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  • माइग्रेशन मुद्दे पर तनाव: अमेरिकी फैसले के असर का आकलन करेगा मैक्सिको

    माइग्रेशन मुद्दे पर तनाव: अमेरिकी फैसले के असर का आकलन करेगा मैक्सिको


    नई दिल्ली । अमेरिका में अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त होते कदमों ने अब मैक्सिको की चिंता बढ़ा दी है। Donald Trump प्रशासन द्वारा जारी नए एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के बाद मैक्सिको सरकार सतर्क हो गई है। इस आदेश के तहत बिना कानूनी दस्तावेजों के अमेरिका में रह रहे प्रवासियों की बैंकिंग और वित्तीय गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जा सकती है। इसी को देखते हुए Claudia Sheinbaum ने अपने अधिकारियों को इस फैसले के संभावित प्रभाव का विस्तृत आकलन करने के निर्देश दिए हैं।

    राष्ट्रपति शीनबॉम ने अपनी नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनकी सरकार इस आदेश के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों का अध्ययन कर रही है। खासतौर पर इस बात पर ध्यान दिया जा रहा है कि इसका असर अमेरिका में काम कर रहे लाखों मैक्सिकन नागरिकों द्वारा अपने परिवारों को भेजे जाने वाले पैसों यानी रेमिटेंस पर कितना पड़ेगा। मैक्सिको की अर्थव्यवस्था में रेमिटेंस विदेशी मुद्रा का एक बड़ा स्रोत मानी जाती है और हर साल अरबों डॉलर देश में आते हैं।

    मैक्सिको सरकार के अनुसार, वित्त मंत्रालय और अमेरिका में नए मैक्सिकन राजदूत Roberto Lajous इस मामले का संयुक्त रूप से अध्ययन कर रहे हैं। शुरुआती समीक्षा में फिलहाल किसी बड़े खतरे के संकेत नहीं मिले हैं, लेकिन सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। अधिकारियों का मानना है कि अगर बैंकिंग सेवाओं और पैसों के लेन-देन पर ज्यादा निगरानी बढ़ी, तो इसका असर प्रवासी समुदाय पर पड़ सकता है।

    अमेरिका के इस नए आदेश में बैंकों और वित्तीय संस्थानों को ग्राहकों की नागरिकता और इमिग्रेशन स्थिति से जुड़े संदिग्ध संकेतों की निगरानी करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके तहत सीमा-पार धन भेजने, बैंक खाते खोलने और वित्तीय सेवाओं के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पहचान पत्रों की जांच और सख्त की जाएगी। माना जा रहा है कि इससे बड़ी संख्या में प्रवासियों की वित्तीय गतिविधियां जांच के दायरे में आ सकती हैं।

    व्हाइट हाउस के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने 19 मई को इस आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। प्रशासन का तर्क है कि अवैध रूप से रह रहे लोगों को बैंकिंग सुविधाएं और ऋण देना वित्तीय व्यवस्था के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। ट्रंप ने कहा कि कई प्रवासियों के पास स्थायी रोजगार नहीं होता और उन पर निर्वासन का खतरा बना रहता है। ऐसे में उन्हें ऋण देना बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।

    इसी बीच अमेरिकी कांग्रेस में विदेश भेजे जाने वाले पैसों यानी रेमिटेंस पर 5 प्रतिशत टैक्स लगाने के प्रस्ताव पर भी चर्चा तेज हो गई है। फिलहाल केवल नकद लेन-देन पर 1 प्रतिशत टैक्स लागू है। मैक्सिको सरकार ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा है कि यह प्रवासियों पर “दोहरी टैक्स वसूली” जैसा होगा, क्योंकि वे पहले ही अमेरिका में टैक्स का भुगतान करते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका ने प्रवासियों के वित्तीय लेन-देन पर और सख्ती की, तो इसका असर सिर्फ मैक्सिको ही नहीं बल्कि कई लैटिन अमेरिकी देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा अमेरिका और मैक्सिको के बीच बड़ा राजनीतिक और आर्थिक विषय बन सकता है।

  • नई दिल्ली में बड़ा कूटनीतिक कदम, भारत और साइप्रस बने रणनीतिक साझेदार, पीएम मोदी ने बताया निवेश बढ़ाने का रोडमैप

    नई दिल्ली में बड़ा कूटनीतिक कदम, भारत और साइप्रस बने रणनीतिक साझेदार, पीएम मोदी ने बताया निवेश बढ़ाने का रोडमैप


    नई दिल्ली। भारत की विदेश नीति में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है, जहां भारत और साइप्रस ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के रूप में औपचारिक रूप दे दिया है। यह निर्णय उच्चस्तरीय बैठक के दौरान लिया गया, जिसमें दोनों देशों ने आपसी सहयोग को नई दिशा देने और भविष्य में आर्थिक तथा कूटनीतिक संबंधों को और अधिक मजबूत करने पर सहमति जताई। इस साझेदारी को दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास और दीर्घकालिक सहयोग का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

    इस अवसर पर दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच विस्तृत चर्चा हुई, जिसमें द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं को और मजबूत बनाने पर जोर दिया गया। बातचीत के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि भारत और साइप्रस के रिश्ते केवल औपचारिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह साझा मूल्यों, लोकतांत्रिक परंपराओं और पारस्परिक सम्मान पर आधारित हैं। यही वजह है कि यह संबंध समय के साथ और अधिक गहरे और स्थिर होते गए हैं।

    प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर बताया कि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेष रूप से साइप्रस से भारत में निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो पिछले दशक में लगभग दोगुना हो चुका है। इसी सकारात्मक रुझान को देखते हुए दोनों देशों ने अगले पांच वर्षों में इस निवेश को फिर से दोगुना करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए व्यापार, वित्तीय सहयोग और निवेश के नए क्षेत्रों को विकसित करने पर सहमति बनी है।

    बैठक में यह भी माना गया कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच मजबूत साझेदारी और स्थिर निवेश माहौल बेहद जरूरी है। इसी कारण दोनों देशों ने मिलकर ऐसे नए अवसरों की पहचान करने पर जोर दिया है, जो भविष्य में आर्थिक विकास को नई गति दे सकें। इसमें तकनीकी सहयोग और व्यापार विस्तार को भी महत्वपूर्ण भूमिका दी जाएगी।

    दोनों देशों ने वैश्विक मुद्दों पर भी विचार साझा किए और अंतरराष्ट्रीय शांति तथा स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही यह भी कहा गया कि मौजूदा वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए संवाद और सहयोग सबसे प्रभावी माध्यम हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर भी सहमति बनी, ताकि वे बदलते वैश्विक परिदृश्य में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकें।

    इस रणनीतिक साझेदारी के साथ भारत और साइप्रस ने अपने संबंधों को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है, जहां सहयोग केवल वर्तमान आवश्यकताओं तक सीमित न रहकर भविष्य की संभावनाओं को भी ध्यान में रखकर आगे बढ़ेगा। यह साझेदारी दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास और साझा विकास की मजबूत दिशा को दर्शाती है।

  • ट्रंप के बाद अब पाकिस्तानी PM शहबाज शरीफ करेंगे चीन की यात्रा…. जानें क्या है एजेंडा?

    ट्रंप के बाद अब पाकिस्तानी PM शहबाज शरीफ करेंगे चीन की यात्रा…. जानें क्या है एजेंडा?


    बीजिंग।
    पाकिस्तान (Pakistan) के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Prime Minister Shahbaz Sharif) चीन की यात्रा (China Tour) करने वाले हैं। चीन (China) के प्रधानमंत्री ली क्वियांग (Prime Minister Li Keqiang) ने उन्हें बुलावा भेजा है। शरीफ की चीन यात्रा 23 से 26 मई के बीच होगी। इस दौरान वह चीनी राष्ट्रपति शी जिनिपिंग (Chinese President Xi Jinping) और प्रधानमंत्री ली क्वियांग से मिलेंगे। बता दें कि हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) चीन की यात्रा से लौटे हैं। चीन यात्रा के दौरान ट्रंप और जिनपिंग ने ईरान युद्ध और ताइवान समेत विभिन्न मुद्दों पर बात हुई। अब देखने वाली बात यह है कि शरीफ चीन पहुंचकर क्या खिचड़ी पकाते हैं।


    यात्रा के क्या हो सकते हैं मायने

    चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता, गुओ जियाकुन ने कहाकि शरीफ का दौरा दोनों देशों के बीच काफी अहम होने वाला है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों ने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर करीबी संवाद और समन्वय बनाए रखा है। साथ ही अपने साझा हितों की प्रभावी रूप से सुरक्षा की है। उन्होंने कहाकि इसके अलावा हमने क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और विकास को बढ़ावा दिया है। चीन को उम्मीद है कि इस अवसर का इस्तेमाल करते हुए दोनों देश, परंपरागत दोस्ती, सभी स्तर के सहयोग और एकता का नया अध्याय लिखेंगे। गुओ ने कहाकि हमारी कोशिश है कि चीन-पाकिस्तान समुदाय नए समय में एक साझा भविष्य की नींव रखे।


    जिनपिंग ने जरदारी से की थी बात

    बता दें कि गुरुवार को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने पाकिस्तानी समकक्ष आसिफ अली जरदारी को दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ पर भी शुभकामनाएं दीं। सरकारी समाचार एजेंसी, शिन्हुआ मुताबिक, शी ने इस संदेश में कहाकि चीन और पाकिस्तान अच्छे दोस्त। साथ ही सभी मौसमों में सहयोगी रणनीतिक साझीदार हैं। हम पहाड़ों और नदियों से जुड़े हैं और सुख-दुःख साझा करते हैं। चीनी नेता ने कहाकि कूटनीतिक संबंध बनने के 75 साल के बाद से चीन और पाकिस्तान के बीच दोस्ती हमेशा से मजबूत और अटूट रही है।


    सुरक्षा और सहयोग बढ़ाने पर जोर

    चीनी राष्ट्रपति ने आगे कहाकि दोनों देशों ने लंबे समय से उच्च-स्तरीय आपसी राजनीतिक विश्वास, व्यावहारिक सहयोग, सुरक्षा सहयोग और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बनाए रखा है। यह दोनों देशों के बीच संबंधों को आदर्श रूप में दिखाता है। जिनपिंग ने कहाकि वे चीन-पाकिस्तान संबंधों को महत्वपूर्ण मानते हैं। साथ ही जरदारी के साथ मिलकर इस वर्षगांठ को एक अवसर के रूप में इस्तेमाल करने को तैयार हैं ताकि संबंधों को और बेहतर बनाया जा सके। साथ ही जिनपिंग ने पारंपरिक दोस्ती को बढ़ाने, सभी पहलुओं के सहयोग को और बेहतर करने पर जोर दिया।

  • ट्रंप को बड़ा झटका… ईरान के सुप्रीम लीडर बोले- विदेश नहीं भेजेंगे देश का यूरेनियम भंडार

    ट्रंप को बड़ा झटका… ईरान के सुप्रीम लीडर बोले- विदेश नहीं भेजेंगे देश का यूरेनियम भंडार


    तेहरान।
    अमेरिका (America) के साथ यूरेनियम (Uranium) को लेकर चल रही तीखी तकरार के बीच ईरान (Iran) ने बड़ा फैसला लिया है। दो वरिष्ठ ईरानी सूत्रों के मुताबिक, देश के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाखा मोजतबा मेनेई (Supreme Leader Ayatollah Mojtaba Menei) ने निर्देश जारी कर दिया है कि ईरान का लगभग हथियार-योग्य समृद्ध यूरेनियम भंडार विदेश नहीं भेजा जाएगा। इससे अमेरिका की प्रमुख मांग पर तेहरान का रुख और सख्त हो गया है। यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। इजरायल के साथ मिलकर चल रही शांति वार्ता अब और जटिल हो सकती है।

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली अधिकारियों ने बताया कि ट्रंप ने इजरायल को आश्वासन दिया था कि ईरान का अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार देश से बाहर भेज दिया जाएगा और किसी भी शांति समझौते में इसे अनिवार्य शर्त बनाया जाएगा। नाम न छापने की शर्त पर बात करने वाले ईरानी सूत्रों ने बताया कि सर्वोच्च नेता का यह निर्देश और सत्ता के अंदरूनी हलकों में आम सहमति है कि समृद्ध यूरेनियम को देश से बाहर नहीं जाना चाहिए। अधिकारियों का मानना है कि ऐसा करने से ईरान भविष्य में अमेरिका-इजरायल हमलों के प्रति और अधिक कमजोर हो जाएगा।


    नेतन्याहू की सख्ती

    दूसरी ओर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कहा है कि जब तक ईरान से समृद्ध यूरेनियम हटाया नहीं जाता, उसके प्रॉक्सी मिलिशिया समर्थन बंद नहीं होते और बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता समाप्त नहीं की जाती, तब तक युद्ध समाप्त नहीं माना जाएगा।


    ईरान को विश्वास नहीं

    28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के हमलों से शुरू हुए युद्ध के बाद अस्थिर युद्धविराम लागू है। इस दौरान ईरान ने खाड़ी राज्यों में अमेरिकी ठिकानों पर गोलीबारी की और लेबनान में हिजबुल्लाह के साथ लड़ाई तेज हुई। हालांकि शांति प्रयास अभी तक नाकाम रहे हैं। ईरानी सूत्रों ने कहा कि तेहरान को आशंका है कि युद्धविराम वाशिंगटन का सिर्फ रणनीतिक धोखा है, ताकि नए हमलों की तैयारी की जा सके। ईरान के शीर्ष शांति वार्ताकार मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने बुधवार को कहा कि दुश्मन की गतिविधियां नए हमलों की तैयारी का संकेत दे रही हैं।


    अमेरिकी राष्ट्रपति ने क्या कहा?

    ट्रंप ने बुधवार को कहा कि यदि ईरान शांति समझौते के लिए तैयार नहीं हुआ तो अमेरिका नए हमलों के लिए तैयार है, हालांकि उन्होंने कुछ दिनों का इंतजार करने का भी संकेत दिया। दोनों पक्षों ने कुछ मुद्दों पर समझौता शुरू कर दिया है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम को लेकर गहरे मतभेद बरकरार हैं, खासकर समृद्ध यूरेनियम के भविष्य और संवर्धन अधिकार पर।


    ईरान का रुख सख्त

    ईरानी अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि उनकी प्राथमिकता युद्ध का स्थायी समाधान और अमेरिका-इजरायल से कोई हमला न होने की विश्वसनीय गारंटी है। इसके बाद ही वे परमाणु कार्यक्रम पर विस्तृत बातचीत के लिए तैयार होंगे। ईरान लंबे समय से परमाणु बम बनाने से इनकार करता रहा है। युद्ध से पहले ईरान ने अपने 60% समृद्ध यूरेनियम भंडार का आधा हिस्सा बाहर भेजने पर सहमति जताई थी, लेकिन ट्रंप की लगातार धमकियों के बाद यह रुख बदल गया, जिसका परिणाम अब सबके सामने है।


    क्या कह रहे आईएईए के आंकड़े?

    अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अनुसार, जून 2025 के हमलों के समय ईरान के पास 440.9 किलोग्राम 60% समृद्ध यूरेनियम था। हमलों के बाद बचा हुआ भंडार मुख्य रूप से इस्फहान और नतांज के परमाणु केंद्रों में सुरक्षित है। दूसरी ओर ईरान का कहना है कि उसे चिकित्सा और अनुसंधान रिएक्टर के लिए सीमित मात्रा में अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम की जरूरत है।

  • POK में मारा गया पुलवामा हमले का मास्टरमाइंड, हमजा बुरहान की गोली मारकर हत्या

    POK में मारा गया पुलवामा हमले का मास्टरमाइंड, हमजा बुरहान की गोली मारकर हत्या



    नई दिल्ली। 2019 के चर्चित पुलवामा आतंकी हमला के मुख्य साजिशकर्ताओं में शामिल आतंकी हमजा बुरहान की पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में हत्या कर दी गई है। ‘डॉक्टर’ के नाम से पहचाने जाने वाले हमजा को मुजफ्फराबाद के पास अज्ञात बंदूकधारियों ने गोलियों से भून डाला। हमले में उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमजा बुरहान का असली नाम अर्जुमंद गुलजार डार था और वह जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले के रत्नीपोरा का रहने वाला था। बताया जा रहा है कि वह पिछले कई वर्षों से POK में एक स्कूल टीचर की फर्जी पहचान के साथ रह रहा था। इसी आड़ में वह आतंकी नेटवर्क, ट्रेनिंग कैंप और घुसपैठ गतिविधियों को संचालित कर रहा था।

    सूत्रों के अनुसार, मुजफ्फराबाद के घने जंगल वाले इलाके में अज्ञात हमलावरों ने उसे निशाना बनाया। हमलावरों ने उस पर अंधाधुंध फायरिंग की, जिससे कई गोलियां लगने के कारण उसकी मौके पर ही मौत हो गई। फिलहाल हमलावरों की पहचान नहीं हो सकी है।

    हमजा आतंकी संगठन अल-बद्र का प्रमुख कमांडर था और वह जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी नेटवर्क के साथ भी सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ था। भारत सरकार ने वर्ष 2022 में उसे UAPA के तहत आधिकारिक तौर पर आतंकवादी घोषित किया था। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की पुलवामा हमले से जुड़ी चार्जशीट में भी उसका नाम प्रमुख साजिशकर्ताओं में शामिल था।

    बताया जाता है कि हमजा पाकिस्तान जाकर आतंकी संगठन अल-बद्र में शामिल हुआ था और बाद में उसका कमांडर बन गया। वह पाकिस्तान से ही जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने, युवाओं को संगठन में भर्ती करने और फंडिंग जुटाने का काम करता था।

    गृह मंत्रालय के अनुसार, हमजा युवाओं को आतंकवादी गतिविधियों के लिए उकसाने और आतंकी संगठनों के लिए आर्थिक मदद जुटाने में भी सक्रिय था। पुलवामा हमले के अलावा उसे कई अन्य आतंकी घटनाओं का भी मास्टरमाइंड माना जाता था।

    14 फरवरी 2019 को हुए पुलवामा हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे। उस दिन जवानों का काफिला जम्मू से श्रीनगर जा रहा था, तभी पुलवामा के लेथपोरा इलाके में विस्फोटकों से भरी एक कार जवानों की बस से टकरा गई थी। धमाका इतना भीषण था कि बस के परखच्चे उड़ गए थे। इस आत्मघाती हमले को स्थानीय आतंकी आदिल अहमद डार ने अंजाम दिया था, जबकि इसकी जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी।

    एनआईए की विस्तृत जांच में मसूद अजहर, अब्दुल रऊफ असगर, उमर फारूक और हमजा बुरहान समेत कई आतंकियों को इस हमले की साजिश में शामिल पाया गया था। अब हमजा की मौत को आतंकी नेटवर्क के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

    हालांकि, उसकी हत्या किसने और किन कारणों से की, इसे लेकर अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। सुरक्षा एजेंसियां पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

  • बांग्लादेश पासपोर्ट विवाद: “Except Israel” शर्त की वापसी, राजनीतिक प्रतीकों को हटाने की तैयारी

    बांग्लादेश पासपोर्ट विवाद: “Except Israel” शर्त की वापसी, राजनीतिक प्रतीकों को हटाने की तैयारी




    नई दिल्ली। बांग्लादेश एक बार फिर अपने पासपोर्ट नीति में बड़े बदलाव की ओर बढ़ रहा है। ढाका से सामने आई रिपोर्टों के अनुसार देश के पासपोर्ट में “Except Israel” यानी “इजरायल को छोड़कर” वाला वाक्यांश फिर से शामिल किया जाएगा। यह वही प्रावधान है जिसे 2020 में शेख हसीना सरकार के दौरान हटाया गया था, हालांकि उस समय भी इजरायल में पासपोर्ट के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लागू था।

    रिपोर्टों के मुताबिक अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेतृत्व वाली सरकार इस वाक्यांश को दोबारा शामिल करने की दिशा में काम कर रही है। कहा जा रहा है कि यह कदम देश की विदेश नीति और फिलिस्तीन मुद्दे पर लंबे समय से चले आ रहे रुख को ध्यान में रखकर उठाया जा रहा है।

    इसी के साथ पासपोर्ट डिज़ाइन और वॉटरमार्क में भी बड़े बदलाव की तैयारी है। प्रस्ताव के अनुसार, बांग्लादेश के ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रतीकों से जुड़े कई चिन्ह हटाए जा सकते हैं, जिनमें बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान से जुड़े स्थल और स्मारक भी शामिल हैं। इसमें धनमंडी 32 स्थित उनका आवास, तुंगीपारा स्थित मकबरा और अन्य राष्ट्रीय पहचान से जुड़े प्रतीक शामिल बताए जा रहे हैं।

    सूत्रों के अनुसार यह बदलाव पहले चरण में नए जारी होने वाले पासपोर्ट पर लागू होगा, जबकि पुराने पासपोर्ट को तुरंत बदलने की कोई योजना नहीं है। जैसे-जैसे पुराने पासपोर्ट की अवधि समाप्त होगी, नए नियमों के अनुसार ही दस्तावेज जारी किए जाएंगे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक और वैचारिक दिशा में भी बड़ा संकेत है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि नई सरकार अपनी विदेश नीति और घरेलू राजनीतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठा रही है, जिसमें फिलिस्तीन के समर्थन और इजरायल विरोधी रुख को दोबारा मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है।

  • पाकिस्तान के पूर्व NSA की भारत को खुली धमकी: चीन के साथ मिलकर “बर्बाद करने” की बात, कश्मीर-सिंधु जल पर जहर

    पाकिस्तान के पूर्व NSA की भारत को खुली धमकी: चीन के साथ मिलकर “बर्बाद करने” की बात, कश्मीर-सिंधु जल पर जहर



    नई दिल्ली। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) नासिर खान जंजुआ ने एक टीवी इंटरव्यू में भारत के खिलाफ बेहद भड़काऊ बयान दिया है। उन्होंने पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर के साथ बातचीत के दौरान पाकिस्तान और चीन को भविष्य की “सुपरपावर” बताते हुए दावा किया कि दोनों देश मिलकर भारत को कड़ी चुनौती देंगे। उनके इस बयान को क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने वाला माना जा रहा है। इंटरव्यू में जंजुआ ने कहा कि मौजूदा समय में भारत की नीतियों के कारण उसके खिलाफ माहौल बन रहा है और उसके “दुश्मन” बढ़ते जा रहे हैं। उन्होंने चीन की तेजी से बढ़ती ताकत का जिक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तान भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में दोनों देश मिलकर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदल देंगे।

    जंजुआ ने आगे दावा किया कि भविष्य में ऐसा समय आ सकता है जब कश्मीर और सिंधु जल संधि जैसे लंबे समय से चले आ रहे मुद्दों का समाधान “ताकत के आधार पर” किया जाएगा। उनके इस बयान को भारत-पाकिस्तान संबंधों के संदर्भ में अत्यंत संवेदनशील और विवादित माना जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि चीन और पाकिस्तान का सहयोग भविष्य में और मजबूत होगा और यह गठजोड़ भारत के लिए चुनौती साबित हो सकता है। इंटरव्यू में दिए गए इन बयानों को भारत के खिलाफ उकसाने वाली भाषा के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि इन दावों पर किसी आधिकारिक स्तर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

    लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) नासिर खान जंजुआ पाकिस्तान सेना के वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं और उन्होंने अपने करियर में कई अहम सैन्य पदों पर काम किया है। वे क्वेटा कोर कमांडर भी रहे हैं और 2015 से 2018 तक पाकिस्तान के 7वें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) के रूप में कार्यरत थे। इसके अलावा उन्होंने नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी इस्लामाबाद के अध्यक्ष के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली है। उनके इस बयान के बाद एक बार फिर भारत-पाकिस्तान और चीन के बीच भू-राजनीतिक तनाव को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

  • भारत और दक्षिण कोरिया मिलकर विकसित करेंगे लेजर हथियार और एयर डिफेंस सिस्टम

    भारत और दक्षिण कोरिया मिलकर विकसित करेंगे लेजर हथियार और एयर डिफेंस सिस्टम

    नई दिल्ली। भारत और दक्षिण कोरिया ने रक्षा क्षेत्र में भविष्य की तकनीकों को लेकर बड़ा कदम उठाया है। दोनों देश अब मिलकर अगली पीढ़ी के आधुनिक हथियार सिस्टम विकसित और निर्मित करेंगे। इसमें लेजर आधारित हथियार, गाइडेड एनर्जी वेपन और अत्याधुनिक एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म जैसी तकनीकें शामिल हैं, जिन्हें भविष्य की ‘स्टार वॉर्स’ तकनीक के रूप में देखा जा रहा है।

    यह महत्वपूर्ण पहल राजनाथ सिंह के सियोल दौरे के दौरान सामने आई। इस दौरान उन्होंने दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री आन ग्यू-बैक के साथ द्विपक्षीय बैठक की। बैठक में रक्षा उत्पादन, समुद्री सुरक्षा, संयुक्त निर्माण और उभरती रक्षा तकनीकों पर सहयोग बढ़ाने को लेकर विस्तृत चर्चा हुई।

    राजनाथ सिंह ने कहा कि दक्षिण कोरिया की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की विशाल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मिलकर रक्षा क्षेत्र में नई संभावनाएं पैदा कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देश भविष्य के एडवांस रक्षा सिस्टम संयुक्त रूप से विकसित और उत्पादित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ेंगे।

    सूत्रों के अनुसार, भारतीय कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और दक्षिण कोरिया की Hanwha Co. Ltd. के बीच दो महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं। इन समझौतों के तहत गाइडेड एनर्जी वेपन, लेजर डिफेंस सिस्टम और ऑटोमेटिक एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म को मिलकर विकसित और निर्मित किया जाएगा।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, गाइडेड एनर्जी वेपन भविष्य की युद्ध तकनीक मानी जाती है। यह लेजर या उच्च ऊर्जा किरणों के जरिए दुश्मन के ड्रोन, मिसाइल और हवाई खतरों को पलभर में नष्ट करने में सक्षम होती है। दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियां पहले से ही इस दिशा में काम कर रही हैं और अब भारत भी इस तकनीक की दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

    राजनाथ सिंह ने दक्षिण कोरिया के रक्षा अधिग्रहण कार्यक्रम प्रशासन के मंत्री ली योंग-चुल से भी मुलाकात की। दोनों देशों ने रक्षा उपकरणों के संयुक्त विकास के साथ-साथ वैश्विक निर्यात बाजार में भी साझेदारी बढ़ाने पर सहमति जताई।

    इस दौरान भारत-कोरिया रक्षा उद्योग व्यापार गोलमेज सम्मेलन का आयोजन भी किया गया, जिसमें दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी और रक्षा कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हुए। सम्मेलन में रक्षा निर्माण और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।

    इसी बीच भारत की रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करने की दिशा में एक और बड़ी उपलब्धि सामने आई है। निबा लिमिटेड द्वारा विकसित ‘सूर्यास्त्र यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर’ ने ओडिशा के चांदीपुर में सफल लाइव-फायरिंग ट्रायल किया। इस सिस्टम ने 150 और 300 किलोमीटर की दूरी तक रॉकेट दागकर सटीक निशाना साधा।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, 300 किलोमीटर की दूरी से दागे गए रॉकेट ने लक्ष्य के मात्र 2 मीटर के दायरे में निशाना लगाकर अपनी उच्च सटीकता साबित की। इसे भारत की लंबी दूरी की मारक क्षमता में बड़ा कदम माना जा रहा है।

    भारत और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग आने वाले समय में एशिया की रणनीतिक ताकतों के संतुलन पर भी असर डाल सकता है। आधुनिक तकनीक आधारित हथियार प्रणालियों का यह साझा विकास भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को नई मजबूती देने वाला माना जा रहा है।

  • ट्रंप, ईरान और चीन को लेकर ब्रह्मा चेलानी का बड़ा दावा: क्या बदल रही है वैश्विक राजनीति?

    ट्रंप, ईरान और चीन को लेकर ब्रह्मा चेलानी का बड़ा दावा: क्या बदल रही है वैश्विक राजनीति?




    नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ Brahma Chellaney ने हाल में एक श्रृंखला में ऐसे दावे किए हैं, जिनमें अमेरिका, ईरान, चीन और कैरेबियन क्षेत्र की भू-राजनीति को लेकर गंभीर टिप्पणियां शामिल हैं।इन दावों के अनुसार वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है और अमेरिका की विदेश नीति नई दिशा में जा रही है।

    ट्रंप और वैश्विक रणनीति पर दावा
    दावों में कहा गया है कि Donald Trump कथित तौर पर ईरान संकट के बीच नई रणनीतिक दिशा अपना रहे हैं। इसमें:

    मध्य पूर्व और कैरेबियन क्षेत्र में अमेरिका की सक्रियता बढ़ना

    क्यूबा और वेनेजुएला जैसी सरकारों पर दबाव की नीति

    सत्ता परिवर्तन (regime change) जैसी पुरानी रणनीतियों की वापसी का संकेत

    हालांकि ये सभी दावे विश्लेषण और टिप्पणी पर आधारित हैं, किसी आधिकारिक अमेरिकी नीति दस्तावेज से इनकी पुष्टि नहीं हुई है।

    क्यूबा और कैरेबियन तनाव का संदर्भ
    चेलानी के अनुसार कैरेबियन क्षेत्र में तनाव के पीछे ये कारक बताए गए हैं:

    क्यूबा के खिलाफ आर्थिक और ऊर्जा प्रतिबंधों का विस्तार

    समुद्री नाकेबंदी और तेल आपूर्ति पर रोक के आरोप

    सैन्य गतिविधियों और निगरानी में वृद्धि

    इन घटनाओं को क्षेत्रीय संकट और मानवीय दबाव से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन इन दावों पर अलग-अलग पक्षों की राय भिन्न है।

    चीन पर रणनीतिक टिप्पणी
    अपने एक अन्य विश्लेषण में चेलानी ने कहा कि:

    अमेरिका अब चीन को केवल प्रतिद्वंदी नहीं बल्कि “समकक्ष महाशक्ति” के रूप में देख रहा है

    वैश्विक शक्ति संतुलन बहुध्रुवीय (multipolar) बनता जा रहा है

    एशिया में खासकर जापान और अन्य देशों के लिए चीन-अमेरिका संबंध महत्वपूर्ण तनाव कारक बन रहे हैं

    इस संदर्भ में China को लेकर वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा की चर्चा और तेज हो गई है।

    कितना तथ्य, कितना विश्लेषण?
    यह समझना जरूरी है कि:

    ये दावे मुख्यतः विश्लेषणात्मक टिप्पणियों और भू-राजनीतिक व्याख्या पर आधारित हैं

    इनमें कई बातें “प्रोजेक्शन” या “जियोपॉलिटिकल थ्योरी” के रूप में प्रस्तुत की गई हैं

    आधिकारिक अमेरिकी या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इन सभी बिंदुओं की पुष्टि नहीं की है

  • पाकिस्तान-ईरान का सीक्रेट डील दावा: क्या है पूरा मामला?

    पाकिस्तान-ईरान का सीक्रेट डील दावा: क्या है पूरा मामला?



    नई दिल्ली। हाल में कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और इज़रायली मीडिया दावों में यह कहा गया है कि पाकिस्तान और ईरान कथित तौर पर एक “सीक्रेट डील” पर काम कर रहे हैं, जिसमें अमेरिका से चल रही ईरान की बातचीत में पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है।इस पूरे विवाद को लेकर अभी तक किसी भी सरकार ने आधिकारिक तौर पर इन दावों की पुष्टि नहीं की है, इसलिए इन्हें फिलहाल अनकन्फर्म्ड मीडिया रिपोर्ट्स के रूप में ही देखा जा रहा है।

    क्या दावा किया जा रहा है?
    रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोप यह हैं कि:

    पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कर रहा है

    बदले में आर्थिक मदद या वित्तीय लाभ मिलने की बात कही जा रही है

    ईरान को अमेरिका के साथ “बेहतर डील” दिलाने में मदद का दावा

    इस प्रक्रिया में पाकिस्तान की “निष्पक्षता” पर सवाल उठाए जा रहे हैं



    पाकिस्तान की भूमिका पर चर्चा
    इन दावों के बीच पाकिस्तान के कई शीर्ष नेताओं और अधिकारियों के तेहरान दौरे को भी जोड़ा जा रहा है। इसमें शामिल हैं:

    गृह मंत्री के स्तर की यात्राएं

    विदेश नीति से जुड़े प्रतिनिधिमंडल

    सैन्य और कूटनीतिक संपर्क

    इन यात्राओं को कुछ रिपोर्ट्स में ईरान-अमेरिका बातचीत में सक्रिय कूटनीतिक भूमिका के रूप में देखा जा रहा है।

    ईरान–अमेरिका तनाव की पृष्ठभूमि
    यह पूरा मामला उस बड़े भू-राजनीतिक तनाव से जुड़ा है जिसमें शामिल हैं:

    ईरान का परमाणु कार्यक्रम

    अमेरिका और इज़रायल की सुरक्षा चिंताएं

    पश्चिम एशिया में लगातार सैन्य तनाव

    समय-समय पर हमलों और जवाबी कार्रवाइयों का दौर

    इस स्थिति में कई देशों द्वारा मध्यस्थता के प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें पाकिस्तान का नाम भी सामने आता रहा है।

    इज़रायल की आपत्ति
    इज़रायली पक्ष की मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक बयानों में:

    ईरान पर सख्त रुख की मांग

    अमेरिका की बातचीत नीति की आलोचना

    पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल

    हालांकि ये बयान राजनीतिक दृष्टिकोण से जुड़े हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं माना जा सकता।