Category: International

  • होर्मुज को लेकर फिर बढ़ा तनाव….. ईरान ने दूसरा रास्ता बनाया, ट्रंप ने दिया 24 घंटे का अल्टिमेटम

    होर्मुज को लेकर फिर बढ़ा तनाव….. ईरान ने दूसरा रास्ता बनाया, ट्रंप ने दिया 24 घंटे का अल्टिमेटम


    वाशिंगटन।
    होर्मुज (Hormuz) को लेकर अमेरिका और ईरान (America and Iran) में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। पिछले चार दिनों से दक्षिणी तटीय इलाकों में धमाके हो रहे हैं। वहीं ईरान ने भी अमेरिका के सहयोगी खाड़ी देशों में मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बंदर अब्बास, केश्म, मूसा और चाबहार जैसी पोर्ट सिटी में भी धमाके की आवाजें सुनी जा रही हैं। दो सप्ताह पहले किया गया समझौता और सीजफायर एक तरह से खटाई में पड़ गया है।

    इस बार लड़ाई होर्मुज को लेकर है। ईरान ने होर्मुज के अंदर एक अलग रास्ता बना दिया है और उसका कहना है कि इसी रास्ते से जहाजों को उसके नियंत्रण में गुजरना है। जबकि अमेरिका एक अलग कॉरिडोर चलाने के प्रयास में है। ऐसे में लड़ाई होर्मुज के अंदर अलग-अलगर रास्तों को लेकर है।

    अमेरिका ने दिया 24 घंटे का अल्टिमेटम
    अमेरिका के सुझाए रास्ते से जब जहाज गुजरते हैं तो ईरान उनपर हमला कर देता है। डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान को धमकी देते हुए कहा है कि होर्मुज को सार्वजनिक तौर पर खुला हुआ डिक्लेयर कर दिया जाए। अगर 24 घंटे के अंदर ऐसा नहीं किया गया तो बहुत बुरा होने वाला है। बता दें कि होर्मुज के रास्ते से ही दुनियाभर के तेल का पांचवां हिस्सा सप्लाई होता है। 28 फरवरी को शुरू हुए युद्ध के बाद समझौता होने तक इस रास्ते में हजारों जहाज फंसे रहे और पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट पैदा हो गया।

    अमेरिका ने कहा कि ईरान को यह संदेश क्षेत्रीय मध्यस्थों के जरिए भेज दिया गया है। ऐक्सियस की रिपोर्ट के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन चाहता है कि ईरान सार्वजनिक तौर पर ऐलान करे कि होर्मुज सबके लिए खुला है। इसके अलावा ईरान कसम खा ले कि वह किसी भी कमर्शियल शिप को निशाना नहीं बनाएगा। अमेरिका अधिकारियों ने कहा, ट्रंप यही चाहते हैं कि होर्मुज के सारे शिपिंग चैनल बिना किसी शुल्क के खोल दिए जाएं।

    अमेरिका ने कहा कि ईरान पिछले सप्ताह हुए समझौते का उल्लंघन कर रहा है। शनिवार को ओमान और ईरान के अधिकारी मस्कट में मुलाकात कर सकते हैं। अमेरिका के अधिकारी भी बैठक में शामिल हो सकते हैं। एक दिन पहले डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान ने उनसे बात करने का अनुरोध किया था और वह बात करने के लिए सहमत हो गए हैं।

    ट्रंप का यह बयान अमेरिकी वायुसेना के ईरान के प्रमुख ठिकानों पर कुछ दिन पहले की गई भीषण बमबारी के बाद आया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी लड़ाकू विमानों और मिसाइलों ने ईरान के पश्चिमी हिस्से में स्थित महत्वपूर्ण बिजली उपकरण निर्माण संयंत्रों, बड़े बिजली घरों और खारे पानी को मीठा बनाने वाले तटीय बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया। तब अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने दावा किया था कि इस कार्रवाई का उद्देश्य ईरान की उस आर्थिक और तकनीकी क्षमता को पंगु बनाना है जिसका उपयोग सैन्य गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है।

  • न्यूयॉर्क में AC पर 'बैन' का खतरा मंडराया, मेयर Mamdani ने दी चेतावनी, मचा हड़कंप

    न्यूयॉर्क में AC पर 'बैन' का खतरा मंडराया, मेयर Mamdani ने दी चेतावनी, मचा हड़कंप


    नई दिल्‍ली । New York इस समय इतिहास की सबसे भीषण गर्मी से जूझ रहा है. तापमान 100 डिग्री और हीट इंडेक्स 112 डिग्री तक पहुंचने का अनुमान है. इस बीच, शहर के नए मेयर ज़ोहरान मम्दानी (Zohran Mamdani) ने न्यू यॉर्कर्स के लिए एक बेहद जरूरी और कड़ा संदेश जारी किया है. यूरोप में हाल ही में आए AC नियमों के बाद अब न्यू यॉर्क का पावर ग्रिड भी खतरे में है. मेयर ने साफ कहा है कि अगर ग्रिड को बचाना है और लोगों की जान सुरक्षित रखनी है, तो AC चलाने के तरीकों में तुरंत बदलाव करना होगा.

    Europe का AC नियम और New York का संकट
    यूरोपियन कमीशन ने हाल ही में एक नया प्रस्ताव पेश किया है, जिसके तहत AC इंस्टॉल करने वालों को ग्राहकों को एनर्जी एफिशिएंसी की पूरी जानकारी देनी होगी. फ्रांस और स्पेन जैसे देशों में रिकॉर्ड गर्मी के कारण AC की बिक्री अचानक बहुत बढ़ गई है. अब ठीक वैसा ही संकट न्यू यॉर्क के सामने खड़ा हो गया है. न्यू यॉर्क का पावर ग्रिड इस समय शहर को ठंडा रखने के लिए अपनी क्षमता से ज्यादा काम कर रहा है.

    Mayor Mamdani का ’78 डिग्री रूल’
    मेयर ज़ोहरान मम्दानी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए लोगों से अपील की है. उन्होंने लिखा कि न्यू यॉर्क में बाहर बहुत गर्मी है और हमारा पावर ग्रिड ओवरटाइम काम कर रहा है. मेयर ने सभी नागरिकों से अपने AC को 78 डिग्री पर सेट करने की अपील की है. इसके साथ ही उन्होंने इस्तेमाल में न आने वाली लाइटों और इलेक्ट्रॉनिक्स को बंद करने और प्लग निकालने के लिए कहा है. मेयर का मानना है कि ग्रिड स्थिर रहेगा तो AC चलता रहेगा और लोगों की जान बचाई जा सकेगी.

    सरकार खुद कर रही है नियमों का पालन
    इस संकट से निपटने के लिए सिर्फ आम जनता ही नहीं, बल्कि खुद न्यू यॉर्क प्रशासन भी कड़े कदम उठा रहा है. मेयर ने बताया कि सभी सरकारी इमारतों में भी 78 डिग्री का नियम लागू कर दिया गया है. पीक ऑवर्स के दौरान सरकारी दफ्तरों की लाइटें डिम या पूरी तरह बंद की जा रही हैं. गैर-जरूरी उपकरणों को पावर डाउन किया जा रहा है. प्रशासन ने न्यू यॉर्क की प्राइवेट कंपनियों से भी अपील की है कि वे इस संकट में शहर का साथ दें और बिजली की खपत कम करें.

    112 डिग्री का टॉर्चर और हीट इमरजेंसी
    नेशनल वेदर सर्विस ने न्यू यॉर्क सिटी के लिए ‘एक्सट्रीम हीट वॉर्निंग’ जारी की है. मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह पिछले एक दशक की सबसे खतरनाक हीटवेव हो सकती है. गर्मी का अहसास (Heat Index) 112 डिग्री तक जा सकता है. इसके लिए शहर में ‘हीट इमरजेंसी प्लान’ एक्टिव कर दिया गया है. प्रशासन ने उन लोगों के लिए कूलिंग सेंटर्स खोले हैं, जिनके घरों में AC की सुविधा नहीं है. बुजुर्गों, बच्चों और सांस के मरीजों को घरों के अंदर ही रहने की सलाह दी गई है.

    मेयर की कार्यशैली पर खड़े हुए सवाल
    एक तरफ जहां मेयर मम्दानी शहर को गर्मी से बचाने में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ न्यू यॉर्क का बिजनेस माहौल गरमा गया है. दुनिया के सबसे अमीर कारोबारियों में शामिल जेफ बेजोस (Jeff Bezos) ने न्यू यॉर्क के स्कूल सिस्टम पर सवाल उठाए हैं, जिसके बाद मेयर के साथ उनकी बहस छिड़ गई है. शार्क टैंक के केविन ओ’लेरी ने भी बेजोस का समर्थन करते हुए न्यू यॉर्क को ‘कम्पलीट डिजास्टर’ करार दिया है. ब्लैकरॉक के लैरी फिंक ने भी चेतावनी दी है कि भारी टैक्स और खराब माहौल के कारण अमीर लोग न्यू यॉर्क छोड़ सकते हैं, जिससे शहर को बड़ा आर्थिक नुकसान होगा.

  • 'भारत आकर लगा जैसे अपने घर में हूं, हमारा डीएनए एक जैसा है', अफगान मंत्री ने की भारत की तारीफ

    'भारत आकर लगा जैसे अपने घर में हूं, हमारा डीएनए एक जैसा है', अफगान मंत्री ने की भारत की तारीफ


    नई दिल्ली। भारत दौरे पर आए अफगानिस्तान के कृषि, सिंचाई एवं पशुपालन मंत्री मौलवी अताउल्लाह ओमारी ने नई दिल्ली में आयोजित एक व्यापारिक कार्यक्रम के दौरान भारत के आतिथ्य और दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत पहुंचने के बाद उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे वह अपने ही देश और अपने लोगों के बीच हों। साथ ही उन्होंने दोनों देशों के बीच गहरे सांस्कृतिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि “हमारा डीएनए एक है।”

    मौलवी अताउल्लाह ओमारी पहली बार भारत की यात्रा पर आए हैं। विदेश मंत्रालय के सहयोग से PHDCCI द्वारा आयोजित भारत-अफगानिस्तान व्यापार अवसर उद्योग इंटरैक्टिव सेशन में उन्होंने कहा कि भारत सरकार, विदेश मंत्री और यहां के लोगों ने उनका बेहद गर्मजोशी से स्वागत किया। उनके अनुसार यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि पूरे अफगानिस्तान के लोगों के लिए सकारात्मक संदेश है।

    भारत-अफगानिस्तान संबंधों पर दिया जोर
    अपने संबोधन में ओमारी ने कहा कि भारत और अफगानिस्तान के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध हैं। उन्होंने कहा कि भारत में उन्हें अपनापन महसूस हुआ और दोनों देशों के लोगों के बीच गहरा जुड़ाव दिखाई देता है। उनके अनुसार यह रिश्ते भविष्य में भी सहयोग को नई मजबूती दे सकते हैं।

    कृषि क्षेत्र में भारत से मांगा सहयोग
    अफगान मंत्री ने कहा कि उनके देश की लगभग 80 प्रतिशत आबादी कृषि, पशुपालन और सिंचाई पर निर्भर है। उन्होंने बताया कि अफगानिस्तान अपने कृषि क्षेत्र को आधुनिक तकनीक से जोड़ना चाहता है और इस दिशा में भारत की विशेषज्ञता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उन्होंने कृषि क्षेत्र के आधुनिकीकरण और तकनीकी सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया।

    संयुक्त समिति की बैठक के बाद आया बयान
    ओमारी का यह बयान भारत और अफगानिस्तान के बीच संयुक्त समिति की चौथी बैठक के अगले दिन सामने आया। नई दिल्ली में आयोजित इस बैठक की सह-अध्यक्षता भारत की ओर से विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव एम. आनंद प्रकाश और अफगानिस्तान की ओर से विदेश मंत्रालय के महानिदेशक शुएब बयारलाई ने की।

    कई अहम क्षेत्रों में सहयोग पर चर्चा
    विदेश मंत्रालय के अनुसार, बैठक में मानवीय सहायता, विकास साझेदारी, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, खेल, व्यापार, वीजा सुविधा और क्षेत्रीय संपर्क जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। भारत ने दोहराया कि वह अफगानिस्तान के विकास और वहां के लोगों के कल्याण के लिए सहयोग जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

  • ढाका में भारत ने जताई कड़ी आपत्ति: सेमिनार में जम्मू-कश्मीर का गलत नक्शा दिखाए जाने पर किया विरोध

    ढाका में भारत ने जताई कड़ी आपत्ति: सेमिनार में जम्मू-कश्मीर का गलत नक्शा दिखाए जाने पर किया विरोध


    नई दिल्ली। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के दौरान भारत ने जम्मू-कश्मीर को लेकर दिखाए गए कथित गलत नक्शे पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। यह मामला उस समय सामने आया जब एक प्रस्तुति के दौरान भारतीय मानचित्र में जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दर्शाया गया।

    यह सेमिनार बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज (BIISS) में आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का विषय था ‘सार्क को फिर से मजबूत बनाने के रास्ते’। सेमिनार में भारत में बांग्लादेश के पूर्व उच्चायुक्त रह चुके अहमद तारिक करीम प्रस्तुति दे रहे थे। इसी दौरान प्रदर्शित किए गए नक्शे पर भारतीय पक्ष ने आपत्ति जताई।

    ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग की सेकंड सेक्रेटरी पूजा कुमारी झा ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए कहा कि प्रस्तुत किया गया नक्शा गलत है और जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत इस तरह के चित्रण का विरोध करता है।

    करीम ने अपनी ओर से सफाई देते हुए कहा कि यह नक्शा केवल सांकेतिक (प्रतीकात्मक) उद्देश्य से इस्तेमाल किया गया था और इसमें वास्तविक सीमाओं को प्रदर्शित नहीं किया गया है। हालांकि, भारतीय अधिकारी ने इस स्पष्टीकरण से असहमति जताते हुए दोबारा भारत का आधिकारिक रुख दोहराया कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है।

    बाद में करीम ने पूछा कि क्या पूजा झा भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। इस पर उन्होंने स्वयं को भारतीय उच्चायोग की अधिकारी बताया। इसके बाद करीम ने कहा कि उनकी आपत्ति को नोट कर लिया गया है और फिर अपनी प्रस्तुति जारी रखी।

    सेमिनार में बांग्लादेश की विदेश मामलों की राज्य मंत्री शमा ओबैद मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। अपने संबोधन में उन्होंने दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने और सार्क को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने संगठन की कार्यक्षमता, वित्तीय मजबूती और बेहतर फॉलो-अप व्यवस्था को प्राथमिकता देने की बात कही।

    ओबैद ने यह भी संकेत दिया कि बांग्लादेश आने वाले महीनों में सार्क सदस्य देशों के बीच विश्वास बढ़ाने के उद्देश्य से कुछ नई पहल पर विचार कर रहा है। इनमें ढाका में मौजूद सार्क देशों के राजदूतों के साथ बैठकें और काठमांडू स्थित सार्क सचिवालय के साथ समन्वय बढ़ाने जैसे कदम शामिल हो सकते हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। कई भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ने पूजा कुमारी झा की तत्परता की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने मौके पर ही भारत का आधिकारिक पक्ष स्पष्ट रूप से सामने रखा।

  • पीएम मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के बीच कांग्रेस ने साझा की इंदिरा गांधी की ऐतिहासिक तस्वीरें, कूटनीति और प्रकृति संरक्षण की विरासत पर दिया जोर

    पीएम मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के बीच कांग्रेस ने साझा की इंदिरा गांधी की ऐतिहासिक तस्वीरें, कूटनीति और प्रकृति संरक्षण की विरासत पर दिया जोर

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के बीच राजनीतिक बयानबाजी का नया दौर देखने को मिला है। कांग्रेस ने इस अवसर पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के ऑस्ट्रेलिया दौरों की ऐतिहासिक तस्वीरें साझा करते हुए उनके पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीवों के प्रति लगाव और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में निभाई गई भूमिका को प्रमुखता से सामने रखा। इस कदम को वर्तमान विदेश दौरे के बीच राजनीतिक और वैचारिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने वर्ष 1968 और 1981 के ऑस्ट्रेलिया दौरों से जुड़ी दो तस्वीरें साझा कीं। एक तस्वीर में इंदिरा गांधी कंगारू को भोजन कराती हुई दिखाई देती हैं, जबकि दूसरी तस्वीर में वह सिडनी के तारोंगा जू में कोआला के साथ नजर आती हैं। इन तस्वीरों के माध्यम से कांग्रेस ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि इंदिरा गांधी विदेश यात्राओं के दौरान केवल कूटनीतिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहती थीं, बल्कि पर्यावरण और जैव विविधता संरक्षण जैसे विषयों को भी महत्व देती थीं।

    कांग्रेस का कहना है कि इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण स्थान दिया। उन्होंने विभिन्न देशों के साथ जैव विविधता और प्रवासी पक्षियों के संरक्षण से जुड़े समझौतों को बढ़ावा दिया तथा वैश्विक स्तर पर प्रकृति संरक्षण के प्रयासों का समर्थन किया। उनके कार्यकाल में पर्यावरण से जुड़ी कई नीतियों और संरक्षण अभियानों को भी नई दिशा मिली, जिनका प्रभाव लंबे समय तक देखने को मिला।

    इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ऑस्ट्रेलिया दौरा भी कई महत्वपूर्ण समझौतों और कार्यक्रमों के कारण चर्चा में रहा। दौरे के दौरान दोनों देशों ने रणनीतिक, तकनीकी और आर्थिक सहयोग को और मजबूत करने के उद्देश्य से कई नई पहलों पर सहमति व्यक्त की। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला जैसे भविष्य की तकनीकों से जुड़े क्षेत्रों में साझेदारी को आगे बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया।

    प्रधानमंत्री ने मेलबर्न में भारतीय समुदाय को भी संबोधित किया, जहां बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय मौजूद रहे। इसके अलावा उन्होंने मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड का दौरा किया और दोनों देशों के बीच खेल सहयोग को नई दिशा देने वाले कार्यक्रमों में भी भाग लिया। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और उच्च तकनीक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने से जुड़े कई निर्णय भी इस यात्रा के दौरान सामने आए, जिन्हें द्विपक्षीय संबंधों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विदेश यात्राओं के दौरान पूर्व और वर्तमान सरकारों की उपलब्धियों को लेकर राजनीतिक दल अक्सर अपनी-अपनी प्राथमिकताओं और दृष्टिकोण को सामने रखते हैं। कांग्रेस द्वारा इंदिरा गांधी के पुराने ऑस्ट्रेलिया दौरों को याद करना भी इसी क्रम का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें उनके पर्यावरण संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में योगदान को रेखांकित किया गया है।

    भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुए हैं। रक्षा, व्यापार, शिक्षा, खेल, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग तेजी से बढ़ा है। ऐसे समय में वर्तमान कूटनीतिक उपलब्धियों के साथ-साथ ऐतिहासिक संदर्भों को भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया जा रहा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े मुद्दे देश की आंतरिक राजनीति में भी लगातार महत्वपूर्ण स्थान बनाए हुए हैं।

  • न्यूजीलैंड में भारतीय समुदाय के स्नेह से भावुक हुए प्रधानमंत्री मोदी, बोले- चार दशक बाद भी भारत से जुड़ाव उतना ही मजबूत

    न्यूजीलैंड में भारतीय समुदाय के स्नेह से भावुक हुए प्रधानमंत्री मोदी, बोले- चार दशक बाद भी भारत से जुड़ाव उतना ही मजबूत

    नई दिल्ली । तीन देशों की विदेश यात्रा के अंतिम चरण में न्यूजीलैंड पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ऑकलैंड में गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया। लगभग चार दशकों के अंतराल के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली आधिकारिक न्यूजीलैंड यात्रा मानी जा रही है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने वहां रह रहे भारतीय समुदाय के स्नेह, अपनापन और भारत के प्रति उनके मजबूत जुड़ाव की सराहना करते हुए कहा कि प्रवासी भारतीयों का अपने देश से भावनात्मक रिश्ता आज भी पूरी मजबूती के साथ कायम है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि न्यूजीलैंड में बसे भारतीयों का उत्साह और आत्मीयता उनके लिए बेहद भावुक करने वाला अनुभव रहा। उन्होंने उल्लेख किया कि लंबे समय बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री के आधिकारिक दौरे को लेकर वहां के भारतीय समुदाय में विशेष उत्साह देखने को मिला। उनके अनुसार यह केवल स्वागत का अवसर नहीं, बल्कि भारत और उसके प्रवासी नागरिकों के बीच गहरे सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंधों का भी प्रतीक है।

    ऑकलैंड पहुंचने पर न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने स्वयं एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया। दोनों नेताओं की मुलाकात को भारत और न्यूजीलैंड के बीच बढ़ते सहयोग का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। इस दौरान दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वागत के लिए न्यूजीलैंड सरकार और प्रधानमंत्री लक्सन का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वह द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देने के उद्देश्य से होने वाली चर्चाओं को लेकर उत्साहित हैं।

    प्रधानमंत्री ने अपनी यात्रा को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह दौरा दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत बनाने का अवसर प्रदान करेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने, आर्थिक संबंधों को मजबूत करने, व्यापार, निवेश, शिक्षा, विज्ञान, नवाचार और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा देने जैसे विषयों पर सार्थक चर्चा होगी। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय समुदाय के साथ संवाद उनकी यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।

    प्रधानमंत्री के स्वागत को विशेष बनाने के लिए ऑकलैंड के प्रसिद्ध स्काई टावर को आकर्षक रोशनी से सजाया गया। इस पहल को भारत और न्यूजीलैंड के बीच मित्रता तथा मजबूत होते संबंधों का प्रतीक माना गया। शहर में भारतीय समुदाय ने भी विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों और पारंपरिक स्वागत के माध्यम से प्रधानमंत्री का अभिनंदन किया। इस दौरान दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक निकटता और आपसी सम्मान की झलक भी देखने को मिली।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह यात्रा केवल कूटनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि दोनों देशों के लोगों के बीच संबंधों को और मजबूत करने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। न्यूजीलैंड में रहने वाला भारतीय समुदाय वहां के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री का यह दौरा प्रवासी भारतीयों के साथ भारत के संबंधों को और सुदृढ़ करने का अवसर भी माना जा रहा है।

    आगामी कार्यक्रमों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के बीच द्विपक्षीय वार्ता होने की संभावना है। दोनों देशों के बीच सहयोग के नए क्षेत्रों पर चर्चा के साथ-साथ भविष्य की साझेदारी को मजबूत बनाने पर भी जोर दिया जाएगा। यह यात्रा भारत और न्यूजीलैंड के संबंधों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखी जा रही है।

  • कल्याणी इम्पेक्स पर ED की बड़ी कार्रवाई, कनाडा, अमेरिका और UAE में अघोषित संपत्तियों व बैंक खातों के मिले अहम सुराग

    कल्याणी इम्पेक्स पर ED की बड़ी कार्रवाई, कनाडा, अमेरिका और UAE में अघोषित संपत्तियों व बैंक खातों के मिले अहम सुराग

    नई दिल्ली । प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत कल्याणी इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशक धर्मेश नरेंद्र संगानी से जुड़े मामले में व्यापक तलाशी अभियान चलाया है। जांच एजेंसी का दावा है कि इस कार्रवाई के दौरान विदेशों में अघोषित बैंक खातों, संपत्तियों और संदिग्ध सीमा-पार वित्तीय लेनदेन से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य सामने आए हैं। फिलहाल एजेंसी इन सभी दस्तावेजों की विस्तृत जांच कर रही है।

    जांच के दौरान ईडी को ऐसे संकेत मिले हैं कि कंपनी के निर्यात से प्राप्त होने वाली कुछ विदेशी रकम निर्धारित समय के भीतर भारत नहीं लाई गई। एजेंसी के अनुसार, लंबे समय तक भुगतान लंबित रहने के बावजूद बकाया राशि की वसूली के लिए आवश्यक दस्तावेजी प्रयास नहीं किए गए। इससे विदेशी मुद्रा प्रबंधन नियमों के संभावित उल्लंघन की आशंका और मजबूत हुई है।

    प्राथमिक जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ निर्यात भुगतान उन विदेशी कंपनियों से प्राप्त हुए, जिनका नाम निर्यात दस्तावेजों, इनवॉइस या शिपिंग बिल में खरीदार अथवा भुगतानकर्ता के रूप में दर्ज नहीं था। ईडी का मानना है कि इस प्रकार के लेनदेन की प्रकृति और उद्देश्य की गहन जांच आवश्यक है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि भुगतान प्रक्रिया नियमानुसार हुई थी या नहीं।

    जांच एजेंसी ने अब तक कनाडा, अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में कई अघोषित विदेशी बैंक खातों और संभावित निवेशों की पहचान किए जाने का दावा किया है। इन खातों और वित्तीय गतिविधियों से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि यह पता लगाया जा रहा है कि क्या इन खातों और संपत्तियों की जानकारी संबंधित भारतीय प्राधिकरणों के समक्ष विधिवत घोषित की गई थी या नहीं।

    तलाशी अभियान के दौरान बरामद दस्तावेजों से यह भी संकेत मिले हैं कि धर्मेश नरेंद्र संगानी की कनाडा में संचालित एक कंपनी में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी हो सकती है। जांच एजेंसी यह भी पड़ताल कर रही है कि क्या इस विदेशी निवेश और उससे जुड़े बैंक खातों की जानकारी नियामकीय संस्थाओं को उपलब्ध कराई गई थी। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात में भी कुछ अघोषित संपत्तियों के संबंध में दस्तावेज मिलने का दावा किया गया है।

    ईडी ने तलाशी के दौरान प्राप्त दस्तावेजों, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और अन्य सामग्री को अपने कब्जे में लेकर उनकी फोरेंसिक और वित्तीय जांच शुरू कर दी है। एजेंसी विभिन्न देशों से जुड़े वित्तीय लेनदेन, बैंकिंग रिकॉर्ड और विदेशी संस्थाओं के साथ कारोबारी संबंधों का भी विश्लेषण कर रही है। आवश्यकता पड़ने पर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से भी जानकारी साझा करने और सहयोग लेने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

    फिलहाल यह जांच प्रारंभिक चरण में है और एजेंसी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की दिशा तय करेगी। मामले में संबंधित पक्षों का विस्तृत पक्ष भी जांच प्रक्रिया के दौरान दर्ज किया जाएगा। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है या नहीं तथा इस मामले में आगे क्या कानूनी कदम उठाए जाएंगे।

  • इजरायली खुफिया दावे से बढ़ी वैश्विक हलचल, डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की कथित साजिश पर अमेरिका सतर्क

    इजरायली खुफिया दावे से बढ़ी वैश्विक हलचल, डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की कथित साजिश पर अमेरिका सतर्क

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच इजरायल की एक खुफिया रिपोर्ट ने नई अंतरराष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने अमेरिका के साथ साझा की गई एक खुफिया जानकारी में दावा किया है कि ईरान ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की कथित योजना बनाई थी। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और ईरान की ओर से भी इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसके बावजूद इस रिपोर्ट ने सुरक्षा और कूटनीतिक स्तर पर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली खुफिया एजेंसियां लंबे समय से ईरान की गतिविधियों पर नजर रख रही हैं। इसी निगरानी के दौरान जुटाई गई जानकारी अमेरिका के साथ साझा की गई, जिसके बाद अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों और नीति-निर्माताओं के बीच इस मामले को लेकर सतर्कता बढ़ गई है। माना जा रहा है कि इस तरह की खुफिया सूचनाएं क्षेत्रीय सुरक्षा और भविष्य की रणनीतिक नीतियों को प्रभावित कर सकती हैं।

    विश्लेषकों का कहना है कि यदि इस प्रकार के दावों को विश्वसनीय माना जाता है तो इसका असर अमेरिका और ईरान के बीच भविष्य में होने वाली किसी भी संभावित कूटनीतिक पहल पर पड़ सकता है। हालांकि अब तक किसी भी संबंधित एजेंसी ने सार्वजनिक रूप से इन दावों की पुष्टि नहीं की है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को अभी खुफिया इनपुट के रूप में ही देखा जा रहा है।

    अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है। जनवरी 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के वरिष्ठ सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत के बाद दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। उस घटना के बाद कई बार दोनों देशों के बीच तीखे बयान, प्रतिबंध और सैन्य गतिविधियां देखने को मिली हैं। डोनाल्ड ट्रंप भी पहले सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि उन्हें ईरान से खतरा हो सकता है, हालांकि उन्होंने ऐसे खतरों को लेकर चिंता व्यक्त नहीं की थी।

    हाल के सप्ताहों में क्षेत्र में संघर्षविराम की कोशिशों के बावजूद हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए हैं। विभिन्न सैन्य गतिविधियों और जवाबी कार्रवाइयों के कारण क्षेत्रीय तनाव लगातार बना हुआ है। इससे पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। कई देशों ने संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान पर जोर देने की आवश्यकता भी दोहराई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका प्रभाव केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी प्रभावित हो सकते हैं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य जैसी रणनीतिक समुद्री मार्गों पर किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर दुनिया के कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय पश्चिम एशिया की परिस्थितियों पर लगातार नजर बनाए हुए है।

    फिलहाल इजरायल के इस दावे की आधिकारिक पुष्टि या स्वतंत्र सत्यापन सामने नहीं आया है। ऐसे में आने वाले दिनों में संबंधित देशों की प्रतिक्रियाओं और आधिकारिक जांच के बाद ही स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में कूटनीतिक संवाद और संयम ही क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का सबसे प्रभावी माध्यम साबित हो सकता है।

  • मोदी दौरे ने फिर दिखाई भारतीय समुदाय की ताकत, ऑस्ट्रेलिया में व्यापार, निवेश और राजनीतिक प्रभाव को मिली नई पहचान

    मोदी दौरे ने फिर दिखाई भारतीय समुदाय की ताकत, ऑस्ट्रेलिया में व्यापार, निवेश और राजनीतिक प्रभाव को मिली नई पहचान


    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे ने भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंधों को नई गति देने के साथ-साथ वहां रह रहे भारतीय समुदाय की बढ़ती भूमिका को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है। पिछले कुछ वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लोगों की बढ़ती आबादी, उनकी आर्थिक भागीदारी और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय उपस्थिति ने दोनों देशों के संबंधों को मजबूत आधार प्रदान किया है। यही कारण है कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच होने वाली रणनीतिक वार्ताओं में भारतीय समुदाय को केवल प्रवासी समूह नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच भरोसे और सहयोग का महत्वपूर्ण माध्यम माना जा रहा है।

    ऑस्ट्रेलिया में भारतीय समुदाय शिक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवाओं, इंजीनियरिंग, वित्तीय सेवाओं, उद्यमिता और शोध जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रहा है। बड़ी संख्या में भारतीय छात्र वहां उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, जबकि हजारों पेशेवर विभिन्न उद्योगों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। इसके साथ ही भारतीय उद्यमियों ने छोटे और मध्यम उद्योगों के माध्यम से स्थानीय अर्थव्यवस्था में निवेश और रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    राजनीतिक दृष्टि से भी भारतीय समुदाय का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न राज्यों और स्थानीय निकायों में भारतीय मूल के प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ी है। चुनावों के दौरान प्रमुख राजनीतिक दल भारतीय समुदाय से संवाद को प्राथमिकता दे रहे हैं और उनकी सामाजिक तथा आर्थिक प्राथमिकताओं को अपने एजेंडे में स्थान दे रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय मूल के मतदाता अब वहां की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण समूह के रूप में उभर चुके हैं।

    भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट भी दोनों देशों को जोड़ने वाला सबसे मजबूत सांस्कृतिक माध्यम बना हुआ है। खेल के जरिए दोनों देशों के लोगों के बीच वर्षों से गहरा जुड़ाव बना है। क्रिकेट ने केवल खेल संबंधों को ही मजबूत नहीं किया, बल्कि पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और व्यावसायिक अवसरों को भी नई दिशा दी है। दोनों देशों के बीच खेल सहयोग लगातार बढ़ रहा है और इससे सामाजिक स्तर पर भी निकटता मजबूत हुई है।

    प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान व्यापार, रक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, स्वच्छ ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, शिक्षा और निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। दोनों देशों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला और आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई। इससे यह संकेत मिला कि भारत और ऑस्ट्रेलिया केवल व्यापारिक साझेदार ही नहीं, बल्कि रणनीतिक सहयोगी के रूप में भी अपने संबंधों को नई ऊंचाई देना चाहते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया में भारतीय समुदाय की सफलता केवल आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। यह समुदाय दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक विश्वास, सामाजिक सहयोग और दीर्घकालिक रणनीतिक संबंधों को भी मजबूती प्रदान कर रहा है। आने वाले वर्षों में व्यापार, निवेश, शिक्षा, नवाचार और रक्षा सहयोग के विस्तार के साथ भारतीय समुदाय की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने की संभावना है। इसी कारण भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंधों में भारतीय प्रवासी समुदाय को भविष्य की साझेदारी का एक मजबूत और भरोसेमंद स्तंभ माना जा रहा है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव के बीच इजरायल की बढ़ी सैन्य तैयारी, ट्रंप के फैसले पर टिकी नजर, पश्चिम एशिया में फिर गहराया युद्ध का खतरा

    अमेरिका-ईरान तनाव के बीच इजरायल की बढ़ी सैन्य तैयारी, ट्रंप के फैसले पर टिकी नजर, पश्चिम एशिया में फिर गहराया युद्ध का खतरा


    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़ते सैन्य तनाव ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति को बेहद संवेदनशील बना दिया है। इसी बीच इजरायल की ओर से यह संकेत मिला है कि आवश्यकता पड़ने पर वह ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई करने के लिए तैयार है। हालांकि इजरायली सैन्य अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल देश की ओर से अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे प्रत्यक्ष सैन्य टकराव में शामिल होने का कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है। इसके बावजूद सुरक्षा एजेंसियों और सेना को हर संभावित परिस्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह सतर्क रखा गया है।

    बढ़ते तनाव के बीच इजरायल के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा सैन्य टकराव आने वाले दिनों में और गंभीर रूप ले सकता है। ऐसे परिदृश्य में यदि अमेरिका अपने सहयोगी देशों से समर्थन चाहता है तो इजरायल भी संभावित सैन्य अभियान का हिस्सा बन सकता है। अधिकारियों का कहना है कि देश पहले भी अपने रणनीतिक सहयोगियों के साथ सुरक्षा अभियानों में भाग ले चुका है और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर आवश्यक कदम उठाने के लिए तैयार रहेगा।

    इजरायल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने संकेत दिया कि यदि हालात की मांग हुई तो देश दोबारा कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी पक्ष क्षेत्र में नए युद्ध की स्थिति नहीं चाहता, लेकिन ईरान की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। सुरक्षा से जुड़े निर्णय क्षेत्रीय हालात और सहयोगी देशों के साथ समन्वय को ध्यान में रखकर लिए जाएंगे।

    दूसरी ओर इजरायली रक्षा बलों का आकलन है कि वर्तमान समय में ईरान भी सीधे इजरायल को इस संघर्ष में शामिल करने की कोशिश नहीं कर रहा है। सेना का मानना है कि निकट भविष्य में इजरायल पर किसी बड़े हमले की आशंका सीमित है। इसके बावजूद सीमाओं की निगरानी बढ़ा दी गई है और सभी सैन्य इकाइयों को उच्च स्तर की तैयारियों में रखा गया है ताकि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति का तुरंत जवाब दिया जा सके।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। अमेरिका ने हालिया सैन्य कार्रवाई को इस क्षेत्र से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों पर हुए हमलों की प्रतिक्रिया बताया है। होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है और यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति तथा वैश्विक व्यापार पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। यही कारण है कि कई देशों की नजर इस क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों पर बनी हुई है।

    अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भी हाल के दिनों में ईरान के प्रति कड़ा रुख अपनाने के संकेत दिए गए हैं। अमेरिका ने यह स्पष्ट किया है कि मौजूदा परिस्थितियों में उसकी प्राथमिकता क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही यह भी संकेत मिले हैं कि कूटनीतिक विकल्पों के साथ-साथ सैन्य तैयारियों को भी बनाए रखा जाएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच तनाव और बढ़ता है तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी इसके व्यापक असर पड़ सकते हैं। ऐसे में दुनिया की प्रमुख शक्तियां हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और उम्मीद की जा रही है कि तनाव को नियंत्रित रखने के लिए कूटनीतिक प्रयास भी समानांतर रूप से जारी रहेंगे।