आर्मेनिया के सांसद एंड्रानिक गेवोरग्यान की नाक से खून बहता दिखाई दिया, जबकि उनके साथी सांसद रूबेन मखितारयान के कपड़े फटे हुए थे। अन्य कुछ सांसदों को भी मामूली चोटें आने की जानकारी सामने आई। दोबारा टकराव की आशंका को देखते हुए सुरक्षाकर्मियों ने संसद के गलियारे में दोनों पक्षों के बीच अवरोध लगाया, ताकि सदस्य फिर आमने-सामने न आ सकें।

    संसद के स्पीकर रूबेन रुबिनयान ने घटना के बाद नारेक करापेत्यान को झड़प के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि उन्होंने ब्रेक के दौरान हुई बातचीत का वीडियो देखा था और उनके अनुसार तारोन चाखोयान के भाषण में ऐसी कोई बात नहीं थी, जिसे आपत्तिजनक माना जाए। स्पीकर ने आरोप लगाया कि करापेत्यान ने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रखा और सीट से विरोध जताने के बाद उठकर चाखोयान पर हमला करने की कोशिश की। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी सांसद गार्निक दावत्यान ने भी चाखोयान पर हमला किया था।

    रुबिनयान ने स्पष्ट किया कि उन्होंने जानबूझकर संसद की लाइव स्ट्रीमिंग बंद नहीं कराई, ताकि आम लोग सदन के भीतर चल रही घटनाओं को देख सकें। इससे पहले अक्टूबर महीने में भी सिविल कॉन्ट्रैक्ट और विपक्षी सांसदों के बीच विवाद हो चुका था। उस समय स्ट्रॉन्ग आर्मेनिया के सांसद एडगर गाजरियन ने स्पीकर पर सांसदों को बोनस देने के लिए सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप लगाया था। उस मामले में भी दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस और तनाव देखने को मिला था।

  • जुकरबर्ग और काइली जेनर के गुप्त ठिकानों की चर्चा, 12 गुना बढ़ी बंकरों की मांग, आखिर किस खतरे से डर रहे अमीर?

    जुकरबर्ग और काइली जेनर के गुप्त ठिकानों की चर्चा, 12 गुना बढ़ी बंकरों की मांग, आखिर किस खतरे से डर रहे अमीर?


    नई दिल्ली। दुनिया के सबसे अमीर और प्रभावशाली लोग अब केवल आलीशान महलों और महंगी संपत्तियों तक सीमित नहीं रहना चाहते। संभावित युद्ध परमाणु हमले प्राकृतिक आपदाओं और वैश्विक अस्थिरता जैसी आशंकाओं के बीच कई अरबपति जमीन के नीचे सुरक्षित ठिकाने तैयार करवा रहे हैं। इन ठिकानों को आधुनिक बंकर का नाम दिया जा रहा है लेकिन इनकी बनावट किसी साधारण भूमिगत शरणस्थल जैसी नहीं है। इनमें आराम और विलासिता की ऐसी सुविधाएं जुटाई जा रही हैं जो किसी पांच सितारा होटल या आलीशान रिसॉर्ट को भी टक्कर दे सकती हैं। इस बढ़ते चलन ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुनिया के अमीरों को किसी बड़ी तबाही का अंदेशा है या वे केवल भविष्य की अनिश्चितताओं से निपटने की तैयारी कर रहे हैं।

    इस चर्चा में फेसबुक की मूल कंपनी मेटा के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग का नाम भी सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक हवाई में उनके विशाल परिसर के भीतर करीब 5000 वर्ग फीट का भूमिगत बंकर बनाए जाने की चर्चा है। इसे संभावित आपात स्थिति में सुरक्षित ठिकाने के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि इस तरह की परियोजनाओं से जुड़ी सभी जानकारियों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। इसी तरह रियलिटी टीवी स्टार और कारोबारी काइली जेनर के लॉस एंजिल्स स्थित घर में भी भूमिगत सुरक्षित ठिकाना तैयार कराने की खबरें सामने आई हैं।

    इन बंकरों की खास बात यह है कि इन्हें केवल जान बचाने के लिए बनाए जाने वाले बंद कमरों की तरह नहीं देखा जा रहा है। आधुनिक तकनीक और आलीशान सुविधाओं के साथ इन्हें लंबे समय तक रहने लायक बनाया जा रहा है। इनमें स्विमिंग पूल जिम आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं और आरामदायक रहने की व्यवस्था जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं। यानी किसी बड़ी आपदा या संकट की स्थिति में भी इनके मालिकों को रोजमर्रा की सुविधाओं और आराम से समझौता न करना पड़े।

    इस कारोबार में बढ़ती दिलचस्पी का अंदाजा एक वास्तुकला फर्म के दावे से लगाया जा सकता है। फर्म के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में भूमिगत बंकरों को लेकर पूछताछ में करीब 12 गुना वृद्धि हुई है। यह आंकड़ा बताता है कि सुरक्षित भूमिगत ठिकानों की मांग अब केवल कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित नहीं रह गई है। आर्थिक रूप से सक्षम लोग भविष्य के संभावित खतरों को ध्यान में रखते हुए ऐसी परियोजनाओं में रुचि दिखा रहे हैं।

    आखिर इन बंकरों की मांग इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है। इसके पीछे कई संभावित कारण माने जा रहे हैं। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बढ़ते भू राजनीतिक तनाव युद्ध की आशंकाएं परमाणु हथियारों का खतरा और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी प्राकृतिक आपदाएं लोगों की चिंता बढ़ा रही हैं। इसके अलावा महामारी और तकनीकी व्यवस्था में बड़े व्यवधान जैसी परिस्थितियों ने भी आपातकालीन तैयारी के महत्व को चर्चा में ला दिया है। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि बंकर बनवाने वाले सभी लोग किसी निश्चित प्रलय या विनाश की आशंका से ऐसा कर रहे हैं।

    दरअसल अरबपतियों के लिए संपत्ति की सुरक्षा के साथ अपनी और परिवार की सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है। जमीन के नीचे तैयार किए जा रहे ये ठिकाने इसी सोच का हिस्सा हो सकते हैं। दूसरी ओर इनकी बढ़ती मांग ने सुरक्षा और विलासिता के नए बाजार को भी जन्म दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि बंकर बनाने का यह चलन केवल अमीरों तक सीमित रहता है या आम लोगों के बीच भी आपातकालीन सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाता है। फिलहाल इतना साफ है कि दुनिया के कुछ सबसे संपन्न लोग भविष्य की अनिश्चितताओं के लिए जमीन के नीचे अपनी अलग दुनिया तैयार करने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

  • ईरान के पास पहुंचा जेडी वेंस का शांति संदेश, तेहरान की चुप्पी ने बढ़ाई दुनिया की चिंता, क्या खत्म होगा अमेरिका से युद्ध?

    ईरान के पास पहुंचा जेडी वेंस का शांति संदेश, तेहरान की चुप्पी ने बढ़ाई दुनिया की चिंता, क्या खत्म होगा अमेरिका से युद्ध?


    नई दिल्ली। अमेरिका (America)और ईरान (Iran)के बीच जारी युद्ध को समाप्त करने की कोशिशों के बीच कूटनीतिक हलचल (Diplomatic activity)एक बार फिर तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Donald Trump)के निर्देश पर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान के सुरक्षा प्रमुख मोहसेन रेजाई को एक पत्र भेजा है। इस पत्र के जरिए दोनों देशों के बीच बातचीत दोबारा शुरू करने और सैन्य टकराव रोकने की संभावनाएं तलाशने की कोशिश की गई है। ईरानी मीडिया के अनुसार तेहरान को यह पत्र मिल चुका है लेकिन अभी तक ईरान की ओर से कोई आधिकारिक जवाब नहीं दिया गया है। ऐसे में पूरी दुनिया की निगाहें अब ईरान के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।

    समाचार एजेंसी तस्नीम ने एक सूत्र के हवाले से बताया है कि ईरान को अमेरिकी उपराष्ट्रपति का पत्र प्राप्त हो गया है। हालांकि तेहरान ने फिलहाल इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक जेडी वेंस ने राष्ट्रपति ट्रंप के निर्देश पर यह संदेश भेजा है। इसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच संवाद का रास्ता खोलना और अमेरिका की ओर से संभावित नए सैन्य हमलों को रोकने की संभावनाओं पर चर्चा करना है। फिलहाल यह पहल किसी अंतिम शांति समझौते की शर्तें तय करने के बजाय बातचीत की रूपरेखा तैयार करने पर केंद्रित बताई जा रही है।

    अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी। उस दिन अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर ईरान पर हवाई हमले किए थे। इन हमलों में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई वरिष्ठ सैन्य कमांडरों की मौत हो गई थी। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इस्राइल और पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। धीरे-धीरे यह संघर्ष व्यापक रूप लेता गया और क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ता चला गया।

    युद्ध का सबसे बड़ा असर होर्मुज जलडमरूमध्य पर देखने को मिला। ईरान ने इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते से व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही पर सख्त पाबंदियां लगा दीं। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी कर दी। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल है। वैश्विक तेल खपत का करीब पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

    ईरान ने इस समुद्री रास्ते को दोबारा खोलने और युद्ध समाप्त करने के लिए अमेरिका के सामने सात शर्तें रखी हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि इस संबंध में मध्यस्थों के साथ बातचीत जारी है। तेहरान की प्रमुख मांगों में पूरे क्षेत्र में युद्धविराम लागू करना और विदेशों में जमा ईरानी संपत्तियों पर लगी रोक हटाना शामिल है। इसके अलावा ईरान अपने तेल उद्योग पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध खत्म करने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी तत्काल हटाने की मांग भी कर रहा है।

    ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी ओर से तय किए गए सख्त ढांचे को कमजोर करने वाली किसी भी स्थिति को स्वीकार नहीं किया जाएगा। इससे साफ है कि तेहरान बातचीत के लिए तैयार होने के बावजूद अपनी शर्तों पर पीछे हटने के मूड में नहीं है। दूसरी ओर अमेरिका की पहल से कूटनीतिक समाधान की उम्मीद जरूर जगी है लेकिन ईरान की चुप्पी ने स्थिति को अनिश्चित बना दिया है।

    अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ईरान अमेरिकी प्रस्ताव पर सकारात्मक जवाब देगा या दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव और बढ़ेगा। यदि बातचीत आगे बढ़ती है तो पश्चिम एशिया में शांति की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है। लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य और आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद बने रहे तो समझौते की राह मुश्किल हो सकती है। फिलहाल दुनिया को तेहरान के जवाब और वाशिंगटन के अगले कदम का इंतजार है।

  • हनी ट्रैप का जाल या चीन की जासूसी चाल, Nvidia CEO जेन्सेन हुआंग को लेकर अमेरिकी एजेंसियों का बड़ा शक

    हनी ट्रैप का जाल या चीन की जासूसी चाल, Nvidia CEO जेन्सेन हुआंग को लेकर अमेरिकी एजेंसियों का बड़ा शक


    नई दिल्ली। दुनिया की दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनी एनवीडिया के सीईओ जेन्सेन हुआंग को लेकर अमेरिका में एक बड़ा जासूसी विवाद सामने आया है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के हवाले से आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीनी मूल की एक महिला ने हुआंग के साथ करीबी संबंध बनाकर कंपनी से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां चीन तक पहुंचाने की कोशिश की। इस पूरे मामले को हनी ट्रैप और आर्थिक जासूसी से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और मामले में किसी आधिकारिक निष्कर्ष की जानकारी सामने आना अभी बाकी है।

    रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में ऐलिस हुआंग नाम की महिला का जिक्र किया गया है। बताया गया है कि वह सिंगापुर की क्लाउड डेटा सेंटर कंपनी मेगास्पीड में शीर्ष कार्यकारी पद पर काम कर रही थी। अमेरिकी अधिकारियों को पहले से ही इस कंपनी की गतिविधियों पर संदेह था। जांच एजेंसियों को आशंका थी कि मेगास्पीड अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार कर एनवीडिया के उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI चिप्स चीन तक पहुंचाने में भूमिका निभा रही है। इसी संदेह के आधार पर अमेरिकी वाणिज्य विभाग कंपनी की गतिविधियों की जांच कर रहा था।

    बताया गया है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने जब ऐलिस हुआंग की गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाई तो उसके कथित चीनी खुफिया संपर्कों को लेकर संदेह गहराया। इसी दौरान जांच में यह दावा सामने आया कि महिला ने एनवीडिया के सीईओ जेन्सेन हुआंग के साथ करीबी संबंध स्थापित किए थे। अमेरिकी एजेंसियों को आशंका थी कि इन संबंधों का इस्तेमाल कंपनी से जुड़ी महत्वपूर्ण व्यावसायिक और तकनीकी जानकारियां हासिल करने के लिए किया जा सकता है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में कौन सी गोपनीय जानकारी हासिल की गई और क्या कोई जानकारी चीन तक पहुंचाई भी गई थी।

    इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका को लेकर भी चर्चा हो रही है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप को करीब एक साल पहले ही इस खुफिया जानकारी से अवगत करा दिया गया था। इसके बावजूद मामले में तत्काल कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई। बताया गया है कि अमेरिकी प्रशासन को आशंका थी कि एनवीडिया के कारोबार पर किसी तरह की सख्ती का असर शेयर बाजार और अमेरिकी टेक्नोलॉजी उद्योग पर पड़ सकता है। इसके अलावा चीन के साथ पहले से संवेदनशील संबंधों में और तनाव बढ़ने की संभावना भी एक चिंता थी।

    दरअसल एनवीडिया के AI चिप्स इस समय वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा के केंद्र में हैं। इन चिप्स का इस्तेमाल सुपर कंप्यूटर से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल और बड़े डेटा सेंटर तक में किया जाता है। अमेरिका चीन को उन्नत सेमीकंडक्टर तकनीक की आपूर्ति सीमित करने के लिए कई प्रतिबंध लगा चुका है। अमेरिकी सरकार की चिंता है कि अत्याधुनिक चिप्स चीन की तकनीकी और सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने में इस्तेमाल हो सकते हैं। ऐसे में किसी तीसरी कंपनी के माध्यम से इन चिप्स की आपूर्ति होने का संदेह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय बन जाता है।

    इस मामले ने एक बार फिर वैश्विक तकनीकी कंपनियों की सुरक्षा और कॉर्पोरेट जासूसी के खतरे को चर्चा में ला दिया है। यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो इसका असर अमेरिका और चीन के तकनीकी संबंधों के साथ सेमीकंडक्टर कारोबार पर भी पड़ सकता है। फिलहाल इस पूरे प्रकरण में सामने आए दावों और आधिकारिक जांच के निष्कर्षों के बीच अंतर समझना जरूरी है।

  • सुपर अल नीनो से भारत की आर्थिक विकास दर को खतरा, फसल उत्पादन घटेगा और महंगाई बढ़ेगीः IMF

    सुपर अल नीनो से भारत की आर्थिक विकास दर को खतरा, फसल उत्पादन घटेगा और महंगाई बढ़ेगीः IMF


    न्यूयार्क।
    भारत (India) की आर्थिक विकास दर (Economic Growth Rate) को लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund- IMF) ने सुपर अल नीनो (Super El Niño) के संभावित खतरे के प्रति आगाह किया है। IMF के मुताबिक, मौसम में होने वाले इस बदलाव से फसलों का उत्पादन घट सकता है, खाद्य महंगाई बढ़ सकती है और आम लोगों की खरीदारी करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।


    जनवरी में भारत की ग्रोथ का दोबारा आकलन करेगा IMF

    IMF की कम्युनिकेशन डायरेक्टर जूली कोजैक ने गुरुवार को कहा कि भारत के सामने सुपर अल नीनो से जुड़े कुछ खतरे हैं, लेकिन अभी तक ये हकीकत में सामने नहीं आए हैं।

    जूली कोजैक ने कहा, “IMF जनवरी में जारी होने वाले अपने अगले वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (WEO) अपडेट में भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान की दोबारा समीक्षा करेगा। यह समीक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि मौसम से जुड़े जोखिम किस तरह सामने आते हैं।”


    भारत की GDP ग्रोथ 7% रहने का अनुमान

    बता दें IMF ने इसी महीने वित्त वर्ष 2026-27 और 2027-28 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7% कर दिया था। इससे पहले जुलाई में IMF ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.4% और वित्त वर्ष 2027-28 के लिए 6.7% ग्रोथ का अनुमान लगाया था।

    IMF के मुताबिक, भारत में घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है और सर्विस सेक्टर में भी अच्छी गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। यही वजह है कि मौसम से जुड़े संभावित खतरों के बावजूद भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान मजबूत बना हुआ है।


    क्या है सुपर अल नीनो और भारत को इससे क्या खतरा है?

    अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने से जुड़ी जलवायु संबंधी घटना है। इसका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है और भारत में मानसून की बारिश भी प्रभावित हो सकती है। अगर अल नीनो की स्थिति ज्यादा मजबूत होती है और बारिश में कमी आती है, तो इसका असर खेती और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।


    इसके तीन बड़े संभावित असर हैं

    1. फसल उत्पादन में गिरावट: बारिश कम होने से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
    2. खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी: अनाज, दालों और दूसरी खाने-पीने की चीजों की सप्लाई घटने पर कीमतें बढ़ सकती हैं।
    3. आम लोगों के बजट पर दबाव: खाने-पीने की चीजें महंगी होने से परिवारों की खरीदारी करने की क्षमता कम हो सकती है।

    हालांकि, इन आशंकाओं का मतलब यह नहीं है कि महंगाई या आर्थिक विकास पर असर पड़ना तय है। वास्तविक प्रभाव मौसम की स्थिति और कृषि उत्पादन में होने वाले बदलाव पर निर्भर करेगा।


    भारत की अर्थव्यवस्था पर रहेगी नजर

    IMF ने फिलहाल भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान में सुपर अल नीनो के संभावित असर को शामिल करके कोई नई कटौती नहीं की है। संगठन का कहना है कि घरेलू मांग और सर्विस सेक्टर की मजबूती से भारत की आर्थिक विकास दर को समर्थन मिल रहा है।