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  • रूखे और फ्रिजी बालों को मुलायम बनाने के लिए घर पर बनाएं ये 5 आसान हेयर मास्क, जानिए इस्तेमाल का तरीका

    रूखे और फ्रिजी बालों को मुलायम बनाने के लिए घर पर बनाएं ये 5 आसान हेयर मास्क, जानिए इस्तेमाल का तरीका

    नई दिल्ली । रूखे, बेजान और उलझे बाल अक्सर पूरे लुक को प्रभावित करते हैं। धूल मिट्टी, प्रदूषण, बार बार शैंपू करना, गर्म पानी, हीट स्टाइलिंग और बालों में नमी की कमी जैसी वजहों से बालों की प्राकृतिक चमक कम हो सकती है। ऐसे में बालों को मुलायम बनाए रखने के लिए नियमित देखभाल जरूरी है। इसके लिए हर बार महंगे हेयर ट्रीटमेंट कराने की जरूरत नहीं होती। घर में मौजूद कुछ सामान्य चीजों से भी आसान हेयर मास्क तैयार किए जा सकते हैं।

    बालों की जरूरत हर व्यक्ति में अलग होती है। किसी के बाल बहुत ज्यादा रूखे हो सकते हैं तो किसी का स्कैल्प तैलीय हो सकता है। इसलिए कोई भी घरेलू हेयर मास्क इस्तेमाल करने से पहले अपनी हेयर टाइप और संवेदनशीलता को ध्यान में रखना चाहिए। अगर किसी सामग्री से पहले एलर्जी या जलन हुई है तो उसका इस्तेमाल करने से बचना बेहतर है।

    एलोवेरा और दही का मास्क रूखे बालों के लिए एक आसान विकल्प हो सकता है। इसे तैयार करने के लिए दो चम्मच एलोवेरा जेल और दो चम्मच सादा दही मिलाकर चिकना पेस्ट बना लें। इस मिश्रण को बालों की लंबाई पर लगाएं और करीब 20 मिनट के लिए छोड़ दें। इसके बाद पानी से बाल धोकर जरूरत के अनुसार हल्का शैंपू किया जा सकता है। यह मास्क बालों को कंडीशनिंग देने और मुलायम महसूस कराने में मदद कर सकता है।

    केला और शहद भी बालों की देखभाल में इस्तेमाल किए जा सकते हैं। एक पके केले को अच्छी तरह मैश करके उसमें एक चम्मच शहद मिलाएं। तैयार मिश्रण को बालों की लंबाई पर लगाकर करीब 15 से 20 मिनट तक रहने दें। इसके बाद बालों को अच्छी तरह धो लें। केला बालों को कंडीशनिंग देने में मदद कर सकता है, जबकि शहद नमी बनाए रखने में सहायक माना जाता है।

    नारियल तेल और एलोवेरा का मास्क भी रूखे बालों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकता है। थोड़ी मात्रा में नारियल तेल लेकर उसमें एलोवेरा जेल मिलाएं और इसे बालों की लंबाई तथा खासकर सूखे सिरों पर लगाएं। करीब 20 से 30 मिनट बाद बाल धो लें। ऑयली स्कैल्प वाले लोग इस मिश्रण को मुख्य रूप से बालों की लंबाई तक सीमित रख सकते हैं। ज्यादा तेल लगाने से बाल भारी या चिपचिपे महसूस हो सकते हैं।

    अंडे और दही से भी एक साधारण हेयर मास्क तैयार किया जा सकता है। एक अंडे को अच्छी तरह फेंटकर उसमें दो चम्मच सादा दही मिलाएं। इसे बालों की लंबाई पर लगाकर लगभग 15 मिनट के लिए छोड़ दें। इसके बाद ठंडे या सामान्य तापमान के पानी से बालों को अच्छी तरह साफ करें और हल्के शैंपू का इस्तेमाल करें। अंडे में प्रोटीन होता है और दही कंडीशनिंग में मदद कर सकता है। अंडे से एलर्जी या संवेदनशीलता होने पर इसे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

    ओट्स और दही का मास्क भी कम सामग्री वाला विकल्प है। दो चम्मच बारीक पिसे ओट्स में दो चम्मच दही मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बनाएं। इसे बालों की लंबाई पर लगाएं और 15 से 20 मिनट बाद धो लें। इस मिश्रण को स्कैल्प पर जोर से रगड़ने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे जलन या रूखापन बढ़ सकता है।

    इन घरेलू उपायों का असर हर व्यक्ति में अलग हो सकता है। किसी भी मास्क को पहली बार इस्तेमाल करने से पहले त्वचा के छोटे हिस्से पर पैच टेस्ट करना उपयोगी हो सकता है। बालों को स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त पोषण, संतुलित खानपान, नियमित सफाई और अत्यधिक हीट स्टाइलिंग से बचना भी जरूरी है। अगर बाल लगातार टूट रहे हों, बहुत ज्यादा झड़ रहे हों या स्कैल्प में खुजली और जलन बनी रहे तो विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर रहेगा।

  • दूध खरीदने से पहले ऐसे पहचानें संभावित मिलावट, बुलबुले और झाग देखकर शुरुआती जांच करने का तरीका जानिए

    दूध खरीदने से पहले ऐसे पहचानें संभावित मिलावट, बुलबुले और झाग देखकर शुरुआती जांच करने का तरीका जानिए

    नई दिल्ली । दूध भारतीय खानपान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक बड़ी संख्या में लोग रोजाना दूध या उससे बने उत्पादों का सेवन करते हैं। दूध को कैल्शियम और प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत माना जाता है, लेकिन बाजार में मिलावट की चिंता के कारण इसकी गुणवत्ता को लेकर सावधानी बरतना भी जरूरी है। पानी के अलावा कुछ मामलों में दूध में डिटर्जेंट जैसे पदार्थ मिलाए जाने की आशंका भी सामने आती रही है।

    दूध में मिलावट होने पर उसकी बनावट, स्वाद और झाग बनने के तरीके में अंतर दिखाई दे सकता है। हालांकि केवल देखने या स्वाद से किसी दूध को मिलावटी घोषित करना सही नहीं है। इसी वजह से खाद्य सुरक्षा से जुड़ी संस्था ने दूध में डिटर्जेंट की संभावित मौजूदगी का शुरुआती संकेत पाने के लिए एक आसान घरेलू तरीका बताया है। इस जांच के लिए किसी महंगे उपकरण की आवश्यकता नहीं होती।

    घरेलू स्तर पर जांच करने के लिए सबसे पहले एक साफ छोटे गिलास में करीब 5 से 10 मिलीलीटर दूध लें। इसके बाद गिलास में मौजूद दूध को अच्छी तरह और तेजी से हिलाएं। कुछ देर तक दूध को हिलाने के बाद उसके ऊपर बनने वाले झाग और बुलबुलों को ध्यान से देखें। इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि झाग कितनी मात्रा में बन रहा है और कितनी देर तक बना रहता है।

    यदि दूध को हिलाने के बाद थोड़े बुलबुले बनते हैं और वे जल्दी खत्म हो जाते हैं तो इसे सामान्य स्थिति का संकेत माना जा सकता है। दूसरी ओर, यदि दूध को हिलाने पर काफी मात्रा में झाग बनता है और वह लंबे समय तक बना रहता है तो डिटर्जेंट या किसी अन्य सर्फैक्टेंट की मौजूदगी की आशंका हो सकती है। ऐसे पदार्थ दूध में झाग को ज्यादा स्थिर बना सकते हैं।

    इसका कारण दूध और डिटर्जेंट के रासायनिक गुणों में अंतर है। सामान्य दूध को हिलाने पर हवा के छोटे बुलबुले बन सकते हैं, लेकिन वे अपेक्षाकृत जल्दी टूट जाते हैं। डिटर्जेंट में मौजूद सर्फैक्टेंट सतही तनाव को कम कर सकते हैं। इसके कारण बुलबुलों के आसपास एक स्थिर परत बन सकती है और झाग अपेक्षाकृत अधिक समय तक दिखाई दे सकता है।

    फिर भी इस घरेलू तरीके को अंतिम या प्रमाणित मिलावट जांच नहीं माना जाना चाहिए। दूध को हिलाने पर झाग बनने की मात्रा कई अन्य परिस्थितियों से भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए यदि इस परीक्षण के बाद दूध की गुणवत्ता को लेकर संदेह बना रहता है तो उसे प्रयोगशाला जांच के लिए भेजना अधिक भरोसेमंद तरीका है। घरेलू परीक्षण को केवल शुरुआती संकेत के रूप में देखना चाहिए।

    दूध खरीदते समय भी कुछ सावधानियां बरतकर मिलावट या खराब गुणवत्ता वाले उत्पाद से बचने की कोशिश की जा सकती है। पैकेट वाला दूध खरीदते समय पैकिंग की सील, लेबल, निर्माण और उपयोग की तारीख तथा अन्य जरूरी जानकारी जरूर देखें। पैकेट फटा हुआ हो, सील से छेड़छाड़ दिखाई दे या पैकिंग असामान्य लगे तो उसे खरीदने से बचना बेहतर है।

    दूध को खरीदने के बाद निर्धारित तापमान पर रखना भी जरूरी है। पैकेट पर दिए गए भंडारण संबंधी निर्देशों का पालन करें और उपयोग से पहले उसकी स्थिति जांच लें। भरोसेमंद विक्रेता या निर्धारित मानकों का पालन करने वाले उत्पाद को प्राथमिकता देना भी सुरक्षित विकल्प हो सकता है। दूध की शुद्धता को लेकर गंभीर संदेह होने पर घरेलू जांच पर निर्भर रहने के बजाय प्रमाणित खाद्य जांच सुविधा से परीक्षण कराना सबसे उचित तरीका है।

  • कभी राजा-महाराजाओं का ठिकाना थे ये पानी पर तैरते महल, आज भी शाही खूबसूरती देख खिंचे चले आते हैं पर्यटक

    कभी राजा-महाराजाओं का ठिकाना थे ये पानी पर तैरते महल, आज भी शाही खूबसूरती देख खिंचे चले आते हैं पर्यटक


    नई दिल्ली । भारत अपनी विविधता और समृद्ध इतिहास के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहां पहाड़ों से लेकर समुद्र तक और रेगिस्तान से लेकर घने जंगलों तक घूमने के लिए अनगिनत जगहें हैं। लेकिन देश में कुछ ऐसी ऐतिहासिक इमारतें भी हैं जिनकी खूबसूरती पानी के बीच और भी ज्यादा निखर जाती है। झीलों के बीच बने ये शाही महल दूर से ऐसे नजर आते हैं जैसे पानी पर तैर रहे हों। इनकी वास्तुकला इतिहास की भव्यता को दिखाती है और आज भी देश विदेश से आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करती है।

    इन वाटर पैलेस में सबसे मशहूर नाम जयपुर के जल महल का है। मानसागर झील के बीच स्थित यह महल दूर से बेहद आकर्षक दिखाई देता है। इसका निर्माण 18वीं सदी में महाराजा माधो सिंह प्रथम के समय कराया गया था। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार इसका इस्तेमाल शाही परिवार आराम और शिकार के लिए करता था। महल की पांच मंजिलों वाली संरचना इसकी सबसे खास विशेषताओं में शामिल है। झील में पानी का स्तर बढ़ने पर इसकी ऊपरी मंजिलें ही दिखाई देती हैं जबकि बाकी हिस्सा पानी में डूबा रहता है। यही वजह है कि जल महल को भारत के सबसे अनोखे जल महलों में गिना जाता है।

    राजस्थान के बाद अगर किसी जगह के वाटर पैलेस की खूबसूरती सबसे ज्यादा चर्चा में रहती है तो वह उदयपुर है। पिछोला झील के बीच बना लेक पैलेस सफेद संगमरमर की खूबसूरत इमारत है। इसे पहले जग निवास के नाम से जाना जाता था और इसका निर्माण 18वीं सदी में महाराणा जगत सिंह द्वितीय के समय हुआ था। झील के नीले पानी के बीच चमकता सफेद महल और पीछे दिखाई देती अरावली की पहाड़ियां इसे बेहद खास बनाती हैं। आज यह एक लग्जरी होटल के रूप में भी प्रसिद्ध है।

    उदयपुर में ही पिछोला झील के बीच जग मंदिर भी मौजूद है। यह एक खूबसूरत द्वीपीय महल है जिसकी निर्माण प्रक्रिया 16वीं सदी में शुरू हुई थी और बाद में इसे शाही संरक्षण में पूरा किया गया। कभी राजपरिवार के आराम के लिए इस्तेमाल होने वाला यह स्थान आज अपनी वास्तुकला और शांत वातावरण के कारण पर्यटकों को आकर्षित करता है। झील के चारों तरफ फैला पानी और महल की भव्य संरचना इसे यादगार पर्यटन स्थल बनाती है।

    मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर मांडू में स्थित जहाज महल भी इस सूची में खास जगह रखता है। यह महल मुंज तालाब और कपूर तालाब के बीच इस तरह बनाया गया है कि दूर से देखने पर यह पानी में तैरते जहाज जैसा दिखाई देता है। इसी वजह से इसे जहाज महल नाम मिला। इसका निर्माण 15वीं सदी में सुल्तान गियासुद्दीन खिलजी के शासनकाल से जोड़ा जाता है। महल की संरचना के साथ यहां की जल व्यवस्था भी बेहद दिलचस्प है। पानी को जमा करने और महल के वातावरण को ठंडा रखने के लिए तालाबों और जल चैनलों का इस्तेमाल किया जाता था।

    इस सूची में त्रिपुरा का नीरमहल भी बेहद खास है। रुद्रसागर झील के बीच बना यह महल अपनी खूबसूरत वास्तुकला के कारण पूर्वोत्तर भारत की पहचान बन चुका है। इसका निर्माण 20वीं सदी में राजा बीर बिक्रम किशोर माणिक्य बहादुर ने गर्मियों में रहने के लिए कराया था। नीरमहल की वास्तुकला में भारतीय और मुगल शैली का सुंदर मेल देखने को मिलता है। महल की बालकनियां मंडप और ऊंचे टावर झील के बीच इसकी खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं।

    भारत के ये वाटर पैलेस सिर्फ घूमने की जगहें नहीं हैं बल्कि देश के गौरवशाली इतिहास शाही जीवनशैली और अद्भुत वास्तुकला की जीवंत तस्वीर भी पेश करते हैं। अगर आपको इतिहास प्रकृति और खूबसूरत नजारों का संगम पसंद है तो इन पांचों जगहों को अपनी ट्रैवल लिस्ट में जरूर शामिल किया जा सकता है।

  • हर बीमारी में घरेलू नुस्खे आजमाना पड़ सकता है भारी, सांस की परेशानी, बेहोशी और खून आने पर तुरंत डॉक्टर से लें सलाह

    हर बीमारी में घरेलू नुस्खे आजमाना पड़ सकता है भारी, सांस की परेशानी, बेहोशी और खून आने पर तुरंत डॉक्टर से लें सलाह

    नई दिल्ली ।  घरेलू उपचार सर्दी-खांसी, पेट दर्द जैसी आम समस्याओं में हम सभी अक्सर खुद से ही घरेलू उपचार करना शुरू कर देते हैं। खांसी में शहद, अदरक, हल्दी या काढ़े की सलाह दी जाती है। पेट खराब हुआ तो अजवाइन और गले में दर्द हुआ तो नमक के पानी से गरारे जैसे उपाय भारतीय घरों में लंबे समय से इस्तेमाल होते रहे हैं। वैसे तो कुछ समस्याओं में ये आराम देने वाले भी हो सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ी गलती तब होती है जब घरेलू नुस्खे को हर बीमारी का इलाज समझ लिया जाता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार इस बात को लेकर अलर्ट करते रहे हैं कि हर आम दिखने वाली बीमारी में खुद से ही दवा या घरेलू उपचार नहीं शुरू कर देना चाहिए। सांस लेने में परेशानी, बेहोशी, भ्रम, बहुत तेज दर्द या अचानक बिगड़ती हालत को केवल घरेलू उपचार से ठीक करने की कोशिश आपके लिए बड़ी मुश्किलों का कारण बन सकती है।

    आइए समझते हैं कि किन समस्याओं में हमें घरेलू उपायों में फंसने की जगह समय रहते डॉक्टर के पास जाना जरूरी है?

    सांस की समस्या

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, वायरल बुखार, हल्के पेट दर्द या गैस जैसी कभी-कभार होने वाली समस्याओं में कुछ उपाय लाभ दे सकते हैं। पर अगर लक्षण लंबे समय तक बने रहें या बार-बार वही समस्या हो रही है तो इसके कारणों का पता लगाने के लिए जांच कराना और समय रहते डॉक्टर की मदद लेना जरूरी हो जाता है।

    सांस लेने में परेशानी या सीने में दिक्कत

    सांस लेने में अचानक या गंभीर परेशानी को केवल भाप, अदरक की चाय या काढ़े से ठीक करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। सांस फूलना कई अलग-अलग स्थितियों का संकेत हो सकता है और कई बार ये गंभीर समस्याओं की ओर इशारा भी कर सकता है।

    अगर सांस लेने में कठिनाई हो रही है तो इसमें आपातकालीन मदद की जरूरत होती है। इसी तरह सीने में तेज और असामान्य दर्द, बेहोशी या हालत तेजी से बिगड़ने में भी घरेलू इलाज की जगह विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है।

    बेहोशी या बहुत ज्यादा कमजोरी

    अगर आपके आसपास या घर में कोई अचानक बेहोश हो जाए या अत्यधिक कमजोर महसूस करे तो इसे सामान्य थकान मानकर इग्नोर करना या खुद से कोई उपाय शुरू कर देना ठीक नहीं है।

    सांस लेने में परेशानी, दौरे पड़ना या त्वचा-होंठों के रंग में बदलाव जैसे संकेत गंभीर हो सकते हैं। कई बार हार्ट अटैक या शरीर में ऑक्सीजन की कमी में भी ऐसी दिक्कतें देखी जाती हैं। इन स्थितियों में तुरंत डॉक्टरी मदद की जरूरत होती है।

    बहुत तेज बुखार या लगातार बिगड़ते लक्षण

    हर बुखार में डॉक्टर के पास जाना जरूरी नहीं होता, लेकिन बहुत तेज बुखार, लगातार बिगड़ते लक्षण या कई दिनों तक सुधार न होने जैसी स्थिति में घरेलू उपचार करते रहना नुकसानदायक हो सकता है।

    दिल्ली-एनसीआर में इन दिनों स्वाइन फ्लू का खतरा देखा जा रहा है जिसमें होने वाला बुखार भी सामान्य लग सकता है। पर इसमें समय रहते डॉक्टरी सलाह जरूरी है। घरेलू उपाय कुछ लक्षणों में अस्थायी आराम दे सकते हैं, लेकिन अगर समय के साथ हालत सुधरने के बजाय बिगड़ रही हो तो विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है।

    खून की उल्टी या मल में खून

    शरीर से किसी भी तरह की ब्लीडिंग में सिर्फ खानपान या घरेलू उपचार के भरोसे बैठे रहना ठीक नहीं है। खून वाली उल्टी और मल में खून जैसे लक्षणों में तुरंत डॉक्टर की सलाह और जांच जरूरी है।

    लिवर या फेफड़ों की गंभीर बीमारियों में उल्टी के साथ खून आने की दिक्कत देखी जाती है। इसी तरह से डेंगू के गंभीर मामले में मल से खून आ सकता है। इन बीमारियों में समय रहते डॉक्टरी मदद जरूरी है। बिना कारण समझे घरेलू उपाय करते रहना स्थिति को और बिगाड़ सकता है।

  • टेस्टोस्टेरोन कम होने पर पुरुषों के शरीर में दिख सकते हैं कई बदलाव, जानिए कमी के कारण, लक्षण और जांच का सही तरीका

    टेस्टोस्टेरोन कम होने पर पुरुषों के शरीर में दिख सकते हैं कई बदलाव, जानिए कमी के कारण, लक्षण और जांच का सही तरीका


    नई दिल्ली ।पुरुषों की सेहत की बात आते ही टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की चर्चा शुरू हो जाती है। इसे आमतौर पर मेल हार्मोन के तौर पर जाना जाता है। मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि टेस्टोस्टेरोन यौन शक्ति के साथ स्पर्म बनाने, मांसपेशियों- हड्डियों को मजबूत रखने और शरीर में ऊर्जा के स्तर को बढ़ाने के लिए जरूरी होता है। जब किसी में इसका स्तर कम हो जाता है, तो इसका शरीर के कामकाज पर सीधा असर दिखने लगता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन शारीरिक विकास और ऊर्जा के लिए जरूरी होता है, लेकिन केवल थकान-कमजोरी या यौन की इच्छा कम होने का मतलब यह नहीं है कि आपमें टेस्टोस्टेरोन कम है। लो टेस्टोस्टेरोन यानी हाइपोगोनाडिज्म की स्थिति कई बार गंभीर समस्याओं का कारण भी बन सकती है, इसलिए इसके लक्षणों पर निरंतर ध्यान देते रहना और टेस्टोस्टेरोन को बढ़ाने के लिए उपाय करते रहना जरूरी है।

    आइए जानते हैं कि कैसे पता किया जाए कि कहीं आपमें इसकी कमी तो नहीं?

    पुरुषों के लिए जरूरी हार्मोन- टेस्टोस्टेरोन

    टेस्टोस्टेरोन पुरुषों का मुख्य हार्मोन है, जिसका निर्माण मुख्य रूप से अंडकोष में होता है। यह पुरुषों में चेहरे और शरीर के बाल, मांसपेशियों के विकास, यौन इच्छा, स्पर्म उत्पादन और हड्डियों के स्वास्थ्य में भूमिका निभाता है।

    टेस्टोस्टेरोन का स्तर दिनभर एक जैसा नहीं रहता। आमतौर पर सुबह इसका स्तर सबसे अधिक होता है। जिन पुरुषों में अंडकोष की समस्या, पिट्यूटरी ग्रंथि से जुड़ी परेशानी, मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज या कुछ क्रॉनिक बीमारियां होती हैं, उनमें टेस्टोस्टेरोन की कमी का खतरा अधिक हो सकता है। इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ भी टेस्टोस्टेरोन में धीरे-धीरे कमी आ सकती है।

    टेस्टोस्टेरोन कम होने के क्या कारण हैं?

    टेस्टोस्टेरोन की कमी केवल उम्र बढ़ने से नहीं होती। अंडकोष में चोट या संक्रमण, कैंसर के इलाज में रेडिएशन या कीमोथेरेपी, पिट्यूटरी ग्रंथि की बीमारी और कुछ दवाएं भी लो टेस्टोस्टेरोन का कारण हो सकती हैं।

    इसके अलावा अगर आप मोटापे, टाइप-2 डायबिटीज, किडनी या लिवर की पुरानी बीमारी का शिकार हैं या फिर नींद से जुड़ी समस्याएं रहती हैं तो इसके कारण भी टेस्टोस्टेरोन की कमी हो सकती है।

    कैसे पता चलेगा कि टेस्टोस्टेरोन कम तो नहीं?

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, थकान या यौन इच्छा में कमी को देखकर खुद से टेस्टोस्टेरोन की कमी मान लेना सही नहीं है।

    इसका पता लगाने के लिए लक्षणों के साथ डॉक्टर कुछ जांच की सलाह दे सकते हैं। आमतौर पर सुबह जब टेस्टोस्टेरोन का स्तर अपेक्षाकृत अधिक होता है तब खून की जांच की जाती है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर कुछ अन्य हार्मोन की जांच करने की भी सलाह दे सकते हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अगर टेस्टोस्टेरोन की कमी का कारण मोटापा, कोई बीमारी या ऐसी स्थिति है जिसे सुधारा जा सकता है, तो उसका इलाज जरूरी है। हाइपोगोनाडिज्म में कुछ लोगों को डॉक्टर टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी की सलाह दे सकते हैं।

    लाइफस्टाइल और खान-पान में सुधार के साथ पौष्टिक चीजों का नियमित सेवन भी टेस्टोस्टेरोन के स्तर को बढ़ाने में मददगार हो सकता है।

  • हेल्दी डाइट के नाम पर इन पोषण संबंधी धारणाओं पर आंख मूंदकर भरोसा न करें, गलत तरीके से अपनाने पर फायदे की जगह नुकसान हो सकता है

    हेल्दी डाइट के नाम पर इन पोषण संबंधी धारणाओं पर आंख मूंदकर भरोसा न करें, गलत तरीके से अपनाने पर फायदे की जगह नुकसान हो सकता है


    नई दिल्ली । शरीर को दिनभर अच्छे तरीके से काम करते रहने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो हमें भोजन से प्राप्त होती है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को ऐसा भोजन करने की सलाह देते हैं, जो न सिर्फ शरीर को ताकत दे, बल्कि पोषक तत्वों से भी भरपूर हो।

    आहार को लेकर अक्सर हमारे मन में कई सारे सवाल रहते हैं। सुबह खाली पेट क्या पीना चाहिए, कौन-सा फल कब खाना चाहिए, कार्बोहाइड्रेट पूरी तरह छोड़ देना चाहिए या रात में खाना खाने से मोटापा बढ़ेगा? स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि स्वस्थ आहार के चार आधार हैं, पर्याप्तता, संतुलन, सीमित मात्रा और विविधता। यानी सिर्फ एक चीज को डाइट में जोड़ लेना या किसी एक खाद्य पदार्थ को पूरी तरह हटा देना स्वस्थ खानपान की गारंटी नहीं है।

    एक और बड़ा भ्रम यह भी है कि जो चीज प्राकृतिक हैं, वह हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित और फायदेमंद भी होगी। ऐसे में हेल्दी डाइट के नाम पर अपनाई जा रही कुछ धारणाओं को समझना जरूरी है, ताकि फायदे की जगह नुकसान से बचा जा सके।

    शरीर के पोषण का रखें ध्यान

    लोगों को सही खानपान और संतुलित आहार के महत्व के बारे में जागरूक करने के उद्देश्य से हर साल 1 से 7 सितंबर तक राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि अच्छा स्वास्थ्य केवल भरपेट खाने से नहीं, बल्कि शरीर को नियमित रूप से सही पोषक तत्व जैसे विटामिन्स, प्रोटीन और खनिज मिलने से बनता है।

    हमारे समाज में खान-पान को लेकर कई तरह की धारणाएं और मिथक प्रचलित हैं, जिनका लोग बिना पूरी जानकारी के पालन करते हैं। इनमें कार्बोहाइड्रेट, फलों और सप्लीमेंट्स से जुड़ी धारणाएं प्रमुख हैं।

    मिथ: कार्बोहाइड्रेट का मतलब वजन बढ़ाने वाली चीज

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि कार्बोहाइड्रेट वाली चीजें सेहत के लिए आवश्यक हैं और इन्हें पूरी तरह वजन बढ़ाने वाला पोषक तत्व मानना सही नहीं है। कार्बोहाइड्रेट शरीर के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। समस्या कार्बोहाइड्रेट की मौजूदगी से ज्यादा उसके स्रोत से जुड़ी होती है।

    साबुत अनाज, दालें, फल और सब्जियों से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट शरीर को स्वस्थ रखने और काम करने की ऊर्जा देते हैं। वहीं अत्यधिक प्रोसेस्ड और मीठे खाद्य पदार्थों से मिलने वाला कार्बोहाइड्रेट लंबे समय में वजन और ब्लड शुगर लेवल बढ़ाने वाला हो सकता है।

    मिथ: फल जितना ज्यादा खाएंगे, उतना ज्यादा फायदा

    फलों को हेल्दी डाइट का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, लेकिन इन्हें भी संतुलित मात्रा में ही खाना चाहिए। ज्यादा मात्रा में फलों के सेवन से भी नुकसान हो सकते हैं। 10 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को रोजाना कम से कम 400 ग्राम फल और सब्जियां खाने की सलाह दी जाती है। इससे अधिक मात्रा में कुछ फल वजन बढ़ने, शुगर और पाचन संबंधी दिक्कतें बढ़ाने वाले हो सकते हैं।

    मिथ: सप्लीमेंट्स से पूरी हो जाएगी पोषक तत्वों की कमी

    अच्छी सेहत पाने के लिए खुद से सप्लीमेंट लेना शुरू कर देना नुकसानदायक हो सकता है। सप्लीमेंट की जरूरत शरीर में पोषक तत्वों की कमी और चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर तय की जाती है। खुद से कोई सप्लीमेंट शुरू करना कई बार फायदे से ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है। पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार का सेवन शरीर की जरूरतें पूरी करने का अधिक सुरक्षित तरीका माना जाता है।

  • बारिश में पचमढ़ी बन जाती है स्वर्ग की तस्वीर घूमने से पहले जान लें मौसम से लेकर जरूरी सावधानियां तक पूरी जानकारी

    बारिश में पचमढ़ी बन जाती है स्वर्ग की तस्वीर घूमने से पहले जान लें मौसम से लेकर जरूरी सावधानियां तक पूरी जानकारी


    नई दिल्ली ।
     मध्यप्रदेश की सतपुड़ा पहाड़ियों के बीच बसा पचमढ़ी बारिश के मौसम में अपनी खूबसूरती के चरम पर पहुंच जाता है। चारों तरफ फैली हरियाली पहाड़ियों से उतरते झरने बादलों से ढकी चोटियां और जंगलों के बीच छाई धुंध यहां आने वाले पर्यटकों को अलग ही अनुभव देती है। पचमढ़ी को मानसून में घूमने की खास वजह यहां के झरने और प्राकृतिक नजारे हैं। मध्यप्रदेश पर्यटन भी बारिश के मौसम में पचमढ़ी के धूपगढ़ और आसपास के प्राकृतिक स्थलों को खास आकर्षण के तौर पर बताता है।

    बारिश के मौसम में पचमढ़ी की सबसे खास बात यहां कऔर ठंडा मौसम है। सितंबर की शुरुआत में भी मौसम विभाग के पर्यटन पूर्वानुमान में पचमढ़ी में बादल और बारिश या गरज के साथ बौछारों की संभावना दर्ज की गई है। 3 सितंबर को यहां अधिकतम तापमान 24 डिग्री और न्यूनतम तापमान 19.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था जबकि पिछले 24 घंटे में 9 मिलीमीटर बारिश हुई थी। आने वाले दिनों में भी बादलों और बारिश का दौर बने रहने के संकेत मिले हैं।

    मानसून में पचमढ़ी घूमने वालों के लिए बी फॉल्स राजत प्रपात और अप्सरा विहार खास आकर्षण बने रहते हैं। बारिश के बाद इन झरनों में पानी का प्रवाह बढ़ जाता है जिससे इनका नजारा बेहद शानदार दिखाई देता है। राजत प्रपात करीब 350 फीट की ऊंचाई से गिरता है और धूप पड़ने पर पानी की धार चांदी की पट्टी जैसी नजर आती है। अप्सरा विहार भी पर्यटकों के बीच लोकप्रिय है और यहां तक पहुंचने के लिए छोटा पैदल रास्ता तय करना पड़ता है।

    इसके अलावा धूपगढ़ मानसून में पचमढ़ी की यात्रा का सबसे यादगार पड़ाव बन सकता है। बारिश के बाद पहाड़ों पर छाई धुंध और बादलों के बीच से दिखाई देने वाला नजारा पर्यटकों को आकर्षित करता है। सतपुड़ा की पहाड़ियों पर हरियाली की चादर बिछ जाती है और कई जगहों पर बादल इतने नीचे नजर आते हैं कि ऐसा लगता है जैसे पर्यटक बादलों के बीच खड़े हों। पचमढ़ी समुद्र तल से करीब 1067 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और इसी वजह से बारिश के दौरान यहां का वातावरण मैदानी इलाकों की तुलना में काफी ठंडा और खुशनुमा रहता है।

    हालांकि बारिश के मौसम में पचमढ़ी घूमने का अपना रोमांच है लेकिन यात्रा के दौरान सावधानी भी बेहद जरूरी है। लगातार बारिश के बाद पहाड़ी रास्ते और ट्रैक फिसलन भरे हो सकते हैं इसलिए मजबूत ग्रिप वाले जूते पहनना बेहतर रहेगा। झरनों और गहरी घाटियों के आसपास सुरक्षा घेरा पार करने से बचना चाहिए। मौसम अचानक खराब होने पर ऊंचे और खुले स्थानों पर जाने से भी बचना जरूरी है। जंगल या ट्रैकिंग वाले क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन और गाइड के निर्देशों का पालन करना चाहिए।

    बारिश में पचमढ़ी जाने वालों को छाता या रेनकोट के साथ अतिरिक्त कपड़े और मोबाइल को सुरक्षित रखने के लिए वाटरप्रूफ कवर भी रखना चाहिए। अगर यात्रा का उद्देश्य झरनों और हरियाली का आनंद लेना है तो सुबह का समय बेहतर रह सकता है क्योंकि बाद में बारिश तेज होने पर कुछ रास्तों पर आवाजाही प्रभावित हो सकती है। मौसम विभाग का ताजा पूर्वानुमान देखकर ही दिन की यात्रा तय करना समझदारी होगी।

    कुल मिलाकर बारिश के मौसम में पचमढ़ी उन लोगों के लिए शानदार पर्यटन स्थल है जो भीड़भाड़ से दूर पहाड़ हरियाली झरने और बादलों के बीच कुछ सुकून भरे पल बिताना चाहते हैं। मानसून में यहां की प्रकृति का रंग पूरी तरह बदल जाता है और यही वजह है कि बारिश के दिनों में पचमढ़ी की यात्रा सामान्य पर्यटन से कहीं ज्यादा यादगार बन जाती है।

  • चेहरे की चमक से लेकर रूखी त्वचा तक, गुलाब के ये आसान उपाय बना सकते हैं स्किन केयर रूटीन को खास

    चेहरे की चमक से लेकर रूखी त्वचा तक, गुलाब के ये आसान उपाय बना सकते हैं स्किन केयर रूटीन को खास


    नई दिल्ली । गुलाब का नाम आते ही सबसे पहले उसकी खूबसूरती और मनमोहक खुशबू का ख्याल आता है लेकिन यह खूबसूरत फूल त्वचा की देखभाल में भी काफी उपयोगी माना जाता है। सदियों से गुलाब की पंखुड़ियों और गुलाब जल का इस्तेमाल सौंदर्य को निखारने के लिए किया जाता रहा है। आज भी प्राकृतिक स्किन केयर रूटीन में गुलाब को खास जगह दी जाती है। बाजार में मिलने वाले कई तरह के कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स में भी गुलाब के अर्क और गुलाब जल का उपयोग किया जाता है। अगर त्वचा को ताजगी और प्राकृतिक चमक देना चाहते हैं तो गुलाब को अपने ब्यूटी रूटीन का हिस्सा बनाया जा सकता है।

    गुलाब जल त्वचा को ताजगी देने के लिए सबसे लोकप्रिय प्राकृतिक उपायों में से एक है। चेहरे को साफ करने के बाद कॉटन की मदद से हल्के हाथों से गुलाब जल लगाया जा सकता है। इससे चेहरा फ्रेश महसूस होता है और त्वचा को ठंडक भी मिलती है। खासतौर पर धूल मिट्टी और तेज धूप के संपर्क में आने के बाद गुलाब जल का इस्तेमाल चेहरे को आराम देने में मदद कर सकता है। कई लोग इसे अपने स्किन केयर रूटीन में टोनर की तरह भी शामिल करते हैं।

    गुलाब की ताजी पंखुड़ियों का उपयोग फेस पैक बनाने में भी किया जा सकता है। इसके लिए साफ और ताजी गुलाब की पंखुड़ियों को पीसकर उसमें त्वचा के अनुसार अन्य प्राकृतिक सामग्री मिलाई जा सकती है। गुलाब की पंखुड़ियों से बना हल्का फेस पैक त्वचा को ताजगी देने में मदद करता है। चेहरे पर किसी भी घरेलू नुस्खे को लगाने से पहले यह जरूरी है कि त्वचा की संवेदनशीलता को ध्यान में रखा जाए और जरूरत पड़ने पर पैच टेस्ट किया जाए।

    रूखी और बेजान दिखने वाली त्वचा के लिए भी गुलाब से बने घरेलू उपाय उपयोगी हो सकते हैं। गुलाब की पंखुड़ियों को पानी में भिगोकर तैयार किया गया प्राकृतिक मिश्रण चेहरे को फ्रेश महसूस कराने में मदद कर सकता है। गर्मी के मौसम में गुलाब जल को ठंडी जगह पर रखकर इस्तेमाल करने से चेहरे को अतिरिक्त ताजगी का एहसास हो सकता है। हालांकि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है इसलिए किसी भी चीज के इस्तेमाल का परिणाम भी अलग हो सकता है।

    गुलाब से त्वचा की देखभाल करते समय साफ और अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पादों का चयन करना जरूरी है। अगर गुलाब जल खरीद रहे हैं तो उसमें अनावश्यक केमिकल और तेज खुशबू वाले तत्वों की जानकारी जरूर जांचनी चाहिए। त्वचा पर किसी नए उत्पाद का इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना सुरक्षित तरीका माना जाता है। जिन लोगों को किसी कॉस्मेटिक या प्राकृतिक चीज से एलर्जी की समस्या होती है उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

    त्वचा की असली खूबसूरती सिर्फ बाहरी उत्पादों से नहीं बल्कि स्वस्थ जीवनशैली से भी जुड़ी होती है। पर्याप्त पानी पीना संतुलित भोजन लेना पूरी नींद करना और धूप से त्वचा को बचाना भी जरूरी है। गुलाब जल और गुलाब की पंखुड़ियों को स्किन केयर रूटीन का एक सरल हिस्सा बनाया जा सकता है लेकिन इन्हें चमत्कारी इलाज नहीं मानना चाहिए।

    अगर त्वचा पर लगातार दाने खुजली लालिमा या किसी तरह की गंभीर समस्या बनी रहती है तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है। सही देखभाल और नियमित स्किन केयर के साथ गुलाब आपकी दिनचर्या में ताजगी और प्राकृतिक खूबसूरती का एक खास एहसास जोड़ सकता है।

  • रात में अचानक पैर में उठता है तेज दर्द? विटामिन D कैल्शियम और B12 की कमी हो सकती है कारण

    रात में अचानक पैर में उठता है तेज दर्द? विटामिन D कैल्शियम और B12 की कमी हो सकती है कारण


    नई दिल्ली । पैरों में दर्द और ऐंठन की समस्या अक्सर लोगों को सामान्य लगती है। लंबे समय तक खड़े रहने या लगातार बैठे रहने के बाद पैरों में दर्द होना आम बात है और कई बार थोड़े आराम के बाद यह परेशानी खुद ही ठीक भी हो जाती है। लेकिन अगर बिना किसी चोट के या ज्यादा मेहनत किए बिना ही पैरों में अचानक दर्द होने लगे और यह समस्या बार बार सामने आए तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई मामलों में शरीर में जरूरी विटामिन और मिनरल्स की कमी भी पैरों में दर्द कमजोरी ऐंठन और झनझनाहट का कारण बन सकती है। ऐसे में शरीर के संकेतों को समझना और अपने खानपान पर ध्यान देना बेहद जरूरी हो जाता है।

    पैरों में दर्द की एक वजह शरीर में विटामिन D की कमी भी हो सकती है। विटामिन D शरीर की हड्डियों के साथ मांसपेशियों और नसों के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी माना जाता है। इसकी कमी होने पर शरीर में कमजोरी और दर्द महसूस हो सकता है। कुछ लोगों में इसका असर खासतौर पर कमर पीठ और पैरों में दिखाई देता है। शरीर को विटामिन D का प्रमुख प्राकृतिक स्रोत सूर्य की रोशनी से मिलता है। हालांकि अगर शरीर में इसकी कमी है तो इसे पूरा करने के लिए डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।

    कैल्शियम की कमी को भी पैरों में होने वाली ऐंठन और खिंचाव से जोड़कर देखा जाता है। आमतौर पर कैल्शियम को सिर्फ हड्डियों की मजबूती के लिए जरूरी माना जाता है लेकिन इसका संबंध मांसपेशियों के सामान्य कामकाज से भी है। शरीर में कैल्शियम का स्तर कम होने पर मांसपेशियों में खिंचाव या ऐंठन जैसी समस्या हो सकती है। अपनी डाइट में दूध दही पनीर और तिल जैसे कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं।

    विटामिन B12 की कमी भी पैरों से जुड़ी परेशानियों की वजह बन सकती है। यह विटामिन नसों के सामान्य स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। इसकी कमी होने पर हाथ और पैरों में सुन्नपन झनझनाहट खिंचाव या असामान्य संवेदनाएं महसूस हो सकती हैं। कुछ लोगों में रात के समय पैरों में ऐंठन की शिकायत भी देखने को मिलती है। अगर इस तरह की समस्या लगातार बनी हुई है तो केवल घरेलू उपाय करने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है।

    पैरों के दर्द और ऐंठन से बचने के लिए संतुलित और पौष्टिक आहार लेना जरूरी है। खाने में हरी सब्जियां दूध दही अंडे मौसमी फल और दूसरे पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं। पर्याप्त पानी पीना और नियमित रूप से हल्की शारीरिक गतिविधि करना भी शरीर को सक्रिय रखने में मदद करता है। हालांकि हर बार पैर में दर्द का मतलब विटामिन या मिनरल्स की कमी ही हो ऐसा जरूरी नहीं है। अगर दर्द बार बार हो रहा है लंबे समय तक बना रहता है या इसके साथ सुन्नपन कमजोरी सूजन जैसी समस्या भी दिखाई देती है तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। बिना जांच के किसी विटामिन या मिनरल का सप्लीमेंट लेना भी उचित नहीं है।

  • अकेलापन सेहत के लिए बन सकता है गंभीर खतरा, डॉक्टर ने मोटापा, शराब और शारीरिक निष्क्रियता से जुड़े जोखिमों पर चेताया

    अकेलापन सेहत के लिए बन सकता है गंभीर खतरा, डॉक्टर ने मोटापा, शराब और शारीरिक निष्क्रियता से जुड़े जोखिमों पर चेताया


    नई दिल्ली । 
    स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले जोखिमों की चर्चा में आमतौर पर धूम्रपान, शराब, मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता को प्रमुख कारण माना जाता है। हालांकि, लंबे समय तक बना रहने वाला अकेलापन भी शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है। हेल्थ एजुकेटर और डॉक्टर एरिक बर्ग ने अकेलेपन को लेकर लोगों को सावधान किया है और इसके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों पर ध्यान देने की बात कही है।

    अकेलापन केवल किसी व्यक्ति का कुछ समय के लिए अकेले रहना नहीं है। समस्या तब बढ़ सकती है जब व्यक्ति लंबे समय तक सामाजिक संपर्क से दूर रहे, उसके पास बातचीत करने वाले लोग कम हों या उसे भावनात्मक रूप से अलग-थलग महसूस हो। ऐसी स्थिति लगातार बनी रहने पर तनाव और मानसिक दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर शरीर के अलग-अलग तंत्रों पर पड़ सकता है।

    डॉक्टर एरिक बर्ग के अनुसार, लंबे समय तक सामाजिक अलगाव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में अकेलेपन की तुलना कई अन्य स्वास्थ्य जोखिमों से करते हुए इसे गंभीरता से लेने की जरूरत बताई। हालांकि, अकेलेपन को सीधे तौर पर प्रतिदिन 15 सिगरेट पीने के बराबर नुकसान पहुंचाने वाला बताना एक लोकप्रिय स्वास्थ्य दावा है, जिसे संदर्भ और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर सावधानी से समझना जरूरी है।

    लगातार अकेलेपन और तनाव की स्थिति में शरीर का तनाव प्रतिक्रिया तंत्र सक्रिय रह सकता है। इससे तनाव से जुड़े हार्मोन और रक्तचाप प्रभावित हो सकते हैं। लंबे समय तक बढ़ा हुआ तनाव हृदय स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है और हृदय रोग तथा स्ट्रोक जैसे रोगों से जुड़े अन्य जोखिमों को बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है।

    अकेलेपन का असर प्रतिरक्षा प्रणाली पर भी पड़ सकता है। लगातार मानसिक तनाव शरीर की सामान्य प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। इससे संक्रमण के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया और बीमारी से उबरने की प्रक्रिया पर असर पड़ने की संभावना रहती है।

    मानसिक स्वास्थ्य के स्तर पर सामाजिक संपर्क की कमी चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं के जोखिम से जुड़ी हुई है। परिवार, दोस्तों और समाज के साथ स्वस्थ संवाद व्यक्ति को भावनात्मक समर्थन देता है। जब यह संपर्क लगातार कम हो जाता है तो तनाव से निपटने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और नकारात्मक भावनाएं लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।

    अकेलेपन का संबंध नींद की गुणवत्ता से भी देखा गया है। लगातार चिंता, असुरक्षा या तनाव के कारण कुछ लोगों को सोने में परेशानी हो सकती है। पर्याप्त और अच्छी नींद नहीं मिलने पर दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं।

    लंबे समय तक सामाजिक अलगाव का असर सोचने और समझने की क्षमता पर भी पड़ सकता है। सामाजिक गतिविधियों और बातचीत से दिमाग लगातार सक्रिय रहता है। उम्र बढ़ने के साथ सामाजिक अलगाव और संज्ञानात्मक गिरावट के बीच संबंध को लेकर भी शोध हुआ है। हालांकि, अकेलापन अकेले ही डिमेंशिया का कारण है, ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, अकेलेपन को नजरअंदाज करने के बजाय नियमित सामाजिक संपर्क बनाए रखना उपयोगी हो सकता है। परिवार और दोस्तों से बातचीत, सामुदायिक गतिविधियों में भागीदारी, पसंदीदा गतिविधियों के लिए समय निकालना और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना मददगार कदम हो सकते हैं। लंबे समय तक अकेलापन महसूस करने वाले व्यक्ति को इसे केवल व्यक्तिगत कमजोरी मानने के बजाय स्वास्थ्य से जुड़ी स्थिति के रूप में गंभीरता से लेना चाहिए।