Category: International

  • 117 हस्तियों ने भारत-पाक वार्ता की उठाई मांग, संयुक्त राष्ट्र में भारत ने आतंकवाद पर पाकिस्तान को घेरा, वैश्विक कार्रवाई पर दिया जोर

    117 हस्तियों ने भारत-पाक वार्ता की उठाई मांग, संयुक्त राष्ट्र में भारत ने आतंकवाद पर पाकिस्तान को घेरा, वैश्विक कार्रवाई पर दिया जोर

    नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के संबंधों में संवाद बहाल करने की मांग को लेकर दोनों देशों की 117 प्रमुख हस्तियों द्वारा खुला पत्र जारी किए जाने के बीच संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर अपना स्पष्ट और सख्त रुख दोहराया है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कहा कि आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी लड़ाई तभी संभव है, जब सभी देश बिना किसी भेदभाव और दोहरे मानदंड के आतंकवाद तथा उसके समर्थकों के विरुद्ध समान रूप से कार्रवाई करें।

    संयुक्त राष्ट्र में भारत ने कहा कि आतंकवाद को किसी भी आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की सोच वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है। भारत ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद का कोई धर्म, सीमा या वैचारिक औचित्य नहीं होता और इससे निपटने के लिए एक समान वैश्विक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। केवल निंदा या औपचारिक बयान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि आतंकवादी गतिविधियों की योजना बनाने वालों, आर्थिक सहायता देने वालों और उन्हें संरक्षण प्रदान करने वालों तक कानून की पहुंच सुनिश्चित करनी होगी।

    भारत का यह रुख ऐसे समय सामने आया है, जब दुनिया के कई हिस्सों में सीमा पार आतंकवादी नेटवर्क और नई तकनीकों के दुरुपयोग को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। भारत ने कहा कि आधुनिक तकनीक ने आतंकवादी संगठनों की कार्यप्रणाली को पहले की तुलना में अधिक जटिल और संगठित बना दिया है। इसलिए वैश्विक सुरक्षा तंत्र को भी बदलती चुनौतियों के अनुरूप मजबूत और तकनीकी रूप से सक्षम बनाना समय की आवश्यकता है।

    भारत ने विशेष रूप से ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डीपफेक तकनीक, एन्क्रिप्टेड संचार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मैपिंग एप्लिकेशन और डार्क वेब के बढ़ते दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की। भारत का कहना है कि इन तकनीकों का इस्तेमाल कट्टरपंथ फैलाने, भर्ती अभियान चलाने, वित्तीय लेन-देन छिपाने और आतंकी गतिविधियों के समन्वय के लिए किया जा रहा है। ऐसे में सुरक्षित और विश्वसनीय डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है।

    भारत ने यह भी दोहराया कि आतंकवाद के वित्तपोषण पर प्रभावी रोक लगाए बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए देशों के बीच खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, वित्तीय निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पूरी तरह पालन करने की आवश्यकता बताई गई। भारत ने कहा कि किसी भी देश की भूमि का उपयोग आतंकवादी गतिविधियों के लिए सुरक्षित ठिकाने के रूप में नहीं होने दिया जाना चाहिए।

    इसी दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में सुधार तथा संवाद बहाल करने की मांग को लेकर दोनों देशों की 117 हस्तियों द्वारा जारी खुले पत्र ने भी राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में चर्चा को गति दी है। हालांकि भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन के माध्यम से यह स्पष्ट संकेत दिया कि आतंकवाद के मुद्दे पर उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं है और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस तथा निष्पक्ष वैश्विक कार्रवाई उसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल रहेगी। भारत का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग, तकनीकी सतर्कता और आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति ही वैश्विक शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी मार्ग है।

  • दोहा में अमेरिका-ईरान की अहम बातचीत, होर्मुज पर टकराव बरकरार; समुद्री मार्ग, प्रतिबंध और समझौते की शर्तों पर नहीं बनी सहमति

    दोहा में अमेरिका-ईरान की अहम बातचीत, होर्मुज पर टकराव बरकरार; समुद्री मार्ग, प्रतिबंध और समझौते की शर्तों पर नहीं बनी सहमति

    नई दिल्ली । कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और ईरान के बीच हुई ताजा वार्ता में होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ता तनाव चर्चा का सबसे अहम विषय रहा। दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार और प्रस्तावित व्यवस्था से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श किया, हालांकि बातचीत के बाद किसी ठोस सहमति या औपचारिक प्रगति की घोषणा नहीं की गई। इसके बावजूद इस बैठक को दोनों देशों के बीच संवाद बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    वार्ता के दौरान अमेरिकी प्रतिनिधियों ने ईरानी पक्ष को स्पष्ट संदेश दिया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर टोल लगाने की किसी भी योजना से व्यापक समझौते की संभावनाओं को नुकसान पहुंच सकता है। अमेरिकी पक्ष का तर्क रहा कि यदि भविष्य में आर्थिक प्रतिबंधों में राहत मिलती है और ईरान वैश्विक बाजार में अपने तेल तथा अन्य संसाधनों का निर्बाध निर्यात कर पाता है, तो उससे होने वाली आय किसी भी संभावित टोल व्यवस्था से कहीं अधिक लाभदायक होगी। अमेरिका ने ईरान से दीर्घकालिक आर्थिक हितों को प्राथमिकता देने की अपील भी की।

    बैठक में पिछले महीने हुए समझौता ज्ञापन की शर्तों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। दोनों देशों के बीच इस समझौते की व्याख्या और उसके क्रियान्वयन को लेकर मतभेद बने हुए हैं। अमेरिका का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसी रणनीतिक समुद्री धुरी से जुड़ी किसी भी नई व्यवस्था में खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों की सहमति और भागीदारी भी आवश्यक है। दूसरी ओर ईरान का कहना है कि संबंधित क्षेत्र उसके अधिकार क्षेत्र से जुड़ा विषय है और अंतिम निर्णय लेने का अधिकार उसी के पास होना चाहिए।

    वार्ता के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री गतिविधियों से जुड़े हालिया घटनाक्रम भी चर्चा का हिस्सा रहे। हाल के दिनों में होर्मुज के आसपास बढ़ी सैन्य गतिविधियों और व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ी है। नए समुद्री मार्गों के संचालन और क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार की सुरक्षा को लेकर कई देशों की चिंता और बढ़ा दी है।

    समझौता ज्ञापन के तहत निर्धारित 60 दिन की अवधि भी वार्ता का महत्वपूर्ण विषय रही। इस अवधि के पूरा होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रबंधन और वहां से गुजरने वाले जहाजों के संचालन को लेकर दोनों पक्षों की अलग-अलग व्याख्याएं सामने आ रही हैं। इसी कारण भविष्य की व्यवस्था को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। निर्धारित समय-सीमा के भीतर व्यापक समझौते तक पहुंचना दोनों देशों के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। दुनिया के ऊर्जा व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है, इसलिए यहां किसी भी प्रकार का तनाव अंतरराष्ट्रीय बाजार, तेल आपूर्ति और समुद्री परिवहन पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। ऐसे में दोहा में जारी संवाद को भविष्य के संभावित समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है, हालांकि कई संवेदनशील मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी कायम हैं।

  • ईरान के राजकीय शोक समारोह में भारत की मौजूदगी, महबूबा मुफ्ती ने स्वीकार किया निमंत्रण, कई वरिष्ठ नेताओं की भागीदारी तय

    ईरान के राजकीय शोक समारोह में भारत की मौजूदगी, महबूबा मुफ्ती ने स्वीकार किया निमंत्रण, कई वरिष्ठ नेताओं की भागीदारी तय

    नई दिल्ली । ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनयिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इसी क्रम में जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने ईरान सरकार की ओर से भेजा गया आधिकारिक निमंत्रण स्वीकार कर लिया है। उन्होंने पुष्टि की है कि वह अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए ईरान जाएंगी और दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगी।

    ईरान में अंतिम संस्कार और शोक संबंधी कार्यक्रम 4 जुलाई से 9 जुलाई तक तेहरान, कोम और मशहद में आयोजित किए जाएंगे। इन कार्यक्रमों में दुनिया के अनेक देशों के प्रतिनिधियों और राजनीतिक नेताओं के शामिल होने की संभावना है। ईरान ने भारत सहित कई देशों के प्रमुख नेताओं और प्रतिनिधियों को औपचारिक निमंत्रण भेजा है, ताकि वे राजकीय शोक समारोह में भाग लेकर संवेदना व्यक्त कर सकें।

    महबूबा मुफ्ती ने अपनी यात्रा की पुष्टि करते हुए कहा कि वह निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ईरान जाएंगी। वहां वह ईरानी नेतृत्व और नागरिकों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करेंगी तथा दिवंगत नेता को अंतिम श्रद्धांजलि देंगी। उनके इस दौरे को भारत और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक एवं सांस्कृतिक संबंधों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ईरान की ओर से केवल महबूबा मुफ्ती ही नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के कई प्रमुख नेताओं को भी आमंत्रित किया गया है। इनमें विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि और शिया समुदाय से जुड़े प्रमुख धार्मिक एवं सामाजिक नेता शामिल हैं। इन नेताओं की संभावित भागीदारी को क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक जुड़ाव के दृष्टिकोण से भी अहम माना जा रहा है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी ईरान की ओर से औपचारिक निमंत्रण भेजा गया था। हालांकि, पूर्व निर्धारित विदेश यात्राओं के कारण उनके इस कार्यक्रम में शामिल होने की संभावना नहीं है। ऐसे में भारत सरकार की ओर से एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल अंतिम संस्कार समारोह में भाग लेगा। यह प्रतिनिधिमंडल भारत की ओर से आधिकारिक संवेदना व्यक्त करेगा और राजनयिक स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करेगा।

    इसके अलावा विभिन्न राजनीतिक दलों के कई वरिष्ठ नेताओं के भी ईरान जाने की संभावना जताई जा रही है। इनमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के प्रतिनिधियों के नाम सामने आए हैं। इससे स्पष्ट है कि यह कार्यक्रम केवल धार्मिक या औपचारिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक महत्व भी रखता है, जहां विभिन्न देशों के प्रतिनिधि एक मंच पर मौजूद रहेंगे।

    अयातुल्लाह अली खामेनेई के निधन के बाद ईरान में राष्ट्रीय शोक का माहौल है। अंतिम संस्कार के दौरान सुरक्षा और राजनयिक व्यवस्थाओं को विशेष रूप से मजबूत किया गया है। दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बीच यह आयोजन वैश्विक राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत की भागीदारी को दोनों देशों के पारंपरिक संबंधों और आपसी सम्मान की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है।

  • यूक्रेन के ड्रोन हमलों के बाद रूस का बड़ा पलटवार, कीव समेत कई ठिकानों पर मिसाइलों की बरसात; युद्ध में बढ़ा नया तनाव

    यूक्रेन के ड्रोन हमलों के बाद रूस का बड़ा पलटवार, कीव समेत कई ठिकानों पर मिसाइलों की बरसात; युद्ध में बढ़ा नया तनाव

    नई दिल्ली । रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध एक बार फिर बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। हाल के दिनों में यूक्रेन द्वारा रूस के ऊर्जा और सैन्य प्रतिष्ठानों पर किए गए ड्रोन हमलों के बाद रूस ने राजधानी कीव सहित कई क्षेत्रों में व्यापक हवाई और मिसाइल हमले किए हैं। इन हमलों के बाद राजधानी में बड़े पैमाने पर नुकसान और जनहानि की खबरें सामने आई हैं, जबकि कई इलाकों में राहत एवं बचाव अभियान लगातार जारी है।

    लगातार हो रहे हमलों के बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने अपना विदेश दौरा बीच में समाप्त कर तत्काल देश लौटने का निर्णय लिया। उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन के साथ हालात की समीक्षा की तथा नागरिकों से एयर अलर्ट का पालन करने और सुरक्षित स्थानों पर रहने की अपील की। सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में आपातकालीन सेवाओं को भी सक्रिय कर दिया है ताकि राहत कार्यों में तेजी लाई जा सके।

    रूसी सेना ने इस अभियान में लंबी दूरी की मिसाइलों और रणनीतिक हवाई क्षमता का इस्तेमाल किया। राजधानी के अलावा कई अन्य स्थानों पर भी हमलों की सूचना मिली है। कई इमारतों, सार्वजनिक ढांचों और बुनियादी सुविधाओं को नुकसान पहुंचा है। कुछ स्थानों पर आग लगने और मलबे में लोगों के फंसे होने की आशंका के चलते बचाव दल लगातार अभियान चला रहे हैं।

    रूस का कहना है कि हमलों का उद्देश्य यूक्रेन के सैन्य और ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाना था। उसके अनुसार हाल के सप्ताहों में यूक्रेन ने रूसी क्षेत्र में स्थित ऊर्जा प्रतिष्ठानों, तेल भंडारण केंद्रों और सैन्य परिसरों पर ड्रोन हमले किए थे, जिनके जवाब में यह कार्रवाई की गई है। दूसरी ओर यूक्रेन का आरोप है कि हमलों का दायरा केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा और कई नागरिक क्षेत्रों को भी भारी नुकसान पहुंचा है।

    युद्ध के मौजूदा चरण में दोनों पक्ष लगातार नई सैन्य रणनीतियां अपना रहे हैं। यूक्रेन की ओर से ड्रोन हमलों की क्षमता में वृद्धि देखी गई है, जबकि रूस लंबी दूरी की मिसाइलों और हवाई हमलों के जरिए जवाबी कार्रवाई तेज कर रहा है। इससे संघर्ष का दायरा और अधिक व्यापक होता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच बढ़ती सैन्य गतिविधियां आने वाले समय में युद्ध को और जटिल बना सकती हैं।

    यूक्रेन के राष्ट्रपति ने कहा है कि उनका देश संघर्ष समाप्त करने के प्रयासों के पक्ष में है, लेकिन लगातार हो रहे हमले शांति प्रक्रिया को कठिन बना रहे हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से यूक्रेन की सुरक्षा और पुनर्निर्माण में सहयोग जारी रखने की अपील की। वहीं रूस ने अपने सुरक्षा हितों और सैन्य लक्ष्यों को प्राथमिकता बताते हुए अभियान जारी रखने के संकेत दिए हैं।

    चार वर्ष से अधिक समय से जारी इस युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर गहरा प्रभाव डाला है। मौजूदा घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि दोनों देशों के बीच तनाव अभी कम होने के संकेत नहीं हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्धविराम और कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं पर फिर से चर्चा तेज हो सकती है, हालांकि फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रणनीतिक रुख पर कायम दिखाई दे रहे हैं।

  • अमेरिका ने ट्रेड डील से पहले दिए सकारात्मक संकेत… 4 भारतीय कंपनियों को से हटाए बैन

    अमेरिका ने ट्रेड डील से पहले दिए सकारात्मक संकेत… 4 भारतीय कंपनियों को से हटाए बैन


    नई दिल्ली।
    भारत (India) के लिए अमेरिका (America) से अच्छी खबर आई है. रूस के साथ कथित व्यापार संबंधों को लेकर चार भारतीय कंपनियों (Indian Companies) पर लगाए गए प्रतिबंध हटा लिए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, बुधवार से अमेरिका द्वारा ये बैन हटाए गए हैं और इसकी जानकारी अमेरिकी वित्त विभाग ने शेयर करते हुए कहा है कि US ने चार भारतीय कंपनियों पर उन बैन को हटाया है, जो रूस के सैन्य-औद्योगिक अड्डे का समर्थन करने के लिए लेटेस्ट टेक्नोलॉजी और उपकरण की आपूर्ति करने के आरोपों पर लगाए गए थे. अब अमेरिका की प्रतिबंध लिस्ट से अलग हो गई हैं।


    इन कंपनियों को बड़ी राहत

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी वित्त विभाग के मुताबिक हैदराबाद स्थित आरआरजी इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड (RRG Engineering Technologies) और लोकेश मशीन्स लिमिटेड पर से प्रतिबंध हटाए गए हैं. तो वहीं अहमदाबाद स्थित गैलेक्सी बियरिंग्स और नई दिल्ली स्थित शौर्य एरोनॉटिक्स प्राइवेट लिमिटेड को विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFC) की बैन लिस्ट से हटा दिया गया है.


    गैलेक्सी पर 2024 में लगा था बैन

    भारतीय कंपनी गैलेक्सी बियरिंग्स लिमिटेड पर अक्टूबर 2024 में प्रतिबंध लगाया गया था. अमेरिका ने उस समय कंपनी पर रोलर बियरिंग और रोलर असेंबली समेत दर्जनों हाई क्वालिटी वाले दोहरे उपयोग वाली वस्तुओं को रूसी संस्थाओं को निर्यात करने का आरोप लगाया था. अब अमेरिकी वित्त विभाग ने इन आरोपों को वापस लेते हुए कंपनी पर से हैन हटा दिए हैं.

    अन्य तीन कंपनियों में अगला नाम शौर्य एरोनॉटिक्स प्राइवेट लिमिटेड का है, जिसे बैन मुक्त कर दिया गया है. इसपर कथित तौर पर रडार उपकरण, रेडियो नेविगेशनल एंड उपकरण, रेडियो रिमोट कंट्रोल उपकरण और दूसरे इलेक्ट्रिक उपकरण रूस को भेजने के आरोप लगा गए थे.


    RRG पर इसलिए था प्रतिबंध

    अमेरिका ने भारतीय कंपनी आरआरजी इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजीज पर रूस स्थित कंपनी आर्टेक्स लिमिटेड को माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स की 100 से अधिक खेपें भेजने का आरोप लगाया गया था. इसके बाद इसे प्रतिबंध वाली अमेरिकी लिस्ट में शामिल किया गया था.

    एक अन्य भारतीय कंपनी अमेरिका की इस प्रतिबंधों वाली लिस्ट में शामिल थी, जिसका नाम लोकेश मशीन्स है और इस पर विभिन्न रूसी मैन्युफेक्चरिंग कंपनियों को मशीन टूल्स की दर्जनों खेपों की आपूर्ति करने का आरोप लगाया गया था.


    ट्रेड डील से पहले आई खबर

    US-Iran Trade Deal पर बातचीत का दौर जारी है और दोनों ही देश टैरिफ विवाद के बाद अब अपने रिश्तों को ट्रैक पर लाने की कोशिश में लगे हुए हैं. अमेरिका की ओर से भारतीय कंपनियों पर प्रतिबंध हटाया जाना एक पॉजिटिव सिग्नल माना जा रहा है. रिपोर्ट्स में दोनों देशों के बीच डील पर बातचीत अब अंतिम चरण में बताई जा रही है।

  • Venezuela: भूकंप में मृतकों की संख्या 2200 के पार, अब भी रेस्क्यू जारी, मेक्सिको से आई मशहूर बचाव टीम

    Venezuela: भूकंप में मृतकों की संख्या 2200 के पार, अब भी रेस्क्यू जारी, मेक्सिको से आई मशहूर बचाव टीम


    मेक्सिको सिटी।
    वेनेजुएला (Venezuela) में आए विनाशकारी भूकंप (Earthquakes) ने भारी तबाही मचाई है। इस आपदा में मृतकों की संख्या 2,200 के पार पहुंच गई है, जबकि 11,000 से ज्यादा लोग घायल हैं। इस मुश्किल घड़ी में मेक्सिको (Mexico) की मशहूर बचाव टीम ‘टोपोस’ (Topos Azteca) मदद के लिए वेनेजुएला पहुंच रही है। यह टीम मलबे में दबे लोगों को निकालने में माहिर मानी जाती है।


    तबाही का मंजर और बढ़ती चुनौतियां

    भूकंप के करीब एक हफ्ते बाद भी वेनेजुएला में हालात बेहद खराब हैं। सबसे ज्यादा असर ला गुआरा राज्य में हुआ है, जहां कई बहुमंजिला इमारतें और घर जमींदोज हो गए हैं। अंतरराष्ट्रीय बचाव टीमें दिन-रात मलबे में दबे लोगों की तलाश कर रही हैं। हालांकि, समय बीतने के साथ अब जीवित बचे लोगों के मिलने की उम्मीद कम होती जा रही है। मेक्सिको से रवाना हुए 39 वर्षीय स्वयंसेवक जर्मन बेलो अपने साथ बचाव उपकरणों के अलावा बड़ी संख्या में ‘बॉडी बैग’ भी ले जा रहे हैं, ताकि मृतकों के शवों को सम्मान के साथ निकाला जा सके।


    कौन हैं ये ‘टोपोस’ और कैसे करते हैं काम?

    ‘टोपोस’ मेक्सिको का एक नागरिक बचाव संगठन है। इसकी शुरुआत 1985 में मेक्सिको सिटी में आए भीषण भूकंप के बाद हुई थी। स्पेनिश भाषा में ‘टोपोस’ का मतलब ‘छछूंदर’ (Moles) होता है। इस टीम को यह नाम इसलिए मिला क्योंकि इसके सदस्य मलबे के बीच बनी बेहद संकरी जगहों और छेदों में रेंगकर घुस जाते हैं। ये लोग थर्मल कैमरे और संवेदनशील माइक्रोफोन जैसे आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं ताकि मलबे के नीचे दबी हल्की सी आहट या शरीर की गर्मी को पहचाना जा सके।


    खामोशी का संकेत और बचाव का तरीका

    बचाव कार्य के दौरान यह टीम एक खास तकनीक अपनाती है। जब कोई बचावकर्मी हवा में मुट्ठी बंद करके हाथ उठाता है, तो इसका मतलब होता है ‘बिल्कुल खामोश हो जाएं’। यह संकेत मिलते ही वहां मौजूद अन्य लोग चुप हो जाते हैं। इस सन्नाटे में बचावकर्मी मलबे के नीचे कान लगाकर सुनते हैं कि कहीं से कोई आवाज या खटखटाहट तो नहीं आ रही। इसके बाद फावड़े और हथौड़ों की मदद से धीरे-धीरे मलबा हटाया जाता है ताकि मलबे के और ज्यादा गिरने का खतरा न रहे।


    उम्मीद की एक आखिरी किरण

    मेक्सिको सिटी के एयरपोर्ट पर एक भावुक पल देखने को मिला। जब वेनेजुएला के एक इंजीनियर डिएगो बेजरानो को पता चला कि जर्मन बेलो और उनकी टीम उनके देश जा रही है, तो वह रो पड़े। डिएगो का परिवार अभी भी वेनेजुएला की राजधानी कराकस में है। बेलो ने उन्हें गले लगाकर तसल्ली दी। बेलो पेशे से एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं और अपनी छोटी सी वर्कशॉप चलाते हैं, लेकिन आपदा के समय वह सब छोड़कर लोगों की जान बचाने निकल पड़ते हैं। उनका कहना है कि किसी दुखी इंसान को उम्मीद देना ही उनका सबसे बड़ा इनाम है।

  • अंडों की कीमतों में कथित हेरफेर पर अमेरिका का बड़ा एक्शन, तीन कंपनियों पर करोड़ों का जुर्माना, 5.3 करोड़ अंडे मुफ्त बांटने का आदेश

    अंडों की कीमतों में कथित हेरफेर पर अमेरिका का बड़ा एक्शन, तीन कंपनियों पर करोड़ों का जुर्माना, 5.3 करोड़ अंडे मुफ्त बांटने का आदेश

    नई दिल्ली । अमेरिका में अंडों की कीमतों में कथित कृत्रिम बढ़ोतरी के मामले में तीन प्रमुख अंडा उत्पादक कंपनियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की गई है। बाजार में आपूर्ति को लेकर कथित हेरफेर और कीमतों को असामान्य स्तर तक पहुंचाने के आरोपों के बाद संबंधित कंपनियों पर करोड़ों रुपये के बराबर आर्थिक दंड लगाया गया है। इसके साथ ही समझौते की शर्तों के तहत कंपनियों को लाखों नहीं बल्कि 5.3 करोड़ अंडे जरूरतमंद लोगों तक मुफ्त पहुंचाने का निर्देश भी दिया गया है।

    यह मामला उस अवधि से जुड़ा है जब अमेरिका में बर्ड फ्लू के कारण अंडों की आपूर्ति प्रभावित हुई थी। जांच में आरोप लगाया गया कि कुछ प्रमुख उत्पादक कंपनियों ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए बाजार में आपूर्ति की कृत्रिम कमी का माहौल बनाया, जिससे खुदरा कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई। इसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में अंडों की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गईं और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा।

    आरोपों के अनुसार कंपनियों ने बाजार गतिविधियों को प्रभावित करने के लिए आपसी समन्वय और गोपनीय संचार का सहारा लिया। जांच के दौरान सामने आए दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक संचार के आधार पर अधिकारियों ने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने और कीमतों को ऊंचा बनाए रखने का प्रयास किया गया। इसके बाद संबंधित एजेंसियों ने मामले में सख्त कार्रवाई शुरू की।

    जांच पूरी होने के बाद हुए समझौते के तहत तीनों कंपनियों पर संयुक्त रूप से लगभग 31 करोड़ रुपये के बराबर आर्थिक दंड लगाया गया है। इसके अलावा उन्हें पोषण कार्यक्रमों और फूड बैंकों के माध्यम से 5.3 करोड़ अंडे जरूरतमंद परिवारों तक मुफ्त उपलब्ध कराने होंगे। इस कदम का उद्देश्य केवल दंड देना ही नहीं, बल्कि बढ़ी हुई कीमतों से प्रभावित समुदायों को प्रत्यक्ष राहत पहुंचाना भी बताया गया है।

    मामले के दौरान यह भी सामने आया कि कीमतों में तेज बढ़ोतरी के समय कई शहरों में अंडे बेहद महंगे हो गए थे। कुछ स्थानों पर उपभोक्ताओं को सामान्य खरीदारी में भी कठिनाई का सामना करना पड़ा और अंडों की उपलब्धता सीमित हो गई। बढ़ती कीमतों ने खाद्य महंगाई को लेकर भी व्यापक बहस छेड़ दी थी, जिसके बाद नियामक एजेंसियों ने बाजार की गतिविधियों पर विशेष निगरानी शुरू की।

    हालांकि संबंधित कंपनियों ने अपने ऊपर लगे आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। उनका कहना है कि उन्होंने पूरे समय कानून के दायरे में रहकर काम किया और आपूर्ति बनाए रखने का प्रयास किया। कंपनियों का दावा है कि बाजार की परिस्थितियां बर्ड फ्लू और उत्पादन में आई बाधाओं के कारण प्रभावित हुई थीं, न कि किसी अवैध गतिविधि के कारण। इसके बावजूद उन्होंने कानूनी प्रक्रिया को लंबा खींचने के बजाय समझौते का रास्ता अपनाया।

    इस कार्रवाई को अमेरिका में उपभोक्ता हितों की रक्षा और बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में कृत्रिम हस्तक्षेप के मामलों पर सख्त निगरानी से भविष्य में इस तरह की गतिविधियों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। साथ ही जरूरतमंदों को मुफ्त खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने का निर्णय सामाजिक राहत के साथ जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है।

  • अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों की नागरिकता बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की रोक खारिज की, लाखों भारतीय परिवारों को बड़ी राहत

    अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों की नागरिकता बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की रोक खारिज की, लाखों भारतीय परिवारों को बड़ी राहत

    नई दिल्ली । अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने जन्म के आधार पर नागरिकता यानी बर्थराइट सिटिजनशिप को बरकरार रखते हुए ट्रंप प्रशासन के उस प्रयास को खारिज कर दिया है, जिसके तहत अमेरिका में जन्म लेने वाले कुछ बच्चों को नागरिकता देने पर रोक लगाने की कोशिश की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन के तहत अमेरिका में जन्म लेने वाले अधिकांश बच्चों को नागरिकता का अधिकार प्राप्त रहेगा। इस फैसले को अमेरिका में रह रहे लाखों भारतीय परिवारों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

    सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से दिए अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रपति के कार्यकारी आदेश के जरिए संविधान में प्रदत्त अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि जन्म के आधार पर नागरिकता का सिद्धांत अमेरिकी संविधान में स्पष्ट रूप से स्थापित है और इसमें बदलाव केवल संवैधानिक संशोधन के माध्यम से ही संभव है। इस निर्णय के साथ ट्रंप प्रशासन का वह आदेश प्रभावी नहीं हो सका, जिसमें अवैध प्रवासियों और अस्थायी वीजा धारकों के अमेरिका में जन्मे बच्चों को नागरिकता से वंचित करने की बात कही गई थी।

    बर्थराइट सिटिजनशिप का आधार अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन है, जो वर्ष 1868 में लागू हुआ था। इसके अनुसार अमेरिका में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति, जो अमेरिकी कानून के अधिकार क्षेत्र में आता है, अमेरिकी नागरिक माना जाएगा। इसी प्रावधान को लेकर विवाद पैदा हुआ था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसे पूरी तरह वैध और प्रभावी माना है।

    अदालत ने अपने निर्णय में वर्ष 1898 के ऐतिहासिक वुंग किम आर्क मामले का भी उल्लेख किया। उस फैसले में भी यह सिद्धांत स्थापित किया गया था कि अमेरिका में जन्म लेने वाला बच्चा अमेरिकी नागरिक होगा, भले ही उसके माता-पिता किसी अन्य देश के नागरिक हों। सुप्रीम कोर्ट ने इस पुराने कानूनी सिद्धांत को दोबारा स्वीकार करते हुए कहा कि संविधान की मूल भावना में किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया जा सकता।

    इस फैसले का सबसे अधिक प्रभाव उन लाखों विदेशी नागरिकों पर पड़ेगा जो अमेरिका में नौकरी, व्यवसाय या शिक्षा के उद्देश्य से रह रहे हैं। भारतीय समुदाय भी इससे सीधे तौर पर लाभान्वित होगा। अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर एच-1बी, एल-1 और अन्य कार्य वीजा पर कार्यरत हैं, जबकि हजारों छात्र एफ-1 वीजा पर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। अब उनके अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों की नागरिकता को लेकर किसी प्रकार की कानूनी अनिश्चितता नहीं रहेगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे भारतीय परिवारों के लिए भी राहत लेकर आया है। हालांकि इस निर्णय का स्थायी निवास या वीजा प्रक्रिया पर कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन अमेरिका में जन्मे बच्चों की नागरिकता पहले की तरह सुरक्षित बनी रहेगी। इससे लंबे समय से अमेरिका में रह रहे भारतीय परिवारों की चिंता काफी हद तक कम होगी।

    हालांकि अदालत के इस फैसले के बाद भी बर्थ टूरिज्म यानी केवल बच्चे को अमेरिकी नागरिकता दिलाने के उद्देश्य से अमेरिका जाने की प्रवृत्ति को वैधता नहीं मिली है। अमेरिकी प्रशासन पहले की तरह वीजा नियमों और जांच प्रक्रिया के माध्यम से ऐसे मामलों पर सख्ती जारी रख सकेगा। वहीं कुछ राजनीतिक समूह भविष्य में संवैधानिक संशोधन की मांग उठा सकते हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में जन्म के आधार पर नागरिकता का संवैधानिक प्रावधान पूरी तरह प्रभावी रहेगा।

  • यूक्रेन की बढ़ती स्ट्राइक क्षमता से रूस पर नया दबाव, मिसाइल हमलों का दायरा बढ़ा; क्या युद्ध निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है?

    यूक्रेन की बढ़ती स्ट्राइक क्षमता से रूस पर नया दबाव, मिसाइल हमलों का दायरा बढ़ा; क्या युद्ध निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है?

    नई दिल्ली । रूस और यूक्रेन के बीच चार वर्षों से जारी युद्ध अब ऐसे चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां संघर्ष का प्रभाव केवल सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। हालिया विश्लेषणों के अनुसार यूक्रेन ने अपनी लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है, जिसके चलते रूस के बड़े हिस्से में मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ गया है। इससे युद्ध का रणनीतिक स्वरूप बदलता नजर आ रहा है और रूस के भीतर भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियां गहराने लगी हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार यूक्रेन अब अपनी स्वदेशी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों और आधुनिक ड्रोन प्रणाली का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहा है। इन हथियारों की मदद से वह रूस के भीतर स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों, रक्षा उत्पादन इकाइयों और रणनीतिक ढांचे को निशाना बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है। हाल के महीनों में रूस के कई ऐसे क्षेत्रों में भी मिसाइल अलर्ट जारी किए गए हैं, जो पहले इस प्रकार के खतरे से अपेक्षाकृत दूर माने जाते थे।

    बताया गया है कि पिछले कुछ समय में रूस के मध्य, दक्षिणी और वोल्गा क्षेत्र के अनेक हिस्सों में संभावित मिसाइल हमलों की चेतावनी जारी करनी पड़ी। इससे यह संकेत मिलता है कि यूक्रेन अब केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस के अंदर काफी दूर स्थित लक्ष्यों तक भी अपनी पहुंच बना चुका है। इससे रूस की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन की इस रणनीति का प्रमुख उद्देश्य रूस की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के साथ-साथ उस पर राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ाना भी है। लंबे समय से जारी युद्ध के बीच कीव चाहता है कि रूस पर इतना दबाव बने कि वह भविष्य में वार्ता के विकल्प पर गंभीरता से विचार करने को मजबूर हो। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इन हमलों का रूस के राजनीतिक नेतृत्व के निर्णयों पर कितना प्रभाव पड़ेगा।

    रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि रूस की बड़ी आबादी अब ऐसे क्षेत्रों में रह रही है जहां कम से कम एक बार मिसाइल हमले का अलर्ट जारी किया जा चुका है। इससे युद्ध का असर आम नागरिकों तक भी महसूस होने लगा है। लगातार बढ़ते सुरक्षा अलर्ट और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर हमलों के कारण रूस को अपनी वायु रक्षा प्रणाली और सैन्य संसाधनों का व्यापक स्तर पर पुनर्विन्यास करना पड़ रहा है।

    यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पहले भी दावा कर चुके हैं कि देश ने ऐसी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल विकसित की है, जो 1,500 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य भेदने में सक्षम है। हाल के महीनों में रूस के भीतर रक्षा उद्योग से जुड़े कई ठिकानों पर हमलों की खबरें भी सामने आई हैं, जिन्हें यूक्रेन अपनी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।

    हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन की बढ़ी हुई मारक क्षमता निश्चित रूप से रूस पर दबाव बढ़ा रही है, लेकिन केवल इन हमलों के आधार पर युद्ध की दिशा बदलने या रूस को तत्काल शांति वार्ता के लिए बाध्य मान लेना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच संघर्ष अभी भी कई सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक कारकों से प्रभावित है। ऐसे में आने वाले समय में युद्ध की दिशा और संभावित वार्ता की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

    संक्षिप्त सार:
    यूक्रेन की लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल और ड्रोन क्षमता में वृद्धि से रूस के अंदर हमलों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। विश्लेषणों के अनुसार अब रूस के बड़े हिस्से में मिसाइल अलर्ट जारी किए जा रहे हैं, जिससे युद्ध का रणनीतिक संतुलन बदलता दिखाई दे रहा है।

    English Keywords:
    VolodymyrZelenskyy, Russia, Ukraine, MissileStrike, StrategicPressure,

    नई दिल्ली । विश्व

    रूस और यूक्रेन के बीच चार वर्षों से जारी युद्ध अब ऐसे चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां संघर्ष का प्रभाव केवल सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। हालिया विश्लेषणों के अनुसार यूक्रेन ने अपनी लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है, जिसके चलते रूस के बड़े हिस्से में मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ गया है। इससे युद्ध का रणनीतिक स्वरूप बदलता नजर आ रहा है और रूस के भीतर भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियां गहराने लगी हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार यूक्रेन अब अपनी स्वदेशी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों और आधुनिक ड्रोन प्रणाली का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहा है। इन हथियारों की मदद से वह रूस के भीतर स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों, रक्षा उत्पादन इकाइयों और रणनीतिक ढांचे को निशाना बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है। हाल के महीनों में रूस के कई ऐसे क्षेत्रों में भी मिसाइल अलर्ट जारी किए गए हैं, जो पहले इस प्रकार के खतरे से अपेक्षाकृत दूर माने जाते थे।

    बताया गया है कि पिछले कुछ समय में रूस के मध्य, दक्षिणी और वोल्गा क्षेत्र के अनेक हिस्सों में संभावित मिसाइल हमलों की चेतावनी जारी करनी पड़ी। इससे यह संकेत मिलता है कि यूक्रेन अब केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस के अंदर काफी दूर स्थित लक्ष्यों तक भी अपनी पहुंच बना चुका है। इससे रूस की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन की इस रणनीति का प्रमुख उद्देश्य रूस की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के साथ-साथ उस पर राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ाना भी है। लंबे समय से जारी युद्ध के बीच कीव चाहता है कि रूस पर इतना दबाव बने कि वह भविष्य में वार्ता के विकल्प पर गंभीरता से विचार करने को मजबूर हो। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इन हमलों का रूस के राजनीतिक नेतृत्व के निर्णयों पर कितना प्रभाव पड़ेगा।

    रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि रूस की बड़ी आबादी अब ऐसे क्षेत्रों में रह रही है जहां कम से कम एक बार मिसाइल हमले का अलर्ट जारी किया जा चुका है। इससे युद्ध का असर आम नागरिकों तक भी महसूस होने लगा है। लगातार बढ़ते सुरक्षा अलर्ट और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर हमलों के कारण रूस को अपनी वायु रक्षा प्रणाली और सैन्य संसाधनों का व्यापक स्तर पर पुनर्विन्यास करना पड़ रहा है।

    यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पहले भी दावा कर चुके हैं कि देश ने ऐसी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल विकसित की है, जो 1,500 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य भेदने में सक्षम है। हाल के महीनों में रूस के भीतर रक्षा उद्योग से जुड़े कई ठिकानों पर हमलों की खबरें भी सामने आई हैं, जिन्हें यूक्रेन अपनी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।

    हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन की बढ़ी हुई मारक क्षमता निश्चित रूप से रूस पर दबाव बढ़ा रही है, लेकिन केवल इन हमलों के आधार पर युद्ध की दिशा बदलने या रूस को तत्काल शांति वार्ता के लिए बाध्य मान लेना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच संघर्ष अभी भी कई सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक कारकों से प्रभावित है। ऐसे में आने वाले समय में युद्ध की दिशा और संभावित वार्ता की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

  • चीनी विमान खरीद सौदे ने नेपाल को कर्ज और घाटे में धकेला, वर्षों से खड़े विमानों पर उठे सवाल; सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को जारी किया नोटिस

    चीनी विमान खरीद सौदे ने नेपाल को कर्ज और घाटे में धकेला, वर्षों से खड़े विमानों पर उठे सवाल; सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को जारी किया नोटिस

    नई दिल्ली । नेपाल सरकार द्वारा एक दशक पहले चीन से खरीदे गए विमानों का सौदा एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। वर्षों से परिचालन से बाहर पड़े इन विमानों के कारण सरकारी एयरलाइन पर बढ़ते आर्थिक बोझ और कर्ज को लेकर नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत ने यह जानना चाहा है कि भारी वित्तीय नुकसान और कथित अनियमितताओं के बावजूद इस खरीद प्रक्रिया की व्यापक जांच अब तक क्यों नहीं कराई गई। इस घटनाक्रम ने सरकारी खरीद, वित्तीय प्रबंधन और विमानन नीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    यह सौदा वर्ष 2014 से 2018 के बीच हुआ था, जब नेपाल ने चीन से अनुदान और रियायती ऋण के माध्यम से छह टर्बोप्रॉप विमान प्राप्त किए थे। इनमें चार Y12E और दो MA60 विमान शामिल थे। इन विमानों को देश के दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों में हवाई संपर्क मजबूत करने के उद्देश्य से खरीदा गया था। हालांकि समय के साथ यह परियोजना अपने मूल उद्देश्य को पूरा करने में सफल नहीं हो सकी और अधिकांश विमान परिचालन से बाहर हो गए।

    वर्तमान स्थिति यह है कि छह में से पांच विमान कई वर्षों से काठमांडू स्थित त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर निष्क्रिय अवस्था में खड़े हैं। इनका संचालन बंद होने के बावजूद पार्किंग और रखरखाव पर लगातार खर्च हो रहा है, जिससे सरकारी एयरलाइन का वित्तीय दबाव बढ़ता जा रहा है। वहीं छठा विमान वर्ष 2020 में नेपालगंज हवाई अड्डे पर रनवे दुर्घटना का शिकार हो गया था और अब उपयोग के योग्य नहीं माना जाता। दुर्घटनाग्रस्त विमान का बीमा दावा मिलने के बावजूद वह अब केवल कबाड़ के रूप में रह गया है।

    नेपाल एयरलाइंस ने इन विमानों को दोबारा संचालन में लाने और लीज पर देने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। एयरलाइन का कहना है कि इन विमानों के संचालन की लागत अत्यधिक अधिक है। ईंधन की ज्यादा खपत, स्पेयर पार्ट्स की सीमित उपलब्धता, रखरखाव पर बढ़ता खर्च और कम व्यावसायिक उपयोगिता के कारण इनका संचालन आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं रहा। इसके अलावा नेपाल के पर्वतीय हवाई अड्डों की भौगोलिक परिस्थितियों में इन विमानों की उपयोगिता भी सीमित पाई गई।

    जांच में यह पहलू भी सामने आया कि एयरलाइन के पास इन विमानों के संचालन के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित पायलट, प्रशिक्षक और तकनीकी इंजीनियर उपलब्ध नहीं थे। आवश्यक स्पेयर पार्ट्स की समय पर आपूर्ति नहीं होने से भी संचालन प्रभावित हुआ। इन सभी कारणों ने मिलकर परियोजना को लगातार घाटे का सौदा बना दिया और सरकारी एयरलाइन की वित्तीय स्थिति पर अतिरिक्त दबाव डाला।

    हाल ही में इस पूरे मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें विमान खरीद प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच की मांग की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इतने बड़े आर्थिक नुकसान और संभावित अनियमितताओं के बावजूद संबंधित एजेंसियों ने प्रभावी जांच नहीं की। अब अदालत द्वारा सरकार से जवाब मांगे जाने के बाद इस विवादित खरीद सौदे की समीक्षा और संभावित जांच की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है। नेपाल में इस मामले को सार्वजनिक धन के उपयोग, सरकारी जवाबदेही और दीर्घकालिक आर्थिक निर्णयों के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।