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  • होटल खाना और सफर की टेंशन खत्म, रेलवे का खास भारत गौरव ट्रेन टूर पैकेज, 12 रातें 13 दिन में घूमिए दक्षिण भारत

    होटल खाना और सफर की टेंशन खत्म, रेलवे का खास भारत गौरव ट्रेन टूर पैकेज, 12 रातें 13 दिन में घूमिए दक्षिण भारत


    नई दिल्ली । दक्षिण भारत की खूबसूरत जगहों और प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों की यात्रा करने का सपना देखने वाले यात्रियों के लिए भारतीय रेलवे खास टूर पैकेज लेकर आया है। भारत गौरव ट्रेन के जरिए यात्रियों को एक ही यात्रा में दक्षिण भारत के कई प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों की सैर कराई जाएगी। खास बात यह है कि इस यात्रा के दौरान यात्रियों को अलग अलग जगहों पर ट्रेन टिकट होटल और स्थानीय परिवहन की व्यवस्था करने की परेशानी नहीं उठानी होगी। रेलवे की ओर से तैयार किए गए इस पैकेज में यात्रा के साथ रहने खाने और साइटसीइंग जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं।

    यह विशेष भारत गौरव ट्रेन उत्तर भारत से दक्षिण भारत की यात्रा के लिए संचालित की जाएगी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ट्रेन 14 नवंबर को अपनी यात्रा शुरू करेगी और 26 नवंबर को वापस जम्मू पहुंचेगी। यानी यात्रियों को करीब 12 रात और 13 दिन की लंबी यात्रा का अनुभव मिलेगा। इस दौरान ट्रेन दक्षिण भारत के पांच प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों को कवर करेगी। यह पैकेज खास तौर पर उन यात्रियों के लिए सुविधाजनक हो सकता है जो एक साथ कई प्रसिद्ध मंदिरों और पर्यटन स्थलों की यात्रा करना चाहते हैं।

    इस यात्रा में रामेश्वरम सबसे प्रमुख पड़ावों में शामिल है। यहां यात्री प्रसिद्ध श्री रामनाथ स्वामी मंदिर के दर्शन कर सकेंगे। इसके बाद मदुरई में ऐतिहासिक और प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर की यात्रा कराई जाएगी। कन्याकुमारी में यात्रियों को विभिन्न प्रमुख पर्यटन स्थलों को देखने का अवसर मिलेगा। यात्रा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव तिरुपति होगा जहां श्रद्धालु भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के दर्शन कर सकेंगे। इसके अलावा मार्कापुर में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के दर्शन भी इस यात्रा का हिस्सा होंगे।

    रेलवे ने यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इस पैकेज में अलग अलग श्रेणियां रखी हैं। यात्री अपनी सुविधा और बजट के अनुसार सेकंड एसी थर्ड एसी और इकोनॉमिक कैटेगरी में बुकिंग कर सकते हैं। सेकंड एसी को कंफर्ट कैटेगरी में रखा गया है जिसका किराया 56830 रुपये बताया गया है। थर्ड एसी स्टैंडर्ड कैटेगरी का किराया 42605 रुपये है जबकि इकोनॉमिक कैटेगरी के लिए यात्रियों को 26895 रुपये खर्च करने होंगे।

    इस टूर पैकेज की खासियत सिर्फ ट्रेन यात्रा नहीं है। बुकिंग कराने वाले यात्रियों को कन्फर्म ट्रेन टिकट के साथ यात्रा के दौरान नाश्ता और दो वक्त का भोजन उपलब्ध कराया जाएगा। इसके अलावा होटल में ठहरने और प्रमुख स्थलों की साइटसीइंग की सुविधा भी पैकेज में शामिल है। इससे यात्रियों को हर शहर में अलग से होटल और वाहन तलाशने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

    दरअसल कई धार्मिक स्थलों की यात्रा करने में सबसे बड़ी परेशानी अलग अलग ट्रेनों की बुकिंग और कनेक्टिंग यात्रा होती है। इसके बाद होटल और स्थानीय परिवहन की व्यवस्था भी यात्रियों के लिए चुनौती बन जाती है। भारत गौरव ट्रेन का यह पैकेज इसी परेशानी को कम करने की कोशिश है। एक तय कार्यक्रम के तहत यात्री कई प्रमुख स्थलों की यात्रा कर सकेंगे और सफर से जुड़ी कई जरूरी व्यवस्थाएं पहले से पैकेज में शामिल रहेंगी। इच्छुक यात्रियों के लिए यह दक्षिण भारत की धार्मिक और पर्यटन यात्रा को आसान बनाने वाला विकल्प साबित हो सकता है।

  • किशोरों में चिड़चिड़ापन और नींद की समस्या को न करें नजरअंदाज, जानें स्ट्रेस और एंग्जाइटी के प्रमुख संकेत

    किशोरों में चिड़चिड़ापन और नींद की समस्या को न करें नजरअंदाज, जानें स्ट्रेस और एंग्जाइटी के प्रमुख संकेत


    नई दिल्ली । किशोरावस्था में बच्चों के व्यवहार में बदलाव को कई बार सामान्य मूड स्विंग मान लिया जाता है, लेकिन लगातार चिड़चिड़ापन, गुस्सा, बेचैनी, नींद में बदलाव और पढ़ाई से दूरी तनाव या एंग्जाइटी के संकेत हो सकते हैं। बच्चों और किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां हमेशा सीधे शब्दों में सामने नहीं आतीं। कई बच्चे अपनी भावनाओं और परेशानियों को ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते, इसलिए माता-पिता के लिए उनके व्यवहार और रोजमर्रा की गतिविधियों में होने वाले बदलावों पर ध्यान देना जरूरी है।

    किशोरावस्था में पढ़ाई और परीक्षा का दबाव, भविष्य को लेकर चिंता, दोस्तों के बीच स्वीकार्यता की चिंता, पारिवारिक तनाव और बुलिंग जैसी परिस्थितियां मानसिक दबाव बढ़ा सकती हैं। इस उम्र में मूड में बदलाव या कभी-कभी चिड़चिड़ापन होना सामान्य हो सकता है, लेकिन जब ये समस्याएं लगातार बनी रहें और बच्चे की पढ़ाई, नींद, सामाजिक जीवन या दैनिक गतिविधियों को प्रभावित करने लगें, तब इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों और किशोरों में तनाव और चिंता होना अपने आप में असामान्य नहीं है। चिंता तब चिंता का विषय बनती है, जब वह लंबे समय तक बनी रहे या बच्चे की सामान्य जिंदगी में बाधा डालने लगे। किशोर में लगातार बेचैनी, किसी बात को लेकर अत्यधिक चिंता, बार-बार आश्वासन मांगना या ऐसी परिस्थितियों से बचना जिनमें वह पहले सामान्य रूप से शामिल होता था, एंग्जाइटी से जुड़े संकेत हो सकते हैं।

    माता-पिता को बच्चे के व्यवहार में अचानक आए बदलावों पर विशेष नजर रखनी चाहिए। अगर बच्चा पहले की तुलना में छोटी-छोटी बातों पर अधिक गुस्सा करने या झल्लाने लगा है, तो इसके पीछे केवल अनुशासन या जिद को कारण मानना उचित नहीं है। लगातार चिड़चिड़ापन कई बार बच्चे के भीतर चल रहे तनाव या भावनात्मक परेशानी का संकेत हो सकता है।

    दोस्तों और परिवार से दूरी बनाना भी एक महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है। यदि बच्चा सामाजिक गतिविधियों से बचने लगे, पहले पसंद आने वाली चीजों में रुचि कम हो जाए या वह ज्यादातर समय अकेले रहना पसंद करने लगे, तो माता-पिता को उससे शांत तरीके से बातचीत करने की कोशिश करनी चाहिए।

    नींद में बदलाव भी मानसिक तनाव से जुड़ा हो सकता है। सोने में परेशानी, रात में बार-बार जागना या जरूरत से ज्यादा सोना ऐसे बदलाव हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसी तरह बार-बार सिरदर्द, पेट दर्द, मितली या शरीर से जुड़ी अन्य शिकायतें भी कभी-कभी तनाव और चिंता के साथ दिखाई दे सकती हैं। हालांकि इन शारीरिक लक्षणों के दूसरे कारण भी हो सकते हैं, इसलिए इन्हें केवल मानसिक स्वास्थ्य समस्या मानकर नहीं चलना चाहिए।

    पढ़ाई या स्कूल से अचानक दूरी बनाना भी माता-पिता के लिए संकेत हो सकता है। परीक्षा का डर, पढ़ाई का दबाव, सामाजिक परेशानी या बुलिंग जैसी स्थितियां बच्चे के स्कूल जाने और पढ़ाई करने के तरीके को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे समय में बच्चे को डांटने के बजाय उसकी परेशानी समझने की कोशिश करना अधिक जरूरी है।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे को यह भरोसा दिलाया जाए कि उसकी बात ध्यान से सुनी जाएगी और उसकी परेशानी के लिए उसे तुरंत दोषी नहीं ठहराया जाएगा। माता-पिता को बिना दबाव बनाए बातचीत करनी चाहिए और बच्चे की भावनाओं को गंभीरता से लेना चाहिए। यदि तनाव या चिंता लंबे समय तक बनी रहती है या बच्चे की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगती है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या चिकित्सक से सलाह लेना उचित है। समय पर सहायता मिलने से समस्या को समझने और बच्चे को बेहतर तरीके से संभालने में मदद मिल सकती है।

  • मलेरिया कब बन सकता है जानलेवा? बुखार से लेकर बेहोशी तक इन संकेतों को पहचानें, डॉक्टर ने बताई जरूरी सावधानियां

    मलेरिया कब बन सकता है जानलेवा? बुखार से लेकर बेहोशी तक इन संकेतों को पहचानें, डॉक्टर ने बताई जरूरी सावधानियां


    नई दिल्ली । मानसून के मौसम में मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है और इनमें मलेरिया एक ऐसी बीमारी है जिसे नजरअंदाज करना कई बार गंभीर पड़ सकता है। तेज बुखार ठंड लगना कंपकंपी सिरदर्द और कमजोरी जैसे लक्षण अक्सर सामान्य वायरल संक्रमण जैसे लगते हैं लेकिन यही संकेत मलेरिया की शुरुआत भी हो सकते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बुखार के साथ ठंड और कंपकंपी महसूस हो रही है तो इसे हल्के में लेने के बजाय डॉक्टर की सलाह लेकर समय पर जांच करानी चाहिए।

    मलेरिया संक्रमित मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से फैलने वाला परजीवी संक्रमण है। इसकी शुरुआत कई बार सामान्य बुखार की तरह होती है जिसके कारण लोग इसे वायरल फीवर समझकर घर पर ही इलाज शुरू कर देते हैं। डॉक्टरों के अनुसार तेज बुखार के साथ सिरदर्द ठंड लगना कंपकंपी कमजोरी मतली या उल्टी जैसे लक्षण दिखाई दें तो सतर्क हो जाना चाहिए। केवल लक्षणों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि व्यक्ति को मलेरिया है या नहीं इसलिए समय पर जांच कराना सबसे जरूरी कदम माना जाता है।

    विशेषज्ञों की सलाह है कि मलेरिया का संदेह होने पर खुद से एंटी मलेरियल दवा शुरू नहीं करनी चाहिए। बिना जांच और डॉक्टर की सलाह के दवा लेने से सही बीमारी की पहचान में देरी हो सकती है और स्वास्थ्य संबंधी दूसरी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं। डॉक्टर जांच के परिणाम और मरीज की स्थिति के आधार पर बीमारी का प्रकार तथा सही इलाज तय करते हैं। समय रहते मलेरिया की पहचान हो जाए और उचित उपचार शुरू कर दिया जाए तो गंभीर जटिलताओं के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    इलाज शुरू होने के बाद भी मरीजों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है। कई बार दवा लेने के बाद बुखार या कमजोरी कम होने लगती है और मरीज खुद को ठीक मानकर दवा बीच में ही बंद कर देते हैं। ऐसा करना खतरनाक हो सकता है। डॉक्टर की सलाह के बिना दवा की मात्रा कम या ज्यादा करना और इलाज की अवधि बदलना भी उचित नहीं है। मलेरिया का उपचार मरीज की स्थिति और संक्रमण के प्रकार के अनुसार तय किया जाता है इसलिए पूरी दवा और डॉक्टर की सलाह का पालन करना जरूरी है।

    कुछ लक्षण ऐसे हैं जिन्हें मलेरिया की गंभीर स्थिति का संकेत माना जा सकता है। अत्यधिक कमजोरी बार बार उल्टी होना सांस लेने में परेशानी पेशाब की मात्रा बहुत कम हो जाना असामान्य रक्तस्राव चेतना या व्यवहार में बदलाव भ्रम बेहोशी और दौरे पड़ना जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत अस्पताल जाना चाहिए। गंभीर मामलों में शरीर के कई अंगों पर असर पड़ सकता है इसलिए ऐसे संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    छोटे बच्चों विशेषकर पांच साल से कम उम्र के बच्चों और गर्भवती महिलाओं में मलेरिया को लेकर अधिक सतर्क रहने की जरूरत होती है। कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में भी संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है। इसलिए बुखार लंबे समय तक बना रहे या अचानक हालत बिगड़ने लगे तो घरेलू उपचार पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से संपर्क करना बेहतर है।

    मलेरिया से बचाव के लिए मच्छरों से सुरक्षा भी बेहद जरूरी है। घर और आसपास पानी जमा न होने दें मच्छरदानी का इस्तेमाल करें और खासकर शाम तथा रात के समय मच्छरों के काटने से बचाव करें। याद रखें तेज बुखार और कंपकंपी को सामान्य समझकर टालना सही नहीं है। समय पर जांच सही इलाज और गंभीर लक्षणों पर तुरंत अस्पताल पहुंचना ही मलेरिया से होने वाले बड़े खतरे को कम करने का सबसे सुरक्षित तरीका है

  • चेहरे की डलनेस और टैनिंग से परेशान हैं तो आजमाएं पपीता: जानें त्वचा को ग्लो देने का आसान और असरदार तरीका

    चेहरे की डलनेस और टैनिंग से परेशान हैं तो आजमाएं पपीता: जानें त्वचा को ग्लो देने का आसान और असरदार तरीका


    नई दिल्ली । चेहरे की खूबसूरती और त्वचा की चमक बनाए रखने के लिए लोग अक्सर महंगे स्किन केयर प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं लेकिन कई बार घर में मौजूद सामान्य चीजें भी त्वचा की देखभाल में मददगार साबित हो सकती हैं। पपीता इन्हीं चीजों में शामिल है। यह स्वादिष्ट फल सेहत के साथ त्वचा के लिए भी उपयोगी माना जाता है। इसमें पपेन नामक एंजाइम और कई पोषक तत्व पाए जाते हैं जो त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाने में मदद कर सकते हैं। यही वजह है कि पपीते का इस्तेमाल कई घरेलू स्किन केयर रूटीन में किया जाता है।

    अगर त्वचा बेजान नजर आती है या चेहरे पर जमा डेड स्किन के कारण प्राकृतिक चमक कम हो गई है तो पके हुए पपीते का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए पपीते को अच्छी तरह मैश करके चेहरे पर हल्की परत के रूप में लगाया जा सकता है। इसे आंखों और होंठों के आसपास लगाने से बचना चाहिए। कुछ मिनट बाद चेहरे को सामान्य पानी से साफ किया जा सकता है। इसके बाद त्वचा पर हल्का मॉइस्चराइजर लगाना बेहतर रहता है। पपीते में मौजूद एंजाइम त्वचा की ऊपरी परत पर मौजूद मृत कोशिकाओं को हटाने में मदद कर सकते हैं जिससे चेहरा साफ और मुलायम महसूस हो सकता है।

    पपीते को शहद या दही जैसी चीजों के साथ मिलाकर फेस पैक के रूप में इस्तेमाल करने का चलन भी है। शहद त्वचा को मॉइस्चराइज करने में मदद कर सकता है जबकि दही में मौजूद लैक्टिक एसिड त्वचा को एक्सफोलिएट करने में सहायक हो सकता है। हालांकि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है इसलिए किसी भी घरेलू नुस्खे को पूरे चेहरे पर लगाने से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है। खासतौर पर संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।

    पपीते का इस्तेमाल करते समय यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इसे बहुत ज्यादा देर तक चेहरे पर लगाकर न रखें। बार बार या जरूरत से ज्यादा एक्सफोलिएशन करने से त्वचा में जलन और रूखापन बढ़ सकता है। अगर चेहरे पर पहले से कट लगा हो या त्वचा पर जलन हो रही हो तो ऐसे समय में पपीते का प्रयोग करने से बचना चाहिए। किसी नए स्किन केयर उपाय को अपनाते समय त्वचा की प्रतिक्रिया पर नजर रखना सबसे जरूरी है।

    अगर चेहरे की देखभाल के साथ पपीते को डाइट में भी शामिल किया जाए तो यह संतुलित खानपान का हिस्सा बन सकता है। इसमें विटामिन ए और विटामिन सी जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि केवल पपीता खाने या चेहरे पर लगाने से त्वचा की सभी समस्याएं खत्म होने की गारंटी नहीं है। लगातार मुंहासे दाग धब्बे खुजली या गंभीर त्वचा समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर होता है। सही स्किन केयर रूटीन संतुलित खानपान पर्याप्त पानी और धूप से बचाव के साथ त्वचा को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है।

  • रात में अचानक पैर पकड़ लेता है दर्द तो न करें नजरअंदाज, इन पोषक तत्वों की कमी हो सकती है वजह

    रात में अचानक पैर पकड़ लेता है दर्द तो न करें नजरअंदाज, इन पोषक तत्वों की कमी हो सकती है वजह


    नई दिल्ली। पैरों में दर्द होना आम समस्या है लेकिन अगर बिना किसी चोट या ज्यादा मेहनत के अचानक पैर में दर्द ऐंठन या खिंचाव होने लगे तो इसे सिर्फ सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार शरीर में जरूरी विटामिन और मिनरल्स की कमी का असर मांसपेशियों और नसों पर पड़ सकता है। खासतौर पर बार बार होने वाली ऐंठन या दर्द शरीर में पोषण से जुड़ी किसी कमी की ओर इशारा कर सकता है। हालांकि पैर में दर्द के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं इसलिए लगातार परेशानी रहने पर डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।

    विटामिन डी शरीर में हड्डियों के साथ मांसपेशियों और नसों के सामान्य कामकाज के लिए भी जरूरी माना जाता है। इसकी कमी होने पर शरीर में कमजोरी और दर्द जैसी शिकायत हो सकती है। कुछ लोगों में पैरों के अलावा कमर और पीठ में भी दर्द महसूस हो सकता है। शरीर को विटामिन डी का एक प्रमुख स्रोत सूर्य की रोशनी है। इसके अलावा डाइट और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट के जरिए इसकी कमी को दूर किया जा सकता है। बिना जांच के खुद से हाई डोज सप्लीमेंट लेना उचित नहीं है।

    कैल्शियम को आमतौर पर हड्डियों की मजबूती से जोड़कर देखा जाता है लेकिन इसका संबंध मांसपेशियों के सामान्य संकुचन और तंत्रिका तंत्र के कामकाज से भी है। शरीर में कैल्शियम का स्तर कम होने पर कुछ लोगों को मांसपेशियों में खिंचाव ऐंठन या असहजता महसूस हो सकती है। डाइट में दूध दही पनीर तिल और कैल्शियम से भरपूर अन्य खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं। अगर किसी व्यक्ति में लगातार कमी बनी हुई है तो डॉक्टर उचित जांच के बाद इसकी वजह और उपचार तय कर सकते हैं।

    विटामिन बी12 की कमी भी नसों से जुड़ी परेशानियों का कारण बन सकती है। इसकी कमी होने पर हाथ पैर में झनझनाहट सुन्नपन कमजोरी या असामान्य संवेदनाएं महसूस हो सकती हैं। कुछ लोगों को पैरों में खिंचाव या दर्द की शिकायत भी हो सकती है। खासकर लंबे समय से बनी रहने वाली ऐसी समस्या को नजरअंदाज करने के बजाय इसकी सही वजह पता करना जरूरी है। विटामिन बी12 मुख्य रूप से दूध अंडे मांस और मछली जैसे खाद्य पदार्थों में पाया जाता है। शाकाहारी लोगों में इसके स्रोत सीमित होने के कारण डॉक्टर की सलाह से इसकी जांच और जरूरत के अनुसार सप्लीमेंट की सलाह दी जा सकती है।

    पैरों में अचानक ऐंठन और दर्द का कारण सिर्फ विटामिन या मिनरल्स की कमी ही नहीं होता। शरीर में पानी की कमी लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहना अधिक शारीरिक गतिविधि मांसपेशियों पर दबाव या कुछ दवाओं के प्रभाव से भी ऐसी परेशानी हो सकती है। इसलिए केवल लक्षण देखकर किसी एक पोषक तत्व की कमी मान लेना सही नहीं है।

    शरीर को जरूरी पोषक तत्व देने के लिए संतुलित आहार लेना सबसे महत्वपूर्ण है। खाने में हरी सब्जियां मौसमी फल दूध दही अंडे दालें सूखे मेवे और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल करें। पर्याप्त पानी पीना और नियमित हल्की एक्सरसाइज भी शरीर को सक्रिय रखने में मदद कर सकती है। अगर पैर का दर्द बार बार हो रहा है रात में लगातार ऐंठन होती है पैर में सुन्नपन या कमजोरी रहती है या दर्द काफी ज्यादा है तो डॉक्टर से संपर्क करना बेहतर होगा। जरूरत पड़ने पर जांच के जरिए विटामिन और मिनरल्स के स्तर के साथ समस्या की दूसरी संभावित वजहों का भी पता लगाया जा सकता है।

  • घंटों लगातार बैठे रहना पड़ सकता है भारी, हर अतिरिक्त घंटे से कैंसर से मौत का खतरा

    घंटों लगातार बैठे रहना पड़ सकता है भारी, हर अतिरिक्त घंटे से कैंसर से मौत का खतरा

    लंदन। लंबे समय तक लगातार बैठे रहने की आदत को लेकर एक बड़े अध्ययन में चौंकाने वाली बात सामने आई है। शोध के मुताबिक, रोजाना बिना ब्रेक लंबे समय तक बैठे रहने की अवधि में हर अतिरिक्त एक घंटा कैंसर से मौत के 9% अधिक जोखिम से जुड़ा पाया गया। वहीं, बैठने के समय के एक घंटे को हल्की शारीरिक गतिविधि से बदलने पर कैंसर से मौत का जोखिम 12% कम देखा गया।

    यह अध्ययन ग्लासगो विश्वविद्यालय के फ्रेडरिक हो और उनके सहयोगियों ने किया है। शोध में लगातार बैठे रहने और कैंसर से जुड़े कई स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध का विश्लेषण किया गया।

    सिर्फ कैंसर से मौत ही नहीं, कई प्रकार के कैंसर से संबंध

    अध्ययन में लंबे समय तक लगातार बैठे रहने और कैंसर से मृत्यु के बढ़े जोखिम के बीच संबंध पाया गया। इसके अलावा, कुल कैंसर होने तथा मोटापे से जुड़े कई कैंसर के मामलों से भी लंबे समय तक बैठे रहने का संबंध सामने आया।

    इनमें भोजन नली, यकृत, गुर्दे, अग्न्याशय, बड़ी आंत, स्तन, अंडाशय और थायरॉयड से जुड़े कैंसर शामिल थे।

    एक घंटे बैठने की जगह हल्की गतिविधि से फायदा

    अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी रहा कि लगातार बैठे रहने के समय को हल्की शारीरिक गतिविधि से बदलने पर जोखिम कम होने का संबंध पाया गया। शोध के मुताबिक, यदि लगातार बैठने के एक घंटे की जगह हल्की गतिविधि की जाए तो कैंसर से मौत का जोखिम 12% तक कम पाया गया।

    इससे संकेत मिलता है कि रोजमर्रा की दिनचर्या में बहुत कठिन व्यायाम के बजाय छोटी-छोटी शारीरिक गतिविधियों को शामिल करना भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

    बीच-बीच में उठना बन सकता है बचाव का तरीका

    शोध में लगातार बैठने की अवधि को बीच-बीच में हल्की गतिविधि से तोड़ने के भी सकारात्मक संकेत मिले। ऐसा करने पर अध्ययन में शामिल सभी प्रमुख स्वास्थ्य परिणामों में जोखिम कम होने का संबंध पाया गया।

    यानी लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहने के बजाय समय-समय पर उठना, कुछ कदम चलना या हल्की गतिविधि करना शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है।

    क्या संदेश देता है अध्ययन?

    अध्ययन के निष्कर्ष लंबे समय तक बैठे रहने वाली आधुनिक जीवनशैली पर ध्यान देने की जरूरत बताते हैं। खासकर उन लोगों के लिए जो काम, यात्रा या अन्य कारणों से दिन का बड़ा हिस्सा लगातार बैठे हुए बिताते हैं, बैठने के लंबे दौर को बीच-बीच में हल्की गतिविधि से तोड़ना महत्वपूर्ण हो सकता है।

    हालांकि, अध्ययन में सामने आए आंकड़े संबंध (association) को दर्शाते हैं; इन्हें यह साबित करने के तौर पर नहीं पढ़ना चाहिए कि लगातार बैठना अकेले ही कैंसर का कारण बनता है।

  • बारिश में बढ़ जाता है स्किन इंफेक्शन का खतरा, नमी और पसीने से बचने के लिए अपनाएं ये उपाय

    बारिश में बढ़ जाता है स्किन इंफेक्शन का खतरा, नमी और पसीने से बचने के लिए अपनाएं ये उपाय


    नई दिल्ली। बारिश का मौसम गर्मी से राहत जरूर देता है लेकिन इस दौरान त्वचा को अतिरिक्त देखभाल की जरूरत पड़ती है। वातावरण में नमी बढ़ने के कारण पसीना ज्यादा आता है और त्वचा लंबे समय तक नम बनी रह सकती है। ऐसी स्थिति में बैक्टीरिया और फंगस के बढ़ने का खतरा भी बढ़ जाता है। यही वजह है कि मानसून के दौरान कई लोगों को दाद खाज खुजली लाल चकत्ते जलन और त्वचा पर छोटे छोटे दाने जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अगर समय रहते त्वचा की सफाई और देखभाल पर ध्यान दिया जाए तो इन समस्याओं को काफी हद तक दूर रखा जा सकता है।

    मानसून में सबसे जरूरी है कि शरीर को साफ और सूखा रखा जाए। बारिश में भीगने के बाद गीले कपड़ों में ज्यादा देर तक रहने से त्वचा पर नमी बनी रहती है और फंगल इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए बारिश में भीगने के बाद जल्द से जल्द कपड़े बदलने चाहिए। खासतौर पर अंडरआर्म्स जांघों के बीच पैर की उंगलियों के बीच और शरीर की उन जगहों को अच्छी तरह सुखाना चाहिए जहां पसीना ज्यादा आता है। गीले मोजे और जूते भी लंबे समय तक पहनने से बचना चाहिए।

    त्वचा की सफाई के लिए बहुत ज्यादा तेज साबुन या ऐसे उत्पादों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए जो त्वचा को अत्यधिक रूखा बना दें। अपनी त्वचा के प्रकार के अनुसार हल्के क्लीनजर का इस्तेमाल किया जा सकता है। चेहरा धोने के बाद उसे साफ तौलिए से धीरे से सुखाना जरूरी है। तौलिए को नियमित रूप से धोकर अच्छी तरह सुखाएं और कोशिश करें कि अपना तौलिया किसी दूसरे व्यक्ति के साथ साझा न करें।

    मानसून में त्वचा को मॉइस्चराइज करना भी जरूरी है। कई लोग सोचते हैं कि नमी वाले मौसम में मॉइस्चराइजर की जरूरत नहीं होती लेकिन ऐसा नहीं है। त्वचा की जरूरत के अनुसार हल्का और नॉन कॉमेडोजेनिक मॉइस्चराइजर इस्तेमाल किया जा सकता है। बाहर निकलते समय मौसम बादलों वाला हो तब भी सनस्क्रीन लगाना उपयोगी रहता है क्योंकि सूर्य की पराबैंगनी किरणों का असर बादलों के बीच से भी हो सकता है।

    अगर त्वचा पर लगातार खुजली होने लगे गोल आकार के लाल चकत्ते दिखाई दें त्वचा पर जलन बढ़ती जाए या समस्या बार बार वापस आए तो इसे सामान्य खुजली समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बिना चिकित्सकीय सलाह के किसी भी तेज दवा या स्टेरॉयड वाली क्रीम का इस्तेमाल करना नुकसानदायक हो सकता है। गलत क्रीम से त्वचा की समस्या दबने के बजाय और जटिल हो सकती है।

    इसके अलावा मानसून में बहुत ज्यादा तंग कपड़े पहनने से भी बचना चाहिए। सूती और आरामदायक कपड़े त्वचा को हवा मिलने में मदद करते हैं। रोजाना पर्याप्त पानी पीना संतुलित आहार लेना और शरीर की स्वच्छता बनाए रखना भी त्वचा को स्वस्थ रखने में मदद करता है। थोड़ी सी सावधानी और नियमित देखभाल से बारिश के मौसम में त्वचा को संक्रमण और दूसरी परेशानियों से बचाया जा सकता है।

  • एंटीबायोटिक बेअसर तो जान पर भारी संक्रमण! 1.59 लाख मरीजों पर ICMR की रिसर्च में सामने आया गंभीर खतरा

    एंटीबायोटिक बेअसर तो जान पर भारी संक्रमण! 1.59 लाख मरीजों पर ICMR की रिसर्च में सामने आया गंभीर खतरा


    नई दिल्ली। एंटीबायोटिक दवाएं गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन के इलाज में बेहद अहम मानी जाती हैं लेकिन जब बैक्टीरिया इन दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी हो जाते हैं तो इलाज की चुनौती काफी बढ़ जाती है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च यानी ICMR से जुड़े शोधकर्ताओं की बड़ी स्टडी में सामने आया है कि कार्बापेनेम एंटीबायोटिक्स के खिलाफ रेजिस्टेंस रखने वाले ग्राम नेगेटिव बैक्टीरिया से संक्रमित मरीजों में मौत का खतरा अधिक हो सकता है। ऐसे संक्रमण न केवल मरीज की हालत को गंभीर बना सकते हैं बल्कि इलाज की अवधि और दवाओं पर होने वाले खर्च को भी बढ़ा सकते हैं।

    ग्राम नेगेटिव बैक्टीरिया शरीर के अलग अलग हिस्सों में संक्रमण फैला सकते हैं। इनमें ई कोलाई क्लेबसिएला न्यूमोनिया एसिनेटोबैक्टर बाउमानी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा जैसे बैक्टीरिया शामिल हैं। ये फेफड़ों पेशाब की नली घाव और खून में संक्रमण का कारण बन सकते हैं। गंभीर संक्रमण के मामलों में कार्बापेनेम जैसी शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन जब बैक्टीरिया इन दवाओं के खिलाफ भी रेजिस्टेंट हो जाते हैं तो डॉक्टरों के पास प्रभावी उपचार के विकल्प सीमित हो सकते हैं।

    शोधकर्ताओं ने अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच देश के 20 बड़े अस्पतालों में भर्ती 1 लाख 59 हजार 336 मरीजों के आंकड़ों का अध्ययन किया। इनमें 26 हजार 213 मरीजों में ग्राम नेगेटिव बैक्टीरिया से संक्रमण की पुष्टि हुई। इनमें 16 हजार 25 मरीज यानी करीब 61.1 प्रतिशत ऐसे थे जिनमें संक्रमण कार्बापेनेम एंटीबायोटिक्स के खिलाफ रेजिस्टेंट पाया गया। इस अंतर ने एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को लेकर गंभीर चिंता सामने रखी है।

    स्टडी के आंकड़ों में मौत का अंतर भी स्पष्ट नजर आया। ई कोलाई से संक्रमित मरीजों में कार्बापेनेम रेजिस्टेंट संक्रमण की स्थिति में मृत्यु दर 24.4 प्रतिशत रही जबकि दवा के प्रति संवेदनशील संक्रमण में यह 17.3 प्रतिशत थी। क्लेबसिएला न्यूमोनिया के मामले में मृत्यु दर क्रमशः 31.2 और 23.5 प्रतिशत रही। एसिनेटोबैक्टर बाउमानी में यह आंकड़ा 37.9 और 32.8 प्रतिशत जबकि स्यूडोमोनास एरुजिनोसा में 28.9 और 20.2 प्रतिशत रहा।

    खतरा तब और बढ़ जाता है जब संक्रमण खून तक पहुंच जाता है। ऐसे मामलों में रेजिस्टेंट बैक्टीरिया से संक्रमित मरीजों में मृत्यु दर कई मामलों में काफी अधिक देखी गई। शोध के मुताबिक इन चारों बैक्टीरिया से होने वाले रक्त संक्रमणों में 85 प्रतिशत से ज्यादा मामले अस्पताल से जुड़े संक्रमण थे। इससे अस्पतालों में साफ सफाई संक्रमण नियंत्रण और मेडिकल उपकरणों के सुरक्षित इस्तेमाल की अहमियत सामने आती है।

    एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का असर मरीज की जेब पर भी पड़ सकता है। रिसर्च में रेजिस्टेंट संक्रमण के इलाज में एंटीबायोटिक दवाओं का खर्च सामान्य संक्रमण की तुलना में लगभग 1.1 से 2 गुना तक ज्यादा पाया गया। हालांकि इसमें अस्पताल में भर्ती रहने कमरे जांच और अन्य चिकित्सा सेवाओं का खर्च शामिल नहीं था इसलिए वास्तविक आर्थिक बोझ इससे अधिक हो सकता है।

    विशेषज्ञों के लिए यह रिसर्च इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस केवल इलाज की समस्या नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। बिना जरूरत एंटीबायोटिक लेना दवाओं का गलत इस्तेमाल और संक्रमण नियंत्रण में लापरवाही बैक्टीरिया में प्रतिरोध बढ़ाने में भूमिका निभा सकती है। ऐसे में डॉक्टर की सलाह के बिना एंटीबायोटिक लेने से बचना सही जांच के बाद उचित दवा का इस्तेमाल करना और अस्पतालों में संक्रमण रोकने के उपायों को मजबूत करना बेहद जरूरी है।

  • मच्छर को कैसे पता चलता है किस इंसान को काटना है IIT कानपुर की रिसर्च से खुलेगा राज

    मच्छर को कैसे पता चलता है किस इंसान को काटना है IIT कानपुर की रिसर्च से खुलेगा राज


    नई दिल्ली। बारिश और उमस के मौसम में मच्छरों की परेशानी बढ़ जाती है। अक्सर आपने भी महसूस किया होगा कि एक ही कमरे में कई लोग बैठे हों तो मच्छर किसी एक व्यक्ति के आसपास ज्यादा मंडराते हैं जबकि दूसरे व्यक्ति को लगभग छोड़ देते हैं। आखिर मच्छर किस आधार पर अपना शिकार चुनता है। क्या वह इंसानों के बीच अंतर कर सकता है। क्या शरीर की गंध उसे किसी खास व्यक्ति की तरफ खींचती है। इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए IIT कानपुर के वैज्ञानिक मच्छर के दिमाग और उसकी गंध पहचानने की क्षमता का अध्ययन कर रहे हैं।

    यह रिसर्च IIT कानपुर के मेहता फैमिली सेंटर फॉर इंजीनियरिंग इन मेडिसिन में प्रोफेसर नितिन गुप्ता की लैब में की जा रही है। वैज्ञानिक यह समझना चाहते हैं कि मच्छर इंसान के शरीर से निकलने वाली गंध को किस तरह पहचानता है। इसके बाद उस गंध से जुड़ी जानकारी उसके दिमाग तक कैसे पहुंचती है और मच्छर इसी सूचना के आधार पर किसी व्यक्ति की ओर जाने का फैसला कैसे करता है। इस अध्ययन का उद्देश्य मच्छर के व्यवहार के पीछे काम करने वाली पूरी जैविक प्रक्रिया को समझना है।

    रिसर्च में खास तौर पर Aedes aegypti मच्छर पर ध्यान दिया जा रहा है। यह मच्छर डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैज्ञानिक यह पता लगाना चाहते हैं कि कुछ लोग मच्छरों को ज्यादा आकर्षित क्यों करते हैं जबकि कुछ लोगों की ओर उनका आकर्षण अपेक्षाकृत कम होता है। इसके पीछे इंसान के शरीर से निकलने वाले अलग अलग रासायनिक संकेतों की भूमिका हो सकती है।

    इंसान के शरीर की गंध केवल पसीने से नहीं बनती। त्वचा पर रहने वाले सूक्ष्म जीव भी अलग अलग रसायन पैदा करते हैं और शरीर की कुल गंध को प्रभावित करते हैं। हर व्यक्ति की शरीर की गंध एक जैसी नहीं होती। यही अंतर मच्छरों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। वैज्ञानिक अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि कौन सी गंध मच्छर को इंसान की तरफ आकर्षित करती है और कौन से संकेत उसे किसी व्यक्ति से दूर कर सकते हैं।

    मच्छर के शरीर पर मौजूद विशेष सेंसर आसपास के रासायनिक संकेतों को पहचानते हैं। इन संकेतों की जानकारी उसके दिमाग तक पहुंचती है जहां गंध से जुड़ी सूचनाओं को प्रोसेस किया जाता है। वैज्ञानिक इसी कनेक्शन का अध्ययन कर रहे हैं। आसान भाषा में समझें तो शोधकर्ता यह जानना चाहते हैं कि मच्छर क्या सूंघता है। उसका दिमाग उस गंध को कैसे समझता है और इसके बाद वह किस दिशा में उड़ने या इंसान के पास जाने का फैसला करता है।

    इस रिसर्च में CRISPR Cas9 जैसी जेनेटिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इसकी मदद से मच्छर के कुछ खास जीन में बदलाव करके वैज्ञानिक यह देख सकते हैं कि उनका असर गंध पहचानने और मच्छर के व्यवहार पर किस तरह पड़ता है। इससे मच्छर की उस जैविक व्यवस्था को समझने में मदद मिल सकती है जिसके जरिए वह इंसान को खोजता है।

    अध्ययन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मादा मच्छर के खून पीने के बाद होने वाले व्यवहारिक बदलाव को समझना भी है। मादा मच्छर को अंडे विकसित करने के लिए खून की जरूरत होती है। खून पीने के बाद उसकी प्राथमिकता बदल जाती है। इसके बाद वह इंसान की तलाश करने के बजाय अंडे देने के लिए उपयुक्त जगह खोजने पर अधिक ध्यान देती है। वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इस बदलाव के दौरान मच्छर के दिमाग में क्या परिवर्तन होता है।

    इस रिसर्च का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां बड़ी स्वास्थ्य चुनौती हैं। अगर वैज्ञानिक यह समझने में सफल होते हैं कि मच्छर इंसान तक पहुंचने के लिए किन गंधों और संकेतों का इस्तेमाल करता है तो भविष्य में ऐसे तरीके विकसित किए जा सकते हैं जो इन संकेतों को बदल दें या मच्छर की पहचान प्रक्रिया को बाधित करें। इससे केवल मच्छर को मारने या भगाने के बजाय उसकी इंसान तक पहुंचने की प्रक्रिया को ही निशाना बनाया जा सकेगा।

    IIT कानपुर की यह रिसर्च अभी मच्छर की गंध पहचानने की क्षमता और उसके दिमाग में होने वाली गतिविधियों को समझने पर केंद्रित है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस अध्ययन से मच्छर के व्यवहार की बेहतर समझ विकसित होगी और भविष्य में डेंगू चिकनगुनिया जैसी बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए नए वैज्ञानिक उपाय खोजने में मदद मिल सकती है।

  • दाद को हर खुजली समझना पड़ सकता है भारी मानसून में ऐसे रखें त्वचा का ख्याल

    दाद को हर खुजली समझना पड़ सकता है भारी मानसून में ऐसे रखें त्वचा का ख्याल


    नई दिल्ली। बारिश का मौसम गर्मी से राहत जरूर देता है लेकिन इस दौरान त्वचा से जुड़ी कई परेशानियां भी बढ़ने लगती हैं। वातावरण में ज्यादा नमी और उमस के कारण पसीना जल्दी नहीं सूखता और त्वचा लंबे समय तक गीली बनी रह सकती है। यही वजह है कि मानसून में दाद फंगल इंफेक्शन और खुजली जैसी समस्याएं ज्यादा परेशान कर सकती हैं। खास बात यह है कि आम बोलचाल में दाद खाज और खुजली को अक्सर एक ही समस्या मान लिया जाता है जबकि इन तीनों शब्दों का मतलब और कारण हमेशा एक जैसा नहीं होता।

    दाद को आमतौर पर फंगल इंफेक्शन या रिंगवर्म के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें त्वचा पर गोल या चकत्ते जैसे निशान दिखाई दे सकते हैं। इन चकत्तों के किनारे लाल या थोड़े उभरे हुए हो सकते हैं और वहां काफी खुजली भी हो सकती है। दाद शरीर के अलग-अलग हिस्सों में हो सकता है और संक्रमित व्यक्ति के संपर्क या उसके व्यक्तिगत सामान के इस्तेमाल से फैलने का खतरा भी रहता है। इसलिए ऐसे लक्षण दिखाई देने पर इसे सामान्य खुजली समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    वहीं खाज शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग जगहों पर अलग अर्थ में किया जाता है। आम बोलचाल में इसका इस्तेमाल खुजली या खुजली वाली त्वचा की समस्या के लिए किया जाता है। केवल खाज होने की बात से यह तय नहीं किया जा सकता कि समस्या फंगल इंफेक्शन की ही है। इसके पीछे एलर्जी त्वचा में जलन फंगल संक्रमण या दूसरी वजहें भी हो सकती हैं। इसलिए सही कारण जानने के लिए लक्षणों पर ध्यान देना जरूरी है।

    खुजली खुद कोई बीमारी नहीं बल्कि एक लक्षण है। त्वचा में खुजली कई कारणों से हो सकती है। एलर्जी ड्राई स्किन पसीना फंगल इंफेक्शन कीड़े के काटने या त्वचा से जुड़ी दूसरी समस्याएं इसके पीछे हो सकती हैं। इसलिए हर तरह की खुजली को दाद मान लेना सही नहीं है। अगर खुजली के साथ गोल चकत्ते बन रहे हैं या निशान धीरे-धीरे फैल रहे हैं तो फंगल संक्रमण की संभावना हो सकती है और ऐसे में डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर रहता है।

    मानसून में फंगल इंफेक्शन का खतरा इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि गर्म और नम वातावरण फंगस के लिए अनुकूल माना जाता है। शरीर के ऐसे हिस्सों में समस्या ज्यादा हो सकती है जहां त्वचा आपस में रगड़ खाती है या जहां नमी लंबे समय तक बनी रहती है। बगल कमर जांघों के बीच और पैरों की उंगलियों के बीच का हिस्सा इसका उदाहरण है। गीले कपड़े मोजे और जूते लंबे समय तक पहने रहने से भी त्वचा पर नमी बनी रहती है।

    बारिश में भीगने के बाद सबसे जरूरी है कि गीले कपड़े जल्द से जल्द बदलें। शरीर को अच्छी तरह सुखाएं और उन हिस्सों पर विशेष ध्यान दें जहां नमी आसानी से जमा होती है। रोज साफ और सूखे मोजे पहनें और गीले जूतों को लंबे समय तक पहनने से बचें। बहुत ज्यादा टाइट कपड़े पहनने से भी बचना चाहिए क्योंकि इससे पसीना और नमी त्वचा के संपर्क में ज्यादा समय तक रह सकती है।

    व्यक्तिगत साफ-सफाई के साथ संक्रमण फैलने से रोकना भी जरूरी है। किसी दूसरे व्यक्ति का तौलिया कपड़े मोजे या निजी सामान इस्तेमाल करने से बचें। अगर त्वचा पर बने गोल चकत्ते लगातार बढ़ रहे हैं खुजली बहुत ज्यादा है या समस्या बार-बार लौट रही है तो त्वचा रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना समझदारी है।

    खास तौर पर बिना डॉक्टर की सलाह के ऐसी क्रीम लगाने से बचना चाहिए जिसमें स्टेरॉयड शामिल हो। गलत तरीके से इस्तेमाल करने पर ऐसी क्रीम फंगल इंफेक्शन के लक्षणों को बदल सकती है और समस्या को और जटिल बना सकती है। सही समय पर सही कारण की पहचान और उचित उपचार ही त्वचा की समस्या को बढ़ने से रोकने का बेहतर तरीका है। मानसून में त्वचा को सूखा साफ और सुरक्षित रखना दाद फंगल इंफेक्शन और कई तरह की खुजली से बचाव में मदद कर सकता है।