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  • PoK में विरोध के बीच तीसरे चरण का मतदान टला, PML-N ने 24 सीटें जीतीं और सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची.

    PoK में विरोध के बीच तीसरे चरण का मतदान टला, PML-N ने 24 सीटें जीतीं और सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची.

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में लगातार जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच 10 अगस्त को होने वाले विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण का मतदान अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया गया है। तीसरे चरण में 11 सीटों पर मतदान होना था। चुनाव टलने से पहले दो चरणों में पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज यानी PML-N ने कुल 24 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इन नतीजों के बाद पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई थी, लेकिन तीसरे चरण की प्रक्रिया रुकने से चुनावी घटनाक्रम फिलहाल प्रभावित हुआ है।

    PoK विधानसभा में कुल 45 सीटें हैं। पहले दो चरणों में PML-N के पक्ष में आए नतीजों ने पार्टी को मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया। हालांकि, तीसरे चरण के मतदान से पहले क्षेत्र में लगातार विरोध प्रदर्शन और तनाव की स्थिति बनी हुई थी। इसी कारण सोमवार को होने वाला मतदान टालने का फैसला लिया गया।

    चुनावी प्रक्रिया के दौरान हिंसा की घटनाएं भी सामने आई थीं। पहले चरण के चुनाव के दौरान अलग-अलग घटनाओं में कम से कम 19 लोगों की मौत होने की जानकारी सामने आई। कई स्थानों पर मतदान केंद्रों के आसपास झड़पों और विरोध प्रदर्शन की खबरें आईं। प्रदर्शनकारियों की ओर से चुनावी प्रक्रिया में धांधली के आरोप भी लगाए गए।

    जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी यानी JAAC इस आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। संगठन के समर्थकों ने सरकार की नीतियों और चुनावी व्यवस्था को लेकर विरोध दर्ज कराया है। संगठन की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि रावलकोट में प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की गोलीबारी में लोगों की मौत हुई। हालांकि, इन आरोपों को संबंधित घटनाक्रम के संदर्भ में जांच और स्वतंत्र पुष्टि की जरूरत है।

    JAAC की मांगें केवल महंगाई और स्थानीय सुविधाओं से जुड़े मुद्दों तक सीमित नहीं हैं। संगठन अब PoK को अधिक स्वायत्तता और राजनीतिक अधिकार देने की मांग भी उठा रहा है। उसकी प्रमुख मांग विधानसभा की 45 सीटों में से 12 आरक्षित सीटों को समाप्त करने की है।

    ये 12 सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहते हैं। JAAC का तर्क है कि PoK से बाहर रहने वाले लोगों को क्षेत्र की सरकार चुनने की प्रक्रिया में इस तरह की भूमिका नहीं मिलनी चाहिए। संगठन का मानना है कि आरक्षित सीटों के कारण स्थानीय मतदाताओं के राजनीतिक प्रभाव में कमी आती है।

    भारत ने PoK में चल रही चुनावी प्रक्रिया को मान्यता देने से इनकार किया है। भारत का आधिकारिक रुख है कि पाकिस्तान के पास उस क्षेत्र में राजनीतिक प्रक्रिया संचालित करने का अधिकार नहीं है, जिसे भारत अपना अभिन्न हिस्सा मानता है। भारत ने PoK में होने वाले चुनावों को पाकिस्तान के कब्जे को वैध दिखाने की कोशिश के तौर पर खारिज किया है।

    इस बीच पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और PML-N अध्यक्ष नवाज शरीफ का बयान भी चर्चा में रहा। उन्होंने कहा था कि यदि उनकी पार्टी PoK में जीत हासिल करती है तो वह शहबाज शरीफ से उन्हें PoK का प्रधानमंत्री बनाने के लिए कहेंगे। हालांकि, PoK के मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार प्रधानमंत्री का चुनाव विधानसभा के मुस्लिम सदस्यों में से होता है।

    PoK विधानसभा का सदस्य बनने के लिए संबंधित व्यक्ति का स्थायी निवासी होना और मतदाता सूची में नाम होना आवश्यक है। नवाज शरीफ इस चुनाव में किसी विधानसभा सीट से उम्मीदवार नहीं हैं। ऐसे में केवल PML-N अध्यक्ष होने या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सहमति से वह सीधे PoK के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते।

    फिलहाल तीसरे चरण के मतदान के स्थगित होने से चुनावी प्रक्रिया की अगली तारीख स्पष्ट नहीं है। विरोध प्रदर्शनों, सुरक्षा स्थिति और राजनीतिक मांगों के बीच चुनाव आयोग तथा संबंधित प्रशासन के सामने मतदान प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की चुनौती बनी हुई है। वहीं PML-N पहले दो चरणों के परिणामों के आधार पर मजबूत स्थिति में है, लेकिन अंतिम चुनावी तस्वीर तीसरे चरण की 11 सीटों पर मतदान के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।

  • ईरान पर ट्रंप का बदला रुख! सैन्य कार्रवाई से पीछे हटे अमेरिका, अब आर्थिक दबाव की रणनीति

    ईरान पर ट्रंप का बदला रुख! सैन्य कार्रवाई से पीछे हटे अमेरिका, अब आर्थिक दबाव की रणनीति


    वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ किसी नए बड़े सैन्य अभियान की संभावना से फिलहाल दूरी बनाने के संकेत दिए हैं। अमेरिका अब तेहरान पर सैन्य कार्रवाई के बजाय आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की रणनीति पर आगे बढ़ता दिख रहा है। रविवार को ‘एक्सियोस’ को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने ईरान को लेकर अपेक्षाकृत संयमित रुख अपनाया।

    ट्रंप ने किसी नई सैन्य कार्रवाई की चेतावनी देने के बजाय कहा कि उनका प्रशासन फिलहाल कम आक्रामक रुख अपना रहा है। उन्होंने ईरान की खराब होती अर्थव्यवस्था और वहां बढ़ती महंगाई पर नजर रखने की बात कही।

    ट्रंप बोले- ईरान से आंशिक बातचीत जारी
    ट्रंप ने कहा कि ईरान में भारी महंगाई है और उसके पास पर्याप्त धन नहीं है। ऐसे में अमेरिका फिलहाल स्थिति को शांत रखते हुए तेहरान के साथ आंशिक बातचीत कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि ईरान की आर्थिक हालत बेहद खराब है और उसके पास अपने सैनिकों को वेतन देने तक के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। ट्रंप के मुताबिक, अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी ने भी ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है।

    खाड़ी देशों ने सैन्य कार्रवाई से बचने की दी सलाह
    अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि उनके खाड़ी सहयोगियों ने उन्हें बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू करने के बजाय आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बनाए रखने की सलाह दी थी। इसके अलावा अमेरिका में कच्चे तेल की कीमत करीब 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है। इससे वाशिंगटन को तत्काल सैन्य कार्रवाई किए बिना ईरान पर दबाव बनाए रखने का अवसर मिल रहा है। ट्रंप ने पूरे घटनाक्रम की तुलना शतरंज के खेल से की और कहा कि मामला अंततः सुलझ ही जाता है।

    होर्मुज समझौते पर नई शर्तों से अटका मामला
    इस बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही को लेकर अमेरिका, ईरान और ओमान के बीच प्रस्तावित समझौते पर भी पेच फंस गया है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख मोहम्मद बागेर जोलकद्र ने शनिवार को मांग रखी कि अमेरिका युद्ध को पूरी तरह समाप्त करे, नौसैनिक नाकेबंदी हटाए और अपनी सेना वापस बुलाए।

    उन्होंने प्रतिबंध हटाने, फ्रीज की गई संपत्तियां बहाल करने और युद्ध क्षतिपूर्ति देने की भी मांग की है। इसके साथ ही उन्होंने ईरान के क्षेत्रीय सहयोगियों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई रोकने और अमेरिकी धमकियों तथा ईरान के कथित अपमान को बंद करने की मांग रखी। वहीं, अमेरिका ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों को खारिज किया है। इसमें वाणिज्यिक जहाजों से टोल वसूलने की किसी भी कोशिश का विरोध शामिल है।

    होर्मुज जलमार्ग खोलना बन सकता है ट्रंप की प्राथमिकता
    ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट के अनुसार, अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही पूरी तरह बहाल कर देता है, तो ट्रंप नया परमाणु समझौता किए बिना भी पीछे हटने के लिए तैयार हो सकते हैं। ऐसा हुआ तो यह अमेरिकी रणनीति में बड़ा बदलाव होगा। परमाणु मुद्दा पिछले कई महीनों से वाशिंगटन की प्रमुख मांगों में शामिल रहा है, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत लगातार मुश्किल बनी हुई है।

    ट्रंप का मानना है कि ईरान के परमाणु ठिकानों के नष्ट होने के बाद उसके लिए परमाणु क्षमताओं को दोबारा खड़ा करना बेहद कठिन होगा। अमेरिका का यह भी मानना है कि उसकी खुफिया एजेंसियां ईरान की किसी गुप्त परमाणु गतिविधि का पता लगाने में सक्षम होंगी।

    ईरान के यूरेनियम भंडार पर ट्रंप ने चिंता को किया खारिज
    राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के जमीन के नीचे मौजूद यूरेनियम भंडार को लेकर उठ रही चिंताओं को भी कमतर बताया। जुलाई में नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) के शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने कहा था कि परमाणु सामग्री जमीन के बहुत नीचे है और दूसरे देशों के लिए उसे हासिल करना संभव नहीं होगा। ऐसे में मौजूदा हालात में ट्रंप प्रशासन व्यापक परमाणु समझौते की तुलना में होर्मुज जलमार्ग को दोबारा खोलने और ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखने को प्राथमिकता दे सकता है।

  • जंगल से ‘गुलेल’ की तरह मिसाइल-ड्रोन लॉन्च कर रहे हूती, सऊदी की तेल फैसिलिटी पर हमला

    जंगल से ‘गुलेल’ की तरह मिसाइल-ड्रोन लॉन्च कर रहे हूती, सऊदी की तेल फैसिलिटी पर हमला


    नई दिल्ली। यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब और यमन के रणनीतिक ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों का वीडियो जारी किया है। फुटेज में हूती लड़ाके खुले मैदानों और जंगल जैसे इलाकों से एक के बाद एक मिसाइल और ड्रोन लॉन्च करते दिखाई दे रहे हैं। लॉन्चिंग का तरीका ऐसा नजर आता है, मानो किसी गुलेल से निशाना साधकर प्रोजेक्टाइल छोड़ा जा रहा हो। हूतियों की ओर से यह वीडियो ऐसे समय जारी किया गया है, जब संगठन ने सऊदी अरब की एक अहम तेल सुविधा और यमन के मोखा बंदरगाह को निशाना बनाने का दावा किया है।

    जिजान में अरामको रिफाइनरी से जुड़ी सुविधा पर ड्रोन हमला
    हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने दावा किया कि हमलों में सऊदी सैनिकों की मौजूदगी वाले इलाकों और हथियारों के गोदामों को निशाना बनाया गया। इसी दौरान सऊदी अरब के जिजान में स्थित अरामको रिफाइनरी से जुड़ी एक सुविधा पर ड्रोन हमला किए जाने का भी दावा किया गया। सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने एक सुविधा में आग लगने की पुष्टि की। हालांकि, आग पर बाद में काबू पा लिया गया। घटना में किसी के घायल होने की खबर नहीं है।

    मोखा बंदरगाह पर हमले में 7 लोगों की मौत
    हूतियों के हमले का दूसरा बड़ा निशाना यमन का मोखा बंदरगाह बना। यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार के नियंत्रण में है और लाल सागर के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के करीब स्थित है। यमनी सरकार से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, हमले में कम से कम 7 लोगों की मौत हुई। मृतकों में चार सैनिक और तीन नागरिक शामिल हैं। वहीं, 30 नागरिकों के घायल होने की जानकारी सामने आई है। हमले में बंदरगाह की इमारतों, पियर्स और वहां रखे सामान को नुकसान पहुंचा।

    मिसाइल और ड्रोन के साथ मानवरहित नाव का भी दावा
    हूतियों ने इन हमलों को सऊदी ड्रोन के यमन के हज्जाह और सादा प्रांतों में घुसने की कार्रवाई का जवाब बताया है। यमनी सेना के मुताबिक, हमले में मिसाइल और ड्रोन के अलावा विस्फोटकों से लदी एक मानवरहित नाव के इस्तेमाल की कोशिश भी की गई। जारी वीडियो में हूती लड़ाकों को अलग-अलग स्थानों से मिसाइल और ड्रोन लॉन्च करते हुए दिखाया गया है। इससे संगठन की हमले करने की रणनीति और इस्तेमाल किए जा रहे हथियारों को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।

    2022 के बाद फिर बढ़ सकती है क्षेत्रीय अशांति
    इन घटनाओं ने यमन में 2022 के बाद से बनी अपेक्षाकृत शांत स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मोखा बंदरगाह बाब-अल-मंदेब के नजदीक है, जो वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है। ऐसे में यदि इलाके में हूती हमले और जवाबी सैन्य कार्रवाई बढ़ती है, तो इसका असर केवल यमन और सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहेगा। लाल सागर के समुद्री व्यापार मार्गों के साथ-साथ क्षेत्र की शिपिंग और ऊर्जा सुरक्षा पर भी इसका असर पड़ सकता है।

  • तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद

    तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते को लेकर क्षेत्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। ईरान की ओर से इस समझौते पर आपत्ति जताए जाने के बाद तुर्किए ने अब अपना रुख स्पष्ट किया है। तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान ने कहा कि यह समझौता किसी भी तरह से ईरान के खिलाफ नहीं है।

    हकान फिदान ने शनिवार, 8 अगस्त 2026 को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हाल में हुआ मक्का रक्षा समझौता पूरी तरह रक्षात्मक प्रकृति का है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य किसी देश पर हमला करना या किसी राष्ट्र को समाप्त करना नहीं है।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने इस मामले में सऊदी अरब की स्थिति को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि रियाद ने ईरान के खिलाफ किसी तरह के हमले या उसे तबाह करने की रणनीति नहीं बनाई है। सऊदी अरब का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में जारी हिंसा को रोकना और महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास स्थिरता कायम करना है।

    हकान फिदान के मुताबिक, सऊदी अरब पहले ही अमेरिका को यह संदेश दे चुका है कि ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाने से मौजूदा समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। रियाद ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी विवाद को बातचीत तथा समझौते के जरिए सुलझाने का समर्थन किया है।

    उन्होंने कहा कि सऊदी अरब की नीति क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाने के बजाय उसे कम करने की दिशा में है। इसी संदर्भ में मक्का में हुई हालिया बैठक को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां क्षेत्रीय सुरक्षा और मौजूदा परिस्थितियों पर चर्चा हुई थी।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मक्का में हुई बैठक के दौरान क्राउन प्रिंस ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। उनका कहना था कि सऊदी अरब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को समाधान के तौर पर नहीं देखता।

    फिदान ने यह भी कहा कि यही संदेश बाद में मोहम्मद बिन सलमान और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बातचीत के दौरान भी पहुंचाया गया। इससे संकेत मिलता है कि रियाद मौजूदा तनाव के बीच सैन्य विकल्प के बजाय बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता दे रहा है।

    मक्का रक्षा समझौते को लेकर ईरान की चिंता ऐसे समय सामने आई है, जब पश्चिम एशिया में पहले से ही कई स्तरों पर तनाव बना हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच मतभेदों के चलते क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बनी हुई है।

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की हिंसा या अस्थिरता का असर कच्चे तेल और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। ऐसे में सऊदी अरब की ओर से क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिए जाने को व्यापक आर्थिक और रणनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

    तुर्किए की ओर से मक्का रक्षा समझौते को रक्षात्मक बताने का उद्देश्य इस समझौते को लेकर पैदा हुई आशंकाओं को स्पष्ट करना है। हकान फिदान के बयान के अनुसार, समझौते का घोषित उद्देश्य किसी विशेष देश के खिलाफ सैन्य अभियान चलाना नहीं, बल्कि संबंधित देशों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है।

    मौजूदा परिस्थितियों में तुर्किए का यह स्पष्टीकरण ईरान के साथ बढ़ते तनाव को सीमित रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। क्षेत्रीय देशों के लिए अब चुनौती सुरक्षा सहयोग और कूटनीतिक संवाद के बीच संतुलन बनाए रखने की है।

  • इस्लामाबाद में लश्कर कमांडर की अचानक मौत से उठे सवाल, मस्जिद पहुंचने से पहले आखिर कहां खाया था खाना

    इस्लामाबाद में लश्कर कमांडर की अचानक मौत से उठे सवाल, मस्जिद पहुंचने से पहले आखिर कहां खाया था खाना

    नई दिल्ली । पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक वरिष्ठ कमांडर कारी सईद अब्दुल अजीज की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। बताया जा रहा है कि वह नमाज पढ़ने के लिए कुबा मस्जिद पहुंचा था, जहां मस्जिद के गेट के पास अचानक गिर पड़ा। उसकी मौत के वास्तविक कारण की आधिकारिक तौर पर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।

    कारी सईद अब्दुल अजीज को लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख सदस्यों में शामिल बताया जाता था। उसके जिम्मे जम्मू-कश्मीर में मुठभेड़ के दौरान मारे गए आतंकवादियों के परिवारों की सहायता से जुड़ा काम था। संगठन के भीतर उसकी भूमिका को देखते हुए उसकी अचानक हुई मौत को महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

    स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक, मस्जिद पहुंचने से पहले कारी सईद ने एक अनजान रेस्टोरेंट में खाना खाया था। इसके बाद वह नमाज के लिए कुबा मस्जिद गया। वहां पहुंचने के बाद वह अचानक गिर पड़ा और उसकी मौत हो गई। हालांकि, इस घटनाक्रम और उसकी मौत के बीच किसी सीधे संबंध की पुष्टि नहीं हुई है।

    कारी सईद की मौत ऐसे समय हुई है जब पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े कई सदस्यों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत को लेकर चर्चा बनी हुई है। संगठन से जुड़े रिजवान हनीफ ने हाल में एक वीडियो में दावा किया था कि पिछले तीन से चार वर्षों के दौरान लश्कर के करीब 30 से अधिक सदस्य पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में मारे गए हैं।

    रिजवान के अनुसार, पेशावर, कराची, रावलपिंडी, रावलाकोट और मुजफ्फराबाद जैसे इलाकों में संगठन के कई सदस्यों की हत्या हुई। उसने इन घटनाओं के पीछे अज्ञात लोगों के होने की बात कही थी। लश्कर से जुड़े किसी सदस्य की ओर से संगठन के इतने लोगों के मारे जाने की बात स्वीकार किए जाने को भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत विरोधी गतिविधियों से जुड़े कुछ आतंकवादियों की संदिग्ध मौत के मामलों में अज्ञात हमलावरों का जिक्र सामने आता रहा है। हालांकि, इन घटनाओं के पीछे कौन लोग हैं और उनके उद्देश्यों क्या हैं, इसे लेकर सार्वजनिक स्तर पर अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। ऐसे मामलों में ठोस निष्कर्ष के लिए जांच और आधिकारिक पुष्टि जरूरी होती है।

    लश्कर-ए-तैयबा को आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े होने के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। संगठन लंबे समय से जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों और भारत विरोधी हिंसा से जुड़ा रहा है। ऐसे में उसके किसी वरिष्ठ कमांडर की पाकिस्तान में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत सुरक्षा एजेंसियों और आतंकवादी नेटवर्क से जुड़े घटनाक्रम के लिहाज से भी ध्यान आकर्षित करती है।

    फिलहाल कारी सईद अब्दुल अजीज की मौत की सटीक वजह स्पष्ट नहीं है। उसके द्वारा मौत से पहले किए गए संपर्कों, रेस्टोरेंट में खाने और मस्जिद पहुंचने के बीच की घटनाओं की जानकारी सामने आने के बाद ही मामले की परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा। साथ ही, संगठन के अन्य सदस्यों की संदिग्ध मौतों से इस घटना का कोई संबंध है या नहीं, यह भी जांच का विषय बना हुआ है।

  • चीन में डॉल्फिन तूफान का खतरा, 1400 उड़ानें रद्द और हजारों लोग सुरक्षित स्थानों पर भेजे गए

    चीन में डॉल्फिन तूफान का खतरा, 1400 उड़ानें रद्द और हजारों लोग सुरक्षित स्थानों पर भेजे गए

    नई दिल्ली । चीन के पूर्वी तट पर टाइफून डॉल्फिन के संभावित प्रभाव को देखते हुए प्रशासन ने व्यापक स्तर पर एहतियाती कदम उठाए हैं। रविवार को तूफान के पहुंचने की आशंका के बीच शंघाई आने-जाने वाली करीब 1400 उड़ानें रद्द कर दी गईं। इसके अलावा हांगझोउ हवाई अड्डे से संचालित होने वाली 270 उड़ानों को भी रद्द किया गया। प्रभावित इलाकों में लोगों की सुरक्षा के लिए उन्हें संवेदनशील क्षेत्रों से हटाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है।

    तूफान के रविवार देर रात या सोमवार सुबह चीन के झेजियांग अथवा पड़ोसी फुजियान प्रांत के तटीय क्षेत्र में पहुंचने की संभावना जताई गई है। इसके मद्देनजर रविवार सुबह रेड टाइफून अलर्ट जारी किया गया। यह तूफान से संबंधित सबसे गंभीर चेतावनी का स्तर है। झेजियांग के मध्य और पूर्वी हिस्सों में बेहद भारी बारिश होने की आशंका जताई गई है।

    मौसम विभाग के अनुसार शंघाई के अलावा फुजियान, अनहुई और जिआंग्सू प्रांतों के कुछ हिस्सों में सोमवार दोपहर तक भारी बारिश जारी रह सकती है। जमीन से टकराने के बाद तूफान के धीरे-धीरे कमजोर होने की संभावना है। इसके बाद इसके पूर्वी चीन में उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर बढ़ने का अनुमान है।

    टाइफून डॉल्फिन का असर चीन पहुंचने से पहले जापान के ओकिनावा क्षेत्र में भी देखा गया। वहां भारी बारिश और तेज हवाओं के कारण सात लोगों को मामूली चोटें आईं। घायलों में 100 साल से अधिक उम्र का एक व्यक्ति भी शामिल है, जो तेज हवाओं की चपेट में आकर गिर गया और उसके सिर में चोट लगी। रविवार दोपहर तक ओकिनावा में करीब 5,290 घरों की बिजली आपूर्ति बाधित थी।

    ताइवान में भी तूफान के प्रभाव के कारण रविवार को द्वीप के उत्तरी हिस्से में तेज हवाओं और भारी बारिश की स्थिति बनी रही। खराब मौसम के चलते दर्जनों फेरी सेवाएं रोक दी गईं, जबकि 180 से अधिक उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। समुद्री और हवाई परिवहन पर पड़े इस असर से यात्रियों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।

    चीन में तूफान के संभावित प्रभाव वाले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। फुजियान में शनिवार शाम तक करीब 99 हजार लोगों को जोखिम वाले इलाकों से हटाया गया। झेजियांग और फुजियान में 200 से अधिक फेरी मार्गों पर सेवाएं रोक दी गई हैं।

    तटीय और समुद्री गतिविधियों पर भी व्यापक रोक लगाई गई है। शुक्रवार सुबह तक 474 निर्माण जहाजों को बंदरगाहों पर वापस बुला लिया गया था। ऑफशोर परियोजनाओं पर काम रोक दिया गया है। यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रभावित क्षेत्रों में कुछ ट्रेन सेवाएं भी अस्थायी रूप से बंद की गई हैं।

    डॉल्फिन से करीब दो सप्ताह पहले दक्षिणी ग्वांगडोंग प्रांत में टाइफून नौल ने दस्तक दी थी। उस समय इसे इस साल चीन में पहुंचा सबसे शक्तिशाली तूफान बताया गया था। चीन पहुंचने से पहले नौल ने फिलीपींस में भी भारी असर डाला था, जहां तीन लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों घर क्षतिग्रस्त हुए थे। ऐसे में डॉल्फिन के संभावित प्रभाव को देखते हुए चीन के तटीय प्रशासन ने परिवहन, निकासी और आपदा प्रबंधन से जुड़े उपायों को प्राथमिकता दी है।

  • दक्षिण चीन सागर में फिर आमने-सामने चीन और फिलीपींस, अमेरिका के रुख से बढ़ी पूरे विवाद की अहमियत

    दक्षिण चीन सागर में फिर आमने-सामने चीन और फिलीपींस, अमेरिका के रुख से बढ़ी पूरे विवाद की अहमियत


    नई दिल्ली ।दक्षिण चीन सागर में चीन और फिलीपींस के बीच लंबे समय से जारी विवाद एक बार फिर चर्चा में है। स्कारबोरो रीफ को लेकर चीन की ओर से उठाए गए नए कदम पर अमेरिका ने आपत्ति जताई है। अमेरिका ने चीन द्वारा इस क्षेत्र को राष्ट्रीय प्रकृति क्षेत्र के रूप में विकसित करने के फैसले का विरोध करते हुए फिलीपींस के साथ खड़े रहने की बात कही है।

    स्कारबोरो रीफ दक्षिण चीन सागर में स्थित एक महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्र है, जिस पर चीन और फिलीपींस दोनों अपना दावा करते रहे हैं। इस इलाके में मछली पकड़ने और समुद्री गतिविधियों को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है। फिलीपींस के मछुआरे इस क्षेत्र में लंबे समय से मछली पकड़ते रहे हैं और नए नियमों के बाद उनके सामने संभावित परेशानियों को लेकर चिंता जताई जा रही है।

    चीन ने एक अगस्त को स्कारबोरो रीफ से जुड़े नए नियम जारी किए हैं। इन नियमों में क्षेत्र की देखभाल, निगरानी और सुरक्षा से संबंधित व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है। इसके तहत चीन के कई सरकारी विभाग मिलकर इस समुद्री क्षेत्र की निगरानी और प्रबंधन करेंगे। चीन का कहना है कि नए नियमों का उद्देश्य संबंधित सरकारी विभागों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना और क्षेत्र की सुरक्षा तथा संरक्षण को व्यवस्थित करना है।

    चीन ने इस क्षेत्र को राष्ट्रीय प्रकृति क्षेत्र के रूप में विकसित करने की मंजूरी सितंबर 2024 में दी थी। अब नए नियमों के जरिए वहां प्रशासनिक और निगरानी व्यवस्था को अधिक स्पष्ट किया गया है। हालांकि, फिलीपींस को आशंका है कि इन व्यवस्थाओं का असर उसके मछुआरों की गतिविधियों पर पड़ सकता है।

    अमेरिका ने चीन के इस कदम पर गंभीर आपत्ति जताई है। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि नए नियमों से फिलीपींस के उन मछुआरों के लिए मुश्किलें पैदा हो सकती हैं, जो लंबे समय से इस क्षेत्र में मछली पकड़ते रहे हैं। अमेरिका ने चीन से क्षेत्र के आसपास मौजूद देशों के अधिकारों और हितों को ध्यान में रखने की अपील की है।

    अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह इस मामले में फिलीपींस के साथ है। इसके साथ ही उसने खुले और स्वतंत्र इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के समर्थन की बात दोहराई है। इससे दक्षिण चीन सागर के विवाद में अमेरिका की रणनीतिक भूमिका एक बार फिर सामने आई है।

    स्कारबोरो रीफ को लेकर विवाद की पृष्ठभूमि काफी पुरानी है। वर्ष 2016 में समुद्री कानून से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय न्यायिक पैनल ने दक्षिण चीन सागर में चीन के व्यापक समुद्री दावों को कानूनी आधार नहीं माना था। फिलीपींस ने इस फैसले का समर्थन किया था, जबकि चीन ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।

    2016 के बाद भी दोनों देशों के बीच इस समुद्री क्षेत्र को लेकर मतभेद खत्म नहीं हुए। समय-समय पर समुद्री गतिविधियों, मछली पकड़ने और क्षेत्रीय अधिकारों को लेकर तनाव सामने आता रहा है। स्कारबोरो रीफ पर चीन की नई प्रशासनिक व्यवस्था ने इसी पुराने विवाद को फिर से सक्रिय कर दिया है।

    मौजूदा घटनाक्रम में चीन अपने नए नियमों को क्षेत्र के संरक्षण और निगरानी से जुड़ी व्यवस्था के तौर पर पेश कर रहा है, जबकि फिलीपींस इसे अपने मछुआरों और समुद्री अधिकारों के संदर्भ में देख रहा है। अमेरिका के खुलकर फिलीपींस का समर्थन करने से इस विवाद का कूटनीतिक महत्व भी बढ़ गया है।

    फिलहाल दक्षिण चीन सागर में चीन और फिलीपींस के बीच स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। स्कारबोरो रीफ पर लागू किए गए नए नियमों को लेकर दोनों पक्षों के रुख में अंतर साफ दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में इस क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों और दोनों देशों की प्रतिक्रियाओं पर नजर रहेगी।

  • ईरान और ओमान समुद्री मार्ग समझौते के करीब, अमेरिका के सामने तेहरान ने रखीं कड़ी शर्तें

    ईरान और ओमान समुद्री मार्ग समझौते के करीब, अमेरिका के सामने तेहरान ने रखीं कड़ी शर्तें


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम एशिया में जारी रणनीतिक और कूटनीतिक तनाव के बीच ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अत्यंत सख्त रुख अपनाया है। ईरानी सैन्य प्रतिष्ठान ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया के इस सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को फिर से खोलने की प्रक्रिया पूरी तरह से अमेरिका द्वारा रखी गई शर्तों को स्वीकार करने पर निर्भर करेगी। जब तक अमेरिका ईरान की सभी मांगों और शर्तों को पूरी तरह से नहीं मान लेता, तब तक होर्मुज जलडमरूमध्य से आवाजाही बहाल नहीं की जाएगी।

    आईआरजीसी के आधिकारिक प्रवक्ता सरदार मोहेबी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि इस महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य को खोलने के लिए कुछ विशेष व्यवस्थाएं और कड़ी शर्तें तय की गई हैं। उन्होंने कहा कि यह मार्ग तभी खोला जाएगा जब अमेरिकी प्रशासन क्षेत्रीय बातचीत और मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप पूरी तरह बंद करेगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिकी प्रशासन के समक्ष रखी गई शर्तें ओमान के साथ चल रही कूटनीतिक वार्ताओं से अलग हैं।

    दूसरी तरफ, कूटनीतिक मोर्चे पर ईरान और ओमान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही को लेकर नए प्रोटोकॉल पर सहमति बनती दिख रही है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पुष्टि की है कि दोनों देश एक व्यावहारिक और नई जहाजरानी व्यवस्था पर समझौते के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि जलमार्ग को पूर्ण रूप से चालू करने से पहले अमेरिका से जुड़े कुछ आर्थिक और तकनीकी मुद्दों का समाधान होना बाकी है।

    ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहम्मद बाघेर ज़ोलघद्र ने अमेरिका के समक्ष रखी गई शर्तों की विस्तृत रूपरेखा साझा की है। ईरान की प्रमुख मांगों में उसके खिलाफ किसी भी प्रकार की सैन्य धमकियों और कार्रवाइयों को तुरंत रोकना, फारस की खाड़ी क्षेत्र में नाकाबंदी में शामिल नौसैनिक और वायुसैनिक बलों की वापसी, संघर्ष के दौरान हुए वित्तीय और ढांचागत नुकसान का उचित मुआवजा देना, आर्थिक प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाना और विदेश में जब्त की गई ईरानी परिसंपत्तियों को तत्काल जारी करना शामिल है।

    ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां कूटनीतिक समझौते के लिए सबसे उपयुक्त अवसर प्रस्तुत करती हैं। हालांकि, उन्होंने दृढ़ता से दोहराया कि तेहरान अपने नागरिकों के अधिकारों और राष्ट्रीय स्वाभिमान से किसी भी सूरत में समझौता नहीं करेगा। उन्होंने देश की आंतरिक क्षमताओं और जनता के भरोसे को प्राथमिकता देने की बात कही।

    इसके अतिरिक्त, क्षेत्र में यमन के मारिब शहर से भी हिंसा की खबरें सामने आई हैं। यमनी सशस्त्र बलों ने ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों पर आवासीय इलाकों और विस्थापित लोगों के शिविरों को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमले करने का आरोप लगाया है। इन हमलों में दो लोगों की मौत हुई है और चौदह अन्य नागरिक गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। यमनी सैन्य नेतृत्व ने उचित समय और स्थान पर इन हमलों का कड़ा जवाब देने की घोषणा की है।

  • ह्यूस्टन के फास्ट-फूड आउटलेट पर खराब भोजन और लापरवाही को लेकर 12.5 करोड़ का केस

    ह्यूस्टन के फास्ट-फूड आउटलेट पर खराब भोजन और लापरवाही को लेकर 12.5 करोड़ का केस

    नई दिल्ली ।अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में स्थित प्रसिद्ध फास्ट-फूड चेन पोपेय्स के एक आउटलेट के खिलाफ 12.5 करोड़ रुपये के भारी-भरकम हर्जाने का कानूनी मामला सामने आया है। एक दंपत्ति ने रेस्टोरेंट प्रशासन पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए स्थानीय अदालत का दरवाजा खटखटाया है। दंपत्ति का दावा है कि उन्होंने आउटलेट से जो फ्राइड चिकन खरीदा था, उसके एक टुकड़े के भीतर आपत्तिजनक और दूषित सामग्री मौजूद थी, जिससे उनकी सेहत और मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ा।

    प्राप्त जानकारी के अनुसार, जस्टिन हॉवर्ड और डेनियल मैककिनन नामक दंपत्ति ने साउथ सैम ह्यूस्टन पार्कवे वेस्ट स्थित पोपेय्स के आउटलेट से चिकन का ऑर्डर दिया था। जब वे घर जाकर भोजन करने लगे, तो जैसे ही एक पीस को काटा गया, उसके भीतर कंडोम जैसी दिखने वाली संदिग्ध वस्तु दिखाई दी। इस अवांछित चीज को देखते ही दंपत्ति का भोजन करने का अनुभव बेहद खौफनाक बन गया और उन्होंने तुरंत खाना रोक दिया।

    इस घटना के बाद दंपत्ति में शारीरिक अस्वस्थता और घबराहट की स्थिति पैदा हो गई। उन्हें लगातार उल्टी महसूस होने लगी और इस बात का गहरा डर सताने लगा कि कहीं उन्होंने कोई संक्रमित या दूषित भोजन तो नहीं खा लिया है। उस समय उनके पास इस बात की जांच या पुष्टि का कोई तत्काल उपाय नहीं था कि चिकन के अंदर मिली सामग्री वास्तव में क्या थी, वह कितने समय से वहां मौजूद थी और क्या पूरे भोजन में उसका जहर या प्रभाव फैल चुका था।

    पीड़ित पक्ष ने इस मामले को लेकर हैरिस काउंटी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में याचिका दायर की है। दायर मुकदमे में पोपेय्स की मूल कंपनी रेस्टोरेंट ब्रांड्स इंटरनेशनल, पोपेय्स लुइसियाना किचन और वहां के फ्रेंचाइजी संचालक आमाना बिजनेसेज को मुख्य रूप से प्रतिवादी बनाया गया है। याचिका में साफ तौर पर लापरवाही बरतने, असुरक्षित तरीके से खाद्य पदार्थों का प्रबंधन करने और टेक्सास राज्य के उपभोक्ता संरक्षण कानून के उल्लंघन के आरोप लगाए गए हैं।

    मामले में सबसे चिंताजनक पहलू रेस्टोरेंट के कर्मचारियों का व्यवहार रहा। पीड़ित दंपत्ति का आरोप है कि जब वे इस शिकायत को लेकर तुरंत आउटलेट वापस पहुंचे, तो वहां मौजूद स्टाफ ने उनकी गंभीर समस्या को समझने के बजाय उसका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। कर्मचारियों ने मामले की गहन जांच करने या खेद व्यक्त करने के बजाय बार-बार चिकन बदलकर नया पैकेट देने का प्रयास किया, जबकि ग्राहक रिफंड और उचित कार्रवाई की मांग कर रहे थे। काफी बहस और दबाव के बाद उन्हें पैसे वापस किए गए।

    इस घटना के उजागर होने के बाद स्थानीय स्तर पर भी विरोध के स्वर उठने लगे हैं। ह्यूस्टन के कुछ प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आउटलेट के प्रबंधन से मुलाकात कर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठाई है। उन्होंने यह भी कहा है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती और खाद्य सुरक्षा के मानकों की पुष्टि नहीं होती, तब तक उस विशिष्ट आउटलेट पर चिकन की बिक्री को पूरी तरह से निलंबित कर दिया जाना चाहिए।

    कुल मिलाकर, इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर रही फास्ट-फूड कंपनियों के गुणवत्ता नियंत्रण और खाद्य सुरक्षा मानकों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब यह मामला अदालत के विचाराधीन है, जहां लापरवाही और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने के आरोपों पर कानूनी सुनवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

  • सऊदी-पाक-तुर्की की डिफेंस डील में बड़ा ट्विस्ट, ईरान पर तुर्की ने साफ किया अपना रुख

    सऊदी-पाक-तुर्की की डिफेंस डील में बड़ा ट्विस्ट, ईरान पर तुर्की ने साफ किया अपना रुख


    नई दिल्ली। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल में हुए रक्षा समझौते को लेकर तस्वीर अब कुछ बदलती नजर आ रही है। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता ईरान या किसी अन्य खास देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया है। उनके बयान के बाद इस डिफेंस डील के उद्देश्य और आपसी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को लेकर नए सवाल उठने लगे हैं।

    शुक्रवार को सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते को लेकर यह बात सामने आई थी कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला होने की स्थिति में इसे तीनों पर हमला माना जाएगा।

    ‘इस्लामिक NATO’ के नाम से हो रही चर्चा
    यह समझौता तेल संपन्न सऊदी अरब, परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान और NATO की दूसरी सबसे बड़ी सेना वाले तुर्की को एक सुरक्षा ढांचे में लाता है। तुर्की का रक्षा उद्योग तेजी से विकसित हुआ है और उसके ड्रोन भी दुनियाभर में चर्चा में रहे हैं। इसी वजह से तीनों सुन्नी बहुल देशों के इस गठजोड़ की तुलना NATO से की जा रही है और इसे कई जगह ‘इस्लामिक NATO’ कहा जा रहा है। माना जा रहा था कि क्षेत्र में ईरान से जुड़े सुरक्षा तनाव के बीच यह समझौता सऊदी अरब के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच साबित हो सकता है।

    तुर्की ने कहा- किसी खास देश को दुश्मन नहीं माना
    अब तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलु एजेंसी को दिए इंटरव्यू में इस समझौते को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने कहा कि तीनों देश किसी विशेष राष्ट्र को तब तक अपना दुश्मन नहीं मानते, जब तक वह उनके खिलाफ शत्रुतापूर्ण कार्रवाई न करे। फिदान के मुताबिक, समझौते में किसी साझा खतरे को लेकर किसी खास देश का नाम निर्धारित नहीं किया गया है। उनका कहना था कि जो देश तुर्की पर हमला नहीं करता, उसे तुर्की अपना निशाना नहीं मानता।

    NATO के अनुच्छेद 5 से कैसे अलग है व्यवस्था?
    फिदान ने समझौते में आपसी रक्षा से जुड़ी व्यवस्था को तकनीकी तौर पर NATO के अनुच्छेद 5 के समान बताया। NATO के अनुच्छेद 5 के तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला होने को सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है। हालांकि, तुर्की के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस नए समझौते में सैन्य मदद अपने आप सक्रिय नहीं होगी। यदि किसी सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे औपचारिक तौर पर अन्य दो देशों से सहायता मांगनी होगी। इसके बाद खतरे की स्थिति और उसके स्तर के आधार पर सहायता का स्वरूप तय किया जा सकता है। इसमें खुफिया जानकारी साझा करना, लॉजिस्टिक सहायता देना या जरूरत पड़ने पर सैन्य टुकड़ियां भेजना शामिल हो सकता है।

    दूसरे देशों को भी जोड़ने की तैयारी
    फिदान ने यह भी बताया कि कुछ अन्य देशों ने इस समझौते का हिस्सा बनने में रुचि दिखाई है। हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन उम्मीद जताई कि मिस्र अगले चरण में इस व्यवस्था से जुड़ सकता है।

    समझौते के तहत तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री तथा उनके सैन्य प्रमुख नियमित रूप से समिति की बैठक करेंगे। इसके अलावा तीनों देशों के बीच समन्वय के लिए एक सचिवालय स्थापित किया जाएगा, जिसका मुख्यालय सऊदी अरब में होगा। इस तरह मक्का में हुआ यह रक्षा समझौता भले ही तीन देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है, लेकिन तुर्की के ताजा बयान से यह साफ हो गया है कि इसका लक्ष्य किसी एक देश, खासकर ईरान के खिलाफ मोर्चा बनाना नहीं है।