Category: International

  • तीन देशों के रणनीतिक दौरे के अंतिम चरण में न्यूजीलैंड पहुंचे पीएम मोदी, द्विपक्षीय संबंधों और आर्थिक साझेदारी को मिलेगा नया विस्तार

    तीन देशों के रणनीतिक दौरे के अंतिम चरण में न्यूजीलैंड पहुंचे पीएम मोदी, द्विपक्षीय संबंधों और आर्थिक साझेदारी को मिलेगा नया विस्तार

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी तीन देशों की रणनीतिक विदेश यात्रा के अंतिम चरण में शुक्रवार को न्यूजीलैंड पहुंच गए। इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की यात्रा पूरी करने के बाद उनका यह दौरा भारत और न्यूजीलैंड के बीच द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, निवेश और क्षेत्रीय सहयोग को और अधिक मजबूत बनाना है। भारत की बदलती वैश्विक भूमिका और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते रणनीतिक महत्व के बीच यह दौरा विशेष महत्व रखता है।

    ऑस्ट्रेलिया प्रवास के दौरान दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग को लेकर सहमति बनी। नागरिक परमाणु ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ने की दिशा में सकारात्मक पहल हुई। इन समझौतों को भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसके बाद अब न्यूजीलैंड यात्रा पर भी दोनों देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को नए स्तर तक पहुंचाने पर जोर रहेगा।

    प्रधानमंत्री मोदी न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के निमंत्रण पर ऑकलैंड पहुंचे हैं। यहां उनके विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के साथ उच्चस्तरीय बैठकों में भाग लेने का कार्यक्रम निर्धारित है। दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच व्यापार, निवेश, कृषि, शिक्षा, तकनीक और रक्षा सहयोग जैसे अनेक विषयों पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच लोगों के आपसी संबंधों और आर्थिक भागीदारी को मजबूत करने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा।

    यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री सरकारी कार्यक्रमों के अलावा व्यापार और खेल क्षेत्र से जुड़े आयोजनों में भी हिस्सा लेंगे। इन कार्यक्रमों के माध्यम से उद्योग जगत, निवेशकों और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ संवाद स्थापित किया जाएगा। भारतीय समुदाय के साथ उनका विशेष कार्यक्रम भी प्रस्तावित है, जिसमें दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों को और मजबूत करने का संदेश दिया जाएगा। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय की भूमिका को भारत लगातार अपनी वैश्विक साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार मानता रहा है।

    भारत और न्यूजीलैंड के बीच पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक और रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ा है। दोनों देश मुक्त और सुरक्षित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती, खाद्य सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के पक्षधर रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री की यह यात्रा भविष्य की साझेदारी के लिए नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस दौरे से दोनों देशों के बीच व्यापारिक अवसरों में विस्तार के साथ निवेश और तकनीकी सहयोग को भी नई गति मिलेगी।

    प्रधानमंत्री मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यह यात्रा भारत की सक्रिय विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है। लगातार बढ़ते वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक बदलावों के बीच भारत अपने प्रमुख साझेदार देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। इस यात्रा के समापन के बाद प्रधानमंत्री नई दिल्ली लौटेंगे। माना जा रहा है कि इस पूरे दौरे के परिणाम आने वाले वर्षों में भारत के व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग और क्षेत्रीय रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती प्रदान करेंगे।

  • 1948 में जब पूर्वी पंजाब ने रोका था पाकिस्तान जाने वाला सिंधु तंत्र का पानी, नेहरू ने फैसले को बताया था अमानवीय, बातचीत से निकला समाधान

    1948 में जब पूर्वी पंजाब ने रोका था पाकिस्तान जाने वाला सिंधु तंत्र का पानी, नेहरू ने फैसले को बताया था अमानवीय, बातचीत से निकला समाधान

    नई दिल्ली । भारत और पाकिस्तान के विभाजन के कुछ ही महीनों बाद वर्ष 1948 में दोनों देशों के बीच सिंधु नदी तंत्र को लेकर पहला बड़ा जल विवाद सामने आया। उस समय पूर्वी पंजाब सरकार ने अपने क्षेत्र में स्थित प्रमुख हेडवर्क्स से पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी की आपूर्ति अस्थायी रूप से रोक दी थी। इस निर्णय का तत्काल प्रभाव पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र की सिंचाई व्यवस्था पर पड़ा और दोनों देशों के बीच जल प्रबंधन का मुद्दा गंभीर कूटनीतिक विषय बन गया। हालांकि बाद में बातचीत के माध्यम से समाधान निकाला गया और पानी की आपूर्ति फिर से बहाल कर दी गई।

    विभाजन के बाद सीमा निर्धारण के कारण माधोपुर और फिरोजपुर जैसे महत्वपूर्ण हेडवर्क्स भारत के हिस्से में आए। इन संरचनाओं से उन नहरों का संचालन होता था जिनके माध्यम से पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र के बड़े हिस्से में सिंचाई होती थी। अंतरिम व्यवस्था की अवधि समाप्त होने और नया समझौता नहीं होने के बाद पूर्वी पंजाब सरकार ने 1 अप्रैल 1948 से पानी की आपूर्ति रोकने का निर्णय लिया। उस समय यह कदम राज्य स्तर पर उठाया गया था और इसका उद्देश्य अपने अधिकार क्षेत्र में उपलब्ध जल संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करना बताया गया।

    इतिहासकारों और जल नीति विशेषज्ञों के अनुसार, इस निर्णय के बाद पाकिस्तान के सामने गंभीर चुनौती उत्पन्न हुई क्योंकि उसकी कृषि भूमि का एक हिस्सा इन नहरों पर निर्भर था। उस समय दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध पहले से ही तनावपूर्ण थे, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए सैन्य विकल्प के बजाय वार्ता को प्राथमिकता दी गई। इसी कारण दोनों पक्षों के बीच बातचीत शुरू हुई और समाधान तलाशने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

    तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का दृष्टिकोण इस विषय पर पूर्वी पंजाब सरकार से अलग माना जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, नेहरू ने इस कदम के मानवीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों पर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने माना कि कृषि के लिए पानी रोकना मानवीय दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता और ऐसे कदम केवल असाधारण परिस्थितियों, जैसे युद्ध, में ही विचारणीय हो सकते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी आशंका जताई थी कि इस प्रकार की कार्रवाई से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि प्रभावित हो सकती है।

    दूसरी ओर, पूर्वी पंजाब के नेतृत्व का तर्क था कि विभाजन के बाद नई परिस्थितियों में राज्य को अपने क्षेत्र से बहने वाले जल पर कानूनी अधिकार प्राप्त था और बिना किसी नए समझौते के पूर्व व्यवस्था को जारी रखना आवश्यक नहीं था। इस प्रकार केंद्र और राज्य के दृष्टिकोण में प्राथमिकताओं का अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। जहां राज्य सरकार स्थानीय परिस्थितियों और संसाधनों के नियंत्रण पर जोर दे रही थी, वहीं केंद्र सरकार व्यापक कूटनीतिक और मानवीय पहलुओं को भी समान महत्व दे रही थी।

    करीब पांच सप्ताह तक चले इस विवाद का समाधान मई 1948 में नई दिल्ली में आयोजित अंतर-डोमिनियन सम्मेलन के दौरान निकला। बातचीत के बाद भारत ने पाकिस्तान की ओर पानी की आपूर्ति दोबारा शुरू कर दी। इसी प्रक्रिया ने भविष्य में दोनों देशों के बीच स्थायी जल व्यवस्था विकसित करने की दिशा में आधार तैयार किया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि 1948 का यह विवाद दक्षिण एशिया के जल इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। बाद के वर्षों में दोनों देशों के बीच नदी जल प्रबंधन को लेकर जो संस्थागत व्यवस्था विकसित हुई, उसकी प्रारंभिक पृष्ठभूमि इसी घटनाक्रम से जुड़ी मानी जाती है। यह प्रकरण आज भी सीमा-पार जल संसाधनों के प्रबंधन, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

  • मुझे गिरफ्तार किया जा सकता है मेरी हत्या भी हो सकती है', फिर भी दिसंबर में बांग्लादेश लौटेंगी शेख हसीना; अदालत में आत्मसमर्पण का ऐलान

    मुझे गिरफ्तार किया जा सकता है मेरी हत्या भी हो सकती है', फिर भी दिसंबर में बांग्लादेश लौटेंगी शेख हसीना; अदालत में आत्मसमर्पण का ऐलान


    नई दिल्ली ।
    बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर बड़ा ऐलान करते हुए कहा है कि वह दिसंबर 2026 में भारत से बांग्लादेश लौटेंगी और वहां की अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करेंगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें अपनी गिरफ्तारी और यहां तक कि हत्या का भी खतरा है, लेकिन इसके बावजूद वह अपने देश लौटने के फैसले से पीछे नहीं हटेंगी। उनका कहना है कि यदि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना है तो वह अपनी मातृभूमि की धरती पर ही करना चाहेंगी।

    शेख हसीना लंबे समय से भारत में रह रही हैं। वर्ष 2024 में बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल और हिंसक छात्र आंदोलन के बाद उन्हें देश छोड़ना पड़ा था। इसके बाद उन्होंने भारत में शरण ली और तब से यहीं रह रही हैं। इस दौरान बांग्लादेश में उनके खिलाफ कई कानूनी कार्रवाइयां शुरू हुईं और राजनीतिक परिस्थितियां भी लगातार बदलती रहीं।

    पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके साथ अवामी लीग के कई वरिष्ठ नेता भी बांग्लादेश लौटने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे सभी अदालत की प्रक्रिया में शामिल होंगे और कानून के अनुसार अपना पक्ष रखेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है तथा उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। ऐसे माहौल के बावजूद उन्होंने वापसी का निर्णय लिया है।

    शेख हसीना ने कहा कि उन्हें इस बात का पूरा अंदेशा है कि स्वदेश लौटते ही उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि उनकी जान को गंभीर खतरा हो सकता है। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि यदि जीवन का अंत होना ही है तो वह अपने देश की मिट्टी पर होना चाहिए, जहां उनके परिवार की यादें जुड़ी हैं। उन्होंने कहा कि अपने देश और न्यायिक व्यवस्था का सामना करना उनका कर्तव्य है।

    बांग्लादेश की अदालत पहले ही वर्ष 2024 के राजनीतिक घटनाक्रम और विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में शेख हसीना को दोषी ठहराते हुए उनके खिलाफ मौत की सजा का फैसला सुना चुकी है। हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री लगातार इन आरोपों को निराधार बताती रही हैं और उनका कहना है कि उनके खिलाफ की गई कार्रवाई राजनीतिक कारणों से प्रेरित है। उनका दावा है कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए।

    इस बीच बांग्लादेश की सरकार लगातार भारत से शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग करती रही है। दोनों देशों के बीच इस मुद्दे को लेकर कूटनीतिक स्तर पर भी चर्चा होती रही है। भारत ने अब तक यह स्पष्ट किया है कि वह प्रत्यर्पण से जुड़े अनुरोधों की प्रक्रिया के अनुसार समीक्षा कर रहा है और दोनों देशों के बीच रचनात्मक संवाद बनाए रखने का पक्षधर है।

    शेख हसीना ने यह भी कहा कि उनकी वापसी किसी बाहरी दबाव या किसी विदेशी सरकार की पहल का परिणाम नहीं होगी। उन्होंने दोहराया कि वह स्वयं अपने निर्णय के आधार पर बांग्लादेश लौटेंगी और अदालत के समक्ष उपस्थित होकर कानूनी प्रक्रिया का सामना करेंगी। उनके इस ऐलान के बाद बांग्लादेश की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज होने की संभावना जताई जा रही है, क्योंकि उनकी वापसी से देश के राजनीतिक समीकरणों और आगामी घटनाक्रम पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

  • स्मार्ट बॉर्डर से घुसपैठ पर कड़ा प्रहार, अमित शाह ने तकनीक आधारित सुरक्षा ग्रिड और एआई निगरानी की व्यापक रणनीति बताई

    स्मार्ट बॉर्डर से घुसपैठ पर कड़ा प्रहार, अमित शाह ने तकनीक आधारित सुरक्षा ग्रिड और एआई निगरानी की व्यापक रणनीति बताई

    नई दिल्ली । देश की सीमा सुरक्षा को अधिक मजबूत, आधुनिक और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने व्यापक रणनीति तैयार की है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि आने वाले वर्षों में सीमा प्रबंधन को पूरी तरह स्मार्ट तकनीक से लैस किया जाएगा, जिससे अवैध घुसपैठ, ड्रोन गतिविधियों, हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी जैसी चुनौतियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सके। उन्होंने कहा कि बदलते सुरक्षा परिदृश्य को देखते हुए पारंपरिक व्यवस्था के साथ अत्याधुनिक तकनीक का समन्वय अब समय की आवश्यकता बन गया है।

    नई दिल्ली में आयोजित बॉर्डर डिस्ट्रिक्ट सुपरिंटेंडेंट्स ऑफ पुलिस कॉन्फ्रेंस-2026 को संबोधित करते हुए गृह मंत्री ने कहा कि सीमा सुरक्षा केवल सीमा पर तैनात सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, जिला प्रशासन, विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों और सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उनका कहना था कि सभी संबंधित संस्थाओं के समन्वित प्रयासों से ही प्रभावी और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

    उन्होंने बताया कि सरकार “स्मार्ट बॉर्डर” की अवधारणा पर तेजी से काम कर रही है। इस व्यवस्था के अंतर्गत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी प्रणाली, डिजिटल सर्विलांस, स्मार्ट सेंसर, एंटी-ड्रोन तकनीक तथा इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर जैसी आधुनिक प्रणालियों का उपयोग किया जाएगा। इन तकनीकों की मदद से सीमा पर होने वाली गतिविधियों की रियल-टाइम निगरानी संभव होगी और किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत कार्रवाई की जा सकेगी।

    गृह मंत्री ने यह भी जानकारी दी कि सरकार एक “क्वाड्रिलेटरल सिक्योरिटी ग्रिड” विकसित कर रही है, जिसके माध्यम से विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच रियल-टाइम इंटेलिजेंस साझा की जाएगी। उनका कहना था कि सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल किसी घटना के बाद प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि संभावित खतरों की पहले से पहचान कर उन्हें समय रहते रोकना है। इस दिशा में आधुनिक तकनीक और सूचनाओं के बेहतर समन्वय को प्राथमिकता दी जा रही है।

    अमित शाह ने कहा कि सरकार की सीमा सुरक्षा नीति तीन प्रमुख आधारों पर केंद्रित है, जिनमें सुरक्षित सीमाएं, समृद्ध सीमावर्ती क्षेत्र और जागरूक समाज शामिल हैं। उन्होंने बताया कि सीमावर्ती इलाकों में सड़क, पुल, सुरंग, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं का लगातार विस्तार किया जा रहा है। इससे सीमावर्ती क्षेत्रों से पलायन कम होगा और स्थानीय नागरिक भी राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के सक्रिय भागीदार बन सकेंगे।

    उन्होंने कहा कि संगठित अपराध, नशीले पदार्थों की तस्करी और अवैध घुसपैठ के खिलाफ अगले तीन वर्षों के लिए व्यापक कार्ययोजना तैयार की गई है। सरकार का लक्ष्य केवल घुसपैठियों की पहचान करना नहीं, बल्कि ऐसी स्थायी व्यवस्था विकसित करना है जिससे अवैध प्रवेश की संभावनाओं को ही न्यूनतम किया जा सके।

    गृह मंत्री ने बताया कि हाल के वर्षों में सीमावर्ती क्षेत्रों के बुनियादी ढांचे पर निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के माध्यम से सीमावर्ती गांवों में विकास कार्यों को गति दी जा रही है। साथ ही भारत-म्यांमार सीमा पर लगभग 1,610 किलोमीटर लंबी फेंसिंग परियोजना भी तेजी से आगे बढ़ रही है। उनका कहना था कि यह परियोजना पूर्वोत्तर क्षेत्र में अवैध घुसपैठ, हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी, कट्टरपंथ तथा संगठित अपराध पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। सरकार का उद्देश्य आधुनिक तकनीक और मजबूत बुनियादी ढांचे के माध्यम से देश की सीमाओं को अधिक सुरक्षित और सक्षम बनाना है।

  • चीन के जिनजियांग शहर में जूतों की फैक्ट्री में लगी भीषण आग…..28 लोगों की मौत

    चीन के जिनजियांग शहर में जूतों की फैक्ट्री में लगी भीषण आग…..28 लोगों की मौत


    बीजिंग।
    चीन (China) के जिनजियांग शहर (Jinjiang City) में गुरुवार को जूतों की फैक्ट्री (Shoe factory) में भीषण आग लगने से 28 लोगों की मौत हो गई। स्थानीय अधिकारियों ने यह जानकारी दी। घटना के वीडियो में इमारत और उसके आसपास की आग की लपटें उठती हुई दिख रही हैं। आपातकालीन प्रबंधन मंत्रालय ने आग लगने के बाद बचाव और राहत कार्यों के लिए संयुक्त कार्य दल पूर्वी चीन (Eastern China) के फुजियान प्रांत (Fujian Province) के जिनजियांग शहर भेज दिए हैं।

    मंत्रालय ने बताया कि आग दोपहर करीब 12 बजे लगी। सरकारी समाचार एजेंसी ‘शिन्हुआ’ की खबर के अनुसार, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अधिकारियों को तलाश और बचाव अभियानों में हरसंभव प्रयास करने, घटना का कारण पता लगाने और जवाबदेही तय करने का निर्देश दिया है।


    जिनपिंग ने दिए सख्त आदेश

    जिनपिंग ने घटना की तेजी से जांच करने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई करने का आदेश दिया। शहर के फायर डिपार्टमेंट ने एक बयान में कहा कि आग जिनजियांग शहर में हुईटेंग शू कंपनी की एक फैक्ट्री में लगी, जिसे चीन की जूतों की राजधानी भी कहा जाता है। आग लगने का कारण तुरंत पता नहीं चला, और यह भी साफ नहीं है कि हाल के सालों में चीन में लगी सबसे जानलेवा आग में और लोग घायल हुए हैं या नहीं। लोकल मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि लोग छत पर फंस गए थे।


    हिरासत में फैक्ट्री का मालिक और इंचार्ज

    शिन्हुआ के अनुसार, फैक्ट्री के मालिक और दूसरे इंचार्ज को हिरासत में ले लिया गया है और कंपनी के अकाउंट फ्रीज कर दिए गए हैं। स्टेट ब्रॉडकास्टर CCTV के वीडियो में कई मंजिल वाली एक बिल्डिंग का अगला हिस्सा जला हुआ काला और सफेद धुएं से ढका हुआ दिख रहा है। पहले के फुटेज में दिख रहा है कि कई मंजिलों पर आग लगी हुई थी और बिल्डिंग घने काले धुएं से ढकी हुई थी।

    जब आग लगी, तब फैक्ट्री में 237 वर्कर और दो विजिटर थे। अधिकारियों ने 213 लोगों को निकाला या बचाया है। सरकारी ब्रॉडकास्टर CCTV के मुताबिक, मरने वाले 28 लोगों में से दो को हॉस्पिटल ले जाने के बाद मृत घोषित कर दिया गया।


    जूते की राजधानी है जिनजियांग

    तटीय फुजियान प्रांत में जिनजियांग जूते और कपड़े बनाने का एक बड़ा हब है और इसे अक्सर चीन की जूते की राजधानी कहा जाता है। एक स्थानीय अधिकारी ने CCTV को बताया कि शुरुआती जांच से पता चलता है कि आग फैक्ट्री के ग्राउंड फ्लोर पर लगी थी। अधिकारी ने कहा कि बिल्डिंग में रखा जूता बनाने का सामान बहुत ज्यादा आग पकड़ने वाला था और इससे आग तेजी से फैल सकती थी। वहां मौजूद सामान और चिपकने वाली चीजों की वजह से, मौके पर तेज गंध थी, जिससे आंखों में जलन हो रही थी। सरकारी ब्रॉडकास्टर ने फायरफाइटर्स के हवाले से बताया कि सीढ़ियों पर भी बहुत सारा सामान जमा हो गया था, जिससे बचाव और आग बुझाने के काम में रुकावट आ रही थी।

  • भारत समेत 97 देशों की संयुक्त कार्रवाई से साइबर अपराधियों पर शिकंजा, इंटरपोल के ऑपरेशन फर्स्ट लाइट-2026 में हजारों गिरफ्तार और लाखों पीड़ितों को राहत

    भारत समेत 97 देशों की संयुक्त कार्रवाई से साइबर अपराधियों पर शिकंजा, इंटरपोल के ऑपरेशन फर्स्ट लाइट-2026 में हजारों गिरफ्तार और लाखों पीड़ितों को राहत


    नई दिल्ली । ऑनलाइन ठगी और साइबर अपराध के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के खिलाफ इंटरपोल ने भारत सहित 97 देशों के सहयोग से अब तक का सबसे बड़ा संयुक्त अभियान चलाकर वैश्विक स्तर पर संगठित साइबर अपराधियों को बड़ा झटका दिया है। ऑपरेशन फर्स्ट लाइट-2026 नाम से चलाए गए इस अभियान के दौरान 5,811 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, 15,606 संदिग्धों की पहचान की गई और 31,014 बैंक खातों को ब्लॉक किया गया। इसके साथ ही लगभग 293 मिलियन अमेरिकी डॉलर, यानी करीब 2,500 करोड़ रुपये की अवैध राशि अपराधियों तक पहुंचने से पहले ही जब्त या फ्रीज कर दी गई।

    यह अभियान 15 जनवरी से 30 अप्रैल 2026 तक संचालित किया गया। कार्रवाई से पहले विभिन्न देशों की पुलिस और जांच एजेंसियों ने साइबर अपराधियों के बैंक खातों, क्रिप्टो वॉलेट, फर्जी कंपनियों, फोन नंबरों और डिजिटल नेटवर्क से जुड़ी महत्वपूर्ण सूचनाओं का आदान-प्रदान किया। समन्वित रणनीति के तहत कई देशों में एक साथ छापेमारी कर साइबर ठगी के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को निशाना बनाया गया।

    जांच एजेंसियों के अनुसार अभियान का मुख्य उद्देश्य सोशल इंजीनियरिंग स्कैम पर रोक लगाना था। इस तरह की ठगी में अपराधी खुद को बैंक अधिकारी, पुलिसकर्मी, सरकारी एजेंसी के प्रतिनिधि, निवेश सलाहकार या अन्य विश्वसनीय व्यक्ति बताकर लोगों का भरोसा जीतते हैं। कई मामलों में वीडियो कॉल पर नकली वर्दी और सरकारी कार्यालय जैसा माहौल दिखाकर लोगों को डराया या लालच दिया जाता है, जिसके बाद उनसे बैंकिंग जानकारी या धनराशि हासिल कर ली जाती है।

    ऑपरेशन के दौरान 1.42 लाख से अधिक संभावित पीड़ितों की पहचान की गई और 1,52,808 मामलों का विश्लेषण किया गया। इनमें से 23,715 मामलों का समाधान किया गया। जांच से स्पष्ट हुआ कि साइबर अपराध अब सीमाओं से परे फैला संगठित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क बन चुका है, जिसके लिए देशों के बीच निरंतर समन्वय और सूचना साझा करना आवश्यक है।

    अभियान के दौरान इंटरपोल ने अपने विशेष भुगतान हस्तक्षेप तंत्र I-GRIP का भी उपयोग किया, जिसके माध्यम से विभिन्न देशों के बीच भेजी जा रही संदिग्ध धनराशि को समय रहते रोकने में सफलता मिली। इस प्रणाली ने कई मामलों में बैंक खातों और क्रिप्टो वॉलेट तक रकम पहुंचने से पहले ही लेनदेन रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    कार्रवाई के दौरान कई देशों में चौंकाने वाले खुलासे भी हुए। एक स्थान पर ठगी के लिए नकली पुलिस स्टेशन तैयार कर लोगों को वीडियो कॉल के जरिए डराया जाता था, जबकि दूसरे मामले में रोमांस स्कैम के जरिए करोड़ों डॉलर का लेनदेन क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से छिपाने का प्रयास किया गया। कई स्थानों से बड़ी संख्या में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, डिजिटल रिकॉर्ड और अन्य अहम साक्ष्य भी बरामद किए गए, जिनके आधार पर आगे की जांच जारी है।

    इस अभियान में कई अंतरराष्ट्रीय पुलिस संगठनों ने भी सहयोग दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल अरेस्ट, निवेश ठगी, रोमांस स्कैम, फर्जी कॉल सेंटर और क्रिप्टो आधारित मनी लॉन्ड्रिंग जैसे अपराध लगातार नए रूप ले रहे हैं। ऐसे में विभिन्न देशों की संयुक्त कार्रवाई ही इन संगठित नेटवर्क पर प्रभावी नियंत्रण का सबसे मजबूत माध्यम बन सकती है। इंटरपोल ने भी स्पष्ट किया है कि भविष्य में सदस्य देशों के साथ तकनीकी सहयोग, खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त अभियानों के माध्यम से वैश्विक साइबर अपराध के खिलाफ कार्रवाई को और मजबूत किया जाएगा।

  • पीएम मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा से पहले बड़ा व्यापारिक संकेत, 57% उत्पादों पर टैरिफ हटाने की घोषणा से मजबूत होंगे द्विपक्षीय संबंध

    पीएम मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा से पहले बड़ा व्यापारिक संकेत, 57% उत्पादों पर टैरिफ हटाने की घोषणा से मजबूत होंगे द्विपक्षीय संबंध

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित न्यूजीलैंड यात्रा से पहले दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने भारत के साथ प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते के तहत अपने देश के 57 प्रतिशत निर्यातित उत्पादों पर पहले दिन से टैरिफ नहीं लगाने की घोषणा की है। इस फैसले को दोनों देशों के बीच व्यापारिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 और 11 जुलाई को दो दिवसीय राजकीय यात्रा पर न्यूजीलैंड पहुंचेंगे। लगभग चार दशक बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली आधिकारिक राजकीय यात्रा होगी। ऐसे समय में व्यापार समझौते को लेकर न्यूजीलैंड की ओर से आया यह संकेत दोनों देशों के बढ़ते रणनीतिक और आर्थिक सहयोग को दर्शाता है। माना जा रहा है कि यात्रा के दौरान व्यापार, निवेश, रक्षा, प्रौद्योगिकी, शिक्षा और कृषि सहित कई क्षेत्रों में सहयोग को और आगे बढ़ाने पर व्यापक चर्चा होगी।

    न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने कहा है कि भारत के साथ होने वाला व्यापार समझौता उनके देश के निर्यातकों के लिए नए अवसर लेकर आएगा। उनका मानना है कि भारतीय बाजार तक आसान पहुंच मिलने से न्यूजीलैंड के उत्पाद अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे और दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए दीर्घकालिक लाभ का आधार बनेगा।

    भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत कई वर्षों से जारी रही है। इसकी शुरुआत वर्ष 2010 में हुई थी, लेकिन कुछ समय बाद वार्ताएं ठहर गई थीं। बाद में दोनों देशों ने दोबारा बातचीत शुरू करने का निर्णय लिया और कई दौर की चर्चाओं के बाद समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई। अब दोनों सरकारें इसे व्यावहारिक रूप से लागू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते से दोनों देशों के बीच व्यापार का दायरा बढ़ेगा और निवेश के नए अवसर भी विकसित होंगे। कृषि उत्पाद, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण, शिक्षा, प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्र जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं मजबूत होंगी। इसके साथ ही भारतीय कंपनियों को भी न्यूजीलैंड के बाजार तक बेहतर पहुंच मिलने की उम्मीद है।

    आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार वैश्विक व्यापार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच ऐसे समझौते दोनों देशों की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने और नए बाजार उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत और न्यूजीलैंड के बीच बढ़ते आर्थिक संबंध हिंद-प्रशांत क्षेत्र में व्यापक रणनीतिक सहयोग को भी नई गति दे सकते हैं।

    प्रधानमंत्री मोदी की आगामी यात्रा को केवल एक औपचारिक राजनयिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों के नए अध्याय के रूप में देखा जा रहा है। यात्रा के दौरान होने वाली उच्चस्तरीय वार्ताओं से व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग के साथ-साथ क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी साझेदारी मजबूत होने की उम्मीद है। ऐसे में टैरिफ में प्रस्तावित राहत का यह फैसला दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाई देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

  • मेलबर्न में PM मोदी की अपील पर रोशनी से जगमगाया स्टेडियम, ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री के सम्मान में हजारों लोगों ने जलाईं मोबाइल फ्लैशलाइट

    मेलबर्न में PM मोदी की अपील पर रोशनी से जगमगाया स्टेडियम, ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री के सम्मान में हजारों लोगों ने जलाईं मोबाइल फ्लैशलाइट

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान मेलबर्न में आयोजित भारतीय समुदाय के विशाल कार्यक्रम में भारत और ऑस्ट्रेलिया की मित्रता का एक विशेष दृश्य देखने को मिला। ‘मेलबर्न मीट्स मोदी’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन की शुरुआत से पहले मौजूद लोगों से ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के सम्मान में अपने मोबाइल फोन की फ्लैशलाइट जलाने का आग्रह किया। उनकी अपील के तुरंत बाद हजारों लोगों ने एक साथ अपनी फ्लैशलाइट जलाकर पूरा स्टेडियम रोशनी से भर दिया। इस दौरान कार्यक्रम स्थल पर उत्साहपूर्ण माहौल देखने को मिला और उपस्थित लोगों ने दोनों देशों की मित्रता के समर्थन में जोरदार उत्साह व्यक्त किया।

    मेलबर्न के मार्वल स्टेडियम में आयोजित इस कार्यक्रम में भारतीय मूल के बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। आयोजन में 30 हजार से अधिक लोगों की मौजूदगी ने इसे ऑस्ट्रेलिया में किसी वैश्विक नेता के स्वागत के लिए आयोजित सबसे बड़े सामुदायिक कार्यक्रमों में शामिल कर दिया। कार्यक्रम के दौरान भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ते संबंधों, सांस्कृतिक जुड़ाव और आर्थिक सहयोग को प्रमुखता से रेखांकित किया गया।

    अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने मेलबर्न में भारतीय समुदाय से मिलने की खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि वह लंबे समय से इस मुलाकात का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने कार्यक्रम को “हाउसफुल” और “ब्लॉकबस्टर” बताते हुए उपस्थित लोगों के उत्साह की सराहना की। इसके बाद उन्होंने विक्टोरिया राज्य के नेतृत्व और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के सम्मान में फ्लैशलाइट जलाने की अपील की, जिसे लोगों ने पूरे उत्साह के साथ स्वीकार किया। कुछ ही क्षणों में पूरा स्टेडियम मोबाइल की रोशनी से जगमगा उठा।

    ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने भी कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मजबूत होती साझेदारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम में दिखाई दे रहा उत्साह दोनों देशों के लोगों के बीच बढ़ते विश्वास और सहयोग का प्रतीक है। उन्होंने भारत की अपनी यात्राओं का उल्लेख करते हुए वहां की संस्कृति, ऊर्जा और विकास की प्रशंसा की तथा दोनों देशों के आर्थिक और सामाजिक संबंधों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में दोनों देशों के बीच पिछले वर्षों में मजबूत हुए रिश्तों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में उनके पहले ऑस्ट्रेलिया दौरे के बाद दोनों देशों के संबंध लगातार नई ऊंचाइयों तक पहुंचे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 12 वर्षों में यह उनका तीसरा ऑस्ट्रेलिया दौरा है, जो द्विपक्षीय संबंधों की बढ़ती मजबूती का संकेत है। उन्होंने इस प्रगति का श्रेय दोनों देशों के लोगों, विशेषकर ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय समुदाय को दिया।

    प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा इंडोनेशिया की यात्रा के बाद शुरू हुआ है। ऑस्ट्रेलिया प्रवास के दौरान दोनों देशों के बीच असैन्य परमाणु ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, निवेश और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है। मेलबर्न में आयोजित यह कार्यक्रम केवल भारतीय समुदाय के सम्मान का अवसर नहीं रहा, बल्कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच गहराते रणनीतिक और जन-स्तरीय संबंधों का भी एक महत्वपूर्ण प्रतीक बनकर सामने आया।

  • राजनयिक बातचीत के बीच छाया हल्का-फुल्का अंदाज, स्कॉट मॉरिसन से पीएम मोदी ने पूछा भारतीय व्यंजनों का हाल

    राजनयिक बातचीत के बीच छाया हल्का-फुल्का अंदाज, स्कॉट मॉरिसन से पीएम मोदी ने पूछा भारतीय व्यंजनों का हाल


    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान मेलबर्न में हुई एक मुलाकात ने औपचारिक कूटनीतिक चर्चाओं के बीच हल्का और आत्मीय रंग भर दिया। प्रधानमंत्री ने ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन से मुलाकात के दौरान मुस्कुराते हुए पूछा कि क्या वे अब भी भारतीय खाना बना रहे हैं। यह सवाल दोनों नेताओं के बीच पुराने मैत्रीपूर्ण संवाद की याद दिलाने वाला बन गया और सोशल मीडिया पर भी चर्चा में आ गया।

    मेलबर्न में हुई इस मुलाकात के बाद स्कॉट मॉरिसन ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत का उल्लेख किया। उन्होंने लिखा कि प्रधानमंत्री ने उनसे मुलाकात के लिए समय निकाला और दोनों नेताओं ने अपने कार्यकाल के दौरान भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों को मिली नई गति पर चर्चा की। मॉरिसन ने हल्के अंदाज में यह भी लिखा कि प्रधानमंत्री ने उनसे उनके भारतीय खाना बनाने के शौक के बारे में पूछा और जानना चाहा कि वह कैसा चल रहा है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने भी मॉरिसन के साथ मुलाकात की तस्वीर साझा करते हुए कहा कि उनसे मिलकर हमेशा खुशी होती है। उन्होंने भारत और ऑस्ट्रेलिया की दोस्ती को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि दोनों देशों के संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। इस बातचीत में व्यापार, रणनीतिक सहयोग और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई।

    मॉरिसन का भारतीय व्यंजनों से लगाव पहले भी सुर्खियों में रह चुका है। वर्ष 2022 में भारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापार समझौते के बाद उन्होंने भारतीय और विशेष रूप से गुजराती व्यंजन बनाकर उसका जश्न मनाया था। उस समय उन्होंने सोशल मीडिया पर रसोई में खाना बनाते हुए अपनी तस्वीरें साझा की थीं और बताया था कि उन्होंने खिचड़ी सहित कई पारंपरिक व्यंजन तैयार किए। उन्होंने यह भी कहा था कि उनके परिवार को भारतीय भोजन काफी पसंद आया।

    विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे व्यक्तिगत और सांस्कृतिक संवाद द्विपक्षीय संबंधों को अधिक आत्मीय बनाते हैं। औपचारिक बैठकों के साथ जब नेता एक-दूसरे की संस्कृति, भोजन और जीवनशैली में रुचि दिखाते हैं, तो दोनों देशों के लोगों के बीच भी निकटता बढ़ती है। प्रधानमंत्री मोदी और स्कॉट मॉरिसन के बीच यह बातचीत उसी सांस्कृतिक जुड़ाव का उदाहरण मानी जा रही है।

    प्रधानमंत्री वर्तमान में तीन देशों की यात्रा पर हैं और ऑस्ट्रेलिया इस दौरे का महत्वपूर्ण पड़ाव है। मेलबर्न पहुंचने पर उनका स्वागत ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों के साथ-साथ भारतीय समुदाय के लोगों ने भी उत्साह के साथ किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि मेलबर्न का मौसम भले ठंडा हो, लेकिन भारतीय समुदाय के स्नेह और गर्मजोशी ने विशेष अनुभव कराया। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह यात्रा भारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापक रणनीतिक साझेदारी को नई ऊर्जा देगी।

    भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हाल के वर्षों में व्यापार, शिक्षा, रक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और तकनीकी सहयोग में तेजी से विस्तार हुआ है। दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी करीबी साझेदार माने जाते हैं। ऐसे में मेलबर्न में हुई यह मुलाकात केवल औपचारिक चर्चा तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने दोनों देशों के संबंधों में मौजूद मानवीय और सांस्कृतिक पहलू को भी उजागर किया।

  • सरकारी आर्थिक दावों पर उठाई थी आवाज, अब नहीं रहे अर्थशास्त्री गाओ शानवेन; निधन के बाद फिर तेज हुई पारदर्शिता पर बहस

    सरकारी आर्थिक दावों पर उठाई थी आवाज, अब नहीं रहे अर्थशास्त्री गाओ शानवेन; निधन के बाद फिर तेज हुई पारदर्शिता पर बहस

    नई दिल्ली । चीन के प्रमुख अर्थशास्त्रियों में गिने जाने वाले गाओ शानवेन का 55 वर्ष की आयु में निधन हो गया। चीन की सरकारी मीडिया के अनुसार उनका निधन बीमारी के कारण हुआ है। हालांकि उनकी मृत्यु के बाद सोशल मीडिया पर विभिन्न तरह की चर्चाएं भी सामने आई हैं। गाओ लंबे समय तक चीन की अर्थव्यवस्था, पूंजी बाजार और आर्थिक नीतियों पर अपनी स्पष्ट और स्वतंत्र राय रखने के लिए जाने जाते रहे। उन्हें देश के प्रभावशाली मैक्रो-इकोनॉमिस्ट्स में शामिल किया जाता था और उनके विचारों को वित्तीय जगत में गंभीरता से लिया जाता था।

    गाओ शानवेन सरकारी निवेश समूह एसडीआईसी सिक्योरिटीज के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री रहे थे। उन्होंने कई वर्षों तक चीन की आर्थिक नीतियों, विकास दर और वित्तीय बाजारों का विश्लेषण किया। उनकी पहचान ऐसे विशेषज्ञ के रूप में बनी, जो आर्थिक आंकड़ों और नीतिगत फैसलों पर खुलकर अपनी राय रखते थे। इसी स्पष्टवादिता के कारण वे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चा में बने रहे।

    वर्ष 2024 के अंत में गाओ उस समय व्यापक सुर्खियों में आए, जब उन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में चीन की आधिकारिक आर्थिक वृद्धि दर पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि वर्ष 2021 से 2023 के बीच चीन की वास्तविक आर्थिक वृद्धि सरकारी दावों से काफी कम रही। उन्होंने उपभोग, रोजगार और रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े संकेतकों का हवाला देते हुए कहा था कि उपलब्ध आर्थिक आंकड़े आधिकारिक विकास दर से पूरी तरह मेल नहीं खाते। उनके इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक जगत में भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

    इन टिप्पणियों के बाद उनके खिलाफ प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की खबरें सामने आईं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार सार्वजनिक मंचों पर उनकी गतिविधियां सीमित कर दी गईं। उनके कुछ लेख, वीडियो और सोशल मीडिया सामग्री भी हटाई गई। बाद में उन्हें अपने पद से हटाए जाने और निवेश सलाहकार लाइसेंस समाप्त होने की जानकारी भी सामने आई। इन घटनाओं ने चीन में आर्थिक विश्लेषण की स्वतंत्रता और आलोचनात्मक विचारों के लिए उपलब्ध स्थान को लेकर कई सवाल खड़े किए।

    करीबी सूत्रों के अनुसार गाओ शानवेन पिछले कुछ समय से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। बीमारी का पता चलने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन से दूरी बना ली थी। लंबे समय तक सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहने के बाद उन्होंने एक शैक्षणिक कार्यक्रम में वीडियो संदेश के माध्यम से संक्षिप्त उपस्थिति दर्ज कराई थी। इसके बाद उनकी सार्वजनिक गतिविधियां बेहद सीमित रहीं।

    गाओ शानवेन के निधन के बाद चीन के सोशल मीडिया मंचों पर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। कई लोगों ने उन्हें बेबाक और स्वतंत्र सोच रखने वाला अर्थशास्त्री बताया। वहीं कुछ प्रतिक्रियाओं में आर्थिक आंकड़ों की पारदर्शिता, स्वतंत्र विश्लेषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर भी चर्चा देखने को मिली। हालांकि इन प्रतिक्रियाओं के बीच आधिकारिक स्तर पर केवल उनके निधन पर शोक व्यक्त किया गया।

    अर्थशास्त्र और वित्तीय विश्लेषण के क्षेत्र में गाओ शानवेन का योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा। उन्होंने आर्थिक आंकड़ों की व्याख्या और नीतिगत चर्चाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका निधन ऐसे समय हुआ है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों का सामना कर रही है और आर्थिक पारदर्शिता तथा विश्वसनीय आंकड़ों की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है।