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  • रात में फोन चलाने की आदत पड़ सकती है भारी: रिसर्च में नींद से लेकर एकाग्रता तक पर असर के संकेत

    रात में फोन चलाने की आदत पड़ सकती है भारी: रिसर्च में नींद से लेकर एकाग्रता तक पर असर के संकेत


    नई दिल्ली। मोबाइल आज हमारी जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन चुका है जिससे दूरी बनाना आसान नहीं है। सुबह आंख खुलते ही फोन देखना हो या रात को सोने से ठीक पहले सोशल मीडिया स्क्रॉल करना हो स्क्रीन हमारी रोजमर्रा की आदतों में शामिल हो चुकी है। कई लोग काम के दौरान बार बार नोटिफिकेशन देखते हैं तो कुछ लोग खाली समय मिलते ही रील्स वीडियो और सोशल मीडिया पर चले जाते हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि मोबाइल हमारा कितना समय ले रहा है बल्कि अब यह भी चिंता बढ़ रही है कि इसका लगातार इस्तेमाल हमारी नींद ध्यान और दिमागी कार्यक्षमता को किस तरह प्रभावित कर रहा है।

    हालिया शोधों में मोबाइल और स्क्रीन टाइम को लेकर कई महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं। एक बड़े व्यवस्थित विश्लेषण में 21 अध्ययनों और करीब 5.48 लाख लोगों के आंकड़ों को शामिल किया गया। इसमें ज्यादा स्क्रीन टाइम का संबंध कम नींद अनिद्रा के लक्षण देर से सोने और सोने में परेशानी से पाया गया। विश्लेषण के मुताबिक स्क्रीन टाइम के हर अतिरिक्त घंटे के साथ सोने का समय औसतन करीब 13 मिनट तक आगे खिसक सकता है।

    रात में मोबाइल इस्तेमाल करने की समस्या केवल स्क्रीन की रोशनी तक सीमित नहीं है। फोन पर लगातार आने वाले नोटिफिकेशन सोशल मीडिया की पोस्ट वीडियो और मैसेज दिमाग को सक्रिय बनाए रखते हैं। ऐसे में व्यक्ति बिस्तर पर जाने के बाद भी मानसिक रूप से आराम की स्थिति में नहीं पहुंच पाता। नतीजा यह होता है कि सोने में देर लग सकती है और नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

    2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में विश्वविद्यालय के छात्रों पर मोबाइल के सोने से पहले इस्तेमाल का असर देखा गया। शोध में पाया गया कि सोने से पहले लंबे समय तक स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वालों में खराब नींद की संभावना अधिक थी। अध्ययन में मोबाइल के लंबे इस्तेमाल का संबंध एकाग्रता और कुछ प्रदर्शन संबंधी मापदंडों में कमी तथा प्रतिक्रिया समय बढ़ने से भी जोड़ा गया। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि इन निष्कर्षों को व्यापक आबादी पर लागू करने के लिए आगे बड़े अध्ययनों की जरूरत है।

    यहां सबसे जरूरी बात यह समझना है कि मोबाइल सीधे हमारे ब्रेन को खराब कर रहा है ऐसा कहना वैज्ञानिक तौर पर सही नहीं होगा। असल समस्या अक्सर मोबाइल इस्तेमाल से बनने वाली आदतों की होती है। यदि कोई व्यक्ति रात में देर तक फोन चलाता है और इसके कारण पर्याप्त नींद नहीं ले पाता तो अगले दिन थकान चिड़चिड़ापन ध्यान लगाने में कठिनाई और काम करने की क्षमता में कमी महसूस हो सकती है। लंबे समय तक खराब नींद बनी रहे तो इसका असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।

    एक अन्य 2026 के अध्ययन में वयस्कों के बीच सोशल मीडिया और सोने से पहले स्मार्टफोन इस्तेमाल का संबंध देखा गया। इसमें ज्यादा स्मार्टफोन निर्भरता और बिस्तर पर फोन इस्तेमाल का संबंध खराब नींद से पाया गया जबकि खराब नींद और कुछ कार्यकारी क्षमताओं जैसे वर्किंग मेमोरी तथा ध्यान नियंत्रित करने में आने वाली कठिनाइयों के बीच भी संबंध सामने आया। हालांकि यह अध्ययन भी कारण और परिणाम को पूरी तरह साबित नहीं करता।

    ऐसे में मोबाइल छोड़ना समाधान नहीं है बल्कि इस्तेमाल का तरीका बदलना ज्यादा जरूरी है। खासकर सोने से पहले फोन से दूरी बनाना एक आसान कदम हो सकता है। रात में स्क्रीन टाइम कम करना नोटिफिकेशन बंद रखना और फोन को बिस्तर से दूर रखना मददगार आदतें हो सकती हैं। दिन में भी बिना जरूरत बार बार फोन देखने की आदत को कम किया जा सकता है।

    मोबाइल हमारी जिंदगी को आसान बनाने वाली तकनीक है लेकिन जब यही तकनीक हमारी नींद और रोजमर्रा की एकाग्रता पर हावी होने लगे तो सावधान होने की जरूरत है। फिलहाल वैज्ञानिक प्रमाण यह नहीं कहते कि मोबाइल हमारे ब्रेन को सीधे स्थायी रूप से बदल रहा है लेकिन लगातार और खासकर रात में अत्यधिक इस्तेमाल नींद तथा उससे जुड़ी मानसिक कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सवाल मोबाइल छोड़ने का नहीं बल्कि यह तय करने का है कि मोबाइल हमें चला रहा है या हम मोबाइल को चला रहे हैं।

  • गोवा में घूमना फिरना है खास अनुभव: बीच हॉलीडे से एडवेंचर और स्वादिष्ट खानपान तक यात्रा को बनाएं यादगार

    गोवा में घूमना फिरना है खास अनुभव: बीच हॉलीडे से एडवेंचर और स्वादिष्ट खानपान तक यात्रा को बनाएं यादगार


    नई दिल्ली। भारत के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में शामिल गोवा अपनी खूबसूरत समुद्री तटों प्राकृतिक नजारों रंगीन संस्कृति और जीवंत माहौल के लिए जाना जाता है। छुट्टियों की योजना बनाते समय बड़ी संख्या में पर्यटक गोवा को अपनी पसंदीदा जगहों की सूची में शामिल करते हैं। यहां समुद्र किनारे आराम करने से लेकर ऐतिहासिक स्थलों को देखने और स्थानीय खानपान का स्वाद लेने तक पर्यटकों के लिए कई अनुभव मौजूद हैं। परिवार के साथ यात्रा करने वाले लोग हों या दोस्तों के साथ छुट्टियां बिताने वाले युवा गोवा हर तरह के यात्रियों को अलग अनुभव दे सकता है।

    गोवा की यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण यहां के समुद्र तट हैं। सुबह और शाम के समय समुद्र किनारे टहलना सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा देखना तथा लहरों के बीच समय बिताना यात्रा को खास बना देता है। कई पर्यटक समुद्र तटों पर आराम करने और प्रकृति के बीच कुछ शांत पल बिताने के लिए पहुंचते हैं। वहीं रोमांच पसंद करने वाले लोगों के लिए समुद्र से जुड़ी विभिन्न गतिविधियां यात्रा को और भी रोमांचक बना सकती हैं। हालांकि किसी भी एडवेंचर गतिविधि को करते समय सुरक्षा नियमों का पालन करना और अधिकृत संचालकों की सेवाएं लेना जरूरी है।

    गोवा केवल समुद्र तटों तक सीमित नहीं है। यहां की पुरानी इमारतें चर्च और सांस्कृतिक धरोहर भी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। गोवा के कई हिस्सों में पुर्तगाली स्थापत्य और स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। पुरानी गलियों में घूमते हुए रंगीन घरों और ऐतिहासिक इमारतों को देखना एक अलग अनुभव देता है। यात्रा के दौरान स्थानीय बाजारों में घूमना भी अच्छा विकल्प हो सकता है। यहां पर्यटक स्थानीय हस्तशिल्प कपड़े और स्मृति चिन्ह देख सकते हैं। खरीदारी करते समय बजट का ध्यान रखना जरूरी है ताकि यात्रा का खर्च अनावश्यक रूप से न बढ़े।

    गोवा का स्थानीय खानपान भी इसकी यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यहां विभिन्न प्रकार के समुद्री भोजन के साथ शाकाहारी विकल्प भी मिलते हैं। स्थानीय स्वाद और पारंपरिक व्यंजनों का अनुभव लेने के लिए साफ और विश्वसनीय स्थानों का चुनाव करना बेहतर रहता है। यात्रा के दौरान पर्याप्त पानी पीना और भोजन में संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है क्योंकि मौसम और यात्रा की थकान का असर स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

    अगर आप गोवा जाने की योजना बना रहे हैं तो यात्रा से पहले मौसम और ठहरने की व्यवस्था की जानकारी जरूर कर लें। व्यस्त पर्यटन सीजन में होटल और यात्रा सेवाओं की मांग बढ़ सकती है इसलिए पहले से योजना बनाने से सुविधा मिलती है। यात्रा के लिए अपने बजट को ठहरने खाने स्थानीय परिवहन और घूमने की गतिविधियों के अनुसार तय करना चाहिए। परिवार के साथ जा रहे हैं तो अपेक्षाकृत शांत और सुविधाजनक जगहों का चुनाव बेहतर हो सकता है जबकि दोस्तों के साथ यात्रा करने वाले लोग अपनी पसंद के अनुसार अलग अनुभव चुन सकते हैं।

    गोवा की यात्रा को यादगार बनाने के लिए केवल लोकप्रिय जगहों की सूची पूरी करने के बजाय वहां के माहौल और संस्कृति को समझने का प्रयास भी करना चाहिए। समुद्र किनारे शांत समय बिताना स्थानीय बाजारों में घूमना ऐतिहासिक स्थलों को देखना और स्थानीय भोजन का स्वाद लेना यात्रा को अधिक खास बना सकता है। पर्यटकों को पर्यावरण की सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए और समुद्र तटों तथा सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने से बचना चाहिए।

    कुल मिलाकर गोवा में घूमना फिरना प्रकृति रोमांच संस्कृति और आराम का शानदार अनुभव दे सकता है। सही योजना और बजट के साथ की गई यात्रा परिवार और दोस्तों के साथ यादगार पल बनाने का अवसर बन सकती है। चाहे आप समुद्र किनारे सुकून चाहते हों या नई जगहों को करीब से देखना चाहते हों गोवा हर यात्री को अपनी पसंद के अनुसार कुछ न कुछ खास अनुभव देने की क्षमता रखता है।

  • स्किन केयर में एलोवेरा का कमाल: ग्लो बढ़ाने और त्वचा को हाइड्रेट रखने के आसान घरेलू तरीके जानिए

    स्किन केयर में एलोवेरा का कमाल: ग्लो बढ़ाने और त्वचा को हाइड्रेट रखने के आसान घरेलू तरीके जानिए


    नई दिल्ली। आज के समय में धूल मिट्टी प्रदूषण तेज धूप और बदलती दिनचर्या का असर सबसे पहले हमारी त्वचा पर नजर आता है। लंबे समय तक धूप में रहने या पर्याप्त देखभाल नहीं करने से चेहरा रूखा बेजान और थका हुआ दिखाई दे सकता है। ऐसे में एलोवेरा त्वचा की सामान्य देखभाल के लिए एक आसान घरेलू विकल्प हो सकता है। एलोवेरा जेल में पानी की मात्रा अधिक होती है और इसे त्वचा पर लगाने से नमी और ठंडक का एहसास मिल सकता है। यही वजह है कि कई लोग इसे अपने स्किन केयर रूटीन का हिस्सा बनाते हैं। हालांकि एलोवेरा को किसी जादुई इलाज की तरह इस्तेमाल करने के बजाय त्वचा की सामान्य देखभाल के एक विकल्प के रूप में देखना बेहतर है।

    चेहरे पर एलोवेरा लगाने के लिए सबसे पहले त्वचा को अच्छी तरह साफ करना जरूरी है। इसके बाद एलोवेरा जेल की थोड़ी मात्रा लेकर चेहरे पर हल्के हाथों से लगाएं और कुछ देर के लिए छोड़ दें। अगर त्वचा इसे आसानी से स्वीकार करती है तो बाद में चेहरे को सामान्य पानी से धोया जा सकता है। इसके बाद हल्का मॉइस्चराइजर लगाने से त्वचा की नमी बनाए रखने में मदद मिल सकती है। एलोवेरा लगाने पर त्वचा को मुलायम और फ्रेश महसूस किया जा सकता है। खासकर रूखी त्वचा वाले लोगों को इसका हाइड्रेटिंग एहसास पसंद आ सकता है।

    एलोवेरा का इस्तेमाल करते समय यह समझना भी जरूरी है कि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है। किसी एक व्यक्ति को एलोवेरा लगाने से अच्छा अनुभव हो सकता है जबकि दूसरे व्यक्ति की त्वचा पर जलन या लालिमा हो सकती है। इसलिए पहली बार इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना समझदारी है। हाथ या बांह के छोटे हिस्से पर थोड़ी मात्रा लगाकर कुछ समय देखें। अगर खुजली जलन लालिमा या सूजन जैसी परेशानी दिखाई दे तो चेहरे पर इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। आंखों के आसपास भी इसे लगाने से बचना बेहतर है।

    सोशल मीडिया पर एलोवेरा के साथ नींबू बेकिंग सोडा या कई दूसरी चीजें मिलाकर लगाने के घरेलू नुस्खे खूब बताए जाते हैं। लेकिन त्वचा पर बिना सोचे समझे ऐसे प्रयोग करना नुकसानदायक हो सकता है। खासकर संवेदनशील त्वचा पर तेज या परेशान करने वाली सामग्री जलन बढ़ा सकती है। इसलिए एलोवेरा का इस्तेमाल सरल तरीके से करना बेहतर है। अगर बाजार से एलोवेरा जेल खरीद रहे हैं तो पैकेट पर दी गई सामग्री जरूर पढ़ें और ऐसे उत्पाद का चुनाव करें जिसमें आपकी त्वचा के लिए अनावश्यक परेशान करने वाले तत्व कम हों।

    एलोवेरा के साथ रोजाना की स्किन केयर में कुछ और आदतों को शामिल करना भी जरूरी है। चेहरा साफ रखना पर्याप्त पानी पीना संतुलित खानपान लेना और धूप में निकलते समय सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना त्वचा की देखभाल के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। केवल एलोवेरा लगाने से त्वचा की हर समस्या खत्म नहीं हो सकती। अगर चेहरे पर लगातार लालिमा खुजली सूजन या किसी तरह की गंभीर समस्या बनी रहती है तो घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होगा।

    कुल मिलाकर एलोवेरा त्वचा की सामान्य देखभाल में एक सरल और सुविधाजनक विकल्प हो सकता है। इसका सही और सावधानीपूर्वक इस्तेमाल त्वचा को नमी और ताजगी का एहसास देने में मदद कर सकता है। लेकिन बेहतर त्वचा के लिए नियमित स्किन केयर स्वस्थ खानपान पर्याप्त नींद और धूप से बचाव को भी अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना जरूरी है।

  • चेहरे की थकान और रूखेपन का आसान इलाज है खीरा, ग्लोइंग स्किन के लिए ऐसे बनाएं घरेलू नुस्खा

    चेहरे की थकान और रूखेपन का आसान इलाज है खीरा, ग्लोइंग स्किन के लिए ऐसे बनाएं घरेलू नुस्खा


    नई दिल्ली । खीरा गर्मियों में शरीर को ठंडक देने वाली सब्जियों में गिना जाता है लेकिन इसका इस्तेमाल केवल खाने तक सीमित नहीं है। त्वचा की देखभाल के लिए भी खीरे का इस्तेमाल लंबे समय से घरेलू उपाय के तौर पर किया जाता रहा है। खीरे में पानी की मात्रा अधिक होती है और इसमें कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसे त्वचा को तरोताजा रखने वाली प्राकृतिक चीजों में शामिल किया जाता है। खासतौर पर धूप और गर्मी के कारण चेहरा थका हुआ और बेजान नजर आने लगे तो खीरे का इस्तेमाल त्वचा को ठंडक देने में मदद कर सकता है।

    खीरे का सबसे आसान इस्तेमाल इसका रस चेहरे पर लगाना है। इसके लिए खीरे को अच्छी तरह धोकर उसका रस निकाला जा सकता है। कॉटन की मदद से इसे चेहरे पर हल्के हाथों से लगाया जा सकता है। कुछ देर बाद चेहरे को सामान्य पानी से धो लें। इससे त्वचा को ताजगी महसूस हो सकती है। हालांकि संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को किसी भी घरेलू चीज को पूरे चेहरे पर लगाने से पहले थोड़ी मात्रा में पैच टेस्ट जरूर करना चाहिए।

    खीरे के टुकड़ों को सीधे चेहरे पर लगाने का तरीका भी काफी आसान है। ठंडे खीरे के पतले टुकड़े आंखों के आसपास कुछ देर रखने से थकी हुई आंखों और आसपास की त्वचा को ठंडक मिल सकती है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने या पर्याप्त आराम न मिलने के कारण आंखों के आसपास थकान दिखाई दे तो यह तरीका कुछ लोगों को आरामदायक लग सकता है। हालांकि आंखों में खीरे का रस जाने से बचना चाहिए।

    खीरे का फेस पैक भी घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है। खीरे को पीसकर उसमें एलोवेरा जेल मिलाकर चेहरे पर लगाया जा सकता है। यह मिश्रण त्वचा को ठंडक और नमी देने में मदद कर सकता है। अगर त्वचा बहुत संवेदनशील है तो नींबू या दूसरे तेज पदार्थ मिलाने से बचना बेहतर है क्योंकि इससे जलन या संवेदनशीलता बढ़ सकती है।

    रूखी त्वचा वाले लोग खीरे के साथ ऐसा प्राकृतिक मॉइस्चराइजिंग मिश्रण इस्तेमाल कर सकते हैं जो त्वचा को अतिरिक्त नमी देने में मदद करे। वहीं तैलीय त्वचा में भी खीरे का इस्तेमाल चेहरे को ताजा महसूस कराने के लिए किया जा सकता है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि खीरा किसी गंभीर त्वचा समस्या जैसे मुहांसे संक्रमण या एलर्जी का इलाज नहीं है।

    त्वचा को स्वस्थ रखने के लिए केवल बाहरी उपायों पर निर्भर रहना भी सही नहीं है। पर्याप्त पानी पीना संतुलित भोजन लेना अच्छी नींद लेना और धूप में निकलते समय सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना भी जरूरी है। चेहरे को साफ रखना और बार बार हाथ लगाने से बचना भी त्वचा की देखभाल का अहम हिस्सा है।

    अगर खीरा लगाने के बाद चेहरे पर लालिमा जलन खुजली या सूजन दिखाई दे तो इसका इस्तेमाल तुरंत बंद कर देना चाहिए। लगातार बनी रहने वाली त्वचा संबंधी समस्या में त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर होता है। कुल मिलाकर खीरा त्वचा की नियमित देखभाल में एक आसान और कम खर्च वाला घरेलू विकल्प हो सकता है जो त्वचा को ताजगी और ठंडक का एहसास देने में मदद कर सकता है।

  • रेबीज वैक्सीन के नाम पर बड़ा खेल! Abhayrab के संदिग्ध वायल जांच में फेल, पैकेजिंग में मिलीं 17 गड़बड़ियां

    रेबीज वैक्सीन के नाम पर बड़ा खेल! Abhayrab के संदिग्ध वायल जांच में फेल, पैकेजिंग में मिलीं 17 गड़बड़ियां


    नई दिल्ली । रेबीज जैसी गंभीर बीमारी से बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाली वैक्सीन को लेकर सामने आई एक खबर ने स्वास्थ्य क्षेत्र में चिंता बढ़ा दी है। Abhayrab वैक्सीन के बैच नंबर KE25012 से जुड़े कुछ वायल दिल्ली के मुखर्जी नगर स्थित एक बिना लाइसेंस वाले परिसर से बरामद किए गए हैं। जांच के दौरान इन वायल के एक सैंपल को जरूरी potency test में तय मानकों पर खरा नहीं पाया गया। इसके बाद संबंधित बैच को Not of Standard Quality यानी निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं माना गया है। साथ ही बरामद वायल के नकली होने की आशंका को लेकर भी जांच की जा रही है।

    मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि रेबीज एक बेहद खतरनाक बीमारी है और संक्रमित जानवर के काटने के बाद समय पर सही उपचार और प्रभावी वैक्सीन लेना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। अधिकारियों के अनुसार दिल्ली से बरामद किए गए संदिग्ध वायल को जांच के लिए सरकारी प्रयोगशाला भेजा गया था। केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला कसौली में हुई जांच में सैंपल जरूरी potency मानक को पूरा नहीं कर सका। इसके बाद नियामक स्तर पर राज्यों को सतर्क किया गया है।

    इस मामले में वैक्सीन बनाने वाली Indian Immunologicals Limited ने भी महत्वपूर्ण जानकारी दी है। कंपनी का कहना है कि जांच में मिले वायल उसकी ओर से तैयार नहीं किए गए हैं। कंपनी के मुताबिक बरामद पैकेज पर Abhayrab का नाम और KE25012 बैच नंबर जरूर लिखा था लेकिन जब इन्हें कंपनी के रिकॉर्ड और सुरक्षित रखे गए वास्तविक सैंपल से मिलाया गया तो कई अंतर सामने आए। कंपनी ने लेबल और पैकेजिंग से लेकर QR कोड कैप के रंग लाइसेंस संबंधी जानकारी और अन्य विवरणों में अंतर होने की बात कही है। कंपनी के अनुसार कुल 17 तरह की विसंगतियां सामने आई हैं। इन्हीं आधारों पर इन वायल के नकली होने की आशंका की जांच की जा रही है।

    मामले के बाद Drugs Controller General of India यानी DCGI ने राज्यों के ड्रग कंट्रोलर्स को संबंधित बैच की बिक्री और वितरण पर निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों को संदिग्ध वायल मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई करने को कहा गया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक दिल्ली पुलिस ने इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया है और अब जांच का फोकस इस बात पर है कि संदिग्ध वायल कहां से आए और क्या इन्हें किसी नेटवर्क के जरिए अलग-अलग स्थानों तक पहुंचाया गया।

    कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसके अधिकृत चैनल से सप्लाई की गई Abhayrab वैक्सीन इस मामले से प्रभावित नहीं है। कंपनी के अनुसार मूल बैच KE25012 में 83 हजार 370 वायल थे जिन्हें अधिकृत माध्यमों से वितरित किया गया था। हालांकि जांच के दायरे में आए संदिग्ध वायल की वास्तविक संख्या और उनकी पहुंच को लेकर पूरी तस्वीर जांच आगे बढ़ने के बाद ही साफ होगी।

    गौर करने वाली बात यह है कि Abhayrab को लेकर इससे पहले भी नकली वैक्सीन का मामला सामने आ चुका है। जनवरी 2025 में कंपनी ने एक अन्य बैच के नाम पर नकली वैक्सीन बाजार में आने की जानकारी ड्रग रेगुलेटर को दी थी। मौजूदा मामले ने एक बार फिर दवा और वैक्सीन की सप्लाई चेन पर निगरानी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    ऐसे में लोगों को घबराने के बजाय सतर्क रहने की जरूरत है। अगर किसी व्यक्ति को जानवर ने काटा है तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। वैक्सीन लगवाने से पहले अस्पताल या अधिकृत स्वास्थ्य केंद्र से उसकी उपलब्धता और स्रोत की पुष्टि करना भी महत्वपूर्ण है। संदिग्ध पैकेजिंग या वैक्सीन को लेकर कोई शंका हो तो खुद से निर्णय लेने के बजाय डॉक्टर या संबंधित स्वास्थ्य अधिकारी से संपर्क करना बेहतर है। इस मामले में अंतिम स्थिति जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

  • छाले मुंह में और दर्द कान में आखिर ऐसा क्यों होता है शरीर की नसों का ये कनेक्शन आपको हैरान कर देगा

    छाले मुंह में और दर्द कान में आखिर ऐसा क्यों होता है शरीर की नसों का ये कनेक्शन आपको हैरान कर देगा


    नई दिल्ली । मुंह में छाले होना एक आम समस्या है और ज्यादातर लोग इसे कुछ दिनों में अपने आप ठीक होने वाली परेशानी मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन कई बार मुंह में छाले होने के साथ कान में भी दर्द महसूस होने लगता है। ऐसी स्थिति में लोगों के मन में सवाल उठता है कि जब परेशानी मुंह के अंदर है तो कान में दर्द आखिर क्यों हो रहा है। दरअसल मुंह कान गले और चेहरे के आसपास के हिस्सों के बीच नसों का जटिल नेटवर्क मौजूद होता है। इसी वजह से एक जगह होने वाली परेशानी का असर दूसरी जगह दर्द के रूप में महसूस हो सकता है।

    मुंह में मौजूद छाले खासतौर पर जीभ के पीछे या मुंह के ऐसे हिस्से में हों जहां नसों की संवेदनशीलता अधिक हो तो उनका दर्द आसपास के हिस्सों तक महसूस हो सकता है। इसे referred pain यानी दूसरी जगह महसूस होने वाला दर्द कहा जाता है। ऐसे मामलों में दर्द का वास्तविक स्रोत मुंह में हो सकता है लेकिन व्यक्ति को उसका असर कान के आसपास महसूस होता है। यह स्थिति हर व्यक्ति में एक जैसी नहीं होती और दर्द की तीव्रता भी अलग हो सकती है।

    कान में दर्द के पीछे केवल मुंह के छाले ही जिम्मेदार नहीं होते। दांतों में संक्रमण मसूड़ों की परेशानी गले में सूजन टॉन्सिल की समस्या या जबड़े के आसपास होने वाली दिक्कत भी कान तक दर्द पहुंचा सकती है। कई बार कान में संक्रमण होने पर भी दर्द आसपास के चेहरे और जबड़े के हिस्से में महसूस होता है। इसलिए केवल कान में दर्द होने के आधार पर इसका कारण तय करना सही नहीं है।

    मुंह के छाले कई वजहों से हो सकते हैं। तनाव नींद की कमी मुंह में चोट बहुत ज्यादा मसालेदार भोजन या पोषण संबंधी कमी कुछ लोगों में छालों की समस्या से जुड़ी हो सकती है। आमतौर पर छोटे छाले कुछ समय में ठीक हो जाते हैं। इस दौरान बहुत ज्यादा तीखा या खट्टा भोजन खाने से बचना राहत दे सकता है। पर्याप्त पानी पीना और मुंह की साफ सफाई बनाए रखना भी जरूरी है।

    अगर छाले के साथ कान में हल्का दर्द है और कुछ दिनों में दोनों समस्याएं कम हो रही हैं तो आमतौर पर ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं होती। लेकिन अगर दर्द लगातार बढ़ रहा है या छाला बार बार हो रहा है तो इसकी वजह समझना जरूरी है। खासतौर पर यदि छाला लंबे समय तक ठीक न हो मुंह में लगातार सूजन या खून आए निगलने में परेशानी हो तेज बुखार हो या कान से संबंधित अन्य लक्षण दिखाई दें तो डॉक्टर या विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।

    बार बार होने वाले मुंह के छालों को भी केवल सामान्य समस्या मानकर लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कुछ मामलों में डॉक्टर जांच के बाद पोषण संबंधी कमी संक्रमण या किसी अन्य कारण की पहचान कर सकते हैं। इसी तरह लगातार कान दर्द होने पर ईएनटी विशेषज्ञ से जांच कराना उपयोगी हो सकता है।

    कुल मिलाकर मुंह के छाले और कान के दर्द के बीच सीधा संबंध हर मामले में नहीं होता लेकिन शरीर में नसों और आसपास के अंगों के आपसी कनेक्शन के कारण एक जगह की समस्या का दर्द दूसरी जगह महसूस हो सकता है। इसलिए दर्द की सही वजह समझना सबसे जरूरी है। घरेलू उपायों से राहत न मिले या लक्षण लगातार बने रहें तो विशेषज्ञ की सलाह लेना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।

  • ब्रेन एजिंग को धीमा करने का असरदार फॉर्मूला! उम्र बढ़ने पर भी दिमाग को जवान रखने में मदद कर सकता है संगीत

    ब्रेन एजिंग को धीमा करने का असरदार फॉर्मूला! उम्र बढ़ने पर भी दिमाग को जवान रखने में मदद कर सकता है संगीत


    नई दिल्ली । उम्र बढ़ना जीवन (Life)की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और इसके साथ शरीर के साथ-साथ दिमाग में भी कई तरह के बदलाव आने लगते हैं। बढ़ती उम्र में अक्सर लोगों को चीजें याद रखने में परेशानी होने लगती है किसी व्यक्ति(Decline) का नाम तुरंत याद नहीं आता या फिर एक साथ कई काम करने में पहले जैसी आसानी महसूस नहीं होती। सोचने समझने और जानकारी को प्रोसेस करने की गति भी समय के साथ प्रभावित हो सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि उम्र बढ़ने के साथ दिमागी क्षमता में गिरावट को पूरी तरह स्वीकार कर लिया जाए। विशेषज्ञों और अध्ययनों के अनुसार स्वस्थ जीवनशैली के साथ कुछ मानसिक गतिविधियां दिमाग को लंबे समय तक सक्रिय और मजबूत बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। इनमें संगीत सीखना और किसी वाद्य यंत्र को बजाने का अभ्यास एक दिलचस्प और प्रभावी तरीका माना जा रहा है।

    उम्र के साथ मस्तिष्क में धीरे-धीरे संरचनात्मक बदलाव होते हैं। कई लोगों में न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन बनाने और सूचनाओं को तेजी से प्रोसेस करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। मेडिकल रिपोर्ट्स में बताया गया है कि 40 वर्ष की आयु के बाद मस्तिष्क में होने वाले कुछ बदलाव अधिक स्पष्ट हो सकते हैं। इस प्रक्रिया को ब्रेन एट्रोफी या ब्रेन श्रिंकेज कहा जाता है। हालांकि हर व्यक्ति में इसका असर एक जैसा नहीं होता। व्यक्ति की जीवनशैली शिक्षा तनाव का स्तर सामाजिक सक्रियता और शारीरिक स्वास्थ्य जैसे कई कारक दिमाग पर उम्र के प्रभाव को प्रभावित कर सकते हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि कम उम्र से ही खानपान और जीवनशैली को बेहतर बनाने पर ध्यान देना जरूरी है। नियमित एक्सरसाइज अच्छी नींद संतुलित भोजन और मानसिक रूप से सक्रिय रहने की आदत ब्रेन हेल्थ को बनाए रखने में मदद कर सकती है। इसके साथ ही संगीत से जुड़ी गतिविधियां दिमाग के लिए खासतौर पर उपयोगी हो सकती हैं। किसी संगीत वाद्य यंत्र को सीखते समय दिमाग के कई हिस्से एक साथ सक्रिय होते हैं और यही इसे एक तरह का फुल ब्रेन वर्कआउट बनाता है।

    जब कोई व्यक्ति पियानो गिटार तबला वायलिन या अन्य वाद्य यंत्र बजाना सीखता है तो हाथों और अंगुलियों की गतिविधि के लिए मोटर कॉर्टेक्स सक्रिय होता है। स्वर और ताल को पहचानने के लिए ऑडिटरी सिस्टम काम करता है जबकि याददाश्त और एकाग्रता से जुड़े हिस्सों को भी लगातार सक्रिय रहना पड़ता है। संगीत के दौरान भावनात्मक प्रतिक्रिया और रचनात्मकता भी दिमाग की गतिविधियों का हिस्सा बनती है। यही कारण है कि संगीत प्रशिक्षण को मानसिक लचीलापन बढ़ाने वाली गतिविधियों में शामिल किया जाता है।

    अध्ययनों के अनुसार उम्र बढ़ने के बावजूद मस्तिष्क में नई तंत्रिका कड़ियां बनाने की क्षमता बनी रह सकती है। ऐसे में लगातार नई चीजें सीखना और दिमाग को चुनौती देने वाली गतिविधियों में शामिल होना उपयोगी हो सकता है। संगीत सीखना इस दिशा में एक रोचक विकल्प है क्योंकि इसमें सुनना समझना याद रखना हाथों की गतिविधियों को नियंत्रित करना और भावनात्मक रूप से जुड़ना एक साथ शामिल होता है।

    बढ़ती उम्र के साथ दिमाग की कोशिकाओं के बीच संचार की गति धीमी पड़ सकती है और स्मृति ध्यान तथा निर्णय क्षमता से जुड़े हिस्सों में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। कुछ अध्ययनों में उम्र के साथ ग्रे मैटर और व्हाइट मैटर में भी कमी की बात सामने आई है। फिर भी स्वस्थ जीवनशैली और मानसिक सक्रियता इन बदलावों की गति को प्रभावित कर सकती है। महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद होने वाले हार्मोनल बदलाव भी स्मृति और संज्ञानात्मक क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में महिलाओं के लिए भी संगीत योग ध्यान और सामाजिक जुड़ाव जैसी गतिविधियां ब्रेन हेल्थ को बेहतर बनाए रखने में सहायक हो सकती हैं।

    कुल मिलाकर बढ़ती उम्र को दिमाग की कमजोरी का अंतिम संकेत मानने की जरूरत नहीं है। नियमित शारीरिक गतिविधि पर्याप्त नींद संतुलित खानपान मानसिक व्यायाम और संगीत जैसी नई चीजें सीखने की आदत दिमाग को सक्रिय रखने में मदद कर सकती है। उम्र चाहे जो भी हो दिमाग को चुनौती देना और लगातार कुछ नया सीखते रहना मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

  • World Physiotherapy Day 2026: स्ट्रोक के बाद फिजियोथेरेपी क्यों है बेहद जरूरी, जानिए मूवमेंट, बैलेंस और रिकवरी में इसके बड़े फायदे

    World Physiotherapy Day 2026: स्ट्रोक के बाद फिजियोथेरेपी क्यों है बेहद जरूरी, जानिए मूवमेंट, बैलेंस और रिकवरी में इसके बड़े फायदे

    नई दिल्ली । दुनियाभर में 8 सितंबर को विश्व फिजियोथेरेपी दिवस 2026 मनाया जाता है। इसका मकसद लोगों को फिजियोथेरेपी के फायदों के बारे में जागरूक करना है। इस बार की थीम हार्ट डिजीज और स्ट्रोक की रोकथाम, प्रबंधन और रिहैबिलिटेशन में फिजियोथेरेपी की भूमिका पर केंद्रित है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि फिजियोथेरेपी केवल हड्डियों की बीमारियों के लिए नहीं बल्कि स्ट्रोक के बाद रिहैबिलिटेशन के लिए भी जरूरी है।

    एक्सपर्ट्स का कहना है कि फिजियोथेरेपी को लोग अक्सर केवल कमर, घुटने या कंधे के दर्द से जोड़कर देखते हैं, लेकिन इसका दायरा इससे कहीं बड़ा है। नियमित और सही तरीके से की गई फिजियोथेरेपी हार्ट डिजीज से बचाव में मदद कर सकती है। दूसरी तरफ, अगर किसी व्यक्ति को स्ट्रोक आ जाता है तो रिहैबिलिटेशन के लिए भी फिजियोथेरेपी जरूरी है। इसकी मदद से स्ट्रोक के बाद आने वाली परेशानी को काबू में किया जा सकता है।

    स्ट्रोक के बाद मरीज में हाथ-पैर की कमजोरी, चलने में परेशानी, संतुलन बिगड़ना और रोजमर्रा के काम करने में दिक्कत हो सकती है। विशेषज्ञ के अनुसार, मरीज की स्थिति के अनुरूप फिजियोथेरेपी और रिहैबिलिटेशन से मूवमेंट और बैलेंस बेहतर करने में मदद मिल सकती है। स्ट्रोक के बाद रिहैबिलिटेशन को केवल अस्पताल तक सीमित नहीं रखना चाहिए। मरीज और परिवार को घर पर भी सुरक्षित तरीके से एक्सरसाइज करनी चाहिए।

    फिजियोथेरेपी में टेक्नोलॉजी का बढ़ता इस्तेमाल फिजियोथेरेपी भी अब तेजी से टेक्नोलॉजी आधारित हो रही है। मोशन एनालिसिस, सेंसर-बेस्ड मॉनिटरिंग, वियरेबल डिवाइस, डिजिटल एक्सरसाइज प्रोग्राम और रोबोटिक रिहैबिलिटेशन जैसी तकनीकें आ रही हैं।

    डॉ. इंद्रमणि उपाध्याय बताते हैं कि आज की सबसे बड़ी समस्या ‘कम मूवमेंट वाली लाइफस्टाइल’ है। ऑफिस में घंटों बैठना, स्क्रीन टाइम बढ़ना और एक्सरसाइज की कमी शरीर को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है। ऐसे में हर उम्र के व्यक्ति के लिए एक्सरसाइज करना जरूरी है। इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि ये आपको हार्ट डिजीज से लेकर कई बीमारियों से बचा सकती है।

  • स्ट्रोक के बाद कमजोरी और बिगड़े संतुलन से मिलेगी राहत! फिजियोथेरेपी क्यों है मरीजों के लिए जरूरी, डॉक्टर से समझें

    स्ट्रोक के बाद कमजोरी और बिगड़े संतुलन से मिलेगी राहत! फिजियोथेरेपी क्यों है मरीजों के लिए जरूरी, डॉक्टर से समझें

    नई दिल्ली । हर साल 8 सितंबर को विश्व फिजियोथेरेपी दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को फिजियोथेरेपी के महत्व और इसके स्वास्थ्य संबंधी फायदों के प्रति जागरूक करना है। आमतौर पर लोग फिजियोथेरेपी को केवल कमर दर्द घुटनों के दर्द कंधे की समस्या या हड्डियों से जुड़ी परेशानियों से जोड़कर देखते हैं लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इसका दायरा इससे कहीं ज्यादा बड़ा है। सही समय पर और विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार की गई फिजियोथेरेपी हार्ट हेल्थ को बेहतर बनाए रखने के साथ ही स्ट्रोक के बाद मरीज के रिहैबिलिटेशन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    स्ट्रोक के बाद मरीज को कई तरह की शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। कई लोगों में हाथ और पैरों में कमजोरी आ जाती है जबकि कुछ मरीजों को चलने फिरने में परेशानी होने लगती है। शरीर का संतुलन बिगड़ना और रोजमर्रा के सामान्य कामों को करने में कठिनाई भी स्ट्रोक के बाद होने वाली समस्याओं में शामिल हो सकती है। ऐसे समय में मरीज की स्थिति के अनुसार शुरू किया गया फिजियोथेरेपी और रिहैबिलिटेशन कार्यक्रम उसकी मूवमेंट और बैलेंस को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि स्ट्रोक के बाद रिहैबिलिटेशन को केवल अस्पताल तक सीमित नहीं रखना चाहिए। मरीज के उपचार और उसकी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए घर पर भी सुरक्षित तरीके से एक्सरसाइज और गतिविधियां जारी रखना उपयोगी हो सकता है। हालांकि किसी भी प्रकार की एक्सरसाइज बिना डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह के शुरू नहीं करनी चाहिए। हर स्ट्रोक मरीज की स्थिति अलग हो सकती है इसलिए उसके लिए रिहैबिलिटेशन का तरीका भी व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार तय किया जाना जरूरी है।

    फिजियोथेरेपी का मुख्य उद्देश्य केवल दर्द कम करना नहीं है बल्कि शरीर की कार्यक्षमता और मूवमेंट को बेहतर बनाने में मदद करना भी है। स्ट्रोक के बाद शरीर के प्रभावित हिस्सों को दोबारा सक्रिय करने के लिए नियमित और सही अभ्यास महत्वपूर्ण हो सकता है। एक्सरसाइज और रिहैबिलिटेशन की मदद से मरीज को शरीर की गतिविधियों पर बेहतर नियंत्रण पाने और संतुलन सुधारने में सहायता मिल सकती है। इससे धीरे-धीरे रोजमर्रा के कामों को करने में भी मदद मिल सकती है।

    आज फिजियोथेरेपी का क्षेत्र तेजी से तकनीक आधारित भी होता जा रहा है। मोशन एनालिसिस सेंसर बेस्ड मॉनिटरिंग वियरेबल डिवाइस डिजिटल एक्सरसाइज प्रोग्राम और रोबोटिक रिहैबिलिटेशन जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है। इन आधुनिक तरीकों की मदद से मरीज की गतिविधियों को बेहतर तरीके से समझने और उसकी प्रगति पर नजर रखने में सहायता मिल सकती है।

    विश्व फिजियोथेरेपी दिवस के मौके पर विशेषज्ञ कम मूवमेंट वाली लाइफस्टाइल को भी बड़ी समस्या मानते हैं। आज के समय में घंटों तक ऑफिस में बैठे रहना बढ़ता स्क्रीन टाइम और एक्सरसाइज की कमी शरीर को धीरे-धीरे कमजोर कर सकती है। शारीरिक गतिविधि कम होने से कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए केवल बीमारी या दर्द होने के बाद ही नहीं बल्कि स्वस्थ रहने के लिए भी हर उम्र के लोगों को अपनी दिनचर्या में नियमित शारीरिक गतिविधि को शामिल करना चाहिए।

    कुल मिलाकर फिजियोथेरेपी को केवल हड्डियों और जोड़ों के दर्द तक सीमित समझना सही नहीं है। स्ट्रोक के बाद सही रिहैबिलिटेशन मरीज की मूवमेंट और संतुलन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। विशेषज्ञ की निगरानी में नियमित एक्सरसाइज और सक्रिय जीवनशैली अपनाकर शरीर की कार्यक्षमता को बेहतर बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है।

  • जल्दी बॉडी बनाने की चाहत में खतरनाक स्टेरॉयड ले रहे युवा, किडनी, लिवर और दिल पर बढ़ सकता है गंभीर जोखिम

    जल्दी बॉडी बनाने की चाहत में खतरनाक स्टेरॉयड ले रहे युवा, किडनी, लिवर और दिल पर बढ़ सकता है गंभीर जोखिम

    नई दिल्ली । तेजी से मसल्स बढ़ाने और शरीर को भारी बनाने की चाहत में जिम जाने वाले कुछ युवा अब सामान्य एक्सरसाइज, संतुलित आहार और प्रोटीन तक सीमित नहीं रह गए हैं। कम समय में ज्यादा मसल्स हासिल करने के लिए कुछ लोग ऐसे स्टेरॉयड इंजेक्शन का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनका उपयोग पशुओं में किया जाता है। बोल्डेनोन, ट्रेनबोलोन और नैंड्रोलोन जैसे स्टेरॉयड इसी वजह से चिंता का विषय बन रहे हैं।

    बाहर से इन दवाओं का असर मांसपेशियों के आकार और शरीर की बनावट में बदलाव के रूप में दिखाई दे सकता है, लेकिन शरीर के भीतर इनका प्रभाव कहीं अधिक गंभीर हो सकता है। स्टेरॉयड के अनियंत्रित इस्तेमाल से हार्मोनल संतुलन प्रभावित होने के साथ किडनी, लिवर और हृदय से जुड़े जोखिम बढ़ने की आशंका रहती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ बिना चिकित्सकीय सलाह ऐसे पदार्थों के इस्तेमाल से बचने की सलाह देते हैं।

    चेन्नई स्थित स्टैनले मेडिकल कॉलेज में हुई रिसर्च में 18 से 50 वर्ष की उम्र के 161 पुरुष जिम करने वालों को शामिल किया गया। इनमें 57 लोगों में ऐसे शारीरिक बदलाव पाए गए, जो स्टेरॉयड के इस्तेमाल से जुड़े थे। खास बात यह रही कि प्रभावित लोगों में बड़ी संख्या 18 से 25 वर्ष की उम्र के युवाओं की थी। इससे कम उम्र में शरीर को तेजी से बदलने की कोशिश को लेकर चिंता बढ़ती है।

    रिसर्च में स्टेरॉयड इस्तेमाल करने वाले लोगों के रक्त परीक्षण में क्रिएटिनिन और लिवर एंजाइम का स्तर अधिक पाया गया। क्रिएटिनिन किडनी की कार्यप्रणाली से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संकेतक है, जबकि लिवर एंजाइम में बदलाव शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव की ओर संकेत कर सकता है। हालांकि केवल इन परीक्षणों के आधार पर किसी व्यक्ति में स्थायी अंग क्षति का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, लेकिन ऐसे बदलाव चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत जरूर बताते हैं।

    स्टेरॉयड के इस्तेमाल को लेकर एक और महत्वपूर्ण पहलू इसका बंद किया जाना है। 79 पुरुषों पर किए गए एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि स्टेरॉयड छोड़ने के तीन महीने बाद वजन में उल्लेखनीय कमी देखी गई। इसका मतलब यह है कि स्टेरॉयड के जरिए हासिल किए गए शारीरिक बदलाव हमेशा स्थायी नहीं रहते। इस्तेमाल बंद होने के बाद शरीर में पहले दिखाई देने वाला वजन और मांसपेशियों का आकार कम हो सकता है।

    युवाओं में स्टेरॉयड लेने की प्रवृत्ति के पीछे जल्दी परिणाम पाने की इच्छा एक बड़ी वजह मानी जा रही है। सोशल मीडिया पर तेजी से बदली हुई बॉडी और मसल्स को देखकर कई लोग प्राकृतिक तरीके से मांसपेशियां विकसित करने के बजाय शॉर्टकट तलाशते हैं। समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब बिना सही जानकारी के पशुओं के लिए बनाई गई दवाओं को इंसानों पर इस्तेमाल किया जाता है।

    स्वस्थ तरीके से मसल्स बढ़ाने में समय लगता है। नियमित व्यायाम, पर्याप्त आराम, संतुलित आहार और शरीर की जरूरत के अनुसार प्रोटीन का सेवन सुरक्षित तरीके से फिटनेस सुधारने में मदद कर सकता है। किसी भी स्टेरॉयड या हार्मोन संबंधी दवा का इस्तेमाल विशेषज्ञ की सलाह के बिना नहीं किया जाना चाहिए। तेजी से बदली हुई बॉडी आकर्षक दिखाई दे सकती है, लेकिन उसके पीछे छिपे स्वास्थ्य जोखिम लंबे समय तक परेशानी पैदा कर सकते हैं।