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  • अमेरिकी नाकाबंदी के बीच होर्मुज से गुजरा माल्टा का ध्वज लगा जहाज…

    अमेरिकी नाकाबंदी के बीच होर्मुज से गुजरा माल्टा का ध्वज लगा जहाज…


    दुबई।
    माल्टा (Malta.) का ध्वज लगे एक जहाज (Ship) ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz.) से पश्चिम की ओर यात्रा शुरू की। यह पहला कच्चा तेल (Crude oil.) ले जाने वाला टैंकर बताया जा रहा है, जब से अमेरिका (America.) ने ईरानी बंदरगाहों पर नाकेबंदी लगाई है। यह जानकारी दुनिया भर में जहाजों की निगरानी करने वाले शिपिंग ट्रैकिंग मॉनिटर के हवाले से दी गई है।

    माल्टा का ध्वज लगा तेल टैंकर अगियोस फैनोरियोस-I के गुरुवार को इराक के बसरा बंदरगाह पहुंचने की उम्मीद है, जहां अमेरिका की नाकेबंदी लागू नहीं है। मरीन ट्रैफिक के अनुसार, यह जहाज ओमान की खाड़ी में लगभग दो दिन तक रुका रहा और फिर उसने दोबारा मार्ग तय किया।

    इस बीच, अमेरिका की नौसेना ने कहा कि वह ईरान के आसपास व्यापारिक जहाजों पर कार्रवाई करने के लिए तैयार है। अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों ने क्षेत्र में मौजूद व्यापारिक जहाजों को चेतावनी दी है कि वे जहाजों को रोक सकते हैं और नाकेबंदी लागू करने के लिए बल प्रयोग कर सकते हैं।

    नौसेना के रेडियो संदेश में कहा, ईरानी बंदरगाहों की ओर या वहां से आने-जाने वाले जहाजों को रोका जा सकता है और जब्त किया जा सकता है। यह संदेश अमेरिकी सेना की मध्य कमान (सेंटकॉम) की ओर से सोशल मीडिया पर भी साझा किया गया है। एक सैन्य अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर पुष्टि की कि यह संदेश इस समय क्षेत्र के सभी जहाजों को प्रसारित किया जा रहा है। रेडियो संदेश में आगे कहा गया, अगर आप नाकेबंदी का पालन नहीं करेंगे, तो बल प्रयोग किया जाएगा।

  • ईरान अमेरिका तनाव के बाद यूरोप का बड़ा कदम होर्मुज मिशन बिना अमेरिका

    ईरान अमेरिका तनाव के बाद यूरोप का बड़ा कदम होर्मुज मिशन बिना अमेरिका


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर खतरे के बीच यूरोपीय संघ अब एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाने की तैयारी में है। रिपोर्ट के मुताबिक यूरोपीय देश होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए एक नया मिशन तैयार कर रहे हैं जिसमें अमेरिका की सीधी भागीदारी नहीं होगी। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच एक महीने से अधिक समय तक चला संघर्ष वैश्विक राजनीति और ट्रांस अटलांटिक संबंधों को नया रूप दे चुका है।

    द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार इस प्रस्ताव का नेतृत्व ब्रिटेन और फ्रांस कर रहे हैं। इसका उद्देश्य संघर्ष के बाद समुद्री व्यापार में भरोसा बहाल करना और जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है।

    फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट किया है कि यह मिशन पूरी तरह रक्षात्मक होगा और यूरोपीय नौसेना किसी अमेरिकी कमांड के तहत काम नहीं करेगी। इसका मकसद शिपिंग कंपनियों को यह भरोसा दिलाना है कि युद्ध के बाद क्षेत्र में व्यापार करना सुरक्षित रहेगा।

    इस प्रस्ताव में कई अहम कदम शामिल हैं जैसे समुद्र में बिछाई गई माइंस को हटाना नेवल एस्कॉर्ट्स तैनात करना और सर्विलांस सिस्टम को मजबूत करना। खास बात यह है कि इस गठबंधन में अमेरिका इजरायल और ईरान जैसे सीधे संघर्ष में शामिल देशों को बाहर रखा जाएगा।

    फ्रांस के विदेश मंत्री जीन नोएल बैरोट के अनुसार यह मिशन तभी शुरू होगा जब क्षेत्र में शांति स्थापित हो जाएगी। साथ ही ओमान और ईरान जैसे तटीय देशों के सहयोग की भी जरूरत होगी। इस मिशन में जर्मनी की भी अहम भूमिका मानी जा रही है जो जहाज और निगरानी संसाधन उपलब्ध करा सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना तीन मुख्य उद्देश्यों पर आधारित है पहला फंसे हुए जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालना दूसरा समुद्र में बिछाई गई माइंस को हटाना और तीसरा सुरक्षित समुद्री मार्ग सुनिश्चित करना।

    होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बेहद अहम मार्ग है जहां से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है जिसमें भारत जैसे बड़े आयातक देश भी शामिल हैं।

    यह पहल इस बात का संकेत है कि यूरोपीय संघ अब वैश्विक सुरक्षा में अपनी स्वतंत्र भूमिका बढ़ाना चाहता है। साथ ही यह अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते मतभेदों को भी दर्शाता है जहां यूरोपीय देश अब अपनी रणनीति खुद तय करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

  • ईरान अमेरिका तनाव के बीच इजरायल लेबनान वार्ता क्या बदलने वाली है मध्य पूर्व की तस्वीर

    ईरान अमेरिका तनाव के बीच इजरायल लेबनान वार्ता क्या बदलने वाली है मध्य पूर्व की तस्वीर


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में जारी भू राजनीतिक तनाव के बीच एक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम सामने आया है जहां इजरायल और लेबनान के बीच करीब 33 साल बाद सीधी बातचीत शुरू हुई है। यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है।

    इस पूरी बातचीत को एक बड़े कूटनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है जिसकी मध्यस्थता अमेरिका कर रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मौजूदगी में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई।

    दरअसल इजरायल और लेबनान के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है जिसकी एक बड़ी वजह दक्षिणी लेबनान में सक्रिय संगठन हिजबुल्लाह है। यह संगठन ईरान का समर्थक माना जाता है और समय समय पर इजरायल पर हमले करता रहा है।

    विशेष रूप से 7 अक्टूबर 2023 हमास हमला के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया था जब हमास के हमलों के साथ ही हिजबुल्लाह ने भी इजरायल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।

    हाल के घटनाक्रमों में अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान की स्थिति कुछ कमजोर मानी जा रही है। ऐसे में अमेरिका और इजरायल इस मौके का फायदा उठाकर क्षेत्रीय समीकरण बदलने की कोशिश में हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि लेबनान के साथ सीधी बातचीत का मकसद हिजबुल्लाह के प्रभाव को कम करना है। यदि लेबनानी सरकार इस दिशा में सख्त कदम उठाती है तो यह ईरान के लिए बड़ा झटका हो सकता है क्योंकि हिजबुल्लाह को उसका प्रमुख सहयोगी माना जाता है।

    हाल ही में लेबनान सरकार ने गैर सरकारी हथियारों को हटाने के निर्देश दिए हैं जिसकी सराहना बेंजामिन नेतन्याहू ने भी की है। यह संकेत देता है कि लेबनान धीरे धीरे हिजबुल्लाह के प्रभाव को सीमित करने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।

    इसके साथ ही अमेरिका और इजरायल अन्य मोर्चों पर भी ईरान को घेरने की रणनीति अपना रहे हैं जिसमें समुद्री मार्गों पर दबाव बनाना भी शामिल है।हालांकि इजरायल ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका और ईरान के बीच संभावित सीजफायर का असर लेबनान पर नहीं पड़ेगा यानी दक्षिणी लेबनान में सैन्य कार्रवाई जारी रह सकती है।

    कुल मिलाकर यह वार्ता केवल दो देशों के बीच संवाद नहीं बल्कि पूरे मध्य पूर्व की राजनीति को प्रभावित करने वाला बड़ा कदम है। अगर यह बातचीत सफल होती है तो इससे क्षेत्र में लंबे समय से जारी संघर्ष की दिशा बदल सकती है और हिजबुल्लाह के प्रभाव को कमजोर किया जा सकता है।

  • बातचीत चाहते हैं, दबाव नहीं सहेंगे: ईरानी राष्ट्रपति की अमेरिका इजरायल को कड़ी चेतावनी

    बातचीत चाहते हैं, दबाव नहीं सहेंगे: ईरानी राष्ट्रपति की अमेरिका इजरायल को कड़ी चेतावनी


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच इरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने साफ किया है कि ईरान युद्ध नहीं बल्कि बातचीत के जरिए समाधान चाहता है। हालांकि उन्होंने अमेरिका और इजरायल को सख्त संदेश देते हुए कहा कि किसी भी तरह का दबाव या शर्तें थोपने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

    संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा ईरान

    ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि उनका देश कभी भी टकराव या अस्थिरता का समर्थक नहीं रहा है। लेकिन यदि किसी ने ईरान को झुकाने या उस पर अपनी शर्तें थोपने की कोशिश की तो वह पूरी तरह विफल होगी। उन्होंने दोहराया कि ईरान अपनी संप्रभुता से किसी भी हाल में समझौता नहीं करेगा।

    नागरिकों पर हमलों पर उठाए सवाल

    ईरानी न्यूज एजेंसी के हवाले से राष्ट्रपति ने अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय सिद्धांतों के तहत नागरिकों बच्चों और बौद्धिक वर्ग को निशाना बनाना साथ ही स्कूलों और अस्पतालों जैसे संस्थानों को नुकसान पहुंचाना किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।

    संवाद ही रास्ता लेकिन दबाव नहीं

    राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि ईरान का रुख हमेशा से संवाद और सहयोग का रहा है। उन्होंने कहा कि देश न तो युद्ध चाहता है और न ही अस्थिरता लेकिन अगर उसकी संप्रभुता पर दबाव बनाया गया तो ईरानी जनता इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। ईरान के राष्ट्रपति ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान को झुकाने या सरेंडर करने के लिए मजबूर करने की हर कोशिश नाकाम रहेगी।

    गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था। इस दौरान तेहरान सहित कई बड़े शहरों पर हमले हुए। इसके जवाब में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने इजरायल के ठिकानों और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंच गया।

    इस्लामाबाद वार्ता रहीं बेनतीजा

    तनाव कम करने के लिए 11 अप्रैल को इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत हुई। ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर गालिबफ ने नेतृत्व किया जबकि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने की। कई दौर की बातचीत के बावजूद कोई ठोस समझौता नहीं हो सका। दोनों पक्षों ने माना कि कई अहम मुद्दों पर मतभेद अब भी बने हुए हैं जिससे दीर्घकालिक समाधान फिलहाल संभव नहीं हो पाया है।

  • नीरव मोदी प्रत्यर्पण केस में बड़ा अपडेट: लंदन में CBI की सक्रियता तेज, भारत वापसी के संकेत

    नीरव मोदी प्रत्यर्पण केस में बड़ा अपडेट: लंदन में CBI की सक्रियता तेज, भारत वापसी के संकेत


    नई दिल्ली।
    भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी को भारत लाने की प्रक्रिया अब निर्णायक चरण में पहुंचती नजर आ रही है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, प्रत्यर्पण से जुड़ी अधिकांश कानूनी बाधाएं दूर हो चुकी हैं और इसी के चलते केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की टीमें इन दिनों लंदन में सक्रिय हैं।

    लंदन में CBI की मौजूदगी क्यों अहम?

    सूत्रों का कहना है कि लंदन में जांच एजेंसियों की बढ़ती गतिविधि इस बात का संकेत है कि प्रत्यर्पण प्रक्रिया अंतिम दौर में है। जैसे ही शेष औपचारिकताएं पूरी होंगी, नीरव मोदी को भारत लाने की कार्रवाई शुरू की जा सकती है। इसे भारत सरकार के लिए बड़ी कानूनी और कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

    क्या है पूरा मामला?

    नीरव मोदी पर अपने मामा मेहुल चोकसी के साथ मिलकर पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में करीब 13,000 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप है। CBI के अनुसार, इस घोटाले में लगभग 6,498 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी सीधे तौर पर नीरव मोदी से जुड़ी बताई गई है।

    कब से जेल में है मोदी?

    55 वर्षीय नीरव मोदी को 19 मार्च 2019 को ब्रिटेन में गिरफ्तार किया गया था। तब से वह वैंड्सवर्थ जेल, लंदन में बंद है। कभी लग्जरी ज्वेलरी ब्रांड और ग्लैमरस आयोजनों में चर्चा में रहने वाला यह कारोबारी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित आर्थिक अपराधी बन चुका है।

    कानूनी रास्ते लगभग खत्म

    हाल ही में ब्रिटेन की हाई कोर्ट ऑफ जस्टिस ने नीरव मोदी की प्रत्यर्पण के खिलाफ अपील को फिर से खोलने की मांग खारिज कर दी थी। इसके बाद उसके पास सीमित कानूनी विकल्प बचे हैं। हालांकि उसने यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय का रुख किया है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे प्रक्रिया में ज्यादा देरी की संभावना नहीं है।

    कब हो सकता है प्रत्यर्पण?

    आधिकारिक तौर पर अभी कोई तारीख तय नहीं की गई है, लेकिन हालिया घटनाक्रमों को देखते हुए माना जा रहा है कि प्रत्यर्पण की प्रक्रिया जल्द पूरी हो सकती है।

    नीरव मोदी का भारत प्रत्यर्पण अब औपचारिकताओं तक सीमित माना जा रहा है। यदि यह जल्द होता है, तो यह न केवल आर्थिक अपराधियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई होगी, बल्कि भविष्य के मामलों के लिए भी सख्त संदेश साबित होगा।

  • ईरान-अमेरिका तनाव का असर: सोना-चांदी की कीमतों में लगातार दूसरे दिन तेजी

    ईरान-अमेरिका तनाव का असर: सोना-चांदी की कीमतों में लगातार दूसरे दिन तेजी


    नई दिल्ली।
     सोने और चांदी की कीमतों में आज लगातार दूसरे दिन तेजी देखने को मिली है। अमेरिका और ईरान के बीच फिर से बातचीत की संभावनाओं की वजह से आज इंटरनेशनल मार्केट गोल्ड और सिल्वर का रेट फिर से बढ़ा हुआ है। मौजूदा परिस्थितियों की वजह से दुनिया भर में एनर्जी संकट गहरा गया है। बता दें, पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के बीच एक दौर की बातचीत हो गई है। लेकिन यह पूरी वार्ता विफल रही थी। दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता तब नहीं हो पाया था।

    क्या है गोल्ड का ताजा रेट (Gold Latest Price)
    COMEX gold की कीमतों में आज शुरुआती कारोबार के दौरान बढ़ोतरी देखने को मिली। जिसके बाद यह 4855 डॉलर प्रति आउंस के स्तर पर पहुंच गया। इससे पहले के सत्र में सोने का भाव 2 प्रतिशत से अधिक बढ़ा था। COMEX Silver के रेट भी आज बुधवार को बढ़ोतरी देखने को मिली है। चांदी की कीमतों में उछाल के बाद यह 79 डॉलर प्रति आउंस के स्तर पर पहुंच गई थी।

  • ब्लूमबर्ग के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की बातचीत आने वाले दिनों में हो सकती है। न्यूयार्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अगले दो दिनों में बातचीत शुरू होने के संकेत दिए हैं। इन खबरों की वजह से मंगलवार को अमेरिकी शेयर बाजार में तेजी दर्ज की गई। वहीं, डॉलर इंडेक्स 0.3 प्रतिशत लुढ़क चुका है। बता दें, जब से युद्ध शुरू हुआ है तब से मेटल की कीमतों में 8 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली है।

    कहां तक जाएगा सोने और चांदी का रेट (Gold Silver Price Outlook)
    Augmon से जुड़ी रेनिशा कहती हैं कि सोने और चांदी इस समय भी बुल रन पर सवार हैं। हालांकि, आगे का रास्ता काफी अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। रेनिशा का कहना है टेक्निकल स्तर पर, “गोल्ड 4800 से 4850 डॉलर (154000 रुपये से 155000 रुपये तक) के आस-पास रेसिस्टेंस दिखा रहा है। अगर कीमतें इसके ऊपर गई तो यह फिर 5000 डॉलर (160000 रुपये) के स्तर तक जा सकती हैं।”

    चांदी के विषय में एक्सपर्ट की राय है कि यह 77 डॉलर (246000 रुपये) के स्तर पर रेसिस्टेंस दिखा रहा है। इसके ऊपर जाने की स्थिति में चांदी का दाम 82 डॉलर से 87 डॉलर (255000 रुपये से 265000 रुपये) के स्तर तक पहुंच सकता है।”

  • ईरान-अमेरिका तनाव के बीच फ्रांस की सक्रिय कूटनीति, क्या मैक्रों दिला पाएंगे राहत?

    ईरान-अमेरिका तनाव के बीच फ्रांस की सक्रिय कूटनीति, क्या मैक्रों दिला पाएंगे राहत?


    वाशिंगटन
    । मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अब इमैनुएल मैक्रों ने शांति बहाली की दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप और मसूद पेजेश्कियन से अलग-अलग बातचीत कर गतिरोध तोड़ने की कोशिश की है।

    होर्मुज स्ट्रेट बना तनाव का केंद्र

    होर्मुज जलडमरूमध्य में बनी तनावपूर्ण स्थिति इस पूरे विवाद की मुख्य वजह है। अमेरिका द्वारा यहां नौसैनिक नाकाबंदी लगाए जाने के बाद हालात और बिगड़ गए हैं। इस बीच ईरान ने संकेत दिया है कि वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन शर्त यह है कि चर्चा अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में हो।

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  • ईरान की शर्तें और रुख

    ईरान ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पूर्ण युद्धविराम के लिए लेबनान में जारी शत्रुता को खत्म करना जरूरी होगा। तेहरान का मानना है कि यूरोप, खासकर फ्रांस, इस गतिरोध को खत्म करने में अहम भूमिका निभा सकता है। हालांकि इस्लामाबाद में हालिया वार्ता बेनतीजा रही, लेकिन ईरान ने आगे बातचीत जारी रखने की इच्छा जताई है।

    मैक्रों का शांति फॉर्मूला

    मैक्रों ने दोनों नेताओं से बातचीत के बाद तीन अहम प्रस्ताव सामने रखे—

    क्षेत्रीय स्थिरता के लिए युद्धविराम का विस्तार, जिसमें लेबनान को भी शामिल किया जाए
    होर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी शर्त और शुल्क के तुरंत खोला जाए
    फ्रांस और ब्रिटेन के नेतृत्व में बहुपक्षीय मिशन बनाकर नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाए

    फ्रांस और ब्रिटेन इस मुद्दे पर पेरिस में एक वीडियो कॉन्फ्रेंस की मेजबानी भी करने जा रहे हैं, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर चर्चा होगी।

    ट्रंप का दावा—ईरान बातचीत को तैयार

    डोनाल्ड ट्रंप ने भी हाल ही में दावा किया कि ईरान की ओर से बातचीत के संकेत मिले हैं और तेहरान समझौता करने को इच्छुक है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका का रुख सख्त बना रहेगा।

    क्या संभव है समाधान?

    विशेषज्ञों के मुताबिक, हालात बेहद संवेदनशील हैं और किसी भी छोटी चूक से बड़ा संघर्ष हो सकता है। ऐसे में फ्रांस की मध्यस्थता अहम साबित हो सकती है, लेकिन अंतिम समाधान दोनों पक्षों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगा।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच फ्रांस की पहल एक उम्मीद जरूर जगाती है, लेकिन शांति की राह अभी भी आसान नहीं दिख रही। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि कूटनीति जीतती है या टकराव और गहराता है।

  • युद्ध का नया चेहरा: यूक्रेन के रोबोटों के सामने रूसी सैनिकों ने डाले हथियार, जेलेंस्की का बड़ा दावा

    युद्ध का नया चेहरा: यूक्रेन के रोबोटों के सामने रूसी सैनिकों ने डाले हथियार, जेलेंस्की का बड़ा दावा

    कीव। रूस-यूक्रेन युद्ध अब ऐसे दौर में पहुंच चुका है, जहां विज्ञान-कथा जैसी बातें हकीकत बनती नजर आ रही हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने बताया कि उनकी सेना के ग्राउंड रोबोटिक सिस्टम और ड्रोन ने मिलकर एक रूसी सैन्य ठिकाने पर कब्जा कर लिया।

    रोबोटों के आगे झुके दुश्मन सैनिक
    सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस पूरे ऑपरेशन में यूक्रेन का कोई भी सैनिक सीधे तौर पर शामिल नहीं था। दुश्मन सैनिकों को रोबोटिक सिस्टम्स के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा। माना जा रहा है कि दुनिया के किसी भी युद्ध में इस तरह की यह पहली घटना है। हालांकि ऑपरेशन की लोकेशन का खुलासा नहीं किया गया है।

    भविष्य की जंग का संकेत
    अगर जेलेंस्की का दावा सही साबित होता है, तो यह युद्ध के बदलते स्वरूप का बड़ा उदाहरण बन सकता है। उनके सलाहकार अलेक्जेंडर कामिशिन के अनुसार आने वाले समय में अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल युद्ध की रणनीति को पूरी तरह बदल सकते हैं। फिलहाल यूक्रेन अपनी करीब 30 प्रतिशत पैदल सेना को रोबोट से बदलने की क्षमता रखता है।

    बिना सैनिक नुकसान के ऑपरेशन सफल
    राष्ट्रपति जेलेंस्की ने एक्स पर जानकारी देते हुए कहा कि यह पूरा मिशन पूरी तरह मानव रहित प्लेटफॉर्म के जरिए अंजाम दिया गया। इस दौरान किसी भी यूक्रेनी सैनिक की जान जोखिम में नहीं पड़ी और बिना किसी नुकसान के दुश्मन के ठिकाने पर कब्जा कर लिया गया।

    हजारों मिशन पूरे कर चुके रोबोट
    जेलेंस्की के मुताबिक यूक्रेन के रेटेल टर्मिट, अर्दल और जमी जैसे रोबोटिक सिस्टम्स ने पिछले तीन महीनों में 22,000 से अधिक मिशनों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। उन्होंने बताया कि जहां पहले सैनिकों को खतरनाक इलाकों में भेजा जाता था, अब वहां रोबोट तैनात किए जा रहे हैं, जिससे हजारों सैनिकों की जान बचाई जा रही है।

  • अंडमान सागर में पलटी बांग्लादेशियों-रोहिंग्याओं से भरी नाव… 250 लोगों के डूबने की आशंका

    अंडमान सागर में पलटी बांग्लादेशियों-रोहिंग्याओं से भरी नाव… 250 लोगों के डूबने की आशंका


    पोर्ट ब्लेयर।
    संयुक्त राष्ट्र (United Nations) ने मंगलवार को बताया कि अंडमान सागर (Andaman Sea.) में बांग्लादेशी नागरिकों (Bangladeshi citizens) और रोहिंग्या शरणार्थियों (Rohingya refugees) को ले जा रही एक नाव पलटने से बच्चों समेत करीब 250 लोगों के लापता होने की आशंका है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) ने एक बयान में कहा, “यह नाव (ट्रॉलर) दक्षिणी बांग्लादेश के टेकनाफ से रवाना हुई थी और मलेशिया जा रही थी। बताया जा रहा है कि तेज़ हवाओं, समुद्र में उफान और नाव में क्षमता से ज़्यादा लोगों के होने के कारण यह डूब गई।” नाव पर सवार लोगों के डूबने की आशंका जताई जा रही है।

    म्यांमार के सताए हुए मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय, रोहिंग्या के हज़ारों लोग हर साल अपने देश में हो रहे दमन और गृहयुद्ध से बचने के लिए समुद्र के रास्ते अपनी जान जोखिम में डालकर भागते हैं। अक्सर वे कामचलाऊ नावों का इस्तेमाल करते हैं। नाव पर सवार रोहिंग्या लोग संभवतः बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार में बने विशाल शिविरों से निकल रहे थे। इन शिविरों में दस लाख से ज़्यादा ऐसे शरणार्थी रहते हैं, जिन्हें म्यांमार के पश्चिमी राज्य रखाइन से भागने पर मजबूर होना पड़ा था। ये लोग यहाँ बेहद खराब हालात में गुज़ारा करते हैं।


    नाव में 280 लोग सवार थे

    रखाइन राज्य में सेना और ‘अराकान आर्मी’ (एक जातीय अल्पसंख्यक विद्रोही समूह) के बीच इलाके पर कब्ज़े को लेकर ज़बरदस्त लड़ाई होती रही है। इस ताज़ा घटना के पीछे की सही वजहें अभी साफ नहीं हैं, लेकिन शुरुआती जानकारी के मुताबिक, इस नाव में 280 लोग सवार थे और यह 4 अप्रैल को बांग्लादेश से रवाना हुई थी। UNHCR के बयान में कहा गया, “यह दुखद घटना लंबे समय से चले आ रहे विस्थापन के गंभीर नतीजों और रोहिंग्या लोगों के लिए किसी स्थायी समाधान के न होने को दर्शाती है।”


    पिछले साल भी दो नाव डूबी थी

    बयान में यह भी कहा गया कि यह घटना “म्यांमार में विस्थापन की मूल वजहों को दूर करने और ऐसे हालात बनाने के लिए तुरंत ज़रूरी प्रयासों की याद दिलाती है, ताकि रोहिंग्या शरणार्थी अपनी मर्ज़ी से, सुरक्षित और सम्मान के साथ अपने घर लौट सकें।” अंडमान सागर म्यांमार, थाईलैंड और मलय प्रायद्वीप के पश्चिमी तटों के साथ-साथ फैला हुआ है। पिछले साल UNHCR ने बताया था कि मई महीने में म्यांमार के तट के पास दो नाव दुर्घटनाओं में समुद्र में 427 रोहिंग्या लोगों के मारे जाने की आशंका थी।

  • अमेरिकी नाकेबादी की चीनी टैंकर ने ली परीक्षा… होर्मुज से गुजरने के बाद लिया यू-टर्न

    अमेरिकी नाकेबादी की चीनी टैंकर ने ली परीक्षा… होर्मुज से गुजरने के बाद लिया यू-टर्न


    तेहरान।
    अमेरिका (America) ने हाल ही में ईरान (Iran.) के बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकेबंदी (Naval blockade) लगा दी है। इसका मतलब है कि कोई भी जहाज ईरान के बंदरगाहों (Iranian Ports) पर नहीं जा सकता या वहां से नहीं आ सकता। यह ब्लॉकेड 13 अप्रैल को लागू हुआ। इसका मकसद ईरान के तेल व्यापार को रोकना है। खासतौर से उन जहाजों को रोका जा रहा है जो ईरानी बंदरगाहों (Iranian Ports) या तटीय क्षेत्रों में आते-जाते हैं। अब एक चीनी कंपनी से जुड़े टैंकर ने इस नाकेबंदी की परीक्षा ली है जिसका दुनिया भर में खूब चर्चा हो रही है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, इस चीनी टैंकर का नाम रिच स्टारी है। यह चीन की शंघाई Xuanrun शिपिंग कंपनी का है। अमेरिका ने 2023 में इसे प्रतिबंधित कर दिया था क्योंकि यह ईरान को प्रतिबंधों से बचने में मदद कर रहा था। टैंकर में लगभग 2.5 लाख बैरल मेथेनॉल (एक तरह का केमिकल) था। ब्लॉकेड शुरू होते ही यह होर्मुज स्ट्रेट से गुजरा और खाड़ी से बाहर निकल गया।


    स्ट्रेट से निकलने में कैसे सफल रहा चीनी टैंकर

    पहले टैंकर होर्मुज के पास पहुंचकर वापस मुड़ गया। कुछ घंटों बाद फिर आगे बढ़ा और सफलतापूर्वक बाहर निकल गया। बाहर निकलने के बाद उसने यू-टर्न कर लिया। इसका गंतव्य ओमान का बंदरगाह था, लेकिन बाद में बदल दिया गया। इस दौरान उसने अपनी चीनी मालिकाना जानकारी भी सार्वजनिक कर दी। कई अन्य जहाज भी इसी समय स्ट्रेट पार कर चुके हैं।


    सीजफायर

    इस घटना से क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। चीन ने अमेरिका के इस ब्लॉकेड की कड़ी निंदा की है और इसे खतरनाक बताया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने इसे गैर-जिम्मेदाराना करार दिया। उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि इससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ सकता है। शिपिंग कंपनियां अब सतर्क हो गई हैं क्योंकि तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। यह घटना दिखाती है कि नाकेबंदी कितना प्रभावी है और आगे क्या हो सकता है।