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  • झुर्रियां होंगी छूमंतर, चेहरे पर आएगा चांदी जैसा निखार; इन 5 जड़ी-बूटियों से घर पर बनाएं 'नेचुरल नाइट सीरम

    झुर्रियां होंगी छूमंतर, चेहरे पर आएगा चांदी जैसा निखार; इन 5 जड़ी-बूटियों से घर पर बनाएं 'नेचुरल नाइट सीरम


    नई दिल्ली । खूबसूरत, बेदाग और ग्लोइंग स्किन की चाहत आज हर किसी को है। लेकिन बाजार में मिलने वाले केमिकल युक्त प्रोडक्ट्स अक्सर त्वचा को निखार देने के बजाय उसे नुकसान पहुँचाते हैं। ऐसे में आयुर्वेद की प्राचीन विधाएं एक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प बनकर उभरी हैं। आयुर्वेद में कई ऐसी औषधीय जड़ी-बूटियों और जड़ों का उल्लेख मिलता है जो त्वचा को अंदर से गहराई तक पोषण देती हैं। अगर आप भी झुर्रियों और बेजान त्वचा से परेशान हैं, तो घर पर इन 5 जड़ी-बूटियों से बना नेचुरल नाइट सीरम आपकी किस्मत बदल सकता है।

    कौन सी हैं वो 5 चमत्कारी जड़ी-बूटियां? विशेषज्ञों के अनुसार, केसर, चंदन, मंजिष्ठा, मुलेठी और हल्दी का अर्क जब सही अनुपात में मिलाया जाता है, तो यह त्वचा के लिए एक शक्तिशाली अमृत बन जाता है। केसर त्वचा की रंगत सुधारता है, तो मंजिष्ठा रक्त शोधन कर कील-मुहासों को रोकता है। वहीं मुलेठी और हल्दी झुर्रियों को कम करने और एंटी-एजिंग गुणों के लिए प्रसिद्ध हैं।

    कैसे काम करता है यह सीरम? रात के समय हमारी त्वचा खुद को ‘रिपेयर’ यानी ठीक करती है। जब हम सोने से पहले इस आयुर्वेदिक सीरम का इस्तेमाल करते हैं, तो इसमें मौजूद सक्रिय तत्व त्वचा के छिद्रों में गहराई तक समा जाते हैं। यह कोलेजन के उत्पादन को बढ़ाता है, जिससे झुर्रियां कम होती हैं और त्वचा में कसाव आता है। नियमित इस्तेमाल से यह सीरम न केवल झाइयां और दाग-धब्बों को हल्का करता है, बल्कि त्वचा को प्राकृतिक रूप से चमकदार भी बनाता है। प्राकृतिक और शुद्ध होने के कारण यह हर तरह की स्किन के लिए अनुकूल है। यदि आप इसे अपनी डेली रूटीन का हिस्सा बनाते हैं, तो कुछ ही दिनों में आपका चेहरा जवां और चमकदार नजर आने लगेगा।

  • सावधान! पेपर कप में चाय-कॉफी पीना बन सकता है सेहत के लिए ज़हर, कैंसर और थायरॉइड का बढ़ता खतरा

    सावधान! पेपर कप में चाय-कॉफी पीना बन सकता है सेहत के लिए ज़हर, कैंसर और थायरॉइड का बढ़ता खतरा


    नई दिल्ली। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में चाय और कॉफी पीने के लिए पेपर कप का इस्तेमाल आम हो गया है। ऑफिस, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और स्ट्रीट वेंडर्स पर इन्हें सुरक्षित और इको-फ्रेंडली मानकर धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनी चौंकाने वाली है। डॉक्टरों के मुताबिक, लंबे समय तक पेपर कप में गर्म चाय या कॉफी पीना शरीर के लिए बेहद नुकसानदायक हो सकता है और इससे कैंसर व थायरॉइड जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

    दरअसल, पेपर कप पूरी तरह कागज से नहीं बने होते। इन्हें वाटरप्रूफ बनाने के लिए अंदर की परत में प्लास्टिक या वैक्स कोटिंग की जाती है। जब इनमें गर्म पेय डाला जाता है, तो यह परत पिघलने लगती है और उससे हानिकारक केमिकल्स और माइक्रोप्लास्टिक चाय-कॉफी में मिल जाते हैं, जो सीधे शरीर में पहुंचते हैं।

    सेहत पर कैसे पड़ता है असर?
    डॉक्टर्स के अनुसार, पेपर कप में मौजूद BPA (बिसफेनोल-A) और अन्य केमिकल्स गर्म तरल के संपर्क में आकर एक्टिव हो जाते हैं। इनका लगातार सेवन करने से हार्मोनल असंतुलन, थायरॉइड की समस्या, और लंबे समय में कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।

    इसके अलावा, माइक्रोप्लास्टिक कण पाचन तंत्र को भी नुकसान पहुंचाते हैं। इससे एसिडिटी, पेट दर्द, गैस, अपच और आंतों से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि रोजाना पेपर कप में गर्म पेय पीने से शरीर में टॉक्सिन्स धीरे-धीरे जमा होने लगते हैं।

    पर्यावरण के लिए भी खतरा
    पेपर कप सिर्फ सेहत ही नहीं, पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक हैं। प्लास्टिक कोटिंग के कारण इन्हें पूरी तरह रिसायकल करना मुश्किल होता है। जलाने पर ये जहरीली गैसें छोड़ते हैं, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ता है।

    क्या करें, क्या न करें
    अगर आप खुद को और अपने परिवार को इन खतरों से बचाना चाहते हैं, तो पेपर कप का इस्तेमाल कम से कम करें। चाय-कॉफी पीने के लिए स्टील, कांच या सिरेमिक कप सबसे सुरक्षित माने जाते हैं। ये न केवल सेहत के लिए बेहतर हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार हैं।

  • न शोर, न भीड़, न फोटो की होड़! फरवरी में भारत की इन 5 जगहों पर असली 'शांति' का करें अनुभव; देखें पूरी लिस्ट

    न शोर, न भीड़, न फोटो की होड़! फरवरी में भारत की इन 5 जगहों पर असली 'शांति' का करें अनुभव; देखें पूरी लिस्ट


    नई दिल्ली । फरवरी यात्रा भारत यात्रा का मतलब सिर्फ जगह बदलना नहीं, बल्कि शोर और जल्दबाजी से थोड़ी दूरी बनाना होता है. फरवरी इसलिए खास लगता है क्योंकि यह किसी बड़े उत्सव या पीक सीजन का समय नहीं होता. इस बीच के समय में जगहें अपना असली स्वभाव दिखाती हैं और यात्री बिना किसी दबाव के उन्हें महसूस कर पाते हैं. न ज्यादा भीड़, न फोटो लेने की होड़ और न ही किसी ट्रेंड को फॉलो करने की मजबूरी.

    कल्पा

    हिमाचल प्रदेश के कल्पा में फरवरी का माह बेहद शांत होता है. इस समय न सेब के बागानों में चहल-पहल होती है और न ही पर्यटकों की भीड़. बर्फ धीरे-धीरे पिघल रही होती है, आसमान साफ होता है और किन्नौर कैलाश की चोटियां दूर से दिखाई देती हैं. यहां की सुबह बिना शोर के आती है और यही चुप्पी मन को भीतर तक सुकून देती है.

    तीर्थन घाटी
    उत्तराखंड की तीर्थन घाटी को लोग आमतौर पर ट्रेकिंग के लिए जानते हैं, लेकिन फरवरी में यह जगह एक संतुलित शांति देती है. इस समय नदी शांत रहती है, जंगल डरावने नहीं लगते और गांवों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी सहज रूप से चलती रहती है. यहां रहकर यह एहसास होता है कि शांति खालीपन नहीं बल्कि एक स्थिर लय होती है.

    गोकर्ण

    गोवा की भीड़ से दूर, फरवरी में कर्नाटक का गोकर्ण खासतौर पर ओम बीच के आगे का इलाका एक अलग ही अनुभव देता है. यहां समुद्र देखने से ज़्यादा सुनने जैसा लगता है. न ज्यादा नमी परेशान करती है और न पर्यटकों की भीड़. बस लहरों की आवाज़ और नमकीन हवा का हल्का सा स्पर्श मन को हल्का कर देता है.

    मंडावा

    राजस्थान का मंडावा फरवरी में अपने शांत रूप में दिखाई देता है. शेखावाटी की हवेलियां, खाली गलियां और धीमी दोपहरें किसी पुराने दौर में ले जाती हैं. यहां सुकून प्रकृति से नहीं बल्कि समय की धीमी रफ्तार से मिलता है, जैसे दिन खुद कह रहा हो कि जल्दी की कोई ज़रूरत नहीं है.

    माजुली

    असम का माजुली फरवरी में बेहद संतुलित लगता है. ब्रह्मपुत्र शांत रहती है और सत्रों में बिना किसी दिखावे के गतिविधियां चलती रहती हैं. यहां बैठकर चुप रहना भी एक तरह की आध्यात्मिकता जैसा महसूस होता है, जो पहाड़ या मंदिर से अलग लेकिन उतनी ही गहरी होती है.

    इन जगहों में क्या समानता है

    आध्यात्मिक यात्रिक और पिलग्रिम महादेवा ट्रैवल के चीफ जुग्ग्नु के अनुसार इन सभी जगहों में फरवरी में कुछ भी खास नहीं होता और शायद यही उन्हें खास बनाता है. न मौसम चरम पर होता है, न पर्यटक. न कुछ मिस करने का डर और न कुछ साबित करने की ज़रूरत. यही सुकून की असली परिभाषा है.

  • तनाव और एंग्जाइटी से राहत दिलाए हाकिनी योग मुद्रा, याददाश्त बढ़ाने का आसान तरीका

    तनाव और एंग्जाइटी से राहत दिलाए हाकिनी योग मुद्रा, याददाश्त बढ़ाने का आसान तरीका

    नई दिल्ली। आज की तेज-तर्रार जिंदगी में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है। काम का दबाव, लगातार स्मार्टफोन और स्क्रीन के सामने बैठना, नींद की कमी और बढ़ता तनाव हमारे शरीर और दिमाग पर गहरा असर डाल रहे हैं।

    इससे न केवल एंग्जाइटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक परेशानियां बढ़ रही हैं, बल्कि याददाश्त कमजोर हो रही है और ध्यान केंद्रित करने में समस्या हो रही है। ऐसे में योग हमारी सेहत के लिए समाधान का काम कर सकता है।

    आयुष मंत्रालय के अनुसार, योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, एकाग्रता और नर्वस सिस्टम को मजबूत करने का भी काम करता है। इसी कड़ी में हाकिनी योग मुद्रा एक सरल हस्त मुद्रा है, जो दिमाग को सक्रिय रखने, तनाव कम करने और आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद करती है।

    हाकिनी योग मुद्रा, जिसे पावर जेस्चर या ब्रेन पॉवर मुद्रा भी कहा जाता है, हाथों की पांचों उंगलियों को आपस में जोड़कर की जाती है। इसे करने के लिए सबसे पहले आप पद्मासन या वज्रासन में बैठ जाएं और आंखें बंद करके गहरी और लंबी सांस लें। इसके बाद एक हाथ की सभी उंगलियों की टिप को दूसरे हाथ की उंगलियों की टिप से जोड़ दें। ध्यान रखें कि उंगलियों पर अत्यधिक दबाव न पड़े। भौहों के बीच पर ध्यान केंद्रित करते हुए मन को अनावश्यक विचारों से दूर रखें। शुरुआत में इसे दो से तीन मिनट करें और धीरे-धीरे इसे पांच मिनट तक बढ़ाएं। रोजाना सुबह खाली पेट और शाम को इसका अभ्यास करने से इसका प्रभाव और भी बढ़ जाता है।

    इस मुद्रा के अनेक लाभ हैं। सबसे पहले, यह ध्यान और एकाग्रता बढ़ाती है। हाथों की उंगलियों को जोड़ने से मस्तिष्क के दोनों हिस्से सक्रिय होते हैं, जिससे याददाश्त मजबूत होती है और किसी भी काम पर ध्यान बनाए रखना आसान होता है। इसके साथ ही यह तनाव और घबराहट को कम करता है। जो लोग लगातार चिंतित रहते हैं या डिप्रेशन का सामना कर रहे हैं, उनके लिए यह मुद्रा मानसिक शांति और संतुलन का काम करती है।

    हाकिनी मुद्रा आत्मविश्वास बढ़ाने में भी मदद करती है। इसे करने से न केवल व्यक्ति अपने कार्यों के प्रति उत्साहित और प्रेरित महसूस करता है, बल्कि मानसिक स्थिरता और ऊर्जा भी बढ़ती है।

    इसके अलावा, हाकिनी मुद्रा नींद की गुणवत्ता को सुधारने में भी मदद करती है। दिनभर की थकान और तनाव के कारण कई लोगों को रात में नींद नहीं आती। इस मुद्रा का अभ्यास शरीर में रक्तसंचार बढ़ाता है और ऑक्सीजन का प्रवाह सुधारता है, जिससे नींद गहरी और संतुलित होती है। इसके नियमित अभ्यास से नर्वस सिस्टम, टिश्यू और सेल्स की कार्यक्षमता भी बेहतर होती है। इससे शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और व्यक्ति दिनभर सक्रिय महसूस करता है।

  • निमोनिया का खतरा बढ़ा, खासकर बच्चों और बुजुर्गों में जानिए बचाव के उपाय

    निमोनिया का खतरा बढ़ा, खासकर बच्चों और बुजुर्गों में जानिए बचाव के उपाय



    नई दिल्ली। सर्दियों के शुरू होते ही निमोनिया का खतरा बढ़ जाता है, खासकर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों में। हर साल लाखों लोग निमोनिया से प्रभावित होते हैं और समय पर इलाज न मिलने पर यह जानलेवा भी साबित हो सकता है। इसी गंभीर बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 12 नवंबर को विश्व निमोनिया दिवस मनाया जाता है। डॉ. सूर्यकान्त (विभागाध्यक्ष, रेस्पिरेटरी मेडिसिन, केजीएमयू, लखनऊ) के अनुसार, निमोनिया की पहचान, बचाव और समय पर उपचार बहुत जरूरी है क्योंकि पांच साल से कम उम्र के बच्चों में यह मृत्यु का प्रमुख कारण बन सकता है 
    निमोनिया में एक या दोनों फेफड़ों के हिस्सों में सूजन आ जाती है और उनमें पानी भरने लगता है। यह अधिकतर संक्रमण के कारण होता है, लेकिन केमिकल, एस्पिरेशन (गले/खाने की नली से फेफड़ों में सामग्री चला जाना) और अन्य कारणों से भी हो सकता है। इसके मुख्य कारण बैक्टीरिया, वायरस, फंगस और परजीवी रोगाणु हैं, जबकि टीबी भी निमोनिया का एक बड़ा कारण बन सकता है। समय पर सही इलाज न मिलने पर निमोनिया जानलेवा साबित हो सकता है और भारत में संक्रामक रोगों से होने वाली मौतों में लगभग 20% मौतें निमोनिया की वजह से होती हैं।

    निमोनिया किसी को भी हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों में जोखिम अधिक रहता है, जैसे धूम्रपान, शराब, नशे की आदत वाले, डायलिसिस कराने वाले मरीज, हृदय/फेफड़े/लिवर की बीमारी वाले, मधुमेह, गंभीर गुर्दा रोग, बुजुर्ग, नवजात, कैंसर या एड्स के मरीज। इसके प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार, खांसी, बलगम, सीने में दर्द, सांस फूलना और कुछ मरीजों में दस्त, उल्टी, चक्कर, मतिभ्रम, भूख न लगना और जोड़ों व मांसपेशियों में दर्द शामिल हैं।

    डॉक्टर अक्सर खून की जांच, बलगम की जांच और छाती का एक्स-रे कराकर निमोनिया की पुष्टि करते हैं।

    निमोनिया तीन मुख्य रास्तों से फैलता है: खांसने या छींकने से श्वास मार्ग, अस्पताल में लंबे समय तक भर्ती मरीजों में IV लाइन या पेसमेकर के माध्यम से खून के रास्ते, और एस्पिरेशन के जरिए जब मुंह या गले की सामग्री फेफड़ों में चली जाती है। इसलिए संक्रमण से बचाव के लिए स्वच्छता, मास्क, और सही उपचार जरूरी है।

    निमोनिया से बचाव संभव है।

    ठंड से बचें, खासकर बच्चों और बुजुर्गों को गर्म कपड़े पहनाएं और बाहर कम समय बिताएं। शुगर और अन्य बीमारियों का नियंत्रण रखें और नियमित जांच करवाते रहें। 65 वर्ष से ऊपर या बीमार लोगों को न्यूमोकोकल और फ्लू वैक्सीन जरूर लगवानी चाहिए, क्योंकि ये टीके फेफड़ों के संक्रमण से बचाने में मदद करते हैं। अस्पताल में संक्रमण से बचने के लिए हाथों को सही तरीके से धोना, नेबुलाइजर और ऑक्सीजन उपकरणों का उचित स्टरलाइजेशन, एंडोट्रैकेल ट्यूब की सफाई और IV लाइन को नियमित बदलवाना आवश्यक है।
    नवजात और छोटे बच्चों को सर्दियों में नहलाने से बचाएं, बिना कपड़ों के खुले में न जाने दें, टीकाकरण और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें और उन्हें ठंड, धूल-धुएं और खांसी-जुकाम से दूर रखें। इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए स्वस्थ जीवन शैली अपनाएं, हरी सब्जियां और फल खाएं, फास्ट फूड से बचें और योग व प्राणायाम करें। इन सावधानियों से आप निमोनिया के खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकते हैं।
  • आयुर्वेद के तीन असरदार उपाय दूर करेंगे एनीमिया की समस्या जानिए क्या रखें खास ध्यान

    आयुर्वेद के तीन असरदार उपाय दूर करेंगे एनीमिया की समस्या जानिए क्या रखें खास ध्यान


    नई दिल्ली।खान पान में पोषक तत्वों की कमी के कारण बच्चों से लेकर महिलाओं तक एनीमिया की समस्या आम होती जा रही है सिर दर्द चक्कर आना और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देने पर अक्सर डॉक्टर आयरन की दवाएं देते हैं लेकिन कई मामलों में दवा लेने के बावजूद शरीर में रक्त की कमी बनी रहती है ऐसे में आयुर्वेद में बताए गए प्राकृतिक उपाय लंबे समय तक राहत देने में सहायक हो सकते हैंआयुर्वेद के अनुसार यदि सही तरीके से कुछ नियमों का पालन किया जाए तो मात्र सात दिनों में शरीर में सकारात्मक बदलाव महसूस किए जा सकते हैं पहला उपाय आयुर्वेदिक पंचामृत के रूप में बताया गया है इसमें रसोई में मौजूद कुछ सामान्य चीजों का नियमित सेवन करने की सलाह दी जाती है

    रक्त की कमी होने पर रात में दो मुनक्का और दो अंजीर भिगोकर सुबह उनका सेवन करना लाभकारी माना गया है इसके साथ लौह भस्म को शहद के साथ चाटना चाहिए सुबह खाली पेट सफेद पेठे और आंवले का रस पीना शरीर में रक्त निर्माण को बढ़ावा देता है तिल और गुड़ का सेवन भी आयरन की कमी को पूरा करने में सहायक है वहीं रात में गुनगुने पानी के साथ त्रिफला चूर्ण लेने से पाचन सुधरता है और रक्त शुद्ध होता है

    दूसरा उपाय आहार तालिका से जुड़ा है भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियां सहजन की पत्ती और डंडी तथा चुकंदर को शामिल करना चाहिए फलों में अनार अंगूर सेब और खजूर का सेवन लाभदायक होता है दिन के समय छाछ पीने से पाचन तंत्र मजबूत होता है और शरीर में पोषक तत्वों का अवशोषण बेहतर होता है जिससे रक्त की मात्रा बढ़ने में सहायता मिलती हैइसके साथ यह जानना भी जरूरी है कि किन चीजों से परहेज करना चाहिए अधिक मात्रा में हरी मिर्च बैंगन ज्यादा खट्टे फल और पैक्ड खाद्य या पेय पदार्थों का सेवन एनीमिया की समस्या को बढ़ा सकता है इसलिए इनसे दूरी बनाना जरूरी है

    तीसरा उपाय जीवनशैली से जुड़ा है आयुर्वेद के अनुसार लोहे के बर्तन में भोजन पकाने से शरीर को प्राकृतिक रूप से आयरन प्राप्त होता है जिससे रक्त निर्माण में मदद मिलती है इसके अलावा सूर्य स्नान भी बेहद जरूरी माना गया है सुबह की हल्की धूप शरीर में विटामिन डी के स्तर को बढ़ाती है जो लाल रक्त कोशिकाओं को मजबूत बनाता हैआयुर्वेदिक उपायों के साथ संतुलित जीवनशैली अपनाकर एनीमिया की समस्या से प्राकृतिक रूप से राहत पाई जा सकती है

  • कब्ज का परमानेंट इलाज: किचन से बदलें ये एक चीज़, हफ्तेभर में पेट होगा मक्खन जैसा साफ

    कब्ज का परमानेंट इलाज: किचन से बदलें ये एक चीज़, हफ्तेभर में पेट होगा मक्खन जैसा साफ


    नई दिल्ली । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और मैदा कल्चर ने हमारे पाचन तंत्र को सुस्त कर दिया है। कब्ज केवल एक समस्या नहीं, बल्कि बवासीर, गैस और एसिडिटी जैसी बीमारियों की जड़ है। डॉक्टर और डाइटिशियन मानते हैं कि अगर आप अपनी रोटियों का आटा बदल लें, तो बिना दवा के पेट की सफाई संभव है। यहाँ उन 5 प्रकार के आटों की जानकारी दी जा रही है, जो फाइबर से भरपूर हैं और कब्ज को जड़ से खत्म करने की ताकत रखते हैं ।

    चोकर युक्त गेहूं का आटा
    अक्सर हम आटे को छानकर उसका चोकर बाहर फेंक देते हैं जबकि असली फाइबर उसी में होता है। फायदा चोकर आंतों की दीवारों पर जमा गंदगी को झाड़ू की तरह साफ करता है। कैसे खाएं आटे को बिना छाने रोटियां बनाएं।

    मल्टीग्रेन आटा

    जब आप गेहूं में चना सोयाबीन, और मक्का मिलाते हैं, तो यह एक फाइबर बम बन जाता है फायदा यह न केवल कब्ज दूर करता है, बल्कि शरीर को भरपूर प्रोटीन भी देता है प्रो टिप घर पर ही 5 किलो गेहूं में 1 किलो काला चना पिसवाकर मिश्रण तैयार करें।

    ओट्स का आटा

    ओट्स में बीटा-ग्लूकन नामक घुलनशील फाइबर होता है, जो पेट को नरम रखता है। फायदा यह मल को मुलायम बनाता है जिससे पेट साफ होने में दर्द या कठिनाई नहीं होती। उपयोग आप इसे गेहूं के आटे में आधा-आधा मिलाकर इस्तेमाल कर सकते हैं।

    रागी या बाजरे का आटा

    मोटे अनाज जैसे रागी बाजरा या ज्वार गुणों की खान हैं। फायदा इनमें गेहूं के मुकाबले कई गुना ज्यादा फाइबर होता है। रागी कैल्शियम का भी बेहतरीन स्रोत है। नोट सर्दियों में बाजरा और गर्मियों में ज्वार या रागी का सेवन सबसे अच्छा माना जाता है।

    जौ का आटा

    प्राचीन समय से ही जौ को पेट के लिए सबसे हल्का और पाचक माना गया है। फायदा यह आंतों की सूजन कम करता है और मेटाबॉलिज्म को बूस्ट करता है। हफ्ते भर में असर: अगर आप लगातार 7 दिन जौ की रोटी खाते हैं, तो पुरानी से पुरानी कब्ज में राहत महसूस होगी।

    एक्सपर्ट टिप्स कब्ज मुक्त रहने के लिए

    पानी का भरपूर सेवन: फाइबर तभी काम करेगा जब आप पर्याप्त पानी पिएंगे। बिना पानी के फाइबर भी कब्ज कर सकता है। रात का खाना: सोने से कम से कम 2-3 घंटे पहले खाना खा लें। सेंधा नमक रोटियों के आटे में थोड़ा सेंधा नमक और अजवाइन मिलाने से पाचन और भी तेज होता है। चेतावनी यदि आपको ग्लूटेन से एलर्जी है या कोई गंभीर पेट की बीमारी है, तो आहार में बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

  • आलू उबालने का नया अंदाज़: अब नहीं होंगे गीले और चिपचिपे, आ गई जीरो वॉटर जादुई ट्रिक

    आलू उबालने का नया अंदाज़: अब नहीं होंगे गीले और चिपचिपे, आ गई जीरो वॉटर जादुई ट्रिक


    नई दिल्ली । आलू के पराठे हों या क्रिस्पी कटलेट, सबसे बड़ी समस्या तब आती है जब कुकर में उबालने के बाद आलू पानी सोख लेते हैं। वह गीलापन न तो स्वाद रहने देता है और न ही पराठों की स्टफिंग सही बनती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बिना एक बूंद पानी के भी आलू उबाले जा सकते हैं जी हां, सोशल मीडिया पर वायरल यह जीरो वॉटर ट्रिक न केवल आपका समय बचाएगी, बल्कि आपको मिलेंगे एकदम सूखे और सोंधे स्वाद वाले आलू।

    कैसे काम करती है यह जीरो वॉटर ट्रिक

    इस तरीके में हम आलू को पानी में डुबाने के बजाय कुकर के अंदर ‘प्रेशर और स्टीम’ का इस्तेमाल करते हैं। इसे फॉलो करना बेहद आसान है तैयारी: सबसे पहले आलू को अच्छी तरह धो लें और उन्हें पोंछकर सुखा लें। ध्यान रहे, आलू के ऊपर अतिरिक्त पानी न हो।कुकर को करें तैयार कुकर की तली में एक छोटा चम्मच तेल या घी लगाकर उसे ग्रीस चिकना कर लें। इससे आलू चिपकेंगे नहीं। सूती कपड़े का जादू: अब एक सूती कपड़ा लें और उसे पानी में भिगोकर अच्छी तरह निचोड़ लें।
    कपड़ा सिर्फ गीला होना चाहिए, उससे पानी टपकना नहीं चाहिए। आलू की सेटिंग अब गीले कपड़े के अंदर आलू को लपेटकर कुकर में रख दें। अगर आलू ज्यादा हैं, तो नीचे गीला कपड़ा बिछाएं, ऊपर आलू रखें और फिर ऊपर से एक और गीला कपड़ा ढक दें।सीटी का इंतज़ार: कुकर का ढक्कन बंद करें और बिल्कुल धीमी आंच पर 10 से 12 मिनट तक पकने दें। इस दौरान कुकर में जो भाप बनेगी, वह गीले कपड़े की नमी से आएगी। परफेक्ट आलू तैयार: गैस बंद करें और प्रेशर अपने आप निकलने दें। जब आप कुकर खोलेंगे, तो आलू पूरी तरह उबले हुए और एकदम सूखे निकलेंगे।

    इस ट्रिक के जबरदस्त फायदे

    सोंधा स्वाद: पानी में उबलने से आलू का स्वाद फीका पड़ जाता है, जबकि इस तरीके से आलू का असली स्वाद बरकरार रहता है। परफेक्ट स्टफिंग: ये आलू चिपचिपे नहीं होते, इसलिए समोसे या पराठे बनाते समय स्टफिंग फटती नहीं है। विटामिन्स की बचत: पानी के साथ आलू के कई पोषक तत्व बह जाते हैं, जो भाप में पकाने से सुरक्षित रहते हैं छिलका उतारना आसान: इस विधि से उबले आलू के छिलके बहुत आसानी से और सफाई से उतर जाते हैं।

    कुछ जरूरी बातें

    इस ट्रिक के लिए हमेशा भारी तले वाले कुकर का इस्तेमाल करें। आंच हमेशा धीमी रखें, वरना कुकर जल सकता है। अगर आपके पास एल्युमीनियम फाइल है, तो आप कपड़े की जगह उसमें भी आलू लपेटकर यही प्रक्रिया दोहरा सकते हैं। याद रखें: यह ट्रिक छोटे और मध्यम आकार के आलू के लिए बेहतरीन काम करती है। अगर आलू बहुत बड़े हैं, तो उन्हें दो टुकड़ों में काटकर रखें।

  • स्लीप-एपनिया की पहली दवा जल्द हो सकती है उपलब्ध: खर्राटों और सांस रुकने की समस्या से मिलेगा आराम

    स्लीप-एपनिया की पहली दवा जल्द हो सकती है उपलब्ध: खर्राटों और सांस रुकने की समस्या से मिलेगा आराम


    नई दिल्ली।ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज AIIMS के अनुसार भारत में करीब 10.4 करोड़ लोग ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया OSA से पीड़ित हैं। यह गंभीर स्लीप डिसऑर्डर धीरे-धीरे हार्ट, ब्रेन और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है।फिलहाल स्लीप एपनिया का इलाज मुख्य रूप से लाइफस्टाइल बदलाव और CPAP मशीन के जरिए किया जाता रहा है। लेकिन अमेरिका में विकसित नई ओरल पिल, थर्ड फेज क्लिनिकल ट्रायल पूरी कर चुकी है और FDA अप्रूवल का इंतजार कर रही है।

    दवा का काम करने का तरीका रात को सोने से पहले ली जाएगी गले की मांसपेशियों को एक्टिव रखेगी, जिससे नींद में सांस की नली बंद नहीं होगी ऑक्सीजन सप्लाई बेहतर होगी और स्लीप एपनिया की गंभीरता घटेगी CPAP मशीन पर निर्भर मरीजों के लिए आसान विकल्प

    ट्रायल और असर
    फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल में दवा ने स्लीप एपनिया की गंभीरता में लगभग 47% तक कमी दिखाई। हल्के साइड इफेक्ट में मुंह सूखना और नींद आने में थोड़ी कठिनाई देखने को मिली।

    भारत में उपलब्धता
    अभी यह दवा भारत में उपलब्ध नहीं होगी। अमेरिका या अन्य देशों में मंजूरी मिलने के बाद ही भारत में उपलब्ध हो सकेगी। संभावित समय 2027 की शुरुआत तक बताया जा रहा है।

    हेल्थ रिस्क अगर समय पर इलाज न हो
    हार्ट डिजीज

    हाई ब्लड प्रेशर

    स्ट्रोक

    डायबिटीज

    ब्रेन से जुड़ी समस्याएं

    इस नई दवा से स्लीप एपनिया के मरीजों को बड़ी राहत मिल सकती है, खासकर उन लोगों के लिए जो CPAP मशीन का नियमित इस्तेमाल नहीं कर पाते।

  • पीरियड्स के दर्द सूजन और ऐंठन से दिलाएंगे राहत ये आसान योगासन

    पीरियड्स के दर्द सूजन और ऐंठन से दिलाएंगे राहत ये आसान योगासन


    नई दिल्ली।नेशनल गर्ल चाइल्ड डे बेटियों की ताकत हिम्मत और आत्मविश्वास का प्रतीक है यह दिन लड़कियों के महत्व को रेखांकित करता है जीवन के अलग अलग पड़ावों पर लड़कियों को कई शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इन्हीं में से एक है पीरियड्स के दौरान होने वाला दर्द ऐंठन और सूजन जो अक्सर उनके रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करता है

    विशेषज्ञों के अनुसार पीरियड्स के समय शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं जिनकी वजह से दर्द मूड स्विंग्स और थकान महसूस होती है ऐसे में योगासन एक प्रभावी और प्राकृतिक उपाय के रूप में सामने आते हैं योग से शरीर में एंडोर्फिन हार्मोन का स्राव बढ़ता है जो प्राकृतिक पेन किलर की तरह काम करता है इससे दर्द कम होता है और मन को भी शांति मिलती हैयोग एक्सपर्ट मानते हैं कि पीरियड्स के दौरान भारी एक्सरसाइज करने से बचना चाहिए और केवल हल्के और आरामदायक योगासन करने चाहिए इससे पेल्विक क्षेत्र में रक्त संचार बेहतर होता है मांसपेशियां रिलैक्स होती हैं और ऐंठन में कमी आती है नियमित योगाभ्यास से पीरियड्स की समस्याएं धीरे धीरे कम हो सकती हैं

    बालासन या चाइल्ड पोज पीरियड्स के दौरान बेहद लाभकारी माना जाता है इस आसन में घुटनों के बल बैठकर आगे झुकना होता है जिससे कमर और पेट की मांसपेशियों को आराम मिलता है यह दर्द सूजन और तनाव को कम करने में मदद करता हैसुप्त बद्ध कोणासन या रिलाइनिंग बटरफ्लाई पोज में पीठ के बल लेटकर पैरों के तलवे जोड़कर घुटनों को बाहर की ओर छोड़ा जाता है यह आसन पेल्विक क्षेत्र में रक्त प्रवाह को बढ़ाता है और ऐंठन के साथ सूजन में भी राहत देता है

    अपानासन पेट की ऐंठन और गैस की समस्या को शांत करने में सहायक है पीठ के बल लेटकर घुटनों को छाती से लगाने से पेट और कमर का दर्द कम होता हैमार्जरीआसन और बितिलासन यानी कैट काउ पोज रीढ़ को लचीला बनाता है इससे कमर का दर्द घटता है और शरीर में ऊर्जा का संचार होता है यह आसन पीरियड्स के दौरान मूड स्विंग्स को भी नियंत्रित करता है

    सुप्त मत्स्येंद्रासन पेट की मरोड़ और सूजन को कम करता है यह आसन शरीर को रिलैक्स करता है और दर्द से राहत दिलाता हैयोगासन को दिनचर्या में शामिल कर पीरियड्स से जुड़ी परेशानियों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है हालांकि इस दौरान शरीर पर अधिक दबाव न डालें और अगर दर्द या सूजन ज्यादा हो तो डॉक्टर की सलाह जरूर लें