Category: International

  • ब्रह्मोस की बराबरी का दावा, लेकिन ‘फेल’ रही फतह-3! चीन की मिसाइल बेचने में जुटा पाकिस्तान, खाड़ी देशों को साधने की कोशिश

    ब्रह्मोस की बराबरी का दावा, लेकिन ‘फेल’ रही फतह-3! चीन की मिसाइल बेचने में जुटा पाकिस्तान, खाड़ी देशों को साधने की कोशिश




    नई दिल्ली। भारत के खिलाफ सैन्य संतुलन बनाने की कोशिश में पाकिस्तान अब चीन निर्मित हथियारों को खाड़ी देशों तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहा है। पाकिस्तानी सेना अपनी ‘फतह-3’ मिसाइल को भारत की ब्रह्मोस मिसाइल का जवाब बताकर सऊदी अरब और कतर जैसे देशों को आकर्षित करने में जुटी है। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह मिसाइल भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम के सामने प्रभावी साबित नहीं हो सकी थी।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान खुद को खाड़ी देशों का सुरक्षा साझेदार दिखाने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका-ईरान तनाव के बाद इस्लामाबाद ने रक्षा सहयोग को बढ़ाने के लिए चीन के हथियारों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। पहले जेएफ-17 फाइटर जेट और अब फतह-3 मिसाइल को लेकर पाकिस्तान बड़े दावे कर रहा है।

    पाकिस्तानी मीडिया फतह-3 को सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बताते हुए इसे ब्रह्मोस की टक्कर का हथियार बता रहा है। दावा किया जा रहा है कि यह जमीन और समुद्री दोनों लक्ष्यों पर हमला करने में सक्षम है और कम ऊंचाई पर तेज रफ्तार से उड़ान भरने के कारण इसे रोकना मुश्किल है। लेकिन रक्षा जानकारों का कहना है कि इसकी तकनीक काफी हद तक चीन की HD-1 मिसाइल पर आधारित है, जिसे Guangdong Hongda कंपनी ने विकसित किया था।

    बताया जा रहा है कि फतह-3 की रेंज करीब 290 से 450 किलोमीटर तक है और यह 240 से 450 किलोग्राम तक का वारहेड ले जा सकती है। इसकी गति 2.5 से 4 मैक तक बताई जाती है। वहीं दूसरी ओर भारत की ब्रह्मोस मिसाइल लंबी रेंज, अधिक सटीकता और भारी मारक क्षमता के लिए जानी जाती है।

    ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने ब्रह्मोस मिसाइलों के जरिए पाकिस्तान के कई अहम सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। रिपोर्ट्स के अनुसार नूर खान एयरबेस के पास हुए हमलों ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को झटका दिया था। इसके बाद पाकिस्तान ने अपनी मिसाइल क्षमता को बढ़ाने और नए खरीदार तलाशने की कोशिशें तेज कर दी हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन पाकिस्तान के जरिए खाड़ी देशों के हथियार बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है, जहां अब तक अमेरिका और पश्चिमी देशों का दबदबा रहा है। इसी रणनीति के तहत पाकिस्तान खुद को रक्षा साझेदार के रूप में पेश कर रहा है और चीनी तकनीक वाले हथियारों को “कम लागत वाला विकल्प” बताकर प्रचारित कर रहा है।

    रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि सऊदी अरब भविष्य में फतह-3 मिसाइल या जेएफ-17 फाइटर जेट में रुचि दिखा सकता है, क्योंकि वह क्षेत्रीय खतरों को देखते हुए अपनी सैन्य ताकत को तेजी से बढ़ा रहा है। हालांकि रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि ब्रह्मोस जैसी उन्नत मिसाइल प्रणाली की बराबरी करना पाकिस्तान और चीन दोनों के लिए अभी बड़ी चुनौती बना हुआ है।

  • आसिम मुनीर की भारत को चेतावनी: ‘भविष्य में होगा दर्दनाक अंजाम’, ऑपरेशन सिंदूर को लेकर फिर बढ़ा तनाव

    आसिम मुनीर की भारत को चेतावनी: ‘भविष्य में होगा दर्दनाक अंजाम’, ऑपरेशन सिंदूर को लेकर फिर बढ़ा तनाव



    नई दिल्ली। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने एक बार फिर भारत के खिलाफ सख्त बयान देते हुए भविष्य में “दर्दनाक परिणाम” भुगतने की चेतावनी दी है। यह बयान रावलपिंडी स्थित GHQ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सामने आया, जो कथित तौर पर ऑपरेशन सिंदूर के एक वर्ष पूरे होने के मौके पर आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में पाकिस्तान की वायुसेना और नौसेना के शीर्ष अधिकारी भी मौजूद रहे।

    आसिम मुनीर ने दावा किया कि 6 और 7 मई की रात भारत ने पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन किया था, जिसका जवाब पाकिस्तान ने पूरी ताकत से दिया। उन्होंने यह भी कहा कि अगर भविष्य में पाकिस्तान के खिलाफ ऐसी कोई कार्रवाई होती है, तो उसका जवाब “बहुत बड़ा और दर्दनाक” होगा।

    अपने संबोधन में उन्होंने भारत पर कई पुराने आतंकी हमलों के बाद की गई कार्रवाइयों को “फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन” बताने का आरोप लगाया और कहा कि भारत पाकिस्तान पर दबाव बनाने की कोशिश करता है। हालांकि भारत इन सभी आरोपों को पहले ही सिरे से खारिज कर चुका है और उसका कहना है कि उसकी सभी कार्रवाइयां आतंकवाद के खिलाफ और आत्मरक्षा में होती हैं।

    भारत ने स्पष्ट किया है कि वह पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख जारी रखेगा। पिछले वर्षों में सीमा पार आतंकी ठिकानों पर की गई कार्रवाई को भारत अपनी सुरक्षा नीति का हिस्सा बताता रहा है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बाद एक बार फिर भारत-पाकिस्तान के बीच बयानबाजी तेज हो गई है और क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

  • इजरायल, ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव पर बड़ा दावा: ‘युद्ध भड़काने की थी साजिश, लेकिन MBS ने रोका बड़ा संकट’

    इजरायल, ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव पर बड़ा दावा: ‘युद्ध भड़काने की थी साजिश, लेकिन MBS ने रोका बड़ा संकट’



    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर बड़े दावों और आरोपों को लेकर सुर्खियों में है। सऊदी अरब के पूर्व खुफिया प्रमुख और पूर्व राजदूत प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने दावा किया है कि यदि इजरायल की कथित रणनीति सफल हो जाती, तो ईरान और सऊदी अरब के बीच सीधा सैन्य संघर्ष भड़क सकता था, जिससे पूरा क्षेत्र विनाशकारी युद्ध की चपेट में आ जाता। हालांकि उन्होंने कहा कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) की सूझबूझ और संयम की नीति के चलते सऊदी अरब इस बड़े संकट से बच गया।

    पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ते आरोप
    तुर्की अल-फैसल ने अपने लेख में दावा किया कि हाल के वर्षों में क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच कुछ बाहरी ताकतें चाहती थीं कि सऊदी अरब और ईरान सीधे टकराव में आ जाएं। उनके अनुसार, यदि यह स्थिति बनती तो खाड़ी देशों की तेल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और नागरिक ढांचे को भारी नुकसान पहुंच सकता था।

    हालांकि यह सभी दावे उनके व्यक्तिगत विश्लेषण और राय पर आधारित हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद यह बयान क्षेत्रीय भू-राजनीति की जटिलता को उजागर करता है।

    सऊदी अरब की ‘संयम नीति’ का दावा
    तुर्की अल-फैसल का कहना है कि सऊदी नेतृत्व ने इस पूरे तनाव के दौरान आक्रामक प्रतिक्रिया देने के बजाय कूटनीति और संयम का रास्ता अपनाया। उनके मुताबिक, अगर सऊदी अरब ईरान के हमलों का सैन्य जवाब देता, तो हालात तेजी से युद्ध में बदल सकते थे और खाड़ी क्षेत्र की तेल सुविधाएं गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती थीं।

    उन्होंने दावा किया कि सऊदी अरब ने पर्दे के पीछे रहकर तनाव को कम करने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की।

    ‘युद्ध में धकेलने की कोशिश’ का आरोप
    पूर्व खुफिया प्रमुख ने यह भी आरोप लगाया कि सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक समूहों के जरिए सऊदी अरब पर दबाव बनाने और उसे संघर्ष में खींचने की कोशिश की गई। लेकिन नेतृत्व ने सार्वजनिक बयानबाजी से दूरी बनाकर स्थिति को बिगड़ने से रोका। उनके अनुसार, यदि उस समय स्थिति नियंत्रण से बाहर जाती तो क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और सुरक्षा ढांचे को भारी नुकसान पहुंच सकता था।

    MBS की रणनीति पर फोकस
    तुर्की अल-फैसल ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की नीति को “दूरदर्शी और व्यावहारिक” बताया। उनके अनुसार, सऊदी अरब ने सीधे टकराव से बचकर क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता दी, जिससे एक बड़े युद्ध की आशंका टल गई।

    क्षेत्रीय राजनीति पर असर
    यह बयान ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों के बीच तनाव पहले से ही उच्च स्तर पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के दावे भले ही राजनीतिक दृष्टिकोण हों, लेकिन ये क्षेत्र में जारी शक्ति संतुलन और कूटनीतिक संघर्ष को दर्शाते हैं।

    तुर्की अल-फैसल का यह दावा एक बार फिर दिखाता है कि पश्चिम एशिया की राजनीति कितनी जटिल और संवेदनशील है। जहां एक ओर सैन्य तनाव की आशंकाएं बनी रहती हैं, वहीं दूसरी ओर कूटनीति और संयम कई बार बड़े युद्धों को टालने में अहम भूमिका निभाते हैं।

  • भ्रष्टाचार विवाद के बीच चीन का भावनात्मक दांव: गलवान शहीदों की माताओं का वीडियो जारी कर बदली सियासी नैरेटिव

    भ्रष्टाचार विवाद के बीच चीन का भावनात्मक दांव: गलवान शहीदों की माताओं का वीडियो जारी कर बदली सियासी नैरेटिव

    नई दिल्ली। चीन में सेना के भीतर भ्रष्टाचार और नेतृत्व स्तर पर सख्त कार्रवाई की खबरों के बीच बीजिंग ने ध्यान भटकाने के लिए एक भावनात्मक रणनीति अपनाई है। मदर्स डे (10 मई) के मौके पर सरकारी मीडिया ने गलवान घाटी संघर्ष में मारे गए सैनिकों की माताओं का वीडियो जारी किया, जिसमें उन्हें अपने बेटों की याद में भावुक होते दिखाया गया।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, वीडियो में 2020 के गलवान संघर्ष में मारे गए सैनिकों के परिजनों को ‘चीनी जन क्रांति सैन्य संग्रहालय’ का दौरा करते दिखाया गया, जहां वे अपने बेटों की प्रतिमाएं देखकर भावुक हो उठीं। इस कंटेंट को चीनी मीडिया ने देशभक्ति और बलिदान की भावना से जोड़कर पेश किया।

    विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब पीएलए (People’s Liberation Army) में भ्रष्टाचार और उच्च अधिकारियों पर कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में पूर्व रक्षा मंत्रियों वेई फेंगहे और ली शांगफू को लेकर सामने आए कथित भ्रष्टाचार मामलों ने चीन की सैन्य व्यवस्था पर बहस तेज कर दी है।

    सोशल मीडिया पर भी चीनी नागरिकों के बीच सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और हथियार खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी को लेकर चर्चा बढ़ी हुई है। ऐसे में गलवान शहीदों के वीडियो को सरकार की तरफ से भावनात्मक और राष्ट्रवादी माहौल बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

    यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि चीन किस तरह संवेदनशील राष्ट्रीय घटनाओं का इस्तेमाल आंतरिक राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार विवादों से ध्यान हटाने के लिए करता है।

  • परिसीमन पर विदेश में छिड़ी बड़ी बहस: थरूर बोले दक्षिण भारत को नुकसान, अन्नामलाई ने बताया जनसंख्या आधारित सिस्टम जरूरी

    परिसीमन पर विदेश में छिड़ी बड़ी बहस: थरूर बोले दक्षिण भारत को नुकसान, अन्नामलाई ने बताया जनसंख्या आधारित सिस्टम जरूरी



    नई दिल्ली। अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में आयोजित एक चर्चा के दौरान परिसीमन और संसदीय सीटों के बंटवारे को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद देखने को मिला। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने चेतावनी दी कि अगर लोकसभा सीटों का बंटवारा केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो दक्षिण भारत के राज्यों को राजनीतिक रूप से नुकसान महसूस हो सकता है और उनके अधिकारों पर असर पड़ सकता है।

    थरूर ने कहा कि उत्तर भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, जिससे वहां एक सांसद पर ज्यादा आबादी आ जाती है, जबकि दक्षिण भारत में स्थिति अलग है। उन्होंने आशंका जताई कि अगर इसी आधार पर सीटें बढ़ीं तो उत्तर भारत संसद में बहुमत के जरिए नीतियों को दक्षिण पर थोप सकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि बड़े राज्यों के पुनर्गठन पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के विभाजन पर।

    वहीं बीजेपी नेता के. अन्नामलाई ने थरूर की बातों का विरोध करते हुए कहा कि संसदीय प्रतिनिधित्व का आधार जनसंख्या ही होना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में हर नागरिक की बराबर भागीदारी जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होता है, तो तमिलनाडु जैसी राज्यों की सीटें भी बढ़ती हैं, जो प्रक्रिया को संतुलित बनाती है।

    अन्नामलाई ने यह भी कहा कि लगातार यह चिंता करना कि किसी राज्य को फायदा या नुकसान होगा, समाधान नहीं है, बल्कि एक ऐसा मॉडल चाहिए जो सभी राज्यों के लिए संतुलित और व्यावहारिक हो।

    इस चर्चा में शशि थरूर ने महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए और इसे परिसीमन प्रक्रिया से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

    गौरतलब है कि परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों में लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने और महिलाओं के लिए 33% आरक्षण देने की बात शामिल थी, लेकिन इस पर राजनीतिक सहमति नहीं बन सकी। विपक्ष ने महिला आरक्षण का समर्थन किया, लेकिन परिसीमन के मौजूदा स्वरूप पर आपत्ति जताई।

  • हंता वायरस से दहशत: क्रूज पर संक्रमण की पुष्टि, 17 अमेरिकी यात्रियों को इमरजेंसी फ्लाइट से अमेरिका शिफ्ट

    हंता वायरस से दहशत: क्रूज पर संक्रमण की पुष्टि, 17 अमेरिकी यात्रियों को इमरजेंसी फ्लाइट से अमेरिका शिफ्ट



    नई दिल्ली। अमेरिका में हंता वायरस को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ गई है, जब डच क्रूज जहाज एमवी होंडियस पर सवार एक अमेरिकी यात्री में संक्रमण की पुष्टि हुई। एक अन्य यात्री में हल्के लक्षण पाए गए हैं। अमेरिकी स्वास्थ्य एवं मानव सेवा विभाग के अनुसार स्थिति को देखते हुए जहाज पर मौजूद 17 अमेरिकी नागरिकों को तुरंत विशेष विमान के जरिए अमेरिका वापस लाया जा रहा है।

    सभी यात्रियों को बायोकंटेनमेंट यूनिट में रखा गया है ताकि संक्रमण के फैलाव को रोका जा सके। प्रोटोकॉल के तहत इन यात्रियों को पहले नेब्रास्का के ओमाहा स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का मेडिकल सेंटर के विशेष उपचार केंद्र में ले जाया जाएगा, जहां सभी की विस्तृत जांच होगी। इसके बाद जरूरत के अनुसार उन्हें दूसरे केंद्रों में शिफ्ट किया जाएगा और उपचार दिया जाएगा।

    जानकारी के मुताबिक शनिवार तक इस प्रकोप से जुड़े 8 संदिग्ध मामले और 3 मौतें भी दर्ज की जा चुकी हैं, जिससे स्थिति की गंभीरता और बढ़ गई है।

    अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (CDC) के अनुसार हंता वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड 1 से 8 सप्ताह तक हो सकता है। यह वायरस मुख्य रूप से चूहों जैसे रोडेंट्स से फैलता है, हालांकि दुर्लभ मामलों में मानव से मानव संक्रमण भी संभव है। विशेषज्ञों के मुताबिक संक्रमित मामलों में मृत्यु दर एक-तिहाई से भी अधिक हो सकती है।

    इसी बीच ब्रिटेन में भी इसी जहाज से निकाले गए 20 यात्रियों को आइसोलेशन में रखा गया है। उन्हें मैनचेस्टर से अस्पताल ले जाकर 72 घंटे की निगरानी में रखा गया है। यदि लक्षण नहीं दिखते हैं तो उन्हें घर भेजा जाएगा, लेकिन 42 दिन तक सेल्फ-आइसोलेशन अनिवार्य रहेगा।

    ब्रिटिश सरकार ने अपने दूरस्थ क्षेत्र ट्रिस्टन दा कुन्हा में भी मेडिकल और सैन्य टीम भेजी है, जहां एक व्यक्ति में संक्रमण की पुष्टि हुई है। यह पहली बार है जब ब्रिटेन ने ऐसे मानवीय मिशन के लिए पैराशूट के जरिए डॉक्टरों को भेजा है।

    हालांकि स्वास्थ्य एजेंसियों ने साफ किया है कि आम जनता के लिए इस वायरस का खतरा बेहद कम है, लेकिन क्रूज और अंतरराष्ट्रीय यात्रा से जुड़े मामलों ने वैश्विक स्वास्थ्य सतर्कता को फिर से बढ़ा दिया है।

  • बांग्लादेश–पाकिस्तान डील से बढ़ा साउथ एशिया में सस्पेंस, खुफिया सहयोग और सुरक्षा गठजोड़ पर उठे सवाल

    बांग्लादेश–पाकिस्तान डील से बढ़ा साउथ एशिया में सस्पेंस, खुफिया सहयोग और सुरक्षा गठजोड़ पर उठे सवाल




    नई दिल्ली। बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच हाल के समय में बढ़ते सुरक्षा और प्रशासनिक सहयोग ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। दोनों देशों के बीच नशे की तस्करी, मनी लॉन्ड्रिंग और सीमा पार अपराधों से निपटने को लेकर एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिसे 10 वर्षों के लिए मान्य बताया गया है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, इस समझौते के तहत दोनों देश खुफिया जानकारी साझा करने, संयुक्त अभियान चलाने और नशीले पदार्थों की तस्करी से जुड़े नेटवर्क को खत्म करने पर काम करेंगे। इसमें उभरते तस्करी रास्तों और नई छिपाने की तकनीकों की जानकारी साझा करने जैसे प्रावधान भी शामिल हैं।

    हालांकि विशेषज्ञ इस समझौते को लेकर सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच कोई सीधी जमीनी सीमा नहीं है, जिससे इस तरह के सहयोग के वास्तविक उद्देश्यों पर चर्चा तेज हो गई है। इसी वजह से इसे केवल अपराध नियंत्रण नहीं बल्कि रणनीतिक और कूटनीतिक बदलाव के रूप में भी देखा जा रहा है।

    रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि बांग्लादेश के कुछ वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी पाकिस्तान में प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं, जिससे दोनों देशों के बीच संस्थागत स्तर पर संपर्क बढ़ रहा है। कुछ विश्लेषक इसे बांग्लादेश की बदलती विदेश नीति और क्षेत्रीय समीकरणों में संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम में बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका और उसकी क्षेत्रीय रणनीति पर भी नजर रखी जा रही है, क्योंकि यह बदलाव दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

    कुल मिलाकर, बांग्लादेश-पाकिस्तान सहयोग का यह नया दौर केवल सुरक्षा समझौते तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि इसके पीछे क्षेत्रीय कूटनीति और रणनीतिक हितों की एक बड़ी परत जुड़ी हुई मानी जा रही है।

  • ट्रंप-शी जिनपिंग मुलाकात से बदलेगा वैश्विक शक्ति संतुलन? ईरान, रूस और रेयर अर्थ पर टिकी दुनिया की नजर

    ट्रंप-शी जिनपिंग मुलाकात से बदलेगा वैश्विक शक्ति संतुलन? ईरान, रूस और रेयर अर्थ पर टिकी दुनिया की नजर



    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा को लेकर वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है, जहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से होने वाली है। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब ईरान, रूस और रेयर अर्थ जैसे मुद्दों पर अमेरिका-चीन के बीच तनाव पहले से ही बढ़ा हुआ है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार इस दौरे में ईरान से जुड़ा तेल व्यापार, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और चीन द्वारा रूस को दिए जा रहे समर्थन जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा हो सकती है। इसके साथ ही अमेरिका की नजर चीन के रेयर अर्थ मिनरल्स पर भी है, जो वैश्विक तकनीकी उद्योग के लिए बेहद अहम माने जाते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और अमेरिका के बीच यह बातचीत केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका असर वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी पड़ेगा। खासकर ईरान संकट और यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दे इस बैठक को और जटिल बना रहे हैं।

    भारत के दृष्टिकोण से यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अमेरिका और चीन दोनों ही उसकी रणनीतिक साझेदारी और सुरक्षा नीति पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। दोनों देशों के रिश्तों में किसी भी बदलाव का असर भारत की कूटनीति और क्षेत्रीय रणनीति पर साफ दिखाई दे सकता है।

    कुल मिलाकर, ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात सिर्फ एक कूटनीतिक बैठक नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति के कई बड़े समीकरणों को प्रभावित करने वाला अहम घटनाक्रम माना जा रहा है, जिस पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।

  • ट्रम्प का ईरान को बड़ा झटका, शांति प्रस्ताव खारिज; परमाणु शर्तों पर बढ़ा टकराव, होर्मुज में तनाव गहराया

    ट्रम्प का ईरान को बड़ा झटका, शांति प्रस्ताव खारिज; परमाणु शर्तों पर बढ़ा टकराव, होर्मुज में तनाव गहराया



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर तेज हो गया है, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के शांति प्रस्ताव को खारिज करते हुए कड़े रुख का संकेत दिया है। ट्रम्प ने साफ कहा कि ईरान की ओर से भेजा गया प्रस्ताव उन्हें स्वीकार नहीं है, जिससे क्षेत्र में कूटनीतिक हलचल और बढ़ गई है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका को नया प्रस्ताव भेजा था, जिसमें युद्धविराम, प्रतिबंधों में राहत और परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत की बात शामिल थी। इसके जवाब में अमेरिका ने शर्त रखी कि ईरान को उच्च संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) अमेरिका को सौंपना होगा और लंबे समय तक परमाणु संवर्धन रोकना होगा।

    इस पूरे विवाद की जड़ ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी है, जहां अमेरिका और पश्चिमी देश इसे सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं, जबकि ईरान इसे शांतिपूर्ण ऊर्जा जरूरतों से जोड़कर देखता है। इसी टकराव के कारण दोनों देशों के बीच बातचीत बार-बार रुकती और शुरू होती रही है।

    तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में हालात भी संवेदनशील बने हुए हैं, जहां वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। किसी भी टकराव का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक इस कूटनीतिक गतिरोध के साथ-साथ क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां और बयानबाजी भी तेज हो गई हैं, जिससे पश्चिम एशिया में अस्थिरता और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

    कुल मिलाकर यह स्थिति दिखाती है कि ईरान-अमेरिका संबंध एक बार फिर टकराव की दिशा में बढ़ रहे हैं, जहां बातचीत और दबाव की राजनीति दोनों साथ-साथ चल रही हैं और किसी भी फैसले का असर वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा सकता है।

  • म्यांमार के खनिजों पर चीन की पकड़ से बढ़ी भारत की चिंता, गृहयुद्ध में बदला भू-राजनीतिक खेल

    म्यांमार के खनिजों पर चीन की पकड़ से बढ़ी भारत की चिंता, गृहयुद्ध में बदला भू-राजनीतिक खेल



    नई दिल्ली। म्यांमार 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद से लगातार गृहयुद्ध जैसी स्थिति में फंसा हुआ है, जहां सेना और विभिन्न जातीय सशस्त्र समूहों के बीच संघर्ष जारी है। इस अस्थिर माहौल के बीच देश के रणनीतिक खनिज संसाधनों, खासकर रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर चीन की बढ़ती भूमिका ने क्षेत्रीय भू-राजनीति को और जटिल बना दिया है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, म्यांमार के उत्तरी राज्यों जैसे कचीन और शान में स्थित खनिज क्षेत्रों से बड़ी मात्रा में रेयर अर्थ तत्वों का उत्पादन होता है, जिनका वैश्विक सप्लाई चेन में अहम स्थान है। इन खनिजों का बड़ा हिस्सा चीन को निर्यात होता है, क्योंकि चीन दुनिया में रेयर अर्थ प्रोसेसिंग का सबसे बड़ा केंद्र है।

    विश्लेषकों का मानना है कि चीन इस क्षेत्र में सिर्फ आर्थिक निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि वह स्थानीय सशस्त्र समूहों और सीमावर्ती नेटवर्क के जरिए अपनी रणनीतिक पकड़ भी बनाए हुए है। इससे म्यांमार के भीतर संघर्ष और अधिक गहरा हुआ है और सीमावर्ती इलाकों में अस्थिरता बनी हुई है।

    भारत के लिए यह स्थिति इसलिए संवेदनशील है क्योंकि म्यांमार की करीब 1,600 किलोमीटर लंबी सीमा नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश से लगती है। इस क्षेत्र में पहले से ही उग्रवाद और तस्करी की चुनौतियां रही हैं, जो अब और जटिल हो गई हैं।

    सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, म्यांमार की अस्थिरता और चीन की सक्रिय मौजूदगी भारत की पूर्वोत्तर सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजनाओं जैसे त्रिपक्षीय राजमार्ग और कलादान मल्टीमॉडल प्रोजेक्ट पर भी असर डाल रही है।

    कुल मिलाकर, म्यांमार का संकट अब केवल आंतरिक गृहयुद्ध नहीं रह गया है, बल्कि यह एक व्यापक क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन और संसाधन प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुका है, जिसमें भारत, चीन और स्थानीय समूहों के हित सीधे जुड़े हुए हैं।