Category: International

  • अमेरिका बोला- ईरान के मिसाइल उत्पादन ढांचे को करेंगे तबाह, तेहरान का हाइफा की रिफाइनरी पर हमले का दावा

    अमेरिका बोला- ईरान के मिसाइल उत्पादन ढांचे को करेंगे तबाह, तेहरान का हाइफा की रिफाइनरी पर हमले का दावा


    वॉशिंगटन/तेहरान।
    पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच अमेरिका ने कहा है कि उसकी सेना ईरान के मिसाइल उत्पादन से जुड़े बुनियादी ढांचे को खत्म करने के लिए अभियान चला रही है।

    व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने कहा कि पिछले 10 दिनों में चलाया गया अमेरिकी सैन्य अभियान काफी सफल रहा है और सैनिक उम्मीद से भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि अमेरिकी सेना ने अब तक ईरान की नौसेना के 50 से अधिक जहाजों को नष्ट कर दिया है, जिनमें एक बड़ा ड्रोन कैरियर जहाज भी शामिल है। लेविट ने कहा कि यह कार्रवाई अमेरिकी सैन्य अभियान ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत की जा रही है और इसका उद्देश्य ईरान की मिसाइल तथा सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को विश्वास है कि अभियान के लक्ष्य जल्द ही हासिल कर लिए जाएंगे।

    दूसरी ओर, ईरान ने दावा किया है कि उसने इजराइल के ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाया है। ईरान के खातम अल-अंबिया सशस्त्र बल मुख्यालय के प्रवक्ता के अनुसार ड्रोन हमलों के जरिए हाइफामें स्थित तेल रिफाइनरी और ईंधन भंडारण टैंकों को निशाना बनाया गया। ईरान का कहना है कि यह हमला उसके जवाबी सैन्य अभियान की 33वीं लहर का हिस्सा है और इसे ईरान के तेल डिपो तथा ऊर्जा ठिकानों पर हुए हालिया हमलों के जवाब में अंजाम दिया गया है।

  • मोजाम्बिक में भीषण बाढ़ के बाद भारत की मदद: राहत सामग्री, चावल और दवाइयों की बड़ी खेप भेजी

    मोजाम्बिक में भीषण बाढ़ के बाद भारत की मदद: राहत सामग्री, चावल और दवाइयों की बड़ी खेप भेजी


    नई दिल्ली । पूर्वी अफ्रीका के देश मोज़ाम्बिक के मध्य और दक्षिणी क्षेत्रों में आई भीषण बाढ़ ने व्यापक तबाही मचाई है। हजारों लोग इस आपदा से प्रभावित हुए हैं और कई इलाकों में राहत और पुनर्वास कार्यों की तत्काल आवश्यकता महसूस की जा रही है। इस कठिन समय में भारत ने मानवीय सहायता का हाथ बढ़ाते हुए बड़े पैमाने पर राहत सामग्री और दवाइयों की खेप भेजी है।

    भारत के विदेश मंत्रालय भारत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से जानकारी दी कि मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियान के तहत मोजाम्बिक को आवश्यक राहत सामग्री भेजी गई है। इस सहायता में 500 मीट्रिक टन चावल, अस्थायी आश्रय के लिए टेंट, हाइजीन किट और पुनर्वास कार्यों में उपयोग होने वाली कई जरूरी वस्तुएं शामिल हैं।

    इसके अलावा बाढ़ प्रभावित लोगों की तत्काल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए करीब 10 मीट्रिक टन अतिरिक्त राहत सामग्री भी भेजी गई है। राहत अभियान के हिस्से के रूप में Indian Navy के एक जहाज के जरिए लगभग 3 मीट्रिक टन आवश्यक दवाइयां भी मोजाम्बिक पहुंचाई जा रही हैं, ताकि बाढ़ के बाद फैलने वाली बीमारियों से निपटने में स्थानीय प्रशासन को मदद मिल सके।

    भारत इससे पहले भी समुद्री मार्ग के जरिए लगभग 86 मीट्रिक टन जीवन रक्षक दवाइयां मोजाम्बिक भेज चुका है। इन दवाइयों का उद्देश्य आपदा प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना और पीड़ित लोगों को आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के बाद सबसे बड़ी चुनौतियों में खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाएं शामिल होती हैं। ऐसे में भारत द्वारा भेजी गई खाद्य सामग्री, स्वच्छता किट और दवाइयां राहत कार्यों को तेजी से आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

    भारत ने अतीत में भी प्राकृतिक आपदाओं के समय कई मित्र देशों की मदद की है। हिंद महासागर क्षेत्र और अफ्रीकी देशों के साथ भारत के मजबूत कूटनीतिक और मानवीय संबंध रहे हैं। आपदा के समय दी जाने वाली यह सहायता इन संबंधों को और मजबूत करने का काम करती है।

    भारत ने स्पष्ट किया है कि वह मानवीय, चिकित्सीय और लॉजिस्टिक सहायता देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इस पहल के माध्यम से भारत न केवल संकट के समय सहायता पहुंचा रहा है, बल्कि हिंद महासागर और अफ्रीका क्षेत्र में एक जिम्मेदार और भरोसेमंद वैश्विक साझेदार के रूप में अपनी भूमिका को भी मजबूत कर रहा है।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य पर ट्रंप की ईरान को सख्त चेतावनी: तेल आपूर्ति रोकने की कोशिश पर 20 गुना जवाबी कार्रवाई की धमकी

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर ट्रंप की ईरान को सख्त चेतावनी: तेल आपूर्ति रोकने की कोशिश पर 20 गुना जवाबी कार्रवाई की धमकी


    वाशिंगटन । अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य  में तेल आपूर्ति को रोकने या बाधित करने की कोई भी कोशिश की गई तो अमेरिका इसका बेहद सख्त जवाब देगा। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में अमेरिका अब तक हुए हमलों से बीस गुना ज्यादा जोरदार कार्रवाई कर सकता है।

    ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सत्य सामाजिक पर पोस्ट किए गए संदेश में कहा कि यदि ईरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को बंद करने की कोशिश करता है तो अमेरिका उसके बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अमेरिका आसानी से निशाना बनाए जा सकने वाले ठिकानों को नष्ट कर सकता है जिससे ईरान के लिए दोबारा व्यवस्थित होना मुश्किल हो जाएगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें उम्मीद है कि हालात इस स्तर तक नहीं पहुंचेंगे।

    इससे पहले ट्रंप ने ट्रम्प नेशनल डोरल में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि अमेरिका दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक को खतरे में डालने की अनुमति किसी भी देश को नहीं देगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए लगातार कदम उठा रहा है और किसी भी आतंकी सरकार को दुनिया की तेल आपूर्ति को बंधक बनाने की इजाजत नहीं देगा।

    ट्रंप ने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना की मजबूत मौजूदगी है और जरूरत पड़ने पर समुद्री मार्ग की सुरक्षा के लिए माइन-क्लियरिंग ऑपरेशन और सैन्य एस्कॉर्ट जैसी व्यवस्थाएं भी लागू की जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी नौसेना के पास दुनिया की सबसे आधुनिक तकनीक और उपकरण हैं जिनकी मदद से समुद्री मार्ग को सुरक्षित रखा जा सकता है।

    उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका खाड़ी क्षेत्र में काम कर रहे तेल टैंकरों को राजनीतिक जोखिम बीमा देने पर भी विचार कर रहा है ताकि समुद्री व्यापार बाधित न हो। ट्रंप के अनुसार यदि खतरा बढ़ता है तो अमेरिका और उसके सहयोगी देश जहाजों को इस संकरे समुद्री मार्ग से सुरक्षित एस्कॉर्ट भी कर सकते हैं।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि इस मार्ग का खुला रहना अमेरिका से ज्यादा एशिया और अन्य ऊर्जा आयात करने वाले देशों के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने खास तौर पर चीन का जिक्र करते हुए कहा कि यह रास्ता कई देशों के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि उनकी बड़ी ऊर्जा जरूरतें इसी मार्ग से पूरी होती हैं।

    दरअसल होर्मुज जलडमरूमध्य  फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला एक संकरा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। दुनिया के कुल समुद्री तेल परिवहन का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का तनाव या सैन्य गतिविधि वैश्विक ऊर्जा बाजार और तेल कीमतों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच ट्रंप का यह बयान वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार को लेकर नई चिंता पैदा कर रहा है।

  • ईरान में खामेनेई की मौत के बाद सड़कों पर हजारों लोग: दो साल की बच्ची के जनाजे में जुटा शोक

    ईरान में खामेनेई की मौत के बाद सड़कों पर हजारों लोग: दो साल की बच्ची के जनाजे में जुटा शोक



    नई दिल्ली। अमेरिका और इजराइल के साथ ईरान में जारी संघर्ष आज 11वें दिन प्रवेश कर गया है। जंग के पहले ही दिन ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मृत्यु की खबर ने पूरी दुनिया को हिला दिया।

    ईरान में खामेनेई के निधन की खबर मिलते ही महिलाओं और पुरुषों सहित हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। लोग हाथों में खामेनेई की तस्वीरें और मोमबत्तियां लिए हुए थे और उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान लोगों ने नारेबाजी करते हुए कहा कि खामेनेई का आदर्श हमेशा जीवित रहेगा।

    दो साल की बच्ची के जनाजे में भारी शोक
    ईरान में शोक की भावना इतनी गहरी थी कि दो साल की बच्ची के जनाजे में भी हजारों लोग शामिल हुए। लोगों की भीड़ ने सड़कें भर दीं और सोशल मीडिया पर इस दौरान की PHOTOS और VIDEOS वायरल हो रही हैं।

    मिडिल ईस्ट और पड़ोसी देशों पर युद्ध का असर
    बीते 10 दिनों में इस संघर्ष ने मिडिल ईस्ट और आसपास के 10 से अधिक देशों के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित की है।

    कुछ क्षेत्रों में बमबारी और सैन्य कार्रवाई का डर

    कई शहरों में विरोध प्रदर्शन और भारी भीड़

    नागरिकों में भय और असुरक्षा का माहौल

    विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के लगातार बढ़ते प्रभाव के कारण क्षेत्रीय स्थिरता खतरे में है और आर्थिक संकट और आपूर्ति बाधित हो रही है।

    ईरान में शोक और अंतरराष्ट्रीय चिंता
    खामेनेई के समर्थन में प्रदर्शनकारी लोगों ने कहा कि उनका नेतृत्व ईरान और मुस्लिम समुदाय के लिए मार्गदर्शक था।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देशों ने संघर्ष को रोकने और कूटनीतिक समाधान खोजने की अपील की है।ईरान में जारी प्रदर्शन और शोक के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जो विश्व समुदाय की चिंता बढ़ा रहे हैं।

  • मिडिल ईस्ट जंग तेज: ईरान की चेतावनी‘एक लीटर तेल भी नहीं जाने देंगे’, होर्मुज स्ट्रेट पर नई शर्त

    मिडिल ईस्ट जंग तेज: ईरान की चेतावनी‘एक लीटर तेल भी नहीं जाने देंगे’, होर्मुज स्ट्रेट पर नई शर्त




    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के बीच हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष का आज 11वां दिन है और इसी बीच ईरान ने दुनिया के लिए एक बड़ी चेतावनी जारी की है। ईरान की ताकतवर सैन्य इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा है कि अगर हमले जारी रहे तो वह एक लीटर तेल भी बाहर नहीं जाने देगा। ईरान ने दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्ग होर्मुज स्ट्रेट को लेकर नई शर्त भी रख दी है। ईरानी सेना का कहना है कि कुछ देशों के जहाजों को ही इस रास्ते से गुजरने दिया जाएगा और इसके लिए उन देशों को पहले अपने यहां से अमेरिका और इजराइल के राजदूतों को निकालना होगा।

    तो पूरी दुनिया में तेल संकट पैदा हो सकता है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान इस रास्ते से गुजरने वाले तेल टैंकरों और व्यापारिक जहाजों से सुरक्षा शुल्क यानी सिक्योरिटी टैक्स वसूलने की योजना भी बना रहा है, खासकर उन देशों के जहाजों से जो अमेरिका के सहयोगी माने जाते हैं।

    इसी बीच युद्ध का असर क्षेत्र के दूसरे देशों पर भी दिखने लगा है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी UNHCR के अनुसार 2 मार्च से अब तक 80 हजार से ज्यादा सीरियाई नागरिक लेबनान से सीमा पार कर अपने देश वापस लौट चुके हैं। एजेंसी की प्रवक्ता सेलिन श्मिट ने बताया कि इजराइली हमलों के डर से कई परिवार जल्दबाजी में लेबनान छोड़कर लौटे हैं। अधिकांश लोग बिना सामान लिए ही निकल गए और फिलहाल अपने रिश्तेदारों के घरों में रह रहे हैं। अभी तक इन लोगों ने आपातकालीन आश्रय की कोई आधिकारिक मांग दर्ज नहीं कराई है।

    युद्ध के बीच ईरान ने साफ कर दिया है कि वह फिलहाल युद्धविराम नहीं चाहता। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबफ ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान पर हमला करने वालों को ऐसा जवाब दिया जाएगा कि वे दोबारा ऐसा करने की हिम्मत न करें। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान को नहीं लगता कि अमेरिका और इजराइल से बातचीत करके यह युद्ध खत्म होगा। उनके मुताबिक ईरान उस स्थिति को खत्म करना चाहता है जिसमें पहले युद्ध होता है, फिर बातचीत और युद्धविराम होता है और कुछ समय बाद फिर से लड़ाई शुरू हो जाती है।

    दूसरी तरफ इराक ने भी इस संघर्ष से दूरी बनाने की कोशिश की है। इराक के प्रधानमंत्री मोहम्मद शिया अल-सुदानी ने अमेरिका से साफ कहा है कि इराक की जमीन या उसके हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल पड़ोसी देशों पर हमले के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने यह बात अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से फोन पर बातचीत के दौरान कही। इराक का कहना है कि वह इस युद्ध में शामिल नहीं होना चाहता और अपने क्षेत्र को किसी भी सैन्य टकराव से दूर रखना चाहता है।

    युद्ध के कारण एशिया के कई देशों में भी चिंता बढ़ गई है। पाकिस्तान के बाद अब थाईलैंड ने ईंधन बचाने के लिए सरकारी कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम करने का आदेश दिया है। थाई सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के विदेश यात्रा पर भी रोक लगा दी है और ऊर्जा बचत के लिए अलग-अलग उपाय लागू किए हैं। पाकिस्तान में भी सरकार ने खर्च कम करने के लिए सरकारी दफ्तरों को हफ्ते में चार दिन खोलने और आधे कर्मचारियों को घर से काम करने का फैसला किया है। वहीं वियतनाम ने लोगों से ईंधन बचाने की अपील की है और बांग्लादेश ने ऊर्जा संकट को देखते हुए विश्वविद्यालय बंद कर दिए हैं तथा छुट्टियों की अवधि बढ़ा दी है।

    इस संघर्ष का पर्यावरण पर भी असर दिखने लगा है। पाकिस्तान के मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि ईरान में हुए हवाई हमलों के बाद वहां से उठने वाला धुआं और प्रदूषण पाकिस्तान के पश्चिमी इलाकों तक पहुंच सकता है, जिससे हवा की गुणवत्ता खराब हो सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान के तेल भंडारण ठिकानों पर हमलों के बाद कई शहरों के ऊपर घना काला धुआं छाया हुआ है और वहां सांस लेना मुश्किल हो गया है।

    दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने भी इस स्थिति को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। कंपनी के सीईओ अमीन नासिर के अनुसार अगर युद्ध जारी रहता है और होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो वैश्विक तेल बाजार में बड़ा संकट पैदा हो सकता है। उन्होंने कहा कि इससे केवल ऊर्जा क्षेत्र ही नहीं बल्कि शिपिंग, बीमा, हवाई यात्रा, खेती और ऑटोमोबाइल जैसे कई उद्योगों पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा दुनिया में तेल का भंडार पहले ही पिछले पांच वर्षों के सबसे निचले स्तर के आसपास है, इसलिए सप्लाई में किसी भी बड़ी रुकावट से स्थिति और गंभीर हो सकती है।

    इसी बीच तुर्किये ने भी अपनी सुरक्षा बढ़ा दी है और देश के दक्षिण-पूर्वी इलाके में अमेरिकी पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम तैनात किया गया है। तुर्किये का कहना है कि हाल की घटनाओं को देखते हुए उसकी सीमाओं और हवाई क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत की जा रही है।

    उधर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि अमेरिकी नौसेना अब तक ईरान के 46 युद्धपोतों को डुबो चुकी है। उनके इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने कहा कि युद्ध कब खत्म होगा यह ईरान तय करेगा और अगर हमले जारी रहे तो क्षेत्र से एक लीटर तेल भी बाहर नहीं जाने दिया जाएगा।

    युद्ध का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने लगा है। मिस्र ने घरेलू ईंधन की कीमतों में करीब 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी कर दी है। सरकार का कहना है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध के कारण तेल सप्लाई और समुद्री परिवहन मार्ग प्रभावित हो रहे हैं, जिसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है।

    कुल मिलाकर मिडिल ईस्ट में जारी यह संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय युद्ध नहीं रह गया है। तेल सप्लाई, शरणार्थी संकट, पर्यावरण और वैश्विक अर्थव्यवस्था—इन सभी पर इसका असर साफ दिखाई देने लगा है और अगर हालात जल्द नहीं संभले तो दुनिया को एक बड़े ऊर्जा और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है।

  • ईरान युद्ध : ऑस्ट्रेलिया ने महिला फुटबॉल टीम की 5 खिलाड़ियों को मानवीय आधार पर शरण दी

    ईरान युद्ध : ऑस्ट्रेलिया ने महिला फुटबॉल टीम की 5 खिलाड़ियों को मानवीय आधार पर शरण दी

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असरखेल जगत तक पहुँच गया है। ऑस्ट्रेलिया सरकार ने ईरान की महिला फुटबॉल टीम की पांच खिलाड़ियों को मानवीय आधार पर शरण दे दी है। ये खिलाड़ी एशियाई टूर्नामेंट खेलने के लिए ऑस्ट्रेलिया आई थीं। युद्ध के बीच ईरान लौटने पर उन्हें सत्ता और सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई का डर था।

    ऑस्ट्रेलियाई गृह मामलों के मंत्री Tony Burke ने बताया कि मंगलवार तड़के ऑस्ट्रेलियाई संघीय पुलिस ने खिलाड़ियों को गोल्ड कोस्ट स्थित होटल से सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। वहां उनकी मुलाकात की गई और मानवीय वीजा की प्रक्रिया पूरी की गई। सरकार का कहना है कि यह फैसला मानवीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया, क्योंकि ईरान इस समय युद्ध की स्थिति से गुजर रहा है।

    खिलाड़ियों को शरण क्यों दी गई?
    ईरान की महिला फुटबॉल टीम पिछले महीने महिला एशियन कप खेलने के लिए ऑस्ट्रेलिया पहुंची थी। टूर्नामेंट खत्म होने के बाद टीम को ईरान लौटना था, लेकिन इस दौरान अमेरिका और इज़राइल के साथ युद्ध तेज हो गया। लगातार हमलों और असुरक्षा के माहौल ने खिलाड़ियों के भविष्य को संकट में डाल दिया। इसी कारण ऑस्ट्रेलिया ने पांच खिलाड़ियों को सुरक्षित रखने का निर्णय लिया।

    अमेरिकी प्रतिक्रिया
    अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने भी इस मुद्दे पर बयान दिया। उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों को ईरान वापस भेजना मानवीय गलती होगी। ट्रंप ने ऑस्ट्रेलिया से अपील की कि उन्हें शरण दी जाए, और यदि ऐसा नहीं होता तो अमेरिका उन्हें अपने देश में आश्रय देने को तैयार है।

    परिवारों की सुरक्षा भी चिंता का विषय
    कुछ खिलाड़ी अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर वापस ईरान लौटने की इच्छा भी जताना चाहती थीं। ट्रंप ने कहा कि कई खिलाड़ियों को डर था कि अगर वे वापस नहीं लौटतीं तो उनके परिवारों को नुकसान पहुंच सकता है।

    टूर्नामेंट के दौरान खिलाड़ियों का रवैया
    महिला एशियन कप के दौरान ईरानी खिलाड़ियों की स्थिति भी चर्चा में रही। दक्षिण कोरिया के खिलाफ पहले मैच में राष्ट्रीय गान के दौरान टीम ने शुरुआत में चुप्पी साधी। इसे विरोध या शोक की अभिव्यक्ति के रूप में देखा गया। बाद के मैचों में खिलाड़ियों ने गान गाया और सलामी दी। टीम की फॉरवर्ड Sara Didar ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने देश और परिवार के लिए अपनी चिंता जाहिर की।
    इस कदम से साफ है कि युद्ध का असर खेल जगत पर भी गहरा पड़ रहा है, और खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मानवीय कदम उठाए जा रहे हैं।

  • ईरान से टकराव में रोज अरबों डॉलर खर्च कर रहा अमेरिका

    ईरान से टकराव में रोज अरबों डॉलर खर्च कर रहा अमेरिका

    वॉशिंगटन। दुनिया में जब भी कोई युद्ध शुरू होता है तो आमतौर पर ध्यान बमबारी, मिसाइल हमलों और सैनिकों की तैनाती पर जाता है, लेकिन हर युद्ध की एक बड़ी कीमत भी होती है। अमेरिका और ईरान (Iran) के बीच जारी संघर्ष में अमेरिका का सैन्य खर्च तेजी से बढ़ रहा है। शुरुआती आकलन बताते हैं कि अमेरिका इस अभियान पर हर दिन अरबों डॉलर खर्च कर रहा है।

    यह खर्च केवल हथियारों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। इसमें मिसाइल, लड़ाकू विमानों का संचालन, नौसैनिक बेड़े की तैनाती, रक्षा प्रणाली, सैन्य ठिकानों का संचालन और युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई भी शामिल है।

    रोज करीब 891 मिलियन डॉलर का खर्च
    वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक Center for Strategic and International Studies के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका इस संघर्ष में प्रति दिन करीब 891.4 मिलियन डॉलर खर्च कर रहा है। यह अनुमान सैन्य अभियान Operation Epic Fury के पहले 100 घंटों के खर्च के आधार पर लगाया गया है।

    इन शुरुआती घंटों में कुल खर्च करीब 3.7 अरब डॉलर रहा, जिससे रोजाना खर्च का औसत करीब 891 मिलियन डॉलर निकाला गया। कुछ अन्य विश्लेषणों के मुताबिक वास्तविक खर्च इससे भी ज्यादा हो सकता है और यह 1 अरब से बढ़कर 1.43 अरब डॉलर प्रतिदिन तक पहुंच सकता है।

    सबसे ज्यादा पैसा हथियारों पर
    इस युद्ध में सबसे बड़ा खर्च हथियारों और मिसाइलों पर हो रहा है। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक करीब 3.1 अरब डॉलर केवल इस्तेमाल किए गए हथियारों और गोला-बारूद की भरपाई (म्यूनिशन रिप्लेसमेंट) पर खर्च किए गए हैं।

    इसके अलावा सैन्य ऑपरेशन चलाने में भी भारी खर्च आता है। इसमें युद्धपोत, लड़ाकू विमान, सैन्य ठिकाने और सैनिकों की तैनाती शामिल है। शुरुआती चरण में प्रत्यक्ष सैन्य संचालन पर लगभग 196 मिलियन डॉलर खर्च हुए, जबकि युद्ध में हुए नुकसान और सैन्य ढांचे की मरम्मत पर करीब 350 मिलियन डॉलर का अनुमान लगाया गया है।

    Pentagon के अधिकारियों के अनुसार, संघर्ष के पहले सप्ताह में ही कुल खर्च करीब 6 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जिसमें लगभग 4 अरब डॉलर सिर्फ मिसाइल और उन्नत इंटरसेप्टर सिस्टम पर खर्च हुए।

    विमानवाहक पोत की तैनाती भी महंगी
    युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत और नौसैनिक बेड़े को भी क्षेत्र में तैनात किया है। अनुमान है कि दो विमानवाहक पोतों के संचालन पर ही रोज करीब 13 मिलियन डॉलर खर्च होते हैं। इसके अलावा हवाई हमले, मिसाइल रक्षा प्रणाली और सैनिकों की आवाजाही जैसे कई सैन्य अभियानों से खर्च लगातार बढ़ रहा है।

    युद्ध लंबा चला तो बढ़ेगी लागत
    विश्लेषकों का कहना है कि अभी संघर्ष शुरुआती चरण में है, इसलिए खर्च बहुत ज्यादा दिखाई दे रहा है। अगर युद्ध लंबे समय तक चला तो इसकी कुल लागत और तेजी से बढ़ सकती है।

    पिछले युद्धों ने भी खाली किया खजाना
    अमेरिका के पिछले युद्धों का इतिहास बताता है कि लंबे सैन्य अभियान बेहद महंगे साबित होते हैं।

    Iraq War पर अमेरिका ने करीब 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए।

    War in Afghanistan की लागत लगभग 2.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई।

    9/11 के बाद विभिन्न युद्ध अभियानों पर अमेरिका का कुल खर्च करीब 8 ट्रिलियन डॉलर तक आंका गया है, जिसमें सैनिकों की देखभाल, कर्ज पर ब्याज और अन्य दीर्घकालिक खर्च भी शामिल हैं।

    असली खतरा तेल आपूर्ति पर
    विशेषज्ञों के मुताबिक इस संकट का सबसे बड़ा आर्थिक खतरा केवल युद्ध नहीं बल्कि ऊर्जा आपूर्ति है। Strait of Hormuz दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल परिवहन का प्रमुख समुद्री मार्ग है। अगर यहां लंबे समय तक बाधा आती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है।

    अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तो अमेरिका में महंगाई 1 से 2 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है।

    वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर
    तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से केवल ईंधन ही महंगा नहीं होगा, बल्कि परिवहन लागत, औद्योगिक उत्पादन और वैश्विक बाजारों पर भी दबाव बढ़ेगा। साथ ही अमेरिकी सेना का ईंधन खर्च भी बढ़ जाएगा, जिससे युद्ध की कुल लागत और ज्यादा हो सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था को 100 अरब डॉलर से ज्यादा का झटका लग सकता है। फिलहाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था शुरुआती खर्च संभाल सकती है, लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इसका आर्थिक बोझ काफी भारी पड़ सकता है।

  • ईरान युद्ध का असर पाकिस्तान पर, स्कूल-कॉलेज बंद

    ईरान युद्ध का असर पाकिस्तान पर, स्कूल-कॉलेज बंद

    लाहौर। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने के बाद पाकिस्तान सरकार ने ईंधन बचाने के लिए कई सख्त कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने घोषणा की है कि देश में स्कूल दो सप्ताह के लिए बंद रहेंगे, जबकि सरकारी दफ्तर अब सप्ताह में सिर्फ चार दिन ही खुलेंगे।

    समाचार एजेंसी Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने कहा है कि ईंधन की खपत कम करने के लिए बैंकों को छोड़कर अधिकतर सरकारी कार्यालय सीमित दिनों में काम करेंगे। साथ ही उच्च शिक्षा संस्थानों की कक्षाएं फिलहाल ऑनलाइन मोड में संचालित की जाएंगी।

    सरकारी दफ्तरों में आधा स्टाफ करेगा वर्क फ्रॉम होम

    सरकार के फैसले के अनुसार जरूरी सेवाओं को छोड़कर कई सरकारी विभागों में 50 प्रतिशत कर्मचारी घर से काम करेंगे। इसके अलावा अगले दो महीनों के दौरान सरकारी विभागों को मिलने वाले ईंधन में भी 50 फीसदी कटौती करने का फैसला किया गया है।
    क्यों लेना पड़ा यह फैसला
    पाकिस्तान में ईंधन संकट का मुख्य कारण मध्य-पूर्व में बढ़ता युद्ध और Strait of Hormuz में बढ़ा तनाव बताया जा रहा है।

    इस समुद्री मार्ग से पाकिस्तान को तेल की बड़ी आपूर्ति मिलती है। क्षेत्रीय हालात बिगड़ने के कारण आपूर्ति प्रभावित हुई है और कीमतों में तेज उछाल आया है।

    सरकार ने शनिवार देर रात पेट्रोल की कीमतों में 55 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की घोषणा की, जिसे देश के इतिहास में सबसे बड़ी बढ़ोतरी माना जा रहा है। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में पेट्रोलियम मंत्री Ali Pervaiz Malik, उप प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री Ishaq Dar और वित्त मंत्री Muhammad Aurangzeb भी मौजूद थे।

    डीज़ल भी हुआ महंगा
    सिर्फ पेट्रोल ही नहीं, बल्कि हाई-स्पीड डीज़ल की कीमत में भी करीब 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है।

    डीज़ल की कीमत 280.86 पाकिस्तानी रुपये से बढ़ाकर 335.86 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है।

    मंत्री अली परवेज मलिक ने कहा कि पड़ोसी क्षेत्र में शुरू हुआ संघर्ष अब पूरे इलाके को प्रभावित कर रहा है और फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि यह संकट कब तक जारी रहेगा।

    सरकार का मानना है कि अगर ईंधन की खपत पर अभी नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले समय में आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है, इसलिए अस्थायी तौर पर ये कड़े कदम उठाए गए हैं।

  • 52 साल बाद जापान पहुंचे ताइवान के पीएम, क्यों तिलमिलाया ड्रैगन?

    52 साल बाद जापान पहुंचे ताइवान के पीएम, क्यों तिलमिलाया ड्रैगन?

    वीजिंग। ताइवान के प्रधानमंत्री चो जुंग-ताई के जापान (Japan) दौरे को लेकर एशियाई राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है। ताइवान के प्रधानमंत्री के इस दौरे पर ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसके पीछे “नापाक मंशा” होने का आरोप लगाया है। बीजिंग का कहना है कि निजी यात्रा की आड़ में ताइवान की स्वतंत्रता को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।
    रिपोर्ट के मुताबिक ताइवान के प्रधानमंत्री सप्ताहांत में Japan पहुंचे थे, जहां उन्होंने World Baseball Classic में ताइवान की टीम का समर्थन किया। हालांकि ताइवान सरकार ने साफ किया कि यह पूरी तरह निजी दौरा था और इसका किसी आधिकारिक कूटनीतिक गतिविधि से कोई संबंध नहीं है।
    1972 के बाद पहली ऐसी यात्रा
    ताइवानी मीडिया के अनुसार, 1972 में टोक्यो और ताइपे के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध टूटने के बाद यह पहला मौका है जब किसी मौजूदा ताइवानी प्रधानमंत्री ने जापान का दौरा किया है।

    चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Guo Jiakun ने आरोप लगाया कि चो जुंग-ताई “चुपके और गुप्त तरीके से” स्वतंत्रता समर्थक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जापान को ऐसे “उकसावे” की कीमत चुकानी पड़ सकती है।

    जापान ने बताया निजी दौरा

    जापान ने इस पूरे मामले के राजनीतिक महत्व को कम करके दिखाने की कोशिश की है। जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव Minoru Kihara ने कहा कि टोक्यो इस यात्रा को निजी मानता है और इस दौरान ताइवानी प्रधानमंत्री तथा जापानी सरकारी अधिकारियों के बीच कोई आधिकारिक बैठक नहीं हुई।

    हालांकि जापान और Taiwan के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंध नहीं हैं, लेकिन दोनों के बीच मजबूत आर्थिक, सांस्कृतिक और अनौपचारिक राजनीतिक रिश्ते मौजूद हैं।

    ताइवान का चीन को जवाब
    ताइवान ने चीन की आलोचना को खारिज करते हुए कहा कि उसके नेताओं को अन्य देशों की यात्रा करने और उनसे संवाद करने का पूरा अधिकार है। ताइपे का कहना है कि चीन का ताइवान पर संप्रभुता का दावा निराधार है और द्वीप का भविष्य वहां की जनता तय करेगी।

    जापान से लौटने के बाद चो जुंग-ताई ने भी कहा कि उनकी यात्रा पूरी तरह निजी थी और इसका उद्देश्य ताइवान की राष्ट्रीय बेसबॉल टीम का समर्थन करना था।

    ऐतिहासिक रूप से जटिल रिश्ते

    ताइवान और जापान के रिश्ते इतिहास में काफी जटिल रहे हैं। Japan ने 1895 से लेकर 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने तक ताइवान पर उपनिवेश के रूप में शासन किया था।

    औपचारिक कूटनीतिक संबंध न होने के बावजूद दोनों के बीच मजबूत आर्थिक साझेदारी और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जारी है। 2022 में Lai Ching-te, जो उस समय ताइवान के उपराष्ट्रपति थे, Shinzo Abe की हत्या के बाद श्रद्धांजलि देने टोक्यो भी गए थे।

    क्यों नाराज रहता है चीन

    बीजिंग लंबे समय से ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और उसकी किसी भी अंतरराष्ट्रीय भागीदारी का विरोध करता रहा है। चीन का कहना है कि ताइवान के नेताओं और विदेशी सरकारों के बीच अनौपचारिक या प्रतीकात्मक संपर्क भी उसके “एक चीन” सिद्धांत को कमजोर कर सकता है।

    यही वजह है कि ताइवान के नेताओं के विदेश दौरों पर चीन अक्सर कड़ी प्रतिक्रिया देता रहा है और इस बार भी ऐसा ही देखने को मिला।

  • आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान ने अब सऊदी अरब से मांगी दीर्घकालिक आर्थिक मदद

    आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान ने अब सऊदी अरब से मांगी दीर्घकालिक आर्थिक मदद


    इस्लामाबाद।
    आर्थिक चुनौतियों (Economic Challenges) से जूझ रहे कंगाल पाकिस्तान (Poor Pakistan) ने सऊदी अरब (Saudi Arabia) से दीर्घकालिक आर्थिक सहायता की मांग की है। सोमवार को सामने आई एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद ने रियाद से कई वित्तीय सहायताओं का अनुरोध किया है, जिनमें 5 अरब डॉलर की मौजूदा अल्पकालिक जमा राशि को 10 साल की दीर्घकालिक सुविधा में बदलने का प्रस्ताव भी शामिल है।

    रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने सऊदी अरब से स्थगित भुगतान पर मिलने वाली तेल सुविधा को 1.2 अरब डॉलर से बढ़ाकर 5 अरब डॉलर करने और उसकी अवधि बढ़ाने का भी अनुरोध किया है। इसके अलावा पाकिस्तान ने प्रवासी नागरिकों द्वारा भेजे गए लगभग 10 अरब डॉलर के धन के प्रतिभूतिकरण (सिक्योरिटाइजेशन) का प्रस्ताव भी रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, शीर्ष सरकारी सूत्रों ने बताया कि अमेरिका और इजरायल के नेतृत्व में ईरान के खिलाफ जारी युद्ध से पैदा हुए भू-राजनीतिक तनाव के कारण पाकिस्तान की आर्थिक परेशानियां और बढ़ गई हैं।


    आईएमएफ के साथ भी चल रही बातचीत

    दूसरी ओर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के साथ 7 अरब डॉलर की विस्तारित निधि सुविधा (ईएफएफ) कार्यक्रम की तीसरी समीक्षा पूरी करने के लिए बातचीत कर रहा है। पाकिस्तान और सऊदी अरब पहले से ही व्यापक आर्थिक सहयोग पैकेज पर चर्चा कर रहे थे, लेकिन हालिया वैश्विक तनावों ने इन वार्ताओं को और तेज कर दिया है।

    रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान में जमा 5 अरब डॉलर की सऊदी राशि को दीर्घकालिक ऋण में बदलने का अनुरोध किया है। इस प्रस्ताव के तहत मौजूदा अल्पकालिक जमा को अनुकूल दरों पर 10 साल की ऋण सुविधा में बदला जा सकता है। दूसरे प्रस्ताव में स्थगित भुगतान के आधार पर मिलने वाली तेल सुविधा को बढ़ाने की मांग की गई है। इसके तहत मौजूदा 1.2 अरब डॉलर की व्यवस्था को बढ़ाकर 5 अरब डॉलर तक करने और भुगतान अवधि को एक साल से बढ़ाकर तीन साल करने का सुझाव दिया गया है।


    प्रवासी धन और अंतरराष्ट्रीय फंड जुटाने की योजना

    तीसरे प्रस्ताव के तहत पाकिस्तान ने प्रवासी नागरिकों द्वारा भेजी गई धनराशि के प्रतिभूतिकरण की योजना रखी है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने और महंगे विदेशी ऋण पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। चौथे प्रस्ताव में सऊदी अरब से पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय सुकुक (इस्लामिक बॉन्ड) जारी करने के प्रयासों के लिए गारंटी देने पर विचार करने को कहा गया है, जिससे पाकिस्तान को कम ब्याज दरों पर अंतरराष्ट्रीय बाजार से पूंजी जुटाने में मदद मिल सके।


    व्यापार और निवेश से जुड़े प्रस्ताव

    पाकिस्तान ने सऊदी अरब से एक्सिम ऋण लाइन उपलब्ध कराने का भी अनुरोध किया है। इसके अलावा इस्लामाबाद ने आयात से जुड़े लेनदेन के लिए बैंक गारंटी की अनिवार्यता को समाप्त करने पर भी विचार करने की अपील की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान ने सऊदी अरब के सार्वजनिक निवेश कोष (PIF) से देश में संभावित निवेश के अवसर तलाशने का भी आग्रह किया है। साथ ही आईएमएफ कार्यक्रम के अनुरूप कर सुधारों और प्राथमिक अधिशेष लक्ष्यों में संभावित समायोजन के लिए भी समर्थन मांगा गया है।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की ओर से किए गए इन आठ प्रमुख अनुरोधों पर सऊदी अरब की प्रतिक्रिया अभी स्पष्ट नहीं है। अखबार ने बताया कि उसने इस संबंध में पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय और स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान से भी संपर्क किया, लेकिन कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिली हैं।