पांच दिशाओं से सैन्य घेराबंदी
ताइवान की जवाबी तैयारी
पूर्वी तट बना सबसे अहम मोर्चा
अमेरिका-ताइवान हथियार सौदे से बढ़ा तनाव
ताइवान को लेकर चीन का रुख

पांच दिशाओं से सैन्य घेराबंदी
ताइवान की जवाबी तैयारी
पूर्वी तट बना सबसे अहम मोर्चा
अमेरिका-ताइवान हथियार सौदे से बढ़ा तनाव
ताइवान को लेकर चीन का रुख

यह पारंपरिक युद्ध से अलग है
राष्ट्रीय एकता की अपील
परमाणु कार्यक्रम पर विवाद
सेना को लेकर राष्ट्रपति का दावा
संभावित युद्ध के असर

सीबीएस न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने कहा, “यह बैठक शानदार रही। मैंने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी फोन पर लगभग दो घंटे से अधिक समय तक बातचीत की। अब लग रहा है कि हम शांति योजना पर बहुत करीब आ गए हैं। पुतिन और मैंने अभी यूरोपीय नेताओं से भी बात की। हमने यूक्रेन-रूस युद्ध को खत्म करने पर बहुत प्रगति की है। यह लड़ाई दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे घातक है।” जेलेंस्की ने कुछ दिन पहले इस मसले पर अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर से बातचीत कर चुके हैं।
यहां यह महत्वपूर्ण है कि ट्रंप की 20 सूत्री योजना के मसौदे की अभी क्रेमलिन समीक्षा नहीं कर सका है। मॉस्को ने अब तक अपनी क्षेत्रीय मांगों पर कोई नरमी दिखाने के संकेत भी नहीं दिए हैं। जेलेंस्की ने जरूर रविवार को कहा कि वह और ट्रंप योजना पर 90 फीसद सहमत हैं। ट्रंप और जेलेंस्की ने डोनबास जैसे क्षेत्रीय मुद्दों को “बहुत कठिन सवाल” बताया। जेलेंस्की ने यूक्रेन के शुभचिंतक देशों से रूस के शनिवार को कीव पर हमला करने के बावजूद शांति योजना पर समर्थन जारी रखने का आग्रह किया।
सीबीएस न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, जेलेंस्की ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा कि राष्ट्रपति ट्रपं के जनवरी में वाशिंगटन में यूरोपीय नेताओं की मेजबानी करेंगे। इस बैठक में वह भी मौजूद रहेंगे। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने और जेलेंस्की ने फ्रांस, फिनलैंड, पोलैंड, नॉर्वे, इटली, यूके और जर्मनी के नेताओं के साथ नाटो और यूरोपीय आयोग के नेताओं से भी बात की। जेलेंस्की ने इस दौरान यूक्रेन के लिए सुरक्षा गारंटी के महत्व पर जोर दिया। युद्ध खत्म होने संभावित समय-सीमा के सवाल पर ट्रंप ने कहा कि ” इसमें कुछ हफ्ते लग सकते हैं।
ट्रंप और जेलेंस्की के बीच चली लगभग ढाई घंटे की बातचीत के दौरान मार-ए-लागो के डाइनिंग रूम में विटकॉफ और कुशनर, व्हाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ सूसी वाइल्स, विदेश मंत्री मार्को रुबियो और युद्ध सचिव पीट हेगसेथ मौजूद रहे।

रिपोर्ट में बताया गया कि हिंसा बांग्लादेश के 30 से अधिक जिलों में हुई। इनमें रंगपुर, चांदपुर, चटगांव, दिनाजपुर, लालमोनिरहाट, सुनामगंज, खुलना, कुमिल्ला, गाजीपुर, टांगाइल और सिलहट जैसे जिले शामिल हैं। मानवाधिकार संगठन का कहना है कि इतने व्यापक इलाके में बार-बार इस तरह की घटनाओं का होना अल्पसंख्यक समुदाय की प्रणालीगत असुरक्षा को दर्शाता है।रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अक्सर सोशल मीडिया या निजी बातचीत में किसी व्यक्ति पर ईशनिंदा का आरोप लगाया जाता है। इसके बाद पुलिस कार्रवाई होती है, भीड़ इकट्ठा हो जाती है और हिंसा फैलती है। अक्सर हिंसा सिर्फ आरोपी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हिंदू मोहल्लों के घर, मंदिर और दुकानों को भी निशाना बनाया जाता है।
विशेष चिंता की बात यह है कि हिंसा में नाबालिग भी शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 90 फीसदी से ज्यादा आरोपी हिंदू थे, जिनमें 15 से 17 साल के नाबालिग भी शामिल थे। उदाहरण के लिए, 27 जुलाई 2025 को रंगपुर के बेटगारी यूनियन में एक 17 वर्षीय लड़के की गिरफ्तारी के बाद भीड़ ने कम से कम 22 हिंदू घरों में तोड़फोड़ की।एचआरसीबीएम के मुताबिक, कई मामलों में सोशल मीडिया खासतौर से फेसबुक का इस्तेमाल आरोपों के लिए हुआ। कई बार अकाउंट हैक पाए गए और पोस्ट की सच्चाई साबित नहीं हो सकी। इसके बावजूद पुलिस ने भीड़ के दबाव में आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। जांच पूरी होने से पहले ही FIR दर्ज कर दी जाती थी।
शिक्षण संस्थानों में भी इसका असर पड़ा। कई कॉलेज और यूनिवर्सिटी छात्रों को निलंबित किया गया, उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया और कुछ को पुलिस रिमांड में भेजा गया। रिपोर्ट में साइबर सिक्योरिटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों की संख्या भी उल्लेखनीय बताई गई है।रिपोर्ट में कई मौतों का भी जिक्र है। 18 दिसंबर 2025 को मयमनसिंह में 30 वर्षीय हिंदू युवक को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला और शव को जला दिया। खुलना में एक नाबालिग पर कथित तौर पर सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में हमला किया गया। इन घटनाओं ने कानून व्यवस्था और पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
भारत ने भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा पर गंभीर चिंता जताई है। विदेश मंत्रालय MEA ने हालात को लगातार जारी दुश्मनी करार दिया और दोषियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की मांग की।एचआरसीबीएम की रिपोर्ट साफ करती है कि बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यक विशेषकर हिंदू समुदाय लगातार असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। राजनीतिक अस्थिरता के इस दौर में रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और बांग्लादेश सरकार दोनों से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है।

स्थिति यह है कि परिवार नियोजन महानिदेशालय के पास उपलब्ध कंडोम का स्टॉक मात्र 39 दिनों के लिए बचा है। ऐसे में अगले वर्ष की शुरुआत में कम से कम एक महीने तक कंडोम वितरित नहीं किए जा सकेंगे। इससे परिवार नियोजन सेवाएं बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है।
50 वर्षों में पहली बार बढ़ी प्रजनन दर
यह संकट ऐसे समय सामने आया है जब देश में कुल प्रजनन दर के मामले में पिछले 50 वर्षों में पहली बार वृद्धि दर्ज की गई है। मल्टीपल इंडिकेटर क्लस्टर सर्वे 2025 के अनुसार, प्रजनन दर 2024 के 2.3 से बढ़कर 2.4 हो गई है। विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि गर्भनिरोधकों की कमी बनी रही तो प्रजनन दर और बढ़ सकती है।
गर्भनिरोधकों के उपयोग में भारी गिरावट
सर्वे के अनुसार, 15 से 49 वर्ष की विवाहित महिलाओं में गर्भनिरोधकों का उपयोग 2019 के 62.7% से घटकर 58.2% रह गया है। आधुनिक गर्भनिरोधकों तक पहुंच भी 77.4% से घटकर 73.5% रह गई है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि गर्भनिरोधकों की उपलब्धता और प्रजनन दर के बीच सीधा संबंध है।
कोविड के बाद बिगड़ी स्थिति
बांग्लादेश के अधिकारियों के मुताबिक, कोविड-19 महामारी (2020) के दौरान गर्भनिरोधकों की मांग तो बढ़ी, लेकिन सरकार ने उस समय परिवार नियोजन को प्राथमिकता नहीं दी। एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त वहां की मीडिया आुटलेट ‘द डेलीस्टार’ को बताया कि 2023 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने करीब एक साल तक गर्भनिरोधकों की खरीद रोक दी, जिससे आपूर्ति में भारी अंतर आ गया।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2019 में कंडोम की आपूर्ति 97.48 लाख थी, जो सितंबर 2025 तक घटकर 41.52 लाख रह गई। एक अधिकारी ने बताया कि सरकार ने पिछले महीने सभी पांच गर्भनिरोधकों की खरीद के लिए एक परियोजना को मंजूरी दी है, लेकिन खरीद प्रक्रिया पूरी होने में कम से कम तीन महीने लगेंगे। उन्होंने कहा कि सीमित मात्रा में कंडोम की खरीद की जा रही है, फिर भी अगले साल एक महीने तक सप्लाई बाधित रह सकती है।
ढाका विश्वविद्यालय के जनसंख्या विज्ञान विभाग के प्रोफेसर अमीनुल इस्लाम का कहना है कि गर्भनिरोधकों और स्टाफ की कमी ने जन्म नियंत्रण गतिविधियों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिसका सीधा असर प्रजनन दर पर पड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में कई दंपति दो से अधिक बच्चे चाहने लगे हैं, जो चिंता का विषय है।

अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से पाकिस्तानी तालिबान ने इस्लामाबाद की नाक में दम करके रखा है। नवंबर 2022 में पाकिस्तान सरकार के साथ संघर्ष विराम खत्म करने के बाद टीटीपी लगातार पुलिसकर्मियों और कानून व्यवस्था से जुड़े लोगों पर हमले करता रहा है। इसके चलते पाकिस्तान का खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांत लगातार अशांत हैं।
पाकिस्तान तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान को फितना अल खवारिज कहकर संबोधित करता है। उन्होंने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है। पाकिस्तान इसके कमांडरों को मारने के लिए लगातार अफगानिस्तान पर हमले करता रहता है। हाल ही में पाकिस्तान और तालिबान अफगानिस्तान के बीच जो लड़ाई शुरू हुई थी उसके पीछे तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान के कमांडरों पर किया गया हमला ही था। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार लगातार टीटीपी को समर्थन देती है, जबकि तालिबान का कहना है कि वह किसी भी तरह की आतंकी घटना के लिए अपने देश की जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देते।
क्या टीटीपी के लिए एयरफोर्स बनाना मुमकिन है?
तहरीक ए तालिबान के लिए एयरफोर्स बनाना आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए बहुत ही उच्च तकनीक की जरूरत होती है। आज से 20 या 15 साल पहले यह बात कर रहे होते, तो हमें इस बात को कोरी धमकी मान सकते थे। लेकिन ड्रोन वॉर फेयर के इस युग में टीटीपी किस स्तर पर वायुसेना बनाने की बात कर रहा है इस पर अभी तक ज्यादा खुलासा नहीं हुआ है। अगर टीटीपी के हाथ उच्च तकनीक वाले ड्रोन और रॉकेट लॉन्चर और अन्य चीजें जल जाती हैं, तो फिर यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ी परेशानी वाली बात होगी। हालांकि, तब भी पाकिस्तानी सेना का सामना कर पाना तालिबान के लिए आसान नहीं होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 44 वर्षीय प्रशांत श्रीकुमार की कनाडा के एडमंटन शहर के ग्रे नन्स अस्पताल में इलाज का इंतजार करते हुए मौत हो गई। वह पेशे से अकाउंटेंट थे और तीन बच्चों के पिता थे। 22 दिसंबर को काम के दौरान उन्हें सीने में तेज दर्द हुआ, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया। आरोप है कि गंभीर दर्द की शिकायत के बावजूद डॉक्टरों ने इसे गंभीर नहीं माना और उन्हें आठ घंटे से ज्यादा समय तक इंतजार कराया, जिससे उनकी मौत हो गई।
‘पापा, मैं दर्द सहन नहीं कर पा रहा’
प्रशांत के पिता कुमार श्रीकुमार ने बताया, ‘‘उसने मुझसे कहा, ‘पापा, मैं दर्द सहन नहीं कर पा रहा हूं।’ उसने अस्पताल कर्मियों को भी बताया कि उसे असहनीय दर्द हो रहा है।” परिजनों के अनुसार, इसके बाद अस्पताल में प्रशांत का इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी) किया गया था, लेकिन उन्हें बताया गया कि रिपोर्ट में कोई भी दिक्कत की बात सामने नहीं आई है और उन्हें इंतजार करने को कहा गया। उन्होंने बताया कि इस दौरान उनके बेटे को दर्द के लिए ‘टाएलेनॉल’ दवा दी गई। कुमार ने बताया कि वह इंतज़ार करता रहा, नर्से थोड़े अंतराल पर प्रशांत का रक्तचाप जांचती रहीं। कुमार ने बताया कि आठ घंटे से अधिक समय बीतने के बाद प्रशांत को उपचार के लिए बुलाया गया।
परिवार में पत्नी और तीन बच्चे
कुमार ने बताया, ‘‘बैठने के बाद 10 सेकंड ही बीते होंगे, उसने मुझे देखा, खड़ा हुआ, अपना हाथ सीने पर रखा और गिर पड़ा।’’ रिपोर्ट के अनुसार नर्सों ने चिकित्सकों को बुलाया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी, प्रत्यक्ष तौर पर हृदयाघात से उनकी मौत हो गई। प्रशांत के परिवार में पत्नी और तीन बच्चे हैं जिनकी उम्र तीन, 10 और 14 वर्ष है।
भारतीय छात्र की गोली मारकर हत्या मामले पर भी प्रतिक्रिया
इसी ब्रीफिंग में विदेश मंत्रालय ने कनाडा में भारतीय छात्र की गोली मारकर हत्या पर भी गहरा दुख जताया।
रणधीर जायसवाल ने कहा, “यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। हम पीड़ित परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं और स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर मामले की जानकारी जुटा रहे हैं।” इन दोनों घटनाओं के बाद कनाडा में भारतीय समुदाय की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति पर बात करते हुए प्रोफेसर ने कहा कि उनकी वैश्विक नीति क्या है इस पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा, “ट्रंप की वैश्विक नीति निजी लाभ पर आधारित है। उदाहरण के लिए पिछले 20 से 30 वर्षों में अमेरिका में किसी की भी सरकार रही हो, वह भारत के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश करती रही है। क्योंकि हम दक्षिण एशिया में चीन को काउंटर करना चाहते हैं। लेकिन ट्रंप ने भारत के साथ रिश्तों को केवल इसलिए खराब कर दिया क्योंकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए समर्थन नहीं किया था।”
प्रोफेसर ने कहा, “ट्रंप के इस फैसले से आप पूरी तरह से समझ सकते हैं कि कैसे उन्होंने अपने निजी लाभ के लिए अमेरिकी हितों को अलग रख दिया। ऐसे में अगर कोई यह सोच रहा है कि ट्रंप प्रशासन की कोई वैश्विक नीति होगी, तो वह परेशान ही होगा।”
आपको बता दें, इस साल जनवरी में जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में आए थे, तो भारत में लोगों की राय यह थी कि भारत और अमेरिका के रिश्ते सही होंगे। ट्रंप और पीएम मोदी की निजी दोस्ती दोनों देशों के बीच में मजबूत साझेदारी का आधार बनेगी। शुरुआती समय में ऐसा दिखा भी। लेकिन मई के महीने में सबकुछ बदल गया।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की तरफ से किए गए ऑपरेशन सिंदूर पर ट्रंप टीम का बयान दोस्ती वाला नहीं था। भारत सरकार के ऐलान करने से पहले ही ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए सीजफायर का ऐलान कर दिया। यह भारत सरकार के लिए असहज करने वाली स्थिति थी। इसके बाद ट्रंप लगातार इस बात को कहते रहे कि भारत और पाकिस्तान के बीच उन्होंने सीजफायर करवाया है, जबकि भारत ने शुरुआत से ही इस बात को कहा कि सीजफायर के लिए पाकिस्तानी डीजीएमओ की तरफ से फोन आया था इसके बाद यह हुआ।
दोनों देशों के बीच बिगड़ती इस परिस्थिति का पाकिस्तान ने बड़ी अच्छी तरह से फायदा उठाया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुले तौर पर इस सीजफायर के लिए ट्रंप को धन्यवाद किया और लगे हाथ उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए समर्थन भी दे दिया। इस पूरे वाकये के बाद भारत और अमेरिका के संबंध लगातार गिरावट की तरफ जाने लगे। अमेरिका ने भारत के ऊपर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया। ट्रंप और उनकी टीम की तरफ से लगातार भारत के खिलाफ बयानबाजी की जाने लगी। भारत ने भी अपनी स्थिति को साफ किया और ट्रंप या अमेरिका के आगे किसी भी तरीके से झुकने से इनकार कर दिया।
दरअसल, कश्मीर और पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय स्थिति पर भारत की स्थिति दशकों से साफ रही है कि भारत इसमें किसी भी तीसरे देश का दखल नहीं चाहता है। शिमला समझौते के तहत पाकिस्तान भी इस पर राजी है, लेकिन पाकिस्तान हमेशा से ही इस मुद्दे में तीसरे देश को शामिल करने के लिए तैयार रहता है। ऐसे में अगर पीएम मोदी नोबेल के लिए ट्रंप को समर्थन देते तो यह भारत की साख के लिए सही नहीं होता और न ही भारत के स्टैंड के मुताबिक होता।

टाइम्स ऑफ इजरायल की एक रिपोर्ट के अनुसार सोमालिया से अलग हुए इस क्षेत्र को 30 साल से अधिक समय के बाद किसी देश ने आधिकारिक तौर पर मान्यता दी है। इस ऐतिहासिक घोषणा पत्र पर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इजरायली विदेश मंत्री गिदेओन साआर ने हस्ताक्षर किए, जबकि सोमालिलैंड की तरफ से राष्ट्रपति अब्दुल्लाही ने।
दोनों ही नेताओं ने इस मान्यता पत्र को ऐतिहासिक पल बताया। नेतन्याहू ने कहा कि इस क्षण से दोनों देशों के बीच में ऐतिहासिक मित्रता की शुरुआत होती है। दोनों देश आर्थिक क्षेत्रों , कृषि और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में साथ मिलकर काम करेंगे। इजरायल का यह फैसला अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल में हुए अब्राहम अकॉर्ड की भावनाओं के अनुरूप है। इजरालय से मान्यता मिलने के बाद सोमालिलैंड ने कहा है कि वह भी इस समझौते में शामिल होना चाहता है। राष्ट्रपति ने एक्स पर अपनी खुशी जाहिर करते हुए लिखा कि यह दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी की शुरुआत है। उन्होंने कहा, “यह एक ऐतिसाहिक क्षण है। हम इसका गर्मजोशी के साथ स्वागत करते हैं।” सोमालिलैंड की राजधानी हरगेसा में भी लोगों ने इजरायल के इस कदम का स्वागत किया और सड़कों पर आकर जश्न मनाया।
अफ्रीकी संघ, सोमालिया समेत कई देशों ने जताई आपत्ति
इजरायल की नेतन्याहू सरकार के इस फैसले की कई देशों ने निंदा की है। सोमालिया ने इसे उसकी संप्रभुता पर जानबूझकर किया गया हमला बताया। सोमालिया के विदेश मंत्री ने कहा कि इस फैसले की वजह से क्षेत्र की शांति कमजोर होगी। वहीं, अफ्रीकी संघ ने कड़े शब्दों में इसकी निंदा करते हुए इस कदम को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि सोमालिलैंड नामक क्षेत्र अफ्रीकी महासंघ के सदस्य सोमालिया का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने कहा, “सोमालिया की एकता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को कमजोर करने की कोई भी कोशिश एक खतरनाक मिसाल का काम कर सकती है, जिससे पूरे महाद्वीप की शांति और स्थिरता पर दूरगामी प्रभाव होगा।
गृहयुद्ध से जूझ रहे सोमालिया के मुख्य सहयोगी तुर्किए ने इजरायल के इस फैसले का विरोध किया है। तुर्किए के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इजरायल की यह पहल उसकी विस्तारवादी नीति से मेल खाती है। यह सोमालिया के आंतरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप है। तुर्किए सोमालिया की एकता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
क्या है सोमालिलैंड की कहानी?
अफ्रीकी महाद्वीप के हॉर्न पर बसे सोमालिया के अंतर्गत माने जाने वाले सोमालिलैंड को मान्यता देने वाला इजरायल पहला देश बना है। अभी तक इस क्षेत्र को किसी भी देश ने स्वतंत्र देश की मान्यता नहीं दी है। हालांकि, ब्रिटेन इथियोपिया, तुर्किए, यूएई,डेनमार्क, कीनिया और ताइवान जैसे देशों के साथ उसके अनौपचारिक राजनयिक संबंध हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से 1960 के दशक में सोमालिलैंड को कुछ समय के लिए स्वतंत्रता मिली थी और उस समय इजरायल समेत कुल 35 देशों ने उसे मान्यता दी थी। लेकिन फिर बाद में वह स्वेच्छा से सोमालिया के साथ एकीकृत हो गया था। बाद में जब 1991 में सोमालिया गृहयुद्ध में उलझ गया तो सोमालिलैंड ने फिर से खुद को स्वतंत्र घोषित कर लिया। तब से लेकर अभी तक सोमालिलैंड एक अलग राज्य के रूप में ही काम कर रहा है। इसकी अपनी सरकार, अपनी मुद्रा और सुरक्षा बल है। सोमालिया के लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष के विपरीत सोमालिलैंड में अपेक्षाकृत शांत और स्थिर शासन देखने को मिलता है।
क्या हैं इसके मायने?
इजरायल का यह फैसला एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। विश्लेषकों के अनुसार, सोमालिलैंड की भौगौलिक स्थिति महत्वपूर्ण है। रेड सी के पास इजरायल को साझेदारों की जरूरत है। इन साझेदारों की मदद से वह भविष्य में यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। इसके अलावा अब्राहम अकॉर्ड में एक और देश के शामिल होने से इजरायल को भी इसका लाभ होगा। हालांकि, इससे अन्य देश भड़क भी सकते हैं। वहीं,दूसरी ओर सोमालिलैंड पिछले 30 साल से अंतर्राष्ट्रीय मान्यता पाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में इजरायल की तरफ से मिली यह मान्यता उसके लिए एक बड़ी संभावना की तरह है। मान्यता के बिना यह क्षेत्र गंभीर गरीबी से जूझ रहा है। क्योंकि इसे विदेशी लाभ भी लगभग न के बराबर मिलता है।

पूर्व राजदूत महेश सचदेवा ने कहाकुछ हफ्तों में हिंदू युवक की हत्या की यह दूसरी घटना सामने आई हैजिसमें ज्यादातर सांप्रदायिक नफरत की वजह से हत्या की गई है। इससे कई तरह की चिंताएं पैदा हुई हैं। सबसे पहलेइससे पता चलता है कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सुरक्षा पक्की करने के लिए संघर्ष कर रही है।
उन्होंने आगे कहादूसरा यह बांग्लादेश के राजनीतिक माहौल में गहरी पैठ जमाए हुए ‘इस्लामवाद’ को दिखाता हैजिसमें पार्टियां अपने विरोधियों से ज्यादा मुस्लिम समर्थक और कट्टरपंथी दिखने की होड़ में हैं। तीसराइससे यह सवाल उठता है कि क्या 12 फरवरी के चुनाव के बाद सांप्रदायिक दुश्मनी की यह लहर कम हो जाएगी या अगर ये ताकतें सत्ता में आती हैंतो क्या हालात और बिगड़ सकते हैं।
तारिक रहमान की वापसी को लेकर महेश सचदेवा ने कहा17 साल के निर्वासन के बादतारिक रहमान बांग्लादेश लौट आए हैं। इस बात का चुनावी प्रक्रिया पर असर पड़ सकता हैक्योंकि 12 फरवरी के चुनाव में बीएनपी को सबसे आगे देखा जा रहा है। उन्होंने सुलह वाली बातें कहीइस बात पर जोर दिया कि बांग्लादेश मुसलमानों और ईसाइयों समेत सभी का है। निर्वासन के दौरान देश के विकास की तारीफ की और अवामी लीग सरकार के सुधारों को भी माना। जानकार बांग्लादेश की मौजूदा उथल-पुथल के बीच भारत और उनके आर्थिक और सामाजिक एजेंडे पर नरम रुख पर नजर रख रहे हैं।
बता देंढाका नॉर्थ सिटी यूनिट ने पुरबाचल इलाके में जुलाई 36 एक्सप्रेसवे पर बीएनपी ने सफाई अभियान चलाया। इस सड़क का इस्तेमाल तारिक रहमान की रैली के लिए किया गया था। जुलाई 36 एक्सप्रेसवे को 300-फीट रोड के नाम से जाना जाता है। सफाई अभियान के दौरान ढाका नॉर्थ सिटी कॉर्पोरेशन डीएसीसी के वर्करपार्टी कार्यकर्ता और 300 किराए के सफाई कर्मचारी शामिल रहे और कचरे-मलबे को हटाया।
ढाका नॉर्थ बीएनपी के संयोजक अमीनुल हक ने इस अभियान का नेतृत्व किया। कचरे को जल्दी हटाने के लिए सोलह ट्रक किराए पर लिए गए। इसके अलावाराजधानी के अलग-अलग इलाकों से 300 सफाई कर्मचारी लाए गए। इस बीचडीएनसीसी के सफाई कर्मचारी भी सड़क से कचरा साफ करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।